‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की योजना सादवाद और आपराधिक प्रवृत्ति से पीड़ित दिमाग़ की उपज है!

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अमृतसर में सिखों ने मुसलमानों को और लाहौर में मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया। मालेर कोटला को सिखों ने बचाया। हांसी (हरियाणा) में इंज़माम-उल-हक़ [पाकिस्तान का मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी] के परिवार को एक गोयल परिवार ने बचाया था। ऐसे हजारों किस्से हैं।

The plan to celebrate ‘partition horror memorial day’ is a brainchild of sadism and criminal inclination!

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने से पहले कुछ खास बातों को जरूर जान लेना चाहिए। एक यह कि भारत पांच हजार साल पुरानी सभ्यता है। दूसरा कि यह कोई पहली विभीषिका नहीं है। महाभारत की विभीषिका हुई। हमारी पुरानी कथाओं के मुताबिक 120 करोड़ लोग इसमें मारे गए। द्रोपदी के कपड़े उतारे गए। सीता का अपहरण हुआ। द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा कटवाया। गांधी जी की हत्या की गई। दलितों और अल्पसंखयकों के हज़ारों जनसंहार हुए जिन के मुजरिमों की पहचान और सज़ा का अभी भी इंतज़ार है। आशा है प्रधान-मंत्री मोदी इन विभीषिकाओं की स्मृति के दिवसों की भी जल्द ही घोषणा करेंगे। 

मोदी द्वारा हर 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की घोषणा का जिस हर्षोउल्लास के साथ हिन्दुत्ववादी टोली ने स्वागत किया है, उस से साफ़ पता लगता है कि उनके हाथ उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले मुसलमानों को हड़काने और ज़लील करने का एक नया अस्त्र उनके हृदय-सम्राट ने उनको उपलब्ध करा दिया है। सब मुसलमानों ने मिलकर विभाजन कराया था और हिंसा एक-तरफ़ा थी इस कथानक के झूठ को जानना ज़रूरी है।

इस शर्मनाक सच के दस्तावेज़ी सबूत मौजूद हैं कि सन 1906 में हिंदू महासभा और आर्य समाज ने घोषणा कर दी थी कि हिंदुस्तान सिर्फ़ हिन्दुओं के लिए है, उन को यहाँ रहना है तो हिन्दू बनकर रहना होगा नहीं तो मुसलमानों को अफगानिस्तान भेज दिया जाए।

सन 1924 में लाला लाजपत राय ने लिख दिया था कि मुसलमानों को जहां-जहां वे बहुसंख्यक हैं, एक नहीं, दो नहीं, तीन-चार पाकिस्तान दे दिए जाएं। लेकिन उन से छुटकारा पा लिया जाए।

सन् 1937 में सावरकर ने अहमदाबाद में जब पहली बार हिंदू महासभा की कमान संभाली, तो कह दिया कि हिंदू मुसलमान दोनों प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों साथ नहीं रह सकते।

“फ़िलहाल हिंदुस्तान में दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र पास-पास रह रहे हैं। कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह मानकर गंभीर ग़लती कर बैठते हैं कि हिंदुस्तान पहले से ही एक सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप में ढल गया है या सिर्फ हमारी इच्छा होने से ही इस रूप में ढल जायेगा। इस प्रकार के हमारे नेक नीयत वाले पर लापरवाह दोस्त मात्र सपनों को सच्चाईयों में बदलना चाहते हैं। दृढ़ सच्चाई यह है कि तथाकथित सांप्रदायिक सवाल और कुछ नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हिन्दू और मुसलमान के बीच सांस्कृति, धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतिद्वंदिता के नतीजे में हम तक पहुंचे हैं। आज यह क़तई नहीं माना जा सकता कि हिंदुस्तान एक एकता में पिरोया हुआ और मिलाजुला राष्ट्र है। बल्कि इसके विपरीत हिंदुस्तान में मुख्यतौर पर दो राष्ट्र हैं-हिन्दू और मुसलमान।”

सच्ची बात यह है कि जिन्ना ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को 1940 में अपनाया।

मशहूर समाजवादी चिंतक और आज़ादी की जंग के एक स्तंभ डॉ. राम मनोहर लोहिया ने साफ लिखा कि हिंदुत्व इसके लिए जिम्मेदार था क्योंकि उसने इस तरह के हालात पैदा कर दिए कि हिंदू मुसलमानों के बीच कोई भी समझौता नहीं हो सके। डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार –

“हिंदुत्ववादी संगठन मुस्लिम विरोधी प्रचार के चलते मुस्लिम लीग के लिए अच्छा-खासा आधार तैयार चुके थे, जिसके आसरे लीग मुस्लिमों के बीच संरक्षक के तौर पर लोकप्रियता हासिल कर सके। इससे ब्रिटेन एवं मुस्लिम लीग को देश का विभाजन करने में मदद मिली…उन्होंने एक ही देश में हिंदू व मुस्लिमों को आपस में करीब लाने के लिए कुछ भी नहीं किया। इसके उलट, उन्होंने इनमें परस्पर एक दूसरे के बीच मनमुटाव पैदा करने की हर संभव कोशिश की। इस तरह की हरकतें ही देश के विभाजन की जड़ों में थीं।”

द्विराष्ट्र का सिद्धांत था कि हिंदू मुसलमान साथ नहीं रह सकते। जिन्ना ने तो यह 1940 में कहा। आर्य समाज, लाला लाजपत राय, भाई परमानंद और लाला हरदयाल यह कब से कह रहे थे कि मुसलमानों की शुद्धि करो, नहीं तो इनको अफगानिस्तान की तरफ भेज दो।

सावरकर ने सन् 1923 में अपनी किताब ‘हिंदुत्व’ में यह सब लिखा। 1939 में गोलवरकर ने ‘वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड’ में कहा कि हिंदू मुसलमान साथ नहीं रह सकते।

इतना ही नहीं, 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। 14 अगस्त को आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने दो संपादकीय लिखे। इनमें लिखा कि तिरंगा झंडा (जो सारे हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई की एकता का झंडा है) को हम नहीं मानते। यह तीनों रंग मनहूस हैं। फिर लिखा कि इस आजादी को हम नहीं मानते क्योंकि इसमें यह माना जा रहा है कि हिंदुओं के अलावा बाकी दूसरे धर्मों के लोग भी भारत राष्ट्र में शामिल होंगे।

इस सबके बीच बहुत महत्वपूर्ण बात है कि 1947 में हिंदू मुसलमान और सिखों ने एक-दूसरे को बचाने की जो कोशिशें कीं, वह अद्भुत हैं। अगर इंसानी समाज में विश्वास करते हैं, तो उनको महिमामंडित करना चाहिए। जैसे, महशहूर अभिनेता सुनील दत्त के पूरे परिवार की एक मुसलमान मां ने (जिसके छह बेटे सेना में थे) कैसे हिफाजत की। उस मां ने अपने बेटों से कहा कि अगर तुमने मेरा दूध पिया है, तो तुम लोगों को हिंदुओं को बचाना होगा और उन्होंने बचाया।

  • अमृतसर में सिखों ने मुसलमानों को और लाहौर में मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया।
  • मलेर कोटला को सिखों ने बचाया।
  • हांसी (हरियाणा) में इंज़माम-उल-हक़ [पाकिस्तान का मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी] के परिवार को एक गोयल परिवार ने बचाया था।

ऐसे हजारों किस्से हैं। 

यह जानना कम दिलचस्प नहीं होगा कि आखिर अब अचानक इसकी याद क्यों आई। इसलिए कि हिंदू मुसलमान करने के इनके सारे फार्मूले नाकाम हो चुके हैं। बंगाल चुनाव ने क्या तय किया। बंगाल चुनाव में सन 1947 के बाद सबसे ज्यादा हिंदू मुसलमान झगड़ा कराने का प्रयास किया गया। ममता बनर्जी को बेगम तक कहा गया। इसके बावजूद यह चला नहीं। लव जिहाद नहीं चला। मुसलमानों की आबादी बढ़ती जा रही है, नहीं चला। तो अब यह नया शिगूफा। यह भी नहीं चलेगा क्योंकि लोग बहुत झेल चुके हैं। 

यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जिन्ना की तारीफ तो आडवाणी ने वहां जाकर की थी जहां पाकिस्तान का प्रस्ताव पास हुआ था। पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह जिन्ना को सेक्युलर बता चुके हैं।

संघ टोली के प्यारे और पूजनीय वीर” सावरकर ने सात बार अंग्रेजों से माफी मांगी। आजादी की लड़ाई में इनका कोई आदमी वंदे मातरम गाते हुए या गौहत्या पर पाबंदी लगवाने के लिए एक मिनट के लिए भी कभी जेल नहीं गया।

सन् 1932 से लेकर 1939 तक दीनदयाल उपाध्याय, एल के आडवाणी, नानाजी देशमुख और गोलवरकर आरएसएस में आ गए। 14 अगस्त, 1947 को कहा कि राष्ट्रीय झंडा मनहूस झंडा है। हिंदू इसको कभी नहीं मानेंगे।

आजादी के बाद जब देश लड़खड़ा रहा था, अर्थव्यवस्था खराब थी और दंगे हो रहे थे, तब इन्होंने गांधी जी की हत्या की और उसके बाद गाय के नाम पर इन्होंने पार्लियामेंट को घेरा। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के घर को आग लगाई। यह देश को अस्थिर करने में लगे थे। यानी यह वह सब कर रहे थे जो पाकिस्तान चाह रहा था। यह इनका राष्ट्रविरोधी चरित्र रहा है। अभी भी वही कर रहे हैं।

पाकिस्तान का इंटरेस्ट यह है कि यहां के हिंदू मुसलमान लड़ें। यह पाकिस्तान का रणनीतिक लक्ष्य है और इसे पूरा कर रहा है आरएसएस।

सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में जब कांग्रेस पार्टी प्रतिबंधित थी, उस वक्त हिंदू महासभा और आरएसएस दोनों साथ थे। इन्होंने मिलकर तीन प्रांतों में मिलीजुली सरकारें चलाईं। बंगाल में डिप्टी प्राइम मिनिस्टर (उस समय डिप्टी चीफ मिनिस्टर को डिप्टी प्रधानमंत्री कहते थे) श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उनके पास गृह मंत्रालय था जिसका जिम्मा क्विट इंडिया मूवमेंट को दबाने का था। उन्होंने वहां के लेफ्टिनेंट गवर्नर को जो खत लिखे उसमें कहा गया था कि कैसे इस आंदोलन को दबाया जाए। वह किसी को भी शर्म दिलाने वाली चिट्ठियां हैं। इन्होंने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार चलाई।

जब नेता जी सुभाषचंद्र बोस सेना बनाकर बाहर से देश को आजाद करने की कोशिश कर रहे थे, तब उनकी सेना को हराने के लिए आरएसएस की सहयोगी हिंदू महासभा ने एक लाख हिंदू अंग्रेज सेना में भर्ती कराए।

यह सब कुछ उनके दस्तावेजों में है।

यह भी देखने की बात है कि हिंदुओं से जुड़े संगठनों ने किन लोगों को मरवाया है। नरेंद्र दाभोलकर, एमएम कलबुर्गी, गोविंद पनसारे और गौरी लंकेश आदि को मरवाया। उसके बाद भीमा कोरेगांव मामले में जिन लोगों को जेलों में बंद कर रखा है, सब हिंदू और इसाई हैं। लोगों की गलतफहमी है कि ये मुसलमानों के खिलाफ और हिंदुओं के पक्ष में हैं। ये गांधी जैसे सच्चे हिंदू को बर्दाश्त नहीं कर सके। सत्ता में आने के सात साल बाद इसलिए याद आ रहा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव आ रहा है, तो कुछ नया ढूढ़ना है। क्योंकि इस देश की 80% आबादी जो हिन्दू है उस की भुखमरी, ग़रीबी, बेरोज़गारी, बीमारी के लिए कुछ भी नहीं किया, सब को भिखारी बना दिया। लोग इनकी जुमलेबाजी से वाकिफ हैं। इनका जो 15 से 20 परसेंट का वोटर है, उसमें भी अब काफी कमी आई है।  

कोई भी देश या समाज तब चलता है जब उसमें एकता होती है और एक-दूसरे के साथ मिलना-जुलना होता है। ये लगातार साजिशें कर रहे हैं।

अगर देश में मुसलमान नहीं होते, तो यह मुसलमान पैदा कर लेते।

जिन्ना के साथ सरकारें चलाईं। आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों ने कहा कि जिन्ना मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं और हिंदुओं के प्रतिनिधि हम हैं। बाबा साहब ने कहा कि जिस दिन हिंदुत्व का राज आ जाएगा, उस दिन इस देश की मौत हो जाएगी। किसी भी कीमत पर देश को हिंदू राष्ट्र बनने से रोका जाना चाहिए।

शम्सुल इस्लाम 

05-09-2021

syama prasad mukherjee श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने में अंग्रेजों की मदद की

भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेज़ों की मुखबिरी करते थे संघी- शाहनवाज़ आलम

भारत छोड़ो आंदोलन,शाहनवाज़ आलम,अंग्रेज़ों की मुखबिरी

सावरकर ने अंग्रेज़ों के लिए कैंप लगाए, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ो आंदोलन कुचलने के लिए पत्र लिख कर सुझाव दिये

स्पीक अप माइनोरिटी कैंपेन – 9 में शामिल हुए डेढ़ हज़ार लोग

Speak Up Minority Campaign –9 : Fifteen Hundred people participated in

लखनऊ 8 अगस्त 2021। अल्पसंख्यक कांग्रेस ने आज स्पीक अप माइनोरिटी कैंपेन के 9 वें संस्करण में भारत छोड़ो आंदोलन में संघ परिवार द्वारा अंग्रेज़ों का साथ दिए जाने पर लोगों से संवाद किया।

इस दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आरएसएस पर अंग्रेज़ों की मुखबिरी और जासूसी करने के ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ बात रखी।

अल्पसंख्यक कांग्रेस प्रदेश चेयरमैन शाहनवाज़ आलम ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन की 79 वीं सालगिरह की पूर्व संध्या पर अल्पसंख्यक कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता भारत छोड़ो आंदोलन के ग़द्दार कौन विषय पर फेस बुक लाइव हुए। इसमें लोगों को बताया गया कि कैसे गांधी जी, नेहरू जी, मौलाना आज़ाद के नेतृत्व में लाखों लोगों ने अंग्रेज़ों भारत छोड़ो के नारे के साथ देश को आज़ाद कराने के लिए संघर्ष किया। हज़ारों लोगों ने शहादत दी और लाखों लोग जेल गए। लेकिन इस पूरे आंदोलन में संघ परिवार और हिंदू महासभा ने अंग्रेज़ों की मुखबीरी की। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुस्लिम लीग के साथ चल रही बंगाल सरकार के उपमुख्यमंत्री के बतौर अंग्रेज़ों को पत्र लिख कर इस आंदोलन को दबाने का सुझाव देने का देशद्रोही काम किया। वहीं सावरकर ने अंग्रेज़ों की तरफ से द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय युवाओं को सेना में भर्ती होने का आह्वान कर देश की भावनाओं के विरुद्ध काम किया। सावरकर ने देशद्रोही काम करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेज़ों का साथ दिया। 

वक्ताओं ने लोगों को यह भी बताया कि कैसे 27 अगस्त 1942 को बटेश्वर में हुए आंदोलनकारियों की बैठक की मुखबीरी अटल बिहारी वाजपेई ने की और 1 सितम्बर 1942 को अपनी मुखबिरी की रिपोर्ट दर्ज कराई। जिसके कारण कांग्रेसी आंदोलनकारी लीलाधर वाजपेयी को जेल जाना पड़ा।

वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह 1942 में महात्मा गांधी देश की आवाज़ थे वैसे ही आज राहुल गांधी जी देश की आवाज़ हैं। जिनके साथ खड़ा होना हर देशभक्त नागरिक की ऐतिहासिक और नैतिक ज़िम्मेदारी है।

शाहनवाज़ आलम ने बताया कि आज आह्वान किया गया कि भारत छोड़ो आंदोलन की बरसी पर 9 और 10 अगस्त को उत्तर प्रदेश कांग्रेस द्वारा होने वाले भाजपा गद्दी छोड़ो अभियान में ज़्यादा से ज़्यादा लोग शामिल हों।

हर रविवार चलने वाले इस कार्यक्रम में आज क़रीब डेढ़ हज़ार लोग लाइव हुए।

आज भी प्रासंगिक है सन् 1857 की क्रांति!

gangu mehtar

The revolution of 1857 is relevant even today!

ब्रिटिश शासन काल में भारत की जैसी दुर्दशा बना दी गई थी, कमोवेश संघी नेतृत्व में आज भारत को बड़ी चतुराई से उसी राह पर धकेला जा रहा है। इसे एक ओर 1943-44 में संघी श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में खाद्यान्न का कृत्रिम अभाव पैदा कर उसे विदेश भेजने और उसके कारण वहां 30 लाख लोगों को भूख से तड़पते हुए जान गँवाने पर मजबूर कर देने की ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में व्याख्यायित किया जा सकता है, तो दूसरी तरफ सरकारी आतंक के जरिए लोगों की आवाज दबाने की वर्तमान कुत्सित मानसिकता के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। 

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी जहांगीर के शासनकाल में ईस्वी सन् 1608 में व्यापार करने आई लेकिन तब इजाजत नहीं मिलने पर दोबारा 1615 में ब्रिटिश सांसद और राजदूत सर थॉमस रो को भेजा गया। तीन साल तक लगातार अनुनय-विनय के बाद थॉमस रो को जहाँगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को कुछ प्रतिबंधों के साथ व्यापार करने की अनुमति दी गई।

करीब 242 वर्षों तक भारत में व्यापार करते हुए यहां से अकूत दौलत इंग्लैंड भेजते रहने के बाद इस देश की बहुमूल्य संपदा पर समग्रता में अधिकार जमाने की लंबी रणनीति के तहत 1787 में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों ने छल-कपट के सहारे नवाब सिराजुद्दौला को पराजित करने में सफलता प्राप्त कर ली। फिर तो उन्होंने अपनी उसी कुटिलता से भारत में झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाते हुए एक-एक कर देसी रियासतों को हड़पने का खेल शुरू किया। उसके बाद जिस तरह अंग्रेजों ने एक-एक कर सभी देसी रियासतों पर कब्जा कर लिया, वह इतिहास में दर्ज है।

आधुनिक समय में जबकि हथियारों से लड़ने के परंपरागत तरीके बदल गये हैं और उनकी जगह लड़ाई मानसिक दबाव बनाने वाले साधनों से लड़ी जा रही है। ऐसे में युद्ध की ठीक उसी शैली में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दिखावा कर आज देश के सभी प्रदेशों की सत्ता हड़पी जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने अवसर आने पर सैन्य बलों का भी इस्तेमाल किया और इस दौर में विपक्ष पर ईडी, सीबीआइ, इनकम टैक्स, पुलिस, प्रशासन और मीडिया के जरिए हमले किये जा रहे हैं।

जनता की दयनीय स्थिति तब भी प्रकारांतर से ऐसी ही थी। विरोध और असहमति पर तब भी दंडित किया गया तो आज भी अंग्रेजों की उसी परंपरा का अनुकरण किया जा रहा है। आज भी 1967 में पारित गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (Unlawful Activities (Prevention) Act—UAPA) को 2019 में कठोर दंडात्मक संशोधन करके लोगों को अनंत काल के लिए जेलों में बंद कर प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें एकदम झूठे और मनमाने मामलों में मुकदमेबाजी में उलझा देना सत्ताधारियों का बायें हाथ का खेल बन गया है।

लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित सरकार असहमति, आलोचना और विरोध के प्रति इस हद तक असहनशील हो गई है कि एक ट्वीट या एक छोटे से कार्टून से ही छटपटाने लगती है और उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर देती है। इसका ताजा उदाहरण देश के जाने-माने कार्टूनिस्ट मंजुल का मामला हमारे सामने है। ट्विटर पर उनके एक कार्टून के लिए सरकार ने ट्विटर को नोटिस जारी कर उनका अकाउंट प्रतिबंधित करने को कहा है।

यह देश को उस संघ का ग़ुलाम बनाने का एक और कदम है जो आग लगाकर दूर खड़ा तमाशा देखता है। वह खुद को गैर-राजनीतिक संगठन का चाहे जितना ढोल पीट ले, लेकिन यह कौन नहीं जानता कि अपने आनुषांगिक संगठन—भारतीय जनता पार्टी की रीति-नितियों के निर्धारण से लेकर उसके लिए वैचारिक ज़मीन तैयार करने, चुनावी रणनीति तय करने, प्रत्याशियों का चयन, टिकट वितरण, चुनाव प्रचार, सरकार के गठन, मंत्रियों के विभागों का बंटवारा और फिर सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप तक सब कुछ संघ द्वारा संचालित किया जाता है।

संघ के पसंदीदा स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की जैसी ऐतिहासिक दुर्दशा योजनाबद्ध तरीके से बना दी गई है और यह प्रक्रिया निरंतर जारी है, वह अंग्रेजी दासता के दौर से कम नहीं है। इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह है कि लोगों के भीतर जहां एक तरफ निराशा फैल गई है, वहीं दूसरी ओर सरकारी आतंक बढ़ रहा है। लोगों को सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त करने से रोका जा रहा है।

तेरा कुत्ता, कुत्ता मेरा वाला टॉमी—

मीडिया के माध्यम से झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को हाशिए पर धकेलने के प्रयास जारी हैं। हालांकि वे भी दूध के धुले नहीं हैं, फिर भी जिस तरह उनकी छवि खलनायक और देश के गद्दारों जैसी बनाई जा रही है, उसे देखते हुए क्या यह ठीक है कि तमाम दलों के महाभ्रष्ट, कुख्यात दल बदलू और यहां तक कि दंगे व वेश्यावृत्ति के आपराधिक मामलों के आरोपियों को बड़ी शान से भाजपा में शामिल कराया जाता रहा है?

संघी नेतृत्व नैतिकता की सारी सीमाएं पार कर किस स्तर तक गिर चुका है, उसकी एक झलक इसके मुखिया द्वारा देश में कोरोना के कुप्रबंधन और देशभर में मृतकों के अंतिम संस्कार तक के लिए लगी लंबी-लंबी कतारें, गंगा में तैरते शव, जेसीबी मशीनों से खाइयां खोदकर थोक में शवों का दफ़न, लोगों की मर्माहत करने वाली चीख-पुकार के बीच दिये गये उस बयान से मिलती है जिसमें कहा गया था कि ये मरे नहीं बल्कि इन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया है। यह जले पर नमक छिड़कने जैसा है। क्या मोहन भागवत की मानवीय संवेदना मर चुकी है या उनके पास संवेदना व्यक्त करने के लिए इससे बेहतर शब्द नहीं थे या फिर वे सत्ता के अहंकार में इस स्तर तक चूर हैं कि उन्हें मानव गरिमा का ध्यान ही नहीं रह गया है?

बहरहाल, इन परिस्थितियों में एक सवाल उभरता है कि क्या इस अंधेरे से निकलने के लिए कोई सामाजिक आंदोलन उभर सकता है? यहां बात समाज का मार्गदर्शन करने वाले अच्छे-भले पढ़े-लिखे और सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक लोगों की मानसिक स्थिति के संदर्भ में हो रही है। जो आने वाली हवा की गंध मीलों दूर बैठे महसूस कर लेते हैं। क्या देश में 1857 जैसी जनक्रांति आज भी संभव है?

यहां थोड़ा रुककर सोचिए कि यदि 1857 की वह क्रान्ति न हुई होती, तो देश की कैसी सूरत होती? सन् 1757 से लेकर 1857 तक के कंपनी के राज, उसकी करतूतों और तज्जनित अपार दुखों की व्यथा को यहां दोहराना असंभव और निरर्थक है लेकिन लॉर्ड डलहौजी के ही भारतीय रियासतों को हड़पने और उस जनक्रांति के लिए इतिहास लेखक लुडलो की यह राय विचारणीय है—

“यदि इन हालात में उन लोगों के पक्ष में, जिनकी रियासतें छीन ली गई थीं और छीनने वालों के विरुद्ध भारतवासियों के भाव न भड़क उठते तो भारतवासी मनुष्यत्व से गिरे हुए समझे जाते।”

(Thoughts on the policy of the crown, pp. 35-36)

आज जिस तरह देश में योजनाबद्ध तरीके से लोगों की नौकरियां, छोटे-बड़े सभी तरह के व्यवसाय, बैंकों में जमा धन, संवैधानिक अधिकार, मानवाधिकार आदि सबकुछ जबरन छीन लिया जा रहा है, असहमति, आलोचना और विरोध को देशद्रोह बताकर तरह-तरह के कानूनों का सहारा लेकर प्रताड़ित किया जा रहा है, ऐसे में देशवासियों के हृदय में जोश उत्पन्न होने की संभावना बनी हुई है क्योंकि मनुष्य का विचार, चाहे सत्य हो या असत्य, किंतु जिस चीज को भी मनुष्य अपना समझता है, उसको आघात से बचाने के लिए वह अपना सर्वस्व तक न्योछावर करने को तैयार हो जाता है।

जैसे 1857 के दौर में भारतवासियों के हृदय में मनुष्यत्व बाकी था, तो वह क्रांति स्वाभाविक और अनिवार्य थी। उस क्रांति के आदशों या उस दौर के क्रांतिकारियों के बारे में हमारे विचार चाहे कुछ भी क्यों न हों, किंतु इसमें संदेह नहीं कि यदि 1857 की क्रांति न हुई होती, तो उसका यही अर्थ होता कि भारतवासियों में से स्वाभिमान, कर्तव्यपरायणता, संघर्षशीलता और जीवन-शक्ति का अंत हो चुका।

अंग्रेज शासकों के हौसले फिर हजारों गुना बढ़ गए होते और भारतवासियों के जीवन में आशा की किरण तक कहीं दूर-दूर दिखाई न देती। सन् 1857 के क्रांतिकारियों का अमूल्य बलिदान किसी भी नजरिए से जरा-सा भी व्यर्थ नहीं गया। उसी जनक्रांति की कोख से 1860 का सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट निकला जो आज भी बदस्तूर जारी है। सरकारी कामकाज में अनेक बदलाव करने पड़े। निस्संदेह कुलीन वर्ग का ही सही लेकिन एक डिबेटिंग क्लब के तौर पर कांग्रेस का जन्म एक अंग्रेज़ के माध्यम से हुआ। वहीं से स्वाधीन भारत के सूर्योदय का उजास भारतीय आकाश में प्रस्फुटित हुआ।

उस अमर क्रांति के अग्रदूतों के आत्मबलिदान ने एक तरफ तो अंग्रेज शासकों की आंखें खोल दीं तो दूसरी ओर उन्होंने कोटि-कोटि भारतीयों के राष्ट्रीय जीवन में आशा और आत्मविश्वास की झलक पैदा कर दी। जो कभी फीकी नहीं पड़ी और अंततोगत्वा देश शताब्दियों के अंधकार से बाहर निकल आया। क्या उन हुतात्माओं का शौर्य और पराक्रम कभी भी अप्रासंगिक हो सकता है? नहीं, कदापि नहीं ! जब भी कालक्रम से ऐसी दुरूह परिस्थितियां सामने होंगी, तब उन बलिदानों की गाथाएं प्रताड़ित, शोषित और संघर्षशील लोगों के भीतर आत्मोत्सर्ग की ज्वाला धधकाती रहेंगी।

श्याम सिंह रावत

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

अगस्त क्रांति के गुनहगार : हिंदुत्व टोली, एक गद्दारी – भरी दास्तान

syama prasad mukherjee in hindi

प्रो. शम्सुल इस्लाम का यह आलेख (Article by professor shamsul islam) अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन 1942 और हिंदुत्व टोली : एक गद्दारी भरी दास्तान मूलतः हस्तक्षेप पर 09 अगस्त 2018 को प्रकाशित हुआ था। हस्तक्षेप को पाठकों के लिए आज दिनांक 23-06-2020 को मूल लेख का संपादित रूप पुनर्प्रकाशन

इस 9 अगस्त 2018 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (Indian freedom struggle) के एक अहम मील के पत्थर, ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Historical Quit India Movement) को 76 साल पूरे हो जायेंगे। 7 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने बम्बई में अपनी बैठक में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया जिसमें अंग्रेज शासकों से तुरंत भारत छोड़ने की मांग की गयी थी। कांग्रेस का यह मानना था कि अंग्रेज सरकार को भारत की जनता को विश्वास में लिए बिना किसी भी जंग में भारत को झोंकने का नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है। अंग्रेजों से भारत तुरंत छोड़ने का यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा एक ऐसे नाजुक समय में लाया गया था जब दूसरे विश्वयुद्ध के चलते जापानी सेनाएं भारत के पूर्वी तट तक पहुंच चुकी थी और कांग्रेस ने अंग्रेज शासकों द्वारा सुझाई ‘क्रिप्स योजना’ को खारिज कर दिया था।

अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के साथ-साथ कांग्रेस ने गांधी जी को इस आंदोलन का सर्वेसर्वा नियुक्त किया और देश के आम लोगों से आह्वान किया कि वे हिंदू-मुसलमान का भेद त्याग कर सिर्फ हिंदुस्तानी के तौर पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद (English imperialism) से लड़ने के लिए एक हो जाएं। अंग्रेज शासन से लोहा लेने के लिए स्वयं गांधीजी ने ‘करो या मरो’ ब्रह्म वाक्य सुझाया और सरकार एवं सत्ता से पूर्ण असहयोग करने का आह्वान किया।

अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनके दौरान देश-भक्त हिन्दुस्तानियों की क़ुर्बानियां | The sacrifices of patriotic Indians during the British Quit India Movement

भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में क्रांति की एक लहर दौड़ गयी। अगले कुछ महीनों में देश के लगभग हर भाग में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आम लोगों ने जिस तरह लोहा लिया उससे 1857 के भारतीय जनता के पहले मुक्ति संग्राम की यादें ताजा हो गईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने इस सच्चाई को एक बार फिर रेखांकित किया कि भारत की आम जनता किसी भी कुर्बानी से पीछे नहीं हटती है। अंग्रेज शासकों ने दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 9 अगस्त की सुबह से ही पूरा देश एक फौजी छावनी में बदल दिया गया। गांधीजी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को तो गिरफ्तार किया ही गया दूरदराज के इलाकों में भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भयानक यातनाएं दी गईं।

सरकारी दमन और हिंसा का ऐसा तांडव देश के लोगों ने झेला जिसके उदाहरण कम ही मिलते हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस और सेना द्वारा सात सौ से भी ज्यादा जगह गोलाबारी की गई जिसमें ग्यारह सौ से भी ज्यादा लोग शहीद हो गए। पुलिस और सेना ने आतंक मचाने के लिए बलात्कार और कोड़े लगाने का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया।

भारत में किसी भी सरकार द्वारा इन कथकंडों का इस तरह का संयोजित प्रयोग 1857 के बाद शायद पहली बार ही किया गया था।

Why Quit India Movement is called ‘August Revolution’

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को ‘अगस्त क्रांति’ भी कहा जाता है। अंग्रेज सरकार के भयानक बर्बर और अमानवीय दमन के बावजूद देश के आम हिंदू मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों ने हौसला नहीं खोया और सरकार को मुंहतोड़ जवाब दिया। यह आंदोलन ‘अगस्त क्रांति’ क्यों कहलाता है इसका अंदाजा उन सरकारी आंकड़ों को जानकर लगाया जा सकता है जो जनता की इस आंदोलन में कार्यवाहियों का ब्योरा देते हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 208 पुलिस थानों, 1275 सरकारी दफ्तरों, 382 रेलवे स्टेशनों और 945 डाकघरों को जनता द्वारा नष्ट कर दिया गया। जनता द्वारा हिंसा बेकाबू होने के पीछे मुख्य कारण यह था कि पूरे देश में कांग्रेसी नेतृत्व को जेलों में डाल दिया गया था और कांग्रेस संगठन को हर स्तर पर गैर कानूनी घोषित कर दिया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व के अभाव में अराजकता का होना बहुत गैर स्वाभाविक नहीं था। यह सच है कि नेतृत्व का एक बहुत छोटा हिस्सा गुप्त रूप से काम कर रहा था परंतु आमतौर पर इस आंदोलन का स्वरूप स्वतः स्फूर्त बना रहा।

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दमनकारी अंग्रेज सरकार का इस आंदोलन के दरम्यान जिन तत्वों और संगठनों ने प्यादों के तौर पर काम किया वे हिंदू और इस्लामी राष्ट्र के झंडे उठाए हुए थे।

ये सच है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रहने का निर्णय लिया था, इसके बारे में सबको जानकारी है। लेकिन आज के देशभक्तों के नेताओं ने किस तरह से न केवल इस आंदोलन से अलग रहने का फैसला किया था बल्कि इसको दबाने में गोरी सरकार की सीधी सहायता की थी जिस बारे में बहुत कम जानकारी है।

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्नाह (Muslim League leader Mohammad Ali Jinnah) ने कांग्रेसी घोषणा की प्रतिक्रिया में अंग्रेज सरकार को आश्वासन देते हुए कहा,

“कांग्रेस की असहयोग की धमकी दरअसल श्री गांधी और उनकी हिंदू कांग्रेस सरकार अंग्रेज सरकार को ब्लैकमेल करने की है। सरकार को इन गीदड़भभकियों में नहीं आना चाहिए।”

मुस्लिम लीग और उनके नेता अंग्रेजी सरकार के बर्बर दमन पर न केवल पूर्णरूप से खामोश रहे बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज सरकार का सहयोग करते रहे।

मुस्लिम लीग इससे कुछ भिन्न करे इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी क्योंकि वह सरकार और कांग्रेस के बीच इस भिड़ंत के चलते अपना उल्लू सीध करना चाहती थी। उसे उम्मीद थी कि उसकी सेवाओं के चलते अंग्रेज शासक उसे पाकिस्तान का तोहफा जरूर दिला देंगे।

RSS’s role in Quit India Movement of 1942

भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने खुले-आम दमनकारी अंग्रेज़ शासकों की मदद की घोषणा की 

लेकिन सबसे शर्मनाक भूमिका हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रही जो भारत माता और हिंदू राष्ट्रवाद का बखान करते नहीं थकते थे। भारत छोड़ो आंदोलन पर अंग्रेजी शासकों के दमन का कहर बरपा था और देशभक्त लोग सरकारी संस्थाओं को छोड़कर बाहर आ रहे थे; इनमें बड़ी संख्या उन नौजवान छात्र-छात्राओं की थी जो कांग्रेस के आह्वान पर सरकारी शिक्षा संस्थानों को त्याग कर यानी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बाहर आ गये थे। लेकिन यह हिंदू महासभा ही थी जिसने अंग्रेज सरकार के साथ खुले सहयोग की घोषणा की।

हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा वीर सावरकर ने 1942 में कानपुर में अपनी इस नीति का खुलासा करते हुए कहा,

सरकारी प्रतिबंध के तहत जैसे ही कांग्रेस एक खुले संगठन के तौर पर राजनीतिक मैदान से हटा दी गयी है तो अब राष्ट्रीय कार्यवाहियों के संचालन के लिए केवल हिंदू महासभा ही मैदान में रह गयी है… हिंदू महासभा के मतानुसार व्यावहारिक राजनीति का मुख्य सिद्धांत अंग्रेज सरकार के साथ संवेदनपूर्ण सहयोग की नीति है। जिसके अंतर्गत बिना किसी शर्त के अंग्रेजों के साथ सहयोग जिसमें हथियार बंद प्रतिरोध भी शामिल है।”

During the Quit India Movement, the Hindu Mahasabha and the Muslim League ran governments together.

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर सरकारें चलाईं

कांग्रेस का भारत छोड़ो आंदोलन दरअसल सरकार और मुस्लिम लीग के बीच देश के बंटवारे के लिए चल रही बातचीत को भी चेतावनी देना था। इस उद्देश्य से कांग्रेस ने सरकार और मुस्लिम लीग के साथ किसी भी तरह के सहयोग का बहिष्कार किया हुआ था। लेकिन इसी समय हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सरकारें चलाने का निर्णय लिया। ‘वीर‘ सावरकर जो अंग्रेज सरकार की खिदमत में 5 माफी-नामे लिखने के बाद दी गयी सजा का केवल एक तिहाई हिस्सा भोगने के बाद हिन्दू महासभा के सर्वोच्च नेता थे, ने इस शर्मनाक रिश्ते के बारे में सफाई देते हुए 1942 में कहा,

व्यावहारिक राजनीति में भी हिंदू महासभा जानती है कि बुद्धिसम्मत समझौतों के जरिए आगे बढ़ना चाहिए। यहां सिंध हिंदू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली जुली सरकार चलाने की जिम्मेदारी ली। बंगाल का उदाहरण भी सबको पता है। उद्दंड लीगी जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद खुश नहीं रख सकी, हिंदू महासभा के साथ संपर्क में आने के बाद काफी तर्कसंगत समझौतों और सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार हो गये। और वहां की मिली-जुली सरकार मिस्टर फजलुल हक को प्रधानमंत्रित्व और महासभा के काबिल व मान्य नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदाय के फायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।”

Prof. Shamsul Islam on Gandhiji's 72nd Martyrdom Day यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि बंगाल और सिंध के अलावा NWFP में भी हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की गांठ-बंधन सरकार 1942 में सत्तासीन हुई।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार में गृह और उप-मुख्य मंत्री रहते हुए अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलनको दबाने के लिए गोरेआक़ाओं को उपाए सुझाए

हिन्दू महासभा के नेता नंबर दो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो हद ही करदी।  आरएसएस के प्यारे इस महान हिन्दू राष्ट्रवादी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्रीमंडल में गृह मंत्री और उप-मुख्यमंत्री  हुए अनेक पत्रों में बंगाल के ज़ालिम अँगरेज़ गवर्नर को दमन के वे तरीक़े सुझाये जिन से बंगाल में भारत छोड़ो आंदोलन को पूरे तौर पर दबाया जा सकता था। मुखर्जी ने अँगरेज़ शासकों को भरोसा दिलाया कि  कांग्रेस अँगरेज़ शासन को देश के लिया अभशाप मानती है लेकिंग उनकी मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिलीजुली सरकार इसे देश के लिए वरदान मानती है।

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति जानना हो तो इसके दार्शनिक एम.एस. गोलवलकर के इस शर्मनाक वक्तव्य को पढ़ना काफी होगा –

“1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था। इस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ न करने का संकल्प लिया।”

इस तरह स्वयं गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी भी कहा जाता है, से हमें यह तो पता चल जाता है कि संघ ने आंदोलन के पक्ष में परोक्ष रूप से किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं की। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी भी प्रकाशन या दस्तावेज या स्वयं गुरुजी के किसी दस्तावेज से आज तक यह पता नहीं लग पाया है कि संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन में किस तरह की हिस्सेदारी की थी।

गुरुजी का यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रोजमर्रा का काम ज्यों का त्यों चलता रहा, बहुत अर्थपूर्ण है।

यह रोजमर्रा का काम क्या था इसे समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। यह काम था मुस्लिम लीग के कंधे से कंधा मिलाकर हिंदू और मुसलमान के बीच खाई को गहराते जाना।

अंग्रेजी राज के खिलाफ संघर्ष में जो भारतीय शहीद हुए उनके बारे में गुरुजी क्या राय रखते थे वह इस वक्तव्य से बहुत स्पष्ट है-

हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिंदु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे नहीं माना है क्योंकि अंततः वह अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी।’

{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}
{Dr. Shamsul Islam, Political Science professor at Delhi University (retired).}

शायद यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक भी कार्यकर्ता अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहीद नहीं हुआ। शहीद होने की बात तो दूर रही, आरएसएस के उस समय के नेताओं जैसे कि गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक।

लाल कृष्ण अडवाणी, के आर मलकानी या अन्य किसी आरएसएस सदस्य ने किसी भी तरह इस महान मुक्ति आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया क्योंकि आरएसएस सावरकर का पिछलग्गू बानी थी।

भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल गुजरने के बाद भी कई महत्वपूर्ण सच्चाईयों से पर्दा उठना बाकी है। दमनकारी अंग्रेज शासक और उनके मुस्लिम लीगी प्यादों के बारे में तो सच्चाईयां जगजाहिर है लेकिन अगस्त क्रांति के वे गुनहगार (Guilty of august revolution) जो अंग्रेजी सरकारी द्वारा चलाए गए दमन चक्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे अभी भी कठघरे में खड़े नहीं किए जा सके हैं। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि वे भारत पर राज कर रहे हैं। हिंदू राष्ट्रवादियों की इस भूमिका को जानना इसलिए भी जरूरी है ताकि आज उनके द्वारा एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है उसके आने वाले गंभीर परिणामों को समझा जा सके।