क्या बैंकों का निजीकरण से सभी समस्याएं सुलझ जाएंगी?

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सभी समस्याओं का समाधान नहीं बैंकों का निजीकरण : Ajit Ranade on Privatization of banks

जुलाई 1969 की दो महत्वपूर्ण घटनाएं

1969 में जुलाई के तीसरे सप्ताह में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं थीं। उनमें से एक राष्ट्रीय और दूसरी अंतरराष्ट्रीय घटना है। 20 जुलाई को चंद्रमा पर पहली बार मानव उतरा जो भारतीय समयानुसार रविवार की सुबह लगभग 8 बजे हुई थी। इससे बारह घंटे पहले 19 जुलाई को भारत में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम घोषणा (Prime Minister Smt. Indira Gandhi announced to the nation) की कि सरकार 14 निजी बैंकों का अधिग्रहण कर रही है जिनमें देश की 85 प्रतिशत राशि जमा है।

एक घटना एक तकनीकी सफलता थी जबकि दूसरी ने राजनीतिक दुस्साहस का प्रदर्शन किया। प्रत्येक घटना का दीर्घकालिक प्रभाव था, एक अंतरिक्ष अन्वेषण कार्यक्रम के विकास पर और दूसरा बैंकिंग और वित्त के विकास पर।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव

आइये, बैंक राष्ट्रीयकरण के दीर्घकालिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 1969 के बाद से अर्थव्यवस्था 50 गुना बड़ी हो गई है। उस समय उन 14 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास जमा पूंजी 100 करोड़ रुपये भी नहीं थे जबकि आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (public sector banks पीएसबी) के पास 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि है। वित्तीय क्षेत्र की गहरी पैठ होना इसकी औपचारिकता और देश के हर कोने में इसका प्रसार अभूतपूर्व रहा है।

53 वर्षों के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ जमा राशि का हिस्सा अभी भी 70 प्रतिशत है जो उस दिन राष्ट्रीयकरण के बाद से केवल 15 प्रतिशत की गिरावट बता रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कदम को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी लेकिन जल्दबाजी में बने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने महज छह महीने बाद ही अस्वीकृत कर दिया था। इसलिए अदालत की बाधा को दूर करने के लिए एक संशोधित अध्यादेश पारित करना पड़ा।

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस निर्णय से अपार लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ प्राप्त किया, क्योंकि पिछले बीस वर्षों में सैकड़ों निजी बैंक डूब गए थे। जनता ने सही या गलत तरीके से माना कि उनका पैसा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुरक्षित था। यह भावना आज तक बनी हुई है। यहां तक कि वर्तमान सरकार ने निजी बैंकों के बजाय पीएसबी पर निर्भरता दिखाई है।

उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री जनधन योजना (जेडीवाई) के 90 प्रतिशत से अधिक, करीब 45 करोड़ खाते पीएसबी द्वारा खोले गये थे। यह दुनिया का सबसे प्रमुख वित्तीय समावेशन अभियान है और इसने जेडीवाई खातों में सरकारी सब्सिडी (Government subsidy in JDY accounts) को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से पहुंचाने में मदद की है। कोविड के दौरान भी ये खाते अमूल्य साबित हुए हैं। उनके पास एक बीमा कवर के साथ-साथ ई खातों से जुड़ी एक ओवरड्राफ्ट सुविधा भी है।

छोटे उद्यमों के लिए मुद्रा ऋण भी ज्यादातर पीएसबी का एक विशेष डोमेन है। क्रेडिट पक्ष पर भी सरकार की परियोजनाओं के लिए ऋण का बड़ा हिस्सा, चाहे वह बंदरगाहों, सड़कों या रेलवे या अन्य बुनियादी ढांचे के प्रयासों में हो, पीएसबी के माध्यम से होता है। इसका ताजा उदाहरण उत्तरप्रदेश का बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे है जिसकी अनुमानित लागत 15 हजार करोड़ है। एक्सप्रेस-वे के लिए पीएसबी के सहायक संघ से लोन उठाया गया है।

बैंक की विफलताओं के मामलों में भी पीएसबी बचाव के लिए आते हैं। यस बैंक को हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा वास्तविक रूप से (तकनीकी रूप से नहीं) लिया गया था। कुख्यात ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (Global Trust Bank) को 2004 में ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स ने बचाया था। यदि कोई केवल पीएसबी के व्यावसायिक प्रदर्शन को देखता है तो तस्वीर कुछ साफ नहीं आती है। निजी बैंकों की तुलना में पीएसबी के खराब ऋणों की मात्रा बहुत खराब है। इन्हें गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (नॉन परफार्मिंग एसेट-एनपीए) कहा जाता है।

पिछले दस वर्षों में 10 गुना बढ़ गए विलफुल डिफॉल्टर्स

क्रेडिट इन्फॉर्मेशन कंपनी ट्रांसयूनियन सिबिल की एक हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि बैंक का कर्ज जानबूझ कर डुबोने वालों (विलफुल डिफॉल्टर्स) जिनके खिलाफ बैंकों ने कानूनी कार्रवाई शुरू की है, पिछले दस वर्षों में 10 गुना बढ़ गए हैं।

मार्च 2021 तक इन डिफाल्टरों पर 2.4 लाख करोड़ रुपये बकाया थे जिसकी 95 प्रतिशत राशि पीएसबी की थी। यह सार्वजनिक धन की लूट जैसा है। इनमें से 36 लोग ऐसे हैं जिन्होंने 1000 करोड़ से अधिक का कर्ज डुबोया है। वसूली की संभावना बहुत कम है और किसी भी मामले में कानूनी प्रक्रिया लंबी चलने वाली है।

सवाल यह है कि क्या इसका तात्पर्य उधारदाताओं की लापरवाही, ऋणों पर सतर्कता की कमी या किसी राजनीतिक दबाव में उधार देना है? लापरवाही का तर्क भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि उदाहरण के लिए, इन ऋ णों में से 30 प्रतिशत भारतीय स्टेट बैंक या उसके सहयोगियों द्वारा दिए गए थे जो उधार देने के नियमों, प्रथाओं के उच्च मानकों के कठोर पालन के लिए जाने जाते हैं।

ऐसा क्यों है कि निजी क्षेत्र के बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात कम है?
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क्या निजी क्षेत्र के बैंक ऋण की निगरानी में बेहतर हैं? क्या निजी क्षेत्र के बैंक सार्वजनिक जमा के बेहतर संरक्षक हैं? क्या निजी क्षेत्र के बैंक स्वाभाविक रूप से कम जोखिम लेते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सामाजिक रूप से वांछनीय लेकिन व्यावसायिक रूप से गैर-आकर्षक उधारकर्ताओं को उधार नहीं देते हैं? या ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें उधार देने के लिए राजनीतिक दबाव का सामना नहीं करना पड़ता है?

यह विचार स्पष्ट रूप से गलत है कि भारत में बैंकिंग की सभी बुराइयों के निराकरण के लिए बैंकों का निजीकरण रामबाण उपाय है। सभी विफलताएं हाई-प्रोफाइल निजी बैंकों की रही हैं। सभी बैंक विफलताओं की शुरूआत 2008 में अमेरिका और पश्चिमी देशों में लेहमैन बैंक के पतन के साथ शुरू हुई और इसके प्रभाव से वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ। निश्चित रूप से इस संकट के लिए बैंकों के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वामित्व को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

2008 के अंत में इंफोसिस जैसी नकदी-समृद्ध कंपनी को सार्वजनिक रूप से घोषणा करनी पड़ी कि वह अपनी नकदी जमा को निजी और विदेशी बैंकों से भारतीय स्टेट बैंक में स्थानांतरित कर रही है और इसके शेयरधारकों या ग्राहकों को घबराना नहीं चाहिए!

पीएसबी के लिए सार्वजनिक जमा का सहज स्थानांतरण जमाकर्ताओं के विश्वास को इंगित करती है। हालांकि इस आत्मविश्वास का एक और पक्ष है। यह पक्ष पीएसबी के मालिक यानी भारत सरकार द्वारा एक अंतर्निहित गारंटी के कारण है कि कोई भी बैंक विफल नहीं होगा। इस अमूल्य गारंटी का परिणाम लाभप्रदता में गिरावट हो सकती है।

क्या यह उचित है कि सार्वजनिक जमाकर्ता के पास असीमित गारंटी होनी चाहिए कि पीएसबी में उसका पैसा सुरक्षित है? क्या इस गारंटी की ऊपरी सीमा (5 लाख रुपये) नहीं होनी चाहिए जिससे ज्यादा की जमा राशि बैंक विफल होने की स्थिति में खतरे में पड़ेगी? इन और ऐसे कई सवालों के जवाब बैंकिंग सुधारों में निहित हैं जिनमें उनके चलाने में अधिक स्वायत्तता, अधिक वाणिज्यिक अनुकूलन, सामाजिक उद्देश्यों की जिम्मेदारी उठाने का कम बोझ, श्रमशक्ति उत्पादकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करना और जमाकर्ताओं के जोखिम का बेहतर मूल्य निर्धारण शामिल है।

सभी पीएसबी का एकमुश्त और थोक निजीकरण एक गलत कदम होगा जैसा कि हाल ही में नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के वर्तमान सदस्य द्वारा लिखे गए एक पेपर में प्रस्तावित किया गया था। निश्चित रूप से एक मध्य मार्ग निकाला जा सकता है जिसमें सरकारी स्वामित्व के पीएसबी की कार्यशील स्वायत्तता बढ़ाना, जनता के विश्वास को बनाए रखते हुए जमा बीमा की उचित कीमत निर्धारित करते हुए बैंकों के वाणिज्यिक प्रदर्शन को बढ़ाया जाता है। यह 1969 में चंद्रमा-लैंडिंग के विपरीत रॉकेट विज्ञान नहीं है।

– अजीत रानाडे

(Ajit Ranade is an economist, political analyst and reporter based out of Mumbai, India. Currently he is Vice Chancellor of Gokhale Institute Of Politics & Economics Pune.)

PMC Bank failure: How safe the Indian Banks are?

देशबन्धु में प्रकाशित लेख का किंचित् संपादित रूप साभार

Privatization of banks is not the solution to all problems

आगे जाकर पीछे लौटने की नीति है बैंकों का निजीकरण

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Privatization of banks, the policy of going back and forth: Vijay Shankar Singh

15 और 16 मार्च को बैंकिंग सेक्टर के सरकारी बैंकों के कर्मचारियों की सफल हड़ताल के बाद आज से बावन साल पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था और बैंकिंग सेक्टर में 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उठाया गया बैंकों के राष्ट्रीयकरण (Nationalization of banks) का कदम बरबस याद आ जाता है। आज बैंकिंग सेक्टर के निजीकरण (Privatization of banking sector) की बात की जा रही है। निजीकरण के भी अपने तर्क हैं और राष्ट्रीयकरण के भी अपने अपने तर्क हैं। राष्ट्रीयकरण के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बैंकिंग सेक्टर का हाल रहा, उसकी क्या उपलब्धियां रहीं और कैसे बैंक आम जन की पहुंच के अंदर पहुंचे, प्रबन्धन की कमियों सहित क्या परिदृश्य रहा, और इन बावन सालों में बैंकिंग की यह यात्रा कैसी रही, उस पर एक नज़र डालते हैं।

बैंकिंग के इतिहास में 19 जुलाई का महत्व | Importance of 19 July in the history of banking

देश की अर्थव्यवस्था खासकर बैंकिंग के इतिहास में 19 जुलाई का दिन बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि 19 जुलाई, 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। उस वक्त ये बैंक देश के बड़े औद्योगिक घराने चला रहे थे। इन बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नैशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक, यूको बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक, सिंडिकेट बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक तथा बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे।

आइए, जानते हैं कि इंदिरा गांधी के इस फैसले के क्रियान्वयन में किसने क्या भूमिका निभाई थी। और बैंकों के राष्ट्रीयकरण का इतिहास क्या है ? (What is the history of nationalization of banks?)

14 निजी बैंकों को राष्ट्रीयकृत करने के अपने फैसले को न्यायोचित ठहराते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि बैंकिंग को ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाना बेहद जरूरी है, इसलिए यह कदम उठाना पड़ रहा है। हालांकि, उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने राजनीतिक लाभ के लिए यह कदम उठाया था।

12 जुलाई 1969 के बैंगलोर अधिवेशन में इंदिरा गांधी ने देश की बैंकिंग व्यवस्था के बारे में टिप्पणी करते हुये कहा था, कि, निजी बैंकों का जनहित में राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिये। उंस समय देश के वित्तमंत्री मोरार जी देसाई थे। वे निजीकरण के पक्ष में थे। उन्होंने इंदिरा गांधी के इस बयान पर सरकार से त्यागपत्र दे दिया। हालांकि बैंकों के राष्ट्रीयकरण की बात 1960 से ही चल रही थी, क्योंकि निजी बैंकिंग व्यवस्था देश की लोक कल्याणकारी योजनाओं, आकार और चुनौतियों को देखते हुये प्रगति के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे थे। साथ ही निजी बैंक डूबने भी लगे थे।

उंस समय वीवी गिरी देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति थे। उन्होंने ही इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर किया था। इसके दूसरे ही दिन उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया क्योंकि उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना था।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मसौदा 24 घण्टे में तैयार किया गया। डीएन घोष जो वित्त मंत्रालय में उप सचिव थे, ने अपनी आत्मकथा में इस बात का वर्णन किया है कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय में उप सचिव होते हुए कितने सक्रिय थे और इस फैसले के क्रियान्वयन में अपनी अहम भूमिका निभाई थी। मोरारजी देसाई निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने की प्रधानमंत्री की योजना से बेहद नाराज थे। नाराजगी प्रकट करते हुए घोषणा के एक सप्ताह पहले उन्होंने वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

अध्यादेश का मसविदा तैयार हो जाने के बाद 19 जुलाई को शाम 5 बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गयी। उसी समय कैबिनेट ने इस अध्यादेश को अपनी मंजूरी दी और रात में ही राष्ट्रपति वीवी गिरी के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बना और 14 निजी बैंक सरकारी बन गए। रात 8.30 बजे एक राष्ट्रीय प्रसारण में प्रधानमंत्री ने इस निर्णय की घोषणा की। जिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया वे देश के अग्रणी कारोबारी घराने जैसे, टाटा, बिरला, पाई और रजवाड़े जैसे बड़ौदा नरेश आदि थे। कुछ को उम्मीद थी कि शायद इंदिरा पर दबाव पड़े पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

प्रधानमंत्री के इस फैसले के क्रियान्वयन में आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर लक्ष्मीकांत झा ने बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन विडंबना यह रही कि इस फैसले की शायद उन्हें पहले से जानकारी नहीं दी गई थी और वह बाद में इस मुहिम का हिस्सा बने। एलके झा की तरह इंद्रप्रसाद गोर्धनभाई पटेल जो तब आर्थिक मामलों के सचिव थे, प्रधानमंत्री के इस फैसले की घोषणा से महज 24 घंटे पहले इसका मसौदा तैयार करने के लिए कहा गया था।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर सी रंगनाथन अपने एक इंटरव्यू में बैंकों के संभावित निजीकरण के मुद्दे पर राष्ट्रीयकरण पर कहते हैं,

“1969 में किए गए बैंकों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय कोई आर्थिक निर्णय ही नहीं था, बल्कि इस फैसले में राजनीति की भी भूमिका थी। यह सवाल आज कोई मायने नहीं रखता कि आज हमारे पास सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग प्रणाली है या हमारे कुछ बैंक सरकारी हैं। प्रश्न यह है कि क्या जनता की अंशधारिता 51 % से नीचे की जा सकती है ? 1969 में किया गया बैंकों का राष्ट्रीयकरण देश में बैंकिंग सुविधा के प्रसार की ओर एक बड़ा कदम था। 1990 में बैंकों के सुधार पर जो कदम उठाया गया था को 1969 के बैंकिंग राष्ट्रीयकरण से बहुत मदद मिली। 1969 के राष्ट्रीयकरण से बैंकिग सुविधाओं का प्रसार, नए और ग्रामीण क्षेत्रो में दूर दूर तक हुआ। इसी क़दम से 1991 के बैंकिंग सुधार की नींव पड़ी।”

जिन 14 बड़े बैंकों को राष्ट्रीयकृत किया गया था वे आरबीआई के मानक के अनुरूप सबसे बड़े बैंक थे। जिनमें मूल जमा 50 करोड़ से अधिक का था। जिनमें तब के हिसाब से देश के कुल जमा बैंकिग धन का 85 % जमा था। उसी समय देश में नेशनल और ग्रिण्डलेज जैसे विदेशी बैंक भी थे। उनका भी राष्ट्रीयकरण किये जाने की बात पर विचार किया गया, पर कुछ तकनीकी ओए कूटनीतिक कारणों से उन्हें उस आदेश से अलग रखा गया।

इस अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी। 10 फरवरी 1970 को सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि यह आदेश स्वेच्छाचारी है और सरकार को आदेश दिया कि वह 9000 करोड़ रुपये का जो मुआवजा राष्ट्रीयकृत बैंकों को दिया गया है वह अपर्याप्त है। लेकिन इंदिरा झुकी नहीं। उन्होंने एक कानून बैंकिग कंपनीज ( एक्वीजिशन एंड ट्रांसफर ऑफ अंडरटेकिंग ) एक्ट 1970, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद ही पारित कर दिया।

अब आज पचास साल बाद बैंकों के पुनः निजीकरण की बात चलने लगी है। हालांकि निजीकरण के पक्षधर पचास साल पहले उठाये गये इस कदम की प्रशंसा करते हुये कहते हैं कि, उस कदम से देश के दूरस्थ जगहों में बैंकिंग व्यवस्था पहुंचाने का एक कठिन और आवश्यक लक्ष्य प्राप्त किया गया, जो देश की आर्थिक प्रगति के लिये जरूरी था। लेकिन वे ये भी कहते हैं कि तब की परिस्थितियों के अनुसार जो उचित था वह तब की सरकार ने किया और आज की परिस्थितियों में जो देशहित में हो वह किया जाना चाहिये।

स्टेट बैंक की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधति राय का कहना है कि, राष्ट्रीयकरण से नुकसान के बजाय लाभ अधिक हुआ है, इसमें कोई संशय नहीं है, लेकिन बैंकिंग सिस्टम का यही स्वरूप सदैव के लिये लाभप्रद रहे, यह भी ज़रूरी नहीं है। आगे वे कहती हैं,

“यदि बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य देश के दूरस्थ इलाक़ों में, बैंकिंग सुविधा का पहुंचाना था तो यह उद्देश्य लगभग पूरा कर लिया गया है। अब हम एक ऐसे मोड़ पर आ पहुंचे हैं कि हमे बैंकिंग व्यवस्था के नए स्वरूप की बात सोचनी और करनी होगी, जो जनता को बेहतर, उन्नत और आधुनिक सुविधा दे सके।

इस कदम का विरोध भी हुआ था। उंस समय यह सवाल पुनः प्रासंगिक हो गया था, कि देश के आर्थिक विकास के लिये दक्षिणपंथी मॉडल उपयुक्त रहेगा या वामपंथी मॉडल। इंदिरा का विरोध स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ ने किया था। यह दोनों दल दक्षिणपंथी आर्थिक मॉडल के पक्ष में थे। स्वतंत्र पार्टी तो रजवाड़ों और बडे धनपतियों की ही पक्षधर थी। और उसी समय पूर्व नरेशों का प्रिवी पर्स और अन्य विशेषाधिकार जो उन्हें आज़ादी के समय रियासतों के विलीनीकरण के समझौते के अंगर्गत मिले थे, सरकार ने समाप्त कर दिया था।

जनसंघ की कोई स्पष्ट आर्थिक नीति न तो तब थी और न ही अब उसके नए स्वरूप भारतीय जनता पार्टी के पास है। पर मौलिक रूप से यह दल भी दक्षिणपंथी आर्थिक विकास के मॉडल का पक्षधर है। कांग्रेस में भी जो पुरानी पीढ़ी थी वह भी इस नए बदलाव से असहज थी और उसने भी इंदिरा के इन प्रगतिशील और जनपक्षीय कदमों का विरोध किया। पर जनता ने इन प्रगतिशील कदमों की खुल कर सराहना की और इंदिरा सही मायनों में तब जननेत्री बन गयीं थी।

1969 के साल में घटी, पचास साल पहले की यह घटना, इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन और देश के इतिहास में एक टर्निंग प्वाइंट थी। यह कांग्रेस के विचारधारात्मक बदलाव का भी एक संकेत था। यह इंदिरा का वामपंथी खेमे की ओर झुकाव था। इस कदम ने इंदिरा की छवि गरीब हित की बनायी, जिसने उन्हें तत्कालीन राजनीति में लगभग विकल्पहीन ही बना दिया था। बाद में और भी उद्योग और कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ पर जो असर आर्थिक विकास के क्षेत्र में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का हुआ, वह किसी अन्य कदम का नहीं हुआ।

लेकिन 1991 में जब आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो, नए और निजी बैंक खुले तथा नियंत्रण मुक्त होकर अर्थ व्यवस्था ने तेज रफ्तार पकड़ ली। देश का विकास हुआ, नौकरियों के अवसर बढे और सकल उत्पाद में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुयी। साथ ही साथ सरकारी बैंकों में जब पूंजीपतियों के लिये ऋण देने में सरकार का बेजा दबाव पड़ा तो बैंक एक नयी समस्या से ग्रस्त हो गए। वह समस्या है कर्ज़ों की नाअदायगी यानी ऐसी धनराशि को एनपीए अनुत्पादक राशि मे रख देना। साल 2009 तक भारत की वित्त व्यवस्था में 8,000 करोड़ रु. का एनपीए सामने आ चुका था।

हालांकि एनपीए तो वित्तीय तँत्र का एक अंग है और दुनियाभर में कोई भी बैंक इस व्याधि से बचा नहीं है। इतिहास में कोई भी ऋण चक्र ऐसा नहीं रहा होगा जिसमें कुछ हिस्सा ऐसे मामलों का न रहा हो जिनमें कर्ज का कभी पुनर्भुगतान हुआ ही नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सूचीबद्ध बैंकों का कुल एनपीए 8.5 लाख करोड़ रु. से ज्यादा है. अब आरबीआई ने बैंकों के लिए जानकारी देने के नियम और सख्त कर दिए हैं, लिहाजा इस आंकड़े के और बढ़ने का अंदेशा है। वित्तीय रेटिंग एजेंसी इक्रा ने इसके जल्द ही 9.25 लाख करोड़ रु. के पार जाने और क्रिसिल ने 9.5 लाख करोड़ रु. पहुंचने का अनुमान जताया है. भारत के रक्षा और ढांचागत क्षेत्र के बजटों को मिला लिया जाए तो यह राशि उससे भी ज्यादा है और श्रीलंका के जीडीपी के तकरीबन दोगुने के बराबर है.

अब चूंकि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में तकरीबन 80 फीसदी हिस्सा सरकारी स्वामित्व वाले 21 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का है लिहाजा इन डूबते कर्जों में भी ज्यादातर उनके ही खाते में जाते हैं।

बैंकिंग व्यवस्था को पटरी पर लाने और इसकी विश्वसनीयता लौटाने के उपाय तलाशने के लिए 2017 के नवंबर में सरकारी बैंकों के पूर्णकालिक निदेशकों और शीर्ष पदाधिकारियों की बैठक ‘पीएसबी मंथन’ हुई. इसमें नीचे लिखी बातों पर सहमति बनी –

1- यह सुनिश्चित करना कि कड़ी जांच-परख के बाद ऋण मंजूर हो. वैसे तो बैंकों ने ऋण मंजूरी के नियम-कायदे तय कर रखे हैं, लेकिन बढ़ता एनपीए साबित करता है कि इन पर ठीक से अमल नहीं होता. वित्त मंत्रालय की पड़ताल में पता चला कि राजमार्ग से जुड़ी ऐसी कई परियोजनाएं हैं, जिन्हें पर्यावरण संबंधी हरी झंडी मिलने से पहले ही कर्ज बांट दिए गए।

2- पक्का करना कि कर्ज लेने वाले की बैलेंस शीट की गहन जांच-पड़ताल हो और नकद प्रवाह संबंधी सुरक्षा मानक पूरे हों. वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, कई मामलों में बैंकों के पास इतनी विशेषज्ञता नहीं होती कि वे ऋण आवेदकों के कागजात को अच्छी तरह जांच सकें।

नतीजा यह होता है कि वे हवा-हवाई मुनाफे और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जा रहे आंकड़ों को पकड़ नहीं पाते, जैसा कि कथित तौर पर एस्सार की परियोजनाओं के मामले में हुआ. फिलहाल एस्सार के ये मामले नेशनल कंपनीज लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के पास हैं।

नकद प्रवाह को सुरक्षित करने का परिणाम यह होगा कि तब यह निगरानी की जा सकेगी कि दी गई राशि का इस्तेमाल किसी दूसरे मद में न हो क्योंकि इस बात का उल्लेख होगा कि उस राशि को कहां खर्च किया जाना है.

3- परियोजना के वित्तपोषण से जुड़े गैर-कोषीय और बाद के जोखिमों पर ध्यान देना.गैर-कोषीय जोखिम बैंक गारंटी और लेटर ऑफ क्रेडिट से जुड़े होते हैं. इसी तरह की कागजी गड़बड़ी के आधार पर नीरव मोदी ने धोखाधड़ी की और इस तरह उसने एक बैंक की गारंटी को दूसरे बैंक से लोन लेने में इस्तेमाल किया।

बाद के जोखिम उन परियोजनाओं से जुड़े होते हैं जो लंबे समय में पूरा होने वाली होती हैं. ऐसे मामलों में आम तौर पर अंततः लागत और समय तय सीमा को पार कर जाते हैं और परमिट का छूटना सीधे-सीधे देनदारी के हालात पैदा कर देता है।

4- सघन विश्लेषण के लिए अनेक नियामक डेटाबेस का इस्तेमाल करना और इसमें तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना.इसी तरीके से सिबिल किसी भी व्यक्ति की क्रेडिट रिपोर्ट तैयार रखता है और इंडस्ट्री बोर्ड अपने क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों की रिपोर्ट रखता है।

ऋण आवेदकों की दी गई जानकारी की अगर इन डेटाबेस से पुष्टि हो पाए तो लोन पर निर्णय करने की प्रक्रिया में सुरक्षा का एक और स्तर शामिल हो जाएगा. साथ ही, संभव है कि इससे बैंकों को ऐसे कॉर्पोरेट कर्जदारों का भी पता चले जिन्होंने जरूरी जानकारी छिपा रखी हो. वित्त मंत्रालय के मुताबिक, यह बात रिलायंस कम्युनिकेशंस पर भी लागू होती है क्योंकि उसने बैंकों को इस बात की जानकारी नहीं दी कि उसने चीन के ऋणदाताओं से मोटी राशि ले रखी है.

5- किसी भी कंसोर्शियम के प्रमुख बैंकों को तकनीकी-आर्थिक मूल्यांकन कराने के लिहाज से क्षमता विकसित करनी चाहिए. सेकंडरी बैंकों से आकलन और पुष्टि में मदद मिल ही जाएगी।

जोखिम के आकलन और इससे जुड़ी निगरानी के मामले में बैंकों की क्षमता बेहद निराशाजनक है. जिस तरह के प्रोजेक्ट आ रहे हैं, उनके लिए तकनीकी जानकारी और क्षेत्र की विशेषज्ञता बहुत जरूरी है. वैसे भी ये जोखिम के आकलन और इनके संभावित आर्थिक पहलू के लिहाज से जरूरी हैं. अगर कोई बैंक किसी परियोजना के संभावित तकनीकी दायरे को नहीं समझ सकता तो वह जोखिमों और लागत का सही आकलन भी नहीं कर सकता।

6- 250 करोड़ रु. से ज्यादा के ऋण के मामलों में पैसे देने के बाद बैंकों को विशेषज्ञों की मदद से परियोजना की निगरानी करनी चाहिए. कंसोर्शियम से जुड़े बैंक जानकारी को साझा करें ताकि सभी को स्थिति का पता रहे।

यह आंशिक रूप से तकनीकी-आर्थिक आकलन वाले बिंदु से जुड़ा है. अब तक बड़े ऋण के मामले में विशेष निगरानी जैसी कोई व्यवस्था न थी, बाहरी विशेषज्ञों से तो बिल्कुल नहीं. बैंकर इसका विरोध कर रहे हैं।

7- किसी एक कंसोर्शियम में केवल नौ बैंक होंगे और किसी ऋण में सहयोगी बैंक 10-10 फीसदी की भागीदारी करेंगे।

देखा जाता है कि कोई डिफॉल्टर आम तौर पर कंसोर्शियम के बैंकों के छोटे बकाये का भुगतान करके बड़ी राशि की अदायगी रोक देते हैं और इस आधार पर राहत मांगते हैं कि उन्होंने कुछ भुगतान कर दिया है. इसके साथ ही, छोटे कंसोर्शियम का प्रबंधन भी आसान होगा और चूंकि ऋण में हर बैंक की पारदर्शी और बराबर हिस्सेदारी होगी, लिहाजा जांच परख आसान होगी।

8- कंसोर्शियम से ऋण मूल्यांकन की एक मानक ऑनलाइन प्रक्रिया हो. वित्तमंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भारतीय बैंकों (कंसोर्शियम में लोन देने वाले बैंक भी) के पास कई बार भुगतान से जुड़े विलंब की जानकारी को साझा करने की कार्यप्रणाली नहीं होती।

9- ऋण, उसके आकलन, निगरानी और वसूली की जिम्मेदारी का काम अलग-अलग लोगों के हाथ में होना चाहिए. कई बैंकों में ऋण से जुड़ी पूरी प्रक्रिया एक-दो लोगों के हाथ में होती है. इससे मिलीभगत/ भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ जाती है और ऋण देने के बाद जरूरी निगरानी नहीं हो पाती।

10- दिवाला और दिवालियापन संहिता में बदलाव करना होगा ताकि एनपीए खाताधारक दिवाला प्रक्रिया के दौरान कंपनी दोबारा न खरीद सकें।

इससे यह निश्चित हो सकेगा कि एनपीए के लिए जिम्मेदार प्रमोटर इसकी भरपाई करें और यह भी कि वे दिवालिया कंपनियों को कौडिय़ों के भाव खरीदकर फायदा न उठा सकें।

11- एनपीए के मामलों को सीधे एनसीएलटी के पास भेजने के लिए आरबीआइ को अधिकृत किया गया है. पहले आरबीआइ के पास इसका अधिकार न था. नतीजा यह होता था कि ऐसी कंपनियां, जिन्हें वह पहले ही डिफॉल्टर घोषित कर चुका होता, राजनैतिक हस्तक्षेप से मामले को लटका देती थीं।

2017 में इस सहमति का क्या असर रहा, यह अभी तक सरकार बता नहीं पायी है। वह इन सब रोगों के निदान के रूप में निजीकरण को देख रही है। इस समय कुछ सरकारी बैंकों के आपस मे बिलयित करने के बाद कुल 11सरकारी बैंक बचे हैं। इनमें से 4 बैंकों को निजी क्षेत्रों में बेचने की बात की जा रही है। यदि इन बैंकों का निजीकरण हुआ तो 7 बैंक पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में रह जाएंगे। सरकार के पास सभी आर्थिक दुरवस्था का एक ही उपचार, फिलहाल है कि, वह सारी सरकारी संपत्तियों को पूंजीपतियों को बेच दे। अब यह देखना है कि संकट में पड़ी बैंकिंग व्यवस्था, निजीकरण के उपचार से कैसे सुधार की ओर बढ़ती है और बढ़ते एनपीए तथा गिरती बैंकिंग व्यवस्था से सरकार कैसे पार पाती है।

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

असामाजिक और जनविरोधी कदम है बैंकों का निजीकरण : शैलेन्द्र दुबे

Shailendra Dubey, Chairman - All India Power Engineers Federation

Privatization of banks is antisocial and anti-people move: Shailendra Dubey

बैंक निजीकरण के विरोध में हड़ताल का बिजली इंजीनियरों ने किया समर्थन

निजीकरण के विरोध में दो दिवसीय बैंक हड़ताल का बिजली इंजीनियरों ने किया समर्थन

प्रधान मंत्री को पत्र भेजकर निजीकरण का फैसला वापस लेने की मांग की

लखनऊ, 15 मार्च, 2021. ऑल इण्डिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन (All India Power Engineers Federation- AIPEF) ने निजीकरण के विरोध में दो दिवसीय बैंक हड़ताल का पुरजोर समर्थन करते हुए प्रधान मंत्री को पत्र भेजकर निजीकरण का फैसला वापस लेने की मांग की है।

ऑल इण्डिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण एक जनविरोधी कदम है। निजीकरण असामाजिक भी है। बैंकों को अब सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से निजी घरानों के लाभ की खोज में चलाया जाएगा।

फेडरेशन ने कहा कि बेरोजगारी के कठिन दौर में बैंकों के निजीकरण से रोजगार के अवसर बुरी तरह प्रभावित होंगे। निजी बैंक न्यूनतम मानवशक्ति से काम चलाते हैं और कर्मियों को भारी मानसिक दबाव में काम करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि बैंकों के निजीकरण से आम लोगों को भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पडेगा और उनकी जमा धनराशि भी सुरक्षित नहीं रह जाएगी। इंडस इंड बैंक और पी एम् सी बैंक में पैसा डूबने से निजीकरण के नाम पर आम लोग काफी दहशत में हैं।

एआईपीईएफ ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के साथ-साथ केंद्र सरकार ने बिजली क्षेत्र सहित अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के निजीकरण के लिए व्यापक नीति अपनाई है।

एआईपीईएफ ने केंद्र सरकार की निजीकरण नीति का पुरजोर विरोध करते हुए सभी केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली के निजीकरण के फैसले और हाल ही में बिजली अधिनियम 2003 में संशोधन के कदम से निजी कंपनियों को राज्यों की वितरण प्रणाली में प्रवेश करने की अनुमति दी।

एआईपीईएफ ने केंद्र सरकार की उस नीति की निंदा की जो अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में काम करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के पूरी तरह खिलाफ है और कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में तैयार की गई है।

कारपोरेट बकायेदारों से सरकार करे वसूली, बैंकों का निजीकरण जनता के धन की लूट – एस. आर. दारापुरी

ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता और अवकाशप्राप्त आईपीएस एस आर दारापुरी (National spokesperson of All India People’s Front and retired IPS SR Darapuri)

लखनऊ, 19 जुलाई 2020, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 51 साल पूरे (51 years of nationalization of banks) होने पर बैंकों के कर्मचारियों की यूनियन द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बकायेदारों की सूची जारी करने का स्वागत करते हुए ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व आईजी एस. आर. दारापुरी ने मोदी सरकार से मांग की है कि उसे तत्काल इन बकायेदारों से कर्ज की वसूली करनी चाहिए और इसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वापस करना चाहिए साथ ही उसे बैंकों के निजीकरण पर रोक लगानी चाहिए.

उन्होंने प्रेस को जारी अपने बयान में कहा कि इस सूची के जारी होने के बाद अब यह साफ हो गया है की अपने कारपोरेट मित्रों की मदद के लिए तमाम सरकारों ने नियम कानूनों को ताक पर रखकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जरिए कर्ज बांटा और जनता के धन के लूट को अंजाम दिया. सरकारों ने जानबूझकर कर्ज न लौटाने वाले इन कारपोरेट घरानों के कर्जों को माफ कर दिया और वसूली नहीं की, जिसने बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करने का काम किया है.

उन्होंने कहा कि आज जो आर्थिक संकट देश झेल रहा है उसके पीछे मोदी सरकार समेत तमाम सरकारों द्वारा अपने कारपोरेट मित्रों को कर्ज बांटने और उसकी वसूली न करने की नीति भी बड़े पैमाने पर जिम्मेदार हैं. इसी के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बर्बाद हुए. इस नीति पर पुनर्विचार करने की जगह सरकारें बैंकों को बंद करने, उनका विलय करने और पुनर्गठन करने में लगी रही. एक तरफ सरकार किसानों, बुनकरों व छोटे मझोले व्यपारियों का कर्ज आज भी माफ करने को तैयार नहीं है. वही सक्षम कारपोरेट घरानों का लाखों करोड़ों कर्ज माफ कर दिया.

उन्होंने कहा कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण 1969 में किसानों को सुलभ, सुरक्षित व सस्ता कर्ज देने व आम आदमी तक बैकिंग पहुंचाने व सूदखोरी से मुक्ति के लिए किया गया था. जिसे निजीकरण के जरिये बर्बाद किया जा रहा है.

उन्होंने कहा बैंक के कर्ज में हुई लूट की वजह से मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट तक में इन बकायेदारों की सूची सार्वजनिक करने से बच रही थी क्योंकि इससे उसका चेहरा बेनकाब हो जाता.

श्री दारापुरी ने कहा कि कोविड-19 की इस वैश्विक आपदा और आर्थिक संकट के दौर में यह आवश्यक व राष्ट्र हित में होगा कि बैंकों में जमा जनता के धन की कारपोरेट मित्रों को कर्जा बांटकर जो लूट की गई है उसे सरकार ठीक करे और जानबूझकर कर्ज न देने वाले कारपोरेट घरानों से वसूली की जाए. इसके लिए यदि आवश्यक हो तो सरकार को अध्यादेश या कानून भी लाना चाहिए ताकि देश की आर्थिक स्थिति सुधर सके.