सागर स्वच्छ, तो सब सुरक्षित

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महासागरों से प्राप्त होती है हमें ऑक्सीजन

नई दिल्ली, 03 अगस्त 2022: लगभग सवा दो लाख जीव-प्रजातियों को अपने में समेटे विशाल सागर-महासागर पृथ्वी के तीन चौथाई भाग की पारिस्थितिकी को सँभालते हैं। शेष एक चौथाई जमीन पर विचरण करने वाले तमाम प्रजातियों को भी प्रत्येक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वातावरण से हमें  जितनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, उसका आधा हिस्सा महासागरों से ही प्राप्त होता है। हालाँकि, हम जब भी ऑक्सीजन के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में सबसे पहले पेड़-पौधे और जंगल ही आते हैं। यह बात समुद्र के महत्व (importance of the sea) को लेकर हमारी अनभिज्ञता का प्रमाण है।

  • दुनिया की आधी आबादी सीधे तौर पर समुद्र पर निर्भर है

दुनिया की आधी आबादी; लगभग तीन अरब लोग सीधे तौर पर समुद्र पर निर्भर हैं। मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide emitted by humans) का 25 प्रतिशत हिस्सा सागर ही सोखते हैं। निरंतर बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं के कारण आज महासागरों पर कार्बन डाईऑक्साइड को ज्यादा से ज्यादा सोखने का दबाव बढ़ता जा रहा है।

सागर अम्लीय क्यों हो जाता है?

सागर जितना अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखता है, उतना ही अधिक अम्लीय होता जाता है। इसके परिणामस्वरूप समुद्र का इको-सिस्टम (ocean ecosystem) प्रभावित होता है, और अंततः यह पूरे पर्यावरण को ही प्रभावित करने लगता है।

प्रदूषण का कारण

सामान्य तौर पर ऐसा कोई भी पदार्थ, जो प्राकृतिक संतुलन में दोष को उत्पन्न करता है; प्रदूषण का कारण होता है। बढ़ते प्रदूषण का एक प्रमुख कारक (a major factor in increasing pollution) है – बड़ी मात्रा में पैदा होने वाला खतरनाक शहरी कचरा। यूँ तो किसी भी छोटे-बड़े शहर में इसकी भयावहता को सीधे तौर पर देखा जा सकता हैl परंतु इस कचरे के असर को हमारे पारिस्थितिकी पर देखने का सबसे बेहतर और व्यापक बैरोमीटर सागर और तटीय क्षेत्र हैं।

समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर एक छोटे से नाले का खतरनाक कचरा सहायक नदी से मुख्य नदी में, और मुख्य नदी से बहता हुआ सागर में मिल जाता है। फिर एक सागर से दूसरे सागर होता हुआ सब तरफ पसर जाता है।

ऐसा माना जाता है कि कुल समुद्री कचरे का 90 प्रतिशत नदियों से बहकर समुद्र में पहुँचता है। इसके अलावा, समुद्री तटों पर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पैदा होने वाला कचरा भी अंततः समुद्र में पहुँचता है। चूँकि समुद्र हर बहते जलीय स्रोत का अंतिम पड़ाव है, इसीलिए मानव जनित कचरे से सबसे अधिक प्रभावित सागर ही हैं।

वैसे तो समुद्र को लोहा, सीसा, सिंथेटिक फाइबर या कपड़ा सहित हर तरह का कचरा प्रदूषित करता है। परंतु, सैकड़ों साल तक विघटित न होने वाला प्लास्टिक इनमें सबसे तेज गति से दूरदराज तक फैल जाने वाला खतरनाक कचरा है।

वर्ल्ड इकोनॉमी फोरम(world economy forum) के अनुसार, आठ लाख टन प्लास्टिक प्रतिवर्ष कचरे के रूप में समुद्र में प्रवाहित हो रहा है। वर्तमान में, सागर तट पर इतना प्लास्टिक है कि दुनिया भर के सागर तट पर हर एक फुट जगह में पाँच प्लास्टिक बैग बिछाये जा सकते हैं।

समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सिंगल यूज़ प्लास्टिक खतरा बन चुका है

एक बार प्रयोग किया जाने वाला (सिंगल यूज़) प्लास्टिक आज समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है (Single-use plastics pose a threat to marine ecosystems)। यह सिगरेट के फिल्टर, फूड रैपर, बोतल, प्लास्टिक बैग, स्ट्रॉ आदि के रूप में हर कहीं मौजूद है। जमीन, हवा और समुद्र में भी। सालों तक विघटित नहीं होने और बाद में माइक्रो-प्लास्टिक के रूप में टूटने के कारण यह पर्यावरण के लिए एक बड़ी और कठिन चुनौती है।

आमतौर पर महानगर में  रहने वाला व्यक्ति अपने शहर के किनारे कचरे का पहाड़ देख कर आश्चर्य करते हैं। पर, ऐसे कचरे के ढेर सागर में भी हैं।

प्लास्टिक-जन्य कचरे का एक प्रमुख स्रोत तटों पर पर्यटन भी है। भारत की 7500 किलोमीटर की तटरेखा पर्यटन से उपजे प्रदूषण से प्रभावित है।

गोवा भारत का एक ऐसा तटीय क्षेत्र है, जिसके द्वारा पर्यटन और अन्य दूसरे कारण से होने वाले समुद्री प्रदूषण की निगरानी की जाती है। अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विस्तृत तटों के लिये मशहूर गोवा, अरब सागर के किनारे बसा भारत का एक छोटा राज्य है। घूमने और छुट्टी बिताने के लिहाज से गोवा, विश्व के सबसे लोकप्रिय स्थानों में से एक है। आर्थिक सामाजिक दृष्टि से पर्यटन गतिविधि इस क्षेत्र के लिये जितनी अनुकूल है, पर्यावरण प्रदूषण की दृष्टि से उतनी ही नुकसानदेह भी।

देश और दुनिया के हर कोने सेआने वाले सैलानी गोवा के 104 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट पर छुट्टियाँ बिताते हैं। इसके समुद्री तट हजारों होटलों, रिसोर्ट्स , स्पा आदि से भरे पड़े हैं। पर्यटकों के लिए सुख-सुविधा प्रदान करने के साथ-साथ यह सब भारी मात्रा में प्लास्टिक और अन्य कचरा भी उत्पादित करते हैं।

गोवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, गोवा में हर दिन 527 टन कचरा पैदा होता है। जिसमें से ज्यादातर समुद्री कचरे के रूप में तटों पर मौजूद होता है। इनमें एक बार उपयोग (सिंगल यूज) होने वाला प्लास्टिक, जिसमें खाद्य पदार्थों के पैकेट, पानी की बोतलें आदि प्रमुख कचरे के रूप में होते हैं। इसका निपटारा आमतौर पर स्थानीय स्तर पर ही कर दिया जाता है। हालाँकि, बड़ी मात्रा में कचरा, जो विभिन्न कारणों से तटों पर रह जाता है, समुद्री पर्यावास से मिलकर पूरे पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है।

यह प्रभाव इतना है कि संस्थाओं द्वारा समुद्री प्रदूषण को मापने के लिये गोवा को राष्ट्रीय योजना में शामिल किया गया है। तटों की सफाई के लिये गोवा का बजट (Goa budget for beach cleaning) 2014 में जहाँ दो करोड़ हुआ करता था। वर्तमान में, यह बजट लगभग 15 करोड़ है। इसके बावजूद गोवा तट उच्च स्तर पर प्रदूषित है।

कई शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रदूषण अब हमारे फ़ूड चैन में प्रवेश कर रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ‘सी फूड उत्पादक’  देश है। साल 2019 में अकेले गोवा के समुद्री तटों से कुल 125.6 हजार टन मछलियों को हार्वेस्ट किया गया।

केंद्रिय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सी॰आर॰एफ॰आर॰आई॰) के 2017 में किये गये अध्ययन में पाया गया है कि देश के 254 तटों में से गोवा के तट सबसे अधिक प्रदूषित हैं। जिन चीजों से गोवा के तट सबसे अधिक प्रदूषित हैं, वह पर्यटकों द्वारा इस्तेमाल की गई सीसे की बोतल, मछुआरों द्वारा इस्तेमाल की जानेवाले नायलॉन के जाल आदि हैं।  समुद्री-तंत्र पर ऐसे कचरे से मंडरा रहे संकट के प्रति व्यापक जन-जागृति की आवश्यकता है।

‘स्वच्छ सागर – सुरक्षित सागर’ (Swachh Sagar Surakshit Sagar) भारत सरकार का स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत देश की तटीय रेखा को जन-भागीदारी से स्वच्छ बनाने का अभियान है। इस अभियान के बारे में जागरूकता प्रसार, और 17 सितंबर 2022 को ‘अंतरराष्ट्रीय तटीय स्वच्छता दिवस’ के दिन भारत की तटीय रेखा के 75 स्थानों पर आयोजित समुद्र तट की सफाई गतिविधि से स्वैच्छिक रूप से जुड़ने के लिए आम लोगों के लिए एक मोबाइल ऐप “इको मित्रम्” भी लॉन्च किया गया हैl

(इंडिया साइंस वायर)

प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बदला पूरी दुनिया का बारिश पैटर्न !

Water

प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बदला पूरी दुनिया का बारिश पैटर्न !

पिछले दिनों देश भर में मानसून के विदा होने के वक्त भयंकर बारिश देखने को मिली थी। खासकर बिहार और देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में पिछले कई वर्षों के वर्षा के रिकॉर्ड टूट गए। अब भारतीय वैज्ञानिक के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म होने के कारण बारिश का भारत का ही नहीं बल्कि वैश्विक पैटर्न भी बदला।

Twofold expansion of the Indo-Pacific warm pool warps the MJO life cycle

शोध पत्रिका नेचर में “इंडो-पैसिफिक वार्म पूल का दो गुना विस्तार एमजेओ जीवन चक्र को प्रभावित करता है” शीर्षक से प्रकाशित इस अध्‍ययन में, शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से का आकार दोगुना हो गया है और पृथ्‍वी पर महासागर के तापमान में यह सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (आईआईटीएम)- Centre for Climate Change Research, Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune, India पुणे से जुड़े एम. के. रॉक्सी (M. K. Roxy), के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में आईआईटीएम से ही जुड़े पाणिनी दासगुप्ता (Panini Dasgupta), प्रशांत समुद्री पर्यावरण प्रयोगशाला, राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन, सिएटल, वाशिंगटन, यूएसए (Pacific Marine Environmental Laboratory, National Oceanic and Atmospheric Administration, Seattle, WA, USA) से जुड़े माइकल जे. मैकडेन (Michael J. McPhaden) व चिदोंग झांग (Chidong Zhang), वायुमंडल और महासागर अनुसंधान संस्थान, टोक्यो विश्वविद्यालय, काशीवा, चिबा, जापान (Atmosphere and Ocean Research Institute, The University of Tokyo, Kashiwa, Chiba, Japan) से जुड़े तमकी सुमात्सु (Tamaki Suematsu), और वायुमंडलीय विज्ञान विभाग, वाशिंगटन विश्वविद्यालय, सिएटल, वाशिंगटन, संयुक्त राज्य अमेरिका (Department of Atmospheric Sciences, University of Washington, Seattle, WA, USA) डेह्युन किम (Daehyun Kim) शामिल हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से में हो रही बढ़ोत्तरी ने उस मौसम के उतार-चढ़ाव को बदल दिया है, जिसका स्रोत भूमध्‍य रेखा के ऊपर है। इसे मड्डेन जूलियन ऑस्‍सीलेशन (एमजेओ)- The Madden–Julian Oscillation (MJO) कहते हैं।

अध्ययन में यह बात निकलकर सामने आई कि एमजेओ के व्यवहार में बदलाव के कारण उत्तरी ऑस्‍ट्रेलिया, पश्चिम पैसिफिक, अमेजॉन बेसिन, दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण-पूर्वी एशिया (इंडोनेशिया, फिलीपींस और पापुआ न्यू गीनिया) में बारिश बढ़ गई है। उसी दौरान इन्हीं परिवर्तनों के कारण सेंट्रल पैसिफिक, यूनाइटेड स्टेट्स के पश्चिम और पूर्वी हिस्से में (उदाहरण के लिये कैलीफोर्निया), उत्तर भारत, पूर्वी अफ्रीका और चीन के यांगज़े बेसिन में बारिश में गिरावट दर्ज हुई है।

एमजेओ भूमध्‍यरेखा के ऊपर चक्रवात, मॉनसून, और एल नीनो साइकल को नियंत्रित करता है- और कभी-कभी एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में मौसम की विनाशकारी घटनाओं को अंजाम देता है।

भूमध्‍य रेखा के ऊपर महासागर में एमजेओ 12,000 से 20,000 किलोमीटर तक की दूरी तय करता है, खास तौर से भारतीय-प्रशांत महासागर के गर्म हिस्से के ऊपर से, जिसका तापमान आमतौर पर समुद्री तापमान 28°C से अधिक रहता है।

कार्बन उत्सर्जन के कारण (Due to carbon emissions) हाल ही के दशकों में भारतीय-प्रशांत महासागर का गर्म हिस्सा और अधिक गर्म हो रहा है और तेज़ी से इसका विस्तार हुआ है।

1900-1980 तक महासागर के गर्म हिस्से का क्षेत्रफल 2.2 × 107 वर्ग किलोमीटर था। 1981-2018 में इसका आकार बढ़ कर 4 × 105 वर्ग किलोमीटर हो गया, जोकि कैलिफोर्निया के क्षेत्रफल के बराबर है।

अध्ययन में कहा गया है कि यद्यपि सम्पूर्ण भारतीय-प्रशांत महासागर गर्म हो गया है, इसमें सबसे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत महासागर में है, जिससे तापमान में अंतर पैदा होता है, जो भारतीय महासागर से नमी को साथ लेकर पश्चिम प्रशांत समुद्री महाद्वीप (West Pacific Maritime Continent) तक ले आता है, और यहां पर बादल बनते हैं। इसके परिणामस्वरूप एमजेओ का जीवनचक्र बदल गया है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि एमजेओ जीवन चक्र पर इस वार्मिंग का प्रभाव काफी हद तक अज्ञात है।

भारतीय महासागर पर एमजेओ के बादलों के बने रहने का समय औसतन 19 दिन से करीब 4 दिन घट कर औसतन 15 दिन हो गया है। जबकि पश्चिमी प्रशांत पर यह 5 दिन बढ़ गया है (औसतन 16 दिन से बढ़कर 21 दिन हो गया है)। एमजेओ बादलों के भारतीय महासागर और पश्चिमी प्रशांत सागर पर बने रहने के समय में बदलाव ही है जिसके कारण पूरी दुनिया के मौसम में परिवर्तन हुआ है।

अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
अमलेन्दु उपाध्याय (Amalendu Upadhyaya) लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वह हस्तक्षेप के संपादक हैं।
 माइकल जे. मैकडेन लिखते हैं कि

“मौसम के सटीक अनुमान को लगाने के लिये समन्यवयक अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयास चल रहे हैं, जो दो से चार हफ्ते में आगे आयेंगे और इस संस्‍था की सफलता के लिये एमजेओ एक महत्वपूर्ण कुंजी है”। वह कहते हैं कि, “हमारे द्वारा निकाले गये निष्‍कर्ष यह पता लगाने के लिये एक वेचनात्मक मानदंड हैं कि मौसम के विस्तारित भाग के अनुमान के लिये किस कंप्यूटर मॉडल पर भरोसा करें। यह उनकी क्षमता और एमजेओ के बनावटी व्यवहार और बदलते हुए पर्यावरण पर निर्भर करता है”

मुख्य शोधकर्ता एम. के. रॉक्सी ने कहा कि

“क्लाइमेट मॉडल के इस बनावटी रूप से यह पता चलता है कि यह सब भारतीय-प्रशांत महासागर में निरंतर बढ़ती गर्मी है, जो भविष्‍य में पूरी दुनिया में बारिश के पैटर्न में बदलाव करेगा।  इसका मतलब हमें हमारे महासागर पर नज़र रखने वाले निरीक्षण यंत्रों को अत्याधुनिक बनाने की जरूरत है, ताकि मौसम में होने वाले परिवर्तन का सटीक अनुमान लगाया जा सके, और गर्म होती दुनिया के कारण भविष्‍य में आने वाली चुनौतियों का भी कुशलतापूर्वक अनुमान लगाया जा सके।”

अमलेन्दु उपाध्याय