बच्चों की यौन जिज्ञासा को सुलझाने में माता-पिता की भूमिका

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

बच्चों की यौन जिज्ञासाओं को मोबाइल की पहुंच ने तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है

इंटरनेट के बढ़ते जाल ने जहां जीवन को आसान बना दिया है वहीं इसके कई नकारात्मक पहलू भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं. विशेषकर इस आधुनिक तकनीक ने बच्चों को मानसिक रूप से सबसे अधिक प्रभावित किया है. मोबाइल की पहुंच ने उनकी यौन जिज्ञासाओं को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया है. यही कारण है कि दुनिया भर में इस विषय पर गंभीरता से ध्यान दिया जा रहा है और स्थानीय भाषाओं में किताबें लिखी जा रही हैं ताकि बच्चों के साथ साथ अभिभावकों को भी इस मुद्दे पर जागरूक बनाया जा सके.

मराठी साहित्य ने बच्चों की कामुकता (children’s sexuality) के नाजुक विषय पर ध्यान नहीं दिया है. इस मायावी विषय पर इस भाषा में कोई सामग्री नहीं मिलती है. हालांकि एक वरिष्ठ सेक्सोलॉजिस्ट और काउंसलर डॉ. राजन भोसले (Senior Sexologist and Counselor Dr. Rajan Bhosale) ने सबसे पहले इस विषय पर मराठी भाषा में ‘आधुनिक पालकत्व-लैंगिकता व पलाकत्व जेव गुरफत्तात’ नामक एक पुस्तक लिखी है.

पेरेंटिंग एंड सेक्सुअलिटी पर किताब

इस संबंध में डॉ भोसले कहते हैं कि मेरे पाठक और शुभचिंतक मुझे आधुनिक समय के पालन-पोषण और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर एक किताब लिखने के लिए कहते रहे हैं. जिसके बाद मुझे ‘पेरेंटिंग एंड सेक्सुअलिटी’ पर एक किताब (book on parenting and sexuality) लिखने की भी जरूरत महसूस हुई. मुझे यह जानने में दिलचस्पी थी कि क्या होता है जब आप अपने बच्चे की सेक्स के बारे में जिज्ञासा का सामना करते हैं? यही कारण है कि इस विषय पर मराठी में एक पुस्तक प्रकाशित करने की आवश्यकता हुई.

अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. राजन भोसले ने कहा कि मैं पेशे से एक डॉक्टर और काउंसलर हूं. प्रतिदिन मैं अपने मरीजों की विभिन्न चिंताओं और चुनौतियों का समाधान करता रहा हूं. समय पर समाधान नहीं होने के कारण कुछ समस्याएं गंभीर रूप ले लेती हैं. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं जिसका अनुभव मैंने अपनी किताब में लिखा है.

डॉ. राजन भोसले ने कहा कि पालन-पोषण और रिश्तों में आने वाली गड़बड़ियों के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है. माता-पिता का रिश्ता किसी भी बच्चे के जीवन का पहला और सबसे महत्वपूर्ण बंधन होता है. इस संबंध के विशाल विस्तार में हमारे जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष शामिल हैं. माता-पिता और बच्चों के बीच बहुत कुछ ऐसा होता है जिसका हमारे व्यक्तित्व और बच्चों के हर पहलू पर गहरा प्रभाव पड़ता है. जब माता-पिता मानसिक या आर्थिक रूप से लड़खड़ाते हैं तो इसका प्रभाव बच्चों और समाज पर समान रूप से पड़ता है. एक डॉक्टर और काउंसलर के रूप में मैंने इसके कई उदाहरण नजदीक से देखे हैं. यदि हम समय पर कार्रवाई करते हैं तो इस नुकसान को रोका जा सकता है.

उन्होंने कहा कि मेरा अनुभव मुझे बताता है कि किसी समस्या के होने से पहले उसे रोकना संभव है. जब कोई समस्या आती है, तो हमें उसके मूल की तलाश करनी होती है जो एक कठिन काम है. मैंने अपनी पुस्तक में इसके कुछ उदाहरणों को उद्देश्यपूर्ण ढंग से उद्धृत किया है.

दरअसल सभी समस्याएं अज्ञानता, पूर्वाग्रह, विचारहीनता, गलतफहमी और दूरदर्शिता की कमी से उत्पन्न होती हैं.

समस्याओं पर काबू पाने के लिए उचित मार्गदर्शन और परामर्श प्राप्त करना आवश्यक है. यहां टेबलेट और दवा काम नहीं करेगी. डॉक्टर तुरंत दवाएं और गोलियां लिख देंगे लेकिन वे अपने मरीजों को पर्याप्त समय नहीं दे पाएंगे. ऐसी कई समस्याएं हैं जिन पर गोलियां काम नहीं करेंगी लेकिन उन्हें सुनना उन्हें समय देना होगा.

हमें काउंसलिंग के दौरान क्लाइंट के साथ समय बिताना होता है. मैं कई वर्षों से इस सिद्धांत का पालन कर रहा हूं. मैंने इस मुद्दे को परामर्श पाठ्यक्रम में शामिल किया है और हम पढ़ाते समय इस सिद्धांत पर जोर देते हैं. डॉक्टरों की भूमिका पर चर्चा (Discuss the role of doctors,) करते हुए डॉ भोसले ने कहा कि आप अपने काम में सक्रिय, ईमानदार और आगे आने वाले हो सकते हैं लेकिन आप बहुत से ऐसे लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जो तनाव और लगातार दर्द में हैं. यह कमी मुझे कई सालों से परेशान कर रहा था. इस पुस्तक के माध्यम से मैं कई माता-पिता से जुड़ना चाहता हूं जिनसे मैं नहीं मिल पाया हूं. इसलिए, मैंने इस पुस्तक को लिखने की चुनौती सहर्ष स्वीकार की.

बहुत ही विशाल और जटिल विषय है पेरेंटिंग

उन्होंने कहा कि पेरेंटिंग एक बहुत ही विशाल और जटिल विषय (Parenting is a very vast and complex subject.) है. मैंने किताब के लिए कामुकता से संबंधित कुछ ही सूत्र उठाए हैं. साथ ही अपने द्वारा निपटाए गए मामलों का रिकॉर्ड रखा है. मैंने अपने पाठकों के लिए कामुकता से संबंधित कुछ चुनिंदा मामलों का हवाला दिया है. लेकिन गोपनीयता बनाए रखने के लिए व्यक्तियों के नाम और स्थान बदल दिए हैं. मैंने अपने कुछ मुवक्किलों की केस हिस्ट्री का हवाला देते हुए उनकी सहमति भी मांगी है.

उन्होंने कहा कि जब माता-पिता को अपने बच्चों की यौन जिज्ञासाओं और यौन जागरूकता से निपटना होता है तो वे भ्रमित हो जाते हैं. मैं अपने प्रैक्टिस के 36 वर्षों से इसका अनुभव कर रहा हूं. जब पालन-पोषण और कामुकता टकराते हैं तो माता-पिता अक्सर भ्रमित हो जाते हैं.

इस पुस्तक के पीछे का उद्देश्य इस मुद्दे के बारे में जागरूकता पैदा करना है. मैंने यह दिखाने की कोशिश की है कि कामुकता के मुद्दे को कई अलग-अलग तरीकों से संबोधित करना संभव है. मैंने ऐसे सैकड़ों मामलों को संभाला है जिनमें माता-पिता और बच्चे आमने-सामने थे. मैंने भ्रम और परेशानियों को सुलझा लिया है.

उन्होंने कहा कि प्रत्येक मामला अपने आप में एक चुनौती भरा होता है. मैंने लगभग सभी मामलों से सीखा जो मैंने संभाला, उन्होंने मुझे नया नजरिया दिया, चीजों को देखने का नया नजरिया सिखाया है.

डॉ भोसले कहते हैं कि मराठी साहित्य ने इस विषय पर विशेष ध्यान नहीं दिया था जिससे यह और अधिक जटिल हो गए हैं. उदाहरण के लिए ट्रांस सेक्ससुअलिटी के मुद्दे (trans sexuality issues), डिस्फोरिक डिसऑर्डर, पीसीओसी (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम– polycystic ovary syndrome), एनाबॉलिक स्टेरॉयड, होमोसेक्सुअलिटी (homosexuality), गाइनेकोमास्टिया (gynecomastia), सैडिज्म (Sadism), एरोमांटिसिज्म (aromanticism), सेक्शुअल ऑब्सेसिव (Sexual obsessions), कंपल्सिव डिसऑर्डर और पोर्नोग्राफी की लत (Compulsive Disorder and Pornography Addiction) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं. मैंने उपरोक्त सभी के बारे में अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है. उन्होंने कहा कि हमारे पास मराठी में इन सभी शब्दों के पर्यायवाची शब्द भी नहीं हैं. यह केवल हमारे समाज की उदासीनता को दर्शाता है. हालांकि, ये मुद्दे बड़ी संख्या में उभरने लगे हैं. इससे कई लोगों की मानसिक स्थिति और रिश्ते खराब हो गए हैं और परिवार के लिए इन समस्याओं से निपटना मुश्किल हो गया है. इसलिए मुझे इन नाजुक लेकिन दबाव वाले विषयों पर लिखना महत्वपूर्ण लगा.

अलका गाडगिल

महाराष्ट्र

(चरखा फीचर)

वात्स्यायन के कामसूत्र से उठे सवाल

(डॉ. राजन भोसले से बातचीत के आधार पर लेख लिखा गया है)

Role of parents in solving children’s sexual curiosity

https://www.hastakshep.com/old/veda-bf-official-movie-trailer/

जानिए सेक्स क्या है? यौन स्वास्थ्य और यौन अधिकार क्या है?

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अक्सर सवाल होता है कि सेक्स क्या है? आज इस खबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक दस्तावेज के हवाले से चर्चा की गई है कि सेक्सुयल हेल्थ क्या है? यौन स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे क्या हैं? कामुकता की कार्य परिभाषा क्या है? Human sexuality (मानव कामुकता)/ लैंगिकता का अर्थ परिभाषा क्या है? Reproductive justice/ यौन अधिकार या यौन प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार क्या हैं? यौन स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण अधिकार क्या हैं?

Sexual health Definition in Hindi

यौन स्वास्थ्य (Sexual health in Hindi) व्यक्तियों, जोड़ों और परिवारों के समग्र स्वास्थ्य और कल्याण और समुदायों और देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आधारभूत है। यौन स्वास्थ्य, जब सकारात्मक रूप से देखा जाता है, तो कामुकता और यौन संबंधों के लिए सकारात्मक और सम्मानजनक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, साथ ही साथ आनंददायक और सुरक्षित यौन अनुभव होने की संभावना, जबरदस्ती, भेदभाव और हिंसा से मुक्त होती है। यौन स्वास्थ्य और कल्याण प्राप्त करने के लिए पुरुषों और महिलाओं की क्षमता निम्न पर निर्भर करती है :

सेक्स और कामुकता के बारे में व्यापक, अच्छी गुणवत्ता वाली जानकारी तक पहुंच;

असुरक्षित यौन क्रियाकलापों के प्रतिकूल परिणामों के प्रति उनकी संवेदनशीलता और उनके सामने आने वाले जोखिमों के बारे में ज्ञान;

यौन स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचने की क्षमता;

ऐसे वातावरण में रहना जो यौन स्वास्थ्य की पुष्टि करता है और उसे बढ़ावा देता है।

यौन स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे व्यापक हैं, और इसमें यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान, यौन अभिव्यक्ति, रिश्ते और आनंद शामिल हैं। उनमें नकारात्मक परिणाम या शर्तें भी शामिल हैं जैसे :

मानव इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस ( human immunodeficiency virus एचआईवी), यौन संचारित संक्रमण (sexually transmitted infections एसटीआई) और प्रजनन पथ के संक्रमण (eproductive tract infections आरटीआई) और उनके प्रतिकूल परिणामों (जैसे कैंसर और बांझपन) के साथ संक्रमण;

अनपेक्षित गर्भावस्था और गर्भपात;

यौन रोग;

यौन हिंसा; तथा

हानिकारक प्रथाएं (जैसे महिला जननांग विकृति, एफजीएम)।

सेक्स क्या है? | Sex Definition in Hindi

सेक्स उन जैविक विशेषताओं को संदर्भित करता है जो मनुष्य को महिला या पुरुष के रूप में परिभाषित करती हैं। जबकि जैविक विशेषताओं के ये सेट परस्पर अनन्य नहीं हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्ति हैं जिनके पास दोनों हैं, वे मनुष्यों को नर और मादा के रूप में अलग करते हैं। कई भाषाओं में सामान्य रूप से, सेक्स शब्द का प्रयोग अक्सर “यौन गतिविधि” के लिए किया जाता है, लेकिन तकनीकी उद्देश्यों के लिए कामुकता और यौन स्वास्थ्य चर्चाओं के संदर्भ में, उपरोक्त परिभाषा को प्राथमिकता दी जाती है।

यौन स्वास्थ्य क्या है? | Sexual and reproductive health definition in Hindi

वर्तमान कार्य परिभाषा के अनुसार, यौन स्वास्थ्य है:

“… कामुकता के संबंध में शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति; यह केवल बीमारी, शिथिलता या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं है। यौन स्वास्थ्य के लिए कामुकता और यौन संबंधों के लिए एक सकारात्मक और सम्मानजनक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, साथ ही साथ आनंददायक और सुरक्षित यौन अनुभव, जबरदस्ती, भेदभाव और हिंसा से मुक्त होने की संभावना होती है। यौन स्वास्थ्य प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए, सभी व्यक्तियों के यौन अधिकारों का सम्मान, संरक्षण और पूरा किया जाना चाहिए।” (डब्ल्यूएचओ, 2006ए)

लैंगिकता क्या है (Sexuality definition in Hindi)

यौन स्वास्थ्य को व्यापक रूप से कामुकता (जो यौन स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण व्यवहारों और परिणामों को रेखांकित करता है) पर विचार किए बिना परिभाषित, समझा या चालू नहीं किया जा सकता है। कामुकता की कार्य परिभाषा है :

“… जीवन भर मानव होने का एक केंद्रीय पहलू सेक्स, लिंग पहचान और भूमिकाएं, यौन अभिविन्यास, कामुकता, आनंद, अंतरंगता और प्रजनन शामिल है। कामुकता का अनुभव और विचारों, कल्पनाओं, इच्छाओं, विश्वासों, दृष्टिकोणों, मूल्यों, व्यवहारों, प्रथाओं, भूमिकाओं और संबंधों में व्यक्त किया जाता है। जबकि कामुकता में ये सभी आयाम शामिल हो सकते हैं, उनमें से सभी हमेशा अनुभव या व्यक्त नहीं होते हैं। लैंगिकता जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, कानूनी, ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक कारकों की परस्पर क्रिया से प्रभावित होती है।” (डब्ल्यूएचओ, 2006ए)

यौन अधिकार (Sexual rights in Hindi)

एक आम सहमति है कि कुछ मानवाधिकारों के सम्मान और संरक्षण के बिना यौन स्वास्थ्य प्राप्त और बनाए नहीं रखा जा सकता है। नीचे दी गई यौन अधिकारों की कार्य परिभाषा यौन स्वास्थ्य से संबंधित मानव अधिकारों पर जारी संवाद में एक योगदान है। कामुकता और यौन स्वास्थ्य के लिए मौजूदा मानवाधिकारों का अनुप्रयोग यौन अधिकार का गठन करता है। यौन अधिकार दूसरों के अधिकारों के लिए और भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा के ढांचे के भीतर, उनकी कामुकता को पूरा करने और व्यक्त करने और यौन स्वास्थ्य का आनंद लेने के सभी अधिकारों की रक्षा करते हैं।” (डब्ल्यूएचओ, 2006 ए, अद्यतन 2010)

“यौन स्वास्थ्य की पूर्ति इस हद तक बंधी है कि मानवाधिकारों का सम्मान, संरक्षित और पूरा किया जाता है। यौन अधिकार कुछ ऐसे मानवाधिकारों को शामिल करते हैं जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मानवाधिकार दस्तावेजों और अन्य आम सहमति दस्तावेजों और राष्ट्रीय कानूनों में मान्यता प्राप्त हैं।

यौन स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण अधिकारों में शामिल हैं :

समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार

यातना या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या दंड से मुक्त होने का अधिकार

निजता का अधिकार

स्वास्थ्य के उच्चतम प्राप्य मानक (यौन स्वास्थ्य सहित) और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार

विवाह करने और एक परिवार प्राप्त करने और इच्छुक पत्नियों की स्वतंत्र और पूर्ण सहमति से विवाह करने का अधिकार, और विवाह में और उसके विघटन पर समानता का अधिकार

अपने बच्चों की संख्या और दूरी तय करने का अधिकार

सूचना के अधिकार, साथ ही शिक्षा

राय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार, और

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए एक प्रभावी उपाय का अधिकार।

मानवाधिकारों के उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग के लिए आवश्यक है कि सभी व्यक्ति दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें।

Know what is sex? What is sexual health and sexual rights?

इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में सेक्स एजुकेशन चर्चा के केंद्र में क्यों है ?

chanel contos

Why is sex education in the center of discussion in Australia these days?

पश्चिम देशों में चैनल कॉन्टोस (Chanel Contos) के चर्चा में रहने की वजह है एक याचिका (Teach Us Consent movement with the vision to demolish rape culture in Australia), जो उसने अपने गृह देश ऑस्ट्रेलिया की अदालत में लगाई है। दरअसल, उसकी याचिका ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में यौन संबंध के बारे में शिक्षा सुधार (MAKE CONSENT EDUCATION MANDATORY) के लिए कॉल करती है।

यह कहानी लंदन में स्नातक की पढ़ाई कर रही ऑस्ट्रेलिया की एक ऐसी छात्रा की है, जो कुछ दिनों पहले तक एक आम छात्रा का जीवन जी रही थी, कोरोना महामारी के दौर में देर तक सोती रहती थी और अपने पूर्वी लंदन स्थित अपार्टमेंट में महीनों तक लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं (online classes during lockdown) में भाग लेती थी, लेकिन बता दें कि चैनल कॉन्टोस नाम की यह छात्रा इन दिनों चर्चा में है।

पश्चिम देशों में चर्चा में क्यों है चैनल कॉन्टोस? | Why is Chanel Contos in discussion in the West?

पश्चिम देशों में चैनल कॉन्टोस के चर्चा में रहने की वजह है एक याचिका, जो उसने अपने गृह देश ऑस्ट्रेलिया की अदालत (court of australia) में लगाई है। दरअसल, उसकी याचिका ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में यौन संबंध के बारे में शिक्षा सुधार के लिए कॉल करती है। इस तरह, उसके और उसके करीबी दोस्तों ने छात्रों के रूप में यौन उत्पीड़न के दर्दनाक अनुभवों (traumatic experiences of sexual assault) को फिर से महसूस करना शुरू दिया है, जो इस पूरे मुद्दे पर वैश्विक विमर्श के जरिए यौन संबंधी शिक्षा में सुधार (improving sex education) लाना चाहते हैं।

‘दी न्यूयॉर्क टाइम्स’ को दिए इंटरव्यू में मिस कॉन्टोस बताती है कि एक दिन अचानक उसने यौन उत्पीड़न से पीड़ित कई छात्र छात्राओं के टेस्टिमोनियल कलेक्ट करने शुरु कर दिए, फिर इस बारे में उसने अपने देश के सांसदों को जानकारियां दीं। यही नहीं, जब बाकी रूममेट रात को अपने-अपने कमरे के दरवाजे लगाकर सोते थे, तब भी वह अपने बेडरूम से वीडियो जारी करके इस मुद्दे पर एडवोकेसी करती थी।

स्कूलों में यौन संबंधी शिक्षा क्यों? | Why sex education in schools?

कॉन्टोस बताती है, ”ऐसा नहीं है कि यौन उत्पीड़न हर दिन होता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कोई उस पर बात नहीं करता है। यह बच्चों के साथ होता है, यहां तक कि किशोरों के साथ भी होता है, कई तो समान आयु वर्ग के लड़के या लड़कियां अपने दोस्तों का यौन उत्पीड़न करते हैं, इसलिए इस आयु वर्ग के छात्रों को इस मुद्दे पर जागरूक बनाने के लिए यौन शिक्षा की सख्त जरूरत है। यदि इन्हें स्कूलों में ही यौन उत्पीड़न के बारे में नहीं पढ़ाया गया, तो यही बच्चे बड़े होकर जब शक्तिशाली पदों पर पहुंचेगें, तब कार्यस्थल पर अपने प्रभाव का लाभ लेकर यौन उत्पीड़न करेंगे।

अब कॉन्टोस का लक्ष्य ऑस्ट्रेलिया की शिक्षा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाना है, जिसका सरोकार यौन संबंधी शिक्षा को ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में अनिवार्य तौर पर शामिल कराने से है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया सरकार भी इन दिनों यौन शिक्षा के मुद्दे पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है और यही वजह है कि वहां वर्तमान शिक्षा नीति पर समीक्षा की जा रही है।

वहीं, इस मुद्दे से जुड़े कई दूसरे छात्र यह मानते हैं कि यदि स्कूलों में छात्रों के बीच के अंतरंग संबंधों को जल्दी से जल्दी नेविगेट करने का कौशल नहीं सिखाया जाता है तो यह एक चूक है, जो आंशिक रूप से किशोरों के बीच यौन उत्पीड़न और यौन हमले (sexual harassment and sexual assault) की व्यापकता के लिए जिम्मेदार है।

यौन शिक्षा के मामले में भारत की स्थिति | India’s position in sex education

इधर, भारत के संदर्भ में इस तरह के विमर्श को देखा जाए तो वर्ष 1994 में जनसंख्या और विकास पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के किशोर और युवाओं के यौन प्रजनन अधिकारों की पुष्टि की गई थी। इसके तहत भारत सरकार स्कूलों में किशोरों के लिए मुफ्त व अनिवार्य व्यापक लैंगिक शिक्षा प्रदान करने के लिए बढ़ावा देती है।

वर्ष 2007 में भारत सरकार ने किशोरों के लिए यौन शिक्षा कार्यक्रम (sex education program) की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम में बॉडी इमेज, हिंसा व दुर्व्यवहार, लिंग व लिंगभेद और यौन रोग जैसे संवेदनशील मुद्दों को शामिल किया गया। इसमें अहम बात यह रही कि अंतरंग संबंधों के बारे में खुलकर बातचीत को आवश्यक बताया गया था।

इस बारे में दिल्ली राज्य शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद में सहायक प्रोफेसर आलोक कुमार मिश्रा बताते हैं कि भारत में यौन शिक्षा (Sex education in India) को लेकर एक तरह की चुप्पी ही रही है। हालांकि, दिल्ली के स्कूलों में किशोरियों के लिए एक कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें पीरियड्स के बारे में महिला शिक्षिकाएं लड़कियों को जानकारियां देती हैं और सेनेटरी पैड्स वितरित करती हैं।

क्या स्कूलों में बच्चों को यौन शिक्षा मिलनी चाहिए?

वह कहते हैं, ”सामाजिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए यौन शिक्षा स्कूली बच्चों को दी जा सकती है, क्योंकि यह स्वास्थ्य और मनोविज्ञान कारकों को प्रभावित करता है। हम नहीं चाहते हैं कि अधूरी, गलत और अफवाह आधारित सूचनाएं पाकर बच्चे भटक जाएं।”

मीटू कैंपेन का अगला चरण

दूसरी तरफ, पश्चिमी मीडिया इस कैम्पेन को उन युवा प्रचारकों की लहर का हिस्सा मानती है, जो ऑस्ट्रेलिया में मीटू (MeToo) कैम्पेन को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं, जहां इसकी शुरुआत धीमी मानी जाती है।

वहीं, यौन उत्पीड़न के विरोध में कार्य रहा एक नया संगठन (A new organization working against sexual harassment), टीच यस कंसेंट (Teach Us Consent) अब इस बात की एडवोकेसी के लिए सामने आया है कि बच्चों को स्कूलों में यौन उत्पीड़न के बारे में संबोधित किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे जैसे-जैसे परिपक्व हों, वे यौन उत्पीड़न और डिजिटल उत्पीड़न (digital harassment) जैसे विषयों के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें और हाई स्कूल तक पहुंचते हुए इस तरह की चुनौतियों से भलीभांति निपट भी सकें।

हालांकि, पश्चिमी देशों में एक वर्ग यौन शिक्षा को लागू कराने के मामले में असहमत नजर आता है। यही नहीं, एक वर्ग इसके विरोध में भी है जो यह मानता है कि ऐसी शिक्षा छात्रों को यौन संबंध बनाने के लिए उकसा सकती है। इस बारे में कॉन्टोस कहती है, ”संयम एक विकल्प है, जिसका अर्थ यौन सहमति नहीं होता।”

यौन उत्पीड़न पर घिरी ऑस्ट्रेलिया सरकार (Australian government)

पिछले एक साल के दौरान ऑस्ट्रेलिया में बलात्कार और यौन उत्पीड़न के प्रकरणों में तेजी आई है, यहां तक कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों (rape and sexual assault allegations) से सरकार का ऊपरी स्तर भी गिरफ्त में है, ऐसे में वहां यौन संबंधी शिक्षा को लेकर एक माहौल बन रहा है और इस दिशा में सरकार भी सहमति के आधार पर कोई बड़ा निर्णय लेना चाहती है।

एक वर्ष के दौरान यौन उत्पीड़न में 61 प्रतिशत की वृद्धि

दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य न्यू साउथ वेल्स (New South Wales) में पुलिस द्वारा सार्वजनिक की गई रिपोर्ट के मुताबिक यौन उत्पीड़न में वहां एक वर्ष के दौरान 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

यह भी एक वजह है कि यौन संबंधी शिक्षा के लिए दाखिल की गई याचिका के समर्थन में एक सप्ताह के भीतर 44 हजार से अधिक ऑस्ट्रेलिया के नागरिकों द्वारा हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।

यौन संबंधों के लिए सहमति पर आधारित शिक्षा (Consent based education for sex)

दक्षिण पूर्वी ऑस्ट्रेलिया स्थित एक राज्य विक्टोरिया (The state of Victoria) ने घोषणा की है कि वह कम उम्र से ही यौन संबंधों पर सहमति शिक्षा को अनिवार्य कर देगा। वहीं, अगले वर्ष जुलाई में ऑस्ट्रेलिया के ही क्वींसलैंड राज्य (Queensland state) ने भी कहा है कि वह यौन सहमति पर शिक्षा करेगा, जो अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट होगी।

दूसरी तरफ, समाजशास्त्र की प्रोफेसर जेसिका रिंगरोज (Jessica Ringrose) ने पिछले दिनों ब्रिटिश मीडिया के साथ बातचीत के दौरान कहा कि सहमति से संपर्क और यौन शिक्षा से बच्चों में आत्म-सम्मान की भावना बढ़ेगी, वे रिश्तों में सीमाओं की समझ को समझेंगे और लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना सीखेंगे। इस बारे में वह कहती हैं, ”यह पहले होना चाहिए, क्योंकि सभी शोध इसकी ओर इशारा करते हैं।”

जेसिका रिंगरोज यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (University College London) में और लिंग, कामुकता और शिक्षा मामलों की विशेषज्ञ हैं।

सेक्स एजुकेशन का पर्याय बन गया है चैनल कॉन्टोस का नाम

वहीं, ऑस्ट्रेलियाई मीडिया भी यौन संबंधों पर सहमति शिक्षा पर चर्चा कराने के लिए 23 वर्षीय कॉन्टोस की ओर रुख कर रही है और केवल कुछ महीनों में ही चैनल कॉन्टोस का नाम सेक्स एजुकेशन का पर्याय बन गया है। इस मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन (Prime Minister Scott Morrison) ने चैनल कॉन्टोस से मुलाकात का वादा किया है।

दरअसल, चैनल कॉन्टोस की चर्चा इसलिए भी अधिक है कि उन्होंने यौन शिक्षा में सुधार के लिए अपने देश से करीब दस हजार मील दूर रहकर भी राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रवक्ता की अप्रत्याशित भूमिका निभाई है।

जब 13 साल की थी तब हुआ था यौन उत्पीड़न

कॉन्टोस बताती हैं कि जब वह 13 साल की थी तो एक लड़के ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। उस लड़के ने कॉन्टोस को आतंकित किया था और बाद में उसने एक अन्य दोस्त के साथ भी यौन उत्पीड़न किया था। वह इस उत्पीड़न की शिकायत न करने के कारण खुद को दोषी मानती है और कहती है कि ऐसी शिकायतों का अच्छी तरह से निराकरण करने के लिए स्कूलों में भी पारदर्शिता की कोई व्यवस्था नहीं होती है।

कॉन्टोस कहती है, ”यदि स्कूल में ही उस लड़के को अपने दोस्तों के साथ सम्मान करना सिखाया जाता और लैंगिक समानता (gender equality) के प्रति संवेदनशील बनाया जाता तो शायद वह ऐसा नहीं करता!”

शिरीष खरे

(शिरीष खरे पुणे स्थित स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। न्यूज क्लिक में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

महिला स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए ज़रूरी है आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक समानता

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भारत समेत एशिया पैसिफिक क्षेत्र के अनेक देशों की अधिकांश महिलाओं के लिए प्रजनन न्याय (रिप्रोडक्टिव जस्टिसReproductive justice) तक पहुँच एक स्वप्न मात्र ही है। प्रजनन न्याय का अर्थ (Meaning of reproductive justice) है व्यक्तिगत शारीरिक स्वायत्तता बनाए रखने का मानवीय अधिकार; यह चुनने और तय करने का अधिकार कि महिला को बच्चे चाहिए अथवा नहीं चाहिए; और इस बात का सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक अधिकार कि बच्चों का लालन पालन एक सुरक्षित वातावरण में किया जा सके।

प्रजनन न्याय क्या है | What is reproductive justice

प्रजनन न्याय शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1994 में शिकागो में अश्वेत महिलाओं के एक समूह द्वारा प्रजनन स्वास्थ्य हेतु एक सुव्यवस्थित न्यायिक ढांचे का निर्माण करने के लिए किया गया था। प्रजनन न्याय वह कड़ी है जो प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं (जिनमें गर्भपात और परिवार नियोजन शामिल हैं) तक पहुँच के कानूनी अधिकार को उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक असमानताओं के साथ जोड़ती है जो महिलाओं की प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बाधित करती हैं। प्रजनन न्याय के मुख्य घटक हैं सुरक्षित गर्भपात, सस्ते गर्भनिरोधक और यौन शिक्षा (sex education) तक समान पहुँच तथा हर प्रकार की एवं हर स्तर पर यौन हिंसा से मुक्ति। 10 वीं एशिया पैसिफिक कॉन्फ्रेंस ऑन रिप्रोडक्टिव एंड सेक्सुअल हैल्थ एंड राइट्स (10th Asia Pacific Conference on Reproductive and Sexual Health and Rights) के आठवें वर्चुअल सत्र में इन सभी मुद्दों पर खुल कर चर्चा हुई।

दक्षिण पूर्व और दक्षिण एशिया में असुरक्षित गर्भपात के कारण होने वाली मृत्यु दर (Unsafe abortion mortality) बहुत अधिक है – मातृ मृत्यु दर का 13%. तीन एशियाई देशों – इराक़, लाओस और फिलीपींस- में गर्भपात कानूनी रूप से अवैध है. 17 देश बिना किसी प्रतिबंध के गर्भपात की अनुमति देते हैं जबकि कुछ अन्य देशों में शर्तो के साथ अनुमति है। लेकिन उन देशों में भी जहाँ तुलनात्मक रूप से उदार गर्भपात कानून हैं (जैसे कंबोडिया, भारत और नेपाल) बहुत सी महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात प्रक्रिया पाने के लिए अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है. गर्भपात से जुड़े हुए सामाजिक कलंक और इसके विषय में जानकारी का अभाव इन सेवाओं तक महिलाओं (विशेषकर अविवाहित महिलाओं) की पहुँच को और भी दुर्गम बना देता है।

एशियन पैसिफिक रिसोर्स एंड रिसर्च सेंटर फॉर वीमेन (ऐरो) की कार्यकारी निदेशक सिवानन्थी थानेनथिरन का मानना है कि इसका मुख्य कारण है दक्षिणपंथी सरकारों के उदय के साथ-साथ धार्मिक कट्टरवाद और उसकी लिंग-विरोधी विचारधारा का बढ़ता हुआ प्रभाव। उनके अनुसार, “अतिवादी विचारधाराएं महिलाओं के शरीर, स्वायत्तता, यौनिकता और उनके दैनिक जीवन पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती हैं. गर्भपात का अपराधीकरण पितृसत्तात्मकता का द्योतक है। महिलाओं के लिए सुरक्षित गर्भपात का तात्पर्य केवल एक विकल्प ही नहीं अपितु उस तक उनकी पहुंच के बारे में भी है. सरकारों को उन सभी कानूनी बाधाओं को समाप्त करना चाहिए जो महिलाओं की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को, जिसमें सुरक्षित गर्भपात भी शामिल है, सीमित करती हैं। नीति आधारित विश्लेषणात्मक ढांचे के माध्यम से गर्भपात और संबंधित मुद्दों पर साक्ष्य आधारित डेटा तैयार करना नीति को प्रभावित करने और जबाबदेही को मजबूत करने के लिए आवश्यक है.”

एशिया सेफ़ एबॉर्शन पार्टनरशिप (Asia Safe Abortion Partnership) की सह-संस्थापक डॉ सुचित्रा दलवी सुरक्षित व स्व-प्रबंधित गर्भपात के राजनीतिक महत्व (Political importance of safe and self-managed abortion) को समझने के लिए कहती हैं. उनका कहना है कि सरकारों को गर्भवती महिलाओं के लिए इसे उपलब्ध कराना चाहिए. एक गर्भवती महिला के पास अपनी गर्भावस्था का सही आकलन करने के लिए पर्याप्त जानकारी होने के साथ-साथ यह सुविधा भी उपलब्ध होनी चाहिए कि वह स्व-प्रबंधित गर्भपात के लिए आवश्यक दवाएं स्वयं खरीद सके और बिना अस्पताल जाए अपनी पसंद के सुरक्षित स्थान पर गर्भपात की प्रक्रिया का संचालन स्वयं कर सके। साथ ही, यदि प्रक्रिया के किसी भी चरण में आवश्यकता हो तो, उसे स्वास्थ्य सेवा प्रदाता तक पहुंचने में भी सक्षम होना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था के बोझ को कम करने के लिए और महिलाओं को सुविधा प्रदान करने हेतु स्व-प्रशासित चिकित्सीय गर्भपात एक अच्छा उपाय है और इस प्रकार के स्व-प्रबंधित गर्भपात की सुरक्षा के समर्थन में आँकड़े उपलब्ध हैं.

भारत, नेपाल, बांग्लादेश, वियतनाम और चीन सहित 10 देशों में किये गए 18 अध्ययनों की एक व्यवस्थित समीक्षा से यह पता चलता है कि स्व- प्रशासित चिकित्सीय गर्भपात, किसी भी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता द्वारा प्रशासित किये गए गर्भपात जितना ही सुरक्षित और प्रभावी है. इसलिए महिलाएं बगैर किसी सेवा प्रदाता के इसे प्रभावी रूप से स्वयं कार्यान्वित कर सकती हैं.

इन निष्कर्षों को प्रस्तुत करते हुए विमेंस रिफ्यूजी कमीशन की अनुसंधान सलाहकार कैथरीन गम्बीर ने कहा कि,

“नीति निर्माताओं को वैश्विक व राष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सीय गर्भपात दिशा निर्देशों में आवश्यक संशोधन करने चाहिए ताकि महिलाओं को नैदानिक मार्गदर्शन के साथ, अथवा उसके बिना भी, प्रारम्भिक गर्भपात प्रक्रियाओं का स्व संचालन करने का विकल्प मिल सके। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ में भी कमी आएगी। वर्तमान समय में कोविड-१९ की वजह से अस्पताल तक पहुँच बाधित होने के कारण यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। इसके अलावा लिंग-आधारित हिंसा (जिसमें अंतरंग साथी-हिंसा भी शामिल है) की बढ़ती हुई घटनाओं को देखते हुए यह और अधिक आवश्यक हो जाता है कि महिलाओं की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की देखभाल और गर्भनिरोधकों (जिसमें आपातकालीन गर्भनिरोधक व चिकित्सा गर्भपात भी शामिल हैं), तक पहुँच को यथाशीघ्र सुनिश्चित किया जाए”.

Post-abortion care contraceptive provision

मानवीय आपदा में भी अनुकूल क़ानूनी वातावरण का होना सेवा प्रदाताओं द्वारा व्यापक गर्भपात देखभाल प्रदान कराने के लिए ज़रूरी है। ऐसे समय में महिलाओं और लड़कियों के लिए असुरक्षित गर्भपात का ख़तरा बढ़ जाता है जिसके परिणामस्वरूप मातृ मृत्यु दर बढ़ती है।व्यापक गर्भपात देखभाल में शामिल हैं मासिक धर्म नियमन (एक प्रक्रिया जो गर्भधारण को रोकने के लिए मासिक धर्म को नियमित करती है); गर्भपात के बाद की देखभाल; और गर्भनिरोधक प्रावधान और परामर्श।

बांग्लादेश की आइपास में कार्यरत यौन और प्रजनन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, मारिया पर्सन, ने बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में व्यापक गर्भपात देखभाल के प्रावधान का उदाहरण देते हुए बताया कि बांग्लादेश सरकार गैर सरकारी संगठनों की सहायता से मुफ्त में गर्भपात देखभाल सेवाएं प्रदान करके इस मानवीय कार्य का नेतृत्व कर रही है. ज्ञात हो कि कॉक्स बाजार में म्यांमार से विस्थापित 900,000 से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं.

बांग्लादेश में गर्भपात की कानूनी अनुमति (Legal permission for abortion) तभी है जब महिला का जीवन खतरे में हो, अन्यथा गर्भपात अवैध है. लेकिन मासिक धर्म नियमन कानूनी रूप से मान्य है तथा अस्पतालों में व्यापक रूप से प्रचलित भी है.

पर्सन ने कहा कि मासिक धर्म नियमन (Menstrual regulation) के कानूनी रूप से मान्य होने के कारण तथा नागरिक समाज संगठनों और सरकार के मिले-जुले सहयोग से कॉक्स बाजार में व्यापक गर्भपात देखभाल का प्रावधान संभव हो सका है।

इंडोनेशिया– जो एक मुस्लिम देश है- में भी गर्भपात केवल चिकित्सीय कारणों, गंभीर जन्मजात दोषों और बलात्कार के मामलों में ही कानूनी रूप से मान्य है. सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम केवल विवाहितों के लिए है. स्वास्थ्य सेवाओं में भी आमतौर पर गर्भपात एक निंदित विषय है.

यह जानकारी देते हुए संयुक्त राष्ट्र के यूएनएफपीए, इंडोनेशिया में प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रम विशेषज्ञ, आर्यंती रिजनावती इमा ने कहा कि

“गर्भपात एवम् गर्भपात संबंधी जटिलताओं से सम्बंधित आँकड़ों का होना बहुत महत्वपूर्ण है. उदाहरणार्थ- यदि गर्भपात सम्बन्धी बहुत अधिक ज्यादा जटिलताएं समस्यायें हैं तो वे असुरक्षित गर्भपात की ओर इंगित करती हैं, और यह नीति निर्माताओं को इसके बारे में कुछ ठोस कदम उठाने के लिए मजबूर करेगा. अतः हमें चर्चाओं में और अधिक डेटा लाना होगा तथा उसका उचित विश्लेषण भी करना होगा ताकि स्थिति को बेहतर किया जा सके।”

इंडोनेशिया में इस्लाम की व्याख्या काफी उदार होते हुए भी गर्भपात के संदर्भ में इसकी समझ बहुत ही संकीर्ण है. रिजनावती का मानना है कि उदारवादी धर्मगुरुओं का समर्थन ले कर, उनकी सहायता से महिलाओं के लिए यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार के मुद्दे को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.

मैरी स्टॉप्स इंटरनेशनल, कंबोडिया की राष्ट्रीय निदेशक ऐमी विलियम्सन मानती हैं कि गर्भपात की प्रतिबंधात्मक पहुंच पुराने कानूनों और नीतियों में बंधी हुई है। कोविड-19 महामारी ने इस बात को और अधिक जरूरी बना दिया है कि अनपेक्षित गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात में वृद्धि को रोकने के लिए इन नीतियों में परिवर्तन लाया जाय। अब यह और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि सरकारें गर्भपात को आवश्यक स्वास्थ्य सेवा के रूप में मान्यता दें. हमें गर्भपात से जुड़े हुए कलंक को मिटाना होगा और यह प्रयत्न करना होगा कि सभी लोग, विशेषकर युवा समुदाय, इसके बारे में सहज रूप से बात कर सकें.

सभी महिलाओं के लिए सुरक्षित गर्भपात सेवाओं की आवश्यकता है. लेकिन हमारा दीर्घकालिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी गर्भ अनचाहा न हो। यह तभी संभव हो सकता है जब प्रत्येक स्त्री और पुरुष उपलब्ध गर्भनिरोधक विकल्पों का उपयोग करने में सक्षम हो। महिलाओं के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और जीवन पर नियंत्रण (Sexual and reproductive health and life control of women) करने वाली पितृसत्तात्मकता आधिपत्य की दीवार को ध्वस्त करना ही होगा।

माया जोशी

(भारत संचार निगम लिमिटेड – बीएसएनएल – से सेवानिवृत्त माया जोशी अब सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) के लिए स्वास्थ्य और विकास सम्बंधित मुद्दों पर निरंतर लिख रही हैं)

ऐसे लोग उन भेड़ियों से कम नहीं, जो महिला सशक्तीकरण का चारा महज़ जिस्मानी आज़ादी तक मानते हैं

Hastakshep new

आज के युवाओं में विवाह को लेकर उदासीनता के कारण | The reasons for the apathy about marriage among today’s youth

किसी भी मज़हब की बात कीजिए, विवाह/ शादी में यौनिक संबंधों को ही अहम माना गया है। प्यार का तो जिक्र ही नहीं मिलता। मनपसंद शादी के नाम पर चेहरे से ज्यादा खानदान की इज्ज़त के रूप में जाने जानी वाली नाक कट जाती है और बिना जांच पड़ताल किए दान-दहेज के साथ बेटी को रुख़सत करने से कोई गुरेज़ नहीं इस समाज के सभ्य लोगों को।

इसीलिए आज के युवाओं में विवाह को लेकर उदासीनता अन्य कारणों में इक अहम मुद्दा है। आज भी लोगों को यौनिकता की स्वतंत्रता (Freedom of sexuality) या यौन शिक्षा पर चर्चा (Discussion on sex education) करने से घबराते देखती हूं।

कॉलेज में मुझे “क्राइम अगेंस्ट वीमेन(Crime against women) सब्जेक्ट मिला था पढ़ाने को। ज़ाहिर है क्लास में लड़कियों से ज्यादा लड़कों की संख्या, ऊपर से महिला शिक्षिका। मैं कभी असहज तो नहीं हुई, लेकिन बाकी चीज़ों पर अफसोस हुआ। उसमें कुछ वो बच्चियाँ भी थीं, जो कानून पढ़ने तो भले ही आ गई थीं, दुनियां से शोषण, असमानता को नेस्तनाबूद करने के ख्वाब भी थे उनकी आंखो में, लेकिन फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी वाली छाप पूरी दिखाई पड़ती थी।

आप क्यों नहीं समझते, किसी भी मुद्दे पर जब तक हेल्थी चर्चा या विचार विमर्श नही होगा, सवाल महज़ सवाल बने रहेंगे। कोई भी विषय हो उसपर चर्चा के बाद ही परिणाम पर पहुंचा जाता है लेकिन अक्सर उल्टा होता देखा है। समस्या की आहट पर हमारे द्वारा इसे नजरअंदाज/ नकार दिया जाता है और समस्या का गंभीर रूप धारण करने पर पितृसत्ता, फलाना-ढिमाका कर खानापूर्ति कर रो- रोकर महिमामंडन किया जाता है।

राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक लगभग हर मुद्दे पर यही ढर्रा है।

भारत के कानून (Laws of india) भी लंबे समय से यहां के सामाजिक ढाँचे, पितृसत्ता सोच और कल्चर का पालन-पोषण करने में मददगार साबित हुए हैं। यौन स्वतंत्रता के अधिकार (Sexual freedom rights) की बात महज़ पुरूषों तक सीमित है। महिलाओं के हिस्से में कानून तो आए, लेकिन साथ ही सामाजिक जिम्मेदारी का बोझ भी। मैं लड़की हूं, सेक्स पर कुछ लिखूं तो कमेंट में शाबाशी और इन्बाक्स में अपनी असल औक़ात के नंगे नज़र आते हैं लोग। जैसे सेक्स जैसे मुद्दे पर बात करना इनके पिता और दादाओं की निशानी रहा हो और अब इनका कॉपीराइट।

मैं किसी भी इंसान की निजी ज़िंदगी (धर्म, रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान आदि) पर कोई कमेंट नहीं करती, यहां तक कि तब भी नहीं जब कोई अपनी नीचता की हद पार कर चुका हो। मैं उन लोगों का भी समर्थन हरगिज़ नहीं करती जो अपनी मर्दानगी सिर्फ जिस्म के इक अंग से आंकते हैं और आखेटक की तरह जाल बिछाकर सेक्स की आज़ादी का समर्थन करते हैं।

मुझे ऐसे लोग उन भेड़ियों से कम नहीं लगते जो सशक्तीकरण का चारा महज़ जिस्मानी आज़ादी तक मानते हैं

मुझे शराब और सिगरेट पीती लड़कियाँ ऐसी ही लगतीं जैसे बाकी सब। जजमेंटल क्यों होना भला? बस अखरता है कि महिलाओं ने भी शोषक वर्ग के बनाएं सांचे शराब, सिगरेट, छोटे कपड़ों को, आधी रात सड़क पर घूमने को ही अपनी आजादी मान लिया, जबकि इससे उलट उनकी नजर में आज़ादी का मतलब होना था सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक पक्षधरता समानता और सुरक्षा।

In many countries, coercion by a wife by a husband is considered rape.

बहुत से देशों में पति द्वारा पत्नी से जबरदस्ती सहवास को बलात्कार माना जाता है लेकिन अभी भारतीय संस्कृति में ऐसे किसी फैसले की आस ही अपने आप में छलावा से बढ़कर कुछ नहीं हैं। सामाजिक नैतिकता और कानून के दरमियाँ जो गहरी खाई है, उसे पाटने में जाने कितना समय लगे? लेकिन इस खाई के इक तरफ “माई बॉडी, माई लाइफ, माई चॉइस” दूसरी तरफ सामाजिक सरोकार और चरित्र का सवाल। कई बार समझना जितना आसान होता है, समझाना उतना ही मुश्किल हो जाता है।

Gender equality and dignity of woman

लिंग समानता और स्त्री की गरिमा क्या कभी पूरा होगा ये सपना या फिर इसकी आड़ में शुरू होगा पितृसत्ता की नई क्रांति का नया दौर। ऐसी क्रांति जो जानी जायेगी ‘सम्पूर्ण यौन क्रांति‘ के नाम से, विषय जितना संवेदनशील है उतना ही गहराई से गंभीरता से सोचना- समझना भी होगा।

साल 2016 में एक फिल्म आई थी “पिंक” जिसमें यौन हिंसा के मामलों को मद्देनज़र रखते हुए एक सवाल को जन्म दिया था कि “न मतलब न” जो कि अब बढकर “हाँ का मतलब हाँ” तक स्वीकार किया जाने लगा है।

एक मामले में न्यायमूर्ति विभु भाखरू ने कहा, ‘जहां तक यौन संबंध बनाने के लिए सहमति का सवाल है, 1990 के दशक में शुरू हुए अभियान ‘न मतलब न’, में विश्व में स्वीकार किया एक नियम शामिल है। मौखिक ‘न’ इस बात का साफ इशारा है कि यौन संबंध के लिए सहमति नहीं दी गई है।

इक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि शारीरिक संबंधों के बावजूद प्रेमिका से बेवफाई चाहे जितनी खराब बात लगे, लेकिन यह अपराध नहीं है। ये बात खुले दिमाग़ से समझने की ज़रूरत है।

The Supreme Court has clearly said that sexual relations made by mutual consent cannot be said to be raped by making false promises of marriage.

इसी कड़ी में आगे सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी भी शामिल है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर महिला ये जानती है कि इस तरह के संबंध को शादी के मुकाम पर नहीं पहुंचाया जा सकता है और इसके बाद भी वो रिलेशन बनाती तो इसको रेप नहीं माना जा सकता।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने सेल्स टैक्स में असिस्टेंट कमिश्नर महिला की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि आपसी सहमति से बनाए शारीरिक संबंध को शादी का झूठा वादा कर रेप करना नहीं कहा जा सकता

बहुत कुछ है जहाँ चर्चा चार दीवारी के भीतर नहीं खुले मंच पर होनी चाहिए। सहजीवन (Live-in- relationship) के कानूनी पक्ष के साथ सामाजिक आयामों को नज़रअंदाज़ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। बातें घर की दहलीज़ लांघ सड़कों पर आ निकलीं तो कई सो कॉल्ड इज्ज़तदारों की इज्ज़त की धज्जियां उड़ जाएंगी।

आज़ादी महज़ जिस्म की नहीं, सोच की आज़ादी। सवाल कीजिए और करते रहिए जब तक जवाब न मिलें। बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, लिख कि कलम में स्याही अब भी बाकी है।

नगीना खान

नगीना खान - Nagina Khan युवा अधिवक्ता व कानून शिक्षिका हैं।
नगीना खान – Nagina Khan युवा अधिवक्ता व कानून शिक्षिका हैं।

अनचाहे गर्भ का खतरा कम करता है आपातकालीन गर्भनिरोधक

emergency contraception hindi

Emergency contraception reduces the risk of unwanted pregnancy

आज के आधुनिक युग में भी परिवार नियोजन और सुरक्षित यौन संबंध (Family planning and safe sex) की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही अधिक है। इसके बावजूद भारत समेत एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के कुछ अन्य देशों की अनेक महिलाओं को, आधुनिक गर्भ निरोधक साधन (Modern contraceptive devices) मिल ही नहीं पाते. जिन महिलाओं के लिए आधुनिक गर्भ निरोधक साधन उपलब्ध हैं, और उन्हें मिल सकते हैं, उन्हें भी कई बार अनेक कारणों से अनचाहा गर्भ धारण करना पड़ता है – जैसे गर्भनिरोधक की विफलता (Contraceptive failure), गर्भनिरोधक गोलियां लेने में चूक हो जाना या फिर अपनी मर्जी के खिलाफ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाना। ऐसी महिलाओं के लिए “आपातकालीन गर्भनिरोधक” (इमरजेंसी कंट्रासेप्शन) एक सुरक्षित और प्रभावी तरीका है जो गर्भावस्था के ज़ोखिम (Pregnancy risk) को कम करता है।

आपातकालीन गर्भनिरोधक की शोधकर्ता एवं ऑस्ट्रेलिया प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एंजेला डॉसन ने कहा कि कई महिलाएं आपातकालीन गर्भनिरोधक के महत्वपूर्ण विकल्प से अनभिज्ञ हैं तथा एशिया पैसिफिक क्षेत्र के कई देशों में इसकी पहुँच भी सीमित है, जिसके कारण यह अभी तक एक उपेक्षित गर्भनिरोधक विधि बनी हुई है.

प्रोफेसर एंजेला, 10वीं एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस ऑन रिप्रोडक्टिव एंड सेक्सुअल हेल्थ एंड राइट्स के छठे वर्चुअल सत्र में आपातकालीन गर्भनिरोधक पर एशिया पेसिफिक संगठन (“एशिया पैसिफिक कंसॉर्शियम फॉर इमरजेंसी कंट्रासेप्शन“- Asia Pacific Consortium for Emergency Contraception (APCEC)) का शुभारंभ करते हुए इस विषय पर अपने विचार रख रही थीं।

क्या है आपातकालीन गर्भनिरोधक? | What is emergency contraception?

यह एक  प्रभावी प्रजनन स्वास्थ्य हस्तक्षेप है जिसके द्वारा विशेष परिस्थितियों में अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाया जा सकता है – जैसे असुरक्षित यौन क्रिया, गर्भनिरोधक की विफलता की आशंका, गर्भनिरोधक का गलत/ अनुचित प्रयोग, या फिर यौन हिंसा या बलात्कार के मामले में। इसका उपयोग यौन क्रिया के पाँच दिनों के भीतर किये जाने पर 95% से अधिक मामलों में अनपेक्षित गर्भ धारण को रोका जा सकता है। इस प्रकार यह एक महिला को अनपेक्षित गर्भावस्था को रोकने का अंतिम मौका देता है।

दो प्रकार के आपातकालीन गर्भनिरोधक उपलब्ध हैं : There are two types of emergency contraception available.

आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली (जिसे मॉर्निंग आफ्टर पिल या आई-पिल के नाम से भी जाना जाता है) और ताँबे यानी कॉपर का आईयूडी।

“लिवोनोगेस्ट्रल” की गोली (levonorgestrel pills in india) एक आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली (EC pills in India) है जिसे असुरक्षित यौन-संबंध के 72 घंटे के भीतर खाने से गर्भ धारण करने का खतरा टल जाता है, परन्तु इसका इस्तेमाल जितना जल्दी किया जाए उतना ही बेहतर है। एक अन्य संयुक्त गर्भनिरोधक गोली – “एथिनिल एस्ट्राडियोल प्लस लिवोनोगेस्ट्रल” का भी उपयोग किया जाता है।

आईयूडी के साइड इफेक्ट | IUD ke nuksan in hindi,

“कॉपर आईयूडी” गर्भाशय में लगाया जाने वाला एक छोटा सा गर्भनिरोधक यन्त्र है। जब इसे असुरक्षित यौन क्रिया (Unprotected sex) के पांच दिनों के भीतर गर्भाशय के अंदर डाला जाता है तो यह एक अत्यंत प्रभावकारी आपातकालीन गर्भनिरोधक का कार्य करता है। यह केवल प्रशिक्षित डॉक्टर या नर्स द्वारा ही लगाया जा सकता है। इसको लगातार जारी रहने वाले गर्भनिरोधक के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।

परन्तु एंजेला आगाह करती हैं कि यौन उत्पीड़न के उपरांत आईयूडी को नहीं डाला जाना चाहिए क्योंकि (IUD should not be inserted after sexual harassment because) इससे महिला को “क्लैमाइडिया” और “गोनेरिया” जैसे यौन संचारित संक्रमणों का ख़तरा हो सकता है। यौन उत्पीड़न के उपचार (Sexual assault treatment) के बाद ही इसका उपयोग एक लम्बे समय तक कार्य करने वाले प्रतिवर्ती गर्भनिरोधक के रूप में किया जा सकता है और वह भी उत्पीड़ित महिला की रज़ामंदी से।

आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियां (Emergency contraceptive pills) ओव्यूलेशन की प्रक्रिया को रोक कर अथवा विलम्बित करके गर्भाधान को रोकती हैं। ये गोलियां न तो गर्भपात करा सकती हैं और न ही ये किसी भी असामान्य भ्रूण के विकास का कारण बनती हैं। कॉपर आईयूडी (Copper iud) शुक्राणु और अंडे के मिलने से पहले रासायनिक परिवर्तन करके गर्भाधान को रोकता है। इसके अतिरिक्त, यदि महिला पहले से गर्भवती है तो आपातकालीन गर्भनिरोधक न तो विकासशील भ्रूण को नुकसान पहुँचाते हैं और न ही गर्भपात का कारण बनते हैं।

भारत में आपातकालीन गर्भनिरोधक | Emergency contraception in india | लोकप्रिय गर्भ निरोधक विधि | emergency contraception hindi

भारत में आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियों (आई-पिल) की शुरुआत 2002 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा की गई थी और 2005 से ये दवा की दुकानों पर बिना नुस्खे के मिलने लगीं। सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में गर्भनिरोधक की आवश्यकता (The need for contraception in India) बहुत अधिक है।

एक अध्ययन के अनुसार 2015 भारत में अनुमानित 4.8 करोड़ गर्भधारणों में (जिनमें  लगभग 50% अनपेक्षित थे) एक तिहाई, यानि 1.56 करोड़, का गर्भपात हुआ। इनमें से 5% गर्भपात असुरक्षित तरीकों से किए गए थे। 1971 से भारत में गर्भपात कानूनी रूप से जायज़ होने के बाद भी देश में 8%  मातृ मृत्यु असुरक्षित गर्भपात के कारण होती हैं। अनपेक्षित गर्भधारण और अनावश्यक गर्भपात की वजह से होने वाली मौतों (Deaths due to unintended pregnancies and unnecessary abortions) को कम करने के लिए आपातकालीन गर्भनिरोधक एक प्रभावी प्रजनन स्वास्थ्य हस्तक्षेप (Effective reproductive health intervention) है।

Emergency contraceptive methods should only be used in emergencies.

परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आपातकालीन गर्भनिरोधक तरीके केवल आपात स्थिति यानि इमरजेंसी में ही प्रयोग किये जाने चाहिए और इनका इस्तेमाल प्रत्येक यौन क्रिया के बाद लगातार-किये-जाने वाले गर्भनिरोधक की तरह कदापि नहीं करना चाहिए। यह स्मरण रहे कि यह हर अनचाहे गर्भ को रोकने का कोई त्वरित समाधान नहीं है और इसका लगातार उपयोग करने पर महिलाओं को स्वास्थ्य-सम्बन्धी गंभीर दुष्प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं। इसके अलावा, ये महिलाओं को यौन संचारित रोगों से नहीं बचा सकते।

इमरजेंसी गर्भनिरोधक से जुड़ी भ्रांतियाँ | Myths About Emergency Contraception You Should know | What is the truth of the emergency contraceptives how does it work

आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियों को प्रायः मॉर्निंग आफ्टर पिल कहा जाता है जो सही नहीं है। इसके बारे में यह भी गलत धारणा है कि इससे गर्भपात होता है और स्वच्छंद संभोग को बढ़ावा मिलता है। सही जानकारी के अभाव में कई महिलाएं सोचती हैं कि गर्भ निरोधक के रूप में इनका नियमित उपयोग किया जा सकता है, जो बिलकुल सही नहीं है।

इमरजेंसी पिल का गर्भनिरोधक के रूप में नियमित उपयोग नहीं करना चाहिए। भारत में आई-पिल काफी लोकप्रिय है और इसका उपयोग करने वाली बहुत सारी महिलाओं को यह भ्रम रहता है कि इससे उन्हें सुरक्षा मिलेगी। जबकि असुरक्षित यौन संबंध के बाद आई पिल लेने के बावज़ूद एचआईवी, सिफिलिस, गोनोरिया जैसी बीमारियों का खतरा बना ही रहता है।

इन प्रचलित भ्रांतियों के पीछे एक बड़ा कारण है भारतीय समाज में यौन शिक्षा को लेकर जागरुकता की कमी (Lack of awareness about sex education in Indian society), और सेक्स के प्रति समाज का रूढ़िवादी रवैया-विशेषकर अविवाहित महिलाओं के सन्दर्भ में।

ज़ाहिर है कि हमें यौन शिक्षा को लेकर चुप्पी तोड़ने की और गर्भ निरोधकों की सही जानकारियों का लगातार प्रसार करने की सख्त ज़रूरत है।

प्रोफेसर एंजेला ने सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) से कहा कि आपातकालीन गर्भनिरोधक पर एशिया पेसिफिक संगठन (‘एशिया पैसिफिक कंसॉर्शियम फॉर इमरजेंसी कंट्रासेप्शन’) का मुख्य उद्देश्य है पक्ष समर्थन, ज्ञान प्रसार व नेटवर्किंग के माध्यम से उपर्युक्त सभी चुनौतियों का मुकाबला करना ताकि साक्ष्य-आधारित नीति में सुधार किया जा सके और सभी ज़रूरतमंद महिलाओं को आपातकालीन गर्भनिरोधक मिल सके. यह न केवल शोधकर्ताओं के लिए, वरन नीति निर्माताओं, स्वास्थ्य प्रदाताओं और उपयोगकर्ताओं के लिए भी सूचना का एक आधिकारिक स्रोत होगा।

Emergency contraception is needed more than ever in this difficult period of the COVID-19 epidemic.

कोविड-19 महामारी के इस कठिन काल में इमरजेंसी गर्भनिरोधक की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। इस वैश्विक महामारी से जूझने के लिए किये गए लॉकडाउन के परिणामस्वरूप अंतरंग साथी द्वारा यौन हिंसा में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई है; वायरस संक्रमण के डर से महिलाओं की आवश्यक स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुँच कम हुई है; यह सेवाएँ कुछ स्थानों पर या तो बंद हैं या उनके खुले रहने का समय कम हो गया है. इसके अलावा गर्भ निरोधक की आपूर्ति, खरीद, और वितरण में भी परेशानियां हैं। इन सबके कारण नियमित और आपातकालीन – दोनों ही प्रकार के गर्भनिरोधक तक पहुँच कम हो गयी है तथा अनपेक्षित गर्भधारण और संभावित गर्भनिरोधक विफलताओं की संभावनाएं बढ़ गई हैं।

एशिया पैसिफिक के 14देशों में किये गए मॉडलिंग अध्ययनों से ज्ञात होता है कि प्रजनन आयु की लगभग ३२% महिलाएं २०२० में अपनी परिवार नियोजन की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं होंगी।

आपातकालीन गर्भ निरोधकों को सभी परिवार नियोजन कार्यक्रमों व महिला स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल किया जाना चाहिए, और ये उन सभी महिलाओं व लड़कियों को उपलब्ध होने चाहिए जिन्हें इसकी सख्त ज़रुरत हो। इसके साथ ही सभी महिलाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि इमरजेंसी गर्भनिरोधक लंबे समय तक इस्तेमाल किये जाने वाले प्रतिवर्ती गर्भ निरोधक तरीकों का स्थान नहीं ले सकते हैं। ये केवल आपातकालीन स्थिति में ही प्रयोग में लाये जाने चाहिए।

माया जोशी

(भारत संचार निगम लिमिटेड – बीएसएनएल – से सेवानिवृत्त माया जोशी अब सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) के लिए स्वास्थ्य और विकास सम्बंधित मुद्दों पर निरंतर लिख रही हैं)

क्या भविष्य के बलात्कारी हैं ये 80 लाख यूजर्स ? कहीं आप तो इनमें शामिल नहीं ?

Say no to Sexual Assault and Abuse Against Women

क्या भविष्य के बलात्कारी हैं ये 80 लाख यूजर्स ?

बलात्कार और समाज का नजरिया Rape and society’s perspective

बलात्कार शब्द ही इतना डरावना है जब भी इसको सुना, पढ़ा जाता है तो दिमाग में एक तस्वीर उभर जाती है कि एक महिला पर पुरुष का यौन हमला, एक महिला की जिंदगी का खात्मा।

The problem of rape in India is becoming macabre.

पूरे विश्व मे ये बलात्कार एक समस्या बनी हुई है। लेकिन भारत में ये समस्या विकराल रूप धारण किये हुए है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे।

About 50 rape cases are registered daily in police stations in India.

आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। 2018 में बलात्कार के 18 हजार से भी ज्यादा मामले दर्ज किए गए। इससे भी कई गुना मामले ऐसे भी रहे जिनको लड़की ने या परिवार ने इज्जत और डर के कारण पुलिस में दर्ज ही नहीं करवाया या पुलिस ने दर्ज ही नहीं किये।

अभी दो दिन पहले हैदराबाद में पशु चिकित्सक के साथ और झारखंड में लॉ स्टूडेंट की छात्रा के साथ बलात्कार की जघन्य व अमानवीय घटना घटित हुई। हैदराबाद में वेटरनरी डॉक्टर ड्यूटी से अपने घर आ रही थी, रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो जाती है। उसकी मदद के लिए 4 लोग आते है। वो ही चारो इंसान जो मददगार बन कर आये थे।

जिन पर एक लड़की ने मुसीबत के समय विश्वास किया कि ये उसकी मदद करेंगें। कितना खुश हुई होगी। दिल को सकूं मिला होगा मदद के लिए आये हाथों को देखकर। लेकिन अगले ही पल मदद के लिए आये इंसानों ने अपने उन्हीं हाथों को जिन पर एक लड़की ने कुछ समय पहले विश्वास किया था, वहशी जानवर बन कर डॉक्टर पर हमला करते हैं। उसको उठा ले जाते हैं उसके बाद वो चारों बलात्कार करते हैं फिर डॉक्टर को जला कर मार देते हैं।

ऐसे ही झारखंड में लॉ की स्टूडेंट अपने पुरुष मित्र के साथ बात कर रही होती है। 12 वहशी जानवर आते हैं और बन्दूक की नोंक पर उनको अगुआ करके एक ईंट-भट्ठे पर ले जाकर लड़की से बलात्कार करते हैं।

ये दो बलात्कार की घटनाएं कोई पहली और आखिरी घटना नहीं हैं। रोजाना ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं। आंकड़ों पर नजर डाली जाए जो आंकड़े एक आम इंसान को हिला कर रख सकते हैं।

जब भी कोई ऐसी घटना घटित होती है तो देश के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो जाती हैं। सोशल मीडिया, जो वर्तमान में आम जनता को अभिव्यक्ति का प्लेटफार्म प्रदान करता है, खुशी हो या गम वो यहां अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करता है। प्रत्येक व्यक्ति जो सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है ऐसी अमानवीय घटना पर अपना पक्ष रखता है, अपना गुस्सा जाहिर करता है। वो रेपिस्ट के लिए कड़ी सजा की मांग करता है।

लेकिन ये गुस्सा, कड़ी सजा की मांग, फाँसी की मांग, क्या सभी बलात्कार की घटनाओं में होती है। शायद ऐसा नहीं है।

वर्तमान की इन दोनों घटनाओं को देखे या इससे पहले की कुछ घटनाओं को देखे तो बलात्कार में कड़ी सजा, फांसी की मांग, लिंग काटना बहुमत उन घटनाओं में की जाती है जिनमें बलात्कार के बाद लड़की को मार दिया जाता है।

समाज का बहुमत तबका बलात्कार ही उसको मानता है जिसमे रेप के बाद लड़की को मार दिया जाता है।

अगर लड़की रेप के बाद जिंदा रह गयी तो उसके साथ बलात्कार हुआ ही नहीं उसके पक्ष में लड़ने की बजाए उसी से 100 सवाल पूछ लिए जाते हैं। रेप पीड़िता के खिलाफ और रेपिस्ट के पक्ष में अनेकों झूठी कहानियां बना दी जाती हैं। बलात्कार पीड़ित का वीडियो (Rape victim’s video) सनी लियोन के पोर्न वीडियो (Porn videos of sunny leone) से ज्यादा चाव से देखा जाता है।

हमारे समाज मे बलात्कार के बाद महिला और उसका परिवार जिनको समाज की सहानभूति और मदद की जरूरत होती है इसके विपरीत पूरी उम्र जहालत की जिंदगी जीने पर मजबूर हो जाता है।

बलात्कार के बाद लड़की को या तो बलात्कारी मार देते है अगर जिंदा बच गयी तो उसको हमारा समाज तिल-तिल कर मारता है।

जैसे ही खबर आई कि हैदराबाद में वेटरनरी डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या (Veterinary doctor murdered in Hyderabad after rape) कर दी गयी उसके बाद से उसको पोर्न साइट पर 80 लाख लोगों ने सर्च किया है। उसमें से लाखो सर्च करने वाले ऐसे भी रहे होंगे जो रेपिस्टों को फांसी हो! फांसी हो! चिल्ला रहे हैं।

क्या सर्च कर रहे हैं ये 80 लाख यूजर्स

ऐसा वीडियो, जिसमें 4 वहशी जानवर एक महिला को कैसे नोंच रहे हैं? या कुछ और?

शायद वो तलाश कर रहे हैं एक ऐसा वीडियो जिसमें चार लोगों ने एक महिला से कैसे संबंध बनाए (A video showing how four men have a relationship with a woman)। वो वीडियो ढूंढ रहे हैं ताकि विक्टिम के प्राइवेट पार्ट देखकर मजा लिया जा सके। ऐसे इंसान क्या भविष्य के बलात्कारी नहीं है?

हजारों Whatsaap ग्रुप्स में बलात्कार या जबरदस्ती करते हुए के वीडियो दिन-रात घूमते रहते हैं, जिनको लोग बड़े चाव से देखते हैं और आगे अपने दोस्तों में सर्कुलेट करते रहते हैं।

पिछले दिनों जब भाजपा के एक नेता की भाजपा की ही महिला नेता के साथ सेक्स वीडियो (Sex video of a BJP leader with a female BJP leader) लीक हुई तो अपने आपको प्रगतिशील कहने वाली पार्टी का एक बुद्धिजीवी नेता सोशल मीडिया पर भाजपा का विरोध करने के नाम पर उन वीडियो के स्क्रीन शॉट लगा रहा था। उसने पोस्ट डाली कि जिसको वीडियो चाहिए वो कॉमेंट में फोन नम्बर छोड़े।

पोस्ट के कमेंट बॉक्स में ऐसी जहालत का विरोध करने की बजाए हजारों लोगों ने फोन नम्बर उसकी पोस्ट के कॉमेंट में छोड़ दिये। अब मैसेंजर पर कितने हजार उन गुप्त इज्जतदारों ने फोन नम्बर वीडियो पाने के लिए छोड़ा होगा, उसकी गिनती बेमानी है। इन सबको क्या कहोगे जो वीडियो पाने की ललक में लार टपका रहे है?

लेकिन इन महापुरूषो का दूसरा चेहरा बहुत ही शरीफ वाला होता है। सोशल मीडिया पर लड़कियों को चंगुल में फंसाने व उनको प्रभावित करने के लिए बलात्कारियों को फांसी हो, कड़ी सजा, महिला सुरक्षा, रेपिस्ट का लिंग भंग की मांग करते रहते हैं।

बलात्कार पीड़िता जब कही से गुजरती हैं तो लोग उसको इस नजर से देखते हैं जैसे सारा दोष उसी का है। उसके शरीर को कपड़ों के अंदर से, अपनी गन्दी आंखों से स्कैन करके कल्पनाओं में उस मंजर को याद करते हैं कि कैसे उन लोगों के साथ इसने सेक्स किया होगा। अगर पीड़िता का वीडियो (Rape victim’s video) मार्किट में है तो लड़की जितने चाहे कपड़े पहन लें लड़की उनको नंगी ही दिखेगी। बहुमत लोग उस महिला के साथ कल्पनाओं में यौन सम्बन्ध तक बना लेते हैं। हर गली, चौराहे, नुक्कड़ पर उसका हर पल बलात्कार होता रहता है। उसको इंसाफ मिले ये तो काल्पनिक सोच है।

आपको शायद याद हो इसी से दुखी होकर उन्नाव रेप पीड़िता ने सार्वजनिक बयान दिया था कि क्या इंसाफ के लिए मुझे मरना पड़ेगा।

साम्प्रदायिक विचारधारा

साम्प्रदायिक विचार धारा से ग्रसित लोग ऐसी प्रत्येक घटना को धार्मिक रंग चढ़ाने की कोशिश में रहते हैं, ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करके अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा सके। भारत में साम्प्रदायिक पार्टी भाजपा और उसके संगठन ऐसी प्रत्येक घटना को अपने गन्दे नजरिये से हिन्दू बनाम मुस्लिम बनाने में लगे रहते हैं इसके लिए उनके पेड वर्कर सोशल मीडिया पर हर पल झूठ फैलाते रहते हैं।

लेकिन इसके उलट अगर लड़का हिन्दू हो लड़की मुस्लिम हो जैसे जम्मू के कठुआ में जब एक 7-8 साल की दलित मुस्लिम लड़की से जब मंदिर में बलात्कार होता है, जिसमें मंदिर का पुजारी और उसका भतीजा शामिल होता है। जिसमें लोकल पुलिस के कुछ अधिकारी भी शामिल होते हैं। तो ये ही राष्ट्रवादी पार्टी पूरे देश में बलात्कारी के समर्थन में तिरंगा (Tiranga Yatra in support of rapist) लेकर धरने-प्रदर्शन करती हैं, क्योंकि पीड़ित लड़की मुस्लिम है और बलात्कारी हिन्दू है।

ऐसे ही जब उत्तर प्रदेश के उन्नाव में भाजपा का विधायक बलात्कार का आरोपी होता है और पीड़ित लड़की दलित समाज से होती है। ये ही साम्प्रदायिक पार्टी विधायक के समर्थन में धरने-प्रदर्शन करती है।

धार्मिक बाबाओं के अंधे अनुयायी

आसाराम, राम रहीम जैसे दर्जनों धार्मिक बाबा, जो बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हैं या उन पर केस चल रहे हैं, उनके लाखों अनुयायी, उनके समर्थन में आज भी धरने-प्रदर्शन करते रहते हैं। मजबूती से इन धार्मिक बाबाओं के समर्थन में और रेप विक्टिम के खिलाफ बोलते रहते हैं।

फोर्स के बलात्कारी जवानों का समर्थन करती सरकार

देश के अलग-अलग हिस्सों में जहाँ जनता असन्तोष की वजह से सत्ता के खिलाफ लड़ रही है, उन हिस्सों में फोर्स द्वारा बलात्कार किये गए। उन फोर्स के जवानों को सजा देने की बजाए देश की सत्ता उनको बचाने के लिए कोर्ट में केस लड़ती है।

सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी जिसके साथ अमानवीयता की हद पार कर दी गयी, जिसकी योनि में पत्थर भर दिए गए। ये सब अमानवीय कृत्य पुलिस अधिक्षक ने थाने के अंदर अंजाम दिए। सरकार ने पुलिस अधिक्षक को सजा देने की बजाए वीरता का मैडल दिलवाया।

मीडिया और रेप Media and rapeMedia bent on killing democracy

मीडिया जो अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता नहीं थकता वो ही इस लोकतंत्र को मारने पर तुला हुआ है। वो सत्ता के इशारे पर लोकतंत्र को बर्बर समाज की तरफ ले जाना चाहता है। वो लोगों को भीड़तंत्र बनाने के लिए प्रत्येक वो खबरें प्लांट कर रहा है जो देश की सत्ता चाहती है।

मीडिया जिसका मुख्य काम समस्या क्यो पैदा हुई, उसका समाधान क्या हो, इस मुद्दे पर व्यापक काम करने की बजाए, इस केस को भी मीडिया हिन्दू-मुस्लिम बनाने में लगी हुई है।

बलात्कार पर अरब देशों की सजाओं का अनुरण करने की मांग

जब भी बलात्कार पर चर्चा होती है तो बलात्कार की समस्या का समाधान कड़ी सजा के नाम पर फांसी, लिंग काटना या अरब या मुस्लिम देशों की सजाओं का अनुसरण करने के उदाहरण अक्सर दिए जाते हैं, जहाँ रेपिस्ट को कड़ी और सार्वजनिक जगहों पर सजा दी जाती है।

फांसी जो अपने आप में ही अमानवीय है, जिसको किसी सभ्य समाज में मंजूर नहीं किया जा सकता और न करना चाहिए। रेपिस्ट को आजीवन कारावास मतलब आखिरी सांस तक जेल के शिकंजों में रखा जाना चाहिए।

अरब और मुस्लिम देश में धार्मिक रूढ़िवादी कानूनों का चलन है। इन देशों में महिलाओं के कोई मानवाधिकार नहीं हैं। उनके कानून बर्बर समाज के कानून हैं। हमारे मुल्क के आवाम ने उन मध्युगीन बर्बर समाज को बहुत पीछे छोड़ कर लोकतांत्रिक समाज में कदम रखा हुआ है। वहाँ की महिलाएं लोकतंत्र की तरफ बढ़ना चाहती हैं। इसलिए अरब के कानूनों को लागू करने की मांग, बर्बर मांग है जिसको कभी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है।

हमको हमारी समस्याओं के समाधान के लिए हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही पीछे देखने की बजाए आगे की तरफ देखकर हल ढूंढना पड़ेगा। कितने ही प्रगतिशील मुल्क, सभ्यताएं हैं जहाँ ये समस्या बहुत कम हैं। हमको उन मुल्कों की सभ्यताओं से सीखना चाहिए।

देश का बहुमत तबका बलात्कार में अपना पक्ष तय करने के लिए रेप विक्टिम की जाति, धर्म, इलाका देखता है। अगर लड़की दलित, आदिवासी, मुस्लिम है तो बहुमत तबका पीड़ित के साथ खड़ा होने की बजाए रेपिस्ट के साथ खड़ा होता है। अगर रेपिस्ट गलती से मुस्लिम है तो साम्प्रदायिक पार्टियां और उनके संगठन बलात्कारी को आरोपित करने की बजाए पूरे मुस्लिम धर्म को ही रेपिस्ट साबित कर देते हैं।

बलात्कार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए सबसे पहले हमको बलात्कारी मानसिकता के खिलाफ जागरूकता अभियान (Awareness campaign against the rapist mentality) शॉर्ट टर्म भी और इसके साथ-साथ लाँग टर्म अभियान चलाना पड़ेगा। बलात्कारी मानसिकता, जिसकी जड़ पुरुषवादी समाज है, इस पर हमला करना बेहद जरूरी है।

जिस समाज में महिला को पैदा होने से मरने तक इंसान नहीं समझा जाता, महिला को दोयम दर्जे का समझना, कमजोर समझना, इंसान मानने की बजाए वस्तु मानना, ऐसे समाज मे पला-बढ़ा आदमी महिला को सम्मान देने की बजाए उस पर हमला ही करेगा। इसलिए सबसे जरूरी है सामाजिक ढांचे में बदलाव करके समानता पर आधारित समाज बनाना।

 यौन शिक्षा ( Sex education) को लागू किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि बलात्कार के आरोप में जेल में बंद बलात्कारी को साइकेट्रिस्ट की टीम काउंसलिंग करे। ताकि ये पता लगाया जा सके उसकी बलात्कारी मानसिकता के पीछे क्या कारण हैं, ताकि भविष्य में ऐसी मानसिकता के खिलाफ काम किया जा सके। हमको जाति, धर्म, इलाका, देश को नजरअंदाज करके निष्पक्ष होकर बलात्कारी के खिलाफ और पीड़ित के पक्ष में ईमानदारी से खड़ा होना चाहिए।

Uday Che

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं