मौजूदा वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के साथ 16 फीसदी बढ़ेगा उत्सर्जन​​​​​

Emissions will increase by 16 percent with current global climate targets.विकसित देशों की ज़िम्मेदारी है कि वे विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई के लिए धन मुहैया करें

Emissions will increase by 16 percent with current global climate targets

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु मामलों की संस्था UNFCCC की ताज़ा रिपोर्ट (The latest report of the UN’s climate affairs body UNFCCC) निराश करने वाली है। इस रिपोर्ट की मानें तो जहाँ जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में प्रभावी होने के लिए NDCs या देशों के जलवायु लक्ष्यों को वैश्विक उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती करनी चाहिए, वहीँ नवीनतम उपलब्ध NDCs के साथ बढ़ने में तो वैश्विक GHG (जीएचजी) उत्सर्जन 2010 की तुलना में 2030 में लगभग 16% ज़्यादा होगा।

ज्ञात हो कि फरवरी 2021 में UNFCCC ने एक अंतरिम मूल्यांकन की पेशकश की, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि दुनिया की सरकारों द्वारा किए गए नए वादों में, संयुक्त उत्सर्जन में कटौती, 2015 में प्रस्तुत किए गए पिछले दौर की प्रतिज्ञाओं की तुलना में केवल मामूली तौर पर ज़्यादा महत्वाकांक्षी थी।

छह महीने बाद, अब यह ताज़ा रिपोर्ट एक निराशाजनक संदेश देती है। अगर जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में प्रभावी होना है तो NDCs को वैश्विक उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती (Substantial cuts in global emissions) करनी चाहिए। वैसे भी वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5C या 2C तक सीमित करने का एक उचित मौका देने के लिए, IPCC (आईपीसीसी) ने 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन में क्रमशः 45% और 25% की कटौती की पहचान की है।

वैश्विक ग्रीनहाउस उत्सर्जन 2010 की तुलना में 2030 में लगभग 16% ज़्यादा होगा

लेकिन नवीनतम उपलब्ध NDCs इशारा देते हैं कि वैश्विक GHG (जीएचजी) उत्सर्जन वास्तव में 2010 की तुलना में 2030 में लगभग 16% ज़्यादा होगा। नए या अद्यतन NDCs (86 NDCs + EU27 (ईयू 27)) वाले 113 दलों के समूह के लिए, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2010 की तुलना में 2030 में 12% की गिरावट होने का अनुमान है। फिर भी, दुनिया सबसे ख़राब जलवायु परिणामों से बचने के लिए आवश्यक महत्वाकांक्षा के स्तर से काफ़ी पीछे छूट रही है।

यह रिपोर्ट IPCC द्वारा, पिछले महीने अपनी सबसे हालिया रिपोर्ट के जारी होने पर, मानवता के लिए “कोड रेड” जारी करने के बाद आई है और नेताओं के लिए आँख खोलने वाली होनी चाहिए।

यूरोपियन क्लाइमेट जलवायु फाउंडेशन (European Climate Foundation) के सीईओ, लॉरेंस टुबियाना, कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के क्रूर प्रभाव दुनिया के हर कोने में पड़ रहे हैं, जिसे नेताओं को अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा में कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह रिपोर्ट पेरिस समझौते के तहत अपने कर्तव्यों को पूरा करने में विफल रहने के कारण ग्रह पर आत्म-क्षति (खुद को नुकसान) पहुंचाने वाले बड़े उत्सर्जकों को रेखांकित करती है। हमें अब ज़रुरत है कि सभी G20 (जी2) देश 1.5C के अनुरूप COP26 द्वारा कठिन योजनाओं को पूरा करें।”

बात G20 देशों की

वैश्विक GHG के 75% के लिए हिस्सेदार, G20 राष्ट्र प्रमुख हैं। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर (क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर) द्वारा इस सप्ताह प्रकाशित नए विश्लेषण के अनुसार, आज तक, अर्जेंटीना, कनाडा, यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने 2030 उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों को मज़बूत किया है – लेकिन केवल यूके को ही 1.5C का पालन करनेवाले के क़रीब का दर्जा दिया गया है।

चीन, भारत, सऊदी अरब और तुर्की (जो वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों के 33 प्रतिशत के लिए सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार हैं) ने अभी तक अद्यतन NDCs जमा नहीं करे हैं। क्लाइमेट एनालिटिक्स और WRI (डब्ल्यूआरआई) द्वारा जारी किए गए एक आकलन के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया ने GHG उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों के साथ अद्यतन NDCs जमा किए हैं, जो 2015 में उनके द्वारा पेश किए NDCs के एकसमान हैं।

ब्राजील और मैक्सिको ने ऐसी योजनाएं प्रस्तुत कीं जो उनके पिछले लक्ष्यों की तुलना में अधिक उत्सर्जन की अनुमति देंगी। रूस एक कदम आगे बढ़ गया, एक ऐसा लक्ष्य प्रस्तुत करते हुए जो वास्तव में उसके वर्तमान “बिज़नेस-एैज़-युसुअल” (“व्यापार-हमेशा की तरह”) प्रक्षेपवक्र की तुलना में उच्च उत्सर्जन की अनुमति देगा। जापान और दक्षिण कोरिया द्वारा COP26 से पहले नए, और सख़्त लक्ष्य प्रस्तुत करने की उम्मीद है।

हेलेन माउंटफोर्ड, वाइस-प्रेज़िडेंट, जलवायु और अर्थशास्त्र, WRI, कहते हैं, “G20 देशों की कार्रवाई या निष्क्रियता काफ़ी हद तक यह निर्धारित करेगी कि हम जलवायु परिवर्तन के सबसे ख़तरनाक और महंगे प्रभावों से बच सकते हैं या नहीं। यही वजह है कि यह इतनी ज़ोरदार और चौंकाने वाली बात है कि ब्राजील और मैक्सिको ने जो उत्सर्जन लक्ष्य पांच साल पहले प्रस्तुत किये थे, उनकी तुलना में और कमज़ोर उत्सर्जन लक्ष्यों को आगे रखा है, जबकि चीन – दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक – ने अभी तक 2060 तक उत्सर्जन शून्य करने की अपनी प्रतिज्ञा के साथ मेल खाने वाले 2030 के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्धता नहीं दी है। वार्मिंग को 1.5C तक सीमित करने के लिए, सभी G20 देशों को अपना वज़न ढोना होगा और COP26 से पहले महत्वाकांक्षी जलवायु योजनाओं को प्रदान करना पड़ेगा। और विकसित देशों की ज़िम्मेदारी है कि वे विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई के लिए धन मुहैया करें।”

नेट ज़ीरो प्रतिबद्धता में भारत की स्थिति. India’s Position in Net Zero Commitment.

अभी तक कोई नेट ज़ीरो प्रतिबद्धता नहीं रखने वाले एकमात्र शीर्ष उत्सर्जक में से एक के रूप में, भारत अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ाने के लिए काफी वैश्विक दबाव में रहा है। भारत सरकार अब तक अपने NDCs को पूरा करने के लिए ट्रैक पर है, 2015 के बाद से इसकी रिन्यूएबल हिस्सेदारी लगभग 226% बढ़ गई है और ऊर्जा मंत्री आर.के.सिंह की हालिया घोषणा, कि भारत ने 100 गीगावॉट स्थापित RE (आरई) क्षमता हासिल कर ली है, सही दिशा में एक कदम है। हालांकि, स्वच्छ ऊर्जा क्रांति 2025 तक 37 गीगावाट प्रस्तावित नई ताप विद्युत क्षमता के साथ हो रही है। COP अध्यक्ष, आलोक शर्मा की हालिया यात्रा और अमेरिकी जलवायु दूत जॉन केरी की भारत यात्रा (US climate envoy John Kerry’s visit to India) से यह स्पष्ट होता है कि जबकि भारत ने तेज़ी से संक्रमण के लिए धन और पूंजी बाजार तक पहुंच बढ़ाने का आह्वान किया है, भारत से उन्नत जलवायु कार्यों की पेशकश की उम्मीद है।

जलवायु परिवर्तन पर ‘लीडर्स समिट ऑन क्लाइमेट’ बाइडन प्रशासन के लिये लिटमस टेस्‍ट : विशेषज्ञ

Climate change Environment Nature

 ‘Leaders Summit on climate’ litmus test for Biden administration: expert

नई दिल्ली, 16 अप्रैल 2021. जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्रवाई के प्रति अमेरिका एक बार फिर संजीदा है। यही वजह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने उन 40 देशों के नेताओं को आमंत्रित किया है जो कार्बन उत्सर्जन में सबसे ज्यादा योगदान करते हैं। इसके अलावा आमंत्रितों में कुछ ऐसे देश भी शामिल हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिहाज से सबसे ज्यादा खतरे में हैं। दुनिया के इन नेताओं का जमावड़ा आगामी 22-23 अप्रैल को ‘लीडर्स समिट ऑन क्लाइमेट’ नामक वर्चुअल बैठक में होगा।

इस समिति को जलवायु संबंधी महत्वाकांक्षा को पुनर्जीवित करने के एक बड़े मौके के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि अनेक देश बदतर होती जा रही कोविड-19 महामारी और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पैदा हो रही कठिनाइयों का हल निकालने के लिए योजना तैयार करने में व्यस्त हैं।

How does the US inspire global action on climate change?

इस साल नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन के विषय पर आयोजित होने जा रही महत्वपूर्ण बैठक से पहले राष्ट्रपति बाइडन द्वारा बुलाई गई यह बैठक इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्रवाई को किस तरह से प्रेरित करता है।

उम्मीद की जाती है कि जापान उस बैठक के समय तक अपने जलवायु संबंधी लक्ष्यों को मजबूत कर लेगा। इसके अलावा कनाडा और दक्षिण कोरिया ने भी निकट भविष्य को लेकर मजबूत संकल्प लेने के संकेत दिए हैं। पहले से ही नाजुक मोड़ पर पहुंच चुके अमेरिका और चीन के आपसी रिश्तो पर भी सब की नजर होगी। साथ ही ब्राजील और भारत पर भी नजरें होंगी।

How to use American money in India’s renewable energy revolution

बाइडन प्रशासन और सीओपी26 की अध्यक्षता संभाल रहा ब्रिटेन, वनों के कटान को कम करने के लिए ब्राजील से एक समझौते का लक्ष्य रख रहे हैं, वहीं क्लाइमेट दूत जॉन केरी भारत को वर्ष 2050 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। वह इन संभावनाओं को भी तलाश रहे हैं कि भारत की अक्षय ऊर्जा क्रांति में अमेरिकी धन को कैसे इस्तेमाल किया जाए

क्लाइमेट ट्रेंड्स ने आयोजित किया वेबिनार

इस महत्वपूर्ण बैठक से जुड़ी तमाम संभावनाओं और पहलुओं पर विचार विमर्श के लिए क्लाइमेट ट्रेंड्स की तरफ से एक वेबिनार आयोजित किया गया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय रिसोर्स पैनल की सह अध्यक्ष और ब्राजील की पूर्व पर्यावरण मंत्री ईजाबेला टेक्सिरा, डब्ल्यूआरआई इंडिया की क्लाइमेट प्रोग्राम के निदेशक उल्का केलकर, यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स में क्लाइमेट एंड एनर्जी प्रोग्राम की पॉलिसी डायरेक्टर रेचल क्लीटस और पूर्व ओबामा क्लाइमेट एडवाइजर और सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष जॉन पोडेस्टा ने हिस्सा लिया।

COVID-19 has broken countries.

रेचल ने देशों द्वारा प्रदूषण मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था के लिये पूर्व में संकल्‍प व्‍यक्‍त कर चुके देशों के सामने कोविड-19 के कारण आयी मुश्किलों का जिक्र करते हुए कहा

‘‘कोविड-19 ने देशों को तोड़ दिया है। जिन देशों ने ग्रीन कमिटमेंट दिया था वह आज इसकी वजह से अपने संकल्‍प को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।’’

उन्‍होंने कहा कि नेट-जीरो का लक्ष्‍य (Net zero target) पूरी दुनिया के लिये महत्‍वपूर्ण है। हमें जीवाश्‍म ईंधन पर निवेश (Investment on fossil fuels) को पूरी तरह बंद करना होगा। रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी (Renewable energy technology) के सहयोग को बढ़ाकर भारत, कनाडा और यूरोप के बीच ग्लोबल क्लाइमेट एंबिशन को बढ़ाने के लिए संवाद जरूरी है। यह पूरी तरह से बाइडन सरकार पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से संकल्प को आगे बढ़ाता है।

रेचल ने कहा कि एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और कोकाकोला जैसी विशाल कंपनियों समेत 300 से ज्यादा कारोबारी और निवेशक बाइडन प्रशासन का आह्वान कर रहे हैं कि वह एक जलवायु परिवर्तन संबंधी ऐसा महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करें जिससे ग्रीन हाउस गैसों के अमेरिका द्वारा किए जाने वाले उत्सर्जन (US emissions of greenhouse gases) में वर्ष 2030 तक 2005 के स्तरों के आधार पर कम से कम 50% की कटौती हो सके।

दरअसल, इस लक्ष्य से अमेरिका द्वारा पूर्व में व्यक्त किए गए संकल्प का भार दो गुना हो जाएगा। इसके लिए बिजली, परिवहन तथा अन्य क्षेत्रों में नाटकीय बदलाव की जरूरत होगी।

राष्ट्रपति जो बाइडेन वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में अपेक्षित कमी के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि वह वर्ष 2050 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के अंतिम लक्ष्य की तरफ बढ़ने का इरादा कर रहे हैं, लिहाजा नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन  मील का पत्थर साबित होगा।

नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन को भी न्यौता

बाइडन ने जिन नेताओं को वर्चुअल बैठक में बुलाया है उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जापान के प्रधानमंत्री योशीहीदे सूगा, ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी शामिल हैं।

Americans are beginning to understand the impact of climate change

जॉन पोडेस्टा ने वेबिनार में कहा

‘‘अब ऐसा समय आ गया है जब अमेरिका के लोग जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने लगे हैं और उन्हें अंदाजा हो गया है कि जलवायु परिवर्तन उन्हें ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। पूरी दुनिया के लोगों को भी यह एहसास होने लगा है इसलिए 22-23 अप्रैल को होने जा रही समिट बहुत महत्वपूर्ण होगी। अमेरिकी प्रशासन ने कुछ प्रमुख लक्ष्यों की तरफ ध्यान दिलाया है। वर्ष 2050 तक नेट जीरो अर्थव्यवस्था, वर्ष 2035 तक ऊर्जा क्षेत्र को 100% प्रदूषण मुक्त बनाना और इस रूपांतरण को न्याय संगत तरीके से करना। हाल ही में बाइडन ने अमेरिका की रोजगार योजना को भी सामने रखा है, जिसमें 240 मिलियन डॉलर के निवेश की बात है, जिसे स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश किया जाएगा। निजी और सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ अमेरिका के लोगों के सहयोग से हम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि आगामी समय में जब अमेरिका समिट में हिस्सा लेगा तो अमेरिका को अपनी विश्वसनीयता दोबारा स्थापित करनी होगी।

उन्‍होंने कहा कि बाइडन सरकार को अपनी आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति में जलवायु के पहलू को भी शामिल करना होगा। अमेरिका को अपनी रणनीतिक साझीदारियों को बढ़ाना होगा ताकि पूरी दुनिया के संबंध में से एक ऐसी नीति बनाई जा सके, जिससे कार्बन उत्सर्जन में लक्ष्यात्मक कमी लाई जा सके। ग्रीन क्लाइमेट फंड के तहत अभी 1.2 बिलियन डॉलर का संकल्प व्यक्त किया है गया है। इस बारे में राष्ट्रपति ने अपने बजट भाषण में कहा भी था लेकिन कुल मिलाकर अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। दुनिया को क्लाइमेट मिटिगेशन और क्लाइमेट रेसिलियंस के लिए अगले एक दशक में 80 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। हमें कोयला बिजलीघरों पर जनता की गाढ़ी कमाई के निवेश को रोकना होगा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को नेट जीरो के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।

उल्का केलकर ने इस मौके पर कहा कि बाइडन प्रशासन से हमें वैसी ही उम्मीदें हैं जैसे कि ओबामा सरकार से हुआ करती थी। हालांकि 1.2 बिलियन डॉलर जीसीएफ बजट उम्मीदों के मुताबिक नहीं है लेकिन फिर भी अमेरिकी प्रशासन द्वारा की गई सशक्त घोषणाओं से एक उम्मीद जगी है। इसके अलावा कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया चीन ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं। मैं भारतीय परिप्रेक्ष्य में तीन चीजों पर बात करना चाहूंगी जो दरअसल उम्मीद बंधाती हैं। जलवायु के प्रति अनुकूल अर्थव्यवस्था बनाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, वह पहले से बिल्कुल अलग हैं और उनके अपने फायदे भी हैं। इससे प्रदूषण के कारण होने वाली असामयिक मौतों में कमी आएगी। भारी मात्रा में पानी की बचत होगी,  हरित क्षेत्र जैसे कि अक्षय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इसका विभिन्न क्षेत्रों में असर होगा। इससे फॉसिल फ्यूल सेविंग के तौर पर निश्चित रूप से फायदा होगा। इनका भारत को भी काफी फायदा होगा। इससे फॉसिल फ्यूल्स सेविंग के तौर पर काफी बचत होगी।

उन्‍होंने कहा भारत सरकार अनेक जीवाश्म ईंधन आधारित कर आमदनी पर निर्भर करती है। अब हम स्‍वच्‍छ ईंधन की तरफ रुख कर रहे हैं। हो सकता है कि हम इन करों में कटौती देखें, जिससे हमारी स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र पर निवेश की क्षमता में कमी हो सकती है, इसलिए हमें सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि एक बिजनेस मॉडल की भी जरूरत है।

उल्‍का ने कहा कि अगर आप 2050 के अनुमानों की तरफ देखते हैं तो कौन सा सेक्टर और कौन सी टेक्नोलॉजी 2050 तक कार्बन न्यूनीकरण की दिशा में सबसे ज्यादा योगदान करेगी? दरअसल यह काम भविष्य की टेक्नोलॉजी ही कर पाएंगी, जैसे कि भारतीय उद्योग का संपूर्ण विद्युतीकरण, अक्षय स्रोतों से मिलने वाली हाइड्रोजन का इस्तेमाल। वैसे सुनने में यह सब बहुत महंगी चीजें लगती है लेकिन अगर आप समेकित रूप से देखें तो वर्ष 2050 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में सबसे ज्यादा योगदान इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का ही होगा। अगर हम इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को अपना लें तो बहुत बड़ी मदद हो सकती है। अमेरिका की नजर में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का मतलब कार और बस से है लेकिन भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का मतलब दोपहिया वाहनों से है। लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक की बात करें तो आप ट्रकों को पूरी रात चार्ज करने के लिए नहीं रोक सकते इसलिए यहां पर प्रौद्योगिकीय साझेदारी की बड़ी भूमिका होगी। इसके लिए तेज चार्ज करने वाले उपकरण हाइड्रोजन सप्लाई चैन इत्यादि की जरूरत होगी।

उन्‍होंने कहा कि अनेक भारतीय राज्यों ने घोषणा की है कि वे अब कोयले में निवेश नहीं करने जा रहे हैं। कोयला अब फायदे का सौदा नहीं रहा। जब हम अमेरिका जैसे देश के लिए डेकार्बोनाइजेशन पाथवे की बात करते हैं तो इसका मतलब है रूपांतरण यानी उस चीज से हटना जो पहले ही बनी हुई है। भारत जैसे देश के लिए इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने अपना नजरिया पेश किया है। हमारे द्वारा उत्सर्जित कार्बन का 60% हिस्सा ऐसी चीजों से निकलता है जो अभी बनी नहीं हैं, इसलिए यह एक अलग तरह का रूपांतरण होगा। दरअसल एक अलग तरह के न्यायसंगत रूपांतरण की जरूरत होगी। भारत में हम न सिर्फ फॉसिल फ्यूल जॉब के नुकसान की बात कर रहे हैं बल्कि अब इस बारे में भी बात कर रहे हैं कि किस तरह से बेहतर तरीके से नई नौकरियां उपलब्ध कराई जाएं, किस तरह से अधिक जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से नया मूलभूत ढांचा तैयार किया जाए। हमें न्याय संगत रूपांतरण पर ध्यान देना होगा। यह एक मुश्किल काम जरूर है लेकिन इस पर जरूर ध्यान देना पड़ेगा।

The meaning of climate change has changed today

अंतरराष्ट्रीय रिसोर्स पैनल की सह अध्यक्ष और ब्राजील की पूर्व पर्यावरण मंत्री ईजाबेला टेक्सिरा ने इस मौके पर कहा

‘‘जलवायु परिवर्तन का मतलब आज बदल चुका है। मेरी नजर में यह खुशी की बात है कि अपने नए नेतृत्व की वजह से अमेरिका जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए एक बार फिर खड़ा हुआ है हमें न सिर्फ कार्बन न्‍यूनीकरण और अनुकूलन पर काम करना है, बल्कि पूरी दुनिया में नई साझेदारियों पर भी काम करना होगा। हमारे लिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग किस तरह से आगे बढ़ता है।

उन्‍होंने कहा कि जलवायु संबंधी द्विपक्षीय लक्ष्य को तय करते वक्त इस बात का भी ध्यान रखना होगा के साथ ही साथ हमें विकास की रफ्तार को भी आगे बढ़ाना है। यही सवाल चीन, जर्मनी और नॉर्वे का भी है। सभी पक्षों को राजी करने के लिए साझा हित तैयार करने होंगे। आगामी समिट के दौरान यह जरूरी होगा।

ईजाबेला ने अपने देश ब्राजील के नेतृत्‍व से जलवायु परिवर्तन जैसे गम्‍भीर मुद्दे और नेट जीरो के लक्ष्‍य की दिशा में अधिक गम्‍भीरता से काम करने की अपेक्षा करते हुए कहा कि ब्राजील को और अधिक मजबूत संकल्‍प के साथ आगे बढ़ना होगा।

सावधान : दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील से भारत पहुँचा रूपांतरित कोरोना वायरस

COVID-19 news & analysis

Beware: the transformed coronavirus arrived in India from South Africa and Brazil

Four people who flew into India last month were infected with the South African variant of the Sars-CoV-2 virus, and another traveller was found infected with the Brazilian variant

नई दिल्ली, 17 फरवरी . भारत में हाल में मिले युनाइटेड किंगडम के 187 रूपांतरित कोरोना वायरस नमूनों के बाद दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में पाया गया कोरोना वायरस का नया रूप भी अब देश में प्रवेश (Corona virus In India) कर चुका है। इस वर्ष जनवरी के दौरान भारत में चार लोगों में कोरोना वायरस (सार्स-कोव-2- sars-cov-2 virus) का दक्षिण अफ्रीकी वेरिएंट पाया गया था। जबकि, फरवरी के पहले हफ्ते के दौरान एक व्यक्ति में ब्राजील के कोरोना वायरस वेरिएंट का पता चला है।

आईसीएमआर महानिदेशक ने दी जानकारी

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक प्रोफेसर बलराम भार्गव ने यह जानकारी देते हुए कहा है कि दक्षिण अफ्रीकी कोरोना वायरस वेरिएंट की पहचान जिन चार लोगों में हुई है, उनमें से एक व्यक्ति अंगोला, एक व्यक्ति तंजानिया, और दो लोग दक्षिण अफ्रीका से भारत आए हैं। प्रोफेसर भार्गव ने बताया कि रूपांतरित कोरोना वायरस से संक्रमितों को  क्वारंटाइन कर दिया गया है।

ब्राजील में पाए गए कोरोना वायरस वेरिएंट के स्पाइक प्रोटीन के रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन में रूपांतरण और बढ़ी हुई प्रसार क्षमता देखी गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि रूपांतरित कोरोना वायरस के तेजी से फैलने में ये कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि वायरस का नया रूप अब तक करीब 15 देशों में फैल चुका है।

प्रोफेसर बलराम भार्गव ने बताया है कि पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के शोधकर्ता संक्रमितों में पाए गए दक्षिण अफ्रीकी कोरोना वायरस वेरिएंट को पृथक करके उसका कल्चर कर रहे हैं। इससे पहले, युनाइटेड किंगडम में मिले कोरोना वायरस वेरिएंट से अब तक 187 लोगों के संक्रमित होने का पता चला है।

स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने कहा है कि ब्राजील एवं दक्षिण अफ्रीकी कोरोना वायरस वेरिएंट्स के भारत में प्रवेश की निगरानी के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं, जिसमें इन दोनों देशों से भारत आने वाली उड़ानों के मार्ग में परिवर्तन शामिल है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से भारत आने वाली उड़ानों को खाड़ी देशों से होकर आना पड़ रहा है।

(इंडिया साइंस वायर)

Rising mortality as Africa marks one year of COVID-19, South Africa will pause Oxford/AstraZeneca vaccine

व्हाइट हाउस में जो बिडेन की आमद, लाएगी जलवायु परिवर्तन की शामत !

Donald Trump, Joe Biden

Joe Biden’s swearing-in ceremony will take place tonight

नई दिल्ली, 20 जनवरी 2021. तमाम ऐतिहासिक उठा-पटक के बाद, अमेरिका में, जो बिडेन (Joe Biden) आज राष्ट्रपति पद की शपथ (Presidential oath) लेंगे। हालाँकि अभी उनका कार्यकाल औपचारिक रूप से शुरू भी नहीं हुआ लेकिन उससे पहले ही उनकी नीतियों और प्राथमिकताओं ने दुनिया भर की नज़रें उनकी और कर दी हैं।

राष्ट्रपति जो बिडेन ने हर लिहाज़ से इतिहास रच दिया है।

ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी देश का चुनाव जलवायु परिवर्तन (Climate change) और पर्यावरण (environment) जैसे गैर-सियासी मुद्दे पर लड़ा गया और जीता भी गया। जीता भी ऐसे कि किसी भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा वोट प्राप्त कर। राष्ट्रपति बिडेन ने इतिहास हर लिहाज़ से रच दिया है।

यह तय है कि बिडेन न सिर्फ अमेरिका को पेरिस समझौते में फिर से शामिल कराने के अपने वादे को पूरा करेंगे, बल्कि यह भी साफ़ दिख रहा है कि पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का नेतृत्व भी वो करने से चूकेंगे नहीं।

ऐसी उम्मीद है कि पद की शपथ लेने के बाद, जल्द ही, वो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु कार्रवाई पर कुछ घोषणाएं करेंगे।

प्रमुख तौर पर 2035 तक बिजली क्षेत्र को कार्बन को शून्य करने के लिए बिडेन की प्रतिज्ञा से संबंधित संभावित शुरुआती बयान अपेक्षित हैं। साथ ही, कार ईंधन दक्षता, बिजली संयंत्र उत्सर्जन, और मीथेन पर ओबामा-युग के मानकों को बहाल करने के लिए कदम; किगली संशोधन में शामिल होने के अमेरिकी इरादे का संकेत और स्पष्ट निर्देश कि जलवायु एक शीर्ष विदेश नीति प्राथमिकता अपेक्षित है।

युक्त राज्य अमेरिका – विदेशी निवेश, व्यापार संबंधों, विकास सहायता, कूटनीति, नियमों और निगमों के माध्यम से – जीवाश्म ईंधन के विस्तार से संबंधित परियोजनाओं की एक श्रृंखला में शामिल है, साथ ही निम्नलिखित महत्वपूर्ण पारिस्थितिक प्रणालियों के संरक्षण या विनाश को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

अर्जेंटीना : वाका मुएर्ता – अमेरिका अंतरराष्ट्रीय विकास वित्तपोषण के माध्यम से अर्जेंटीना में फ्रैकिंग और तेल और गैस उत्पादन को प्रोत्साहित करता है, जो पिछली बार वाका मुएर्ता परियोजनाओं के लिए हुआ। उपराष्ट्रपति-निर्वाचित कमला हैरिस सहित कई अमेरिकी सीनेटरों ने इसके खिलाफ एक याचिका पर हस्ताक्षर किए। बिडेन स्वच्छ ऊर्जा का समर्थन करने के लिए संघीय विकास एजेंसियों को निर्देशित कर सकते हैं।

• कनाडा : टार सैंड्स (Canada tar sands news) – बिडेन ने कीस्टोन एक्सएल पाइपलाइन के खिलाफ बात की है, यह कहते हुए कि “टार सैंड्स की हमें ज़रूरत नहीं है।”

बिडेन के राष्ट्रपति अभियान का एक प्रमुख वादा कीस्टोन एक्सएल को रद्द करने की प्रतिबद्धता थी। वह मिनेसोटा के माध्यम से अमेरिका में कनाडाई टार रेत लाने के लिए एक नई परियोजना, प्रस्तावित लाइन 3 पाइपलाइन जो विपक्ष में बढ़ रही है, को भी रोक सकतें हैं।

ब्राजील : अमेज़ॅन विनाश – बिडेन ने कहा है कि वह वनों की कटाई के लिए ब्राजील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो को जवाबदेह ठहराएंगे। अन्य देशों को रैली करने के माध्यम से अमेज़न सुरक्षा करने के लिए $20 बिलियन के समर्थन से शायद यह हासिल किया जा सकता है। हालांकि स्थानीय ब्राज़ीलियाई समूहों इस बात पर ज़ोर डालते हैं कि यह इस तरह से किया जाना चाहिए जो ब्राजील की अमेज़ॅन के अपने हिस्से पर संप्रभुता को स्वीकार करता है और उसका सम्मान करता है।

इसके साथ, ऐसा संभव है कि ‘क्लीन ग्रोथ फर्स्ट’ के जुमले को तरजीह देते हुए बिडेन विदेशी जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के अमेरिकी समर्थन को सीमित कर दें। गौर करने वाली बात है कि 2010-2019 के बीच अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक ने विदेशी जीवाश्म ईंधन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 90% से अधिक का वित्त पोषण किया, और हाल ही में मोज़ाम्बिक एलएनजी परियोजना को 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्रदान किया।

जो बिडेन पहले ही संकेत दे चुके हैं कि वह विदेशी जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को न सिर्फ खत्म कर देंगे बल्कि चीन सहित अन्य G20 देशों को ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।

कुल मिलाकर, जो बिडेन की व्हाइट हाउस में आमद जलवायु परिवर्तन के खिलाफ दुनिया की लड़ाई में निर्णायक साबित होगी।

मानव इतिहास का सबसे गर्म साल था 2020

Climate change Environment Nature

2020 tied with 2016 as the hottest year on record

फ़िलहाल मानव इतिहास में अब तक का सबसे गर्म साल 2016 को माना जाता था। लेकिन अब, 2020 को भी अब तक का सबसे गर्म साल कहा जायेगा।

The Copernicus Climate Change Service, the EU’s Earth Observation Programme, has just announced that 2020 was the warmest year ever recorded tying with 2016, the previous record-holder. The unusually high temperatures throughout 2020 happened despite the occurrence of La Niña, a recurrent weather phenomenon that has a cooling effect on global temperatures.

नई दिल्ली, 09 जनवरी 2021. यूरोपीय संघ के पृथ्वी अवलोकन कार्यक्रम (अर्थ ऑब्ज़र्वेशन प्रोग्राम), कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस ने घोषणा कर दी है कि ला-नीना, एक आवर्ती मौसम की घटना जिसका वैश्विक तापमान पर ठंडा प्रभाव पड़ता है, के बावजूद 2020 के दौरान असामान्य उच्च तापमान रहे और पिछले रिकॉर्ड-धारक 2016 के साथ अब 2020 भी सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

यह घोषणा एक चिंताजनक प्रवृत्ति की निरंतरता की पुष्टि करती है, पिछले छह वर्ष लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म रहे हैं। यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती (Cut greenhouse gas emissions) के लिए देशों की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है, जो मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार (Responsible for global warming) हैं। जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि पेरिस समझौते को पूरा करने के लिए वर्तमान योजनाएँ अपर्याप्त हैं, चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों ने हाल ही में अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य को सामने रखा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे ग्रह गर्म होता है, कई चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है। 2020 में इसके कई संकेत थे, आर्कटिक में रिकॉर्ड तापमान के साथ, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में बहुत बड़ी वाइल्डफ़ायर (जंगल की आग), और मानसून के मौसम के दौरान कई एशियाई देशों में भारी बरसात के कारण गंभीर बाढ़ें।

माध्य वैश्विक तापमान का विश्लेषण कई वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा नियमित रूप से किया जाता है। कोपर्निकस के अलावा, नासा, एनओएए, बर्कले अर्त और हैडली की वेधशालाएं पूरे वर्ष वैश्विक तापमान पर निगरानी करती हैं।

क्योंकि वे अलग-अलग तरीकों का उपयोग करते हैं, डाटासेटों के बीच छोटे अंतर होते हैं और यह संभव है कि अन्य समूह 2016 के मुकाबले 2020 को अधिक गरम नहीं समझतें हों। इन छोटी विसंगतियों के बावजूद, सभी विश्लेषण समग्र प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं, और हाल के वर्षों को लगातार रिकॉर्ड पर सबसे गर्म पाया गया है।

2020 चरम घटनाओं का साल | 2020 year of extreme events

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में दुनिया भर में चरम मौसम की घटनाओं की लागत $150 बिलियन से अधिक है। इन घटनाओं में हीटवेव, वाइल्डफ़ायर, बाढ़ और उष्णकटिबंधीय चक्रवात शामिल थे – ये सभी ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होते हैं।

उच्च तापमान

अत्यधिक तापमान पूरे वर्ष स्थिर रहे और कई पिछले गर्मी के रिकॉर्ड टूट गए। इनमें शामिल है:

• साइबेरिया में रिकॉर्ड पर सबसे गर्म दिन, 38 डिग्री सेल्सियस के तापमान के साथ, आर्कटिक सर्कल के उत्तर में सबसे अधिक दर्ज किया गया तापमान। यह चरम तापमान एक हीटवेव के बीच ज़ाहिर हुआ जो, एक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के बिना “लगभग असंभव” होती।

• पृथ्वी पर अब तक का सबसे ऊँचा तापमान (डेथ वैली, कैलिफोर्निया में 54.4 ° C) दर्ज किया गया।

• उत्तरी गोलार्ध में सबसे गर्म गर्मी का मौसम (NOAA के अनुसार) ।

आग

वाइल्डफ़ायर ने पूरे साल कई सुर्खियां बटोरीं। जलवायु परिवर्तन द्वारा लाये गए अत्यधिक तापमान ने उनमें से कुछ की गंभीरता में योगदान दिया होगा। दुनिया भर में सबसे खराब आग की सूची में शामिल हैं :

• ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की झाड़ियों में लगी आग। रिकॉर्ड पर सबसे महंगी जंगलों की झाड़ियों की आग मानी जाती है, इस आग ने लाखों एकड़ को तबाह कर दिया और अरबों जानवरों को मार डाला। जनवरी 2020 में प्रकाशित एक एट्रिब्यूशन अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला कि जलवायु परिवर्तन ने ऐसी आग के जोखिम को कम से कम 30% बढ़ा दिया है।

• पश्चिमी तट अमेरिका में आग। आग का मौसम कैलिफोर्निया में रिकॉर्ड पर सबसे खराब था, जिसमें 4 मिलियन एकड़ से अधिक भूमि जल गई। अमेरिका के पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्र, जैसे कि ओरेगन और वाशिंगटन, भी प्रभावित हुए। आग का मौसम एक अत्यधिक हीटवेव के बीच पड़ा, जो इस क्षेत्र में बहुत उच्च तापमान लायी।

• दक्षिण अमेरिका में आग। कई दक्षिण अमेरिकी देश 2020 में जंगल की आग से प्रभावित हुए, जिनमें ब्राजील, अर्जेंटीना, बोलीविया और पैराग्वे शामिल हैं। अमेज़ॅन में कई आगें थीं, और पाराना की नदी के डेल्टा और ग्रान चाको के जंगल में भी, जिससे जैव विविधता को महत्वपूर्ण नुकसान हुए।

अत्यधिक वर्षा और बाढ़

कई देशों ने अत्यधिक वर्षा, विशेष रूप से एशियाई मानसून से जुड़ी हुई, के एपिसोड का अनुभव किया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्रह के गर्म होने के साथ मानसून की कुल बारिश में वृद्धि होगी, हालांकि हवा के पैटर्न में बदलाव के कारण कुछ क्षेत्रों में दूसरों के मुकाबले कम बारिश हो सकती है। कुछ प्रभावित देश :

• चीन में बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया, जिससे हजारों विस्थापन हुए और कम से कम 219 लोग मारे गए या लापता हो गए। बाढ़ से नुकसान का अनुमान 32 बिलियन डॉलर है।

• पाकिस्तान में बाढ़ से कम से कम 410 लोग मारे गए और $ 1.5 बिलियन की लागत आई।

• भारत में बाढ़ से मृत्यु दर बहुत अधिक था, जिसमें 2,067 लोग मारे गए थे। नुकसान का अनुमान $ 10 बिलियन है।

• सूडान में बाढ़ ने दस लाख से अधिक लोगों को प्रभावित किया, फसलों को नष्ट कर दिया और कम से कम 138 मौतें हुईं।

ऊष्णकटिबंधी चक्रवात | Tropical cyclone

अटलांटिक और हिंद महासागर दोनों में 2020 के उष्णकटिबंधीय चक्रवात का मौसम बहुत तीव्र रहा है।

• अटलांटिक में 2020 का तूफान का मौसम अब तक का सबसे सक्रिय था, जिसमें 30 नामित तूफान थे। इतिहास में दूसरी बार, तूफानों के नाम के लिए ग्रीक (यूनानी) नामों का इस्तेमाल करना पड़ा।

• सितंबर में, अटलांटिक बेसिन में पांच तूफान एक साथ सक्रिय थे, जो केवल रिकॉर्ड पर एक बार पहले, 1995 में, देखा गया था।

• कुछ क्षेत्रों ने कई तूफानों का अनुभव किया, जिनमें से कई लगभग एक के बाद एक हुए। अमेरिका में, अकेले लुइसियाना में पांच तूफ़ान आये, जिसने इस राज्य के लिए एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया। और मध्य अमेरिका के देश, जैसे होंडुरास और निकारागुआ, कुछ हफ्तों की अवधि में तूफान एटा और इओटा से प्रभावित हुए थे।

• दक्षिण एशिया में, चक्रवात अम्फान ने भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान को प्रभावित किया और 128 मौतों का कारण बना।

• फिलीपींस में, सुपर टाइफून गोनी और वामको ने व्यापक नुकसान पहुंचाया और कम से कम 97 लोगों की मौत हो गई। गोनी वर्ष का सबसे मजबूत उष्णकटिबंधीय चक्रवात था।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जलवायु सेवा केंद्र जर्मनी (GERICS) के वैज्ञानिक, डॉ. करस्टन हौस्टिन, ने कहा, “यह तथ्य कि 2016 के साथ 2020 रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्ष है, एक और कठोर अनुस्मारक है कि मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन बेरोकटोक निरंतर जारी है। यह विशेष रूप से अद्भुत है क्योंकि 2020 का वर्ष एल नीनो के प्रभाव में नहीं था, उष्णकटिबंधीय प्रशांत में प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता का एक मोड जिसने अतिरिक्त गर्मी के साथ वर्ष 2016  को ‘सुपरचार्ज’ करा था। 2020 में ऐसा कोई ‘बूस्ट’ नहीं था, फिर भी यह पिछले रिकॉर्ड धारक से लगभग अधिक था। वास्तव में, केवल एक विशेष रूप से ठंडा दिसंबर (नवंबर की तुलना में) 2020 को नए स्टैंड-अलोन (अकेला) सबसे गर्म वर्ष बनने से रोकता है।

वो आगे कहते हैं, “महामारी के संदर्भ में, वैज्ञानिकों ने पाया है कि आर्थिक स्टिमुलस (प्रोत्साहन) के रूप में  सरकारों द्वारा व्यवसायों को बनाए रखने के लिए (और व्यक्तियों का समर्थन करने के लिए)  लिक्विडिटी (तरलता) समर्थन, पेरिस जलवायु समझौते के अनुरूप कम कार्बन मार्ग पर रहने के लिए आवश्यक वार्षिक ऊर्जा निवेश से कहीं अधिक है। एक बार जब हम एक आपातकालीन स्थिति का सामना कर रहे हैं, तो अचानक असंभव (वित्तीय) कार्रवाई अभूतपूर्व पैमाने पर की जाती है। यह देखते हुए कि हम जलवायु आपातकाल की स्थिति में भी हैं – जिसे किसी टीके के साथ पूर्ववत नहीं किया जा सकता है – स्मार्ट निवेश विकल्प की ज़रुरत है यह देखते हुए की दांव पर क्या है। “

जॉर्जिया एथलेटिक एसोसिएशन के प्रतिष्ठित प्रोफेसर ऑफ एटमॉस्फेरिक साइंसेज एंड जियोग्राफी, डॉ. मार्शल शेफर्ड, ने कहा, “मुझे लगता है यह मुद्दा नहीं है कि रिकॉर्ड पर 2020 सबसे गर्म वर्ष है या नहीं है। हम निरंतर रिकॉर्ड तोड़ वर्षों के युग में हैं। यह अब ब्रेकिंग न्यूज नहीं है, बल्कि मानवीय संकट है।”

जेयर बोल्सोनारो के सत्ता में आने के बाद सेअमेज़ॅान जंगल ने बेल्जियम के दोतिहाई हिस्से के बराबर वन खो दिया

Jair Bolsonaro

अमेज़ॅान जंगल  ने बेल्जियम के दो तिहाई हिस्से के बराबर वन खो दिया

Brazilian Amazon forest lost two-thirds of Belgium since Jair Bolsonaro took office

Deforestation more than 30% up for the second consecutive year; fires skyrocket in August

नई दिल्ली, 10 अगस्त 2020.  जेयर बोल्सोनारो के पदभार संभालने के बाद से ब्राजील के अमेज़ॅान वन ने बेल्जियम का दो तिहाई हिस्सा खो दिया है। आज जारी किए गए आधिकारिक डेटा के अनुसार ब्राजील के अमेज़ॅन में वनों की कटाई की दर 9.205 वर्ग किमी, पिछले 12 महीनों में 34% की वृद्धि हुई है।

यह एक नया कीर्तिमान है और पिछले 12 महीनों (अगस्त 2018 और जुलाई 2019 के बीच) में कटाई की दर के समान पहुंच गया, जब अमेज़ॅान वन ने 10,129 किमी² वन खोया था।

अगर जंगल की कटाई का सिलसिला यूंही चलता रहा तो अमेज़ॅान एक टिपिंग पॉइंट 20 से कम वर्षों में पहुंच सकता है, और स्थायी रूप से क्षेत्रीय मौसम के पैटर्न को बदल सकता है, जीवित वर्षावन को सूखे सवाना में बदल सकता है और अरबों टन कार्बन को वायुमंडल में जारी कर सकता है।

Bolsonaro’s government almost doubled the pace of destruction of the Brazilian Amazon forest.

अगस्त 2019 और जुलाई 2020 के बीच पाया गया वनों की कटाई का क्षेत्र दो साल पहले की तुलना में 101% अधिक है, जिसका अर्थ है कि बोल्सनारो की सरकार ने ब्राजील के अमेज़ॅन वन के विनाश की गति लगभग दोगुनी कर दी।

गौरतलब है कि अमेज़न दुनिया का सबसे बड़ा रेनफॉरेस्ट (वर्षावन) है, जो धरती  पर सबसे बड़ी जैव विविधता का घर है और एक विशाल कार्बन सिंक है। पर अगर नष्ट हो गया तो यह ग्रीन हाउस गैसों ( GHG) के उत्सर्जन का एक गंभीर  स्रोत है क्योंकि जब पेड़ों को काटा जाता है, तो ग्लोबल वार्मिंग में तेजी लाते हुए CO2 की एक बड़ी मात्रा वायुमंडल में उत्सर्जित होती है।

ब्राजील में GHG (जीएचजी) उत्सर्जन के 44% के लिए वनों की कटाई ज़िम्मेदार है – यह दुनिया में 6वाँ सबसे बड़ा उत्सर्जक है। 2020 में, वनों की कटाई और कृषिक्रम  के कारण, देश 2018 से सबसे हाल के आंकड़ों की तुलना में 10% -20% अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर सकता है।

ज्ञात हो कि ब्राजील के अमेज़ॅन जंगल में आग (Brazilian Amazon Wildfire) का मौसम शुरू हो चुका है और हम शायद 2019 से भयावह छवियों का दोहराव देखेंगे या स्थिति को और भी ज़्यादा बिगड़ते हुए देखेंगे। अमेज़ॅन वन को कृषि योग्य भूमि में बदलने की प्रक्रिया में आग केवल एक कदम है। आग में जलकर खाली ज़मीन पर या तो सोया की खेती की जाती है और या पशुपालन के काम में लाई जाती है।

अमेज़ॅान एनवायरनमेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूटamazon environmental research institute (ipam), (आईपीएएम) के अनुसार, पिछले साल  कब्ज़ा किए गए 87,000 से अधिक हॉट स्पॉट के लिए ऐसी आग लगने की घटनाएं ज़िम्मेदार थीं ।

अगर हम 20 महीने की अवधि पर विचार करते हैं क्योंकि 2019 की पहली जनवरी को Jair Bolsonaro ने पदभार संभाला है, तो अमेज़ॅन वर्षावन ने 20.500 km th खो दिया – जो कि  बेल्जियम के लगभग दो तिहाई, हिस्से या 30689 किमी² के बराबर या फिर आधे  स्विट्जरलैंड (41 285 km²) के बराबर  है।

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