हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, आज कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ?

chanchal bhu

यह पोस्ट अपने अग्रज, समाजवादी चिंतक, ITM  विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलाधिपति भाई Rama Shankar Singh के लिए है। कल उन्होंने पूछा था –

“बाक़ी सब ठीकई है जो है सो हइयै पर चंचल जी यह बताया जाये कि ४७ के बाद से लगातार २०१४ तक   कांग्रेस ने अपने उन विपक्षी सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया जिनकी शानदार भूमिका आज़ादी की लड़ाई में थी।”

यह सवाल अलग-अलग तरीक़ों, अलग-अलग ज़ुबानो में अलग-अलग मौक़ों पर हमसे पूछा जाता रहा है। 

 रमा भाई हमारे शुभेक्षु हैं, उनका प्यार दुलार हम लोंगो को मिलता रहा है, सो उन्होंने बहुत बचाते हुए यह सवाल उठाया। रमा भाई ने यह सवाल प्रियंका गांधी की गिरफ़्तारी पर लिखे गए हमारे पोस्ट पर की है।

रमा भाई की इसी टिप्पणी के नीचे एक साहब और हैं, मनीष जी, उन्होंने सीधे-सीधे हमसे हमारी क़ीमत ही पूछ लिया – कांग्रेस ने कितने में ख़रीदा है ? यह सवाल दो मायने में दुरुस्त है एक – एक तरफ़ जब एक पूरा तंत्र कांग्रेस का इतिहास मिटाने पर तुला है, कांग्रेस के पास कोई जवाब देने वाला नहीं है ? ये कांग्रेसी अपना इतिहास तक नहीं जानता, कमबख़्त सालों साल बैठ कर मलाई खा रहा है और जब ऊँघता है तो पूछता है – कांग्रेस ने हमें दिया क्या ?

2012 से कांग्रेस का बचाव कर  रहे हो, ग़लीज़ गालियों के बीच से गुजरना पड़ रहा है तुम्हें मिला क्या है ?

हमने पहले हिस्से का जवाब नहीं दिया और सच बात है की हमारे पास उसका जवाब  है भी  नहीं, क़ि कांग्रेसी चुप क्यों रहता है ? दूसरे खंड का जवाब दिया है – हाँ हमें मिला है कांग्रेस से। “खुद मुखतारी “। मतलब आज़ादी। आज़ादी का वो मतलब नहीं, जो तुम आसानी से समझ बैठे हो – विदेशी  हुकूमत को हटा कर देसी सरकार बनाना। आज़ादी का मतलब मुकम्मिल आज़ादी। शोषण और दबाव मुक्त माहौल। हम ही उत्पादक हो, हम ही उपभोक्ता हों, बीच में कोई बिचौलिया न हो।

गांधी विचार की लम्बी यात्रा में केवल  निर्गुन आंदोलन नहीं रहा है, क्रांतिकारी रचनात्मक आंदोलन को कांग्रेस ने ढोया है। ( इस कांग्रेस में राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल या राज गोपालाचारी नहीं  रहे, इसी कांग्रेस में  बाचा खान, पंडित नेहरु, सुभाष चंद बोस   डॉक्टर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, सुचेता कृपलानी भी हैं ) अंग्रेजों भारत छोड़ो, के साथ चरखा भी चला है, मैकाले की  कलम घिस्सू शिक्षा नीति का बहिष्कार ही नहीं हुआ है, काशी विद्यापीठ,   जामिया मिल्लिया इसलामिया  जैसे संस्थानों के निर्माण के लिए कांग्रेस ने भीख माँग कर नयी पीढ़ी का निर्माण किया है।

हज़ारों हज़ार साल से अछूत बना कर समाज के एक  बड़े हिस्से को बाहर फेंक दिया गया था, उसे कांग्रेस ने  उसे ऊपर उठाया है। बग़ैर तस्वीर चिपकाए मासूम बच्चों को कलम के साथ तकली भी पकड़ाया है। मित्र ! यह सब हमें मुफ़्त में मिला है, ख़रीदना नहीं पड़ा है, न लड़ना पड़ा है। कांग्रेस ने कोई एहसान भी नहीं  जताया  क़ि “यह मुफ़्त“ में दे रहा हूँ।

यह रही हमारी तस्वीर। उस कांग्रेस को नहीं मालूम था क़ि  “फ़र्ज़ “ और  “कर्तव्य“ को फ़्री फंड बोल कर ग़ुलाम भी बनाया जा सकता है।

जी हाँ कांग्रेस ने ख़रीदा है और हम और क़ीमत की लालच में एक लबार के पीछे भागे जा रहे हैं। और कांग्रेस के साथ वाले से सवाल पूछा जा रहा है, कांग्रेस ने दिया क्या है ? 

हम रमा भाई के गम्भीर सवाल पर आते हैं।

रमा भाई का इशारा है कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता वह भी 1947 से 2014 के बीच। कांग्रेस का सत्याग्रहियों के साथ भयानक दुर्व्यवहार क्यों किया, जिनकी आज़ादी की लड़ाई में शानदार भूमिका थी ? “

रमा भाई के बहाने से हम अपने उन तमाम शुभेक्षुओं से मुख़ातिब हैं जो अक्सर हमसे पूछते हैं ताउम्र ( वही आप वाली सीमा रेखा, रमा भाई !) 2014 तक तुम कांग्रेस के विरोध में रहे, मार खाते रहे, जेल जाते रहे अचानक कांग्रेस के समर्थन में कैसे आ गये ? यानी कांग्रेस और समाजवादियों के बीच का रिश्ता ? इस सवाल को हल करने के लिए हम इसी भारतीय ज़मीन से निकली, सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा प्रचलित कहानी का तीनों मशहूर हिस्सा दे  रहे हैं। 

मूल कहानी है- कछुआ और ख़रगोश के बीच दौड़ की प्रतियोगिता में ख़रगोश अपनी जीत पर आश्वस्त है, रास्ते में सो जाता है, जीतता कछुआ है।    

पाकिस्तान के मशहूर  व्यंग्यकार इब्ने इंशा लिखते हैं – कछुआ जब गंतव्य तक पहुँचा तो उसने देखा – पत्थर के एक टीले पर एक ख़रगोश का बच्चा बैठा, टुकुर-टुकुर ताक रहा है। कछुए ने ख़रगोश से पूछा – बच्चे ! तुमने किसी ख़रगोश को इधर आते देखा है ? हमसे दौड़ने की बाज़ी लगा रखा है। ख़रगोश का बच्चा मुस्कुराया –  वो मेरे दादा थे, पिता जी को जो समझा के गये, मरते  समय पिता जी ने वही बताया  कि  –  एक दिन एक ख़रगोश यहाँ आएगा, उसका कान काट लेना और बता देना कि तुम हार गये हो। इतना सुनते ही ख़रगोश ने अपनी गरदन  खोल में डाल ली और आज तक अपने खोल में छिपा बैठा है।

तीसरा  वर्जन डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का है – लिखते हैं – नदी के किनारे एक वृद्ध कछुआ मुद्दतों से वही एक जगह पड़ा कराहता रहता है। गरदन  निकालता है, नदी के किनारे की झाड़ी को देखता है। दो बूँद आंसू गिरा कर फिर अपनी खोल में चला जाता है। रोने और चुप पड़े रहने का सबब पूछने पर उसने बताया – कछुआ और ख़रगोश में बाज़ी लग गई और दौड़ शुरू हुई।  ख़रगोश ने कुलाँच भरा ही था कि एक झबरा  कुत्ता झपट्टा मारा और ख़रगोश की गरदन मरोड़ कर, लहूलुहान कर दिया और  जबड़े  में फँसाए उसे लेकर अपने मालिक के पास  चला गया। आज भी वह कछुआ वहीं है। ख़रगोश का नाती-कभी कभी उस झाड़ी में दिख जाता है।

रमा भाई ! कांग्रेस और समाजवादी के बीच यही रिश्ता रहा। अलग-अलग भाष्य, अलग-अलग तेवर। आज देखें तो तीनों वर्जन सही लगते हैं। दोनों के बीच मात्र “गति“ की प्रतिस्पर्धा रही।

पहला समाजवादी सुभाष चंद बोस और बापू के बीच। केवल गति को लेकर जिच है। उद्देश्य दोनों का एक है। सुभाष चंद बोस ने हिंसक क्रांति को ज़्यादा गतिशील समझा, गांधी जी ने अहिंसक क्रांति के ज़रिए आने वाली सत्ता में  मज़बूती और स्थायित्व देखा। कालांतर में नेता जी ने स्वीकारा भी। 

समाजवादी निकले, अपना बड़ा हिस्सा वही, छोड़ कर। कांग्रस और समाजवादी  सिद्धांत या नीतियों में कोई फ़र्क़ नहीं है अगर कोई जिच रही तो गति को लेकर। 

बहरहाल हम या हमारे जैसे लोग जिन्होंने अपनी पूरी जवानी जेल और सड़क पर गुज़ारी है, कांग्रेस के कार्यकाल में, आज वे कांग्रेस को क्यों चाहते हैं ? केवल एक बड़ी  वजह है –  सवाल उठना बंद हो जाएगा। राजनीति तिजोरी के हवाले हो जाएगी। मुल्क बंदूक़ के साये में हाँफेगा।

कांग्रेस केवल सत्ता नहीं थी, पीढ़ियों को राजनीति के दायरे में खड़ा किया।

रमा भाई ! 77 के बाद एक माम नहीं उठा, जिसे  राजनीति ने उठाया हो। कांग्रेस के साथ तो हम अपने स्वार्थ के लिए हैं और हमारा स्वार्थ है – कल कांग्रेस सत्ता में आ जाय, हम फिर सड़क पर तखती लिए खड़े मिलेंगे – “जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।“ एवज़ में लाठी चार्ज होगा, पानी के फव्वारे फेंके जाएंगे, आंसू गैस के गोले फेंके जाएंगे, जेल की तनहाई मिलेगी। सरकार बताएगी नहीं क़ि ये देशद्रोही हैं, ये टुकड़े-टुकड़े गैंग हैं, आंदोलनजीवी हैं, अर्बन नक्सल हैं। इसकी जगह सरकार पूछेगी – कौन हैं ये लोग ? इनकी माँग क्या है ? इन्हें रिहा किया जाय, बात चीत का न्योता दो।

बुलडोज़र नहीं रमा भाई !

हम ख़ौफ़ में हैं, हमारी एक पीढ़ी बधिया हो चुकी है। “न“ बोलना बंद हो गया है। बाक़ी कल 

Chanchal BHu

वरिष्ठ पत्रकार, समाजवादी चिंतक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष चंचल जी की फेसबुक टिप्पणी साभार

भाजपा के लिए नई मुसीबत नीतीश-तेजस्वी! | hastakshep | हस्तक्षेप | उनकी ख़बरें जो ख़बर नहीं बनते

भारत छोड़ो आंदोलन : अगस्त क्रांति और भारत का शासक-वर्ग

dr. prem singh

भारत छोड़ो आंदोलन की 80वीं सालगिरह के अवसर पर (On the occasion of 80th anniversary of Quit India Movement)

(यह विशेष लेख 2012 में भारत छोड़ो आंदोलन अथवा अगस्त क्रांति की 70वीं सालगिरह (70th anniversary of the august revolution) के अवसर पर लिखा गया था, और ‘युवा संवाद’ एवं ‘हस्तक्षेप डॉट कॉम’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें भारत छोड़ो आंदोलन की वास्तविक प्रेरणा, तथ्यों और उसमें हिस्सेदारी करने वाली भारतीय जनता और नेताओं का समुचित उल्लेख करने की कोशिश की गई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम (‘Mann Ki Baat’ program on 75th anniversary of August Revolution) में और भाजपा सरकार ने अपने ‘संकल्प से सिद्धि’ अभियान में भारत छोड़ो आंदोलन का खोखला हवाला दिया था। राम पुनियानी ने इस विषय पर जवाबी लेख – ‘हाउ टू रिवाइव द स्पिरिट ऑफ़ क्विट इंडिया मूवमेंट’ (पीपल्स वोइस, 21 अगस्त 2017) लिखा था, जिसका हिंदी अनुवाद भी छपा था। हालांकि पुनियानी जी ने भी अपने लेख में भारत छोड़ो आंदोलन की वास्तविक प्रेरणा, चरित्र और तथ्यों का समुचित उल्लेख नहीं किया।

आरएसएस आधुनिक भारत के राष्ट्रीय इतिहास की धारा के बाहर पड़ी रह जाने वाली मानसिकता से परिचालित होता है। लिहाज़ा, उसका राष्ट्रीय महत्व की विभूतियों, विचारों, घटनाओं के साथ सार्थक रिश्ता नहीं जुड़ पाता। यह उसकी मौलिक अक्षमता बनी हुई है, जिससे उबरने की इच्छा-शक्ति राजनीतिक सत्ता पाने के बाद भी दिखाई नहीं देती। इसीलिए आरएसएस राष्ट्रीय इतिहास, भारतीय संविधान और महत्वपूर्ण हस्तियों के साथ बेहूदा किस्म का बर्ताव और तोड़-मरोड़ करता है। लेकिन आरएसएस का विरोधी पक्ष जब राष्ट्रीय इतिहास के तथ्यों को नज़रंदाज़ करता है, तो उससे आरएसएस की मदद होती है।

अगस्त क्रांति की 80वीं सालगिरह के मौके पर लेख मामूली संपादन के साथ फिर से जारी किया गया है। आशा है युवा साथी समय निकाल कर लेख पढ़ेंगे और शासक-वर्ग द्वारा लादी जा रही नव-साम्राज्यवादी गुलामी के प्रश्न पर विचार करेंगे। पहली बार लेख का अंग्रेजी अनुवाद भी जारी किया गया है।)

आजादी की इच्छा का विस्फोट

‘‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूं। आप इसे हृदयपटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्वास के साथ उसका जाप कीजिए। वह मंत्र है – ‘करो या मरो’। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आंखों से अपने देश का सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा कांग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निश्चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बंधन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिंदा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।’’ (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए गए गांधीजी के भाषण का अंश)

डॉ. राममनोहर लोहिया ने 2 मार्च 1946 को भारत के वायसराय लार्ड लिनलिथगो को एक लंबा पत्र लिखा था। वह पत्र महत्वपूर्ण है, और गांधीजी ने उसकी सराहना की थी। पत्र ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर और षड़यंत्रकारी चरित्र को सामने लाता है। लोहिया ने वह पत्र जेल से लिखा था। भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत भूमिका निभाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार किया गया। पहले लाहौर किले में, और फिर आगरा में उन्हें कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानुषिक यंत्रणाएं दीं। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। इस बीच उनके पिता का निधन हुआ, लेकिन लोहिया ने छुट्टी पर जेल से बाहर आना गवारा नहीं किया। उनकी अनुपस्थिति में ही पिता की अंत्येष्टि हुई।

वायसराय महोदय ने कांग्रेस नेताओं पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सशस्त्र बगावत की योजना बनाने, और आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने वाली जनता पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। उस समय के तीव्र वैश्विक घटनाक्रम और बहस के बीच वायसराय यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि ब्रिटिश शासन अत्यंत न्यायप्रिय व्यवस्था है, और उसका विरोध करने वाली कांग्रेस व भारतीय जनता हिंसक और निरंकुश। आजादी मिलने में केवल साल-दो साल बचा था, लेकिन ब्रिटिश वायसराय ऐसा जता रहे थे, मानो भारत पर हमेशा के लिए शासन करने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार बना हुआ है!

पत्र में लोहिया ने वायसराय के आरोपों का खंडन करते हुए निहत्थी जनता पर ब्रिटिश हुकूमत के भीषण अत्याचारों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि आंदोलन का दमन करते वक्त देश में कई जलियांवाला बाग घटित हुए, लेकिन भारत की जनता ने दैवीय साहस का परिचय देते हुए अपनी आजादी का अहिंसक संघर्ष किया।

लोहिया ने वायसराय के उस बयान को भी गलत बताया जिसमें उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में एक हजार से भी कम लोगों के मारे जाने की बात कही।

लोहिया ने वायसराय को कहा कि उन्होंने असलियत में पचास हजार देशभक्तों को मारा है। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें देश में स्वतंत्र घूमने की छूट मिले, तो वे इसका प्रमाण सरकार को दे सकते हैं।

लोहिया ने पत्र में लिखा, ‘‘श्रीमान लिनलिथगो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यदि हमने सशस्त्र बगावत की योजना बनाई होती, लोगों से हिंसा अपनाने के लिए कहा होता, तो आज गांधीजी स्वतंत्र जनता और उसकी सरकार से आपके प्राणदंड को रुकवाने के लिए कोशिश कर रहे होते।’’

लोहिया ने वायसराय को उनका बर्बर चेहरा दिखाते हुए लिखा, ‘‘आपके आदमियों ने भारतीय माताओं को नंगा कर, पेड़ों से बांध, उनके अंगों से छेड़छाड़ कर जान से मारा। आपके आदमियों ने उन्हें जबरदस्ती सड़कों पर लिटा-लिटा कर उनके साथ बलात्कार किए और जानें लीं। आप फासिस्ट प्रतिशोध की बात करते हैं, जबकि आपके आदमियों ने पकड़ में न आ पाने वाले देशभक्तों की औरतों के साथ बलात्कार किए और उन्हें जान से मारा। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब आप और आपके आदमियों को इसका जवाब देना होगा।’’

कुर्बानियों की कीमत रहती है, इस आशा से भरे हुए लोहिया ने अलबत्ता व्यथित करने वाले उन क्षणों में वायसराय को आगे लिखा, ‘‘लेकिन मैं नाखुश नहीं हूं। दूसरों के लिए दुख भोगना और मनुष्य को गलत रास्ते से हटा कर सही रास्ते पर लाना तो भारत की नियति रही है। निहत्थे आम आदमी के इतिहास की शुरुआत 9 अगस्त की भारतीय क्रांति से होती है।’’

हालांकि स्वंय कांग्रेस के कई बड़े नेता ‘फासिस्ट’ शक्तियों के खिलाफ युद्ध में फंसे ‘लोकतंत्रवादी’ इंग्लैंड को परेशानी में डालने पर अंत तक दुविधाग्रस्त बने रहे। उनका जिक्र लोहिया ने अपने पत्र में किया है। लेकिन खुद लोहिया को अंग्रजों को बाहर खदेड़ने के फैसले पर कोई दुविधा नहीं थी। उन ‘आधुनिकतावादियों’ जैसी दुविधा उनमें भी होती, तो वे साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ जनता के संघर्ष में पूरी निष्ठा और शक्ति से नहीं रम पाते।

उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम भविष्य के प्रति जिज्ञासु हैं। चाहे जीत आपकी हो या धुरी शक्ति की, उदासी और अंधकार चारों ओर बना रहेगा। आशा की मात्र एक ही टिमटिमाहट है। स्वतंत्र भारत इस लड़ाई को प्रजातांत्रिक समापन की ओर ले जा सकता है।’’ (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 176-181)

दरअसल, लोहिया दुनिया में स्थायी शांति कायम करने की दिशा में चार-सूत्री योजना का सुझाव रखते हुए 1939 में ही युद्ध के विरोध में गांधी जी से सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने का आग्रह कर चुके थे। ये चार सूत्र थे : सभी पराधीन देशों की स्वाधीनता और उनमें वयस्क मताधिकार द्वारा स्वराज पंचायतों द्वारा संविधान निर्माण, किसी भी देश को कोई विशेषाधिकार न रहे और हर व्यक्ति को बिना पूर्व अनुमति के मनचाहे देश में निवास करने की स्वतंत्रता, किसी भी देश द्वारा अन्य देश में संपत्ति अर्जित करने अथवा पूंजी लगाने की मनाही और संपूर्ण निरस्त्रीकरण। गांधीजी ने लोहिया की योजना को तुरंत स्वीकृति दी, लेकिन तत्काल सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने का आग्रह स्वीकार नहीं किया।

लोहिया की जीवनीकार इंदुमति केलकर ने लिखा है, ‘‘मार्च 1939 में, युद्ध के विरोध में लिखे अपने एक लेख में लोहिया ने अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘गुलाम भारत की दृष्टि में जितनी पापी ब्रिटिश साम्राज्यशाही है, उतनी पापी जर्मनी की हिटलरशाही और जापान की साम्राज्यशाही है। बिना साम्राज्यशाही को समाप्त किए संसार सुरक्षित नहीं हो पाएगा। ब्रिटिश साम्राज्यशाही ने ही फासिज्म को पाल-पोस कर बड़ा किया है। इसलिए भारत को चाहिए कि वह फासिज्म और साम्राज्यशाही, दोनों के विरोध में लड़े, तभी संसार के पराधीन देशों का वह सहायक बनेगा।’ इसी समय लोहिया ने युद्ध कर, युद्ध कर्ज और सैनिक भरती जैसे उपक्रमों का विरोध करने का उपाय भी सुझाया था।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 32)

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन का करीब तीन-चार साल का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ पेचीदा भी है। यह आंदोलन देश-व्यापी था, जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूतपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। लोहिया ने रूसी क्रांतिकारी चिंतक लियों ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया, जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 20 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की। (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. राममनोहर लोहिया’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 129)

हालांकि जनता का विद्रोह पहले तीन-चार महीनों तक ही तेजी से हुआ। नेतृत्व व दूरगामी योजना के अभाव तथा अंग्रेज सरकार के दमन ने विद्रोह को दबा दिया। 8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ; अरुणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराया; और 9 अगस्त की रात को कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नेताओं की गिरफ्तारी के चलते आंदोलन की सुनिश्चित कार्य-योजना नहीं बन पाई थी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व सक्रिय था, लेकिन उसे भूमिगत रह कर काम करना पड़ रहा था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन और हौसला अफजायी करने तथा आंदोलन का चरित्र और तरीका स्पष्ट करने वाले दो लंबे पत्र अज्ञात स्थानों से लिखे। भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व का एक पक्ष यह भी है कि आंदोलन के दौरान जनता खुद अपनी नेता थी।  

भारत छोड़ो आंदोलन की कई विशेषताएं हैं। कई चरणों और नेतृत्व से गुजरे भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में चले जनता के अहिंसक आंदोलन का मिलन भारत छोड़ो आंदोलन में होता है। दोनों की समानता और फर्क के बिंदुओं को लेकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ भी भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्र जोड़े जा सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन हिंसक था या अहिंसक, इस सवाल को लेकर काफी बहस हुई है। गांधी, जिन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया, और जिन्हें उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया, ने जनता से अहिंसक आंदोलन का आह्वान किया था। जब दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की हिंसा में फंसी थी, गांधीजी का यह एक अनूठा अहिंसक आह्वान था।

जेपी ने गुप्त स्थानों से ‘आजादी के सैनिकों के नाम’ दो पत्र क्रमश: दिसंबर 1942 और सितंबर 1943 में लिखे। अपने दोनों पत्रों में, विशेषकर पहले में, उन्होंने हिंसा-अहिंसा के सवाल को विस्तार से उठाया। हिंसा-अहिंसा के मसले पर गांधी और कांग्रेस का मत अलग-अलग है, यह उन्होंने अपने पत्र में कहा। उन्होंने अंग्रेज सरकार को लताड़ लगाई कि उसे यह बताने का हक नहीं है कि भारत की जनता अपनी आजादी की लड़ाई का क्या तरीका अपनाती है। उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के मूल में हत्या नहीं करने और चोट नहीं पहुंचाने का संकल्प है।

उन्होंने लिखा, ‘‘अगर हिंदुस्तान में हत्याएं हुईं – और बेशक हुईं – तो उनमें से 99 फीसदी ब्रिटिश फासिस्ट गुंडों द्वारा और केवल एक फीसदी क्रोधित और क्षुब्ध जनता के द्वारा। हर अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजी राज के लिए जिच पैदा करना, उसे पंगु बना कर उखाड़ फेंकना ही उस प्रोग्राम का मूल मंत्र है और ‘अहिंसा के दायरे में सब कुछ कर सकते हो’ यही है हमारा ध्रुवतारा। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि जिस प्रोग्राम पर 1942 के अगस्त से अब तक कांग्रेस संस्थाओं ने अमल किया है उसका बौद्धिक आधार अहिंसा है – उस अर्थ में अहिंसा, जैसा उसके अधिकारी पुरुषों ने इस अर्से में बताया है।’’ (‘नया संघर्ष’, अगस्त क्रांति विशेषांक, अगस्त-सितंबर 1991, पृ. 31)

भारत छोड़ो आंदोलन में अहिंसा-हिंसा के सवाल पर जनता से लेकर नेताओं तक जो विमर्श उस दौरान हुआ, उसका विश्लेषण होना बाकी है। हिंसा के पर्याय और उसकी पराकाष्ठा पर समाप्त होने वाले दूसरे विश्वयुद्ध के बीच एक अहिंसक आंदोलन का संभव होना निश्चित ही गंभीर विश्लेषण की मांग करता है। यह विश्लेषण इसलिए जरूरी है कि भारत का अधिकांश बौद्धिक वर्ग 1857 और 1942 की हिंसा का केवल भारतीय पक्ष देखता है, और उसकी निंदा करने में कभी नहीं चूकता। केवल और हर तरह की हिंसा के बल पर तीन-चौथाई दुनिया को गुलाम बनाने वाले उपनिवेशवादियों को ‘सभ्य’ और ‘प्रगतिशील’ मानता है।   

भारत छोड़ो आंदोलन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ। लिहाजा, उसका एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी था। आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पहलू का इतना दबदबा था कि विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के औचित्य और भारत की आजादी को विश्वयुद्ध में हुए अंग्रेजों के नुकसान का नतीजा बताने के तर्क भारत में आज तक चलते हैं। ऐसे अंतर्राष्ट्रीयतावादियों के लिए आजादी के लिए स्थानीय भारतीय जनता का संघर्ष ज्यादा मायने नहीं रखता। आज जो भारतीय जनता की खस्ता हालत है, उसमें आजादी के इस तरह के मूल्यांकनों का बड़ा हाथ है। हालांकि, इसकी जड़ें और गहरी जाती हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आजाद हिंद फौज बना कर अंग्रेजों को बाहर करने के लिए किया गया संघर्ष भी भारत छोड़ो आंदोलन के पेटे में आता है। अंग्रेजों और स्थानीय विभाजक शक्तियों द्वारा देश के विभाजन की बिसात बिछाई जाने का काम भी इसी दौरान पूरा हुआ। जेपी ने इन सब पहलुओं पर अपने पत्रों में रोशनी डाली है। उन पत्रों को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए।  

भारत छोड़ो आंदोलन देश की आजादी के लिए चले समग्र आंदोलन, जैसा भी भला-बुरा वह रहा हो, का निर्णायक निचोड़ था; भारत की आजादी का प्रवेशद्वार था। विभिन्न स्रोतों से आजादी की जो इच्छा, और उसे हासिल करने की जो ताकत भारत में बनी थी, उसका अंतिम प्रदर्शन भारत छोड़ो आंदोलन में हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन ने यह निर्णय किया कि आजादी की इच्छा में भले ही नेताओं का भी साझा रहा हो, उसे हासिल करने की ताकत निर्णायक रूप से जनता की थी। हालांकि अंग्रेजी शासन को नियामत मानने वाले और अपना स्वार्थ साधने वाले तत्व भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी पूरी तरह सक्रिय थे। वे कौन थे, इसकी जानकारी जेपी के पत्रों से मिलती है।

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

यह ध्यान देने की बात है कि गांधीजी ने आंदोलन को समावेशी बनाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए अपने भाषण में समाज के सभी तबकों को संबोधित किया था – जनता, पत्रकार, नरेश, सरकारी अमला, सैनिक, विद्यार्थी। उन्होंने अंग्रेजों, यूरोपीय देशों, एशियाई देशों, मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व और यूएन को भी अपने उस भाषण में संबोधित किया था। किसी देश की जनता और विश्व को संबोधित वह दुनिया का संभवत: सर्वश्रेष्ठ भाषण कहा जा सकता है। सभी तबकों और समूहों से देश की आजादी के लिए ‘करो या मरो’ के व्यापक आह्वान का आधार उनका पिछले 25 सालों के संघर्ष का अनुभव था। भारत छोड़ो आंदोलन का गांधी का निर्णय भारत और विश्व के स्तर पर एक सम्पूर्ण दृष्टि पर आधारित था। जबकि जिन नेताओं/संगठनों ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया, वे सभी खंडित दृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाले थे।

किसी समाज एवं सभ्यता की बड़ी घटना का प्रभाव साहित्य रचना पर पड़ता है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारत की एक बड़ी घटना थी। अंग्रेजों का डर कह लीजिए या भक्ति, 1857 का संघर्ष लंबे समय तक साहित्यकारों की कल्पना से बाहर बना रहा। जबकि भारत छोड़ो आंदोलन ने रचनात्मक कल्पना (क्रियेटिव इमेजिनेशन) को तत्काल और बड़े पैमाने पर आकर्षित किया। विभाजन साहित्य (पार्टीशन लिटरेचर) के बाद भारतीय साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन का चित्रण रहा है। इसका कारण लगता है कि गांधी के राजनैतिक कर्म और विचारों ने पूंजीवाद के आकर्षण को भारतीय भद्रलोक के मानस से कुछ हद तक काटा था; और जनता के संघर्ष की बदौलत आजादी लगभग आ चुकी थी।

मार्क्सवादी लेखकों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन को विषय बना कर उपन्यास लिखे। हिंदी में यशपाल, जो अपने साहित्य को मार्क्सवादी विचारधारा के प्रचार का माध्यम मानते थे, ने आंदोलन के दौरान ही दो उपन्यास – ‘देशद्रोही’ (1943) और ‘गीता पार्टी कामरेड’ (1946) – लिखे। यह ध्यान देने की बात है कि भारत छोड़ो आंदोलन अपने ढंग के विशिष्ट राजनीतिक उपन्यासकार यशपाल का देर तक पीछा करता है। यशपाल सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम महाकाय उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (1979) में एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से चित्रण किया।

सोवियत रूस के दूसरे विश्वयुद्ध में शामिल होने पर भारत के मार्क्सवादी नेतृत्व ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध और अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया। वह कांग्रेस समाजवादियों और मार्क्सवादियों के बीच कटु टकराहट का कारण तो बना ही, उस निर्णय के चलते मार्क्सवादी कार्यकर्ता देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषा व कसौटी को लेकर भ्रमित हुए।

यशपाल ने अपने तीनों उपन्यासों में मार्क्सवादी कथानायकों को ‘देशभक्त’ सिद्ध किया है। सतीनाथ भादुड़ी का ‘जागरी’ (1945), बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का ‘मृत्युंजय’ (1970), समरेश बसु का ‘जुग जुग जियो’ (चार खंड, 1977) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यासों के अलावा भारतीय भाषाओं में, भारतीय अंग्रेजी उपन्यास सहित, कई उपन्यास भारत छोड़ो आंदोलन की घटना पर लिखे गए, या उनमें उस घटना का जिक्र आया है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ (1954) का समय करीब आजादी के एक साल पहले और एक साल बाद का है। उनके इस कालजयी उपन्यास पर भारत छोड़ो आंदोलन की गहरी छाया व्याप्त है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत अवस्था के अंतिम महीनों में लोहिया ने अपना लंबा लेख ‘इकोनॉमिक्स आफ्टर मार्क्स‘ – मार्क्सोत्तर अर्थशास्त्र – लिखा।

इंदुमति केलकर लिखती हैं, ‘‘भूमिगत जीवन की अस्थिरता, लगातार पीछे पड़ी पुलिस, आंदोलन के भविष्य की चिंता, संदर्भ साहित्य की कमी के बावजूद लोहिया का लिखा प्रस्तुत प्रबंध विश्व भर के आर्थिक विचार और समाजवादी आंदोलन को दी गई बहुत बड़ी देन समझी जाती रही है। अपने प्रबंध में लोहिया ने मार्क्स के अर्थशास्त्र और उसके निष्कर्षों की बहुत ही मौलिक और बिल्कुल नए सिरे से व्याख्या प्रस्तुत की है।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 45)

इंदुमति केलकर ने इस लेख के उद्देश्य के बारे में लोहिया को उद्धृत किया है: ‘‘1942-43 की अवधि में ब्रिटिश सत्ता के विरोध में जो क्रांति आंदोलन चला उस समय समाजवादी जन या तो जेल में बंद थे या पुलिस पीछे पड़ी हुई थी। यह वह समय भी है जब कम्युनिस्टों ने अपने विदेशी मालिकों की हां में हां मिलाते हुए ‘लोक-युद्ध’ का ऐलान किया था। परस्पर विरोधी पड़ने वाली कई असंगतियों से ओतप्रोत मार्क्सवाद के प्रत्यक्ष अनुभवों और दर्शनों से मैं चकरा गया और इसी समय मैंने तय किया कि मार्क्सवाद के सत्यांश की तलाश करूंगा, असत्य को मार्क्सवाद से अलग करूंगा। अर्थशास्त्र, राज्यशास्त्र, इतिहास और दर्शनशास्त्र, मार्क्सवाद के चार प्रमुख आयाम रहे हैं। इनका विश्लेषण करना भी मैंने आवश्यक समझा। परंतु अर्थशास्त्र का विश्लेषण जारी ही था कि मुझे पुलिस पकड़ कर ले गई।’’ (‘राममनोहर लोहिया’ (संक्षिप्त संस्करण), इंदुमति केलकर, पृ. 45)

जाहिर है, मार्क्सवाद को अटल सार्वभौमिक जीवन-दर्शन मानने वाले भारत के पार्टी कम्युनिस्टों को लोहिया की ये टिप्पणी और ‘इकोनॉमिक्स आफ्टर मार्क्स’ निबंध उस समय नागवार गुजरे होंगे। इसकी एक झलक दूधनाथ सिंह के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ (2006) में देखने को मिलती है। उपन्यास में बाबरी मस्जिद ध्वंस की परिस्थितियों का सजीव चित्रण हुआ है। लेकिन उपन्यास का समय चालीस के दशक, यानी भारत छोड़ो आंदोलन तक पीछे लौटता है। कथानायक कम्युनिस्ट पार्टी का सिद्धांतकार एक प्रोफेसर है। उसके हवाले से लेख पर कम्युनिस्ट प्रतिक्रिया का यह ब्योरा आया है कि लोहिया ने ऐसा लेख लिखने की हिमाकत कैसे की! बहरहाल, घटना से लेकर अभी तक उपन्यासों में भारत छोड़ो आंदोलन के चित्रण या प्रभाव की परिघटना दर्शाती है कि भारत छोड़ो आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ हमारी जातीय स्मृति का हिस्सा भी है।

भारत छोड़ो आंदोलन का जो भी घटनाक्रम, प्रभाव और विवाद रहे हों, मूल बात थी भारत की जनता की लंबे समय से पल रही आजादी की इच्छा – will to freedom – का विस्फोट।

भारत छोड़ो आंदोलन के दबाव में भारत के आधुनिकतावादी मध्य-वर्ग से लेकर सामंती नरेशों तक को यह लग गया था कि अंग्रेजों को अब भारत छोड़ना होगा। अतः अपने वर्ग-स्वार्थ को बचाने और मजबूत करने की फिक्र उन्हें लगी। नौकरशाही/प्रशासन का लौह-शिकंजा और उसे चलाने वाली भाषा तो अंग्रेजों की बनी ही रही; विकास का मॉडल भी वही रखा गया।

भारत का ‘लोकतांत्रिक, समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष’ संविधान भी पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ की छाया से पूरी तरह नहीं बच पाया। अंग्रेजों के वैभव और रौब-दाब की विरासत, जिससे भारत की जनता के दिलों में भय बैठाया जाता था, भारत के शासक-वर्ग ने अपनाए रखी। वह उसे उत्तरोत्तर मजबूत भी करता चला गया।

गरीबी, मंहगाई, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, कुपोषण, विस्थापन और आत्महत्याओं का मलबा बने हिंदुस्तान में शासक-वर्ग का वैभव अश्लील ही कहा जा सकता है।

भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सावरकर को भारत रत्न ! | #hastakshep

भारत छोड़ो आंदोलन का एक सबक यह भी है कि सेवाग्राम और साबरमती आश्रम के छोटे और कच्चे कक्षों में बैठ कर गांधी को दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई। अपना चिंतन/लेखन/आंदोलन करने में भी नहीं। गांधी का आदर्श यदि सही नहीं था, तो शासक-वर्ग सादगी का कोई और आदर्श सामने रख सकता था। बशर्ते वैसी इच्छा होती। पिछले दो दशकों से जो अश्लील पूंजीवाद देश में चल रहा है, उसके तहत एक के बाद एक विलासिता के टापू खड़े करने का शासक-वर्ग पर जैसे खब्त सवार हो चुका है।   

वायसराय के आदमी 

लोहिया ने आजाद भारत के शासक-वर्ग और शासन-तंत्र की सतत और विस्तृत आलोचना की है। वे उसे कमोबेश अंग्रेजी राज का विस्तार बताते थे। लोहिया को लगता रहा होगा कि उनकी आलोचना से शासक-वर्ग का चरित्र बदलेगा; तद्नुरूप शासन-तंत्र में परिवर्तन आएगा; और भारत की अवरुद्ध क्रांति आगे बढ़ेगी। हालांकि, संसद और उसके बाहर जनता के पक्ष में उनका संघर्ष शासक-वर्ग की ‘प्रतिष्ठा’ को नहीं हिला पाया। आज जब हम अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं, तो सोचें – किस लिए? क्या हम जनता का पक्ष मजबूत करना चाहते हैं? या स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा प्रतीकों, प्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर, उनके सार-तत्व को नष्ट कर देना चाहते हैं?

नवउदारवाद के विरोध की किसी भी प्रेरणा को नष्ट/विकृत करने की प्रवृत्ति भारत में जोर-शोर से चल रही है। 1857 के डेढ़ सौवें साल पर कांग्रेस ने दिल्ली से मेरठ और मेरठ से दिल्ली के बीच क्रांति यात्रा का आयोजन किया था। धूमधाम से किए गए उस बडे सरकारी आयोजन में कई नवउदारवाद विरोधी बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने शिरकत की। देश की संवैधानिक संप्रभुता समेत उसके समस्त संसाधनों और श्रमशक्ति को नवसाम्राज्यवादी ताकतों का ग्रास बना देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मेरठ से लौटे क्रांति यात्रियों का लाल किले पर स्वागत किया था। यह कटूक्ति है, लेकिन इससे कम कुछ नहीं कहा जा सकता कि 1857 के शहीदों का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता था!

डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर दो वर्षों तक सरकार ने पैसा भी खूब बांटा। पैसा देखते ही बुद्धिजीवियों में भी जोश आ जाता है। जिन्होंने 1857 पर कभी एक पंक्ति न पढ़ी थी, न लिखी थी, ऐसे बहुत-से विद्वान सभा-सेमिनारों में सक्रिय हो गए।

मार्क्सवादियों ने इस बार कुछ ज्यादा जोर-शोर से 1857 का जश्न मनाया। लेकिन साथ ही उनके नेतृत्व ने यह भी कह दिया कि पूंजीवाद के अलावा विकास का कोई रास्ता नहीं है। यानी मान्यता वही पुरानी रही – अपनी आजादी के लिए लड़ने वाले पिछड़ी/सामंती शक्तियां थे, और उन्हें गुलाम बनाने वाले अंग्रेज आगे बढ़ी हुई। ऐसे में पिछड़ी और सामंती शक्तियों का हारना तय था।

आज तक भारत का मार्क्सवादी और आधुनिकतावादी दिमाग, 1857 का उत्सव चाहे जितना मना ले, आजादी की इच्छा में अपने प्राणों पर खेल जाने वालों की हिमाकत को माफ नहीं करता है। उनके हिसाब से यह देश अंधकूप था और अंग्रेज न आते तो अंधकूप ही रह जाता। यह अकेले नब्बे के दशक का फैसला नहीं है कि भारत की राजनीति के सारे रास्ते कॉरपोरेट पूंजीवाद की ओर जाते हैं!

लोहिया ने भारत छोड़ो आंदोलन की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर लिखा, ‘‘नौ अगस्त का दिन जनता की महान घटना है और हमेशा बनी रहेगी। पंद्रह अगस्त राज्य की महान घटना थी। लेकिन अभी तक हम 15 अगस्त को धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि उस दिन ब्रिटिश वायसराय माउंटबैटन ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ हाथ मिलाया था और क्षतिग्रस्त आजादी क्षतिग्रस्त देश को दी थी। नौ अगस्त जनता की इस इच्छा की अभिव्यक्ति थी – हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे। हमारे लंबे इतिहास में पहली बार करोड़ों लोगों ने आजादी की अपनी इच्छा जाहिर की। कुछ जगहों पर इसे जोरदार ढंग से प्रकट किया गया।’’

पच्चीस साल की दूरी से देखने पर लोहिया ने उस आंदोलन की कमजोरी – सतत दृढ़ता की कमी – पर अंगुली रखी। वे लिखते हैं, ‘‘लेकिन यह इच्छा थोड़े समय तक ही रही, लेकिन मजबूत रही। उसमें दीर्घकालिक तीव्रता नहीं थी। जिस दिन हमारा देश दृढ़ इच्छा प्राप्त कर लेगा उस दिन हम विश्व का सामना कर सकेंगे। बहरहाल, यह 9 अगस्त 1942 की पच्चीसवीं वर्षगांठ है। इसे अच्छे तरीके से मनाया जाना चाहिए। इसकी पचासवीं वर्षगांठ इस प्रकार मनाई जाएगी कि 15 अगस्त भूल जाए, बल्कि 26 जनवरी भी पृष्ठभूमि में चला जाए या उसकी समानता में आए। 26 जनवरी और 9 अगस्त एक ही श्रेणी की घटनाएं हैं। एक ने आजादी की इच्छा की अभिव्यक्ति की और दूसरी ने आजादी के लिए लड़ने का संकल्प दिखाया।’’ (देखें, ‘राममनोहर लोहिया रचनावली’ खंड 9, संपा. मस्तराम कपूर, पृ. 413)

अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ देखने के लिए लोहिया जिंदा नहीं रहे। लोग मरने के बाद उनकी बात सुनेंगे, उनकी यह धारणा अभी तक मुगालता ही साबित हुई है। अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ 1992 में पड़ी। कहां लोहिया की इच्छा और कहां 1992 का साल! यह वह साल है जब नई आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोल दिए गए और एक पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को ‘राममंदिर आंदोलन’ चला कर ध्वस्त कर दिया गया। तब से लेकर नवउदारवाद और संप्रदायवाद की गिरोहबंदी के बूते भारत का शासक-वर्ग उस जनता का जानी दुश्मन बन गया है, जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में साम्राज्यवादी शासकों के दमन का सामना करते हुए आजादी का रास्ता प्रशस्त किया था। जो हालात हैं, उन्हें देख कर कह सकते हैं कि नब्बे के दशक के बाद उपनिवेशवादी दौर के मुकाबले ज्यादा भयानक तरीके से जनता के दमन को अंजाम दिया जा रहा है।

अगस्त क्रांति दिवस के मौके पर हम यह विचार कर सकते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत छोड़ो’ के नारे क्यों कारगर नहीं होते, और क्यों कॉरपोरेट पूंजीवाद का कब्जा उत्तरोत्तर मजबूत होता जाता है? क्यों सारे देश को स्मार्ट नगर और सारी आबादी को उपभोक्ता (कंज्यूमर) बनाने का दुःस्वप्न धड़ल्ले से बेचा जा रहा है? कारण स्पष्ट है, भारत का शासक-वर्ग पूरी तरह से कॉरपोरेट पूंजीवाद का पक्षधर बन चुका है।

देश के नेता, उद्योगपति, बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, फिल्मी सितारे, पत्रकार, खिलाड़ी, जनांदोलनकारी, नौकरशाह, तरह-तरह के सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट कॉरपोरेट पूंजीवाद के समर्थन और मजबूती की मुहिम में जुटे हैं। इनमें जो शामिल नहीं हैं, उनके बारे में माना जाता है उनकी प्रतिभा में जरूर कोई खोट या कमी है। नवउदारवाद और उसके पक्षधरों की स्थिति इतनी मजबूत है कि अब उनकी आलोचना भी उनके गुणों का बखान हो जाती है, और उनका पक्ष और मजबूत करती है।

जैसा कि हमने पहले भी कई बार बताया है, नवउदारवादियों के साथ प्रच्छन्न (छिपे हुए) नवउदारवादियों की एक बड़ी और मजबूत टीम तैयार हो चुकी है। वह शासक-वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध है, और नवउदारवाद विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को नष्ट करने में तत्पर रहती है। दरअसल, सीधे नवउदारवादियों के मुकाबले प्रच्छन्न नवउदारवादी जनता और समाजवाद के बड़े दुश्मन बने हुए हैं। नवउदारवाद के मुकाबले में उभरे सच्चे जनांदोलनों और समाजवादी राजनीति के प्रयासों को प्रच्छन्न नवउदारवादियों ने बार-बार भ्रष्ट किया हैा। इन्होंने एक बड़ा हल्ला, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का, वर्ल्ड सोशल फोरम (डब्ल्यूएसएफ) के तत्वावधान में बोला था, और उससे बड़ा हमला, राष्ट्रीय स्तर पर, इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के तत्वावधान में बोला हुआ है।

प्रछन्न नवउदारवादियों के लिए सब कुछ अच्छा हो सकता है; बुरी है तो केवल राजनीति। हालांकि उनकी अपनी राजनीतिक ऐषणाएं शायद ही कभी एक पल के लिए सोती हों!

डब्ल्यूएसएफ के समय कम से कम सांप्रदायिकता से बचाव था। गैर-राजनीतिक रूप में ही सही, ‘दूसरी दुनिया संभव है’ का नारा था। आईएसी के आंदोलन में संप्रदायवादी और धर्मनिरपेक्षतावादी आपस में मिल गए हैं और वे एक ‘जन लोकपाल’ के बदले नवउदारवादी व्यवस्था और नेतृत्व को अभयदान देते हैं।

आईएसी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का शुरुआती नारा था – ‘मनमोहन सिंह वोट चाहिए तो जन लोकपाल कानून लाओ’। अब बाबा रामदेव कहते घूम रहे हैं, ‘राहुल गांधी काला धन वापस लाओ, प्रधानमंत्री बन जाओ’। सुना है नवउदारवाद के उत्पाद इन बाबा ने विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का आंदोलन फिर से छेड़ने के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना है!

मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह नवउदारवादियों और प्रच्छन्न नवउदारवादियों के साथ है, जिसमें नेता और मुद्दे कंपनियों के उत्पाद की तरह प्रचारित किए जाते हैं। नतीजा यह है कि भारतीय मानस संपूर्णता में शासक-अभिमुख यानी नवउदारवादी रुझान का बनता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों से प्रताड़ित जनता भी इस मुहिम की गिरफ्त में है। यह प्रक्रिया जब मुकम्मल हो जाएगी, कोई भी बदलाव संभव नहीं होगा। केवल फालतू लोगों का सफाया होगा। हम प्रच्छन्न नवउदारवादियों के इस तर्क के कायल नहीं हैं कि वे सरकार पर दबाव डाल कर गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं बनवाते हैं। उनकी यह मदद गरीबों को नहीं, कॉरपोरेट घरानों को सुरक्षित करती है।

हम हाल का एक वाकया बताना चाहते हैं। 8 जुलाई 2012 को पूना में समाजवादी नेता और लेखक/पत्रकार पन्नालाल सुराणा के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। अवसर उनके अस्सीवें साल में प्रवेश करने का था। कार्यक्रम के आयोजन में राष्ट्र सेवा दल की प्रमुख भूमिका थी, जिसके वे अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र के हर जिले से आए करीब पांच सौ लोगों ने साने गुरुजी स्मारक पहुंच कर पन्न्नालाल जी को बधाई दी। व्यक्तिगत चंदा करके उगाहे गए ग्यारह लाख रुपयों का चेक भी उन्हें भेंट किया गया। सत्ता की राजनीति से बाहर किए गए राजनीतिक संघर्ष के लिए उत्तर भारत में ऐसा शालीन कार्यक्रम होना असंभव है। हमने अपनी आंखों से देखा कि एक व्यक्ति नंगे पैर आया और स्वागत कक्ष में चंदा देकर रसीद ली।

कार्यक्रम हालांकि पन्नालाल जी के अभिनंदन का था, लेकिन चर्चा ज्यादातर राजनीतिक हो गई। स्वागत समिति के अध्यक्ष भाई वैद्य ने पन्नालाल जी के व्यक्तित्व और लेखकीय कृतित्व के साथ समाजवादी आंदोलन में उनके राजनीतिक संघर्ष पर भी प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने वक्तव्य में अवसरोपयुक्त टिप्पणी करने के साथ कार्यक्रम की अध्यक्ष अरुणा राय को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक बार फिर उन्हें सक्रिय राजनीति में आने की अपील करके उलझन में डालना चाहते हैं। वे शायद पहले भी कतिपय अवसरों पर उनसे वैसी अपील कर चुके होंगे। उन्होंने दूसरे मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को भी नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों की चर्चा करके उलझन में डाला।

शिंदे साहब, जो कार्यक्रम में शुरू से अंत तक मौजूद रहे, का भाषण काफी लंबा था। वे नवउदारवादी नीतियों की जरूरत और उनसे होने वाले फायदों पर बोले। पन्नालाल जी को हालांकि आयोजकों और वहां आने वाले शुभेच्छुकों का धन्यवाद ही करना था, लेकिन समाजवादी प्रतिबद्धता और राजनीतिक संघर्ष के तहत उन्होंने अपने भाषण में शिंदे साहब की धारणाओं का जोरदार ढंग से खंडन किया।

हमें अच्छा लगा कि एक नागरिक अभिनंदन के कार्यक्रम में अच्छी-खासी राजनीतिक बहस सुनने को मिली। लेकिन आश्चर्य भी हुआ कि राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य अरुणा राय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सक्रिय राजनीति की बात करने वालों पर बिना झिझक तानाकशी की। उनका निशाना स्पष्टत: कॉरपोरेट पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद की राजनीति करने वालों पर था। गोया सक्रिय राजनीति करने का अधिकार उस पार्टी और सरकार के लिए सुरक्षित है, जिसकी वे सलाहकार हैं! उन्होंने कहा कि वे राजनीति को ज्यादा अच्छी तरह समझती हैं, और जो कर रही हैं, वही सच्ची राजनीति है। उनके मुताबिक, यह उसी राजनीतिक चेतना का असर है कि लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने वैसी ही सच्ची राजनीतिक चेतना फैलाने में नर्मदा बचाओ आंदोलन का हवाला भी दिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि मनरेगा को वे अपने विचारों की राजनीतिक चेतना की देशव्यापी पाठशाला मानती ही होंगी।

काफी ऊंचे ओटले से ऊंची आवाज में बोलते हुए उन्होंने घोषणा की कि असली आजादी तो अब आई है, जब उन जैसे सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों ने लोगों को जागरूक करना शुरू किया है।

अरुणा राय अपने वक्तव्य को लेकर इस कदर आत्मव्यामोहित थीं कि अपनी मान्यता और भूमिका पर रंच मात्र भी आलोचनात्मक निगाह डालने को तैयार नहीं दिखीं।

दरअसल, एनजीओ वालों का राजनीतिक संघर्ष से कोई वास्ता नहीं रहा होता। वे उसके बारे में वाकफियत भी नहीं रखना चाहते। वे गरीबों को साल में सौ दिन सौ रुपया का काम देने को बहुत बड़ी क्रांति मान कर अपनी पीठ ठोंकते हैं, और इस सच्चाई से आंखें फेरे रहते हैं कि देश में कॉरपोरेट क्रांति हो चुकी है। अगस्त क्रांति के दिन यह समझना जरूरी है इन लोगों का स्वार्थ शासक-वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध है। वरना सीधी बात है, यदि आप किसी सरकार या पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, तो उसके सलाहकार नहीं बन सकते; सामाजिक काम करने के लिए उस सरकार के प्रोजेक्ट नहीं ले सकते।

सोनिया गांधी की सलाहकार समिति, जिसका सदस्य बनने के लिए मारामारी होती है, द्वारा जो भी काम संपादित होता है, सरकार के लिए होता है; और कांग्रेसनीत यूपीए सरकार कॉरपोरेट पूंजीवाद की पैरोकार सरकार है।

मजेदारी यह है कि जनता को धोखा देने का यह खेल खुले आम और बिना किसी ग्लानि के चलता है। अपने वायसराय को लिखे खत में लोहिया ने जिन्हें ‘आपके आदमी’ बताया है, सरकारों के सलाहकार बने प्रच्छन्न नवउदारवादी उसी श्रेणी में आते हैं।

सोनिया गांधी के इन सलाहकारों से पूछा जा सकता है कि आप भारत की करोड़ों माताओं की दुर्दशा में शामिल हैं; उन माताओं के करोड़ों बच्चों के कुपोषण, बीमारी, असमय मृत्यु, अशिक्षा की जिम्मेदारी आप पर आयद होती है; बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के संसाधनों की लूट, लोगों का विस्थापन और लाखों किसानों की आत्महत्या किसी दैवीय प्रकोप की नहीं, आपकी देन हैं; क्योंकि आप सरकार के सलाहकार हैं; और उस सरकार की राजनीति से अलग राजनीति के धुर विरोधी!

सीधे राजनीति ही रास्ता

भारत पर आए नवउदारवादी गुलामी के खतरे को सबसे पहले देख पाने वाले समाजवादी नेता और चिंतक किशन पटनायक ने यह माना था कि नवउदारवाद के विरोध और विकल्प के लिए जनांदोलनों का राजनीतिकरण और एकीकरण होना चाहिए। वह निश्चित ही एक प्रासंगिक और स्फूर्तिदायक विचार था। किशन पटनायक की साख भी थी, और समस्या की सम्यक समझ भी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी साथियों के साथ मिलकर पहल की। 1995 में एक नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) का गठन हुआ, जिसके तहत वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक विकास का विचार लोगों के सामने रखा गया। हालांकि किशन पटनायक की आशा फलीभूत नहीं हो पाई। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में एनजीओ का तंत्र नवउदारवाद विरोधी किसी भी राजनीतिक पहल को निष्क्रिय करने के लिए स्वाभाविक तौर पर सक्रिय रहता है। उसी तंत्र में फंस कर किशन पटनायक की मौत हो गई।

नवउदारवाद के खिलाफ सजप के अलावा और भी कई राजनैतिक प्रयास हुए हैं।

उदारीकरण के पहले 10 सालों में मुख्यधारा राजनीति की तरफ से भी उसके विरोध में कुछ न कुछ स्वर उठते रहे। देश पर देश के शासक-वर्ग द्वारा नवउदारवादी हमले के बाद उसका मुकाबला करने की प्रेरणा से चुनाव आयोग में बड़ी संख्या में राजनीतिक पार्टियों का पंजीकरण हुआ है। लेकिन कोई प्रयास कामयाब नहीं हो पा रहा है। बल्कि ऐसे प्रयासों को नवउदारवाद समर्थकों द्वारा लोकतंत्र को कमजोर करने वाला प्रचारित किया जाता है। इस गतिरोध के कई कारण हैं, लेकिन शासक-अभिमुख प्रछन्न नवउदारवादियों, जो कभी जनांदोलनकारियों के और कभी सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों की सूरत में होते हैं, की नकारात्मक भूमिका उनमें प्रमुख है।

अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह पर हम यह समझ लें, कि एनजीओ आधारित जनांदोलनकारी राजनैतिक प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैं, तो आगे का रास्ता बनेगा। कहने को ये गैर-सरकारी संस्थाएं हैं, लेकिन उनसे ज्यादा सरकारी सरकारों के अपने विभाग भी नहीं होते। इन्होंने जेनुइन प्रतिरोध आंदोलनों – चाहे वे किसानों के हों, आदिवासियों के हों, मजदूरों के हों, छोटे व्यापारियों के हों, निचले दरजे के सरकारी कर्मचारियों के हों या छात्रों के – आगे नहीं बढ़ने दिया। वैश्विक कॉरपोरेट पूंजीवाद की हमसफर फोर्ड फाउंडेशन, राकफेलर जैसी दान-दाता संस्थाओं और उसी तरह की बहुत-सी ईनाम-दाता संस्थाओं के धन ने समाजवादी राजनीति के रास्ते को अवरुद्ध किया हुआ है। जैसे बड़े नेता और पार्टियां अपने यहां स्वतंत्र राजनीतिक सोच के कार्यकर्ताओं को नहीं पनपने देते, वैसे ही प्रच्छन्न नवउदारवादी समाज में राजनीतिक पहल और प्रक्रिया को नहीं संभव होने देते। इनका मानना है कि हर कार्यकर्ता की कीमत होती है, उसे चुकाने वाला एनजीओ अथवा ईनाम-दाता संस्था होनी चाहिए। कहना न होगा कि कीमत और मुनाफे से जुड़ी यह सोच पूंजीवाद की पैदाइश है। इन्हें सुरक्षा का दोहरा कवच प्राप्त है – भारत के शासक-वर्ग का, और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का। इन्हें कारेपोरेट पूंजीवाद के ‘सिविल सुरक्षा बल’ कहा जा सकता है।

एक और बात गौर की जा सकती है, अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग इनकी दुनिया के सदस्य नहीं बन सकते; उन्हें साम्राज्यवादी चाल के इन प्यादों का प्यादा बन कर रहना होता है। जनता की स्वतंत्र राजनीति भला ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

अगस्त क्रांति दिवस की सही प्रेरणा यही हो सकती है कि नव-साम्राज्यवादी गुलामी और उसे लादने वाले शासक-वर्ग के खिलाफ संघर्ष की राजनीति संगठित और मजबूत हो। बाकी सारे सामाजिक-संस्कृतिक प्रयास उस राजनीति को पुष्ट और बहुआयामी बनाने में लगें। हालांकि पूंजीवाद की चौतरफा गिरफ्त और कठिनाइयों में जीने की मजबूरियों ने देश की जनता को राजनीतिक रूप से लगभग अचेत कर दिया है।

दरअसल, नवउदारवाद समाज में अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को तेज करता है। इसलिए नई राजनीतिक पहल को जनता का समर्थन नहीं मिल पाता। मध्य-वर्ग राजनीति-द्वेषी बन गया है और दिन-रात उसका प्रचार करता है। इस तरह वह मौजूदा राजनीति को ही मजबूत करता है, जो धनबल, बाहुबल, संप्रदायवाद, जातिवाद, व्यक्तिवाद , परिवारवाद, वंशवाद, क्षेत्रवाद आदि के बल पर चलती है। ऐसे कठिन परिदृश्य में जो राजनीतिक संगठन जनता के पक्ष को मजबूत बनाने के लिए पारदर्शी और सतत राजनीतिक संघर्ष करेगा, एक दिन उसे सफलता मिलेगी।   

हालांकि प्रच्छन्न नवउदारवादियों को दूर रखना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन दूर रखे बगैर नवउदारवाद विरोध की राजनीति खड़ी नहीं हो सकती।

20-22 साल के अनुभव के बाद यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर भारत में समाजवादी राजनीतिक ताकत खड़ी हो पाएगी, तो प्रछन्न नवउदारवादियों से बच कर ही हो पाएगी।

प्रेम सिंह

25 जुलाई 2012

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।) 

August Revolution and India’s ruling class

भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के ख़िलाफ़ हिंदुत्व टोली-अंग्रेज़ शासक- मुस्लिम लीग हमजोली थे : जानिये हिन्दुत्व अभिलेखागार की ज़ुबानी

opinion debate

HINDUTVA GANG COLLUDED WITH BRITISH RULERS & JINNAH AGAINST QUIT INDIA MOVEMENT: A PEEP INTO HINDUTVA ARCHIVES

इस 9 अगस्त 2022 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम मील के पत्थर, ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को 80 साल पूरे हो जायेंगे। 7 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने बम्बई में अपनी बैठक में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंग्रेज़ शासकों से तुरंत भारत छोड़ने की मांग की गयी थी। कांग्रेस का यह मानना था कि अंग्रेज़ सरकार को भारत की जनता को विश्वास में लिए बिना किसी भी जंग में भारत को झोंकने का नैतिक और क़ानूनी  अधिकार नहीं है। अंग्रेज़ों से भारत तुरंत छोड़ने का यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा एक ऐसे नाज़ुक समय में लाया गया था जब दूसरे विश्वयुद्ध के चलते जापानी सेनाएं भारत के पूर्वी तट तक पहुंच चुकी थीं और कांग्रेस ने अंग्रेज़ शासकों द्वारा सुझाई ‘क्रिप्स योजना’ को ख़ारिज कर दिया था।

अंग्रेज़ों भारत छोड़ो प्रस्ताव के साथ-साथ कांग्रेस ने गांधी जी को इस आंदोलन का सर्वेसर्वा नियुक्त किया और देश के आम लोगों से आह्वान किया कि वे हिंदू-मुसलमान का भेद त्याग कर सिर्फ हिदुस्तानी के तौर पर अंग्रेज़ी  साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए एक हो जाएं। अंग्रेज़ शासन से लोहा लेने के लिए स्वयं गांधीजी ने ‘करो या मरो’ ब्रह्म वाक्य सुझाया और सरकार एवं सत्ता से पूर्ण असहयोग करने का आह्वान किया।

अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनके दौरान देशभक्त हिन्दुस्तानियों की क़ुर्बानियां

भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में क्रांति की एक लहर दौड़ गयी। अगले कुछ महीनों में देश के लगभग हर भाग में अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध आम लोगों ने जिस तरह लोहा लिया उससे 1857 के भारतीय जनता के पहले मुक्ति संग्राम की यादें ताजा हो गईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने इस सच्चाई को एक बार फिर रेखांकित किया कि भारत की आम जनता किसी भी कुर्बानी से पीछे नहीं हटती है। अंग्रेज़ शासकों ने दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 9 अगस्त की सुबह से ही पूरा देश एक फौजी छावनी में बदल दिया गया। गांधीजी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को तो गिरफ्तार किया ही गया दूरदराज के इलाकों में भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भयानक यातनाएं दी गईं।

सरकारी दमन और हिंसा का ऐसा तांडव देश के लोगों ने झेला जिसके उदाहरण कम ही मिलते हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस और सेना द्वारा सात सौ से भी ज़्यादा जगह गोलाबारी की गई, जिसमें ग्यारह सौ से भी अधिक लोग शहीद हो गए। पुलिस और सेना ने आतंक मचाने के लिए बलात्कार और कोड़े लगाने का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया। भारत में किसी भी सरकार द्वारा इन कथकंडों का इस तरह का संयोजित प्रयोग 1857 के बाद शायद पहली बार ही किया गया था।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को ‘अगस्त क्रांति’ भी कहा जाता है। अंग्रेज़ सरकार के भयानक बर्बर और अमानवीय दमन के बावजूद देश के आम हिंदू मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों ने हौसला नहीं खोया और सरकार को मुंहतोड़ जवाब दिया।

यह आंदोलन ‘अगस्त क्रांति’ क्यों कहलाता है इसका अंदाजा उन सरकारी आंकड़ों को जानकर लगाया जा सकता है जो जनता की इस आंदोलन में कार्यवाहियों का ब्योरा देते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 208 पुलिस थानों, 1275 सरकारी दफ्तरों, 382 रेलवे स्टेशनों और 945 डाकघरों को जनता द्वारा नष्ट कर दिया गया। जनता द्वारा हिंसा बेकाबू होने के पीछे मुख्य कारण यह था कि पूरे देश में कांग्रेसी नेतृत्व को जेलों में डाल दिया गया था और कांग्रेस संगठन को हर स्तर पर गैर क़ानूनी  घोषित कर दिया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व के अभाव में अराजकता का होना बहुत गैर स्वाभाविक नहीं था। यह सच है कि नेतृत्व का एक बहुत छोटा हिस्सा गुप्त रूप से काम कर रहा था परंतु आमतौर पर इस आंदोलन का स्वरूप स्वतः स्फूर्त बना रहा।

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दमनकारी अंग्रेज़ सरकार का इस आंदोलन के दरम्यान जिन तत्वों और संगठनों ने प्यादों के तौर पर काम किया वे हिंदू और इस्लामी राष्ट्र के झंडे उठाए हुए थे।

ये सच है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रहने का निर्णय लिया था। इसके बारे में सबको जानकारी है। लेकिन आज के देशभक्तों के नेताओं ने किस तरह से न केवल इस आंदोलन से अलग रहने का फ़ैसला किया था बल्कि इसको दबाने में गोरी सरकार की सीधी सहायता की थी जिस बारे में बहुत कम जानकारी है।

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्नाह ने कांग्रेसी घोषणा की प्रतिक्रिया में अंग्रेज़ सरकार को आश्वासन देते हुए कहा,

कांग्रेस की असहयोग की धमकी दरअसल श्री गांधी और उनकी हिंदू कांग्रेस सरकार अंग्रेज़ सरकार को ब्लैकमेल करने की है। सरकार को इन गीदड़ भभकियों में नहीं आना चाहिए।

मुस्लिम लीग और उनके नेता अंग्रेज़ी  सरकार के बर्बर दमन पर न केवल पूर्णरूप से ख़मोश रहे, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज़ सरकार का सहयोग करते रहे। मुस्लिम लीग इससे कुछ भिन्न करे इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वह सरकार और कांग्रेस के बीच इस भिड़ंत के चलते अपना उल्लू सीध करना चाहती थी। उसे उम्मीद थी कि उसकी सेवाओं के चलते अंग्रेज़ शासक उसे पाकिस्तान का तोहफ़ा ज़रूर दिला देंगे।

भारत छोड़ो आंदोलन के ख़िलाफ़ आरएसएस के चहेते सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने खुले-आम दमनकारी अंग्रेज़ शासकों की मदद की घोषणा की 

लेकिन सबसे शर्मनाक भूमिका हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रही जो भारत माता और हिंदू राष्ट्रवाद का बखान करते नहीं थकते थे। भारत छोड़ो आंदोलन पर अंग्रेज़ी शासकों के दमन का क़हर बरपा था और देशभक्त लोग सरकारी संस्थाओं को छोड़कर बाहर आ रहे थे; इनमें बड़ी संख्या उन नौजवान छात्र-छात्राओं की थी जो कांग्रेस के आह्वान पर सरकारी शिक्षा संस्थानों को त्याग कर यानी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बाहर आ गये थे। लेकिन यह हिंदू महासभा ही थी जिसने अंग्रेज़ सरकार के साथ खुले सहयोग की घोषणा की। हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा वीर सावरकर ने 1942 में कानपुर में अपनी इस नीति का

ख़ुलासा करते हुए कहा,

सरकारी प्रतिबंध के तहत जैसे ही कांग्रेस एक खुले संगठन के तौर पर राजनीतिक मैदान से हटा दी गयी है तो अब राष्ट्रीय कार्यवाहियों के संचालन के लिए केवल हिंदू महासभा ही मैदान में रह गयी हैहिंदू महासभा के मतानुसार व्यावहारिक राजनीति का मुख्य सिद्धांत अंग्रेज़ सरकार के साथ संवेदनपूर्ण सहयोग की नीति है। जिसके अंतर्गत बिना किसी शर्त के अंग्रेज़ों   के साथ सहयोग जिसमें हथियार बंद प्रतिरोध भी शामिल है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर सरकारें चलाईं

कांग्रेस का भारत छोड़ो आंदोलन दरअसल सरकार और मुस्लिम लीग के बीच देश के बंटवारे के लिए चल रही बातचीत को भी चेतावनी देना था। इस उद्देश्य से कांग्रेस ने सरकार और मुस्लिम लीग के साथ किसी भी तरह के सहयोग का बहिष्कार किया हुआ था। लेकिन इसी समय हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सरकारें चलाने का निर्णय लिया। वीरसावरकर ने जो अंग्रेज़ सरकार की

ख़िदमत में 6-7 माफ़ीनामे लिखने के बाद दी गयी सज़ा का केवल एक तिहाई हिस्सा भोगने के बाद हिन्दू महासभा के सर्वोच्च नेता थे, इस शर्मनाक रिश्ते के बारे में सफाई देते हुए 1942 में कहा,

व्यावहारिक राजनीति में भी हिंदू महासभा जानती है कि बुद्धिसम्मत समझौतों के ज़रिए आगे बढ़ना चाहिए। यहां सिंध हिंदू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली जुली सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी ली। बंगाल का उदाहरण भी सबको पता है। उद्दंड लीगी जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद ख़ुश नहीं रख सकी, हिंदू महासभा के साथ संपर्क में आने के बाद काफ़ी  तर्कसंगत समझौतों और सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार हो गये। और वहां की मिलीजुली सरकार मिस्टर फ़ज़लुल हक़ को प्रधानमंत्रित्व [अंग्रेज़ शासन में मुख्यमंत्री को प्रधान-मंत्री कहा जाता था] और महासभा के क़ाबिल मान्य नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी [जो उप-प्रधान मंत्री थे] के नेतृत्व में दोनों समुदाय के फ़ायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।

यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि बंगाल और सिंध के अलावा NWFP में भी हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की गांठ-बंधन सरकार 1942 में सत्तासीन हुई।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार में गृह मंत्री और उपमुख्य मंत्री रहते हुएअंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनको दबाने के लिए गोरे आक़ाओं को उपाए सुझाए

हिन्दू महासभा के नेता नंबर दो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो हद ही करदी।  आरएसएस के प्यारे इस महान हिन्दू राष्ट्रवादी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्री मंडल में गृह मंत्री और उप-मुख्यमंत्री रहते हुए अनेक पत्रों में बंगाल के ज़ालिम अँगरेज़ गवर्नर को दमन के वे तरीक़े सुझाये जिन से बंगाल में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को पूरे तौर पर दबाया जा सकता था। मुखर्जी ने अँगरेज़ शासकों को भरोसा दिलाया कि  कांग्रेस अँगरेज़ शासन को देश के लिया अभशाप मानती है लेकिन उनकी मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिलीजुली सरकार इसे देश के लिए वरदान मानती है।

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति जानना हो तो इसके सब से क़द्दावर दार्शनिक एम.एस. गोलवलकर के इस शर्मनाक वक्तव्य को पढ़ना काफ़ी होगा –

“सन् 1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था। उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ करने का संकल्प किया। परन्तु संघ के स्वयं सेवकों के मन में उथलपुथल चल ही रही थी। संघ यह अकर्मण्य लोगों की संस्था है, इनकी बातों में कुछ अर्थ नहीं ऐसा केवल बाहर के लोगों ने ही नहीं, कई अपने स्वयंसेवकों ने भी कहा। वे बड़े रुष्ट भी हुए।”

इस तरह स्वयं गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी भी कहा जाता है, से हमें यह तो पता चल जाता है कि संघ ने आंदोलन के पक्ष में परोक्ष रूप से किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं की। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी भी प्रकाशन या दस्तावेज़ या स्वयं गुरुजी के किसी भाषण, लेख या कर्म से आज तक यह पता नहीं लग पाया है कि संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में किस तरह की हिस्सेदारी की थी।

गुरुजी का यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रोज़मर्रा का काम ज्यों का त्यों चलता रहा, बहुत अर्थपूर्ण है। यह रोज़मर्रा का काम क्या था इसे समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं है। यह काम था मुस्लिम लीग के कंधे से कंधा मिलाकर हिंदू और मुसलमान के बीच खाई को गहराते जाना।

अंग्रेज़ी राज के खिलाफ संघर्ष में जो भारतीय शहीद हुए उनके बारे में गुरुजी क्या राय रखते थे वह इस वक्तव्य से बहुत स्पष्ट हो जायेगा-

हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिंदु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे नहीं माना है क्योंकि अंततः वह अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी।

शायद यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक भी कार्यकर्ता अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहीद नहीं हुआ। शहीद होने की बात तो दूर रही, आरएसएस के उस समय के नेताओं जैसे की गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक। लाल कृष्ण अडवाणी, के आर मलकानी या अन्य किसी आरएसएस सदस्य ने किसी भी तरह इस  महान मुक्ति आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया कियोंकी आरएसएस सावरकर का पिछलग्गू बानी थी। 

भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल गुज़रने के बाद भी कई महत्वपूर्ण सच्चाईयों से पर्दा उठना बाक़ी है। दमनकारी अंग्रेज़ शासक और उनके मुस्लिम लीगी प्यादों के बारे में तो सच्चाईयां जगज़ाहिर है लेकिन अगस्त क्रांति के वे गुनहगार जो अंग्रेज़ी  सरकार द्वारा चलाए गए दमन चक्र में प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे अभी भी कठघरे में खड़े नहीं किए जा सके हैं। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि वे भारत पर राज कर रहे हैं। हिंदू राष्ट्रवादियों की इस भूमिका को जानना इसलिए भी ज़रूरी है ताकि आज उनके द्वारा एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है उसके आने वाले गंभीर परिणामों को समझा जा सके।

शम्सुल इस्लाम

भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ देने के लिए सावरकर को भारत रत्न ! | #hastakshep

QIM also known as ‘August Kranti’ (August Revolution) was a nationwide Civil Disobedience Movement

झूठ का पुलिंदा : व्हाई आई किल्ड गांधी

film review

‘व्हाई आई किल्ड गांधी’ फिल्म को लेकर क्या है विवाद? | What is the controversy about the movie ‘Why I Killed Gandhi’?

‘Why I Killed Gandhi’ movie review in Hindi by Dr Ram Puniyani | डॉ राम पुनियानी द्वारा हिंदी में व्हाई आई किल्ड गांधीफिल्म की समीक्षा

हाल में रिलीज हुई फिल्म ‘वाय आई किल्ड गांधी ‘महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करने का प्रयास (Attempts to glorify Mahatma Gandhi’s assassin Nathuram Godse) है. इस फिल्म की एक क्लिप, जो पंजाब हाईकोर्ट में नाथूराम गोडसे की गवाही के बारे में है, सोशल मीडिया पर दिखाई जा रही है.

इसमें गोडसे को घटनाक्रम का एकदम झूठा विवरण प्रस्तुत करते हुए और इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रंग देते हुए दिखाया गया है. काफी समय से आम लोगों के दिमाग में यह ठूंसा जा रहा है कि महात्मा गांधी ने क्रांतिकारी भगतसिंह की जान बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया. तथ्य इसके विपरीत हैं. वायसराय लार्ड इर्विन ने अपने विदाई भाषण में कहा था कि महात्मा गांधी ने बहुत कोशिश की थी कि भगतसिंह की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाए. इर्विन ने 26 मार्च 1931 को कहा था ‘‘जब मिस्टर गांधी मुझसे काफी जोर देकर यह आग्रह कर रहे थे कि सजा को कम कर दिया जाए तब मैं यह सोच रहा था कि अहिंसा का एक दूत इतने आग्रहपूर्वक ऐसे लोगों की पैरवी क्यों कर रहा है जो उसकी विचारधारा के एकदम विपरीत सोच रखते हैं. परंतु मेरा यह मानना है कि इस तरह के मामलों में मैं अपने निर्णय को शुद्ध राजनैतिक कारणों से प्रभावित नहीं होने दे सकता. मैं ऐसे किसी दूसरे मामले की कल्पना भी नहीं कर सकता जिसमें कोई व्यक्ति कानून के अंतर्गत उसे दिए गए दंड के लिए प्रत्यक्ष रूप से इतना पात्र हो.‘‘

गोडसे ने अपने बयान में कहा कि गांधीजी लगातार क्रांतिकारियों के खिलाफ लिख रहे थे और यह भी कि उनके विरोध के बावजूद कांग्रेस अधिवेशन में भगतसिंह के बलिदान और देशभक्ति की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया था. सच यह है कि भगतसिंह की प्रशंसा करते हुए जो प्रस्ताव कांग्रेस ने पारित किया था उसका मसविदा गांधीजी ने ही तैयार किया था. प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘‘कांग्रेस किसी भी रूप में या किसी भी प्रकार की राजनैतिक हिंसा से स्वयं को अलग करते हुए और उसका अनुमोदन न करते हुए भी दिवंगत सरदार भगतसिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरू की वीरता और बलिदान पर अपनी प्रशंसा दर्ज करना चाहती है. इन जिंदगियों को खोने वाले परिवारों के साथ हम भी शोकग्रस्त हैं. कांग्रेस की यह राय है कि इन तीन मृत्युदंडों का कार्यान्वयन अकारण की गई बदले की कार्यवाही है और देश की उनके दंड को कम करने की सर्वसम्मत मांग का जानबूझकर अनादर किया गया है.‘‘

क्रांतिकारियों और गांधी को एक-दूसरे का विरोधी बताते हुए गोडसे यह भी भूल जाता है कि गांधीजी ने सावरकर बंधुओं की रिहाई के लिए भी प्रयास किए थे. ‘कलेक्टिड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ खण्ड-20 के पृष्ठ 369-371 में गांधीजी का एक लेख प्रकाशित है जिसमें उन्होंने यह कहा है कि सावरकर बंधुओं को रिहा किया जाना चाहिए और उन्हें देश की राजनीति मंे अहिंसक तरीके से भागीदारी करने की अनुमति दी जानी चाहिए.

क्या गांधी और बोस एक दूसरे के विरोधी थे?

जो वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर दिखाई जा रही है उसमें गांधी और बोस को एक-दूसरे का विरोधी बताया गया है. यह सच है कि गांधी और बोस में कुछ मुद्दों पर मतभेद थे परंतु दोनों भारत को स्वतंत्रता दिलवाने के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे. गांधीजी ने सन् 1939 में बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने का विरोध किया था. बोस का तर्क था कि हमें अंग्रेजों से लड़ने के लिए जापान और जर्मनी के साथ गठबंधन करना चाहिए. गांधीजी का मानना था कि स्वाधीनता हासिल करने के लिए हमें ब्रिटेन के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए. कांग्रेस की केन्द्रीय समिति के अधिकांश सदस्य इस मामले में गांधी के साथ थे. इन मतभेदों के बावजूद गांधी और बोस दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति अथाह सम्मान था.

जब गांधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ तब बोस ने इस पर प्रसन्नता जाहिर की. बोस ने आजाद हिन्द फौज की सफलता के लिए गांधीजी का आशीर्वाद मांगा था.

महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का संबोधन सबसे पहले किसने किया?

बोस ने ही महात्मा के लिए राष्ट्रपिता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया और आजाद हिन्द फौज की एक टुकड़ी का नाम गांधी बटालियन रखा. बोस के प्रति गांधीजी के मन में सम्मान का भाव था और वे उन्हें ‘प्रिंस अमंग पेट्रियट्स’ कहते थे. वे आजाद हिन्द फौज के कैदियों से मिलने जेल भी गए थे.

आरएसएस-हिन्दू महासभा के दुष्प्रचार के अनुरूप गोडसे यह आरोप भी लगाता है कि गांधी हिन्दुओं के विरोधी और मुसलमानों के समर्थक थे और देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार थे. हम जानते हैं कि देश के विभाजन के पीछे अनेक जटिल कारण थे. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति को सफल बनाने के लिए मुस्लिम और हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. गोडसे द्वारा बोस की प्रशंसा मगरमच्छी आंसू बहाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है. जब बोस अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे तब हिन्दू महासभा ब्रिटिश आर्मी में भारतीयों को भर्ती कराने का अभियान चला रही थी. गोडसे के अखबार ‘अग्राणी‘ ने उस समय एक कार्टून छापा था जिसमें सावरकर को रावण को मारते हुए दिखाया गया था. रावण महात्मा गांधी थे और उनका एक सिर बोस था. अगर गोडसे क्रांतिकारियों से इतना ही प्रभावित था तो उसे आजाद हिन्द फौज में शामिल होने से किसने रोका था?

गोडसे गांधीजी पर पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दिलवाने का आरोप लगाता है. यह 55 करोड़ भारत और पाकिस्तान के संयुक्त खजाने में पाकिस्तान का हिस्सा था. गांधीजी ने इस मुद्दे पर उपवास किया था क्योंकि उनका मानना था कि अगर हम इस तरह का व्यवहार करेंगे तो दुनिया हमें किस नजर से देखेगी.

गोडसे गांधी पर क्यों हमलावर था?

गोडसे गांधी पर इसलिए भी हमलावर है क्योंकि उन्होंने यह शर्त रखी थी कि वे अपना उपवास तभी तोड़ेंगे जब हिन्दू मुसलमानों की मस्जिदों और उनकी संपत्तियों से अपना बेजा कब्जा छोड़ देंगे. विभाजन की त्रासदी के बाद पूरे देश में हिंसा फैल गई थी. साम्प्रदायिक तत्वों की मदद से हिन्दुओं ने मस्जिदों और मुसलमानों की संपत्तियों पर कब्जा कर लिया था. गोडसे गांधी को चुनौती देता है कि वे पाकिस्तान और मुसलमानों के मामले में ऐसी ही कार्यवाही करके दिखाएं. गोडसे भूल जाता है कि महात्मा गांधी ने नोआखली में दंगे रोकने के लिए अनेक कदम उठाए थे और नोआखली में दंगा पीड़ित मुख्यतः हिन्दू थे. गांधीजी का मानना था कि अगर भारत में मुसलमान सुरक्षित रहेंगे तो वे पाकिस्तान के हिन्दुओं और सिक्खों के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं. शांति और अहिंसा पर उनका जोर नैतिक सिद्धांतों पर आधारित था. ‘‘अगर हम दिल्ली में यह कर पाए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि पाकिस्तान में हमारी राह खुल जाएगी और इससे एक नया सफर शुरू होगा. जब मैं पाकिस्तान जाऊंगा तो मैं उन्हें आसानी से नहीं छोड़ूंगा. मैं वहां के हिन्दुओं और सिक्खों के लिए अपनी जान दे दूंगा‘‘.

फिल्म में गोडसे के बयान में सबसे बड़ा झूठ यह है कि गोडसे ने अकेले महात्मा गांधी की हत्या का षड़यंत्र रचा था. सरदार पटेल ने कहा था कि गांधीजी की हत्या की योजना हिन्दू महासभा ने बनाई थी. आगे चलकर जीवनलाल कपूर आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ‘‘इन सभी तथ्यों को एकसाथ देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हत्या का षड़यंत्र सावरकर और उसके साथियों के अतिरिक्त और किसी ने नहीं रचा था.

गोडसे का हिन्दू राष्ट्रवाद क्या था और गांधीजी की हत्या का असली कारण क्या था? | What was Godse’s Hindu nationalism and what was the real reason behind Gandhiji’s assassination?

गांधीजी की हत्या का असली कारण यह था कि वे समावेशी राष्ट्रवाद के पैरोकार थे – उस राष्ट्रवाद के जिसका सपना भगतसिंह और बोस ने भी देखा था. गांधीजी की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वे अछूत प्रथा और जातिगत ऊँचनीच के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. गोडसे का हिन्दू राष्ट्रवाद जातिप्रथा का समर्थक और समावेशी राष्ट्रवाद का विरोधी था. गोडसे को जो कुछ कहते हुए दिखाया गया है वह हिन्दू राष्ट्रवादियों के असली एजेंडे को बताता है.

-राम पुनियानी

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

क्या राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने सावरकर से दया याचिका प्रस्तुत करने के लिए कहा था?

savarkar

हिन्दी में डॉ. राम पुनियानी का लेख : Dr. Ram Puniyani’s article in Hindi: Did Gandhi ask Savarkar to submit a mercy petition?

हिन्दू राष्ट्रवाद अपने नये नायकों को गढ़ने और पुरानों की छवि चमकाने का हर संभव प्रयास कर रहा है. इसके लिए कई स्तरों पर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है. हाल में 2 अक्टूबर (गाँधी जयंती) को महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के जयकारों की बाढ़ आ गई थी. अब गोडसे के गुरु सावरकर (Godse’s Guru Savarkar) चर्चा का विषय हैं. सावरकर की शान में कसीदे काढते हुए किताबें लिखी जा रही हैं और इन किताबों के विमोचन के लिए भव्य कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं.

सावरकर 1.0 और सावरकर 2.0 का अंतर (Difference between Savarkar 1.0 and Savarkar 2.0)

अपने जीवन के शुरूआती दौर में सावरकर ब्रिटिश-विरोधी क्रन्तिकारी थे और अपने अनुयायियों को अंग्रेज़ अधिकारियों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रोत्साहित करते थे. वे सावरकर 1.0 थे.

सावरकर 2.0 का जन्म उन्हें कालापानी की सज़ा सुनाये जाने के बाद हुआ. कालापानी की सज़ा का अर्थ था अंडमान स्थित जेल की अत्यंत कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में जीवन गुज़ारना. इसी जेल में रहते हुए सावरकर ने हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र की विचारधाराओं का विकास किया और इसी दौरान उन्होंने जेल से रिहा होने के लिए कई दया याचिकाएं सरकार को भेजी.

अब तक तो उनके अनुयायी यही मानने को तैयार नहीं थे कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगी थी और उन्हें रिहा करने की प्रार्थना की थी. परन्तु जैसे-जैसे एक क्रन्तिकारी और हिंदुत्व की राजनीति के मुख्य चिन्तक के तौर पर उनकी छवि को चमकाने के लिए पुस्तकें लिखी जाती गईं, वैसे-वैसे यह छुपाना मुश्किल होता गया कि उन्होंने सरकार से माफ़ी मांगीं थी. अब सवाल यह था कि एक क्रन्तिकारी भला एक के बाद एक कई दया याचिकाएं कैसे प्रस्तुत कर सकता था? क्रांतिधर्मिता और हाथ पसारने के बीच तालमेल कैसे बैठाया जाए? इसके लिए गोयबेल्स की तकनीक अपनाई गई. इसी तारतम्य में भाजपा के वरिष्ठ नेता और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उदय माहुरकर और चिरायु पंडित द्वारा लिखित पुस्तक “वीर सावरकर: द मैन हू कुड हैव प्रिवेंटिड पार्टीशन” के विमोचन के अवसर पर एक ऐसा वक्तव्य दिया जो सच से मीलों दूर है.

Did Gandhi ask Savarkar to File Mercy petitions?

श्री सिंह ने कहा, “सावरकर के बारे में अनेक झूठ कहे गए…कई बार यह कहा गया कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार को अनेक दया याचिकाएं भेजीं. परन्तु सच यह कि उन्होंने (जेल से) अपनी रिहाई के लिए कोई दया याचिका नहीं प्रस्तुत की. किसी भी बंदी को दया याचिका प्रस्तुत करने का हक होता है. महात्मा गाँधी ने उनसे दया याचिका प्रस्तुत करने के लिए कहा था. उन्होंने गाँधीजी की सलाह पर एक दया याचिका प्रस्तुत की थी. महात्मा गाँधी ने यह अपील की थी कि सावरकरजी को रिहा किया जाए. उन्होंने यह चेतावनी भी दी थी कि उनके राष्ट्रीय योगदान का अपमान सहन नहीं किया जायेगा.”

What is the truth?

सच क्या है? सावरकर को 13 मार्च 1910 को गिरफ्तार किया गया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या के लिए पिस्तौल भेजी थी.

यह सही है कि जेल में हालात अत्यंत ख़राब थे. यह भी सही है कि दया याचिका प्रस्तुत करना हर बंदी का अधिकार होता है. ये याचिकाएं स्वास्थ्य सम्बन्धी, पारिवारिक या अन्य आधारों पर बंदियों द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं.

राजनाथ सिंह और उनके साथियों का दावा है कि सावरकर ने एक निश्चित प्रारूप में एक सी याचिकाएं लिखी थीं. परन्तु तथ्य यह है कि उनकी सभी याचिकाओं की भाषा अलग-अलग है और उनमें इस आधार पर दया चाही गई है कि उन्होंने जो किया वह एक गुमराह युवा की हरकत थी.

सावरकर ने यह भी लिखा कि जो सजा उन्हें दी गई है वह न्यायपूर्ण और उचित है परन्तु उन्हें इसलिए रिहा लिया जाए क्योंकि उन्हें उनकी गलती का अहसास हो गया है और वे ब्रिटिश सरकार की जिस तरह से वह चाहे उस तरह से सेवा करने को तैयार हैं.

यह घुटने टेकने से भी आगे की बात है.

सावरकर ने ने 1911 से दया याचिकाएं लिखनी शुरू कीं और यह सिलसिला जेल से उनकी रिहाई तक जारी रहा. उनकी पत्रों की भाषा और उनमें व्यक्त विचारों से पता चलता है कि कोई व्यक्ति कैद से मुक्ति पाने के लिए कितना झुक सकता है. कई लेखकों ने उनकी दया याचिकाओं को विस्तार से उदृत किया है.

यह दावा कि ये याचिकाएं गाँधी के कहने पर लिखी गईं थीं, सफ़ेद झूठ है. सावरकर ने 1911 से ही दया की गुहार लगाते हुए याचिकाएं लिखनी शुरू कर दीं थीं. उस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे और वे 1915 में भारत वापस आये. धीरे-धीरे उन्होंने कांग्रेस का नेतृत्व सम्हालना शुरू कर दिया. इसी बीच गांधीजी को सावरकर के भाई डॉ नारायण सावरकर का पत्र मिला, जिसमें गांधीजी से उनकी भाई को रिहा करवाने में मदद करने का अनुरोध किया गया था.

इस पत्र के जवाब में गांधीजी ने 25 जनवरी 1920 को नारायण सावरकर को लिखा कि “आप एक याचिका तैयार करें जिसमें प्रकरण के सभी तथ्यों का उल्लेख हो और इस तथ्य को सामने लायें कि आपके भाई ने जो अपराध किया है वह विशुद्ध राजनैतिक है.” यह उत्तर ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी’ के खंड 19 में संकलित है.

अतः यह साफ़ है कि महात्मा गाँधी ने सावरकर के भाई से याचिका तैयार करने को कहा था न कि सावरकर से दया याचिका प्रस्तुत को. परन्तु सावरकर ने तो दया की याचना कर ली.

गांधीजी जानते थे कि सावरकर की रिहाई मुश्किल है और इसलिए उन्होंने डॉ सावरकर को लिखा था कि आपको सलाह देना एक कठिन काम है.

बाद में गाँधीजी ने एक लेख भी लिखा जो ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी’, खंड 20, पृष्ठ 369-371 में संकलित है. इसमें कहा गया है कि सावरकर को रिहा किया जाना चाहिए और उन्हें अहिंसक तरीकों से देश के राजनैतिक जीवन में भागीदारी करने का मौका मिलना चाहिए.

आगे चलकर गांधीजी ने भगत सिंह के बारे में भी इसी तरह की अपील की थी. वे स्वाधीनता संग्राम को एक विस्तृत और समावेशी राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में देखते थे और इसलिए इस तरह के प्रयास करते रहते थे.

गांधीजी के जीवन और उनके चरित्र को देखते हुए यह संभव नहीं लगता कि वे किसी को अंग्रेज़ सरकार के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत करने को कहेंगे.कलेक्टेड वर्क्स में शामिल एक अन्य लेख में, दुर्गादास के प्रकरण की चर्चा करते हुए गांधीजी लिखते हैं, “अतः मुझे आशा है कि दुर्गादास के मित्र उन्हें या उनकी पत्नी को दया याचिका प्रस्तुत करने की सलाह नहीं देंगे और ना ही दया या सहानुभूति का भाव प्रदर्शित कर श्रीमती दुर्गादास को और दुखी करेंगे. इसके विपरीत, हमारा यह कर्तव्य है कि हम उनसे कहें कि अपना दिल मज़बूत करें और यह कहें कि उन्हें इस बात का गर्व होना चाहिए कि उनके पति बिना कोई अपराध किये जेल में हैं. दुर्गादास के प्रति हमारी सच्ची सेवा यही होगी कि हम श्रीमती दुर्गादास को आर्थिक या अन्य कोई भी सहायता जो ज़रूरी हो, वह उन्हें उपलब्ध करवाएं….”

यह झूठ जानबूझकर फैलाया जा रहा है कि सावरकर ने गाँधी की सलाह पर सरकार से माफ़ी मांगी थी.

महत्वपूर्ण यह भी है कि जिस सावरकर की रिहाई के लिए गांधीजी ने अपील की थी वही सावरकर आगे चलकर उनकी हत्या का एक आरोपी बना.

जैसा कि सरदार पटेल ने नेहरु को लिखा था, “हिन्दू महासभा के एक कट्टरपंथी तबके, जो सावरकर के अधीन था, ने षड़यंत्र रचा था…” बाद में जीवनलाल कपूर आयोग भी इन्हीं निष्कर्षों पर पहुंचा.

अंग्रेजों की हर तरह से मदद करना सावरकर के जीवन का लक्ष्य बन गया (Helping the British in every way became the goal of Savarkar’s life.)

यह सही है कि जेल से अपनी रिहाई के बाद सावरकर ने दलितों के मंदिरों में प्रवेश के लिए काम किया. उन्होंने यह भी कहा कि गाय पवित्र पशु नहीं है. परन्तु अंग्रेजों की हर तरह से मदद करना उनकी जीवन का लक्ष्य बन गया. उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद (जो देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत भारतीय राष्ट्रवाद का विरोधी था) की नींव को गहरा किया. सन 1942 में जब गाँधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया उस समय सावरकर ने हिन्दू महासभा के सभी पधाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने पदों पर बने रहें और ब्रिटिश सरकार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे. उन्होंने ब्रिटिश सेना में भारतीयों की भर्ती करवाने में भी सरकार की मदद की.

आज हिन्दू राष्ट्रवादी सावरकर का महिमामंडन करना चाहते हैं. यह दिलचस्प है कि इसके लिए उन्हें गाँधी का सहारा लेना पड़ रहा है – उस गाँधी का जिसकी हत्या में हिंदुत्व नायकों का हाथ था.

राजनाथ सिंह के वक्तव्य से पता चलता है कि संघ परिवार के शीर्ष नेता अपने नायकों की छवि चमकाने के लिए बड़े से बड़ा झूठ बोलने में भी नहीं सकुचाते.

 -राम पुनियानी

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

Fact check: Did VD Savarkar write mercy petitions on Gandhi’s advice, as Rajnath Singh claimed?

भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेज़ों की मुखबिरी करते थे संघी- शाहनवाज़ आलम

भारत छोड़ो आंदोलन,शाहनवाज़ आलम,अंग्रेज़ों की मुखबिरी

सावरकर ने अंग्रेज़ों के लिए कैंप लगाए, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने के लिए पत्र लिख कर सुझाव दिये

स्पीक अप माइनोरिटी कैंपेन – 9 में शामिल हुए डेढ़ हज़ार लोग

Speak Up Minority Campaign –9 : Fifteen Hundred people participated in

लखनऊ 8 अगस्त 2021। अल्पसंख्यक कांग्रेस ने आज स्पीक अप माइनोरिटी कैंपेन के 9 वें संस्करण में भारत छोड़ो आंदोलन में संघ परिवार द्वारा अंग्रेज़ों का साथ दिए जाने पर लोगों से संवाद किया।

इस दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आरएसएस पर अंग्रेज़ों की मुखबिरी और जासूसी करने के ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ बात रखी।

अल्पसंख्यक कांग्रेस प्रदेश चेयरमैन शाहनवाज़ आलम ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन की 79 वीं सालगिरह की पूर्व संध्या पर अल्पसंख्यक कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता भारत छोड़ो आंदोलन के ग़द्दार कौन विषय पर फेस बुक लाइव हुए। इसमें लोगों को बताया गया कि कैसे गांधी जी, नेहरू जी, मौलाना आज़ाद के नेतृत्व में लाखों लोगों ने अंग्रेज़ों भारत छोड़ो के नारे के साथ देश को आज़ाद कराने के लिए संघर्ष किया। हज़ारों लोगों ने शहादत दी और लाखों लोग जेल गए। लेकिन इस पूरे आंदोलन में संघ परिवार और हिंदू महासभा ने अंग्रेज़ों की मुखबीरी की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ चल रही बंगाल सरकार के उपमुख्यमंत्री के बतौर अंग्रेज़ों को पत्र लिख कर इस आंदोलन को दबाने का सुझाव देने का देशद्रोही काम किया। वहीं सावरकर ने अंग्रेज़ों की तरफ से द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय युवाओं को सेना में भर्ती होने का आह्वान कर देश की भावनाओं के विरुद्ध काम किया। सावरकर ने देशद्रोही काम करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेज़ों का साथ दिया। 

वक्ताओं ने लोगों को यह भी बताया कि कैसे 27 अगस्त 1942 को बटेश्वर में हुए आंदोलनकारियों की बैठक की मुखबीरी अटल बिहारी वाजपेई ने की और 1 सितम्बर 1942 को अपनी मुखबिरी की रिपोर्ट दर्ज कराई। जिसके कारण कांग्रेसी आंदोलनकारी लीलाधर वाजपेयी को जेल जाना पड़ा।

वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह 1942 में महात्मा गांधी देश की आवाज़ थे वैसे ही आज राहुल गांधी जी देश की आवाज़ हैं। जिनके साथ खड़ा होना हर देशभक्त नागरिक की ऐतिहासिक और नैतिक ज़िम्मेदारी है।

शाहनवाज़ आलम ने बताया कि आज आह्वान किया गया कि भारत छोड़ो आंदोलन की बरसी पर 9 और 10 अगस्त को उत्तर प्रदेश कांग्रेस द्वारा होने वाले भाजपा गद्दी छोड़ो अभियान में ज़्यादा से ज़्यादा लोग शामिल हों।

हर रविवार चलने वाले इस कार्यक्रम में आज क़रीब डेढ़ हज़ार लोग लाइव हुए।