नाटकों की संरचनात्मक कसौटी पर टीवी ड्रामा ‘मिर्जापुर’

Mirzapur 2 review

सच यही है कि अपराधी माफिया-राजनीतिज्ञों-पुलिस-नौकरशाही की धुरी पर टिका कोई भी ड्रामा ऐसा ही हो सकता है, जैसा मिरजापुर है। इस ड्रामा के सारे प्रमुख चरित्रों का अंत तक मर जाना और किसी स्वान संगी के साथ एक धर्मराज के बचे रहने के बजाय मिरजापुर ( हस्तिनापुर) की गद्दी पर ही एक प्रतिशोधी स्वान का बैठ जाना इस हिंसक नाटक का स्वाभाविक प्रहसनात्मक पटाक्षेप हो सकता था, जो इसमें हुआ है।