कौन बनाता है मुख्यमंत्री? मुख्यमंत्री चुनने में विधायकों की भूमिका क्या है?

Since the beginning of parliamentary democracy in the country, the nomination of Chief Ministers has been taking place.kaun banaata hai mukhyamantree? mukhyamantree chunane mein vidhaayakon kee bhoomika kya hai?

कौन बनाता है मुख्यमंत्री,मुख्यमंत्री चुनने में विधायकों की भूमिका,इंदिरा गांधी की पत्रकार वार्ता,पंडित नेहरू के समय मुख्यमंत्री

नेहरूजी के जमाने में मुख्यमंत्री नामांकित होते थे, इंदिरा ने कुबूला था

तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी (The then President Neelam Sanjiva Reddy) ने एक बार कहा था कि पंडित नेहरू के समय मुख्यमंत्री (Chief Minister at the time of Pandit Nehru) नामजद नहीं होते थे.

इंदिरा गांधी की पत्रकार वार्ता

नीलम संजीव रेड्डी की इस टिप्पणी के कुछ दिन बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भोपाल आई थीं. उनकी पत्रकार वार्ता (Indira Gandhi’s press conference) आयोजित थी. पत्रकार वार्ता में मैंने पूछा कि अभी हाल में राष्ट्रपति महोदय ने यह टिप्पणी की थी कि नेहरूजी के जमाने में मुख्यमंत्री नामांकित नहीं होते थे.

उत्तर देते हुए उन्होंने कहा क्या नेहरूजी को मुझसे ज्यादा कोई जानता था?’

स्पष्ट है कि उनका कहना था कि नेहरूजी के जमाने में भी मुख्यमंत्री नामांकित होते थे. इससे साफ है कि जब से देश में संसदीय प्रजातंत्र की शुरूआत हुई है तभी से मुख्यमंत्रियों का नामांकन ही होता आया है.

Sardar Patel had an important role in choosing the heads of Congress governments.

आजादी के पूर्व भी हमारे देश में निर्वाचित राज्य सरकारें बनीं थीं. उस समय बहुसंख्यक राज्यों में कांग्रेस की सरकारें गठित हुई थीं. उस दौरान राज्य सरकार के मुखिया को प्रधानमंत्री कहते थे.

कांग्रेसी सरकारों के मुखियाओं को चुनने में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी. आजादी के बाद राज्य सरकारों के प्रधानों को मुख्यमंत्री कहा जाने लगा. सैद्धांतिक दृष्टि से मुख्यमंत्री को चुनने का अधिकार निर्वाचन के माध्यम से बने विधायकों को दिया गया था परंतु वास्तविकता में प्रायः विधायक उसे ही मुख्यमंत्री चुनते थे जिसे केन्द्रीय नेतृत्व का समर्थन प्राप्त होता था.

आजादी के बाद के शुरूआती दिनों में कांग्रेस के दिग्गज नेता मुख्यमंत्री बनते थे. उनमें से अनेक ऐसे थे जो केन्द्रीय नेतृत्व के समर्थन के बिना ही मुख्यमंत्री बनने की क्षमता रखते थे. ऐसे दिग्गजों में बंगाल के विधानचन्द्र राय, बिहार के श्रीकृष्ण सिन्हा, उत्तरप्रदेश के गोविंद वल्लभ पंत, सेन्ट्रल प्रांत और बरार के एन. बी. खरे और कुछ समय बाद मुख्यमंत्री बनने वाले रविशंकर शुक्ल शामिल थे.

उस दौरान भले ही ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री बनता था जिसे हाईकमान का समर्थन प्राप्त हो परंतु चुनाव की औपचारिकता पूरी की जाती थी. बाकायदा नेता चुनने के लिए विधायक दल की बैठक होती थी, बैठक के दौरान मतदान होता था. मतदान केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षक की मौजूदगी में होता था. कभी-कभी निर्विरोध चुनाव भी हो जाता था.

परंतु धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलती गईं. जहां तक मध्यप्रदेश का सवाल है, मुख्यमंत्री के चुनाव की प्रक्रियाओं में परिवर्तन होते गए.

सन् 1956 में नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ. गठन के बाद रविशंकर शुक्ल नए प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उन्हें सिर्फ इसलिए मुख्यमंत्री बनाया गया क्योंकि वे मध्यप्रदेश में शामिल होने वाली सबसे बड़ी इकाई के मुख्यमंत्री थे. परंतु दुर्भाग्य से मुख्यमंत्री बनने के दो माह के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गई. वे 1 नवबंर 1956 को मुख्यमंत्री बने और 31 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई.

उनकी मृत्यु के बाद डॉ. कैलाशनाथ काटजू को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया. डॉ काटजू का मध्यप्रदेश से मात्र इतना संबंध था कि उनका जन्म मध्यप्रदेश में हुआ था. उनकी कर्मभूमि उत्तरप्रदेश थी. उत्तरप्रदेश में रहते हुए उन्होंने आजादी के आन्दोलन में भाग लिया था. वे सन् 1962 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. सन् 1962 में हुए चुनाव में वे पराजित हो गए. उस दौरान यह आरोप लगाया गया कि उन्हें हरवा दिया गया था.

इसके बाद श्री भगवंतराव मंडलोई को मुख्यमंत्री बनाया गया. परंतु इस बीच डॉ. काटजू एक उपचुनाव जीतकर पुनः विधायक बन गए थे. इसी दौरान देश में कामराज योजना लागू कर दी गई. उस समय कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष थे. इस योजना के अंतर्गत, जिसका नाम उनके नाम पर था, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ा. इन मुख्यमंत्रियों में मंडलोईजी भी शामिल थे.

अब सभी प्रदेशों में यह बड़ा सवाल पैदा हुआ कि अगला मुख्यमंत्री कौन हो? मध्यप्रदेश में भी यह कठिन प्रश्न था. मध्यप्रदेश में कांग्रेस दो शक्तिशाली गुटों में विभाजित थी. एक गुट का नेतृत्व मूलचन्द देशलहरा और बाबू तख्तमल जैन कर रहे थे और दूसरे गुट के नेता थे पंडित द्वारिकाप्रसाद मिश्र. पंडित मिश्र एक उपचुनाव में विधायक निर्वाचित हुए थे. तख्तमल-देशलहरा गुट ने तख्तमलजी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. मिश्रजी के गुट ने यह तय किया कि यदि निर्वाचन निर्विरोध होता है तो डॉ. काटजू उम्मीदवार होंगे और यदि चुनाव होता है तो पंडित मिश्र उम्मीदवार होंगे. इस पूरी प्रक्रिया में केन्द्रीय नेतृत्व तटस्थ भूमिका में था.

जहां तक मुझे याद पड़ता है जगजीवन राम केन्द्रीय पर्यवेक्षक बनकर आए थे. चुनाव में पंडित मिश्र विजयी हुए. उनका चुनाव सन् 1963 में हुआ था और वे सन् 1967 में हुए आम चुनाव के बाद पुनः मुख्यमंत्री बने. परंतु उसी वर्ष जुलाई माह में कांग्रेस के 36 विधायक दलबदल कर गए. इसके बाद संविद की सरकार बनी और गोविंदनारायण सिंह मुख्यमंत्री बने. परंतु सन् 1969 में संविद सरकार अपदस्थ हो गई. उसके बाद कांग्रेस की सरकार बनी. मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव हुआ. इस बीच उच्च न्यायालय ने चुनाव याचिका पर मिश्रजी के विधायक के चुनाव को निरस्त करने का फैसला दे दिया. इसके नतीजे में वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके.

परंतु उन्होंने अपनी ओर से कुंजीलाल दुबे को मैदान में उतारा. श्यामाचरण शुक्ल ने उनका विरोध किया. चुनाव में शुक्ल जीत गए. इस चुनाव में भी हाईकमान ने लगभग तटस्थता की भूमिका निभाई.

थोड़े समय बाद शुक्ल के विरूद्ध प्रचार प्रारंभ हो गया. शुक्ल ने सरकार को अलीबाबा चालीस चोर की सरकार कहकर बदनाम किया गया. अंततः उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. उनके स्थान पर प्रकाशचन्द सेठी को मुख्यमंत्री बनाया गया. सेठी उस समय केन्द्र में मंत्री थे. वे पूरी तरह से केन्द्रीय नेतृत्व अर्थात श्रीमती इंदिरा गांधी के नामिनी थे. जहां तक मुझे याद है उनका चुनाव दिल्ली में हुआ था.

इस बीच देश में आपातकाल लागू हो गया और दिसंबर 1975 में श्यामाचरण शुक्ल को पुनः मुख्यमंत्री बना दिया गया.

शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाने के निर्णय ने सबको आश्चर्यचकित कर दिया. पहले सेठी जी और फिर श्यामाचरण शुक्ल की नियुक्ति पूरी तरह श्रीमती इंदिरा गांधी की मर्जी से हुई थी.

बांग्लादेश के निर्माण के बाद इंदिराजी एक बहुत शक्तिशाली नेता के रूप में उभर आईं थीं. कांग्रेस में हर निर्णय उनकी मर्जी से होता था. आजाद भारत के इतिहास में कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व कभी इतना शक्तिशाली नहीं रहा. आपातकाल के बाद देश में चुनाव हुए. चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई.

अनेक पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया और इसके झंडे तले लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ा. मध्यप्रदेश विधानसभा में जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ और इसके जनसंघ धड़े के सबसे अधिक विधायक चुनकर आए. इसलिए जनसंघ के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनना था. उस समय वीरेन्द्र कुमार सकलेचा स्वाभाविक च्वाइस थे. परंतु जनता पार्टी के गैर-जनसंघ घटकों को सकलेचा पसंद नहीं थे क्योंकि उनकी छवि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कट्टर स्वयंसेवक की थी. इसलिए उन्होंने न केवल उनका विरोध किया वरन् सार्वजनिक रूप से कैलाश जोशी के प्रति अपना समर्थन घोषित किया. अंततः सकलेचाजी मुख्यमंत्री नहीं बन सके. इस तरह केन्द्रीय नेतृत्व की मर्जी के विरूद्ध जोशीजी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला.

जोशीजी का रवैया न तो केन्द्रीय नेतृत्व को पसंद आया और ना ही प्रांतीय नेतृत्व को. जोशीजी के नेतृत्व को कमजोर करने के सघन प्रयास प्रारंभ हो गए. इस दरम्यान वे अस्वस्थ भी हो गए और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद सकलेचा मुख्यमंत्री बने.

सन् 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त जीत हुई. लोकसभा चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए सकलेचाजी ने मुख्यमंत्री का पद त्याग दिया और श्री सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने. परंतु वे लगभग एक माह तक ही मुख्यमंत्री रह सके क्योंकि अन्य राज्यों के साथ मध्यप्रदेश में भी विधानसभा बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया.

इसके कुछ दिन बाद विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस की विजय हुई. इस बार मुख्यमंत्री पद के लिए भारी खींचतान हुई. टक्कर उतनी ही जबरदस्त थी जितनी बाबू तख्तमल जैन और पंडित डी. पी. मिश्र के बीच हुई थी. मुख्यमंत्री पद के लिए मुख्य रूप से अर्जुन सिंह और शिवभानु सोलंकी मैदान में थे. तीसरे उम्मीदवार कमलनाथ थे. कांग्रेस विधायकदल की बैठक में मतदान हुआ और सोलंकी को बहुमत का समर्थन मिला. उस समय कांग्रेस नेतृत्व में संजय गांधी की निर्णायक भूमिका थी. इस बीच कमलनाथ ने उन्हें प्राप्त मतों को अर्जुन सिंह को ट्रान्सफर कर दिया. इसके बाद संजय गांधी की तरफ से अर्जुन सिंह को विजयी घोषित कर दिया गया. इस तरह एक बार फिर केन्द्रीय नेतृत्व की मर्जी से मुख्यमंत्री चुना गया.

अर्जुन सिंह पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहे. सन् 1985 में हुए चुनाव के बाद वे पुनः मुख्यमंत्री बने. किंतु दुबारा मुख्यमंत्री बनने के अगले ही दिन अत्यधिक नाटकीय तरीके से अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया और पूरी तरह से केन्द्रीय नेतृत्व के समर्थन से मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री बने.

सन् 1985 से लेकर 1989 के बीच एक बार वोराजी को हटाकर अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया और उसके कुछ माह बाद उच्च न्यायालय द्वारा एक मामले में अर्जुन सिंह के विरूद्ध की गई टिप्पणी के कारण अर्जुन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और वोराजी दुबारा मुख्यमंत्री बने.

सन् 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार होने के कुछ दिन बाद वोराजी ने इस्तीफा दे दिया और कुछ महीने श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने. सन् 1990 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (जनसंघ का नया अवतार) ने अपने दम पर विधानसभा में बहुमत हासिल किया और पार्टी हाईकमान के समर्थन से सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने.     

सन् 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मध्यप्रदेश की सरकार बर्खास्त कर दी गई और एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लागू होने से पटवा को मुख्यमंत्री का पद खोना पड़ा. एक वर्ष तक राष्ट्रपति शासन लागू रहने के बाद विधानसभा चुनाव हुए. चुनाव में कांग्रेस विजयी हुई. विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री का फैसला हुआ. मुकाबला दिग्विजय सिंह और श्यामाचरण शुक्ल के बीच हुआ. दिग्विजय सिंह की जीत हुई. इस चुनाव में केन्द्रीय नेतृत्व की भूमिका तटस्थता की थी.

इस दौरान दबी जुबान से यह बात फैलाई गई कि प्रधानमंत्री नरसिंहराव लगभग किसी का साथ नहीं दे रहे हैं. उस समय सभी का यह सोच था कि शायद नरसिंहराव श्यामाचरणजी को समर्थन देंगे. इस अनुमान का आधार यह था कि आजादी के आंदोलन के दौरान वे नागपुर में मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के घर छिपकर रहे थे. उन्हें उस रियासत से बहिष्कृत कर दिया गया था जहां उनका परिवार रहता था.

दिग्विजय सिंह दस वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे. यह पहली बार था जब मध्यप्रदेश में कोई कांग्रेसी लगातार 10 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहा हो.

दस वर्ष की अवधि के बाद  सन् 2003 में हुए चुनाव में भाजपा को जबरदस्त बहुमत मिला और उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं. उनका चुनाव मात्र एक औपचारिकता थी क्योंकि चुनाव के मैदान में वे मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में लड़ीं थीं. परंतु वे अधिक समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाईं क्योंकि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व उनसे प्रसन्न नहीं था. उनके हटने के बाद बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने. परंतु रहस्यपूर्ण कारण से केन्द्रीय नेतृत्व ने क़रीब एक वर्ष बाद उन्हें हटा दिया.

उसके बाद नेतृत्व, विशेषकर लालकृष्ण आडवाणी की कृपा से शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने. सन् 2018 के विधानसभा चुनाव तक, तेरह वर्ष से अधिक अवधि तक, लगातार मुख्यमंत्री रहकर उन्होंने दिग्विजय सिंह का रिकार्ड तोड़ दिया.

सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बने. उस समय किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे इतनी जल्दी शिवराज दुबारा मुख्यमंत्री बन जाएंगे. किंतु ज्योतिरादित्य सिंधिंया ने अपने समर्थक विधायकों सहित कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ले ली और कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई. कमलनाथ ने इस्तीफा दिया और 15 माह बाद शिवराज सिंह एक बार फिर मुख्यमंत्री बने.

इस विवरण से यह सिद्ध होता है कि अधिकतर अवसरों पर मुख्यमंत्री के चुनाव में विधायकों की भूमिका नगण्य रही है. परंतु यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में केन्द्रीय नेतृत्व की निर्णायक भूमिका होती है.      

एल. एस. हरदेनिया

अजब गजब मध्यप्रदेश : जिंदगी में कभी शुमार नहीं हुए, अब मौत में भी गिनती में नहीं

covid 19

संसदीय लोकतंत्र या सूचित, लोकतांत्रिक, सभ्य समाज के हर नियम, हर परम्परा को तोड़ना भाजपा का सबसे प्राथमिक मिशन

भाजपा और उसकी सरकारों का सचमुच में कोई सानी नहीं है। आप एकदम अति पर जाकर इनके द्वारा किये जाने वाले खराब से खराब काम की कल्पना कीजिये वे अगले ही पल उससे भी ज्यादा बुरा कुछ करते हुए नजर आएंगे। आप उनके आचरण की निम्नतर से निम्नतम सीमा तय कीजिये वे पूरी ढिठाई के साथ उससे भी मीलों नीचे का बर्ताव करते पाए जायेंगे। लगता है जैसे इस पार्टी ने झूठ, फरेब और छल की सारी सीमाएं लांघना और इस मामले में अपने ही रिकार्ड्स को तोड़ना अपना लक्ष्य बनाकर रखा हुआ है। संसदीय लोकतंत्र या सूचित, लोकतांत्रिक, सभ्य समाज के हर नियम, हर परम्परा को तोड़ना जैसे इनका सबसे प्राथमिक मिशन है। यह सिर्फ एक तरह की लत भर नहीं है, वह तो है ही, सैडिस्ट – परपीड़क – सिंड्रोम भी है; इन्हें जनता को दुखाने में ही सुख मिलता है। इस मामले में वे अखाड़े में पूर्णतः आश्वस्त होकर उतरते है। क्योंकि फ़िल्मी खलनायक जगीरा की तरह उन्हें पक्के से पता है कि उसका मुकाबला करने वाले बाकी चाहें जितनी बल, साहस, ताकत और शक्ति जुटा लें ; उसकी ये वाली विशेषताएं कहाँ से लायेंगे।

कोरोना की दूसरी लहर (second wave of corona) में मोदी की अगुआई वाली केंद्र तथा भाजपा की राज्य सरकारों की विषाणु-प्रियता की जो कारगुजारियां सामने आयी उन्हें देश और दुनिया ने देखा भी, इसके दोषियों को दुत्कारा भी। मगर अपनी नरसंहारी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए भाजपा सरकारों ने जो किया वह पिछले महीने सम्मानजनक अंतिम संस्कार के इंसानी अधिकार से वंचित रहे भारतीयों की लाशों से पटी गंगा और उसके रेत में दबी मृत देहों की फसल ने अपनी जुगुप्सा पैदा करती तादाद से सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया था। मगर जैसा कि ऊपर कहा गया है कि वे खुद की नीचाई को भी चुनौती मानते हैं और जल्द से जल्द खुद ही उसे तोड़ देते हैं। यही हुआ भी।

भाजपा नीत सरकारों ने महामारी से निपटने में अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए मौतों की वास्तविक संख्या को छुपाने का एक नया ही कारनामा कर दिखाया।

जन्म मृत्यु का हिसाब रखने वाले सरकारी पंजीकरण विभाग सीआरएस के मुताबिक इस साल के केवल मई महीने में मध्यप्रदेश में करीब 1 लाख 64 हजार 348 लोगों की मौत हुई है। अप्रैल-मई 2021 में कोविड-19 से हुई मौतों के सरकारी आंकड़ों से 40 गुना अधिक मौतें दर्ज हुई हैं। इसी कालावधि के पिछली दो वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक़ मई 2019 में मध्यप्रदेश में 31 हजार और मई 2020 में 34 हजार जानें गईं थीं। जबकि राज्य सरकार के मुताबिक जनवरी से मई 2021 के बीच सिर्फ 4,461 कोविड मौतें हुई है। सीआरएस – सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम – के तहत ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया देशभर में हुई जन्म और मृत्यु का हिसाब रखता है। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को खुद सीआरएस पर जन्म और मृत्यु का डेटा जमा करना होता है।

अब तक के औसत के हिसाब से भारत में 86 फ़ीसदी और मध्य प्रदेश में 80 फ़ीसदी मौतें यहां दर्ज की जाती हैं। सिर्फ सीआरएस का डाटा ही औसत मौतों की संख्या और उसमें आये बदलावों का सही अनुमान देता है। यह हर मौत का रिकॉर्ड रखता है। चाहे मौत कहीं भी और किसी भी कारण से मौत हुई हो।

सीआरएस रिपोर्ट के मुताबिक अकेले राजधानी भोपाल में अप्रैल-मई 2019 में 528 मौतें हुई थी, 2020 में इसकी संख्या 1204 थी, लेकिन साल 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के बीच कुल 11045 लोगों की मौतें हुई हैं। सामान्य दिनों में होने वाली मौतों से यह दो हजार फीसदी ज्यादा है। पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा मौत इंदौर में हुई है। यहां अप्रैल-मई 2021 में 19 हजार लोगों की जान गई है। भोपाल, इंदौर के शमशानों में लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूची और कतारबद्ध शवों की सचित्र ख़बरों से वे अखबार भी पटे हुए थे जो सरकार की निगाह में काफी सज्जन, सुशील और गोद में ही सुखी रहने वाले अबोध माने जाते हैं।

कुल मिलाकर यह कि पिछले साल की तुलना में इस साल जनवरी से मई के बीच 1.9 लाख ज्यादा मौतें हुई हैं। हालांकि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा ही है। क्योंकि दूरदराज के गाँवों की मौतों का इंदराज सीआरएस के आंकड़ों में शामिल हुआ होगा इस पर यकीन करने की कोई वजह नजर नहीं आती।

इन पंक्तियों के लेखक ने पिछले सप्ताह अमरकंटक की पहाड़ियों के बीच बसे गाँवों के आदिवासियों के साथ चर्चा में पाया था कि ऐसा कोई गाँव या टोला नहीं था जहां अप्रैल-मई में लगभग हर सप्ताह कोई न कोई मौत न हुयी हो।

मरने वालों की गिनती में गड़बड़ी करने वाला मध्यप्रदेश अकेला नहीं है। लाख छुपाने के बावजूद सामने आये तथ्यों और प्रमाणों से यह साबित हो गया है कि समूचे गुजरात में जितनी मौतों – करीब साढ़े तीन हजार – का दावा मोदी के गुजरात की मोदी की पार्टी की सरकार कर रही थी लगभग उतनी – 3100 से ज्यादा – मौतें तो अहमदाबाद के सिर्फ एक अस्पताल में ही हुयी थीं।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविद के शहर उत्तरप्रदेश के कानपुर में अकेले एक दिन में सामान्य दिनों की तुलना में पांच गुना से ज्यादा दाहसंस्कार हुए – औसत संख्या से कोई 400 ज्यादा शव जलाये गए जबकि सरकारी आंकड़ों में इस दिन कोविड-19 से मरने वालों की संख्या सिर्फ 3 बताई गयी। इसी तरह के झूठों के उजागर होने पर हरियाणा के संघी मुख्यमंत्री खट्टर, “जाने वाले कभी नहीं आते” का तत्वज्ञान बघार चुके हैं।

कर्नाटक, आसाम से बिहार तक मौतों की वास्तविक संख्या छुपाने की यह चतुराई एक जैसी है। इस कदर दक्षता और भक्ति भाव के साथ अमल में लाई गयी है जैसे सबको ऐसा करने के लिए शिक्षित, दीक्षित और निर्देशित किया गया हो।

मौतें और उनमें अचानक इतनी ज्यादा बढ़त सिर्फ संख्या के इधर उधर होने या तात्कालिक रूप से झांसा देकर “पॉजिटिविटी अनलिमिटेड” का स्वांग रचाने भर का मामला नहीं है। इसका बची हुयी जिंदगियों की सलामती के साथ गहरा रिश्ता है। चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से यह इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि वे जान समझ सकें कि इनका कारण क्या है और उसके आधार पर भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए समुचित कदम और इलाज ढूंढा जा सके। यदि सरकारें इन मौतों को कोविड 19 की महामारी से हुयी मौत नहीं मानती तब तो यह पता लगाना और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर ऐसी कौन सी अदृश्य और अब तक अनचीन्ही बीमारी थी जो इस महामारी का कारण बनी। मगर यह काम शुरू तो तब होगा न जब उन मौतों को मौत माना जाएगा।

शुरू में कुछ धीरे धीरे – कोरोना की दोनों लहरों के बीच कुछ ज्यादा तेजी के साथ लोगों ने समझना शुरू कर दिया है कि ज्यादा मारक और संहारक कारपोरेटी हिंदुत्व का वह विषाणु है जो बाकी महामारियों के विषाणुओं की आमद निर्बाध और निर्विघ्न सुनिश्चित करने के लिए द्वारपाल बना डटा है। जो सिर्फ आज के भारतीयों की जान के लिए ख़तरा भर नहीं है – अगर उसकी चली तो – अगली पीढ़ियों का जीना मुहाल करने के लिए तत्पर और तैयार बैठा है

जैसा कि कहा जाता है; जानकारी बचाव की शुरुआत होती है। बाकी का काम इसके बाद शुरू होता है। जिसमें यही जानकारी एक हथियार बन जाती है। क्यूँकि दर्द जब हद से गुजरता है तो दवा हो जाता है।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

भाजपा राज में अस्पतालों की दुर्दशा, एनआरआई सोशल एक्टिविस्ट का शिवराज को खुला पत्र हुआ वायरल

maya vishwakarma

Plight of hospitals under BJP rule, NRI social activist’s open letter to Shivraj goes viral

नई दिल्ली, 17 अप्रैल 2021. देश में कोरोना की दूसरी लहर कहर बरपा रही है। एक साल तक ताली थाली बजवाने वाली सरकार इस कोरोना कहर में लापता दिख रही है। 21 दिन में कोरोना को हराने और 150 देशों को मदद करने का दंभ भरने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कुछ बोल नहीं रहे हैं। देश भर से अस्पतालों और श्मशानों से भयावह खबरें आ रही हैं। इस बीच कैलीफोर्निया में रहने वाली मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले की निवासी सोशल एक्टिविस्ट माया विश्वकर्मा का मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखा खुला पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। उनका भोपाल के हमीदिया हॉस्पीटल के कोरोना वार्ड की दुर्दशा (Plight of corona ward of hamidia hospital Bhopal)पर एक वीडियो भी वायरल हो गया जिसे सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू (Justice Markandey Katju, retired judge of the Supreme Court) ने भी शेयर किया।

माया विश्वकर्मा की फेसबुक पोस्ट पर स्वतंत्र पत्रकार रामकुमार विद्यार्थी ने टिप्पणी की –

“लगातार लड़ें या बीमारी का इलाज कराएं मैं खुद यहां 1 माह तक रहा हूँ सिस्टम इतना गैर जवाबदेह है कि पूछिये मत जबकि बाजू में बिल्डिंगें बन ही रही हैं शायद उनके उद्घाटन का इन्तेजार होगा ।”

पहले पढ़िए माया विश्वकर्मा का खत फिर देखिए वीडियो

“मुख्यमंत्री के नाम खुला पत्र।

आदरणीय मुख्यमंत्री जी मेरा नाम माया विश्वकर्मा है और मैं मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले की निवासी हूँ विगत बारह वर्षो से अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में रहती हूँ मेरे गृह निवास के क्षेत्र की हालात लगातार देखती आयी हूँ फिर लगा कि यहाँ कुछ सामाजिक कार्य करना चाहिए शिक्षा, स्वस्थ और महिलाओं पर पिछले पाँच साल से सुकर्मा फॉउण्डेशन { Sukarma Foundation – सुकर्मा फाउंडेशन}की अध्यक्ष और संस्थापक के रूप में ज़िले में कार्यरत हूँ।

पिछले साल जब से कोरोना आया है हम लगातार राहत का कार्य कर रहे है और अपने टेली मेडिसिन प्राथमिक स्वस्थ मेहरागाँव केंद्र के जरिये स्वस्थ सेवायें भी दे रहे है।

पिछले हफ्ते हमारी 12 वर्षीय बिटिया की रिपोर्ट पॉजिटिव आयी और उसे चिकनपॉक्स भी हो गया जिसके चलते हम उसे भोपाल के हमीदिया अस्पताल ले गए।  बिटिया कोरोना पॉजिटिव थी पर वो वार्ड में अकेले नहीं रह सकती थी इसलिए डॉक्टर ने मुझे भी साथ में सावधानी के साथ अनुमति दे दी। हम लोग हमीदिया के पाँच नंबर वार्ड में थे जिसमें करीब 40 और कोरोना मरीज थे जिसमें एक पंद्रह दिन का बच्चा अपनी माँ के साथ और एक छह साल का बच्चा अपने माता पिता के साथ था। इस पत्र के माध्यम से मैं अपना तीन दिन का अनुभव लिख रही हूँ जो मैंने अस्पताल में अपनी आँखों से देखा।

हम जब अस्पताल पहुंचे तो हमारे पास रेफेरल पर्ची थी जिस पर लिखा हुआ था कोरोना पॉजिटिव और चिकनपॉक्स बुखार (१०४  डिग्री) इस आधार पर हमारी बच्ची का दाखिला हुआ मगर दाखिला होने के बाद ना तो किसी डॉक्टर नर्स ने दोबारा तापमान नापा और ना ही कोरोना पॉजिटिव कन्फर्म करने के लिए दोबारा रैपिड टेस्ट किया सिर्फ ऑक्सीजन लेवल देखा जो नार्मल रेंज में आया। सीधा एडमिट कर चिकेनपॉक्स बुखार की दवा देना शुरू कर दिया। हमको बताया गया कि अब अगले दिन से ब्लड टेस्ट शुरू होंगे। अगले दिन करीब १२ बजे पीडिअट्रिशन आयीं और ब्लड सैंपल लिए जिसकी रिपोर्ट दूसरे दिन आयी जो काफी हद तक नार्मल थी इसके बाद X-Ray या CT-Scan होना था। दुर्भायपूर्ण X-Ray मशीन ख़राब हो गयी और CT-Scan में लम्बी कतार जिसके चलते इन दोनों में से कुछ ना हो सका। जिन मरीजों का CT-SCAN होना था उनको रात को 3 बजे उठा कर जाँच कराने ले गए थे और उनकी रिपोर्ट 24 घंटे बाद आयी। अगले दिन नर्स मल्टीविटामिन के साथ पैरासिटामाल देना शुरू किया तो मैंने सवाल किया कि पहले बच्ची का तापमान देख लीजिये फिर दीजिये पैरासिटामॉल नर्स कहने लगी की इस वार्ड में कोई थर्मामीटर नहीं है हम बुखार नहीं देख सकते इसलिए ऐसे ही पैरासिटामाल दे रहे है इतना सुनकर हमने बहस करना उचित नहीं समझा और बाजार से डिजिटल थर्मामीटर बुलवा लिया। लेकिन दो दिन तक हमको उचित इलाज़ नहीं मिल रहा था ऊपर से मैं एक स्वस्थ इंसान सिर्फ मास्क के भरोसे कोरोना मरीजों के बीच में थी। सभी मरीजों को बहुत करीब से देख रही थी जो कुछ लोग तो बीस पचीस दिन से यही भर्ती थे ज्यादातर मरीज बजुर्ग थे जिनमें अधिकांश को खाँसीं थी। पर उनके पास मास्क नहीं था। वार्ड में सफाई बढ़िया थी भोजन और बिस्लरी पानी की बोतल सबको मिल रही थी कमी थी तो बस उचित समय पर जाँच और मास्क की जब आप बीस रुपये की बोतल दे सकते है तो दो रुपये का मास्क भी दे सकते है कोरोना मरीज बाहर नहीं जा सकता सबके परिजन भी नहीं ला सकते। जो मरीज बिना मास्क के खाँसता था आसपास के मरीज उससे डर जाते थे जो बीमार ना हो वो भी बीमार हो जाए। 

इसी के साथ एक और बिकराल समस्या थी बाथरूम और शौचालय में पानी की एक बार शाम को सात आठ बजे पानी ख़त्म हुआ अगले दिन सुवह दस ग्यारह बजे आता था मरीज पूरे समय में बिसलरी की बोतल पर आश्रित रहते है पीने के अलावा शौचालय में भी इमर्जेंसी में बिसलरी के पानी का उपयोग होता है चूकि सभी कोरोना मरीज है कोई बाहर नहीं जा सकता और ना ही शिकायत कर सकता है इसलिए वो ज्यादातर स्टाफ या डॉक्टर को बोलते है मगर बात उन तक ही रह जाती थी आधे से बाथरूम के नल ख़राब दरवाजे ख़राब खिड़की टूटी हुई मच्छर भिनभिनाते हुए देख कर लग रहा था कि इस पुरानी बिल्डिंग की रिपेरिंग ही नहीं हुई। ऐसे में पानी नहीं रहेगा तो हाईजीन भी नहीं रहेगी और रोगी और रोगों से ग्रसित रहेगा।

इन सब हालात को देखते हुए मुझे लगा कि बच्ची की हालत इतनी नाजुक भी नहीं है और जाँच भी ठीक से समय पर नहीं हो रही है तो क्या फायदा ? बीमार नहीं है तो और बीमार हो जाएगी और मैं भी कोरोना के मरीजों के बीच संक्रमित हो जाउंगी। इसलिए हमने डॉक्टर से निवेदन किया की हमको डिस्चार्ज कर दें ताकि ये एक बेड किसी जरूरतमंद को मिल जाए। ये बात को डॉक्टर सुनाने को तैयार नहीं थे तो मुझे हमीदिया के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर चौरसिया जी के पास जाना पड़ा तब जाकर हमको छुट्टी मिली और सुरक्षित घर आये।

ये मेरा तीन दिन का अनुभव आपके शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का है जो शहर के मध्य में है और सर्व सुविधायुक्त है उसमें इस प्रकार की छोटी छोटी कमियाँ है तो आप माननीय अंदाज़ा लगाइये की छोटे कस्बों की हालत क्या होगी ? आपको खुद को कोरोना हो तो आप प्राइवेट “चिरायु अस्पताल” में अपना इलाज़ करा सकते है मगर आज के आम मरीज को ये सुविधा मुमकिन नहीं है हर किसी को चिरायु या अन्य अस्पताल में बेड नहीं मिल सकता है आपकी सरकार को मध्य प्रदेश में पंद्रह साल से अधिक समय हो गया है आप चाहते तो भोपाल ही क्या पूरे मध्य प्रदेश के सिविल अस्पताल को सर्व सुविधायुक्त बना सकते थे जिसमें कभी भी आक्सीजन या इंजेक्शन की कमी ना होती। लेकिन आपका उद्देश्य सरकारी व्यवस्था को दुरुस्त करना नहीं बल्कि पूँजीपतिओं की जेब भरना है आज हर गाँव से लाशें निकल रही है शमशान में चिताएँ जल रही है और आप दमोह के चुनावों में व्यस्त है गाँवों में इस कदर डर व्याप्त है कि आदमी ना तो टीकाकारण (वैक्सीन) लेने जा रहा ना ही इलाज कराने। आपके पास एक साल का पूरा समय था कोरोना से लड़ने का मगर सत्ता मिलते ही आप फिर चुनावों में व्यस्त हो गए। मेरी आपसे हाँथ जोड़ कर यही प्रार्थना है कि आप अपने लोगों को इस कोरोना काल से निकालिये। आप अभी प्रदेश के मुखिया है इसलिए अस्पतालों में दवाई और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित कीजिये तभी इससे मुक्ति मिल सकती है नहीं तो बहुत से परिवार और अनाथ हो जायेंगे।  जय हिन्द।

एक आम नागरिक की अपील

माया विश्वकर्मा

ग्राम मेहरागाँव, जिला नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)”

चल पड़े हैं लेकिन मंजिल बहुत दूर है…….. किसी के मन में नहीं है दर्द? श्रमिकों की न कदर, न सम्मान, नहीं श्रम की सही कीमत!

How many countries will settle in one country

नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2020. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कहा है कि मध्य प्रदेश के गुजरात में अटके सैकड़ों मजदूरों को सरकार की तरफ से कोई राहत नहीं मिली है। आंदोलन ने मध्य प्रदेश शासन के तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत बताई है।

आंदोलन ने सरकार से सवाल किया है कि मध्य प्रदेश से चलकर सैकड़ों किमी दूर जाने वाले मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था क्यों नहीं?

 नर्मदा बचाओ आंदोलन की विज्ञप्ति निम्न है।

लॉक डाउन के चलते कोरोना से भी देश की जनता अधिक ग्रस्त है, बेरोजगारी और भूखमरी से! ‘रोजगार’ के मुद्दे की गंभीरता अब समझ में आ रही है, बुद्धिजीवियों को भी! लेकिन सबसे अधिक त्रस्त है श्रमजीवी ही! जिनका हाथ पर पेट रहता है, ऐसे मजदूरों में, देश में रोजगार मूलक विकास नियोजन की कमी के कारण, शामिल है आदिवासी भी।

नर्मदा घाटी के, सतपुड़ा और विंध्याचल के आदिवासियों को पहले कभी गाँव छोड़कर दूर क्षेत्र में मजदूर बनके जाना नहीं पड़ता था। लेकिन अब प्राकृतिक विनाश और बाजार – आधारित रोजगार की दौड़ में वे अपने गाँव और पंचकोशी के तहत उपलब्ध संसाधनों से रोजगार नहीं पा रहे है। किसानों को भी घाटे का सौदा जैसी ही खेती चलानी पड़ती है तो वे काम का सही दाम नहीं दे पाते और रोजगार गारंटी के कानून पर अमल के लिए व्यवस्था, संवेदना, और कुशलता के साथ तैयार नहीं है। ग्रामसभा सशक्त करने पर किसी भी राजनेता का ध्यान नहीं है, जो जुटे हैं मात्र मतपेटी भरने पर।

इस परिस्थिति की पोलखोल हो रही है लॉकडाउन के चलते। मध्य प्रदेश के खेती से समृध्द क्षेत्रों के पास रहे पहाड़ी के आदिवासी भर-भर के गुजरात में सुरेन्द्र नगर, जामनगर, अहमदाबाद, बड़ोदा, आणंद, जैसे जिले-जिले में कई तहसीलों में, गाँव-गाँव में टुकडिया बनाकर अटके पड़े है। उन्हें अपने घर छोड़कर आये, मजदूरी बंद हुई और मजदूरी की कमाई ही खाने की वस्तुएँ खरीदने पर खर्च करके भी कई जगह भूखे रहना पड़ा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गुजरात और केंद्र में बैठी सत्ताधारी दल के ही होते हुए, उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री को म.प्र. के गुजरात गये मजदूरों की व्यवस्था करने संबंधी लिखे पत्र की कोई दखल भी नहीं ली गयी है।

यह चित्र बड़वानी तहसील के तथा अलीराजपुर के कुछ ही तहसील और गांवों के आदिवासियों पर गुजरी परिस्थिति से साफ नजर आया है।

गुजरात में लॉकडाउन के बाद कही एकाध गाँव में खाना खिलाया गया, कहीं किसानों ने खिलाया लेकिन पूरे दिन, पूरे मजदूरों की पूरी जरूरत पूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है। अहमदाबाद जिले के धंधुका और धोलेरा तहसील में अटके 12 समूहों में से कई तो खुले में खेत में, धूपताप में अपने बच्चों के साथ रहते हैं। उनके पास की मेहनत से लायी कमाई और मामलतदार से दिया एकाध कुछ किलो अनाज का पॅकेज खत्म हो चुका है और गाँव वालों ने किसी को थोड़ा सा कुछ दिया तो भी बच्चे, बुजुर्ग अधपेट ही है। दुकानों पर माल लेने में भी किसी जगह पुलिस अटकाते हैं और अन्यथा माल की कीमतें भी अधिक होते, मजदूर सूखे भूखे रहना पसंद करते हैं।

वे चिंता से भरे हुए है, वापसी की। वाहन व्यवस्था और खर्चा, दोनों पर नहीं मध्य प्रदेश सरकार का निर्णय, नहि गुजरात का।

भोजनसुरक्षा की, पलायन किये मजदूरों की चर्चा तो माध्यमों में, शासन के वक्तव्यों में, बुध्दिजीवीयों के आलेखों में भी बहुत चल रही है लेकिन प्रत्यक्ष में हस्तक्षेप नहीं के बराबर।

श्रीमती दीपाली रस्तोगी, जो मध्यप्रदेश की नोडल अधिकारी हैं उन्हें इस मामले में, तीन दिन पूर्व से हमने जितने गांवों की मिली, वह ठोस जानकारी भेजी है और जिलाधिकारी महोदय को भी। लेकिन आज तक सुरेन्द्र नगर जिले के मामलतदार ने मात्र एक गाँव बडोल पर जवाब दिया है, जहाँ गांववाले स्वामीनारायण मंदिर ट्रस्ट की मदद लेकर खाना खिला रहे हैं। इसे शिकायतकर्ताओं ने भी नकारा नहीं है लेकिन इस गाँव की तकलीफ अब खत्म हुई है तो भी अन्यत्र के सभी मजदूरों की शिकायत ही बेबुनियाद होने की रिपोर्ट अधिकारी नहीं भेज सकते। इसका जवाब दे रहे हैं मजदूरों की हकीकत बताने वाले संगठनों के हम साथी।

मध्य प्रदेश शासन के उच्च स्तरीय हस्तक्षेप के बिना आने वाले और 10 दिन 3 मई तक ही लॉकडाउन मानकर बच्चों – बहनों के साथ मजदूर आदिवासी समूहों को काटना भी मुश्किल है। कौन लेगा जिम्मेदारी इन श्रमिकों की?

कांग्रेस के कुछ प्रतिनिधि और भाजपा युवा मोर्चा के कुछ साथी कह रहे हैं कि जरूरतों की पूर्ति करेंगे लेकिन उनके पास भी स्थानांतरित मजदूरों की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

हमने हमारी करीबन 45 समूहों के करीबन 800 श्रमिक आदिवासियों की जानकारी तो भेजी है लेकिन सवाल कई गुना अधिक गंभीर है। आंतरराज्य स्थलांतरित श्रमिक कानून, 1979 (Corona infected, lockdown latest update, corona investigation, Madhya Pradesh news,

Inter-State Transferred Workers Act, 1979) का पालन किसी भी राज्य में श्रमायुक्त कार्यालय से तथा श्रम मंत्रालय से नहीं होने से यह स्थिति पैदा हुई है।

स्थलांतर किये मजदूरों के मूल गाँव में रहे बूढ़े माता पिता किसी की अकेली पत्नी और बच्चे भी अधभूखे हैं। कहीं राशन मिला है तो तेल, मिर्च, प्याज नहीं, साग सब्जी नहीं, ऐसी तो कई बिना राशन के लाभ पाये भी हैं। जैसे अमलाली, बिजासन, हो या घोंगसा, धजारा, तुवरखेड़ा, कोटबांधनी, भादल ये वनग्राम हो अकेले बड़वानी तहसील के इन गावों में अभी तक कोविड के दौरान का और कुछ पहले का भी राशन पहुंचना बाकी है।

अप्रैल, मई, जून के लिए मुफ्त में देना जाहिर है 5 किलो चावल प्रति व्यक्ति लेकिन अप्रैल के 3 सप्ताह निकल पड़े, बेरोजगारी में; चावल कई जगह पहुंचा नहीं है – बड़वानी से 10/15 किमी दूर भी।

चल पड़े हैं लेकिन मंजिल बहुत दूर है…….. किसी के मन में नहीं है दर्द?

इससे भिन्न समस्या है मुंबई इंदौर जैसे हाईवे पर चलकर उत्तर प्रदेश के किसी शहर गाँव की लखनऊ जैसी मंजिल तक पहुँचने के इरादे से पैदल चलकर जाने वाले मजदूरों की।

मध्य प्रदेश शासन इस बात से हैरान है कि ये एक राज्य से दूसरे राज्य में कैसे पहुँच जाते हैं, लॉकडाउन में? लेकिन जब वे अपने राज्य पहुँच रहे है तो उनके साथ शासन का रुख क्या होना चाहिये, इस पर कोई निर्णय नहीं दिखाई देता।

म.प्र. में कोई उन्हें खाना खिलाते हैं, पुलिस या गाँववासी तो उसके लिए भी नियमों के बंधन कभी हैरान करते हैं। कही पंचायते गाँव की सुरक्षा के नाम पर नाकाबंदी करती हैं, अपना कर्तव्य नहीं निभाती हैं, जबकि शासकीय अधिकारी उन पर भरोसा व्यक्त करते हैं। लेकिन वे आगे सैकड़ों किमी चलकर कैसे जाएं? जाएं या नहीं जाएं? इन्हें इंसानियत के तहत भी 3 मई तक मध्य प्रदेश में ही, जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ रुकवाने की बात मानना और व्यवस्था करना, यह तैयारी नहीं के बराबर दिखाई देती है।

दरवाजे के हैंडल को छूना मतलब कोरोना’ यहाँ तक भय पैदा करने के बाद भी इन्हें पैदल चलने मजबूर न करते वाहन व्यवस्था क्यों नहीं? अधिक लाभदायक, कोरोना रोकने और मजदूरों की जान और जिन्दगी बचाने का, परिवहन उपलब्धि ही विकल्प होकर भी क्यों नहीं स्वीकार करती सरकार? इसीलिए ना कि श्रमिकों की न कदर, न सम्मान, नहीं श्रम की सही कीमत!

मध्य प्रदेश शासन ने मंत्रिमंडल नियुक्ति ही देरी से करने से स्वास्थ्य या आपदा प्रबंधन पर राजनीति हावी हुई और आंतरराज्य समन्वय में तो और गंभीर मामला है सत्ताधीशों में बेबनाव का जो इस परिस्थिति में तो है ही।

राजकुमार दुबे. किशोर सोलंकी. महेंद्र तोमर. मेधा पाटकर

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