मुहावरों का राष्ट्रवाद : ‘इन वाक्यों में बार-बार पाकिस्तान ही क्यों आता है?’ क्योंकि इसी घृणा से हमारी देशभक्ति खाद-पानी प्राप्त करती है

Dr Raju Ranjan Prasad पच्चीस जनवरी उन्नीस सौ अड़सठ को पटना जिले के तिनेरी गांव में जन्म। उन्नीस सौ चौरासी में गांव ही के ‘श्री जगमोहन उच्च विद्यालय, तिनेरी’ से मैट्रिक की परीक्षा (बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना) उत्तीर्ण। बी. ए. (इतिहास ऑनर्स) तक की शिक्षा बी. एन. कॉलेज, पटना (पटना विश्वविद्यालय, पटना) से। एम. ए. इतिहास विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना से (सत्र 89-91) उन्नीस सौ तिरानबे में। ‘प्राचीन भारत में प्रभुत्त्व की खोज: ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में’ (1000 ई. पू. से 200 ई. तक) विषय पर शोधकार्य हेतु सन् 2002-04 के लिए आइ. सी. एच. आर का जूनियर रिसर्च फेलोशिप। मई, 2006 में शोधोपाधि। पांच अंकों तक ‘प्रति औपनिवेशिक लेखन’ की अनियतकालीन पत्रिका ‘लोक दायरा’ का संपादन। सोसायटी फॉर पीजेण्ट स्टडीज, पटना एवं सोसायटी फॉर रीजनल स्टडीज, पटना का कार्यकारिणी सदस्य। सम्प्रति मत-मतांतर, यादें, पुनर्पाठ आदि ब्लॉगों का संचालन एवं नियमित लेखन।

#मुहावरोंकाराष्ट्रवाद खेत आना (युद्ध में शहीद होना) —भारत-पाकिस्तान-युद्ध में हमारे अनेक वीर खेत आये। नाकों दम करना (परेशान करना)—पिछली लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को नाकों दम कर दिया। मुंह की खाना (पहल करके हार जाना) —पाकिस्तान को पिछली लड़ाई में मुंह की खानी पड़ी। लोहे के चने चबाना (बहुत कठिनाई झेलना)—भारतीय सेना के सामने