प्रेस स्वतंत्रता दिवस : भारत पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक

press freedom

Press Freedom Day in Hindi: India is one of the most dangerous countries in the world for journalists

3 मई – प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष (World Press Freedom Day 2022)

एक स्वतंत्र प्रेस हमारे लोकतांत्रिक समाज में एक आवश्यक भूमिका निभाता है जैसे -सरकारों को जवाबदेह ठहराना, भ्रष्टाचार, अन्याय और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करना, समाज को सूचित करना और उन्हें प्रभावित करने वाले निर्णयों और नीतियों में शामिल होना। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (world press freedom index) दुनिया भर में प्रेस की आज़ादी की काफी निराशाजनक तस्वीर (Quite a dismal picture of press freedom) पेश करता है।  सरकारी धमकी, सेंसरशिप और पत्रकारों और मीडिया आउटलेट्स के उत्पीड़न के बढ़ते रूपों से हमारे लोकतंत्रों की प्रकृति और लचीलेपन को कम करने का खतरा है। आने वाले समय में हम इस मुद्दे से कैसे निपटेंगे, यह निर्णायक होगा।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में भारत की स्थिति

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 को मीडिया वॉचडॉग ग्रुप रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (media watchdog group Reporters Without Borders) द्वारा जारी किया गया है। नॉर्वे लगातार पांचवें वर्ष सूचकांक में शीर्ष पर रहा। रिपोर्ट में 132 देशों को “बहुत खराब”, “खराब” या “समस्याग्रस्त” करार दिया गया है।

180 देशों में भारत 142वें स्थान (India’s position in the World Press Freedom Index 2021) पर रहा। ब्राजील, मैक्सिको और रूस के साथ भारत को “खराब” श्रेणी में स्थान दिया गया था।

पेरिस स्थित रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स प्रतिवर्ष एक विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (world press freedom index) प्रकाशित करता है। सूचकांक 180 देशों में मीडिया के लिए उपलब्ध स्वतंत्रता के स्तर का मूल्यांकन करता है, जो सरकारों और अधिकारियों को प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ और उनकी नीतियों और विनियमों से अवगत कराता है।

क्या कहती है वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की रिपोर्ट? दुनिया भर में हुई भारत की आलोचना

रिपोर्ट में कहा गया है कि अपना काम ठीक से करने की कोशिश कर रहे पत्रकारों के लिए भारत दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है। 2016 में, भारत की रैंक 133 थी, जो 2020 में लगातार गिरकर 142 हो गई है। सरकार की “आलोचना करने की हिम्मत” करने वाले पत्रकारों के खिलाफ “बेहद हिंसक सोशल मीडिया नफरत अभियान” के लिए भारत की आलोचना दुनिया भर में हुई।

एक स्वतंत्र प्रेस क्यों जरूरी है? | Why is a free press necessary? मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्यों माना जाता है?

लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए विचारों का मुक्त आदान-प्रदान, सूचना और ज्ञान का मुक्त आदान-प्रदान, बहस और विभिन्न दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है। एक स्वतंत्र प्रेस अपने नेताओं की सफलताओं या विफलताओं के बारे में नागरिकों को सूचित कर सकता है। स्वतंत्र प्रेस लोगों की जरूरतों और इच्छाओं को सरकारी निकायों तक पहुंचाता है, सूचित निर्णय लेता है और परिणामस्वरूप समाज को मजबूत करता है। स्वतंत्र प्रेस विचारों की खुली चर्चा को बढ़ावा देता है जो व्यक्तियों को राजनीतिक जीवन में पूरी तरह से भाग लेने की अनुमति देता है।

फ्री मीडिया सरकार के फैसलों पर सवाल खड़ा करता है और उसे जवाबदेह बनाता है। हाशिये के लोगों की आवाज बनता है; जनता की आवाज होने के कारण स्वतंत्र मीडिया लोगों को राय व्यक्त करने का अधिकार देता है। इस प्रकार, लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया महत्वपूर्ण है। इन विशेषताओं के कारण, मीडिया को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।

प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?

प्रेस की स्वतंत्रता को खतरा का सबसे बड़ा खतरा (The greatest threat to the freedom of the press) फेक न्यूज़ है; नियमों के नाम पर सरकार का दबाव, फेक न्यूज की बमबारी और सोशल मीडिया का प्रभाव खतरनाक है। भ्रष्टाचार-पेड न्यूज, एडवर्टोरियल और फेक न्यूज स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया के लिए खतरा हैं।

पत्रकारों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा

संवेदनशील मुद्दों को कवर करने वाले पत्रकारों पर हत्याएं और हमले बहुत आम बात हैं। सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल नेटवर्क पर साझा और अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है।

‘फ्रीडम इन द वर्ल्ड 2021 (फ्रीडम हाउस, यूएस)’, ‘2020 ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट (यूएस स्टेट डिपार्टमेंट)’, ‘ऑटोक्रेटाइजेशन गोज़ वायरल (वी-डेम इंस्टीट्यूट, स्वीडन)’ जैसी रिपोर्ट्स ने भारत में पत्रकारों की धमकी को उजागर किया है। कॉर्पोरेट और राजनीतिक शक्ति ने मीडिया के बड़े हिस्से, प्रिंट और विजुअल दोनों को अभिभूत कर दिया है, जो निहित स्वार्थों की ओर ले जाता है और स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है।

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता सभी लोकतांत्रिक संगठनों की नींव में है। भारतीय संविधान अनुच्छेद 19 के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो भाषण की स्वतंत्रता आदि संबंधित है। प्रेस की आज़ादी भारतीय कानूनी प्रणाली द्वारा स्पष्ट रूप से संरक्षित नहीं है, लेकिन यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत निहित रूप से संरक्षित है। हालाँकि, प्रेस की स्वतंत्रता भी पूर्ण नहीं है।

भारतीय प्रेस परिषद अधिनियम 1978 के तहत स्थापित एक नियामक संस्था है। इसका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखना और भारत में समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखना और सुधारना है।

भारतीय प्रेस परिषद, एक नियामक संस्था, मीडिया को चेतावनी दे सकती है और नियंत्रित कर सकती है यदि उसे पता चलता है कि किसी समाचार पत्र या समाचार एजेंसी ने मीडिया नैतिकता का उल्लंघन किया है।

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन  को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए जो निजी टेलीविजन समाचार और करंट अफेयर्स ब्रॉडकास्टर्स का प्रतिनिधित्व करता है। मीडिया की स्वतंत्रता को कम किए बिना सामग्री में हेरफेर और फर्जी खबरों का मुकाबला करने के लिए मीडिया में विश्वास बहाल करने की आवश्यकता है।

यह महत्वपूर्ण है कि मीडिया सत्य और सटीकता, पारदर्शिता, स्वतंत्रता, निष्पक्षता और निष्पक्षता, जिम्मेदारी और निष्पक्षता जैसे मूल सिद्धांतों पर टिके रहे।

प्रियंका सौरभ

इस वक्त कोरोना से मृत्यु दर सबसे  ज्यादा ब्राज़ील में है, वहां भी अमेरिका की तरह नस्ली तानाशाही है

Jair Bolsonaro with Donald Trump

Currently, Brazil has the highest death rate from Corona, there is also racial dictatorship like America.

भारत में मीडिया फ्रांस के जन विद्रोह की खबर क्यों दबा रहा है ? | Why is the media in India suppressing the news of the French uprising?

अपने ताज़ा पोस्ट में न्यूयार्क से डॉक्टर पार्थ बनर्जी (Doctor Partha Banerjee from New York) ने कोरोना की आड़ में मुसलमानों के खिलाफ भारतीय सत्ता वर्ग के घृणा अभियान (Indian ruling class hatred campaign against Muslims under the cover of Corona) को निराधार बताया। उन्होंने साफ साफ लिखा कि यह गलत प्रचार है कि कोरोना मुसलमानों की वजह से फैला।

डॉ बनर्जी का कहना है कि मुसलमानों की वजह से कोरोना फैलता तो मुस्लिम देशों में कोरोना (Corona in Muslim countries) ज्यादा तेजी से फैलता। जबकि सच यह है कि एकमात्र ईरान ही ऐसा मुस्लिम देश है, जहां लोग कोरोना से काफी ज्यादा मरे। बाकी देशों में कोरोना से मरने वालों की संख्या ज्यादा है।

सबसे ज्यादा मौतें अमेरिका, इंग्लैंड और ब्राजील में हुई हैं। इटली, स्पेन और फ्रांस में हुई हैं। जो मुस्लिम देश नहीं हैं। हां नस्ली असमानता के शिकार रोजगार और चिकित्सा से वंचित अश्वेत ज्यादा मारे गए।

Jair Bolsonaro follows Donald Trump on coronavirus

डॉ बनर्जी के मुताबिक इस वक्त कोरोना से मृत्यु दर सबसे  ज्यादा ब्राज़ील में है। वहां भी अमेरिका की तरह नस्ली तानाशाही है। ब्राजील के तानाशाह बोलसोनारो (Brazilian dictator Bolsonaro) ट्रम्प की तरह अश्वेतों और गरीबों के सफाये की नीति पर चल रहे हैं। पृथ्वी की सेहत के लिए जरूरी बारिश लाने वाले जंगल को तबाह कर रहे हैं और कोरोना से निपटने के बहाने नागरिकों के अधिकार, कायदा कानून और मानवाधिकार खत्म करने के लिए सेना को उतारने की बात कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका में नस्ली भेदभाव के खिलाफ जो आंदोलन दुनिया भर में फैल रहा है, वह इसी नरसंहार संस्कृति के खिलाफ है। फ्रांस में तो फ्रांसीसी क्रांति की तरह मजदूर और मेहनतकश तबका सड़कों पर हैं और दुनिया भर में बुद्धिजीवी उनके समर्थन में सड़कों पर हैं। भारत में मीडिया फ्रांस के जन विद्रोह की खबर (News of french mass rebellion) दबा रहा है। अमेरिका, इंग्लैंड और समूचे यूरोप में औपनिवेशिक नस्ली प्रतीकों को हटाने की मुहिम तेज़ है और मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं।

गौरतलब है कि साहित्य और कला में विशुद्धता और विद्वता की शर्त की वजह से नस्ली भेदभाव की बात पर्दे में हैं। तो जीवन के हर क्षेत्र में वंचित वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। समूचा बुद्धिजीवी वर्ग रंग बिरंगी राजनीति के सत्ता वर्ग से नाभि नाल की तरह नत्थी है। राजनीतिक विरोध के अलावा वे बुनियादी बदलाव के लिए कतई तैयार नहीं है और हर मुद्दे को कांग्रेस भाजपा की राजनीति के दायरे में रखते हुए असमानता और अन्याय, नस्ली व्यवस्था को कायम रखकर अपना वर्ग हित जाति हित एक दूसरे को फासिस्ट बताकर साबित कर रहे हैं।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास

महानगरों के ऐश-ओ-आराम में सुरक्षित यह कुलीन बुद्धिजीवी वर्ग गरीबों, मजदूरों की बात करते हुए महान साहित्य और महान कला का सृजन तो कर सकते हैं लेकिन उनकी सारी कोशिश यथास्थिति को बनाये रखने की है।

The underprivileged of India do not have an organic intellectual of their own

भारत के वंचितों का अपना कोई ऑर्गेनिक बुद्धिजीवी वर्ग नहीं है जो उनके हक हक़ूक़ की लड़ाई में उनके साथ सड़क की लड़ाई में अमेरिका और यूरोप की तरह या बांग्लादेश, नेपाल की तरह भी खड़ा हो।

डॉ बनर्जी विश्वविख्यात शिक्षाविद हैं और मशहूर अमेरिकी चिंतक नोआम चॉम्स्की के अंतरंग हैं। वे खुद चाहते हैं कि हिंदी समाज दुनिया की हलचल और फासिस्ट तानाशाही के असली चेहरे को पहचाने।

पलाश विश्वास

बंगला में लिखा डॉ बनर्जी का ताजा अपडेट
डॉक्टर पार्थ बनर्जी (Dr. Partha Banerjee) विश्वविख्यात शिक्षाविद हैं और मशहूर अमेरिकी चिंतक नोआम चॉम्स्की के अंतरंग हैं।
डॉक्टर पार्थ बनर्जी (Dr. Partha Banerjee) विश्वविख्यात शिक्षाविद हैं और मशहूर अमेरिकी चिंतक नोआम चॉम्स्की के अंतरंग हैं।

ব্রেজিল এখন করোনাভাইরাসে সর্বাপেক্ষা দ্রুত মৃত্যুর হার দেখছে। এই মুহূর্তে আমেরিকার মৃত্যুসংখ্যার পরেই (১১৬,০৬৩) দ্বিতীয় সর্বোচ্চ মৃত্যুর স্থানে ব্রিটেন (৪১,২৭৯) ও ব্রেজিল (৪১,০৫৮)। সেখানে শাসকরা এবারে মিলিটারি নামানোর কথা ভাবছে জনরোষ সামাল দেওয়ার জন্যে। পুরোনো খেলা।

কেন ব্রেজিলের এই অবস্থা হলো? কারণ সেদেশের ক্ষমতা এখন ট্রাম্পের আর এক অবতারের হাতে। ভুল বললাম, ঈশ্বরের অবতার হয়। ট্রাম্প ঈশ্বর নন। মানুষকে যদি ঈশ্বর সৃষ্টি করে থাকেন, তাহলে আর একজন আছেন, যিনি মৃত্যুর, ভয়ের, বিভীষিকার, রোগের, ঘৃণা, হিংসার, মিথ্যার  এজেন্ট। সর্বনাশের প্রতিনিধি। ইনি তাই। তার অবতার বলসেনারো। যিনি আমাজন রেনফরেস্ট ধ্বংস করে দিচ্ছেন। আদিম উপজাতিগুলোকে শেষ করে দেওয়ার খেলায় মেতেছেন।

ভারতেও তাদের অবতাররাই এখন রক্ষক ও ভক্ষক।

ব্রিটেনে কেন এই শোচনীয় অবস্থা ঠিক আমেরিকার মতো? কারণ এই সবগুলো দেশেই বিজ্ঞানবিরোধী, নিষ্ঠুর, কেবলমাত্র মুনাফাকেন্দ্রিক, নিয়ন্ত্রণহীন ইঙ্গ-মার্কিন মডেলের পুঁজিবাদ ক্ষমতায় গেড়ে বসেছে। যে সিস্টেমে সাধারণ মানুষের জীবনের কোনো দাম নেই।

অথচ, যেসব দেশে করোনাভাইরাস তেমনভাবে তার করাল থাবা বসাতে পারেনি, তাদের কথা আমাদের মিডিয়া বলেনা। যেমন, জাপান ও ভিয়েতনামের মতো ঘনবসতিপূর্ণ জনসংখ্যার দেশ। জাপানে মৃত্যু ৯২০, ভিয়েতনামে ০, জনবহুল কম্বোডিয়া ও লাওসে ০, বর্মাতে ৬। যেমন, নেপাল — মাত্র ১৬। যেমন, কিউবা (৮৪), অথবা ভেনেজুয়েলার (২৩) মতো সোশ্যালিস্ট দেশ। অথবা, ভারতে কেরালার মতো রাজ্য।

অথবা, বিভিন্ন পুঁজিবাদী দেশ — যেখানে মার্কিন মডেল বর্জন করে এক জনমুখী, কল্যাণকামী রাষ্ট্র গড়ে তোলা হয়েছে। যেমন, ক্যানাডা (মৃত্যুসংখ্যা ৮০০০), নরওয়ে (২৪২), আয়ারল্যান্ড (১৭০০), অস্ট্রেলিয়া (১০২), নিউজিল্যান্ড (২২), জার্মানি (৮৮০০), এবং আফ্রিকার প্রায় সব দেশ।

জনসংখ্যার ধুয়ো চলবেনা, কারণ বিপুল জনসংখ্যার জাপান, ভিয়েতনাম, বর্মা, মরক্কো, মিশর এসব দেশে করোনাভাইরাস মহামারীর চেহারা নেয়নি। আমেরিকায় নিয়েছে। ব্রেজিল, ব্রিটেনে নিয়েছে। কারণ সেখানে রাষ্ট্র মানুষের দায়িত্ব অস্বীকার করেছে। অর্থনীতিকে দেউলিয়া করে অতি ধনিকশ্রেণীর হাতে ও কর্পোরেশনগুলোর হাতে তুলে দিয়েছে।

এই আলোচনাটা মিডিয়া করছেনা। এবং হোয়াটস্যাপ ইউনিভার্সিটি ও আইটি সেলের গোয়েবলসরা মিথ্যা প্রোপাগাণ্ডা ছড়িয়ে যাচ্ছে আর এক ভাইরাসের মতো। মানুষ কোনো কিছু যাচাই না করে তাদের কথাই গিলছে।

আর ও হ্যাঁ, একটা কথা বলা হয়নি। মুসলিম দেশগুলোতে কিন্তু ইরান ছাড়া প্রায় সর্বত্রই মৃত্যুসংখ্যা নগণ্য। ওই লাইনের কুৎসাও তাই ধোপে টিঁকবে না।

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#ParthaBanerjeePost

June 12, 2020

Brooklyn, New York