यहां नेटवर्क की समस्या भी चुनावी मुद्दा है?

Vote

Here the problem of network is also an election issue.

14 फरवरी को उत्तराखंड में वोट डाले जायेंगे

देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव (Assembly elections in five states) की सरगर्मियां चल रही हैं उनमें पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भी शामिल है. जहां 14 फरवरी को वोट डाले जायेंगे. ऐसे में मतदाताओं को अपने अपने पक्ष में करने के लिए सभी पार्टियां एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हैं. पिछले चुनावों की तरह इस बार भी विकास प्रमुख मुद्दा रहेगा क्योंकि गठन के 21 साल बाद भी उत्तराखंड विकास के कई पैमानों पर अन्य राज्यों की अपेक्षा पिछड़ा हुआ है. विशेषकर इसके दूर दराज़ के ग्रामीण क्षेत्र अब भी विकास की लौ से वंचित हैं.

हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक से 20 किमी दूर रौलियाना गांव की. जो आज भी नेटवर्क की समस्या से जूझ रहा है. ग्रामीणों के पास नई तकनीक से लैस मोबाइल फोन तो उपलब्ध हैं, परंतु नेटवर्क नहीं होने के कारण वह केवल सजावटी वस्तु मात्र रह जाता है. इस समस्या से जहां ग्रामीण परेशान हैं, वहीं पिछले दो वर्षों से सबसे अधिक कठिनाई विद्यार्थियों को भी हुई है.

कोरोना काल में जब स्कूल, कॉलेज और सभी प्रकार के शिक्षण संस्थान बंद हो गए थे और पढ़ाई का एकमात्र सहारा ऑनलाइन क्लास थी. ऐसे समय में गांव में नेटवर्क की कमी (lack of network in the village) ने छात्र-छात्राओं को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है.

छात्राओं की शिक्षा को सबसे अधिक प्रभावित किया है ऑनलाइन क्लास और नेटवर्क की कमी ने

इसके कारण न केवल ग्रामीण स्तर पर शिक्षा प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो गई बल्कि प्राथमिक और मध्य विद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को शिक्षा से लगभग दूर ही कर दिया है. हाई स्कूल के विद्यार्थी किसी प्रकार नेटवर्क एरिया में पहुंच कर अपना क्लास अटेंड करने का प्रयास कर लेते थे, लेकिन छोटे बच्चों के लिए यह मुमकिन नहीं था. ऑनलाइन क्लास और नेटवर्क की कमी ने छात्राओं की शिक्षा को भी सबसे अधिक प्रभावित किया है. जहां लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को ऑनलाइन क्लास की प्राथमिकता दी गई.

अधिकतर घरों में आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने की वजह से केवल एक फोन की सुविधा होती है, जिसे पहले लड़कों के लिए उपलबध कराई जाती है. अफ़सोस की बात यह है कि लड़की के सीनियर क्लास में होने के बावजूद कई घरों में जूनियर क्लास में पढ़ने वाले लड़के को मोबाइल उपलब्ध कराई जाती है. पहले तो लड़कियों से घर का काम लिया जाता है. काम ख़त्म होने के बाद यदि समय मिला तो उन्हें फोन उसी वक्त मिलता है, जब भाई की क्लास पूरी हो चुकी होगी. लड़के की क्लास में नेटवर्क की समस्या को घर में जहां गंभीरता से लिया जाता है, वहीं लड़की को आने वाली इस समस्या पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता है.

यह समस्या आज भी जस की तस है. इस संबंध में गांव की एक किशोरी ममता का कहना है कि जब हमें ऑनलाइन क्लास के लिए फोन उपलब्ध हो भी जाता है तो नेटवर्क की समस्या आड़े आ जाती है. कई बार घर से एक किमी दूर पहाड़ पर एक निश्चित स्थान पर जाना होता है, जहां कुछ समय के लिए नेटवर्क उपलब्ध होता है. कई किशोरियों के अभिभावक इतनी दूर आने की इजाज़त भी नहीं देते हैं. वहीं एक अन्य स्कूली छात्रा का कहना था कि पिछले दो वर्षों में नेटवर्क की कमी के कारण शायद ही ऐसा कोई दिन होता है जब हम अपनी क्लास पूरी कर पाए हैं. नेटवर्क की कमी के कारण न तो हम शिक्षक से सवाल पूछ पाते हैं और न ही गूगल पर सर्च करने में सक्षम हो पाते हैं. ज्ञान विज्ञान में रुचि होने के बावजूद हम देश और दुनिया की ख़बरों को जानने से वंचित रह जाते हैं.

उत्तराखंड में कोरोना की तीसरी लहर

बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही एक छात्रा सरोजिनी कहती है कि उत्तराखंड में कोरोना की तीसरी लहर (third wave of corona in uttarakhand) को देखते हुए फिर से लॉकडाउन लगा दी गई और ऑनलाइन क्लास की जा रही है. सभी जानते हैं कि बोर्ड का पेपर किसी भी विद्यार्थी के लिए कितना महत्वपूर्ण होता है. इसकी महत्ता को समझते हुए हमारे शिक्षक ऑनलाइन उपलब्ध रहते हैं, लेकिन नेटवर्क की कमी के कारण मैं उनसे संपर्क करने और किसी भी प्रश्न का हल जानने से वंचित रह जाती हूँ. जिससे मेरी पढ़ाई का बहुत अधिक नुकसान हो रहा है. यदि दूरसंचार विभाग और नेटवर्क कंपनियां इस दूर दराज़ ग्रामीण क्षेत्रों में भी नेटवर्क सुधार पर ध्यान देती तो मेरे जैसे कई विद्यार्थियों का नुकसान नहीं होता.

विद्यार्थियों को हो रहे इस नुकसान से शिक्षक भी चिंतित हैं. शिक्षक नीरज पंत के अनुसार बोर्ड परीक्षा किसी भी विद्यार्थी के जीवन का निर्णायक मोड़ होता है. जिसे स्कूल प्रशासन बखूबी समझता है. इसीलिए लॉकडाउन में भी ऑनलाइन क्लासेज (online classes in lockdown) के माध्यम से उनका मार्गदर्शन किया जाता है. लेकिन रौलियाना गांव में नेटवर्क की कमी (Lack of network in Rauliana village) के कारण वहां के छात्र-छात्राओं को ऑनलाइन क्लास के माध्यम से गाइड करना बहुत मुश्किल हो जाता है. जो स्कूल और शिक्षा विभाग के लिए भी चिंता का विषय है.

विद्यार्थियों के साथ-साथ आम ग्रामीणों को भी नेटवर्क की समस्या से कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.

मंजू देवी के अनुसार रोज़गार की तलाश में शहर गए परिवार के सदस्यों से संपर्क का एकमात्र साधन फोन है, लेकिन नेटवर्क की कमी के कारण उनसे संपर्क करना किसी जंग के जीतने के समान है. आजकल सभी चीज़ें डिजिटल हो गई हैं. इंटरनेट के माध्यम से कई काम आसानी से संभव हो जाते हैं, लेकिन यह उसी वक्त मुमकिन है जब नेटवर्क की समस्या न हो. जबकि यही इस गांव की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है.

बहरहाल अब देखना यह है कि डिजिटल इंडिया के इस युग में, जबकि चुनाव प्रचार भी डिजिटल होता जा रहा है, ऐसे में राजनीतिक दल इस समस्या के निदान में क्या भूमिका निभाते हैं? क्योंकि नेटवर्क के बिना किसी भी गांव का विकास अधूरा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधा की कमी इस चुनाव में प्रमुख मुद्दा बन सकता है?

हेमा

रौलियाना, बागेश्वर

उत्तराखंड

(चरखा फीचर)

दिल्ली में ओमिक्रॉन का कम्युनिटी स्प्रेड शुरू : स्वास्थ्य मंत्री

omicron in hindi

Community spread of Omicron’s new variant of COVID-19

नई दिल्ली, 30 दिसंबर 2021. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन (Delhi Health Minister Satyendar Jain) ने कहा है कि राष्ट्रीय राजधानी में कोविड-19 के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन का कम्युनिटी स्प्रेड शुरू हो गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 200 से अधिक कोविड-19 रोगियों को दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जिनमें से केवल 102 लोग शहर के हैं।

46% of the cases are of Omicron variant: Satyendra Jain, Delhi Health Minister.

उन्होंने कहा, “इनमें से 46 फीसदी मामलों में ओमिक्रॉन वेरिएंट पाया गया है।”

उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों को और मजबूत किया जाएगा या नहीं, यह दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की अगली बैठक में तय किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रतिबंध या लॉकडाउन का परिणाम उनके लागू होने के सात दिनों के बाद देखा जाता है।

Delhi is one of the worst covid-hit states in India.

उन्होंने कहा, “एक ही दिन में वैश्विक स्तर पर 15 लाख से अधिक मामले सामने आए हैं। हालांकि, यह तथ्य कि ओमिक्रॉन वेरिएंट ज्यादा खतरनाक नहीं है, यह बड़ी राहत की बात है।”

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, पिछले 24 घंटों में, भारत ने 13,154 नए कोविड-19 मामले और 268 मौतें दर्ज की हैं।

इस बीच, देश भर में ओमिक्रॉन वेरिएंट के मामलों की संख्या 961 हो गई है, जिनमें से 320 रोगियों को अस्पतालों से छुट्टी दे दी गई है।

मंत्रालय ने पुष्टि की है कि कुल 22 राज्यों ने नए वेरिएंट का पता लगाने की सूचना दी है।

जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार ने चेताया, ओमिक्रॉन बढ़ रहा, अस्पतालों पर पड़ेगा दबाव

omicron in hindi

ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों से अमेरिकी अस्पतालों पर पड़ सकता है दबाव : अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार एंथनी फौसी

नई दिल्ली, 20 दिसम्बर 2021. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉ. एंथनी फौसी (Dr. Anthony Fauci, Chief Medical Adviser to US President Joe Biden) ने चेतावनी दी है कि कोरोना का ओमिक्रॉन वेरिएंट (Omicron variant of Corona) अमेरिका और दुनिया में ‘तेजी से बढ़’ रहा हो और आने वाले हफ्तों में यह देश में अस्पताल प्रणाली पर दबाव डाल सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स में फौसी को एनबीसी न्यूज पर ओमिक्रॉन वेरिएंट का जिक्र करते हुए उद्धृत किया गया था, “एक बात जो बहुत स्पष्ट है, और इसमें कोई संदेह नहीं है, इसमें बहुत आसानी से फैलने की क्षमता है।”

उन्होंने कहा कि ओमिक्रॉन के अमेरिका में डेल्टा वेरिएंट से आगे निकलने की आशंका है।

89 देशों में अब तक ओमिक्रॉन का पता चल चुका है (Omicron has been detected in 89 countries so far)

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 89 देशों में ओमिक्रॉन का पता चला है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि यह डेल्टा वेरिएंट की तुलना में काफी तेजी से फैल रहा है, जिसमें उच्च स्तर की जनसंख्या प्रतिरक्षा वाले देशों में भी शामिल है। वैरिएंट पहले से ही यूके में अधिकांश मामलों के लिए जिम्मेदार है।

रविवार को एबीसी न्यूज ने नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज के निदेशक फौसी के हवाले से बताया कि हमारे अस्पतालों में अगर चीजें वैसी दिखती हैं, जैसी वे अभी दिख रही हैं, तो अगले एक या दो सप्ताह में, लोगों के लिए बहुत तनाव वाली वजह होने वाला है।”

उन्होंने चेतावनी दी, “इस देश में हमारे पास ऐसे बहुत से लोग हैं जो टीकाकरण के योग्य हैं जिन्हें अभी तक टीका नहीं लगाया गया है और यह अस्पताल प्रणाली पर तनाव के लिए एक वास्तविक समस्या होने जा रही है।”

पिछले एक सप्ताह में बढ़ गया है अमेरिका में कोविड-19 का ओमिक्रॉन वेरिएंट

चेतावनी के तौर पर अमेरिका में कोविड-19 वेरिएंट पिछले एक सप्ताह में बढ़ गया है। न्यूयॉर्क राज्य और कोलंबिया जिले दोनों ने लगातार दिनों के रिकॉर्ड मामलों की सूचना दी है। वेरिएंट का जोखिम उन अमेरिकियों के लिए विशेष रूप से अधिक है जो या तो असंबद्ध हैं या जिन्हें बूस्टर शॉट नहीं मिला है।

इसके अलावा, शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, डेल्टा की तुलना में ओमिक्रॉन वेरिएंट कम गंभीर बीमारी का कारण हो सकता है। हालांकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य और संक्रामक रोग विशेषज्ञ सावधानी बरतते हैं कि यह बताना जल्दबाजी होगी, क्योंकि यूके और दक्षिण अफ्रीका के अस्पतालों में भर्ती उच्च ओमिक्रॉन के मामलों का बढ़ना जारी है।

इसी प्रकार, डब्ल्यूएचओ ने यह भी नोट किया है कि वैरिएंट कम गंभीर होने पर भी अस्पताल में प्रवेश बढ़ा सकता है।

क्या लगेगा लॉकडाउन ?

उन्होंने कहा,

“मैं उस तरह के लॉकडाउन की उम्मीद नहीं करता, जैसा हमने पहले देखा है, लेकिन मुझे निश्चित रूप से हमारे अस्पताल सिस्टम पर तनाव की संभावना दिख रही है।”

‘अच्छे दिन’ के हकदार : महामारी के आईने में कॉरपोरेट इंडिया की नंगी सच्चाई

Modi with Ambani Tata

अच्छे दिन’ के हकदार पहले भी कॉरपोरेट इंडिया के दावेदार थे, आज भी वे ही हैं, और कल भी वे ही रहेंगे। इस सच्चाई की लंबी-चौड़ी व्याख्या की जरूरत नहीं

नंगी सच्चाई | Bare truth: Corporate India is loaded on the back of the toiling masses

पिछले साल 24-25 मार्च की रात से जब प्रधानमंत्री ने देश पर लॉकडाउन थोपा था तो प्रवासी मजदूरों के महापलायन के हृदय-विदारक दृश्यों से यह सच्चाई नंगी होकर सामने आ गई थी कि तीन दशकों से बनाया जा रहा कॉरपोरेट इंडिया मेहनतकश जनता की पीठ पर लदा हुआ है। इस सच्चाई को ढंक-तोप कर रखा जाता है; क्योंकि कॉरपोरेट इंडिया के निर्माण पर शासक-वर्ग के बीच सर्वानुमति है। उस समय इस सच्चाई पर बहस होती, और थोड़ा ठहर कर सोचा जाता कि क्या यह किसी भी आधार – स्वतंत्रता संघर्ष के मूल्य, संविधान के मूल्य, मानव मूल्य – पर वाजिब है? लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पूरे देश के कच्चे-पक्के रास्तों पर निकल पड़े प्रवासी मजदूरों के हुजूम पर सत्ता, विपक्ष और नागरिक समाज के विमर्श में यह मान कर चला गया कि दिन-रात खटने के बावजूद इस विशाल खलकत का निपट गरीब और सुविधा-विहीन होना कोई गलत स्थिति नहीं है।

कॉरपोरेट इंडिया और उसमें प्रचलित निगम राजनीति पर बनी सर्वानुमति का नतीजा है कि कोरोना महामारी का अगर तीसरा, चौथा, पांचवा विस्फोट भी होगा तो मेहनतकश देश और राज्यों की राजधानियों/नगरों से ऐसे ही पिदड़ते नजर आएंगे। कल्पना कीजिए कॉरपोरेट इंडिया में सुरक्षित  लोगों को इतनी बड़ी संख्या में बदहाल स्थिति में सड़कों पर निकलना पड़ जाता तो क्या किसी की हिम्मत थी थाली-शंख-घड़ियाल बजाने, आसमान में हवाई जहाज नचाने, दीवाली मनाने की! महामारी के उपचार का यह ‘पवित्र’ जश्न अकेले संघियों और मोदी प्रेमियों ने ही नहीं मनाया था; प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं/दलों ने भी मनाया था।   

अच्छे दिन’ के हकदार पहले भी कॉरपोरेट इंडिया के दावेदार थे, आज भी वे ही हैं, और कल भी वे ही रहेंगे। इस सच्चाई की लंबी-चौड़ी व्याख्या की जरूरत नहीं है।

22 अप्रैल को ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ और ‘फाइनांसियल टाइम्स’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अजेंडा सेटिंग डिबेट सीरीज (Agenda Setting Debate Series) में बोलते हुए देश की वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि महामारी की दूसरी लहर के बावजूद सुधारों की रफ्तार, खास कर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश, मजबूती के साथ जारी रहेगी। कॉरपोरेट इंडिया बन रहा है तो उसकी कीमत चुकाने वाले भी चाहिएं। इसीलिए वित्तमंत्री ने कृपापूर्वक कीमत चुकाने वालों पर भी तात्कालिक रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई है।

‘हिंदू-राष्ट्र’ बनाने वाले हों या भारत के विचार (आइडिया ऑफ इंडियाIdea of india) की महीन कताई करने वाले, कॉरपोरेट इंडिया में सबकी समान आस्था है। कोरोना महामारी ने इस आस्था को तनिक भी नहीं डिगाया है। नरेंद्र मोदी के लालबुझक्कड़ अर्थशास्त्रियों की बात जाने दें, प्रगतिशील अर्थशास्त्री भी यह नहीं कहते कि इस देश की अर्थव्यवस्था में यह मेहनतकश खलकत शामिल ही नहीं की जाती है। उनके लिए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और उनके प्रिय प्रतीक पुरुषों के नाम पर चलाई जाने वाली योजनाएं/कार्यक्रम काफी माने जाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों को नाम और रूपरेखा देने की देश से लेकर विदेश तक एक पूरी इंडस्ट्री है।

कॉरपोरेट इंडिया के पूर्व युग में जब कभी ऐसी योजनाएं/कार्यक्रम चलाए गए तो यह कहा गया कि गरीबी हटानी है। कॉरपोरेट इंडिया में ‘गरीबी का रोना’ वर्जित है। गरीब हैं तो कॉरपोरेट इंडिया के निर्माण के लिए सस्ता श्रम है; और निगम राजनीति को परवान चढ़ाने के लिए सस्ते वोट।

आपदा में उत्सव

हल्ला-बोल शैली में जो ‘शाइनिंग’, ‘नया’ ‘स्मार्ट’, ‘डिजिटल’ और साथ ही ‘आयुष्मान’ भारत बनाया जा रहा है, महामारी के आईने में उसकी हकीकत सामने है। बिस्तर, दवाई, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर के बगैर मरीज परिजनों के कंधों पर और गोदियों में दम तोड़ रहे हैं। कहीं अस्पताल में आग लगने से मरीज मारे जा रहे हैं, कहीं ऑक्सीजन रिसने से, कहीं ऑक्सीजन डिप होने से। मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार कर पाना दुष्कर कार्य हो गया है। दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के निवासियों में प्रतिरोधक क्षमता का कुदरती करिश्मा नहीं होता तो भारत में प्रभावी जन स्वास्थ्य व्यवस्था की अनुपस्थिति में लाशों के अंबार लग सकते थे।

लेकिन नेता, नौकरशाह, विशेषज्ञ दिन-रात बताने में लगे हैं कि न कहीं कोई कमी है, न किसी से कहीं कोई चूक हुई है। प्रधानमंत्री की छवि पर जरा भी आंच न आए, इसकी मुकम्मल पेशबंदी की गई है। अभी वे कुछ शमित नजर आ रहे हैं। इस बार लॉकडाउन को आखिरी विकल्प बताते हुए उन्होंने विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और सामंजस्य का उपदेश दिया है। स्थिति में सुधार होते ही, या 2 मई को बंगाल फतह होने पर, वे “महाभारत 18 दिन में जीता गया था, कोरोना के खिलाफ जंग’ 21 दिन में जीत ली जाएगी’’ जैसा कोई बड़ा बतोला मारते हुए आलोचकों के खिलाफ उग्र हुंकार भर सकते हैं। वे उत्सव-प्रिय हैं, लिहाजा, उन्होंने लोगों को आपदा में उत्सव मनाने की नसीहत दी है।

उत्सव मनाने की नसीहत देते हुए प्रधानमंत्री को जरूर यह विश्वास रहा होगा कि लोग नाशुकरे नहीं होंगे। क्योंकि उन्हें भली-भांति समझ दिया गया है कि नरेंद्र मोदी बड़े काम करने आए हैं।

महामारी ने यह साफ कर दिया है कि कॉरपोरेट इंडिया में उसके केंद्र पर काबिज लोगों को ही इलाज की निर्बाध सहूलियत है। कॉरपोरेट इंडिया के विविध उपकेंद्रों पर बसने वाले लोग, जो समझते थे पैसा फेंक कर महंगे से महंगा इलाज खरीद लेंगे, दिक्कत में आ गए हैं। कॉरपोरेट इंडिया के हाशियों पर सबसे ज्यादा लोग बसते हैं। उन्हें पता चल गया होगा कि उनकी हैसियत कॉरपोरेट इंडिया से बहिष्कृत लोगों से अच्छी नहीं है। महामारी ने यह सच्चाई भी अच्छी तरह बता दी है कि बहु-प्रशंसित कॉरपोरेट इंडिया किस कदर बुरी तरह से धर्म, जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र, भाषा आदि के टुकड़ों में बंटा हुआ है। महामारी ने यह दिखाया है कॉरपोरेट इंडिया में अपनी जगह बनाने और आगे बढ़ने के लिए आपका कोई शत्रु होना चाहिए। कॉरपोरेट इंडिया में सक्रिय शत्रु-भाव के अनगिनत वृत्तों ने देश को एक कलह-खाने में तब्दील कर दिया है।

महामारी के संकट में संवाद की सच्ची प्रेरणाएं भी सामने आई हैं। व्यक्तिगत और संस्थागत रूप से बहुत से लोगों ने आंसू पोंछने और सौहार्द बनाने में भूमिका निभाई है। मानवता का यह धड़कता हुआ हृदय भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा सहारा है। गुरुद्वारों ने पहले भी बड़ी जिम्मेदारी सम्हाली थी; जरूरतमंदों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की गाजियाबाद गुरुद्वारे की पहल से आशा बंधती है कि पूरे देश में यह पहल होगी।      

शासन-विधि का सच   

बीबीसी की रपट से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति कार्यालय समेत बिना किसी भी संबद्ध सरकारी विभाग/संस्था को सूचित किए लॉकडाउन की घोषणा की थी। उन्हें जवांमर्दी दिखाने का काफी शौक है। महामारी में भी उन्होंने उसका अवसर निकाल लिया। एक शोधकर्ता की यह रपट भी आई है कि सरकार के पास दूसरी लहर की काफी-कुछ तथ्यात्मक जानकारी होने के बावजूद उसे रोकने या उससे निपटने के उपाय नहीं किए गए। “कोरोना पर विजय पा ली गई है” यह कहते हुए सरकार चुनावों में विजय हासिल करने के अभियान में जुट गई।

दूसरी लहर का विस्फोट हुआ तो शराब की दुकानों से लेकर रैलियों/कुम्भ मेले तक ज्यादा से ज्यादा भीड़ को आमंत्रित करने वालों ने फतवा दे दिया कि लोग दोषी हैं, वे नियमों का पालन नहीं करते!

जिस कॉरपोरेट इंडिया की तारीफ में दिन-रात फू-फां की जाती है, महामारी ने उद्घाटित कर दिया है कि उसमें संरचनात्मक शासन-विधि (स्ट्रक्चरल गवर्नेंस) नाम की कोई चीज नहीं है।

आरएसएस को यह श्रेय जाता है कि उसने देश को पहला छैला प्रधानमंत्री दिया है। प्रधानमंत्री के लिए नीति, योजना, शासन-विधि आदि का अर्थ फैशन और बातों जैसा ही है।

शासकीय जिम्मेदारी और जवाबदेही का निर्वाह मीडिया में शोर मचाने से नहीं, समस्याओं और संकट को अंदरखाने गंभीरता और ईमानदारी से सुलझाने से होता है। जिम्मेदारी और जवाबदेही के जो कुछ अवशेष राजनीतिक पार्टियों और सरकारी संस्थाओं में बचे हुए हैं, कॉरपोरेट इंडिया में उनका तेजी से ह्रास हो रहा है। क्योंकि हवाबाजी और विज्ञापनबाजी को अच्छी शासन-विधि का पर्याय बना दिया गया है। नतीजा लोगों के सामने है : महामारी की पहली लहर के समय मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर एक बहिष्कृत अबोध शिशु अपनी मृत मां का आंचल खींच रहा था; इस बार बड़ी संख्या में बड़े लोग इलाज से वंचित परिजनों के मृत शरीरों को झकझोर रहे हैं!

प्रेम सिंह

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi - 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria
डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi – 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria

क्या यह सुनियोजित जनसंहार नहीं है?

Corona virus COVID19, Corona virus COVID19 image

लगातार घनिष्ठ मित्रों, साथियों और प्रियजनों के कोरोना संक्रमित होने की खबरें मिल रही हैं।

उत्तराखंड में आज से शाम सात बजे से रात्रि कर्फ्यू है। दोपहर दो बजे से सब कुछ बन्द।

सिर्फ लॉकडाउन कहा नहीं जा रहा। कालाबाज़ारी की धूम मची है। जरूरी चीजें अनाज, दालों, खाद्य तेल से लेकर जीवनरक्षक दवाओं तक की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऊपर से कालाबाजार।

विशेषज्ञ लगातार चेता रहे थे, दूसरी लहर आएगी। वैक्सीन भी आ गयी। लेकिन करीब 6 महीने का वक्त मिलने के बावजूद इस संकट से निबटने की कोई तैयारी नहीं की गई।

तैयारी थी तो बिसनेस बढ़ाने की।

तैयारी थी तो सिर्फ आपदा को अवसर बनाने की।

तैयारी थी तो सिर्फ जातीय, नस्ली धार्मिक ध्रुवीकरण की।

क्या यह सुनियोजित जनसंहार नहीं है?

फिर घनघोर रोज़गार संकट।

शिक्षा चिकित्सा ठप।

बच्चे घरों में कैद।

मजदूरों का पलायन शुरू।

अल्वेयर कामु ने प्लेग के शिकंजे में मरते हुए पेरिस का जो ब्यौरा अपने उपन्यास the plague में दिया है, जैसा शरत के उपन्यासों में बर्मा,समुंदर और कोलकाता में प्लेग का विवरण है, जैसा माणिक बन्दोपाध्याय की रचनाओं में बंगाल की भुखमरी के ब्यौरे हैं, जो चित्र अकाल का सोमनाथ होड़, जैनुल आबेदीन, चित्तोप्रसाद ने बनाये थे, वे सारे चित्र और ब्यौरे हमारे आस पास चारों तरफ जीवंत हो रहे हैं।

लंदन में भी इसी तरह की महामारी फैली थी।

महानगरों के विनाश की कथाएँ जीवंत हो रही हैं।

हमारे महानगर मृत्यु दड़बे में तब्दील हैं।

हमने विकास और बाज़ार के लिए गांवों को भी सीमेंट के जंगल में तब्दील कर दिया है।

पीढ़ियों से जड़ों से, जमीन से कटे शहरी भद्रलोग तो शहरों में ही सड़ गलकर मरने को अभिशप्त हो गए हैं।

प्रवासी मजदूर हजारों किमी पैदल चलकर गाँव वापस लौट सकते हैं, लेकिन कुलीन भद्र शहरों की पीढ़ी लिखी जनता के लिए जाने की कोई जगह नहीं बची है।

हमने प्रकृति और पर्यावरण का इतना सत्यानाश कर दिया है कि लोग अब हवा पानी आक्सीजन की कमी से मर रहे हैं।

इस सुनियोजित प्रायोजित मृत्यु उत्सव के उल्लास में बचे हुए लोगों के दिलोदिमाग बन्द हैं और बचने का कोई रास्ता नहीं है।

हम यह भी नहीं जानते कि पिछली दफा सकुशल बचे और सक्रिय रहने के बाद इस साल हम कैसे बचें रहेंगे।

वैक्सीन लगा ली है। महीने भर से सरदर्द और कमजोरी झेल रहे हैं।

कोविशिल्ड लगाने वाले ज्यादातर लोगों को उल्टियों की वजह से भारी समस्या हो रही है।

कल 20 तारीख को दूसरा डोज़ लगना था। अब कहा गया कि 2 जून के बाद लगेगा। हम बचे रहेंगे तो आखिरी साँस तक सक्रिय भी रहेंगे।

इस अफरातफरी में भी हम एक दूसरे के साथ खड़ा होकर संकट का मुकाबला कर सकते हैं। लेकिन भारतीय समाज का बाजार ने विघटन कर दिया है।

न समाज बचा है ओर न सामुदायिक जीवन, सिर्फ राजनीतिक रंग बचे हैं, जिनसे हर कोई सराबोर है।

पलाश विश्वास

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

प्रवासी मजदूरों के खातों में रुपये जमा करे सरकार : राहुल की मांग, प्रियंका ने भी सरकार को घेरा

Rahul Gandhi

Government to deposit money in the accounts of migrant laborers: Rahul’s demand, Priyanka also questioned the government

नई दिल्ली, 20 अप्रैल. लॉकडाउन के कारण घर वापसी को मजबूर प्रवासी श्रमिकों (Migrant workers forced to return home due to lockdown) के साथ सरकार को जिम्मेदारी से पेश आने की सलाह देते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि प्रवासी श्रमिकों को आर्थिक दिक्कत नहीं हो इसलिए उनके बैंक खातों में तत्काल छह हजार रुपये जमा कराए जाने चाहिए।

राहुल गांधी का ट्वीट | Rahul Gandhi’s tweet

श्री गांधी ने ट्वीट किया, प्रवासी श्रमिक एक बार फिर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनके बैंक खातों में रुपए डाले। लेकिन कोरोना फैलाने के लिए जनता को दोष देने वाली सरकार क्या ऐसा जन सहायक क़दम उठाएगी।

Smt Priyanka Gandhi’s Tweet

उधर कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी ट्वीटकर कहा,

“कोविड की भयावहता देखकर ये तो स्पष्ट था कि सरकार को लॉकडाउन जैसे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे लेकिन प्रवासी श्रमिकों को एक बार फिर उनके हाल पर छोड़ दिया। क्या यही आपकी योजना है?

नीतियां ऐसी हों जो सबका ख्याल रखें। गरीबों, श्रमिकों, रेहड़ी वालों को नकद मदद वक्त की मांग है। कृपया ये करिए।”

कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि सरकार विपक्ष के नेताओ की बात नहीं सुनती और उनके सुझाव का मज़ाक उड़ाती है।

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष फ़रवरी में जब श्री गाँधी ने कोरोना महामारी के बारे में चेताया तो सरकार ने पहले मज़ाक़ उड़ाया और नमस्ते ट्रम्प मना कर मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार को जबरन गिराया। फिर बग़ैर बताए घातक लॉकडाउन लगाया।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने फिर चेताया कि बगैर इंतजाम लॉकडाउन से गरीब मज़दूरों का क्या होगा..सरकार ने फिर से एक न सुनी और इसका नतीजा यह रहा कि देश को आजादी के बाद की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी का मंजर देखने को मिला। कांग्रेस ने प्रवासी मजदूरों का रेल भाड़ा जमा करवाया और बसों का इंतज़ाम करवाया तो उसका भी पहले मजाक उड़ाया फिर जा कर कहीं-कहीं रेल का इंतजाम करवाया गया।

प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि पिछले एक साल में कोरोना टैक्स के नाम पर जनता को लूटा गया लेकिन न अस्पताल, न डॉक्टर, न वेंटिलेटर, न वैक्सीन और न दवाई उपलब्ध करवाई और न ही 6,000 रुपये की राशि खाते में जमा कराई।

कोरोना को लेकर सरकार का बड़ा आदेश, हर रविवार को यूपी में संपूर्ण लॉकडाउन

Yogi Adityanath

यूपी में हर रविवार को होगा संपूर्ण लॉकडाउन : मुख्यमंत्री

There will be complete lockdown on every Sunday in UP: Chief Minister

लखनऊ, 16 अप्रैल 2021. कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर बहुत भयानक होती जा रही है। संक्रमण के बढ़ते प्रसार को देखते हुए यूपी सरकार ने हर रविवार को संपूर्ण लॉकडाउन का फैसला किया है।

टीम-11 के साथ समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए हर रविवार को कंपलीट लॉकडाउन का फैसला किया है।

उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है। राज्य में अब सभी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रविवार को पूर्णतया बंदी रहेगी। इस दौरान अति आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी बाजार तथा दफ्तर बंद रहेंगे। इस दिन प्रदेश के सर्वाधिक संक्रमित जिलों में व्यापक सेनेटाइजेशन अभियान चलेगा।

राज्य के सभी ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में रविवार को साप्ताहिक बन्दी होगी। इस अवधि में केवल स्वच्छता, सैनिटाइजेशन और आपातकालीन सेवाओं ही संचालित होंगी। इस संबंध में आवश्यक जागरूकता कार्य भी किए जाएं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार प्रत्येक नागरिक के जीवन और जीविका की सुरक्षा के लिए संकल्पित है। कोविड के कारण लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसके लिए सभी जरूरी प्रयास किए जाए। भरण-पोषण भत्ता के पात्र लोगों की सूची अपडेट कर ली जाए। सरकार जल्द ही इन्हें राहत राशि प्रदान करेगी। अंत्योदय सहित विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत राशन वितरण कार्य की व्यवस्था की समीक्षा कर ली जाए। सरकार सभी जरूरतमंदों को राशन और भरण-पोषण भत्ता उपलब्ध कराएगी।

कोविड की रोकथाम से संबधी कार्यों में विगत वर्ष विधायक निधि उपयोगी सिद्ध हुई थी। इस वर्ष भी कोविड केयर फंड की नियमावली के अनुरूप विधायकगणों की अनुशंसा पर उनकी निधि का कोविड प्रबंधन में उपयोग किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पंचायत चुनावों का पहला चरण अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ। जिन क्षेत्रों में माहौल बिगाड़ने की कतिपय कोशिश हुई है, इसमें संलिप्त लोगों के विरुद्ध कठोर विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। यह कार्रवाई अन्य चरण के चुनावों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करेगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश में सभी के लिए मास्क लगाना अनिवार्य है। पहली बार मास्क के बिना पकड़े जाने पर 1000 का जुर्माना लगाया जाए। अगर दूसरी बार बिना मास्क के पकड़ा जाए तो दस गुना अधिक जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा कि कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी जैसे अधिक संक्रमण दर वाले सभी 10 जिलों में व्यवस्था और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। स्थानीय जरूरतों के अनुसार नए कोविड हॉस्पिटल बनाए जाएं। बेड्स बढ़ाये जाएं। निजी हॉस्पिटल को कोविड हॉस्पिटल के रूप में परिवर्तित किया जाए। प्रयागराज में अविलंब यूनाइटेड मेडिकल कॉलेज को डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल के रूप में परिवर्तित किया जाए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि 108 की आधी एम्बुलेंस केवल कोविड मरीजों के उपयोगार्थ रखी जाए। इस कार्य में कतई देरी न हो। होम आइसोलेशन के मरीजों की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाए। एम्बुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम कम से कम हो। ऑक्सीजन और अन्य चिकित्सकीय जरूरतों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोविड प्रबंधन से जुड़े कार्यों के लिए धन की कोई कमी नहीं है। सभी जनपदों में क्वारन्टीन सेंटर संचालित किए जाएं। क्वॉरन्टीन सेंटरों में आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाओं के साथ-साथ भोजन और शयन की समुचित व्यवस्था हो।

मुख्यमंत्री ने कहा कि डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल की संख्या बढ़ाई जाए। एल-2 व एल-3 स्तर के अस्पतालों की संख्या में लागातर बढ़ोतरी की जाए। कहीं भी बेड की कमी कतई न हो। अस्पतालों में प्रशिक्षित मानव संसाधन की व्यवस्था सुनिश्चित करें।

राजधानी लखनऊ के केजीएमयू और बलरामपुर हॉस्पिटल को अगले 24 घंटे की अवधि में डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल के रूप में परिवर्तित कर संचालित किया जाना है। स्वास्थ्य मंत्री एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री इस महत्वपूर्ण कार्य की मॉनीटरिंग करेंगे। इन दो नए डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल के संचालन से लखनऊ में लगभग 4000 बेड का विस्तार होगा। दोनों मंत्रीगण यह सुनिश्चित करेंगे कि इन अस्पतालों में कोविड मरीजों के इलाज से जुड़े सभी आवश्यक चिकित्सा प्रबंध उपलब्ध हो जाएं।

लखनऊ में डिफेंस एक्सपो आयोजन स्थल पर डीआरडीओ के सहयोग से अति शीघ्र सभी सुविधाओं से लैस 1000 बेड का नया कोविड हॉस्पिटल बनाया जाएगा। इसके क्रियाशील होने के साथ ही लखनऊ में कोविड मरीजों के लिए 5000 अतिरिक्त बेड उपलब्ध हो जाएंगे।

राज्य में हर दिन सवा 02 लाख से अधिक कोविड टेस्ट हो रहे हैं। इसे और विस्तार दिए जाने की आवश्यकता है। कोविड से लड़ाई में टेस्टिंग अत्यंत महत्वपूर्ण हथियार है। अन्य प्रदेशों से आने वाले यात्रियों व लोगों के लिए एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन तथा बस स्टेशनों पर रैपिड एन्टीजन टेस्ट की व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं।

कोविड-19 : मोदी सरकार की विफलताओं की दूसरी लहर

Narendra Modi flute

COVID-19: Modi government’s second wave of failures

अब जबकि कोविड-19 महामारी की कथित दूसरी लहर के रूप में जबर्दस्त वापसी हो चुकी है, मोदी सरकार उसी घोर अक्षमता, निर्ममता और एकाधिकारवृत्ति को दोहराने पर आमादा है, जिनका बहुत ही नुकसानदेह प्रदर्शन उसने महामारी की पहली लहर (Corona virus In India) के दौरान पिछले साल के बड़े हिस्से में किया था।

महामारी की पहली लहर के साथ इस सरकार के सलूक की घोर विफलताओं को दुहराए जाने में अगर कोई कसर रहती भी थी, तो उसे दो चीजों के दुहराए जाने ने पूरा कर दिया है। इनमें पहला है, संक्रमणों में भारी तेजी तथा उसके चलते रात के कर्फ्यू तथा माइक्रो लॉकडाउन (Night curfew and micro lockdown) समेत विभिन्न पाबंदियों की वापसी से आशंकित और पिछली लहर के अपने भयावह अनुभव से आतंकित, प्रवासी मजदूरों के अपने घर-गांवों की ओर पलायन के सिलसिले का शुरू होना।

पिछली बार की तरह, इस सिलसिले की शुरूआत, ट्रेनों में तथा बसों में भी घर-वापसी की भारी भीड़ों के साथ हुई है। अभी तक यह शुरूआत ही है, लेकिन इसके पीछे पिछली बार के कटु अनुभव का अतिरिक्त दबाव भी है, जब ये गरीब प्रवासी मजदूर हर प्रकार के साधनों से वंचित होकर और परिवहन के साधनों ही नहीं घर वापसी की यात्रा की इजाजत भी नहीं होने के चलते, परायी जगहों पर फंसकर रह गए थे।

लॉकडाउन के कमजोर से अंदेशों से ही उठ रही, प्रवासी मजदूरों की अंधाधुंध ‘घर वापसी’ की लहर, पहली लहर के प्रवासी मजदूरों के कडुए अनुभवों पर अपने आप में पर्याप्त टिप्पणी है।

यह लहर यह भी दिखाती है कि मौजूदा सरकार से इन मेहनत-मजदूरी करने वालों की अपेक्षा शून्य है।

खबरों के अनुसार, इस बार के पलायन में अगर कोई बात गनीमत की है, तो यही कि इस बार इन मजदूरों के साथ औरतें-बच्चे काफी कम हैं। पिछली बार के अनुभव से सीखकर, जिसमें बिना किसी पूर्व-चेतावनी के अचानक लॉकडाउन थोप दिए जाने और आवाजाही के साधन ही नहीं आवाजाही मात्र बंद कर दिए जाने और बिना संसाधनों के छोड़ दिए जाने का अनुभव शामिल है, रोजगार के लिए दूसरे शहरों-कस्बों में लौटे मजदूर ज्यादातर अकेले ही आए थे, औरतों-बच्चों को गांव-घर की न्यूनतम सुरक्षा में छोडक़र।

जाहिर है कि यह गनीमत, मेहनतकशों-मजदूरों द्वारा बरती गयी इस सावधानी का ही नतीजा है, न कि सरकार के पिछली बार के अनुभव से सीखकर ऐसा कुछ भी करने का, जिससे इन मजदूरों को अपना ख्याल रखे जाने का कोई भरोसा होता।

इसके बाद भी अगर कोई कसर रह गयी थी तो उसे दूसरी लहर के जोर पकड़ने के बाद, मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की पहली बैठक में पेश की गयी, चार दिन के ‘‘टीका उत्सव’’ की घोषणा ने पूरा कर दिया है।

अचरज की बात नहीं है कि टीका उत्सव के विचार को, देश में कोरोना के विस्फोट की शुरूआत के दौर में पहले ताली-थाली बजाने के कार्यक्रम और आगे चलकर दीया-बत्ती के कार्यक्रम तथा अंतत: फौजी हैलीकोप्टरों आदि से कृतज्ञता पुष्पवर्षा के कार्यक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।

वैसे ईमानदारी की बात यह है कि ‘‘टीका उत्सव’’ का विचार कोविड-19 की चुनौती का सामना करने के लिहाज से, कम से कम, ताली-थाली बजाने या दीया-बाती के आयोजनों जितना बेतुका तो नहीं ही है।

चार दिन के इस टीका उत्सव में उत्सव पर चाहे कितना ही जोर क्यों न हो, टीकाकरण का अभियान तो चलाया ही जा रहा होगा, जोकि मौजूदा दौर में इस महामारी का मुकाबला करने के लिए इकलौता करने वाला काम है। तब क्यों न हम यह मानें कि इससे ‘‘उत्सव’’ से टीकाकरण के काम में कुछ न कुछ तेजी ही आएगी, जो ‘‘टीका उत्सव’’ को कम से कम ताली-थाली आदि के आयोजनों से भिन्न और उद्देश्यपूर्ण बनाता है। लेकिन, काश ऐसा होता! 

दुर्भाग्य से टीकाकरण के तेज किए जाने की जरूरत के सब के स्वीकार करने के बावजूद, इससे टीकाकरण में कोई तेजी नहीं आने जा रही है। लेकिन, क्यों?

इस क्यों का जवाब, उस ठोस पृष्ठभूमि में है, जिसमें नये उत्सव का यह एलान किया गया है। कोविड की उछाल पर मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की जिस बैठक में टीका उत्सव की योजना का एलान किया गया, उससे एक दिन पहले देश के स्वास्थ्य मंत्री, डॉ हर्षवर्द्धन ने कोविड महामारी के दौर का ही नहीं, शायद स्वास्थ्य मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का भी सबसे हमलावर बयान दिया था। जैसाकि मोदी सरकार में कायदा ही हो गया है, स्वास्थ्य मंत्री ने यह असाधारण रूप से हमलावर बयान महाराष्ट्र, पंजाब तथा कुछ अन्य राज्यों द्वारा टीकों की उपलब्धता की स्थिति को लेकर सवाल उठाए जाने तथा मौजूदा हालात पर असंतोष जताए जाने के जवाब में दिया था। संबंधित राज्यों के लिए टीकों की आपूर्ति, जो पूरी तरह से केंद्र द्वारा नियंत्रित है, सुधारने का कोई भरोसा दिलाना तो दूर, खुद को मोदी का सच्चा मंत्रिमंडलीय सहयोगी साबित करते हुए, हर्षवर्द्धन ने विपक्षी राज्य सरकारों के सवालों का जवाब जबर्दस्त हमले से दिया। उन्होंने पलट कर संबंधित राज्य सरकारों पर ही आरोप लगा दिया कि वे संक्रमणों को रोकने से लेकर टीकाकरण तक में अपनी ‘‘घोर विफलता’’ पर पर्दा डालने के लिए ही, टीकों की उपलब्धता का सवाल उठा रही थीं!

बेशक, प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी बैठक में अपने स्वास्थ्य मंत्री के उक्त हमले को आगे नहीं बढ़ाया। इतना ही नहीं, न सिर्फ उन्होंने इस पूरे विवाद को अनदेखा ही कर दिया बल्कि प्रत्यक्ष रूप से जिक्र किए बिना ही अपने स्वास्थ्य मंत्री की खासतौर पर महाराष्ट्र, पंजाब आदि राज्यों की इसके लिए आलोचना से खुद को अलग भी किया कि वहां, पॉजिटिव केसों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।

उल्टे प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि केसों की संख्या ज्यादा निकलने को किसी राज्य के कोविड से निपटने के प्रयासों की सफलता-विफलता का पैमाना मानना गलत होगा। उल्टे चूंकि प्रधानमंत्री विशेष रूप टैस्टिंग बढ़ाने पर जोर देना चाहते थे, वह पॉजिटिव केसों की बढ़ती संख्या को, टैस्टिंग में बढ़ोतरी का स्वाभाविक परिणाम मानने का ही आग्रह करते नजर आए। और इस लिहाज से टैस्टिंग में पॉजिटिव केसों की संख्या का बढ़ना, कोविड-19 से निपटने के संबंधित राज्यों के प्रयत्नों की गंभीरता के ही साक्ष्य के तौर पर देखा जाना चाहिए न कि गंभीरता में कमी के संकेतक के रूप में।

जाहिर है कि कम से कम महाराष्ट्र के मामले में यह नजरिया, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के आक्षेपों से ठीक उल्टा बैठता है।

लेकिन, प्रधानमंत्री टैस्टिंग के महत्व पर विशेष जोर देने पर ही नहीं रुक गए। इससे आगे बढक़र प्रधानमंत्री ने टीकाकरण पर ज्यादा जोर दिए जाने को, टैस्टिंग तथा कांटैक्ट ट्रेसिंग व ट्रीटमेंट से ध्यान घटने के लिए और इसलिए, महामारी के तेजी से फैलने के लिए भी जिम्मेदार बना दिया। जाहिर है कि इसके लिए कोविड की पाबंदियों के पालन में जनता की ‘‘ढि़लाई’’ को भी उन्होंने, उससे ज्यादा नहीं तो उतना ही जिम्मेदार तो जरूर ही माना। अचरज की बात नहीं है कि यहां से आगे प्रधानमंत्री ने न सिर्फ राज्यों को पर्याप्त संख्या में टीके उपलब्ध कराने में अपनी सरकार की विफलताओं को चर्चा से ही बाहर कर दिया बल्कि एक प्रकार से इसका भी इशारा किया कि टीकों में कमी को, महामारी को संभालने में केंद्र सरकार के कदमों और फैसलों की किसी कमी का संकेतक नहीं माना जा सकता है। नतीजा यह कि टीकों के संबंध में टीकों की खरीद व वितरण से लेकर, टीकाकरण की प्राथमिकताओं व प्रक्रियाओं तक, सब कुछ और अक्षरश: केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाने के बावजूद, देश के अनेक राज्यों में पैदा हो गए गंभीर टीका संकट की किसी भी तरह की अर्जेंसी, प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ इस बैठक में दिखाई नहीं दी। और यह तब था जबकि इस बैठक के शुरू होने के समय तक, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई व महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों से लेकर, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अनेक हिस्सों तक, टीकों की आपूर्ति की कमी से टीकाकरण केंद्रों पर ‘‘आउट ऑफ स्टॉक’’ के बोर्ड लटकाए जाने का सिलसिला शुरू हो चुका था। ‘‘टीका उत्सव’’ तक इस संकट के दूर होने के कोई आसार तो नजर नहीं आ रहा हैं। ऐसे में ‘‘टीका उत्सव’’ के मोदी सरकार का ताली-थाली पिटवाने जैसा एक और टोटका बनकर रह जाने के ही आसार ज्यादा हैं

टीकाकरण की धीमी गति के लिए, मोदी सरकार की नीतियां और निर्णय जिम्मेदार | The Modi government’s policies and decisions are responsible for the slow pace of vaccination.

         जैसाकि हमने पहले ही कहा, टीकाकरण की धीमी गति और अब टीका संकट की ही नौबत आ जाने के लिए, मोदी सरकार की नीतियां और निर्णय ही जिम्मेदार हैं क्योंकि सारे निर्णय उसने अकेले और बिल्कुल इकतरफा तरीके से लिए हैं, जिनमें राज्यों की बात सुनने से साफ तौर पर इंकार किया जाता रहा है। विकलांगों व अशक्तों को घर जाकर टीका लगाने से लेकर, कार्यस्थलों पर टीके लगाने तथा टीका लगवाना चाह रहे सभी लोगों के टीका लगाने तक के, अनेक विपक्षी राज्य सरकारों के ठोस सुझावों को, बड़ी हिकारत के साथ केंद्र सरकार ने ठुकराया है।

सिर्फ टीकाकरण तक ही सीमित नहीं मोदी सरकार की विफलता

बहरहाल, मोदी सरकार की विफलता टीकाकरण तक ही सीमित नहीं है। रेमडेसिविर जैसी कोविड रोगियों के लिए कारगर दवाओं से लेकर आक्सीजन सिलेंडरों तथा अस्पतालों में वेंटीलेटर की सुविधाओं तक का दूसरी लहर के पहले की धक्के में कम पड़ जाना, इस तरह की महामारी से निपटने के लिए इस सरकार की तैयारियों की भारी कोताही को ही दिखाता है।

उधर, बढ़ते संक्रमण के सामने विभिन्न पाबंदियों की वापसी का असर, प्रवासी मजदूरों के उलट पलायन के रूप में तो सामने आ ही रहा है, पर आम तौर पर मेहनत-मजदूरी करने वालों की पहले ही खराब माली हालत के और भी बिगड़ जाने के रूप में सामने आएगा। लेकिन, मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की बैठक में इसका कोई संकेत नहीं था कि सरकार का इस ओर भी कोई ध्यान है। उल्टे, कोविड की पहली लहर के बीच पांच किलोग्राम मुफ्त राशन की जो व्यवस्था शुरू की गयी थी, उसे भी नवंबर से बंद किया जा चुका है। अतिरिक्त नकदी सहायता तो खैर नाममात्र को दी गयी थी और वह कभी की बंद की जा चुकी है।

इस मामले में दूसरी लहर में मोदी सरकार, पहली जितनी ही लापरवाह तथा निष्ठुर साबित होने जा रही है। बस, शायद इस दूसरी लहर में मोदी सरकार अर्थव्यवस्था के बैठ जाने के अंदेशे से देश भर में ‘‘पूर्ण लॉकडाउन’’ को दुहराने से बचना चाहेगी। लेकिन, टीकाकरण समेत विभिन्न मोर्चों पर उसकी विफलताओं के दुहराए जाने का अर्थ यह भी तो है कि अर्थव्यवस्था के पहिए चलते रखने की कीमत, केंद्र से किसी भी वास्तविक मदद के अभाव में, मजदूर और अन्य मेहतनकशों को ही चुकानी होगी।  

राजेंद्र शर्मा

अंतत: जनता को ही भुगतना पड़ता है मूर्ख शासकों की कथनी और करनी दोनों का फल

Today's Deshbandhu editorial

Ultimately, the people have to suffer the consequences of both the words and actions of foolish rulers.

देशबन्धु में संपादकीय आज | Editorial in Deshbandhu today

मूर्ख शासकों की कथनी और करनी दोनों का फल अंतत: जनता को ही भुगतना पड़ता है, यह समयसिद्ध सत्य है। हम किसी मुद्दे पर सरकार के समर्थन में रहें या विरोध में रहें। किसी फैसले पर आवाज उठाएं या चुप्पी साध लें। लेकिन जब उस मुद्दे पर नुकसान उठाने की बारी आती है, तो जनता को ही बलि का बकरा बनना पड़ता है। हिंदुस्तान में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्होंने बालकनी में आकर ताली या थाली न बजाई हो या दिए और टार्च न जलाएं हों। लॉकडाउन की घोषणा होने पर अच्छा है, अच्छा है का दम भरते हुए लोग घरों में भी खुशी-खुशी कैद हो गए। एसी और कूलर की हवा खाते हुए उन लोगों को लानत भेजने से भी बाज न आए, जो मजबूरन घर लौट रहे थे और इसके लिए बसों पर सवार होने की कोशिश में थे या फिर पैदल ही निकल पड़े थे। पिछले साल इन्हीं दिनों तब्लीगी जमात (Tablighi Jamaat) को कई खबरिया

चैनल पौराणिक कथाओं में वर्णित दानव की तरह पेश कर रहे थे, जिनके कारण कोरोना संक्रमितों के आंकड़े कुछ हजार तक जा पहुंचे थे। हमारे शासक जनता की इस भक्ति का लाभ उठाते हुए पिछले दरवाजे से कई बड़े फैसले ले चुके थे, और सामने वे जनता को यही बतला रहे थे कि दुनिया की महाशक्ति अमेरिका कैसे सबसे ज्यादा प्रभावित है। हम तो उससे फिर भी पीछे ही हैं।

The second wave of Corona has arrived in the country like a tsunami.

अब कोरोना की दूसरी लहर देश में सुनामी की तरह आ चुकी है। और लॉकडाउन का डर (Fear of lockdown) फिर दिखने लगा है, बल्कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में अलग-अलग तरह से लॉकडाउन लगने भी लगा है। आम जनता तो बीमारी के डर से घबरा ही रही है, प्रवासी मजदूर भी एक बार फिर अपनी रोजी-रोटी के साथ जान की चिंता में उलझ गए हैं। महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, दिल्ली से रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों में मजदूरों की बढ़ती भीड़ दिखाई देने लगी है। सरकार ने इनकी ओर से आंखें मूंद ली हों, तो औऱ बात है। सरकार को वैसे भी कहां कुछ दिखाई देता है।

कोई मोदी जितना संवेदनहीन कैसे हो सकता है

जैसे इस वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने परीक्षा पर चर्चा की। उन्हें शायद ये नजर नहीं आया कि पिछले साल से अब तक किशोर और युवा अपनी पढ़ाई और रोजगार को लेकर कितने असमंजस में हैं। कक्षाओं का ठिकाना नहीं है, सोशल मीडिया पर परीक्षाओं के बहिष्कार की मुहिम चल रही है, ऑनलाइन-ऑफलाइन के सी-सॉ में विद्यार्थियों का भविष्य झूल रहा है और मोदीजी बच्चों को परीक्षा में आत्मविश्वास बढ़ाने के नुस्खे (Tips to increase confidence in the exam) बता रहे हैं। कोई इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है।

Modi government is not only insensitive, but also biased

यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि मोदी सरकार न केवल संवेदनहीन है, बल्कि पक्षपाती भी है। सरकार जो फैसले जनता पर थोप रही है, खुद उस पर अमल नहीं कर रही। इसका सबसे बड़ा प्रमाण चुनावी रैलियां और रोड शो हैं, जिनमें निर्वाचन आयोग की नियमावलियों का उल्लंघन हो रहा है। कार को सार्वजनिक स्थान बताकर उसमें अकेले चालक को भी मास्क अनिवार्य कर दिया गया है, लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सार्वजनिक सभाओं में बिना मास्क के नजर आ रहे हैं।

इंदौर में पुलिसवालों ने एक ऑटोचालक पर मास्क न पहनने के कारण सख्ती के नाम पर बर्बरता दिखाई, लेकिन माननीयों से सख्ती तो दूर, नरमी से यह पूछना भी गुनाह माना जा सकता है कि साहेब आपने मास्क क्यों नहीं पहना।

प्रधानमंत्री ने 8 अप्रैल की सुबह टीके की दूसरी खुराक भी लगवा ली। माना जा सकता है कि वे अब सुरक्षित हैं और उन्हें सुरक्षित रहना भी चाहिए। लेकिन प्राणों की कीमत तो सबकी एक जैसी ही होती है।

जनता तक टीके की आसान पहुंच कब होगी, कब टीके की किल्लत खत्म होगी, कब इसकी कालाबाजारी रुकेगी, कब टीके सबके लिए सुरक्षित होंगे, ये सवाल उठ रहे हैं। क्या सरकार इनका जवाब देगी। या कोरोना के नाम पर उन व्यापारियों का धंधा चमकाने में लगी रहेगी, जिनसे भारी-भरकम चंदा मिलता है।

आंकड़े बताते हैं कि आम जनता के लिए कमाई के अवसर भले घट गए हों, लेकिन इस देश में धनपशुओं की ताकत में इजाफा हुआ है।

अगर दोबारा लॉकडाउन हुआ तो आम आदमी के लिए अर्थव्यवस्था फिर चौपट हो जाएगी, लेकिन रईसों की अर्थव्यवस्था फिर चमक जाएगी। कोरोना की दूसरी लहर के बहाने आम जनता के सामने जान और माल दोनों से हाथ धोने का खतरा बना रहेगा। इस खतरे को बुद्धिमानी से दूर किया जा सकता है, बशर्ते अक्लमंदी के ईमानदार इस्तेमाल की नीयत हो।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप.

दिल्ली में स्थिति गंभीर, कोरोना के 8,521 नए मामले सामने आए, 39 की मौत

COVID-19 news & analysis

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले 24 घंटों के दौरान शुक्रवार को 8,521 नए कोविड मामले सामने आए हैं

Situation critical in Delhi, 8,521 new cases of corona reported, 39 dead

In the national capital Delhi, 8,521 new COVID cases have been reported on Friday during the last 24 hours.

नई दिल्ली, 10 अपैल 2021 । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली) में पिछले 24 घंटों के दौरान शुक्रवार को 8,521 नए कोविड मामले सामने आए हैं। महामारी की शुरूआत के बाद से दिल्ली में यह एक ही दिन में सामने आए मामलों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है।

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य बुलेटिन में यह जानकारी दी गई है।

पिछले साल 11 नवंबर को दिल्ली में एक ही दिन में यानी कुल 24 घंटों के दौरान 8,593 रिकॉर्ड मामले दर्ज किए गए थे।

दिल्ली में दैनिक तौर पर पॉजिटिविटी रेट 7.79 प्रतिशत दर्ज की गई है। फिलहाल यहां सक्रिय (एक्टिव) मामलों की संख्या 26,631 हैं, जिनमें से 13,188 अपने घरों में ही आइसोलेशन में हैं।

इस बीच दिल्ली में बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कोविड-19 की तैयारियों का जायजा लेने के लिए आज एलएनजेपी का दौरा किया। इस दौरान एलएनजेपी अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मौजूद रहे।

दिल्ली में लॉकडाउन की योजना नहीं | No lockdown planned in Delhi

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय राजधानी में लॉकडाउन की योजना नहीं बना रही है। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि सरकार आने वाले दिनों में कुछ और प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही है।

शुक्रवार को 39 और मौतों के साथ दिल्ली में कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़कर 11,196 हो गया है।

यहां 109,398 और नमूनों का परीक्षण किया गया है, जिनमें 70,403 आरटी-पीसीआर और 38,995 रैपिड एंटीजन टेस्ट रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चिंता की बात यह है कि यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कम से कम 20 डॉक्टर और छह एमबीबीएस छात्र भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं।

कोविड-19 मामलों में भारी वृद्धि के बीच, दिल्ली सरकार ने शुक्रवार को राजधानी के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को अगले आदेशों तक बंद करने का आदेश दिया है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने घोषणा करते हुए कहा कि कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण, सभी सरकारी और निजी स्कूल के साथ ही सभी प्रकार की कक्षाएं अगले आदेश तक बंद रहेंगे।

कोरोना संक्रमण की नई-लहर और लॉकडाउन की चिताएं

The new wave of corona infection and lockdown concerns

कोरोना संक्रमण की तेज रफ्तार ने छत्तीसगढ़ में एक बार फिर लॉकडाउन की शुरूआत करवा दी है। अंततः सरकार को पूर्णबंदी जैसे कदम उठाने को विवश होना पड़ रहा है।

सवाल कई तरह के हैं, लेकिन इस वक्त मुख्य सवाल यही है कि इसके लिए जवाबदेह कौन है ? इसके लिए सरकार और लोगों में से अधिक लापरवाही किसकी है ?

दुर्ग जिला से सरकार में सर्वाधिक केबिनेट मंत्री हैं। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री जैसे कई कद्दावर मंत्रियों के जिलों की इस तरह की बदतर स्थिति सरकार की प्रशासनिक अक्षमता मानी जाये या नहीं यह कहना तो जल्दबाजी होगी, बहरहाल सरकार के लिए सवाल एवं मुश्किलें दोनों मुसीबत खड़ा करते दिख रहे हैं।

लॉकडाउन लेटेस्ट अपडेट

कोरोना संक्रमण के नये वेरियेंट या नई म्युटेंट के कारण छत्तीसगढ़ सहित दर्जनों राज्यों की बिगड़ती स्थिति पर काबू पाने के लिए एक बार फिर पूर्णबंदी या लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू (Lockdown and night curfew) जैसे कवायदों की सख्तियों की शुरूआत हो गई है। राज्य सरकारों के समक्ष चिंताएं एवं चुनौतियां इस बार एक अलग स्वरूप में दिखाई दे रहीं हैं क्योंकि इस बार कोरोना के लक्षण कुछ अलग तरह के हैं।

जाहिर है कि इस बार राज्य सरकारों को कोरोना संक्रमण से अलग तरह से जूझना है और इससे उबरने एवं निपटने के लिए उपाय भी नये तरीके से करना है।

How to stop the rapidly increasing infection rate of the second wave of corona infection

इस बार की पहली चिंता एवं चुनौती यह है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की तेजी से बढ़ती संक्रमण दर को कैसे रोका जाये। दूसरी चिंता टीकाकरण की दर को कैसे बढ़ाया जाये। जिस गति एवं रफ्तार से दूसरी लहर का संक्रमण फैल रहा है एवं बढ़ रहा है, उसे अब लाॅकडाउन जैसे उपायों से रोकना एवं निपटना असंभव तो है ही, साथ ही साथ अब यह व्यावहारिक एवं उचित भी नहीं है। उद्योगधंधे, अर्थव्यवस्थाएं पहले से ही खराब चल रहीं हैं। जीएसटी संग्रहण पहले से ही बहुत कम हो रहे हैं। स्थितियां तेजी से सुधरती दिख रहीं थीं, मगर दूसरी लहर से सारे सकारात्मक नतीजों के उल्टे पड़ने की आशंकाएं बढ़ती दिख रही हैं।

उद्योग-धंधों एवं अर्थव्यवस्थाओं को सुधारने और विकास दर की गिरावट को रोकने जैसे उपायों पर छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य सरकारों ने बेहतर काम करते हुए अर्थव्यवस्थाओं को सुस्ती से बाहर निकालने के लिए सराहनीय काम किया जिसका नतीजा यह निकला है कि उद्योग-धंधे एवं कारोबार को गति मिली है। रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं एवं बढ़ाएं जा रहे हैं।

बाजार की स्थितियों में सुधार हुआ है, बाजार में उपभोक्ता मांग बढ़ी है। कुल मिलाकर एक साल बाद स्थितियां काबू में आ गई थीं।

लेकिन अब सारे प्रयासों पर पानी फिरता दिख रहा है और महाराष्ट्र सहित कुछेक राज्यों में तो स्थितियां बेकाबू होती दिखने लगीं हैं। यदि यह स्थिति फिर पहले जैसे हो गई तो इस बार कारोबार, उद्योग-धंधों एवं अर्थव्यवस्थाओं को संभालना बहुत कठिन हो सकता है।

विकासदर की चिंता तो छोड़िये, रोजगार की स्थिति ही विकराल हो सकती है। अर्थव्यवस्था लंबी अवधि के लिए सुस्ती एवं मंदी की चपेट में आ सकती है। महंगाई बेकाबू होकर मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।

इस समय कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की तेजी से बढ़ती संक्रमण दर से बचने एवं इसकी आसन्न चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकारों को अपनी कामकाज की शैलियों में सुधार करने की सख्त जरूरत है। कोरोना की वजह से राज्यों के राजस्व एवं संसाधनों पर आई गिरावट को राज्य सरकारों ने नजर अंदाज करते हुए अपने खर्चों में अपेक्षित कटौती नहीं की, जितनी उन्हें की जानी चाहिए थी। केन्द्र सहित कई राज्य सरकारों ने अपने गैर-जरूरी खर्चों एवं निर्माण कार्यों पर रोक नहीं लगाई है।

केन्द्र सरकार लगातार रक्षा खर्चों, निर्माण कार्यों पर होने वाले को बढ़ाती जा रही है, जिसकी इस समय उपयोगिता एवं जरूरत उतनी नहीं है जितनी सरकार समझ रही है। पूरी दुनिया कोविड-19 संकट से जूझ रही है, मगर हमारी सरकार लगातार राफेल विमानों की खरीदी पर भारी-भरकम बजट खर्च करने में लगी है। संसद भवन अभी सालों तक काम आ सकता है, उस पर भारी खर्च करने को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना चुकी है। शिक्षा, महंगाई, रोजगार जैसे जन उपयोगी मसलों पर केन्द्र सरकार चुप्पी साधकर अनेंको गैर-जरूरी मसलों पर राजस्व एवं संसाधनों की बबार्दी पर रोक लगाने में नाकाम दिखती है।

इस समय सरकारों को सारे गैर-जरूरी प्रशासनिक खर्चों में कटौती करनी चाहिए। सारे गैर-जरूरी निर्माण कार्यो को फिलहाल स्थगित करना चाहिए। केन्द्र सहित सभी राज्य सरकारों फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की जरुरत है। इस समय जो सबसे बड़ी जरूरत है वह यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई भर्तियों को तत्काल प्रभाव से अंजाम दिया जावे। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उपाय करने की जरुरत है। इन उपायों के द्वारा रोजगार के अवसर बढ़ाने की जरुरत है ताकि बाजार में उठाव एवं मांग पैदा हो। इससे अर्थव्यवस्था संभलेगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और सरकारों का राजस्व भी बढ़ेगा।

बदलते वक्त में सरकारों को अपनी कार्यशैली में बदलाव करने की जरूरत है जिससे कोरोना से निपटने एवं उबरने में सहूलियत हो।

अब लॉकडाउन जैसे उपाय कतई उचित एवं व्यावहारिक नहीं हो सकते हैं। टीकाकरण बढ़ाने के साथ लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाना होगा। टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के साथ उसके बाद भी एवं बाद की सावधानी के साथ जीने की आदत के लिए उत्प्रेरित एवं जागरूक करना होगा। जब तक लोगबाग स्वयं अपने स्वास्थ्य के लिए जागरूक नहीं होंगे, तब तक सरकारों के सारे उपाय नाकाम ही सिद्ध एवं साबित होंगे। इसलिए जन चेतना, जन शिक्षा एवं जन जागरूकता बढ़ाना सबसे सकारात्मक, महत्वपूर्णं एवं सार्थक उपाय होगा।

साफ-सफाई, व्यक्तिगत चेतना ही स्वास्थ्य की कुंजी

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की तेजी से बढ़ती संक्रमण दर से बचने एवं इसकी आसन्न चुनौतियों से निपटने एवं उबरने से अधिक जरूरी जन मानस की मानसिकता में बदलाव एवं सकारात्मक परिवर्तन लाने की है कि व्यक्तिगत सावधानियां, व्यक्तिगत साफ-सफाई एवं व्यक्तिगत चेतना ही स्वास्थ्य की कुंजी है। यही बात लोगों को समझने एवं समझाने की जरूरत है।

डॉ. लखन चौधरी

Dr-Lakhan-Choudhary
Dr-Lakhan-Choudhary

कोरोना संकट से फिर लग सकता है शिक्षा पर ग्रहण

COVID-19 news & analysis

Education can be eclipsed again due to Corona crisis

देश में अर्थव्यवस्था और शिक्षा, दो ऐसे महत्वपूर्ण सेक्टर हैं जिसे कोरोना संकट का सबसे अधिक दंश झेलना पड़ा है। हालात सामान्य होने पर अर्थव्यवस्था जहां पटरी पर लौटने लगी थी, वहीं स्कूल कॉलेज खुलने से भी ऐसा लग रहा था कि शिक्षा व्यवस्था फिर से मज़बूत होगी। लेकिन संकट अभी पूरी तरह से टला भी नहीं था कि कोरोना की दूसरी लहर के बढ़ते प्रकोप ने एक बार फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

देश के कई राज्यों और ज़िलों में दुबारा लॉकडाउन लगा दिया गया है और पिछले 11 महीने से बंद स्कूल और कॉलेज अभी पूरी तरह से खुले भी नहीं थे कि फिर से बंद करने की नौबत आ गई है। हालांकि बच्चों की सेहत को प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकारों का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इस लॉकडाउन से आर्थिक क्षेत्र की तरह शिक्षा में भी अमीर और गरीब की खाई चौड़ी होती चली जाएगी।

नई टेक्नोलॉजी से युक्त मज़बूत आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के बच्चों को जहां लॉकडाउन में ऑनलाइन क्लास (Online class in lockdown) आसानी से उपलब्ध हो रहा था, वहीं कम आय वाले ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की ऑनलाइन क्लास तक पहुँच मुश्किल रही थी।

कम आय वाले कई ऐसे परिवार हैं जहां एंड्रॉएड फोन की कमी की वजह से बच्चे ऑनलाइन क्लास करने से वंचित रह गए और पूरे लॉकडाउन के दौरान उनकी पढ़ाई छूट गई। आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के बावजूद शिक्षा के महत्त्व को प्राथमिकता देते हुए कुछ अभिभावकों ने ऐसे फोन उपलब्ध भी कराये तो परिवार के किसी एक बच्चे को ही यह सुविधा मिल पाती थी। अन्य राज्यों की अपेक्षा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर के बच्चों को इस दौरान दोहरी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। एक तरफ जहां लॉकडाउन से स्कूल बंद (School closed due to lockdown) थे तो वहीं धारा 370 के हटने के बाद पूरे राज्य में केवल 2G के संचालन ने मोबाइल नेटवर्क की रफ़्तार पर भी ब्रेक लगा रखा था। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो दूर, अच्छी आर्थिक स्थिति वाले परिवारों और शहरी क्षेत्रों के बच्चों को भी ऑनलाइन क्लास करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

कोरोना महामारी के चलते पूरे 11 महीनों स्कूलों में ताले देखने को मिले। बच्चों की पढ़ाई अस्त व्यस्त हो गई। उन्होंने जो कुछ स्कूलों मे सीखा था वह भी भूल बैठे थे। अब जबकि धीरे धीरे स्कूल खुलने शुरू हुए तो अभिभावकों के साथ-साथ बच्चों में भी एक नई ख़ुशी और उमंग देखने को मिल रही है।

लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन स्टडी की दिक्कतें | Problems of online study during lockdown

जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र पुंछ से करीब 6 किमी दूर मंगनाड गांव के अभिभावकों के साथ-साथ बच्चे भी दुबारा स्कूल खुलने से खुश हैं, उन्हें उम्मीद है कि पटरी से उतर चुकी उनकी पढ़ाई स्कूल खुलने से फिर रफ़्तार पकड़ सकेगी।

गांव के वार्ड नंबर 1 के मोहल्ला टेंपल के रहने वाले दर्शन लाल पेशे से मज़दूर हैं। परिवार में तीन बच्चों में बड़ा बेटा सुनील 11th का विद्यार्थी है। स्मार्टफोन नहीं होने के कारण वह पिछले 11 महीने से अपनी पढ़ाई नहीं कर पा रहा था।

दर्शन लाल कहते हैं कि जब करोना काल का बुरा समय था, तब सरकार ने हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाए। सरकार ने हर तरफ से हमारी मदद की। हमें मुफ्त राशन, गैस, दाल और हमारे खाते में जनधन योजना के तहत पैसे भी डाले, लेकिन बच्चों की पढ़ाई छूट गई। गरीबी के कारण बच्चों को ऐसे फोन उपलब्ध नहीं करा पाया जिससे वह अपनी शिक्षा को जारी रख सकते। परन्तु अब जबकि स्कूल खुलने लगे हैं तो हमारी सरकार से यही विनती है कि कुछ खास सावधानियों को ध्यान रखते हुए इस वर्ष बच्चों की शिक्षा पर अधिक से अधिक ध्यान केंद्रित करे।

हालांकि इसी मोहल्ले में रहने वाली पिंकी देवी का कहना था कि उनका बेटा सातवीं का छात्र है। उन्होंने किसी तरह अपने बच्चे के लिए स्मार्ट फोन उपलब्ध करा लिया था, लेकिन ऑनलाइन स्टडी के दौरान उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। पिछले 11 महीनों में उसने एक दिन भी ढंग से पढ़ाई नहीं की। उनका कहना था कि हम इतने पढ़े लिखे नहीं हैं कि उसे स्वयं पढ़ा सकें। अब जबकि स्कूल खुल गए हैं तो उम्मीद है कि शिक्षक उसकी पढ़ाई पूरी करवाने में उसकी मदद करेंगे।

इसी गांव के वार्ड नंबर 2 स्थित मोहल्ला ‘ग्रा’ के रहने वाले देवेंद्र पाल का बड़ा बेटा अंकित सातवीं कक्षा में और छोटा बेटा मनीष चौथी कक्षा का छात्र है। वह अपने बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित दिखे। इनके पास भी स्मार्ट फोन नहीं था, जिससे लॉकडाउन के दौरान इनके बच्चे ऑनलाइन स्टडी से वंचित रह गए। परंतु अब जबकि स्कूल खुल गए हैं तो इन्हें भी उम्मीद है कि बच्चों की अधूरी रह गई पढ़ाई समय पर पूरी हो सकेगी।

वहीं मोहल्ला ‘लोपारा’ के रहने वाले प्रदीप का मानना है कि स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ अनुशासन भी सिखाई जाती है। ऐसे में स्कूल बंद होने से बच्चे जहां पढ़ाई में कमजोर हो रहे थे, वहीं उनका अनुशासन भी भंग हो रहा था। अब जब स्कूल खुल गए हैं तो बच्चों की पढ़ाई और अनुशासन दोनों में सुधार आ सकता है।

Children had difficulties in doing online classes due to poor network

इस सिलसिले में क्षेत्र के मुख्य शिक्षा अधिकारी चौधरी गुलजार हुसैन का भी मानना है कि कमज़ोर नेटवर्किंग के कारण बच्चों को ऑनलाइन क्लास करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। उनका कहना है कि पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से इस केंद्रशासित प्रदेश में 4G इंटरनेट सेवा बाधित रही है, जिसके कारण दूरदराज इलाकों में नेटवर्क की हालत बहुत खराब रही है। हालांकि अब 4G नेटवर्क सेवा बहाल हो गई है तो स्कूल भी खुलने लगे हैं, ऐसे में बच्चों की पढ़ाई फिर से रफ़्तार पकड़ सकेगी।

Community classes better than online classes

हालांकि चौधरी गुलज़ार का मानना है कि ऑनलाइन क्लासेस से बेहतर कम्युनिटी क्लासेस रही है। उन्होंने कहा कि कोरोना के सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करते हुए चरणबद्ध तरीके से कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। उन्होंने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि कोरोना काल में हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत कमज़ोर हो चुकी है। बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से ट्रैक से उतर चुकी है। लेकिन शिक्षा विभाग का प्रयास रहेगा कि स्कूल खुलने के बाद सभी कमियों को ठीक कर लिया जाए।

Corona virus In India

बहरहाल कोरोना संकट के समय सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों से लोगों को राहत तो मिली है, लेकिन जिस प्रकार से शिक्षा व्यवस्था चौपट हुई है, उसकी भरपाई के लिए सभी को आगे आने की ज़रूरत है। शिक्षा विभाग जहां अपने स्तर से प्रयास कर रहा है वहीं अभिभावक और समाज को भी इस दिशा में सोचने और बेहतर कदम उठाने की ज़रूरत है। ऑनलाइन के साथ-साथ कोरोना के सभी नियमों का पालन करते हुए सामुदायिक कक्षाओं के संचालन करने की भी आवश्यकता है ताकि बच्चों की रुकी हुई शिक्षा निर्बाध गति से चलती रहे। क्योंकि इस प्रकार के किसी नए सुझावों पर यदि अमल नहीं किया गया तो आने वाले समय में बच्चों की पढ़ाई को जारी रख पाना मुश्किल हो सकता है। जिस प्रकार से कोरोना की दूसरी लहर तेज़ी से अपना पांव पसार रही है ऐसे में शिक्षा पर फिर से खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। यदि फिर से लॉकडाउन लगता है तो शिक्षा व्यवस्था पर ग्रहण लगना निश्चित है। ज़रूरत है ऑनलाइन क्लास के विकल्पों को ढूंढने की ताकि इस बार कोई भी बच्चा फोन की कमी के कारण शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित न रह जाए।

हरीश कुमार

पुंछ, जम्मू

(चरखा फीचर)

कोरोना मामलों में वृद्धि के चलते लॉकडाउन की अवधि बढ़ी

COVID-19 news & analysis

The lockdown period extended in Germany due to an increase in Corona cases

नई दिल्ली, 05 मार्च 2021. जर्मनी में लॉकडाउन (Lockdown in germany) के बावजूद पिछले कुछ हफ्तों से कोविड-19 महामारी (COVID-19 Epidemic) के नए मामलों में फिर से वृद्धि देखने को मिल रही है। यहां एक दिन में कोरोना के 11,912 मामले दर्ज हुए हैं। रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट (Robert Koch-Institut आरकेआई) ने इसकी घोषणा की है।

Lockdown till 28th March

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, बढ़ते संक्रमण और कोविड-19 वेरिएंट्स के प्रसार के चलते चांसलर एंजेला मार्केल और संघीय राज्यों ने बुधवार को कम से कम 28 मार्च तक लॉकडाउन की अवधि को बढ़ाए जाने की बात पर अपनी सहमति व्यक्त की है। इस दौरान पांच चरणबद्ध क्रम से धीरे-धीरे दुकानें वगैरह खोली जाएंगी।

धीरे-धीरे लॉकडाउन में छूट

मार्च के शुरू होने के साथ ही स्कूल और हेयरड्रेसर की दुकानें खोल दी गईं। दूसरे चरण में बुकस्टोर, फ्लावर स्टोर और गार्डेन सेंटर को खोलने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन इसमें पर्याप्त स्वच्छता और ग्राहकों की संख्या को लेकर नियमों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य होगा।

COVID-19 news & analysis

मार्केल ने कहा कि “अब हमें समझदारी के साथ अपना अगला कदम उठाना होगा।” बुधवार को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान नए नियमों की घोषणा करते हुए मार्केल ने कहा, “यूरोप में महामारी की तीसरी लहर के कई उदाहरण मौजूद हैं, ऐसे में खतरा हम पर भी बना है।”

चल पड़े हैं लेकिन मंजिल बहुत दूर है…….. किसी के मन में नहीं है दर्द? श्रमिकों की न कदर, न सम्मान, नहीं श्रम की सही कीमत!

How many countries will settle in one country

नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2020. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कहा है कि मध्य प्रदेश के गुजरात में अटके सैकड़ों मजदूरों को सरकार की तरफ से कोई राहत नहीं मिली है। आंदोलन ने मध्य प्रदेश शासन के तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत बताई है।

आंदोलन ने सरकार से सवाल किया है कि मध्य प्रदेश से चलकर सैकड़ों किमी दूर जाने वाले मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था क्यों नहीं?

 नर्मदा बचाओ आंदोलन की विज्ञप्ति निम्न है।

लॉक डाउन के चलते कोरोना से भी देश की जनता अधिक ग्रस्त है, बेरोजगारी और भूखमरी से! ‘रोजगार’ के मुद्दे की गंभीरता अब समझ में आ रही है, बुद्धिजीवियों को भी! लेकिन सबसे अधिक त्रस्त है श्रमजीवी ही! जिनका हाथ पर पेट रहता है, ऐसे मजदूरों में, देश में रोजगार मूलक विकास नियोजन की कमी के कारण, शामिल है आदिवासी भी।

नर्मदा घाटी के, सतपुड़ा और विंध्याचल के आदिवासियों को पहले कभी गाँव छोड़कर दूर क्षेत्र में मजदूर बनके जाना नहीं पड़ता था। लेकिन अब प्राकृतिक विनाश और बाजार – आधारित रोजगार की दौड़ में वे अपने गाँव और पंचकोशी के तहत उपलब्ध संसाधनों से रोजगार नहीं पा रहे है। किसानों को भी घाटे का सौदा जैसी ही खेती चलानी पड़ती है तो वे काम का सही दाम नहीं दे पाते और रोजगार गारंटी के कानून पर अमल के लिए व्यवस्था, संवेदना, और कुशलता के साथ तैयार नहीं है। ग्रामसभा सशक्त करने पर किसी भी राजनेता का ध्यान नहीं है, जो जुटे हैं मात्र मतपेटी भरने पर।

इस परिस्थिति की पोलखोल हो रही है लॉकडाउन के चलते। मध्य प्रदेश के खेती से समृध्द क्षेत्रों के पास रहे पहाड़ी के आदिवासी भर-भर के गुजरात में सुरेन्द्र नगर, जामनगर, अहमदाबाद, बड़ोदा, आणंद, जैसे जिले-जिले में कई तहसीलों में, गाँव-गाँव में टुकडिया बनाकर अटके पड़े है। उन्हें अपने घर छोड़कर आये, मजदूरी बंद हुई और मजदूरी की कमाई ही खाने की वस्तुएँ खरीदने पर खर्च करके भी कई जगह भूखे रहना पड़ा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गुजरात और केंद्र में बैठी सत्ताधारी दल के ही होते हुए, उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री को म.प्र. के गुजरात गये मजदूरों की व्यवस्था करने संबंधी लिखे पत्र की कोई दखल भी नहीं ली गयी है।

यह चित्र बड़वानी तहसील के तथा अलीराजपुर के कुछ ही तहसील और गांवों के आदिवासियों पर गुजरी परिस्थिति से साफ नजर आया है।

गुजरात में लॉकडाउन के बाद कही एकाध गाँव में खाना खिलाया गया, कहीं किसानों ने खिलाया लेकिन पूरे दिन, पूरे मजदूरों की पूरी जरूरत पूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है। अहमदाबाद जिले के धंधुका और धोलेरा तहसील में अटके 12 समूहों में से कई तो खुले में खेत में, धूपताप में अपने बच्चों के साथ रहते हैं। उनके पास की मेहनत से लायी कमाई और मामलतदार से दिया एकाध कुछ किलो अनाज का पॅकेज खत्म हो चुका है और गाँव वालों ने किसी को थोड़ा सा कुछ दिया तो भी बच्चे, बुजुर्ग अधपेट ही है। दुकानों पर माल लेने में भी किसी जगह पुलिस अटकाते हैं और अन्यथा माल की कीमतें भी अधिक होते, मजदूर सूखे भूखे रहना पसंद करते हैं।

वे चिंता से भरे हुए है, वापसी की। वाहन व्यवस्था और खर्चा, दोनों पर नहीं मध्य प्रदेश सरकार का निर्णय, नहि गुजरात का।

भोजनसुरक्षा की, पलायन किये मजदूरों की चर्चा तो माध्यमों में, शासन के वक्तव्यों में, बुध्दिजीवीयों के आलेखों में भी बहुत चल रही है लेकिन प्रत्यक्ष में हस्तक्षेप नहीं के बराबर।

श्रीमती दीपाली रस्तोगी, जो मध्यप्रदेश की नोडल अधिकारी हैं उन्हें इस मामले में, तीन दिन पूर्व से हमने जितने गांवों की मिली, वह ठोस जानकारी भेजी है और जिलाधिकारी महोदय को भी। लेकिन आज तक सुरेन्द्र नगर जिले के मामलतदार ने मात्र एक गाँव बडोल पर जवाब दिया है, जहाँ गांववाले स्वामीनारायण मंदिर ट्रस्ट की मदद लेकर खाना खिला रहे हैं। इसे शिकायतकर्ताओं ने भी नकारा नहीं है लेकिन इस गाँव की तकलीफ अब खत्म हुई है तो भी अन्यत्र के सभी मजदूरों की शिकायत ही बेबुनियाद होने की रिपोर्ट अधिकारी नहीं भेज सकते। इसका जवाब दे रहे हैं मजदूरों की हकीकत बताने वाले संगठनों के हम साथी।

मध्य प्रदेश शासन के उच्च स्तरीय हस्तक्षेप के बिना आने वाले और 10 दिन 3 मई तक ही लॉकडाउन मानकर बच्चों – बहनों के साथ मजदूर आदिवासी समूहों को काटना भी मुश्किल है। कौन लेगा जिम्मेदारी इन श्रमिकों की?

कांग्रेस के कुछ प्रतिनिधि और भाजपा युवा मोर्चा के कुछ साथी कह रहे हैं कि जरूरतों की पूर्ति करेंगे लेकिन उनके पास भी स्थानांतरित मजदूरों की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

हमने हमारी करीबन 45 समूहों के करीबन 800 श्रमिक आदिवासियों की जानकारी तो भेजी है लेकिन सवाल कई गुना अधिक गंभीर है। आंतरराज्य स्थलांतरित श्रमिक कानून, 1979 (Corona infected, lockdown latest update, corona investigation, Madhya Pradesh news,

Inter-State Transferred Workers Act, 1979) का पालन किसी भी राज्य में श्रमायुक्त कार्यालय से तथा श्रम मंत्रालय से नहीं होने से यह स्थिति पैदा हुई है।

स्थलांतर किये मजदूरों के मूल गाँव में रहे बूढ़े माता पिता किसी की अकेली पत्नी और बच्चे भी अधभूखे हैं। कहीं राशन मिला है तो तेल, मिर्च, प्याज नहीं, साग सब्जी नहीं, ऐसी तो कई बिना राशन के लाभ पाये भी हैं। जैसे अमलाली, बिजासन, हो या घोंगसा, धजारा, तुवरखेड़ा, कोटबांधनी, भादल ये वनग्राम हो अकेले बड़वानी तहसील के इन गावों में अभी तक कोविड के दौरान का और कुछ पहले का भी राशन पहुंचना बाकी है।

अप्रैल, मई, जून के लिए मुफ्त में देना जाहिर है 5 किलो चावल प्रति व्यक्ति लेकिन अप्रैल के 3 सप्ताह निकल पड़े, बेरोजगारी में; चावल कई जगह पहुंचा नहीं है – बड़वानी से 10/15 किमी दूर भी।

चल पड़े हैं लेकिन मंजिल बहुत दूर है…….. किसी के मन में नहीं है दर्द?

इससे भिन्न समस्या है मुंबई इंदौर जैसे हाईवे पर चलकर उत्तर प्रदेश के किसी शहर गाँव की लखनऊ जैसी मंजिल तक पहुँचने के इरादे से पैदल चलकर जाने वाले मजदूरों की।

मध्य प्रदेश शासन इस बात से हैरान है कि ये एक राज्य से दूसरे राज्य में कैसे पहुँच जाते हैं, लॉकडाउन में? लेकिन जब वे अपने राज्य पहुँच रहे है तो उनके साथ शासन का रुख क्या होना चाहिये, इस पर कोई निर्णय नहीं दिखाई देता।

म.प्र. में कोई उन्हें खाना खिलाते हैं, पुलिस या गाँववासी तो उसके लिए भी नियमों के बंधन कभी हैरान करते हैं। कही पंचायते गाँव की सुरक्षा के नाम पर नाकाबंदी करती हैं, अपना कर्तव्य नहीं निभाती हैं, जबकि शासकीय अधिकारी उन पर भरोसा व्यक्त करते हैं। लेकिन वे आगे सैकड़ों किमी चलकर कैसे जाएं? जाएं या नहीं जाएं? इन्हें इंसानियत के तहत भी 3 मई तक मध्य प्रदेश में ही, जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ रुकवाने की बात मानना और व्यवस्था करना, यह तैयारी नहीं के बराबर दिखाई देती है।

दरवाजे के हैंडल को छूना मतलब कोरोना’ यहाँ तक भय पैदा करने के बाद भी इन्हें पैदल चलने मजबूर न करते वाहन व्यवस्था क्यों नहीं? अधिक लाभदायक, कोरोना रोकने और मजदूरों की जान और जिन्दगी बचाने का, परिवहन उपलब्धि ही विकल्प होकर भी क्यों नहीं स्वीकार करती सरकार? इसीलिए ना कि श्रमिकों की न कदर, न सम्मान, नहीं श्रम की सही कीमत!

मध्य प्रदेश शासन ने मंत्रिमंडल नियुक्ति ही देरी से करने से स्वास्थ्य या आपदा प्रबंधन पर राजनीति हावी हुई और आंतरराज्य समन्वय में तो और गंभीर मामला है सत्ताधीशों में बेबनाव का जो इस परिस्थिति में तो है ही।

राजकुमार दुबे. किशोर सोलंकी. महेंद्र तोमर. मेधा पाटकर

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सावधान! बिना तैयारी के लॉकडाउन हटा तो उसके नतीजे भयानक होंगे

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careful! If the lockdown is removed without preparation, its results will be terrible.

3 मई के बाद लॉकडाउन हटाने की स्थिति बनती है या नहीं, इस पर केंद्र और राज्य सरकारें चिंतन मंथन कर रही हैं। प्रधानमंत्री मुख्यमंत्रियों से बात करके कोई फैसला करेंगे।

जैसे बिना तैयारी के लॉकडाउन के ऐलान से आम जनता और खास तौर पर मेहनतकश लोगों को पूरे महीने भर भारी मुसीबत उठानी पड़ी, देश भर में करोड़ों लोग बेरोजगार और भुखमरी के शिकंजे में फंस गये, इस अनुभव से हुक्मरान सबक लें तो बेहतर।

बिना तैयारी के लॉकडाउन हटा तो उसके नतीजे भयानक होंगे।

पूरी योजना के साथ चरणबद्ध ढंग से लॉकडाउन से जनता को आज़ाद करना अब केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है।

इसी बीच देश को रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन में बांट दिया गया है।

जाहिर है कि रेड जोन, यानी ज्यादातर बड़े महानगरों और नगरों की जनता और खास तौर पर मुंबई, दिल्ली और गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान हरियाणा, मध्य प्रदेश के रेड जोन में फंसे लाखों दिहाड़ी मजदूर रेड जोन से ग्रीन जोन की तरफ भागेंगे। समर्थ लोग कार लेकर पहाड़ों की ओर दौड़ लगाएंगे।

138 करोड़ जनसँख्या में अभी 5 लाख लोगों की भी जांच की व्यवस्था नहीं हुई हैं।

जिनकी जांच हुई, उनमें 22 हजार लोग संक्रमित पाए गए। बाकी 137 करोड़ से ज्यादा लोगों में कितने संक्रमित होंगे, कोई नहीं कह सकता।

अब तो ऐसे लोग भी मिल रहे हैं, जिनमें कोरोना के कोई लक्षण नहीं दिखे, लेकिन वे संक्रमित हैं।

हम और आप में कौन संक्रमित हैं, कौन नहीं कोई नहीं जानता।

मेरा गांव बसन्तीपुर तराई के इने गिने गांवों में हैं, जहां किसानों के पास कुछ न कुछ जमीन है। फिर भी खस्ताहाल खेती किसानी के चलते इस गांव में भी ज्यादातर लोग मजदूर बन गए हैं। खेतिहर मजदूर और भूमिहीन भी काफी हैं। पढ़े लिखे स्त्री पुरुष सिडकुल की कम्पनियों में काम करते थे। लॉकडाउन के बाद वे सारे लोग घर बैठे हैं।

30 तारीख के बाद कुछ कम्पनियां खुली हैं, लेकिन मेरे गांव से कोई काम पर लौट नहीं सका।

लॉक डाउन की वजह से मैं दिनेशपुर जा नहीं पा रहा महीने भर से। इस दौरान पोती शिवन्ना के साथ रोज़ घर-घर जा रहा हूँ।

लोग बहुत दिक्कत में हैं।

काफी लोग दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में फंसे हैं। बंगाल में रिश्तेदारी में जाकर भी लोग फंसे हैं। पारिवारिक संकट, किसी की मृत्यु की स्थिति में भी लोग घर नहीं लौट सकते।

हमारा गांव दो गांव सभाओं में पड़ता है।

आंदखेड़ा और अमर पुर।

अमरपुर ग्रामसभा का प्रधान हमारा भतीजा संजीत है।

कल शाम जब खेतों में खड़ी गेंहू की फसल मशीन काट रही थी, तो मैं शिवन्ना के साथ संजीत के घर गया।

संजीत सिडकुल में काम करता रहा है और मजदूर यूनियन का नेता भी है

संजीत  एक्सीडेंट में बुरी तरह जख्मी हो जाने की वजह से चलने फिरने में असमर्थ मुकुलजी के साथी हैं। मुकुलजी घर से ही सिडकुल और पूरे इलाके में मजदूरों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं और एक पत्रिका भी मज़दूर आंदोलन पर चला रहे हैं।

संजीत ने कहा कि सिडकुल में ठेका मज़दूरों का न ईएसआई और न पीएफ कटता है। दरअसल वे पे रोल पर ही नहीं हैं और वे ज्यादा हैं संख्या में। दुर्घटना की स्थिति में इनका कोई क्लेम नहीं बनता। हर साल ब्रेक देकर बरसों से वे कम्पनियों में काम पर रखे जाते हैं, और कभी भी निकल दिए जाते हैं।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।
उपन्यास अमेरिका से सावधान
कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती।
सम्पादन- अनसुनी आवाज – मास्टर प्रताप सिंह
चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं-
फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन
मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी
हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन
अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित।
2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

बदले हुए श्रम कानून की वजह से उनकी कही सुनवाई नहीं होती। काम की स्थितियां भी अमानवीय हैं।

संजीत ने बताया कि 30 तारीख के बाद जो थोड़ी कम्पनियां खुली हैं, उन में स्थानीय लोगों को दुबारा काम पर बुलाया नहीं जा रहा।

बाहर के फंसे हुए मजदूरों को काम पर बुलाया गया है। उनके काम की जगह पहुंचने का इंतज़ाम नहीं है।

इस पर उन्हें कहा गया है कि काम पर नहीं पहुंचे तो एब्सेंट लगेगा।

हमारी बातचीत के बीच ही पंजाब के किसी ग्राम सभा के सभापति का फोन आया। वहां अमरपुर गांव की बीस औरतें फंसी हुई हैं।

संजीत ने कहा कि लॉक डाउन में हम उन्हें निकालकर ला नहीं सकते। आप प्रधान हैं तो आप अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए उनके ठहरने खाने का इंतज़ाम भी करें।

दिनेशपुर, शक्तिफार्म और तराई भर के गांवों में हालात बसंतीपुर से बुरे हैं। हजारों लोग बाहर फंसे हैं।

इनमें अनेक गांव, गांव के लोगों ने ही सील कर दिए हैं।

बाहर के लोग उन गांवों में आ जा नहीं सकते।

लॉक डाउन हटने पर बाहर से घर लौटने वाले लोगों का अपने ही गांव में कैसे स्वागत होगा, कहना मुश्किल है।

पलाश विश्वास+

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