हिंदी में नेपाल विमर्श : भारत में नेपाल को कैसे समझें?

book review

प्रस्तावना : एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी

दर्शन मानिस को भित्री आँखा हो’.[1] अर्थात दर्शन मनुष्य की भीतरी आँख है.

                    (जीवन रोका मगर, थबांग, रोल्पा, नेपाल)

भईया मैं दर्शन नहीं जानती, पर आप पीएच.डी क्यूँ कर रहे हो?

                    (निर्मला घीसिंग, सामना परिवार, नेपाल)[2]

(१)

यह कहावत आम है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. पर इसे ऐसा क्यूँ कहा जाता है, इसका जवाब सीधे नहीं दिया जाता है, अक्सर इसे बौद्धिक रहस्य के आवरण में छुपाया जाता है. यह इसलिए क्यूंकि साहित्य का सम्बन्ध सीधे राजनीति से जुड़ा होता है. एक देश काल विशेष में कौन सा साहित्य रचा गया, यह उस दौर में सत्ताधारी वर्ग की राजनीति और उसके खिलाफ जनता के प्रतिरोध से निर्मित संघर्ष से तय होता है. इस प्रकार साहित्य का सवाल एक राजनैतिक सवाल बन जाता है. साहित्य का राजनीति के साथ सम्बन्ध जनपक्षधरता के लिए लड़े गए संघर्षों से तय होता है. इसलिए ही तो दक्षिण एशियाई उप महाद्वीप के बिश्व प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने बहुत पहले फरमाया था, कि साहित्य, राजनीति के आगे चलने वाली मशाल होती है. यह तय करने का काम साहित्यकार का है, कि वह किस वर्गीय स्वार्थ के साथ खड़ा होता है. राजसत्ता के साथ अथवा आम जनता के साथ. वह वाकई में आम जन मानस संसार के बीच से होते हुए उनके सुख-दुःख-संघर्ष को अपनी रचनाओं में आवाज देता है कि नहीं? अन्यथा कि बौद्धिक गाल बजाने के लिए समाज के प्रभुजनों द्वारा स्वांत सुखाय वाला साहित्य रच कर उसका हिस्सा बनकर सिमट कर रह जाता है. इसलिए बकौल जीवन मगर, यह दर्शन ही तय करता है कि अमुक लेखक द्वारा रचा गया साहित्य किसके हित में है अथवा किसके अहित में?

इतिहास की भौतिकवादी दार्शनिक समझ के आलोक में मार्क्स और एंगल्स ने “द जर्मन आइडियोलॉजी” में क्या मार्के की बात कही थी कि इतिहास के हर युग में शासक वर्ग के बिचार ही वर्चस्ववादी (रूलिंग) बिचार हुआ करते हैं.[3] इस बात का उल्लेख यहाँ पर इसलिए करना जरुरी है कि लोगों के सामान्यज्ञान में आम तौर पर साम्राज्य के प्रतीक प्रभुजनों के हितों के लिए रचा गया साहित्य ही जुबान पर होता है. क्यूंकि राजसत्ता अपने बहुआयामी नौकरशाही तंत्र के बिबिध अंगों द्वारा मसलन शिक्षा व संचार के बिभिन्न उपकरणों (टी.वी, रेडियो, अखबार व इन्टरनेट) द्वारा सत्ताधारी वर्ग के बिचार का प्रसार करने वाले साहित्य को ही व्यापक स्तर पर पहुंचाती है. मसलन शेक्सपियर के बारे में थोड़ा सामान्य ज्ञान रखने वाला आदमी भी जानता है कि वे अंग्रेजी के विश्व प्रसिद्ध नाटककार हैं, और इंग्लॅण्ड देश के रहने वाले थे.

बहरहाल यदि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारतीय उपमहाद्वीप पर राज नहीं किया होता, तो क्या हम शेक्सपियर के बारे में जान पाते?

यह कहना थोड़ा मुश्किल है. उस हालत में यह इससे भी तय होता कि उनका साहित्य आम जन मानस के दुःख दर्दों से जुड़ता है अथवा नहीं. या समाज में बदलाव की लडाई में शेक्सपियर का साहित्य कितना उपयोगी है, ये बातें तब उनके बारे में जानने के सम्बन्ध में एक भूमिका अदा करती.

मसलन यदि आज हम रुसी कवि पुश्किन, कथाकार लियो टालस्टाय, इवान तुर्गनेव, दोस्तोवेस्क्यी, चेखव या चीनी कवि लु शुन, लैटिन अमेरिकन महाद्वीप के कवि पाब्लो नेरुदा, कथाकार गब्रिएला गार्सेज मार्खेज, जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त इत्यादि के साहित्य से परिचित हैं तो इसका कारण सीधे-सीधे उनके साहित्य से हम एक लोकतान्त्रिक जनवादी समाज बनाने की प्रेरणा गृहण करते हैं.

 (२)

लेकिन हम दक्षिण एशिया यानि भारत के पडोसी देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालद्वीप, और नेपाल या भूटान के कितने साहित्यकारों के बारे में जानते हैं? यहाँ उनके साहित्य से परिचय होने की सीमायें हैं. मसलन यदि हम (मतलब पढ़ा लिखा समुदाय) इन लेखकों के बारे में जानते भी हैं, तो केवल उन्ही को जिनका साहित्य भारत की क्षेत्रीय भाषाओं (मतलब हिंदी आदि) में अनुदित हुआ है और कुछेक जिनका साहित्य उनकी भाषाओँ से अंग्रेजी में अनुदित हुआ है. लेकिन अंग्रेजी अनुदित साहित्य की पहुँच केवल एक ख़ास वर्ग तक सीमित है. चूँकि अंग्रेजी भाषा अभी तक दक्षिण एशिया में प्रभुजनों की भाषा बनी हुई है, इन समाजों में सत्ताधारी वर्ग के लिए अंग्रेजी ही डोमिनेंट डिस्कोर्स या वर्चस्ववादी विमर्श की भाषा है. और क्षेत्रीय भाषाएं करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली जन भाषाएं हैं, जिनका अंग्रेजी के वर्चस्ववादी विमर्ष से बहुत ही तकनीकी रूप का सम्बन्ध है. बदलाव की भाषा अभी भी क्षेत्रीय भाषाएँ बनी हुईं हैं और जो जन आकांछा में बदलाव के लिए लड़ने वाली आवाजों से तय होती है. और उनमे से भी भारत की गोबर पट्टी अर्थात नार्दन इंडियन बेल्ट में बोली जाने वाली हिंदी भाषा.

साहित्य से राजनीति के सन्दर्भ में अभी तक दक्षिण एशिया के केंद्र में भारत है जिसके मूल में औपनिवेशिक इतिहासबोध भरा हुआ है. और भारत से ले दक्षिण एशिया में जनपक्षधर राजनीति का केंद्र बिंदु हिंदी क्षेत्र होता है और हिंदी क्षेत्र दक्षिण एशिया है. दक्षिण एशिया इस मायने में भारत का पर्याय है. मतलब साहित्य का सीधा तार हमारे औपनिवेशिक अतीत से जुड़ा हुआ है. रूप में ही सही १९४७ में इस अतीत से छुटकारा पा लेने के बाद भी वास्तव में औपनिवेशिक अतीत हमारा पीछा नहीं छोड़ता है. क्यूंकि यदि यह पीछा छोड़ता तो हम हिंदी के लेखकों के अलावा दक्षिण एशिया के अन्य देशों के साहित्यकारों के बारे में बखूबी जानते. पर सच्चाई यह है, कि हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते.

या ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर ही जानते हैं. वस्तुतः भारत देश सुरसा का मुंह है, यदि यहाँ बांग्ला भाषा और उर्दू भाषी जनता नहीं रहती, तो १९४७ की ‘आजादी’ के बाद पता ही नहीं चल पाता कि बांग्लादेश में तसलीमा नसरीन जैसी विद्रोही लेखिकाएं भी पायी जाती हैं. अथवा पाकिस्तान में फैज़ अहमद फैज़, अहमद फराज और फहमीदा रियाज या तहमीना दुर्रानी ने अपनी कलम से जनपक्षधर साहित्य भी रचा है.

अन्यथा इसके अलावा देशी पाठक वर्ग इन दो देशों के अलावा और साउथ एशिया के किस देश के लेखक को कितना-कितना जानती है. जहाँ तक मेरी समझ है, अलग तमिल इलम के लिए श्रीलंका में दशकों से चले सशत्र आन्दोलन के प्रभाव के कारण तमिलनाडु का बौद्धिक समुदाय जरुर वहां इस बीच रचे गए साहित्य से परिचित है. लेकिन केवल उन्ही तक, जो तमिल भाषा जानते हैं, और कुछ मात्रा में अंग्रेजी का ज्ञान रखते हैं. 

दक्षिण एशिया के सन्दर्भ में देखा जाय, तो मोटे तौर से यह बात स्पष्ट होती है कि साहित्यकारों ने इस दायित्व को अंशतः ही निभाया है. यहाँ स्पष्ट रूप से इन लेखको के बारे में कहने का तात्पर्य उस औपनिवेशिक अंग्रेजी भाषी कुलीन संसार से है, जो अपने भद्रलोक, व अकादमिक संसार के बाहर तभी जाते हैं, जब उनको कुछ वाहवाही लूटनी होती है. क्षेत्रीय भाषाओं के प्रसिद्ध लेखकों के कामों को पश्चिम के बौद्धिक कुलीन समुदाय के लिए अनुवाद करके यह बौद्धिक तत्व तभी अपने खोल से प्रगट होते हैं. जब इन्हें प्रसिद्धि पाने का चस्का लगा होता है. इसके लिए वे खूब तर्क गढ़ते नजर आते हैं, मसलन बदलाव के लिए चल रहे संघर्ष के साथ एकजुटता दिखाने और जनपक्षधरता के साथ खड़े होने का. हालांकि इसमें कुछेक अपवाद भी मिलेंगे. अंग्रेजी अभी तक इस उपमहाद्वीप में कुलीन और उच्च वर्ग की ही भाषा बनी हुई है. इसलिए इन लेखकों द्वारा रचा गया साहित्य एक बहुत ही छोटे संसार तक सीमित रहता है.

(३)

असल में मेरी इस भूमिका बांधने के पीछे एक ख़ास मकसद है जिसका सीधा सबंध नेपाल को लेकर भारत में होने वाले विमर्श से है. आमतौर पर यह सुना जाता है कि नेपाली भाषा हिंदी की छोटी बहन है. चूँकि यह देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, इसलिए उसे समझने में कोई ख़ास मशक्कत नहीं करनी पड़ती है. उसको सीखने की जरुरत नहीं है. यह समझ आम पढ़े लिखे वर्ग तक ही नहीं बल्कि दिल्ली में समाज विज्ञान की उपाधियों से लैश सुसंस्कृत बौद्धिक लोगों तक की है. और हो भी क्यूँ न क्यूंकि भारत तो वैसे भी नेपाल का ‘बड़ा भाई’ है. यह बात निकल के तब आई, जब पिछले दिनों (जुलाई २०१६) सामाजिक संचार माध्यम फेसबुक में युवा नेपाली कवि स्वप्निल स्मृति ने अपनी फेसबुक वाल एक लेख साझा किया. सरसरी तौर से जब मैंने यह लेख पढ़ा, तो उस समय मुझे यह समझ में आया कि नेपाली कवि श्रवण मुकारुंग की कविताओं को उनके हान्गयुग अज्ञात नाम के साहित्यकार मित्र ने चोरी कर अपने नाम से छपवा लिया है. तत्काल मैंने इस बिषय पर फेसबुक में एक प्रतिक्रिया लिखी कि “साहित्य नाम की विधा में बौद्धिक समाज इस तरह की चोरी करने में सिद्धहस्त है. और वह इस तरह के कर्म को भावशुन्य होकर अंजाम देता है. हान्गयुग अज्ञात के बौद्धिकता के नाम की जुगाली करने की इस बौद्धिक हस्तमैथुन प्रवृत्ति के विरुद्ध कम से कम श्रवण मुकारुंग ने मुहं खोला है. इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं.” लेकिन एक दिन बाद दुबारा पढ़ने पर महसूस हुआ कि मैंने उस लेख के अर्थ को बिलकुल गलत समझा था. क्यूंकि उस लेख के अनुसार नेपाली कवि श्रवण मुकारुंग ने अपने साहित्यकार मित्र हान्गयुग अज्ञात की चोरी का जिक्र मात्र इस सन्दर्भ में किया था कि अज्ञात कैसे किताब चोरी कर पढ़ने की लत के शिकार थे.

अब लीजिये, हो गया न अर्थं का अनर्थ!!!

इस आख्यान में २०१६ की शुरुवात भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह कहकर सोने पे सुहागा लगाया, अवसर था तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से भेंट करते समय. स्वराज ने उन्हें नेपाल का पर्याय मानते हुए अपने से उम्र में छोटा होने का हवाला देकर भारत को नेपाल की “ठुलो दीदी” (बड़ी बहन) बना डाला. अब देख लीजिये कि कैसे साहित्य, राजनीति से संचालित हो रही है. नेपाली राष्ट्र की प्रगति पर सदियों से सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे भारतीय शासक वर्ग के साम्राज्यवादी वर्चस्व का ही प्रभाव है कि जब भारत में यानि हिंदी दुनिया में नेपाली साहित्य के बारे में बात छिड़ती है, तो यही माना जाता है कि यह नेपाली साहित्य तो हिंदी साहित्य का ‘छोटा भाई’ या ‘छोटी बहन’ है.

(४)

हाल फिलहाल (२०१६) में मैंने नेपाली समाज से टकराने के क्रम में हिंदी में कई कवितायें लिखीं और इन्हें हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध प्रगतिशील पत्रिका “हंस” को छपने के लिए भेजी. लेकिन पता चला हंस, नेपाल पर लिखी गयी राजनैतिक कवितायेँ छापने को उतना ही गुनाह समझता है जितना कि वर्चस्ववादी दिल्ली, अपनी राजनैतिक-सांस्कृतिक बिरासत के तहत नेपाल को एक “प्रभुता संपन्न, सार्वभौम” देश मानने से इनकार करती है. यह बात जगजाहिर है भारत इसे ३१ वें संघीय प्रदेश की तरह अपना हिस्सा मानता है, अन्यथा अभी हाल ही में संबिधान के सवाल पर भारत नेपाल सीमा पर घोषित-अघोषित किस्म की कई महीनों की लम्बी नाकेबन्दी नहीं करवाता. जिस पर प्रतिरोध के नाम पर सिवाय वरिष्ठ भारतीय पत्रकार और नेपाली राजनीति के एक प्रसिद्ध बिश्लेषक आनंदस्वरुप वर्मा की पहल पर एक प्रेस नोट व नेपाली मजदूर संगठनों की पहल पर जंतर मंतर पर इक्का दुक्का बिरोध प्रदर्शन होने के अलावा कुछ भी न हो सका. परन्तु नेपाल के खिलाफ महीनों से भी ज्यादा चली नाकेबंदी की इतनी बड़ी ज्यादती के बिरोध में आमतौर से भारतीय बौद्धिक-साहित्यिक जगत चुप बैठा रहा. एक ऐसे देश में जहाँ लाखों परिवार भूकंप की बिभीषका से उबर ही नहीं पाए थे. जहाँ लोग एक नाकारा सरकार के रहमोंकरम और साम्राज्यवादी दाता संगठनों के अरबो रूपए की सहायता सामग्री से मरहूम मूसलाधार बारिश और ठिठुरन झेलते हुए राजधानी काठमांडू से लेकर बिभिन्न शहरों में टेंट लगा कर रहने पर मजबूर थे, वहां मधेशियों के ‘तथाकथित’ समर्थन के नाम पर महीनों की नाकेबंदी करना तो केवल भारतीय साम्राज्यवादी सत्ता का नंगानाच ही कहा जाएगा.

इसका मूल कारण यह है क्यूंकि यहाँ के बुद्धिजीवी मानते है कि वे सभी लोग नेपाल के एक्सपर्ट हैं. इसलिए उन्हें नेपाल को जानने-समझने की जरुरत ही नहीं है और शोध करने की बात तो दूर की कौड़ी है. और चूँकि नेपाल-भारत संबध इतिहास-संस्कृति के एक विशेष सीमेंट से निर्मित हैं. ब्रिटिश भारत साम्राज्य से संरक्षित और अब स्वतंत्र भारत में प्रेरित असमान संधियों की कृपा से दोनों की सीमायें अभी तक खुली हैं. यहाँ आने जाने के लिए पासपोर्ट की जरुरत नहीं पड़ती. इसीलिए गरीब किसान परिवारों के नेपाली किशोर-अधेढ़ से लेकर बूढ़े तक भारत के गली मोहल्लों में मिल जायेंगे.

इसलिए तो मीर तकी मीर, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, मुक्तिबोध, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्ययन, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, महादेवी वर्मा, साहिर लुधियानवी, त्रिलोचन शास्त्री, कैफ़ी आजमी, फिराक गोरखपुरी, हरिशंकर परसाई, अमृता प्रीतम, अज्ञेय, भीष्म साहनी, महाशेवता देवी, पाश, गोरख पाण्डेय, धूमिल, मंगलेश डबराल, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अदम गोंडवी, कात्यायनी, या उदयप्रकाश इत्यादि तो नेपाल के बौद्धिक समाज में जाने जाते हैं, पर भारत में कितने लोग नेपाली साहित्य[4] के मील के स्तंभों यथा राजनेता-साहित्यकार बीपी कोइराला, बालकृष्ण सम, पारिजात, या फिर महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, गोपालप्रसाद रिमाल, सिद्धिचरण श्रेष्ठ, भूपी शेरचन, माधव प्रसाद घिमिरे, मंजुल, जीवन शर्मा, कृष्णसेन इच्छुक, गोकुल जोशी, भूपिन और ख़ुशीराम पाख्रिन आदि इत्यादि से परिचित हैं? याकि नेपाल के संघीय गणतंत्र युग में प्रवेश कर लेने के बाद आस्तित्व में आये नेपाली राष्ट्रगान “सयों थुंगा फूलका हामी” के रचयिता व्याकुल माईला से परिचित हैं क्या? अथवा आज के नेपाली समाज से मुठभेड़ कर लगातार अपनी कलम चला रहे लेखकों मसलन उपन्यासकार खगेन्द्र संगरौला, सी.के. लाल, आहुति, युग पाठक, नबीन बिभास, उपेन्द्र सुब्बा और कवि भूपाल राई, श्रवण मुकारुंग, बिमल निभा, केशव सिलवाल, शरद पौडेल, माईला लामा, मनोज गजुरेल, विनोद विक्रम केसी, रोशन जनकपुरी, अभय श्रेष्ठ, प्रगति राई, यकीन अगाध और स्वप्निल स्मृति इत्यादि से हमारा हिंदी जगत परिचित है क्या? ले देकर कुछ लोगों ने नेपाली साहित्यकार मंजूश्री थापा का नाम जरुर सुना होगा पर सिर्फ इसलिए कि उनका लेखन इस उपमहाद्वीप की शासकवर्गीय भाषा अंगरेजी में है, पर और कोई कारण नहीं.[5] लेकिन क्या इनका काम हिंदी में उपलब्ध है कि नहीं? यदि नहीं है तो क्यूँ नहीं है? खरोचने भर की देर है, पता चलता है कि हिंदी में इन पर कुछ भी उपलब्ध नहीं, जिस पर कुछ ख़ास चर्चा की जा सके.

इस प्रकार भारतीय राज्यसत्ता की वर्चस्ववादी राजनीति तमाम स्तरों पर यथा सांस्कृतिक, बौद्धिक और साहित्यिक रूप में समय-समय पर प्रकट होती है. मसलन हिंदी साहित्य में “कविता कोष” नाम का एक लोकप्रिय वेब पोर्टल पाया जाता है. इस कविता कोष में बिदेशी भाषाओं से हिंदी में सैकड़ों कवियों के अनुवाद मिल जायेंगे. पर नेपाली कविओं का जो भी कुछ मिलेगा, वह नेपाली में ही मिलेगा (कुछेक कविओं की एकाध रचनाओं के तकनीकी हिंदी अनुवाद छोड़कर). कविता कोष गर्व से हिंदी साहित्य की सेवा करने की घोषणा करता है इसलिए यह फरमाता है कि भारतीय संस्कृति नाम की चीज़ तो होती है. तथापि नेपाली संस्कृति नाम की चीज़ नहीं पायी जाती. क्यूंकि यदि यह पायी जाती तो नेपाली साहित्य से हम परिचित होते. यह है वर्चस्ववादी भारतीय संस्कृति; लैनचोर[6] की तरह यह भी साम्राज्यवादी है?

                    (५)

असल में भारत में नेपाल को समझने की परंपरा ही विकसित नहीं हुई है.

भारत में नेपाल पर बस दो ही रुझान पाए जाते हैं. पहला सुरक्षा अध्ययन, जो कि अपने मूल में एकेडमिक परिदृश्य से कभी बाहर नहीं जाता. खासकर अपनी उबाऊ शब्दावलियों और शासकवर्गीय हितों के चिंतन, व भाषायी कलेवर में अंगरेजी जानने वालों तक सीमित रहने के कारण. यह नेपाल विमर्ष एक ख़ास चरित्र से ग्रस्त रहा है, जिसके केंद्र में भारतीय राज्यसत्ता की वह विशिष्ट समझ है जिसके अनुसार नेपाल के बारे में उनका सारा अध्ययन [राष्ट्रीय] सुरक्षा! सुरक्षा!! और सुरक्षा!!! तक ही में सीमित रहता है. इस धारा के अनुसार, नेपाल सरकार की किसी भी सरकार के व विशेषकर चीन के प्रति थोडा दायें-बाएं ढुलकना नेपाल द्वारा भारतीय राज्य के प्रति की गयी एक शत्रुतापूर्ण कार्यवाही है. इसके अलावा नेपाली समाज के गर्भ में क्या-क्या चल रहा है, इस पर जो भारत में जो भी लिखा पढ़ा जाता रहा है, वह बकौल नेपाली इतिहासकार प्रत्यूष वंत के अनुसार, भारतीय राज्यसत्ता द्वारा निर्धारित नेपाल संबंधों पर सुरक्षा चिंतन से उबर नहीं पाया है. निकट भबिष्य में भी भारतीय विश्वविद्यालयों में बिचरण करने वाले “नेपाल सम्बन्धी एक्सपर्टों” के इस चिंतन में कोई बदलाव होने की कोई संभावना नहीं है.[7] इसलिए यहाँ का बौद्धिक समुदाय नेपाल पर सोचने के सवाल को एक फालतू सवाल के रूप में लेता है. इसलिए नेपाली समाज के तमाम आयामों का भारत के समाज विज्ञान की बिभिन्न धाराओं (मसलन मनोविज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनितिक विज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य व संस्कृति) में अतीत के गिने चुने कामों के अलावा कुछ ख़ास उपलब्ध नहीं है.

दूसरा रुझान नेपाली समाज के बारे में बदलाव की धारा के पक्ष में कुछेक लोगों के कलम चलाने से सम्बंधित है जो सुरक्षा प्रतिष्ठानों के वर्चस्ववादी चिंतन की प्रतिक्रिया का परिणाम है. और यह परिदृश्य नेपाली माओवादी आन्दोलन के उभार के बाद स्पष्ट रूप से उभर कर आता है.

नेपाल के बारे में जिज्ञासा करने पर “रोल्पा से डोल्पा तक” अथवा नेपाल को केन्द्रित करके निकलने वाली हिंदी पत्रिका “समकालीन तीसरी दुनिया” का नाम उभरता है. निश्चित ही इस पत्रिका के संपादक आनंद स्वरुप वर्मा ने “रोल्पा से डोल्पा तक” से डेढ़ दशक पहले भारतीय पाठक जगत को नेपाल के माओवादी आन्दोलन से परिचित कराया था. इस किताब के माध्यम से उन्होंने एक ऐसा “जादुई साहित्य” रचा था, जिसने मेरे जैसे हजारों नौजवानों को झकझोर के रख दिया था. २००१ का वो इलाहाबाद का दौर आज तक आँखों से नहीं ओझल होता, जब हम लोग (रमेश जी, पंकज, शैलेन्द्र यादव की टोली) इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गलियारों से ले कर्नलगंज में पप्पू भाई की चाय वाली दूकान से ले आइसा ऑफिस में बैठ घंटों नेपाली क्रान्ति पर चर्चा किया करते थे. हमारे नौजवान मनों के लिए “रोल्पा से डोल्पा तक” एक अदभुत किताब थी; उसकी इस पंक्ति में क्या जादू था, जिसमें प्रचंड कहते कि;

“जब आप किसी तालाब में या किसी झील के बीच में होते हैं तो आपको पानी के महत्व का पता नहीं चलता लेकिन अगर आप कहीं रेगिस्तान में हों तो आप महसूस करेंगें कि एक गिलास पानी भी कितना महत्वपूर्ण है. आज दुनिया में वास्तविक जनयुद्ध कहाँ हो रहे हैं. इसलिए क्रांतिकारी युद्ध के इस मरुस्थल में नेपाल का जनयुद्ध सभी क्रांतिकारी लोगों के लिए एक गिलास पानी की तरह है. क्रांतिकारी जनता को इस पानी की आपूर्ति करते रहने की जिम्मेदारी हम निभाएंगे.” (—प्रचंड, १९९९)[8]

प्रसिद्ध फेबियन समाजवादी लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था, यदि जवानी के दौर में कोई आदमी कम्युनिस्ट न बना हो, तो उसके पास दिल ही नहीं है. बेशक हमारे पास दिल था, इसलिए उस समय उस किताब की एक-एक पंक्ति में क्या जादू लगता था. क्रान्ति, कम्युनिस्ट होने के मायने मैंने और मेरी पीढ़ी ने नेपाली माओवादी क्रान्ति से सीखे थे.

लेकिन इस किताब द्वारा खड़ा किया नेपाल विमर्श एक सीमा के आगे कोई सार्थक भूमिका निभाने में असफल रहा. बावजूद इसके कि इसके लेखक ने नेपाल पर बहुत कुछ लिखा. इसका कारण यह था कि ‘रोल्पा से डोल्पा तक’ से उपजा उनका नेपाल विमर्ष कॉमनसेंस पर आधारित विमर्ष था. पर चूँकि यह वामपंथी बैचारिकी पर आधारित था, और अपनी किस्म का भारत में व हिंदी में पहला प्रयास. इसलिए यह हाथों हाथ लिया गया. उनकी इस किताब का अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ. प्रख्यात भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते ने अपने एक लेख “सोशियोलॉजी एंड कॉमनसेंस” में क्या खूब फरमाया है कि कॉमनसेन्स द्वारा खड़ा किया विमर्ष जड़ों से कटा विमर्ष होता है, चूँकि यह समाज के मूल सवालों को खंगालने के लिए व्यवस्थित तौर से किये गए जमीनी अनुसंधान पर आधारित नहीं होता.[9] इसलिए ऐसे लेखक फील्ड में जाने की जहमत उठाये बिना ही “घर बैठे” जो रचते हैं, उसका एकांगी होना स्वाभाविक है. क्यूंकि ले दे करके “रोल्पा से डोल्पा तक” का बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिकी वामपंथी पत्रकार ली ओनेस्टो द्वारा नेपाली जनयुद्ध के तीसरे वर्ष (१९९९) में  माओवादी महासचिव प्रचण्ड से लिए गए इंटरव्यू पर आधारित था. यह किताब ली ओनेस्टो की तरह ही किसी फील्डवर्क अर्थात स्थलगत दौरे पर आधारित नहीं थी. और इसका शेष हिस्सा लेखक के नक्सलवादी आन्दोलन से प्रभावित हो सत्तर के दशक में नेपाल के “झापाली क्रांतिकारियों” से उपजी संसदवादी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) की रिपोर्टों पर आधारित था.

अब के परवर्ती काल में जैसा इस किताब के लेखक मानते हैं कि नेपाली “क्रांतिकारी वामपंथ” (माओवादी आन्दोलन) की दिशा भटक गयी, पर अभी तक उनके अनुसार संशोधनबाद में परिणति नहीं हुई![10] इस प्रकार मूल रूप से उनके द्वारा खड़ा किया गया नेपाल विमर्श अथवा नेपाली माओवादी विमर्ष, इसके ‘कैश माओवाद’[11] में पतित होने की प्रक्रिया को समझ पाने में असफल रहा. जो बकौल इस स्वयं भू कवि के, यह ‘कैश माओवादी’ भाष्य तो सन १९९८-२००० से ही ‘गणतंत्र, व अंतरिम सरकार, व [और दरबार हत्याकांड के बाद से तीसरी ‘क्रांतिकारी मांग’ संबिधान सभा] के जरिये लिखा जा रहा था. इसलिए १९९८ से “आधार इलाका” और “गुरिल्ला जोन” बनाने के बारे में उनका मतिभ्रम “शीघ्र विजय” का शिकार हो गया. और खासकर २००१ के बाद “प्रचंडपथ” के अवतरण के बाद नेपाली माओवादी आन्दोलन “दीर्घकालीन जनयुद्ध” तो बिलकुल नहीं रह गया था. इसलिए इस दौर से शाही नेपाली सेना के साथ ज्यादातर युद्धों में माओवादी सेना को जबरदस्त जानमाल की क्षति उठानी पड़ी, उनके हजारों कार्यकर्ता मारे गए, व अपांग हो गए. और किस नाम पर, अरे हुजुर! समाजवादी नेपाल बनाने के लिए नहीं वरन बुर्जुवा संसदीय अवतरण के लिए. इतनी बड़ी त्रासदी के लिए कौन जिम्मेवार था, इस पर शीर्ष माओवादी नेतृत्व पंक्ति में कभी बहस नहीं हुई.

स्वयं भू कवि के अनुसार, “रोल्पा से डोल्पा तक” व समकालीन तीसरी दुनिया निर्मित नेपाल विमर्ष की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह आलोचनात्मक नजरिये से नेपाल विमर्श निर्मित नहीं कर पाता. इसलिए नेपाली जनयुद्ध में गड़बड़ी कहाँ पर हुई थी? नव जनवादी क्रान्ति पूरा करने के रास्ते पर चलते हुए ही बीच में यह राह छोड़कर भारत के संरक्षण में किये गए शांति समझौते से जो माओवाद का संसदीय अवतरण हुआ, उससे क्या नेपाली क्रान्ति संपन्न हुई अथवा नहीं? ऐसा क्यों है कि केवल एक राजा के पतन की जगह संसदीय व्यवस्था से उत्पन्न दर्जनों राजाओं के उभार अथवा उनके औचित्य के पीछे के विमर्श को यह क्यूँ निर्मित नहीं कर पाता. सुरक्षा अध्ययन की लीक पर चलते हुए बस राजधानी काठमांडू के इर्द गिर्द घूम कर रचा जाने वाला यह राजनैतिक विमर्श इसलिए जमीन से नहीं जुड़ पाता. 

इसलिए जब नेपाली माओवाद जब इस विमर्श से उलट मई २०१६ से एक ‘तथाकथित भाष्य’ लिखने लगा, तब जाकर कहीं “रोल्पा से डोल्पा तक” के लेखक की आँख खुलती है. उसके पहले जैसे इस विमर्श के अनुसार मानो सब कुछ ‘ठीक ठाक’ चल रहा था. क्यूंकि यदि नेपाली माओवाद से जुड़े इन सवालों को शुरू से ही गहराई से समझने की कोशिस की जाती, और उन पर आलोचनात्मक धार के साथ चीज़ों को ठीक करने के साथ उस पर कलम चलायी जाती, तब इस किंकर्तव्यबिमुढ़ता की स्थिति नहीं आती. इस किस्म के विमर्ष को तब तक और उसके पहले कोई जरुरत ही महसूस नहीं होती थी कि क्या “माओवाद” और “नेपाली माओवाद” के लेंस में ही अर्थात बैचारिक-राजनैतिक-व्यवहार के स्तर पर गंभीर गड़बड़ियाँ मौजूद थीं. क्यूंकि २००६ में सशत्र आन्दोलन की समाप्ति के बहुत पहले से ही नेपाली माओवाद, क्रान्ति अथवा जनयुद्ध के नाम पर जो आन्दोलन चला रहा था, वह अपने मूल अर्थों में केवल “प्रचंड युद्धसरदार” ही पैदा कर रहा था. भारतीय प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता की सीधी देखरेख में नेपाली माओवादी व सात संसदवादी दलों के २००५ के तीन दलीय घोषणापत्र जिसे १२ सूत्रीय समझौता कहा गया, तो १९५० के दशक की तथाकथित क्रान्ति का इक्कीसवीं सदी का नया प्रारूप भर था. जहाँ अब बदलाव बस यह हुआ था कि दिल्ली अब नेपाली कांग्रेस की जगह ‘कैश माओवादियों’ को जगह देने को तैयार थी. मतलब १३००० लोगों की बलि बस नेपाली माओवादियों के संसदीय अवतरण के लिए.

थबांग के मेरे अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नेपाली माओवादी आन्दोलन का शीर्ष नेतृत्व शुरू से ही ब्यक्तिगत जीवन और राजनीति के स्तर पर जमीन-आसमान पर खड़ा हुआ था. प्रारंभ से ही माओवादी नेताओं का शीर्ष हिस्सा जनयुद्ध से पैदा जनआधार को “गणतंत्र” में भुनाकर संसदीय सत्ता प्राप्ति से आगे जाने को तैयार नहीं थी. और तैयार होता भी क्यूँ जबकि उनकी यात्रा का गंतव्य बिंदु क्रान्ति नहीं, समाजवाद नहीं बल्कि कुछ और ही था. नहीं तो राजा बीरेन्द्र के साथ पहले ‘गुप्त’ वार्ताओं के दौर पे दौर नहीं चलते और फिर सितम्बर, २००० से ही प्रचंड के माओवादी नेपाली “नरोत्तम सिंहानुक” का ढोल न बजाते. और यह वही समय था, जब गुरिल्ला युद्ध के आधारभूत नियमों को धता बताकर दुस्साहसवाद की लीक पर माओवादी लड़ाकों ने डोल्पा जिले के प्रशासनिक केंद्र दुनई पर भीषण हमला किया था. १५ पुलिस जवानों की हत्या कर नेपाल राष्ट्र बैंक से नगद ५ करोड़ की राशि लूटने के बाद जब शाम को नन्द किशोर पुनमगर उर्फ़ पासंग (जो अब नेपाल के उप राष्ट्रपति हैं] के नेतृत्व में हजारों छापामार स्थानीय जनता के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के अभाव में जब जंगल में भूख प्यास से पीड़ित होकर इधर-उधर भटक रहे थे, तब लगभग उसी समय भारत की किसी सुरक्षित ऐशगाह से महासचिव प्रचंड यह प्रेस नोट जारी कर रहे थे कि उनकी पार्टी “नेपाल सरकार के साथ संस्थागत रूप में वार्ता कर” माओवादी आन्दोलन का शांतिपूर्ण समाधान चाहती है.[12] वह तो साम्राज्यवादी सत्ताएं नहीं चाहती थीं कि माओवादी युद्ध का इतनी जल्दी समाधान हो इसलिए इन सबके के दुष्चक्र से राजा बीरेन्द्र का हत्याकांड रचाया गया जिसके लिए बकौल तब के क्रांतिकारी और अब के भूतपूर्व मार्क्सवादी पुजारी उर्फ़ नयाँ शक्ति पार्टी के संयोजक और अब संघीय समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा दलबदलू पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ. बाबुराम भट्टाराई के अनुसार, यह हत्याकांड भारत और अमेरिका के ख़ुफ़िया तंत्र की मिलीभगत का नतीजा था.[13] इस हत्याकांड के तत्काल बाद से ही नए राजा ज्ञानेंद्र के सत्ता आरोहण के साथ आखिरकार माओवादी व सरकार के बीच सरकारी स्तर पर वार्ता का जो दौर शुरू हुआ, उसका गंतव्य बिंदु अंततः पूंजीवादी संसदीय राजनीति में सुरक्षित अवतरण मात्र ही था, न कि उसका समाजवाद से कोई लेना देना.

और फिर भारत के बड़े बड़े शहरों में टाठबाट से शीर्ष नेतृत्व के रहकर वहीँ से कार्यकर्ताओं को सेटेलाइट फ़ोन से निर्देशित करने आखिर उपजता भी क्या? सिवाय प्रचंड युद्ध सरदारों के, या दुम्छुल्ला बाबुरामों के. जबकि युद्धभूमि में नेताओं व कार्यकर्ताओं के लिए खाने के लिए अलग-अलग व्यवस्था मौजूद थी. जबकि निचले कार्यकर्ता और माओवादी लड़ाकू डीढ़ों [मकई के आटे से बना खाध्य पदार्थ] या चावल में सुंगुर (सूअर) व बीफ (भैंसा/गाय) के मांस से बना सालन पेटभर खाने के लिए तरसते थे, तब हेड क्वार्टर व केंद्रीय समिति के नेताओं के लिए महीन खुशबूदार चावल और खसी का माँस (बकरा) व कुखुरा अर्थात मुर्ग मुसल्लम परोसा जाता था. क्यूंकि नेपाली माओवादी के तागाधारी नेताओं मसलन डॉ. बाबुराम भट्टाराई इत्यादि के ब्राह्मण कुल के अनुसार सूअर/भैंसा/गाय खाना सनातन धर्म और हिन्दू शास्त्र विरुद्ध था. मतलब कम्युनिस्ट का क-ख-ग-घ तो रट लोगे और मार्क्सवाद को पुरोहिताई कर्मकांड में बदलकर ज्ञान बांटते फिरेंगे, पर डी-क्लास [और डी-कास्ट भी] कभी नहीं करना सीखना. मसलन अपने संस्मरण “जनयुद्धको नाऊँमा” रोल्पाली गीतकार महेश आरोही सन २००१ में रोल्पा के कुरेली गाँव में आयोजित पार्टी की बैठक के सन्दर्भ में लिखते हैं कि प्रचंड धकाधक सिगरेट भी पियेंगे पर जनता से छुपकर.[14] और यही नहीं थबांगी कार्यकर्ताओं के अनुसार “श्रद्धेय सीएम”[15] प्रचंड मदिरापान भी करेंगें. मतलब ढोंगी बनकर क्रांतिकारी होने का नाटक रचाएंगे.

अब या इन उपर्युक्त सवालों पर चुप्पी साध ली जाय, जो कि यहाँ के गढ़ों मठों में बैठे बौद्धिक विमर्ष की लीक रही है. या तो समाजविज्ञान की सुसंस्कृत और तकनीकी गोलमाल भाषा में बौद्धिक पेपर व किताबें छपा कर ज्ञान को किताबों में कैद कर बड़ा नाम कमाया जाय अथवा इस स्वयं भू मन में बसे बाबा नागार्जुन की सीधी सपाट शैली में फरमाया जाय;

“जनता मुझसे पूंछ रही है, क्या बतलाऊं?

जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊं?”[16]

                    (६)

भारत में नेपाल विमर्श की प्रकृति पर रौशनी डालते हुए यह साफ़ तौर पर पता चलता है कि इस विमर्ष की सीमायें क्या-क्या हैं. इन दो किस्म के बिचार विमर्श यानि सुरक्षा अध्ययन और बदलाव के लिए समर्पित पत्रकारिता लेखन में जो एक चीज समान है कि ये दोनों नेपाली समाज का अध्ययन साहित्य की बिधा को नजरअंदाज करके करते हैं या उसके प्रति उदासीन रहते हुए करते हैं; ये दोनों विमर्श नेपाली समाज की गति से उपजे साहित्य के साथ नहीं जुड़ते हैं. और इसीलिए वह जो विमर्श खड़ा करते हैं वह अपनी विश्वसनीयता और जनपक्षधरता को टिकाऊ तरीके से कायम नहीं रह पाता. नेपाली साहित्य संस्कृति से उपजा राजनैतिक विमर्श ही भारत में नेपाल विमर्ष को तय करेगा. क्यूंकि असल सवाल नेपाली दुनिया के साथ हमारे सीधे संवाद करने का है.

भारत में रहते हुए नेपाली समाज के साथ सीधा खरा संवाद मात्र कुछ गिने चुने लोगों ने ही किया है.

इस दृष्टि से भारतीय जनमानस को सबसे पहले नेपाल से परिचित कराने का श्रेय गुजरे ज़माने के मैथिली अंचल के कालजयी साहित्यकार फनीश्वरनाथ रेणु को है, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में नेपाल के साथ सीधा विमर्श कर इस किस्म के संवाद की नींव डाली थी. “नेपाली-क्रान्ति कथा” के रिपोर्ताज के माध्यम से उन्होंने १९५० के दशक में राणाशाही के विरुद्ध नेपाली कांग्रेस द्वारा चलाये गए सशस्त्र संघर्ष का जो आँखों देखा चित्रण किया है, वह आज कई दशक बीत जाने के बाद भी पढ़ते हुए जैसे अभी का ताजा लगता है.[17]

रेणु भारतीय समाजवादी आन्दोलन धारा से जुड़े थे, यही कारण है कि नेपाल में चल रहे राणा बिरोधी आन्दोलन की नब्ज को वो उस पकड़ सके. और यह संबाद उनके नेपाली जनता के संघर्ष से सीधे जुड़ते हुए उपजा था, न कि मात्र अकादमिक द्रष्टिकोण से. गौरतलब है कि इस कृति की प्रस्तावना नेपाल के पहले लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए प्रधानमंत्री बीपी कोइराला ने लिखी थी और यह पचास के प्रारम्भिक दशक तक के राजनैतिक इतिहास को ही समेटती है. इसको प्रकाशित हुए ६० साल बीत चुके हैं लेकिन इसकी प्रासंगिकता ख़त्म नहीं हुई है.

कविता के क्षेत्र की बात करें तो, हिंदी के प्रख्यात कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना थे, जिन्होंने नेपाल में निरंकुश पंचायत व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर गवईं जनता के जीवन पर “काठमांडू में भोर” नामक कविता लिखी और नेपाली कविताओं का संग्रह सम्पादित करके हिंदी जगत को नेपाली कविओं के मानस संसार से रुबरु कराया था.[18] उनके अलावा कुछेक हिंदी कवियों ने नेपाली समाज को अपनी कविताओं का विषय बनाया है. इस सन्दर्भ में हिंदी कविता के शिखर पुरुष बाबा नागार्जुन की एक कविता “नेपाल का नौजवान” उल्लेखनीय है, जो उनके राधाकृष्ण प्रकाशन से १९८१ में छपे कविता संग्रह “हज़ार हज़ार बाँहों वाली” में संकलित है. उनके अतिरिक्त वरिष्ठ हिंदी कवि शिवमंगल सिद्धांतकर ने नक्सलबाड़ी आन्दोलन की पृष्ठभूमि में नेपाली समाज पर “कालपत्रक” शीर्षक से एक कविता लिखी है, जो उनके “आग के अक्षर” संग्रह में संग्रहीत है. इसके अलावा प्रसिद्ध नेपाली साहित्यकार पारिजात की कविता “मृत्यु” का अनुवाद हिंदी कवि सुरेश सलिल ने किया है.

नेपाली समाज के विगत-अतीत से बाहर आकर वर्तमान नेपाल के हवाले से यदि बात करें तो माओवादी आन्दोलन के उदय होने के साथ ही भारतीय समाज में इसके सीधे प्रभाव को रेखांकित करता हुआ कुमांऊनी भाषाविद प्रो. शोभाराम शर्मा द्वारा समकालीन नेपाली समाज में माओवादी आन्दोलन के उदय की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास “काली वार-काली पार” है. जो अभी तक प्रकाशाधीन है. यह संभवतः हिंदी भाषा में लिखा गया यह अकेला पहला उपन्यास है जो भारत-नेपाल सीमा में उत्तरांचल राज्य और सुदूर पश्चिम नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले वनरावत समुदाय के जीवन में माओवादी आन्दोलन की आग से पैदा विपन्न जनसमुदाय के नए सपनों को रेखांकित करता है. यहाँ तक कि नेपाली माओवाद के “कैश माओवाद” में पतित हो जाने के बाद भी इस उपन्यास की प्रासंगिकता कम नहीं हो जाती. माओवादी आन्दोलन के दौर में प्रसिद्ध गोरखा जेल ब्रेक की नायिका नेपाली माओवादी नेता उमा भुजेल के संस्मरण “जेलब्रेक” का अनुवाद नेपाली मूल के भारतीय पत्रकार विष्णु शर्मा ने किया है, जो समकालीन तीसरी दुनिया से प्रकाशित है.

(७)

असल में नेपाल विमर्श पर मैं इस किस्म के सवाल इसलिए खड़ा कर पाता हूँ क्यूंकि मेरी नेपाल पर पढाई अकादमिक स्तर पर बिदेश के किसी प्रसिद्ध संस्थान ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी अथवा लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स इत्यादि में नहीं हुई और न ही दिल्ली के सुरक्षा अध्ययन संस्थानों में.

दो साल पहले २०१५ में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित एक सेमीनार के क्रम में नेपाल पर मेरे एक असुविधाजनक सवाल पूछने पर भारत के जाने माने “नेपाल एक्सपर्ट” प्रोफेसर एस. डी. मुनि साहेब ने प्रोग्राम ख़त्म हो जाने के बाद चाय के वक़्त फरमाया कि “क्या मैं नेपाली हूँ? मेरे द्वारा अपने को भारतीय कहने पर वे चौकें. और बोले क्या मैं नेपाली पढ़ता और समझता हूँ? मैंने बताया, हाँ थोड़ी बहुत मेहनत करके पढ़ लेता हूँ, तो प्रतिउत्तर में बोले कि मैं उनसे आकर ऑफिस में मिलूं”.

नेपाल के बारे में साउथ ब्लाक के चिंतकों से भरी सभा में मैंने बस उनसे यही सवाल किया था, कि “जब आपके (प्रोफेसर मुनि) के अनुसार, नेपाल [व हिमालयी क्षेत्र भूटान भी] में लोकतंत्र के स्थायित्व न होने का कारण भारत का नेपाल में अपने रणनीतिक हितों के लिए काम करना है. तब आपके तर्क को आगे बढाते हुए क्या यह कहना उचित है कि नेपाल, भारत का एक संरक्षित राज्य है!”.

टूटी फूटी अंग्रेजी में मेरा इतना कहते ही, सेमीनार में जैसे भूचाल आ गया.

प्रो. मुनि ने तुरंत कहा, “मैं अपने शब्द उनके मुंह में ठूंस रहा हूँ”. सेमीनार के आयोजकों ने कहा, कि इस तरह के सवाल मैं कैसे पूंछ सकता हूँ. मैंने उन्हें साफ़ शब्दों में बताया कि चूँकि मेरी ट्रेनिंग जेएनयू में समाजशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में हुई है, इसलिए मैं एक आपकी तरह भारतीय राज्यसत्ता के एक सुरक्षा विशेषज्ञ की तरह से नहीं सोच पाता.

बहरहाल मैं आज तक उनसे मिलने नहीं गया. मुझे लगता है! यदि मैं उनसे मिलने गया, तब मैं वह नहीं बन सकूँगा, जिस प्रस्थान बिंदु से मेरी भारत से नेपाल की यात्रा शुरू हुई थी.

व्यक्तिगत स्तर पर प्रोफेसर मुनि से भेंट करने में मुझे कोई एतराज नहीं, पर उनके शासकवर्गीय चिंतन से है और उनके ‘एकेडमिक नेटवर्क में फिट होने’ के लिए अपना चिंतन परिवर्तित कर लेने में. मेरी नेपाल यात्रा समाजवादी क्रान्ति की यात्रा थी. तभी तो मेरे ह्रदय में भारत की जनता के दुख और नेपाली जनता के दुःख एक होकर मुक्ति की प्रसव पीड़ा में बदल जाते हैं. जहाँ दो समाजों के सम्मिलन से उपजे इस स्वयं भू कवि के ह्रदय में बदलाव की चिर आकांछा से प्रेरित जनसंघर्ष की बासंती बयार बहती है.

और मैं, हिंदी पट्टी का एक स्वयं भू कवि, नेपाल (और तब भारत को भी) को आम जनता के मनोविज्ञान से होकर समझना चाहता हूँ, पर एक्सपर्ट बनकर कदापि नहीं. इस प्रकार मैं, पवन मन, एक गंवई भारतीय शरीर में बसे एक नेपाली मन से आकार लेते हुए समाजशास्त्र के एक बिद्यार्थी के बतौर उनके बेहतर भबिष्य के सपने के साथ खड़ा हुआ पाता हूँ. क्यूंकि मैंने नेपाली समाज का अध्ययन नेपाल को एक समाजवादी समाज में तब्दील करने के लिए चले राजनैतिक आन्दोलन के एक कार्यकर्ता के बतौर किया है, न कि बस बौद्धिक जुगलबंदी और अकादमिक लच्छेदार भाषा सीख कर बौद्धिक जगत में अपना डंका बजवाने के लिए.

मेरा नेपाल का अध्ययन, नेपाल में समाजवादी क्रान्ति संपन्न होने से जुड़ा था.

इलाहाबाद विश्वबिद्यालय में पढ़ते व वामपंथी छात्र राजनीति करते हुए १९९९ में बलिया में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र नेता बलवंत यादव के साथ हुई चहलकदमी ने नेपाली क्रान्ति के प्रति मन में जो उमंग पैदा की थी, उसी के कारण था कि मैं वर्ष २००१ में छात्र संगठन आल इण्डिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के इलाहाबाद में हुए राष्ट्रीय महाधिवेशन में बतौर अतिथि आये नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के नेताओं से लड़ पड़ा था. शायद उस समय मैंने उन पर इसलिए कुछेक माँ-बहन वाली गालियों की बौछार की थी. क्यूंकि मेरे उनसे माओवादी आन्दोलन के बारे में यह प्रश्न पूछने पर उन्होंने फरमाया था कि “माओवादी पार्टी ड्रग्स और लड़कियों की तस्करी करने वालों का गिरोह है”.

“रोल्पा से डोल्पा तक” से उपजी नेपाली क्रान्ति ही बाद में मेरे माले-लिबरेशन से मोहभंग का कारण बनी, क्यूंकि माले एक तरफ ‘नक्सलवादी आवरण’ में केवल संसदवादी राजनीति का अखाडा बनी हुई थी, और साथ में एनजीओ इंडस्ट्री को कार्यकर्ता उत्पादित करने की फैक्ट्री भी. दूसरी तरफ भारत में क्रान्ति के पैरोकार पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर [अब के भारतीय माओवादी] आपस में खून की नदियाँ बहाकर ‘वर्ग संघर्ष’ की राजनीति आगे बढ़ा रहे थे. इन सबके बीच नेपाली माओवादी ही मुझे क्रांति के मूर्त रूप लगे. इसलिए जेएनयू में पढ़ते हुए जब मैं नेपाली माओवादी पार्टी से जुड़े हुए प्रवासी मजदूर संगठन ‘नेपाली जनाधिकार सुरक्षा समिति, भारत’ के संपर्क में आया तब, तब लगा कि “मुझे अपना असल खानदान मिल गया है.”

इसलिए जब मुझे नेपाल में भारत के संभावित सैनिक हस्तक्षेप के विरुद्ध देशव्यापी स्तर पर बने संगठन ‘भारत-नेपाल जनएकता मंच’[19] को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करने की जिम्मेवारी दी गयी, तो यह मेरे लिए गर्व का बिषय था. उस वक़्त नेपाली क्रान्ति के सवाल पर लोकतान्त्रिक और जनवादी धारा की दो दर्जन से भी ज्यादा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों का एक साथ इकट्ठा होना कोई मामूली बात नहीं थी. उत्तर पूर्वी भारत से ले उत्तर, दक्षिण, पश्चिम के कौन-कौन से संगठन नहीं थे, छोटे से ले बड़े. मंच के संरक्षक भारतीय मार्क्सवाद की किद्वंती शख्सियत और अब हाल ही में दिवंगत प्रो. रणधीर सिंह थे. उनके साथ बातचीत के वो लम्बे-लम्बे दौर मुझे आज भी याद हैं, जब नक्सलवादी धारा के उन परस्पर ‘शत्रु’ संगठनों के लगभग ३० साल बाद नेपाली क्रान्ति के लिए उनकी एक मंच पर हुई एकजुटता से पैदा हुई तरंग, उमंग को देखकर वो भी हैरान रह जाते थे और कहते थे, कि नेपाली क्रान्ति ने आज हजारों भगत सिंह पैदा कर दिए हैं. वो समय अभूतपूर्व था.

बहरहाल तब क्या पता था कि ‘भारत नेपाल जनएकता मंच’ तो नेपाली माओवादिओं के लिए भारतीय राज्यसत्ता से सौदेबाजी कर अपना हित साधने का यंत्र मात्र था. और इसलिए सन २००८ में संबिधान सभा से उपजी सिंह दरबार की सत्ता प्राप्ति के बाद प्रचंडों/बाबूरामों की क्रान्ति संपन्न हो गयी. इसलिए मई, २०१० में मंच के महासचिव पद से इस्तीफा देते हुए नेपाली माओवाद से मेरा मोहभंग तो हुआ लेकिन उस चिंतन के बुनियादी बिंदु से नहीं जिसके आधार पर इस संगठन की जिम्मेवारी लेते हुए मैं सोचा करता था, कि केवल एक सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति ही, गंगा-जमुनी समाज अर्थात भारत उर्फ़ ‘हिन्दुस्तान’ और नेपाल उर्फ़ ‘असल हिन्दुस्थान’ के लोकतान्त्रिक-जनवादीकरण का प्रस्थान बिंदु हैं. इस चिंतन की प्रासंगकिता अभी भी कम नहीं हुई है बल्कि आज के दौर में भी जस की तस कायम है.

क्यूंकि मैं यदि कविमन नहीं होता तो भारतीय वामपंथ से नेपाली माओवाद की यात्रा नहीं करता. नेपाली क्रान्ति में गड़बड़ी कहाँ हुई, यह खोजने नेपाली माओवाद के प्रतीक थबांग गाँव नहीं जाता. और थबांग पर पीएचडी करते हुए मैं ‘कैश माओवादी’ थीसिस की खोज नहीं कर पाता, जो कि नेपाल ही नहीं बल्कि भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए उपयोगी है. 

अब जब मुझे महसूस होता है कि मैं भले ही हिंदी का एक स्वयं भू कवि कहलाऊं, पर इस भारतीय तन में नेपाली समाज के सुख-दुःख, पीड़ा-आक्रोश से उपजे मन को मैं जितना अपनी कविताओं में रचूंगा, उतना ही सुन्दर समाजशास्त्रीय आख्यान रच सकूँगा. क्यूंकि इन दो देशों में आमूलचूल बदलाव अर्थात क्रान्ति संपन्न करने का काम दिल्ली से होकर गुजरता है. दिल्ली मुक्त तो नेपाल मुक्त और समूचा दक्षिण एशिया भी. इसलिए तो हिंदी का यह स्वयं भू कवि कहता है:

“रचूंगा मैं एक टन”

रचूंगा मैं एक टन

बन हो पवन मन

रचूंगा मैं एक मन

बन हो जन मन

रचूंगा मैं एक टन

करके लडाई 

बना नेपाल को अपनी कमाई

सो उत्रण हो सकूँ

मैं एक ऋण से

बना मुझको पवन मन.

(१४ मई, २०१६)

इस छोटी सी भूमिका के साथ हिंदी के एक स्वयं भू कवि की यह डायरी प्रस्तुत है और इसमें नेपाल के साथ मेरा संवाद खालिस कविता के रूप में ही है.

डॉ पवन पटेल नेपाली समाजशास्त्र के एक स्वतन्त्र भारतीय अध्येता व कवि हैं. नेपाल पर दो किताबें प्रकाशित; “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थाबांगी पर्सपेक्टिव, आदर्श बुक्स: न्यू दिल्ली (2019) और “एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे (2021)”. सम्प्रति अपने गृह जनपद बाँदा, उत्तर प्रदेश में निवास.

लेखक का आत्मकथ्य

यह एक तथाकथित बलात्कारी की जिन्दगी की प्यास है, जिसने भारत से नेपाल की एक अविस्मर्णीय यात्रा की I १९९९ से इलाहाबाद से शुरू हुई वामपंथी राजनीति की इस गैरमामूली यात्रा में मेरे भीतर बसे राजनैतिक कार्यकर्ता को एक फर्जी मनगढ़ंत बलात्कार के केस में तिहाड़ जेल जाना पड़ा I तिहाड़ जेल के इस आस्तित्वगत मानस पटल पर रहते हुए मेरी एक नेपाली कवि से भेंट हुई, जिसके गर्भ से इस स्वयं भू कवि का जन्म हुआ I तब मेरे भीतर बसे कवि ने अपनी पहली किताब “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थाबांगी पर्सपेक्टिव” रची, जो २०१९ में आदर्श बुक्स: न्यू डेल्ही से प्रकाशित हुई I यह किताब लिखते हुए व दिल्ली के गलियारों में बलात्कार का मुकदमा झेलते हुए मैंने नेपाल में माओवाद के उदय के बाद हुए सामाजिक-आर्थिक, राजनैतिक सांस्कृतिक परिदृश्य पर कवितायें रची I प्रस्तुत कविता संग्रह ४ भागों में बिभक्त है- प्रस्तावना, मिले, सुर, मेरा-तुम्हारा I पहले खंड “प्रस्तावना” के तहत हिंदी में नेपाल विमर्श का एक संक्षिप्त लेखा जोखा प्रस्तुत है I दूसरे खंड “मिले” के तहत २०१३ से २०१९ तक लिखी (जेल) डायरी के चुनिन्दा अंश सन्निहित है, वहीँ तीसरे खंड “सुर” के अन्तर्गत कविताओं की मैथेडलॉजी दी गयी है तथा चौथे खंड “मेरा-तुम्हारा” में मात्र कवितायें सहेजी गयी हैंI


[1] यह उद्धरण जून २०१२ में थबांग में लिए गए एक इंटरव्यू के क्रम में जीवन रोका मगर से पूछें गए एक सवाल का उत्तर है. मूल रूप से यह उद्धरण बरिष्ठ नेपाली माओवादी नेता कॉ. मोहन बैद्य ‘किरण’ की मार्क्सवादी दर्शन पर लिखी गयी किताब “संघर्ष र दर्शन” का पहला वाक्य है. जीवन (उमर ११ साल) थबांग गाँव का रहने वाला है, उसके माता पिता माओवादी आन्दोलन के क्रम में शहीद हो चुके हैं. वह “मगरात स्वायत्त राज्य जनसरकार” के अंतर्गत “थबांग बिशेष जिला” द्वारा संचालित “शहीद जनवादी विद्यालय, थबांग” का छात्र रहा है. गौरतलब है कि माओवादी जनसत्ता द्वारा ग्रामीण नेपाल के भूभाग में स्थापित दर्जनों ऐसे जनवादी बिद्यालयों (कक्षा एक से पांच तक) में बच्चों को “दर्शन” नाम का बिषय भी पढाया जाता था. 

[2] सामना परिवार नेपाली माओवादी आन्दोलन का एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक संगठन था. इस संगठन से जुडी कार्यकर्ता और अब नेपाल की उभरती हुई युवा गायिका निर्मला से मेरी पहली भेंट २००६ के शुरुवात में जेएनयू में हुई थी और उपर्युक्त उद्धरण मुझसे उसका पहला सवाल था.

[3] कार्ल मार्क्स व फ्रेडरिक एंगल्स (१९७६), ‘द जर्मन आइडियोलॉजी’, देखें, ऑन हिस्टोरिकल मटेरियलिज्म, मास्को: प्रोग्रेस पब्लिशर्स, पृष्ठ. ४४.

[4] मैंने यहाँ नेपाली साहित्य के केवल उन्ही नामों का उल्लेख किया है, जिनके लेखन से मैं नौसिखए रूप से थोडा बहुत परिचित हूँ. बहरहाल नेपाली साहित्य के महासागर की गहराई में मेरा गोता लगाना अभी बांकी है, जो अपने भीतर किन-किन मोतियों को छुपाये बैठा है. मैं इस टिप्पणी के लिए युवा नेपाली पत्रकार-अध्येता शंकर तिवारी का आभारी हूँ. साथ ही मैं नेपाली कवि व मानवशास्त्री डॉ. बालगोपाल श्रेष्ठ का भी शुक्रिया अदा करता हूँ, जिन्होंने मुझसे अपनी और बिभिन्न कवियों की नेपाल भाषा से नेपाली व अंगरेजी में अनुदित रचनाएं साझा की.

[5] नेपाल के माओवादी आन्दोलन के बारे में उनकी किताब “फॉरगेट काठमांडू: एन एल्गी फॉर डेमोक्रेसी (२००५; पेंगुइन; नयी दिल्ली)” चर्चित रही है. यह मूलतः एक बुर्जुवा पर्सपेक्टिव में लिखा गया यात्रा वृतांत है.

[6] लैनचोर काठमांडू शहर का एक मोहल्ला है, जहाँ पर भारतीय राजदूतावास स्थित है. नेपाली जनमानस भारतीय साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ अपने गुस्से मिश्रित प्रतिरोध को व्यक्त करने के लिए अपने दैनिक बोलचाल में भारत को “लैनचोर” की भी संज्ञा देते हैं. 

[7] प्रत्यूष वंत (२००१), ‘रीजनल एरिया स्टडीज इन साउथ एशिया: डार्क डेज अहेड’, नेपाली जर्नल ऑफ़ कंटेम्पररी स्टडीज, अंक-१, संख्या-२, पृष्ठ. ६०-८९.

[8] उपरोक्त उद्धरण नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के तत्कालीन महासचिव प्रचण्ड से वामपंथी अमेरिकी महिला पत्रकार ली ओनेस्टो द्वारा १९९९ में किये गए इंटरव्यू का हिस्सा है. सबसे पहले यह इंटरव्यू अमेरिका से निकलने वाले प्रगतिशील अखबार “रिवोल्यूशनरी वर्कर” के २२ फ़रवरी, २००० वाले अंक में प्रकाशित हुआ था. देखें, आनंद स्वरुप वर्मा (२००१), रोल्पा से डोल्पा तक: नेपाल का माओवादी आन्दोलन, नोयडा: समकालीन तीसरी दुनिया, पृ. ९८.

[9] आंद्रे बेते (२००५), ‘सोशियोलॉजी एंड कॉमनसेंस’, इन दीपांकर गुप्ता (संपा.), एंटी-यूटोपिया: एसेंशियल राइटिंगस ऑफ़ आंद्रे बेते, नई दिल्ली: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ. ४६.

[10] देखें, “समकालीन तीसरी दुनिया” में प्रकाशित उनके अभी हाल तक (सन्दर्भ २०१६ तक) नेपाल सम्बन्धी सम्पादकीय व लेख.

[11] पवन पटेल (२०१९), द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थबांगी पर्सपेक्टिव, नई दिल्ली: आदर्श बुक्स.

[12] पासांग (२००८), रेड स्ट्राइड्स ऑफ़ द हिस्ट्री: सिग्नीफिकेंट मिलिटरी रेड्स ऑफ़ द पीपुल्स वॉर, काठमांडू: अग्निपरीक्षा जनप्रकाशन गृह, पृष्ठ. ८८. और देखें, कियोक अवगुरा (२००४), ‘रियलिटीज एंड इमेजेज ऑफ़ नेपाल्स माओइस्ट्स आफ्टर द अटैक आन बेनी’, यूरोपियन बुलेटिन ऑफ़ ऑफ़ हिमालयन रिसर्च, अंक-२७, पृष्ठ. ६९.

[13] बाबूराम भट्टाराई (२००५), ‘लेट्स नॉट लेजिटमाइज द न्यू कोट मैसकर’, इन मोनार्की वर्सेज डेमोक्रेसी: द एपिक फाइट इन नेपाल, न्यू देल्ही: समकालीन तीसरी दुनिया, पृष्ठ. १७-२५.

[14] महेश आरोही (२०६८) जनयुद्धको नाऊँमा, नेपाल: मगर राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा, केन्द्रीय समिति, पृष्ठ. ८.

[15] सी.एम. मतलब चेयरमैन. युद्ध सरदार मार्गचित्र अनावरण करने अर्थात ‘प्रचंडपथ’ के दिव्य ज्ञान से पहले प्रचंड नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव मात्र थे. सन २००१ में भारत के पंजाब राज्य के जालन्धर में आयोजित पार्टी कांफ्रेंस से वो चेयरमैन बने. 

[16] वेद प्रकाश (२०११; सं.), नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएँ, दिल्ली: पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ, १४.

[17] फनीश्वरनाथ रेणु (१९९९ [१९७७]), नेपाली-क्रान्ति कथा, नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन.

[18] सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (२०१४ [१९८४]), प्रतिनिधि कवितायें, नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ. ६४-६५. बहरहाल उनके द्वारा सम्पादित नेपाली कवितायें उपलब्ध नहीं हैं.

[19] इस मंच की स्थापना मूल रूप से दिल्ली में बरिष्ठ पत्रकार आनंदस्वरुप वर्मा के नेत्रव्त्व में २००२ में हुई थी.

आम लोगों के अंदर यह जानने की जबरदस्त उत्सुकता है कि आखिर माओवाद क्या है : इंछामो

Things you should know

विशद कुमार

आज जहां सारा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है, सोशल मीडिया और अखबार ऑक्सीजन व वेंटिलेटर के अभाव में मर रहे लोगों की खबरों से भरे पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर तेलंगाना की राज्य सरकार व केंद्र सरकार इस आपदा को जनवादी संगठनों व लोकतांत्रिक आवाजों के दमन के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रही है। जिसका जीता-जागता उदाहरण है पिछले दिनों तेलंगाना की चंद्रशेखर राव सरकार ने केंद्र सरकार के इशारे पर रिवोल्यूशनरी राइटर्स एशोसिएशन (विरसम) सहित 16 जन संगठनों (जिसमें 4 छात्र संगठन भी शामिल हैं) को प्रतिबंधित कर दिया गया।

इस फासीवादी फैसले के खिलाफ इंक़लाबी छात्र मोर्चा, इलाहाबाद ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा है कि के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली तेलंगाना की राज्य सरकार ने मोदी- शाह और NIA के इशारे पर चार छात्र संगठनों ‘तेलंगाना विद्यार्थी वेदिका (TVV)’, ‘डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन’, ‘आदिवासी स्टूडेंट्स यूनियन, तेलंगाना’ ‘विद्यार्थी संघम’ सहित ‘रेवोल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन’ (विरसम) और 11 अन्य जन संगठनों को माओवादियों का संगठन बता कर प्रतिबंधित कर दिया है। इंक़लाबी छात्र मोर्चा तेलंगाना सरकार के इस फासीवादी कदम का पुरजोर विरोध व निंदा करता है।

मोर्चा ने कहा है कि पूरे देश के शासक वर्गों को आज एक भूत सता रहा है- माओवाद का भूत। अपने हर विरोधी को माओवादी बता कर उसका दमन किया जा रहा है। चाहे किसानों का आंदोलन हो, मजदूरों का आंदोलन हो, छात्रों का आंदोलन हो या मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले संगठन हों, सबको माओवादियों द्वारा संचालित बताया जा रहा है। ऐसे आम लोगों के अंदर यह जानने की जबरदस्त उत्सुकता पैदा हो रही है कि आखिर ये माओवाद क्या है? माओवादियों की माँगें क्या हैं? वे कैसा समाज चाहते हैं? उन्हें बोलने क्यों नहीं दिया जा रहा? उन्हें क्यों प्रतिबंधित किया गया है?

विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस साम्राज्यवाद परस्त पूंजीवादी और अर्धसामंती व्यवस्था के हाथ जनता के खून से सने हुए हैं। देश के कोने – कोने में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, सब जनता का खून चूसने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इसका विरोध करने वालों और सच्चे लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों और एक्टिविस्टों का बर्बरतापूर्वक दमन किया जा रहा है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन लोगों के हाथ खुद खून से सने हुए हों उन्हें क्या हक है किसी संगठन को प्रतिबंधित करने का?

मोर्चा ने सवाल करते कहा है कि लोकतंत्र का ढोंग करके 70 सालों से देश की सत्ता पर लुटेरे वर्गों ने कब्जा कर रखा है। इन लुटेरों से यह पूछा जाना चाहिए कि किसकी इजाजत से वे देश की खेती- किसानी, उद्योगों, खानों- खदानों, जल- जंगल- जमीन आदि को कौड़ियों के भाव देशी- विदेशी पूंजीपतियों के हवाले कर रहे हैं। जो सरकारें आम जनता को अस्पताल, बेड व ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं उपलब्ध करवा पा रही हैं, असली अपराधी तो वो हैं। उन्हें क्या हक है स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की मांग उठाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करने का? अगर प्रतिबंधित ही करना है तो सबसे पहले RSS- BJP- बजरंग दल- विश्व हिंदू परिषद- हिन्दू युवा वाहिनी- सनातन संस्था जैसे देशद्रोही व दंगाई संगठनों को प्रतिबंधित किया जाए। रिवोल्यूशनरी राइटर्स एसोशिएशन (विरसम) पिछले 60 सालों से जनतंत्र की लड़ाई लड़ रहा है। इसकी स्थापना जाने- माने बुद्धिजीवी और क्रान्तिकरी कवि वरवर राव ने किया था। जो भीमा कोरेगांव के फ़र्ज़ी केस में हाल ही में जेल से जमानत पर रिहा हुए हैं।

क्या हमारे लिए गुस्से व शर्म की बात नहीं है कि देश के प्रतिष्ठित व वरिष्ठ लेखकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया है और जनसंहारों के अपराधी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री बने बैठे हैं? इन 16 जन संगठनों को प्रतिबंधित करने का तात्कालिक कारण है इनके द्वारा जन विरोधी व साम्राज्यवाद परस्त तीन कृषि कानूनों का विरोध, अलोकतांत्रिक नागरिकता संशोधन अधिनियम CAA-NRC का विरोध और भीमा कोरेगांव मामले में जानबूझकर फंसाये गए 16 एक्टिविस्टों की रिहाई के लिए इनके द्वारा संघर्ष किया जाना। इंक़लाबी छात्र मोर्चा देश के समस्त न्यायपसंद व जनवादी लोगों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, छात्र- छात्राओं व संगठनों से यह अपील करता है कि इन 16 संगठनों पर लगाये गए प्रतिबंध के खिलाफ उठ खड़े हों व आवाज़ उठाएं। क्योंकि आज अगर आप चुप रहे तो कल आपकी भी बारी आएगी। फिर कोई बोलने वाला शेष बचा नहीं रहेगा क्योंकि ये सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है।

मोर्चा मार्टिन निमोलर की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहता है –

पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था

फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था

फिर वे यहूदियों के लिए आए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता।

छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा : इस व्यवस्था को हथियार से नहीं जन आंदोलनों से ही बदला जा सकता है…

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शनिवार 3 अप्रैल को बीजापुर जिले के तर्रेम इलाके के पास सीआरपीएफ, कोरबा बटालियन और पुलिस के जवानों पर घात लगाकर नक्सलियों द्वारा किया गया हमला जिसमें 23 जवान मारे गए, 31 घायल हुए और एक नक्सलियों की पकड़ में है, पिछले 15 दिनों में सुरक्षा बलों पर किया गया तीसरा हमला है। इसके पूर्व भी 21 मार्च, 2021 को सुकमा में हुई मुठभेड़ में 17 जवान शहीद हुए थे और फिर 23 मार्च, 2021 को माओवादियों ने नारायणपुर में एक बस को उड़ा दिया था जिसमें 5 पुलिसकर्मी शहीद और 13 घायल हुए थे।

पिछले एक दशक में बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर जिलों के गांवों के आसपास एक दर्जन से अधिक बड़े नक्सल हमले सुरक्षा जवानों पर हो चुके हैं। 25 मई 2013 को बस्तर जिले की दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में महेंद्र कर्मा, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल,पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जान से हाथ धोना पड़ा था। अभी तक ऐसे हमलों में लगभग 350 से अधिक सुरक्षा कर्मी अपनी जान से हाथ धो चुके होंगे। इतनी ही संख्या में अथवा इससे अधिक माओवादी भी सुरक्षा कर्मियों के हमले में मारे गए होंगे।

शहरी क्षेत्र में एक आम धारणा बन चुकी है कि माओवाद अब कोई क्रांतिकारी आंदोलन न होकर अराजक आतंकवाद बन कर रह गया है। मैंने यहाँ उन घटनाओं का जिक्र नहीं किया है जिनमें आम आदमी याने आदिवासी अथवा अर्ध-नगरीय क्षेत्र में रहने वाला नागरिक या किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता जो माओवादियों का विरोध करता हो, पुलिस का मुखबिर होने के शक में माओवादियों के द्वारा तड़पा तड़पा कर मार दिया जाता है।

अनेक बार ऐसा भी होता है जब जैसे सुरक्षाकर्मियों को गलत जानकारी मिलती है या शक होता है और उनके हाथों निर्दोष लोग मारे जाते हैं वैसे ही माओवादी भी गलती से अथवा शक में आम निर्दोष लोग मारे जाते हैं। स्वाभाविक है अपनी इस गलती को दोनों पक्षों में से कोई स्वीकार नहीं करता है। इन घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाये कम है। यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपना असम दौरा बीच में छोड़कर वापस आए और घायल जवानों से मिले तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी बंगाल का चुनाव छोड़कर आए और घायल जवानों से मिले। स्वाभाविक तौर पर उनसे वे ही रटे रटाये जुमले सुनने मिले जो प्रत्येक गृहमंत्री और मुख्यमंत्री से अभी तक प्रत्येक घटना के बाद सुनने मिलते हैं। जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी। हमने नक्सलियों को सबक सिखाया और उनकी योजना चौपट की वगैरह।

इस लेख का विषय फोर्स की क्या गलती थी या उनसे कहाँ चूक हुई, इसका शोध करना नहीं है। हम सिर्फ यह चाहते हैं कि माओवादी सक्रियता के लगभग 6 दशकों के बाद माओवादी इस पर विचार करें कि वे किसकी मदद कर रहे हैं और किसको नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि आतंक फैलाकर या बनाए रखकर ही माओवाद को ज़िंदा रखना माओवादियों का मकसद है, तो वे अपने मकसद में फौरी तौर पर इसलिए कामयाब दिख सकते हैं की आतंक फैलाने में वे कामयाब हो गए हैं। पर, यदि वे यह सोचते हैं कि वे इस तरह के हमला करके देश में कायम व्यवस्था को कमजोर कर पाए हैं या उसे बदलने की दिशा में माओवाद को तनिक भी दूर आगे बढ़ा पाए है, तो वे पूरी तरह गलत है। या, वे यह सोचते हैं कि वे नगरीय इलाके के जनमानस को यह सन्देश देने में कामयाब हुए हैं कि माओवाद ताकतवर होकर बहुत आगे बढ़ आया है और अब बारी आ गयी है कि अर्बन जनता भी हथियार उठाकर उनके साथ हो ले, तो भी वे पूरी तरह गलत हैं क्योंकि इस हिंसा के फलस्वरूप पैदा होने वाली व्यग्रता का पूरा फायदा देश का शासक वर्ग ही उठा रहा है।

माओवादी जिस हथियारबंद संघर्ष के जरिये तथाकथित क्रान्ति का सपना आदिवासियों को दिखाते हैं, उसका कभी भी सफल न होना, दीवाल पर लिखा एक ऐसा सत्य है, जिसे माओवादी पढ़ना नहीं चाहते हैं। जिस देश में अभी तक मजदूर-किसान के ही एक बड़े तबके को, जो कुल श्रम शक्ति का लगभग 98% से अधिक ही होगा, संगठित नहीं किया जा सका हो। जिस देश में नौजवानों और छात्रों के संगठन लगभग मृतप्राय: पड़ गए हों और वामपंथी शिक्षा कुल शिक्षा से तो गायब ही हो, स्वयं वामपंथ की शैक्षणिक गतिविधियां लगभग शून्य की स्थिति में आ गई हों, वहाँ, शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित आदिवासी समाज को जंगल में क्रान्ति का पाठ पढ़ाकर, बन्दूक थमा कर क्रान्ति का सपना दिखाना एक अपराध से कम नहीं है।

इस बात में कोई शक नहीं कि जितनी हिंसा माओवाद के नाम पर राज्य सत्ता स्वयं देश के निरपराध और भोले लोगों पर करती है और सेना-पुलिस के गठजोड़ ने जो अराजकता, हिंसा,बलात्कार विशेषकर बस्तर के आदिवासी समाज पर ढा कर रखा है, उसकी तुलना में माओवादी हिंसा कुछ प्रतिशत भी न हो, पर, भारतीय समाज का अधिकाँश हिस्सा आज भी हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। राज्य अपनी हिंसा को क़ानून, शांति कायम करने के प्रयासों, देशद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे नारों के बीच छुपा जाता है, वहीं, माओवादियों के हर आक्रमण को या उनके नाम पर प्रायोजित आक्रमण को बढ़ा-चढ़ा दिखाता है, यह हम पिछले लंबे समय से देख रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में एक सोची समझी साजिश के तहत अर्बन-नक्सल की थ्योरी प्रचारित की जा रही है जिसकी आड़ में देश के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और शिक्षाविदों को निशाना बनाकर उन्हें राष्ट्र-द्रोह के मामलों में फंसाकर या तो जेल में डाला जा रहा है या आम देशवासियों की नजर में उनकी छवि देशद्रोही की बनाई जा रही है।

आज देश के शोषितों का बहुत बड़ा हिस्सा किसान सरकार के साथ सीधे-सीधे दो-दो हाथ कर रहा है और सरकार तथा उसके नुमाईंदे उस किसान समूह को आतंकवादी से लेकर राष्ट्र-द्रोही तक सिद्ध करने पर उतारू हैं। जैसे ही 3 अप्रैल की माओवादी घटना हुई, शासक पार्टी की आईटी सेल ने सोशल मीडिया में और सरकार के इशारे पर आज के इस बिक चुके डिजिटल मीडिया ने देश के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयओं को माओवाद के लिए जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना यह है;

“शहीद हुए जवानों पर हथियार भले ही नक्सलियों ने ताने थे मगर उनके हाथों में वो हथियार देश की किसी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे “ज्ञानी” प्रफ़ेसर ने पहुंचाए हैं। किसी “आला” दर्जे के साहित्यकार ने उन नक्सलियों की ट्रेनिंग का खर्चा उठाया है। रंगमंच के रंगों में सिर से पैर तक डूबे किसी “क्रांतिकारी” रंगकर्मी ने नक्सलियों के हमले की स्क्रिप्ट लिखी है। किसी “टॉप क्लास” फिल्मकार ने उन नक्सलियों के रहने-खाने की व्यवस्था की है। किसी एसी रूम में बैठकर खबर के खोल में संपादकीय बांच रहे किसी “निष्पक्ष” पत्रकार ने उन नक्सलियों की बंदूकों में गोलियाँ भरी हैं। उन जवानों ने हिडमा के साथियों से प्रत्यक्ष युद्ध में बलिदान नहीं दिया है, उन्होंने हमारे-आपके आस-पास मौजूद इन नामी-गिरामी हस्तियों से चल रहे परोक्ष युद्ध में बलिदान दिया है।”

यह एक जाना माना तथ्य है कि एक ऐसी व्यवस्था में, जैसी व्यवस्था में हम रह रहे हैं, एक ऐसी फासिस्ट सत्ता काबिज है जो किसी भी तरह की बौद्धिकता से आम देशवासी को दूर रखना चाहती है, ताकि उसकी सत्ता चुनौती से परे रहे। उस सत्ता को एन 5 राज्यों के चुनाव के समय इस घटना ने एक बड़ा अवसर दे दिया है। पूंजीवाद मात्र एक शासन की व्यवस्था नहीं है, वह एक जीवन शैली भी है और वह पैदा होने के साथ ही मनुष्य को अपने साँचे में ढालना शुरू कर देती है। यही कारण है कि उससे घृणा करने वाले ही उसे जीवन रस भी देते रहते हैं। इसे हथियार से नहीं जन-आंदोलनों से ही बदला जा सकता है। 

माओवादियों को सोचना होगा कि उनकी इन सभी गतिविधियों से आखिर किसकी मदद होती है? आज इस देश के अमन पसंद लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या एक ऐसी सत्ता से छुटकारे पाने की है, जिसने इस देश की सदियों पुरानी सहिष्णुता और भाईचारे को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जो, खुले आम, आम जनता के खिलाफ पूंजीपतियों के पक्ष में तनकर खड़ी है और जिसने अपना एकमात्र कार्य केवल किसी भी प्रकार से विरोधियों को समाप्त करके देश में फासीवाद को स्थापित करना घोषित करके रखा है। उस समय माओवादियों के ये आक्रमण अंतत: उसी सत्ता की मदद करने वाले हैं जिससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद में इस देश के शांतिप्रेमी लोग लगे हैं।

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला
अरुण कान्त शुक्ला

किसान आंदोलन में बढ़ता आक्रोश : सम्राट जनता का नहीं WTO, टाटा, अम्बानी, अडानी का चौकीदार है

Farmers launch T-shirt in support of the movement on the border "Zinda hai to Delhi Aaja, join the struggles"

Growing anger in peasant movement: King is not Chowkidar of public but WTO, Tata, Ambani and Adani

देश के किसान पिछले चार महीने से जनविरोधी तीन कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए बड़े ही व्यवस्थित व अनुशासनिक तरीके से दिल्ली की सरहदों पर बैठे हैं। किसान ईमानदारी से तीन कानूनों को रद्द करवाने के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन इसके विपरीत भारत की फासीवादी सत्ता किसानों को सुनने की बजाए पहले दिन से किसानों के खिलाफ झूठा प्रचार कर रही है। खेती बचाने के इस आंदोलन को कभी विपक्ष का आंदोलन, कभी खालिस्तानी या माओवादियों द्वारा संचालित आंदोलन कह रही है। मुल्क की सत्ता के इस व्यवहार से साफ जाहिर हो गया है कि सत्ता बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के लिए काम कर रही है व उसी के प्रति जवाबदेह है। मुल्क के सम्राट ने साफ सन्देश दे दिया है कि सम्राट जनता का चौकीदार न होकर WTO, टाटा, अम्बानी, अडानी का चौकीदार है।

टूट रहा है किसानों के धैर्य का बांध

ऐतिहासिक जन-आंदोलन कड़कड़ाती सर्दी से तपती गर्मी में प्रवेश कर रहा है। आंदोलन जितना लम्बा होता जा रहा है। वैसे-वैसे किसानों के धैर्य का बांध टूटता जा रहा है।

27 मार्च को पंजाब के भाजपा विधायक अरुण नारंग (Punjab BJP MLA Arun Narang) जो किसान कानूनों के पक्ष में प्रेसवार्ता करने जा रहे थे, आंदोलनकारी किसानों ने विधायक को घेर लिया। विधायक की बुरी तरह पिटाई करते हुए उनका काला मुँह कर दिया। किसानों में इतना ज्यादा आक्रोश था कि किसानों ने विधायक को नंगा कर दिया। पुलिस विधायक को बचाने के लिये एक दुकान के अंदर ले गयी। किसान दुकान के बाहर दो घण्टे बैठे रहे।

इससे पहले हरियाणा में भी किसान मुख्यमंत्री की रैली को उसके गृह हल्के में विफल कर चुके है, जननायक जनता पार्टी के नेताओं को दौड़ा चुके हैं। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला अपने गृह जिले सिरसा में सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं जा पा रहे हैं।

टोहाना से जेजेपी विधायक देवेंद्र बबली प्रेसवार्ता में स्वीकार कर चुके हैं कि सत्ता पक्ष का कोई विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री सार्वजनिक गांव में नहीं जा पा रहा है। गांव में जाने के लिए उनको लोहे के हेलमेट की जरूरत पड़ेगी।

हरियाणा के सांपला में जहां चौधरी छोटूराम का स्मारक बना हुआ है। चौधरी बीरेंद्र सिंह, जो चौधरी छोटूराम जी के जो नाती हैं, जो अपनी राजनीति चौधरी छोटूराम के नाम पर चलाते रहे हैं, सांपला हल्के ने भी उनको नाती होने के कारण बहुत प्यार किया है। लेकिन किसान आंदोलन में चौधरी बीरेंद्र सिंह सत्ता के साथ खड़े हो गए।

अपने जन्मदिन पर बीरेंद्र सिंह ने सांपला में छोटूराम के स्मारक में एक कार्यक्रम रखा हुआ था। लेकिन किसान वहां इस कार्यक्रम के खिलाफ इकट्ठा हो गए। उसके बाद कार्यक्रम के आयोजकों को लठों से दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया।

घटना के वीडियो में साफ-साफ किसानों का गुस्सा व आयोजकों का डर देख सकते हैं कि कैसे बाइक रैली में शामिल नौजवान बीरेंद्र की तस्वीर छपी टीशर्ट को उतार कर फेंक रहे हैं। बीरेंद्र समर्थकों के चेहरे पर जो डर हैं, वो साफ-साफ देखा जा सकता है।

आखिर किसान आक्रोशित क्यों हो रहे हैं

इस आक्रोश को समझने के लिए इस आंदोलन के सफर को जानना जरूरी है।

पंजाब से चला किसान आंदोलन जो धीरे-धीरे जन-आंदोलन में तब्दील होता गया। इस जन-आंदोलन ने सरदार अजीत सिंह के किसान आंदोलन की यादें एक बार फिर से ताजा कर दी। एक ऐसा किसान आंदोलन जो 9 महीने तक अंग्रेज सरकार के खेती कानूनों के खिलाफ चला था।

वर्तमान किसान आंदोलन ने पूरे विश्व में अपनी छाप छोड़ी है। इस आंदोलन ने साफ सन्देश दिया कि उनकी लड़ाई चौकीदार से लड़ने तक सीमित न होकर उसके लुटेरे साम्राज्यवादी मालिक से है।

आंदोलन की शुरुआत में सत्ता ने हजारों कोशिशें कीं किसानों को भड़काने की, लेकिन किसानों ने सयंम रखते हुए आंदोलन को पंजाब से दिल्ली और दिल्ली से पूरे मुल्क में फैला दिया।  

दिल्ली की सरहदों पर किसान व्यवस्थित व अनुशासनात्मक तरीके से बैठे हैं।

किसान आंदोलन 26 मार्च को 4 महीने पूरे कर चुका है। वैसे पंजाब में चले इस आंदोलन के समय को जोड़ लिया जाए तो ये बहुत ज्यादा लम्बा समय हो जाएगा। 26 नवंबर पंजाब व पंजाब के लगते हरियाणा के किसान जत्थेबंदियों का दिल्ली की तरफ कूच करना, भारत की फासीवादी सत्ता के इशारे पर हरियाणा की फासीवादी सत्ता के द्वारा गैर संवैधानिक तरीके से पंजाब के लगती सभी सरहदों को अन्तर्राष्ट्रीय सरहदों की तरह बैरिकेटिंग करके बन्द किया गया। दिल्ली को जाने वाले हरियाणा के सभी रास्तों को जगह-जगह जे.सी.बी. से खुदवा दिया गया। कंटीले तार से बाड़ की गई, भारी भरकम पत्थर सड़क पर डाल दिए गए। 

लेकिन आंदोलनकारी किसान सरकार के इन सब इंतजामों को ताश के पत्तों की तरह आसमान में उड़ा कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते गए।

हरियाणा का किसान जो इस समय तक चुप बैठा हुआ था। हरियाणा सरकार की इस तानाशाही के खिलाफ पंजाब के किसानों के साथ मजबूती से आ खड़ा हुआ।

हरियाणा व केंद्र की भाजपा सरकार ने हरियाणा की जनता को पंजाब की जनता से लड़वाने के बहुत ज्यादा प्रयास किये। छद्म किसानों के भेष में भाजपा व जजपा के नेताओं ने एसवाईएल के पानी का मुद्दा भी उठाया ताकि हरियाणा की जनता पंजाब की जनता के खिलाफ हो जाये।

हरियाणा की जनता को जाट बनाम गैर जाट के नाम पर लड़ाने की भी कोशिशें की गई। लेकिन हरियाणा की जनता  सत्ता के विभाजनकारी षड्यंत्र को ठुकराते हुए किसान आंदोलन का हिस्सा बन गई।

हरियाणा-पंजाब की एकता के बाद इस किसान आंदोलन ने गुणात्मक तरीके से रफ्तार पकड़ी। अब यह किसान आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। अब किसान आंदोलन में मजदूरों की भागीदारी भी बढ़ती गयी।

संयुक्त किसान मोर्चे के आह्वान पर 26 जनवरी को दिल्ली में किसान परेड में एक करोड़ बीस लाख मजदूर-किसान, 80 हजार के आस-पास ट्रेक्टर-ट्राली के साथ दिल्ली किसान परेड में शामिल हुए।

लाल किले पर हुआ सरकारी षड्यंत्र जिसके बाद किसान आंदोलन को देशद्रोही साबित करने के लिए सत्ता व गोदी मीडिया ने व्यापक अभियान चलाया। सीमाओं पर शांतिपूर्ण तरीके से बैठे किसानों पर भाजपा ने अपने गुंडों से हमला करवाया। किसान फिर भी शांत रहा।

किसान ने सत्ता के दमन का जवाब जनता की एकजुटता कर आंदोलन के रूप में दिया।

पूरे देश में अलग-अलग जगहों पर किसान महापंचायतें हुईं। इन महापंचायतों में करोड़ों मजदूर-किसानों ने हिस्सेदारी की, महिला किसानों की संख्या इस आंदोलन में बढ़ते क्रम में रही है।

लेकिन दूसरी तरफ सत्ता का रुख किसानों के प्रति नरम पड़ने की बजाए कठोर से कठोरतम होता गया।

सत्ता में शामिल भाजपा के नेताओं ने भाषा की सभी मर्यादाएं ताक पर रख दीं। आंदोलन में शामिल किसानों को आतंकवादी, माओवादी, खालिस्तानी कहा गया।

हरियाणा के कृषि मंत्री जयप्रकाश दलाल ने किसानों की मौत पर ठहाके लगाते हुए मजाक बनाया व जाहिलाना बयान दिया।

ऐसे ही हरियाणा से राज्यसभा सांसद रामचन्द्र जांगड़ा ने किसानों को निकम्मा, निट्ठल्ला, फ्री की रोटी तोड़ने वाले दारूबाज कहा।

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने किसानों को आतंकवादी और दलाल कहा।

सत्ता के लिए काम करने वाला गोदी मीडिया तो दिन रात ही सत्ता के इशारे पर किसानों के खिलाफ भ्रामक प्रचार करता ही रहता है।

प्रधानमंत्री महोदय ने तो किसान आंदोलनकारियों को नया नाम आंदोलनजीवीपरजीवी ही दे दिया।

पिछले दिनों हरियाणा में विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। इस अविश्वास प्रस्ताव ने उन सभी राजनेताओं को नंगा कर दिया जो जनता में तो किसान हितैसी बनने का ढोंग कर रहे थे लेकिन जब विधान सभा में किसान के हित में खड़ा होने की बात आई तो इन नेताओं ने किसानों की पीठ में छुरा घोंप दिया।

सत्ता द्वारा किसानों को मुल्क का गैर राजनीतिक नागरिक मानने की बजाए सत्ता का राजनीतिक दुश्मन मान लिया। इसी कारण सत्ता ने किसानों के साथ दुश्मन वाला व्यवहार किया। उनके खिलाफ व्यापक झूठा प्रचार किया।

सत्ता ने किसानों के साथ वार्ता करने का जो ढोंग किया। सत्ता की इस दोमुंही चाल, सत्ता के जाहिल व तानाशाही रुख, सत्ता का अमानवीय व्यवहार के कारण ही किसान जो शांति से आंदोलन कर रहा था वो अब सत्ता के खिलाफ आक्रोशित हो रहा है। किसानों का धैर्य जवाब देता जा रहा है। भविष्य में अगर सत्ता इसी तरह अड़ियल व्यवहार करती रहेगी व किसानों की जायज मांग तीन खेती कानूनों को रद्द नहीं करती है तो मुल्क को हिंसा को तरफ धकेलने की गम्भीर साजिश कर रही है।

Udey Che

सच का दस्तावेज है बस्तर और सच उजागर करने के खतरे तो उठाने ही होंगे : कमल शुक्ला

Kamal Shukla Journalist,

लोकजतन सम्मान से अभिनंदित होने के बाद बोले पत्रकार कमल शुक्ला

भोपाल/रायपुर 25 जुलाई 2020. छत्तीसगढ़ की आदिवासी जनता के यातनापूर्ण हालात को निर्भीक स्वर देने के साथ हर मुश्किल में उनके साथ खड़े होने की कीमत खुद दमन-उत्पीड़न सहकर चुकाने वाले जांबाज पत्रकार कमल शुक्ला (Kamal Shukla Journalist) को रायपुर और भोपाल में एक साथ हुए सम्मान समारोह में लोकजतन सम्मान 2020 से अभिनंदित किया गया। दोनों राजधानियों में जारी लॉकडाउन के चलते सम्मान समारोह का आयोजन सोशल मीडिया पर लाइव किया गया, जिसमें करीब 14 हजार दर्शकों ने भागीदारी की। लोकजतन सम्मान लोकजतन के संस्थापक सम्पादक शैलेन्द्र शैली (24 जुलाई 1957 – 07 अगस्त 2001) के जन्म दिन पर दिया जाता है।

इस मौके पर “सच्ची पत्रकारिता के कड़वे अनुभव” विषय पर बोलते हुए सम्मानित पत्रकार कमल शुक्ला ने बस्तर को सच का एक ऐसा दस्तावेज बताया जिसका पूरा सच अभी उजागर किया जाना बाकी है। उन्होंने देश और दुनिया के शोधार्थियों, लेखक, कवि, रचनाकार तथा इतिहासकारों को बस्तर आकर उसे जानने और उसके बारे में दुनिया को बताने का न्यौता दिया। उन्होंने दो पाटों के बीच पिसती बस्तर की आदिवासी आबादी के दर्दों के अनेक पहलू उजागर किये और बताया कि किस तरह एक तरफ सशस्त्र बल और दूसरी तरफ माओवादियों की बंदूकों से घिरे बस्तर के आदिवासी नागरिक अधिकारों और इंसानी जीवन जीने तक के अवसरों से वंचित कर दिए गए हैं।

उन्होंने बताया कि अकेले सलवा जुडुम, जिसे छत्तीसगढ़ की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने मिलकर चलाया था – के समय 700 आदिवासी गाँव जला दिए गए, हजारो परिवारों को अपनी खेती, जमीन, घर और जानवर छोड़कर शरणार्थी बन पड़ोस के प्रदेशों में जाना पड़ा। स्कूल और अस्पताल मिटा दिए गए। बिना किसी अपराध के सिर्फ आदिवासी होने की वजह से बस्तर को दण्डित किया गया। उन्होंने उम्मीद जताई कि मौजूदा राज्य सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली के जो दावे कर रही है वे अमल में आएंगे।

पुलिस और अर्ध सैनिक बलों की निरंकुश निर्ममता (Unbridled ruthlessness of police and paramilitary forces) के अनेक उदाहरण देते हुए कमल शुक्ला ने कहा कि बस्तर में हर रोज संविधान और लोकतंत्र की हत्या (Killing of Constitution and Democracy) हो रही है और जिस तरह सलवा जुडूम में टाटा, एस्सार आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा और योजना थी वही आज भी जारी है।

Governments are providing paramilitary forces to private companies to protect even illegal mining.

उन्होंने उदाहरण सहित बताया कि अवैधानिक खनन तक की सुरक्षा के लिए सरकारें निजी कंपनियों को अर्ध सैनिक बल उपलब्ध करा रही हैं। उधर भी सिपाही के रूप में गरीब का बेटा मरता है इधर भी आदिवासी के रूप में उसकी ही मौत होती है।

बस्तर की सांस्कृतिक लूट (Cultural plunder of Bastar) को उन्होंने अत्यंत चिंताजनक अत्याचार बताया और कहा कि कारपोरेट उन्हें बेदखल करके मार रहा है तो हिंदुत्ववादी संघ उनसे उनकी पहचान छीन कर उन्हें हिन्दू बनाना चाहता है।

Bastar’s identity is not Maoism

कमल शुक्ला ने कहा कि बस्तर की पहचान माओवाद नहीं है – बस्तर की पहचान हजारों साल पुरानी सभ्यता और विरासत है, जिसे तात्कालिक मुनाफे के लिए बर्बाद करने की साजिशें रची जा रही हैं।

लोकजतन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए 32 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में लगे कमल शुक्ला ने कहा कि वे अकेले नहीं हैं। अनेक पत्रकारों ने बस्तर का सच सामने लाया है और सच के लिए खतरे उठाने ही होते हैं सो उठाये हैं।

सम्मान समारोह की शुरुआत में लोकजतन सम्पादक बादल सरोज ने कमल शुक्ला के योगदान को पत्रकारिता के इतिहास में एक चमकीला पृष्ठ बताते हुए कहा कि पत्रकारिता और मीडिया के पराभव के इस दौर में भी 99 प्रतिशत पत्रकार आज भी ईमानदारी और बहादुरी से डटे हैं। समर्पण और लूट में हिस्सेदारी का काम कारपोरेट द्वारा खरीदे गए मीडिया घरानो ने किया है पत्रकारों ने नहीं।

कार्यकारी सम्पादक रामप्रकाश त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कमल शुक्ला को चुनौतियों के बीच सबसे मुखर बताते हुए उनकी सक्रियता के लिए शुभकामनाएं दी

उन्होंने बताया कि ठीक इसी तरह की पत्रकारिता के लिए लोकजतन प्रतिबद्ध है और लोक के जतन के रूप में बिना किसी कारपोरेट या मठ की मदद के निरंतर प्रकाशन की 21वी वर्ष में पहुँच गया है।

प्रमुख एक्टिविस्ट और गांधीवादी हिमांशु कुमार ने कमल शुक्ला की निडर पत्रकारिता की सराहना करते हुए उन्हें बस्तर और छत्त्तीसगढ़ में मानवाधिकारों तथा न्याय की लड़ाई का योद्धा बताया।

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने कमल शुक्ला के कई संघर्षों के संस्मरण सुनाये और बताया कि किस तरह अन्याय के खिलाफ वे अपनी नौकरी तक दांव पर लगाकर लड़ते रहे हैं।

इस अवसर पर लोकजतन की प्रकाशक सुश्री संध्या शैली, प्रबंधक सुरेंद्र जैन, सम्पादक मंडल के सदस्य प्रमोद प्रधान तथा उपेंद्र यादव भी उपस्थित थे।

लोकजतन की ओर से जानकारी दी गयी कि कोरोना संकट के ख़त्म होने के बाद रायपुर में एक भव्य आयोजन भी किया जाएगा।