पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तभी गणतंत्र सुरक्षित रहेगा

press freedom

Journalists will be safe only then the republic will be safe

“पृथ्वी पर मीडिया का सबसे शक्तिशाली अस्तित्व है। उनके पास निर्दोष को अपराधी बनाने और दोषी को निर्दोष बनाने की शक्ति है, क्योंकि वे जनता के दिमाग को नियंत्रित करते हैं “- मैल्कम एक्स

पत्रकारों की सुरक्षा क्यों जरूरी है? पत्रकारों की सुरक्षा कैसे?

आज, पूरे विश्व में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पहले और सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश सदस्य संसद लार्ड मैकॉले ने मीडिया को यह दर्जा दिया था। किसी भी प्रजातांत्रिक सरकार प्रणाली में तीन प्रशासनिक निकाय होते हैं   

1 . विधायिका  

2 . कार्यपालिका   

3 . न्यायपालिका                                                     

इन तीनों निकायों में से किसी की अनुपस्थिति में सरकार व्यवस्थित नहीं चल सकती। इन तीनों का एक साथ होना जरूरी है और इन तीनों के कार्य पारदर्शी एवं जनहित में हों, यह कार्य प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का है। इसलिये इस चौथी कड़ी का मज़बूत होना बहुत ही ज़रूरी है। प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, वहीं तीनों स्तंभों की निगरानी करने वाला चौथा स्तंभ बिना किसी संवैधानिक सुरक्षा के कार्य करता है। बावजूद इसके मीडिया बिना संवैधानिक सुरक्षा के प्रशासनिक निकायों और आम जनता के बीच एक जानकारीपूर्ण पुल के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मीडिया के माध्यम से ही आम जनता को सरकार की नीतियों की जानकारी मिलती है और कई बार मीडिया सरकार की गलत नीतियों का जनहित में विरोध भी करता है जनता की आवाज़ बन कर।

मीडिया नहीं होता, तो लोगों को इस बात की जानकारी कभी नहीं होती कि संसद में किस तरह के बिल और कार्यवाही पारित किये जाते हैं और समाज में सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव उस बिल से क्या होंगे। यदि मीडिया अपनी आंखें बंद कर ले, तो पूरी व्यवस्था निरंकुश हो जायेगी। इसलिए मीडिया सरकारी गतिविधियों और आम जनता के बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण और निष्पक्ष भूमिका निभाता है, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि मीडिया की स्वतंत्रता गणतंत्र की सफलता की गारंटी है।

लोकतंत्र की रीढ़ है मीडिया की स्वतंत्रता

स्वस्थ लोकतंत्र को आकार देने में मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह लोकतंत्र की रीढ़ है। मीडिया हमें दुनिया भर में होनेवाले विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों से अवगत कराता है। यह एक दर्पण की तरह है, जो हमें दिखाता है या हमें सच्चाई और कठोर वास्तविकताओं को दिखाने का प्रयास करता है।

मीडिया ने नि:संदेह विकास किया है और हाल के वर्षों में अधिक सक्रिय हो गया है। यह मीडिया ही है, जो राजनेताओं को चुनाव के समय अपने अधूरे वादों के बारे में याद दिलाता है। चुनाव के दौरान न्यूज़ चैनल अत्यधिक कवरेज लोगों तक पहुंचाता है; विशेषकर अशिक्षित व्यक्ति को भी सत्ता के चुनाव में मदद करता है। यह अनुस्मारक सत्ता में बने रहने के लिए राजनेताओं को अपने वादे के लिए मजबूर करता है। टेलीविजन और रेडियो ने ग्रामीण लोगों को अपनी भाषा में सभी घटनाओं के बारे में जागरूक करने में ग्रामीणों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। गांव के सिर और धन के शोषणकर्ताओं के शोषण के अपशिष्टों के कवरेज ने सरकार के ध्यान को आकर्षित करके उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने में मदद की है।

मीडिया भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कमियों को उजागर करता है, जो आखिरकार सरकारों को कमियों की रिक्तता को भरने और एक प्रणाली को अधिक जवाबदेह, उत्तरदायी और नागरिक-अनुकूल बनाने में मदद करता है।

मीडिया के बिना एक लोकतंत्र पहियों के बिना वाहन की तरह है।

सूचना प्रौद्योगिकी की उम्र में हम जानकारी के साथ बमबारी कर रहे हैं। हम सिर्फ एक माउस के एक क्लिक के साथ विश्व की घटनाओं की नब्ज प्राप्त करते हैं। सूचना के प्रवाह में कई गुना बढ़ गया है। राजनीति और समाज में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को उजागर करने में प्रौद्योगिकी और मानव संसाधन (पत्रकार) के सही मिश्रण ने एक भी पत्थर नहीं छोड़ा है।                                                                 

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया पर लगातार हमले बढ़े हैं। पत्रकारों की देश भर में हो रही लगातार हत्याओं को देश का सबसे बड़ा मीडिया संगठन भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) ने गंभीरता से लिया है और लगातार पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए देश भर में मज़बूती से आवाज़ उठा रहा है।

वर्ष 2016 में बिहार-झारखण्ड में पत्रकारों की हत्या (murder of journalists) के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उप राष्ट्रपति, गृहमंत्री, राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री के समक्ष पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग संगठन ने उठायी है।

देश भर के सभी माननीय जनप्रतिनिधियों, सांसदों एवं विधायकों से भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ यह विनम्र आग्रह करता है कि आप लोकसभा, राजसभा एवं विधानसभा में देश के चौथे स्तंभ की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवाज़ उठायें। पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तब ही गणतंत्र सुरक्षित रहेगा। प्रजातांत्रिक व्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा समय की मांग है।

शाहनवाज हसन

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव हैं।

शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं

पत्रकारिता की गिरती साख और गरिमा को अगर कोई बचा सकता है तो वे हैं आंचलिक पत्रकार

Press Freedom

आंचलिक पत्रकार और पत्रकारिता की गिरती साख

Declining credibility of journalism AND regional journalist

आंचलिक पत्रकारों के बिना आप समाचार पत्र एवं न्यूज़ चैनलों की कल्पना नहीं कर सकते। अखबार एवं चैनल में 70 प्रतिशत आंचलिक पत्रकारों की बदौलत ही सुर्खियां बनती हैं। आंचलिक पत्रकार पत्रकारिता की रीढ़ होते हैं जिसके बिना कोई भी समाचार पत्र एवं न्यूज़ चैनल दो कदम चल नहीं सकता है। आप 12 पेज का अखबार प्रकाशित करें या 24 घंटे का न्यूज चैनल चलाएं, बिना आंचलिक पत्रकारों के आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। समाचार संकलन से लेकर प्रसार तक में आंचलिक पत्रकारिता की भूमिका (Role of regional Journalism) अहम होती है। वहीं दूसरी तरफ जो कड़वी सच्चाई है उन अखबारों और चैनलों की कमाई का 5 प्रतिशत भी आंचलिक पत्रकारों की झोली में नहीं जाती।

आंचलिक पत्रकार जब कभी समाचार संकलन को लेकर मुसीबत में होते हैं तो उन्हें उनका प्रबंधन पत्रकार तक मानने से इंकार कर देता है।

पिछले कुछ वर्षों में समाचार संकलन को लेकर झारखण्ड में आंचलिक पत्रकारों के विरुद्ध लगभग 38 मामले दर्ज हुये और पांच पत्रकारों की हत्याएं हुयी। उन सभी मामलों में उनके प्रबंधन ने उन्हें अपना पत्रकार मानने तक से इंकार कर दिया।

अधिकांश आंचलिक पत्रकार अखबारों एवं चैनलों में निशुल्क सेवा देते हैं। कॉरपोरेट घरानों के कुछ अखबार उन्हें वेतन के नाम पर 100₹ से लेकर 250₹ तक मानदेय देते हैं जो एक दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी से भी कम होता है। आंचलिक पत्रकारों में मानदेय पाने वाले भी मात्र 2 से 5 प्रतिशत ही होते हैं।

आंचलिक पत्रकारों के ऊपर संस्थान का दोहरा दबाव रहता है उन्हें अपने संस्थान के लिये वार्षिक 2 से 5 लाख रुपये का विज्ञापन देना अनिवार्य होता है। अगर यह कहा जाये कि समाचार के साथ-साथ आंचलिक पत्रकार अखबार एवं चैनल का 50 प्रतिशत आर्थिक बोझ भी उठाते हैं तो यह कहना गलत नहीं होगा।

आंचलिक पत्रकारों को अपने जीवनयापन के लिये पत्रकारिता के साथ-साथ कोई न कोई कार्य करना ही पड़ता है। उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड एवं बंगाल जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में आंचलिक पत्रकार किसान हैं, तो कई निजी बीमा कंपनी के एजेंट के रूप में भी कार्य कर रहे होते हैं। अपनी पत्रकारिता के साथ वे कभी समझौता नहीं करते, समाज और देश के प्रति वे पूरी ईमानदारी से कार्य करते हैं उन सफेदपोश पत्रकारों से कहीं बेहतर जो उन आंचलिक पत्रकारों के कंधे पर सवार होकर लोकसभा एवं राज्यसभा तक पहुंचने का लक्ष्य बनाकर पत्रकारिता को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं।

आंचलिक पत्रकारों के लिये अब पत्रकारिता की साख बचाये रखने का भी दबाव अधिक बढ़ता जा रहा है। अंचल स्तर पर अब पत्रकारों की भीड़ में धंधेबाजों की एंट्री ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। अधिवक्ता, सरकारी कर्मचारी एवं सरकारी शिक्षक भी अब पत्रकारिता करने लगे हैं। आंचलिक पत्रकारों के लिये यह सबसे बड़ी चुनौती बनते जारहे हैं और आये दिन इनके क्रियाकलापों के कारण उन्हें शर्मसार होना पड़ता है। अखबार एवं चैनल के प्रबंधन को उस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि वे पत्रकार के रूप में जिसे अपना माइक आईडी और प्रमाण दे रहे हैं उसकी शिक्षा क्या है, वे कहीं किसी अन्य पेशे से तो नहीं जुड़े हैं। मीडिया हाउस का प्रबंधन केवल यह देखता हैं कि उन्हें वार्षिक विज्ञापन के रूप में उन्हें मोटी रक़म कहाँ से मिल पायेगी। एक तरह से उन्हें एक मज़बूत वसूली करने वाला व्यक्ति चाहिये होता है जो दोहन कर उन्हें अधिक से अधिक आर्थिक रूप से वसूली कर पैसे दे सके।

पिछले दिनों झारखण्ड में टेरर फंडिंग, कोयला खनन एवं अवैध खनन करने वालों से वसूली के खाते में पत्रकारों का नाम मिलना यह दर्शाता है कि पत्रकारिता की आड़ में उन धंधेबाजों का उद्देश्य एवं लक्ष्य क्या रहा है।

भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है | This is the most tragic time of Indian media.

छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है, और यह उम्मीद हमें आंचलिक पत्रकारों से ही मिलती है। आज भी झारखण्ड के पिछड़े जिलों में से एक सरायकेला में हमें साइकिल से पत्रकारिता करते पत्रकार मिल जायेंगे, वे आंचलिक पत्रकार एवं पत्रकारिता के लिये उम्मीद की किरण हैं।

जब कभी लातेहार के प्रखण्ड के कई आंचलिक पत्रकार साथियों को आज भी खेत में धान बोते देखता हूँ तब यह उम्मीद और प्रबल हो जाती है।

पत्रकारिता कहने के लिए बड़ा ही नोबल प्रोफेशन है, और कुछ हद तक यह सच भी है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ से आप न सिर्फ अपनी बात बड़े पैमाने पर कह सकते हो, साथ ही साथ अपनी नज़र से लोगों को दुनिया के अलग-अलग रंग-रूप भी दिखा सकते हो। एक सच्चे और अच्छे पत्रकार के जीवन को जब आप करीब से देखेंगे तब आप को इस कड़वे सच का पता चल पायेगा उसका अपना जीवन ठीक उस दिये जैसा दिखेगा, जिसके कारण रौशनी तो होती है लेकिन उसके अपने चारों तरफ अँधेरा होता है। इसलिए ऐसे साथी जिनके पास पत्रकारिता को लेकर एक स्पष्ट दूर दृष्टि नहीं हो वो इस नोबल पेशे में न ही आयें तो बेहतर होगा।

पत्रकारिता का स्वरूप बदलते बदलते इतना बदल गया है कि कभी-कभी पत्रकार को एहसास होता है वो पत्रकारिता नहीं पीआर कर रहे हैं। कोई भी संस्थान किसी को पत्रकार नहीं बना सकता है, पत्रकार आप स्वयं ही बन सकते हैं, संस्थान आपको तराश कर तीक्ष्ण और तीव्र जरूर बना देगी। गुरु द्रोण मिले तो एक आध अर्जुन भी जरूर बनेंगे।

Now the biggest challenge in front of regional journalists
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं
शाहनवाज हसन (Shahnawaz Hassan) वरिष्ठ पत्रकार हैं और वे भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं

 आंचलिक पत्रकारों के ऊपर अब सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारिता की साख बचाये रखना है और इसके लिये उन्हें एक लकीर खींचनी होगी, आंचलिक पत्रकारों के भेस में आप के बीच रंगे सियार के रूप में शामिल पत्तलकारों को अलग-थलग करना होगा, ताकि लोगों के बीच यह स्पष्ट संदेश दे सकें कि पत्रकार और पत्तलकार में क्या अंतर है।

प्रबंधन के बेजा दबाव को मानने से आप खुलकर इंकार करना सीखें, क्योंकि कोई भी अखबार एवं चैनल आप के समाचार एवं आप के दिये विज्ञापन के बदौलत ही चल रहा होता है क्योंकि आप अगर पत्रकार हैं तो प्रबंधन को आप की ज़रूरत है और अगर आप पत्तलकार हैं तो फिर आप को प्रबंधन की ज़रूरत है।

पत्रकारिता की गिरती साख और गरिमा को अगर कोई बचा सकता है तो वे हैं आंचलिक पत्रकार

शाहनवाज़ हसन

 

माल्या-अडानी के लिए पैसा है, किसान के लिए नहीं- पी साईनाथ

P Sainath at Varanasi

माल्या-अडानी के लिए पैसा है, किसान के लिए नहीं- पी साईनाथ

वाराणसी, 29 नवंबर 2019। देश के जाने-माने पत्रकार पी.साईंनाथ ने इस बात पर चिंता जताई है कि भारत में किसानों की आमदनी तेज़ी से कम हो रही है। किसान अपने ही खेतों में मज़दूर की तरह हो गए हैं जो कॉरपोरेट के फ़ायदे के लिए काम कर रहे हैं।

श्री साईनाथ शुक्रवार को पराड़कर भवन में पत्रकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ गठित समिति काज की उत्तर प्रदेश इकाई की ओर से आयोजित संवाद कार्यक्रम में बोल रहे थे। ग्रामीण इलाकों में पत्रकारिता के बुनियादी सवालों (Basic questions of journalism in rural areas) को उठाते हुए आंचलिक इलाकों के पत्रकारों की समस्याओं को रेखांकित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकार सही मायने में काम कर रहे हैं। हमले भी इन्हीं पत्रकारों पर हो रहे हैं। हाल के सालों में जितने में पत्रकारों की हत्याएं (Killing journalists) हुईं उनमें सभी ग्रामीण पत्रकार थे और वो क्षेत्रीय भाषाओं में काम करते थे। अंग्रेजी अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों पर हमले होते ही नहीं। देश में ऐसा कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। सियासी दल और माफिया गिरोह अंचलों में काम करने वाले पत्रकारों को ही निशाना बनाते रहे है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने पत्रकारों को सतर्क रहने की बात कहते हुए कहा कि ग्रामीण पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

The agricultural crisis is not just a crisis in rural India, it will have a huge impact on the entire country.

साईनाथ ने किसानों के मुद्दों को भी जोरदार ढंग से उठाया। कहा कि कृषि की लागत बढ़ रही है और सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रही है। कृषि को किसानों के लिए घाटे का सौदा बनाया जा रहा है ताकि किसान खेतीबाड़ी छोड़ दें और फिर कृषि कॉर्पोरेट के लिए बेतहाशा फ़ायदे का सौदा हो जाए। देश में बीज, उर्वरक, कीटनाशक और साथ ही कृषि यंत्रों की कीमत उदारीकरण के बाद तेजी से बढ़ी है। पिछले तीन सालों में कृषि से जुड़ी आय में भारी कमी आई है जबकि लागत तेजी से बढ़ी है। पिछले दो दशकों से लागत लगातार बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4-5 लोगों वाले किसान परिवार की एक महीने की आय लगभग छह हज़ार रुपये है। कृषि संकट सिर्फ़ ग्रामीण भारत का संकट नहीं है, इसका समूचे देश पर व्यापक असर होगा।

किसान आंदोलन ऐसे स्थानों से शुरू हुए हैं, जहां सामान्यतः पिछले एक-दो दशकों में इनकी शुरुआत नहीं हुई है। सिर्फ़ किसानों के जीवन, कृषि पर निर्भर लोगों के जीवन और कृषि मज़दूरों के जीवन में झांककर ही समझा जा सकता है। आंकड़े झूठ बोलते हैं। कर्ज़ माफ़ी किसानों को राहत तो देती है, लेकिन ये उनकी समस्याओं का हल नहीं है।

साल 2008 में यूपीए सरकार ने कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किया था, लेकिन इसके फ़ायदे ज़्यादातर किसानों तक नहीं पहुंच पाए। ज़्यादातर किसानों ने निजी कर्ज़ लिया है। ऐसे में कर्ज़ माफ़ी का फ़ायदा वो नहीं उठा पाते हैं। लेकिन यही सरकारें हर साल लाखों-करोड़ का कॉर्पोरेट क़र्ज़ माफ़ करती हैं।

After the ban on animals, the rural economy is collapsing

पी साईनाथ का कहना है कि पशुओं पर लगे प्रतिबंधों के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। साईनाथ ने कहा कि न ही बीती सरकार पशु संकट को लेकर चिंतित थी और न ही मौजूदा सरकार। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार में ये संकट और गहरा रहा है। मवेशियों की बिक्री पर प्रतिबंधों के बाद ये संकट और गंभीर हो गया है। इससे न सिर्फ़ कसाइयों का व्यवसाय ख़त्म हुआ है, बल्कि ग़रीब लोगों की डाइट पर भी असर हुआ है। यदि ग्रामीण क्षेत्र में पशुओं की क़ीमत गिर रही है या बिक्री कम हो रही है तो इसका सीधा मतलब ये है कि उस क्षेत्र में संकट गहरा रहा है।”

Suicides are not the cause of the agrarian crisis but are the result of it

श्री साईनाथ ने कहा कि देश भर में किसानों की कुल आत्महत्याओं में से आधी से ज़्यादा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में होती हैं। एनसीआरबी के 2015 के डाटा के मुताबिक देश में हुए कुल किसान आत्महत्याओं में से 68 फ़ीसदी इन तीनों प्रदेशों में थी। इससे ये पता चलता है कि यहां गहरा कृषि संकट है। आत्महत्याएं कृषि संकट की वजह नहीं है बल्कि इसका परीणाम हैं। पिछले दो सालों में वास्तविकता में किसान आत्महत्याएं बढ़ी हैं, लेकिन डाटा कलेक्शन में फ़र्ज़ीवाड़े के कारण ये संख्या कम दिखेगी।

इस मौके पर यूपी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष रतन दीक्षित ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसके लिए अब लंबी लड़ाई लड़नी होगी। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के प्रदेश अधध्यक्ष सौरभ श्रीवास्तव ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों के दम पर भारत में पत्रकारिता जिंदा है। सच लिखते हैं इसीलिए उन पर हमले ज्यादा होते हैं। पत्रकार प्रेस क्लब के प्रदेश अध्यक्ष घनश्याम पाठक ने कहा कि पत्रकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ उनका संगठन लंबी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। अगर सत्ता जानबूझकर पत्रकारों की आवाज दबाएगी तो उसके खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जाने-माने पत्रकार-लेखक सुभाष राय ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारों के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं जिनका मुकाबला करने के लिए सभी पत्रकार संगठनों को एक मंच पर आना होगा। उन्होंने कहा कि आंचलिक इलाकों में ही पत्रकारिता जिंदा है। शहरों में कुछ घरानों और कारपोरेटरों के लिए पत्रकारिता की जा रही है। यह स्थिति ठीक नहीं है।

इससे पहले वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की पुस्तक देशगांव का पी साईनाथ ने लोकार्पण किया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार, अनिल चौधरी, रामजी यादव, प्रभाशंकर मिश्र, जगन्नाथ कुशवाहा, बल्लभाचार्य, विकास दत्त मिश्र, मिथिलेश कुशवाहा, प्रदीप श्रीवास्तव, अंकुर जायसवाल, अमन कुमार, मंदीप सिंह, नित्यानंद, रिजवाना तबस्सुम, दीपक सिंह, अनिल अग्रवाल एके लारी, शिवदास समेत समूचे पूर्वांचल के पत्रकार उपस्थित थे।

कार्यक्रम के अंत में काज के यूपी के कोआर्डिनेटर विजय विनीत ने अतिथियों और पत्रकारों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में 400  से अधिक पत्रकारों ने भाग लिया।