श्रम का समान मूल्य और ट्रस्टीशिप से आयेगा विनोबा का साम्ययोग : आचार्य विनोबा भावे की जन्मतिथि पर

Vinoba Bhave

विनोबा के शब्दों में – विवेकानंद माथने 

आचार्य विनोबा भावे की जन्मतिथि (Birthday of Acharya Vinoba Bhave) पर (11 सितम्बर 1895 – 15 नवम्बर 1982), Vinoba Bhave (विनायक नरहरी भावे)

स्वराज्य के बाद हमे अब साम्ययोग की स्थापना का आदर्श सामने रखना होगा। इसी को हमने सर्वोदय कहा है। सर्वोदय यानी सबका भला। किसी का कम और किसी का ज्यादा भला नहीं। सबकी समान चिंता और सब पर समान प्यार। हमने अहिंसा की शक्ति से स्वातंत्र्य प्राप्त किया है, अब अगर हम दूसरा कदम, आर्थिक और सामाजिक समानता कायम करने का नहीं उठाते, तो हमारा स्वातंत्र्य खतरे में है।

साम्ययोग के कारण आर्थिक क्रांति होगी।

राजनैतिक क्षेत्र में भी आज के मूल्य बदले जायेंगे। सामाजिक क्षेत्र में जातिभेद या ऊंच नीच का भाव नहीं रहेगा। साम्ययोग नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में परिवर्तन लाना चाहता है। इसी को क्रांति कहते हैं। हमारा दावा है कि साम्ययोग नैतिक मूल्यों में परिवर्तन करता है, क्योंकि उसकी बुनियाद आध्यात्मिक है और वह जीवन की सारी शाखा उपशाखाओं में आमूलाग्र क्रांति करता है।

साम्ययोग का मानना है कि हरएक मानव में एक ही आत्मा समानरुप में बसती है। साम्ययोग मानव-मानव में भेद नहीं करता, बल्कि मानव आत्मा और प्राणीमात्र की आत्मा में भी बुनियादी भेद नहीं मानता। हां, इतना ही मानता है कि मानव की आत्मा में जो विकास संभव है, वह दूसरे प्राणियों की आत्मा में नहीं हो सकता।

पारमार्थिक साम्य ही हमारा मूल सिद्धांत है। उसी की बुनियाद पर आर्थिक साम्य लाने की हमारी प्रक्रिया होनी चाहिये। जाति भेद आदि छोटे-मोटे भेद आर्थिक समता से ही मिटेंगे। आर्थिक समता की दृष्टि रखकर काम करने से धर्म को भी विशुद्ध रूप प्राप्त होगा।

अहिंसक समाज रचना हम स्थापित करना चाहते हैं, तो अपरिग्रह का खयाल रखना चाहिये। यानी जिनके पास संपत्ति है, उन्हे सच्चे अर्थ में उसके ट्रस्टी बनाना चाहिये, तभी अहिंसा का दर्शन होगा। नहीं तो उत्तरोत्तर अशांति बढती जायेगी।

अर्थप्राप्ति की पद्धति का नियमन अस्तेय करता है और उसकी मात्रा का नियमन अपरिग्रह करता है।

अस्तेय और अपरिग्रह दोनों मिलकर अर्थशुचित्व पूर्ण होता है, जिसके बगैर व्यक्ति और समाज के जीवन में धर्म की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। सत्य और अहिंसा तो मूल है, लेकिन आर्थिक क्षेत्र में दोनों का अविर्भाव अस्तेय और अपरिग्रह से ही हो सकता है।

अस्तेय कहता है कि शरीर का निर्वाह मुख्यतया शरीरश्रम से यानी उत्पादक श्रम से होना चाहिये। इसलिये अस्तेय व्रत शरीर श्रम द्वारा संपत्ति निर्माण पर जोर देता है। जरूरत से जादा संपत्ति अपने पास नहीं रखनी चहिये, इस बात को हम मानते हैं। लेकिन किसकी जरुरत कितनी है यह कौन तय करे?

अपरिग्रह एक विचार है। वह विचार अगर मनुष्य के हृदय में प्रवेश करता है, तो वही मनुष्य को सुझायेगा कि उसके पास कितने संग्रह की आवश्यकता है। वह अपने लिये जो भी तय करेगा, उसमें मैं समाधान मानूंगा, बशर्ते कि अपरिग्रह के विचार को वह सच्चे दिल से मानता हो।

सर्वोदय की दृष्टि से अमीरी गरीबी, दोनों पाप हैं।

लोग मानते हैं कि पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा, इसलिये इस जन्म में गरीबी मिली है। इसी तरह यह भी मानते हैं कि पिछले जन्म में कोई पुण्य किया है, तभी इस जन्म में धनवान बने हैं। पैसे को पुण्य मानना गलत विचार है।

पुण्य का परिणाम संपत्ति नहीं, सद्बुद्धि है और पाप का परिणाम गरीबी नहीं, कुबुद्धि है।

भगवान देखता है कि संपत्ति का उपयोग गरीबी की सेवा में करता है या लोगों को पीड़ा पहुंचाने में करता है? अगर लोगों को सुख देने के लिये संपत्ति का उपयोग करता है, तो वह भगवान की परीक्षा में पास हो जाता है। और दूसरों को पीडा पहुंचाने में करता है, तो भगवान की परीक्षामें अनुत्तीर्ण होता है।

श्रीमान धन से धनवान है, तो श्रमशक्ति के हिसाब से गरीब है। गरीब पैसे से गरीब है, तो श्रमशक्ति के हिसाब से धनी है। श्रीमान और गरीब में एक एक शक्ति है। दोनों की शक्ति का उपयोग होगा, तो बहुत लाभ होगा। शक्ति और बुद्धि का योग होगा, तो गरीबी मिट जायेगी।

संपत्ति की विषमता कृत्रिम व्यवस्था के कारण पैदा हुई है, ऐसा मानकर उसे छोड़ दें, तो भी मनुष्य की बौद्धिक और शारीरिक शक्तियों की विषमता दूर होगी ही ऐसा नहीं। आदर्श स्थिति में भी इस विषमता के सर्वथा अभाव की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये बुद्धि, शरीर और संपत्ति, इन तीनों में से जो प्राप्त हो, उसे यही समझना चाहिये कि वह सबके हित के लिये ही उसे मिली है। इसी को अच्छे अर्थ में ट्रस्टीशिप कहेंगे।

नैतिक मूल्यों के समान आर्थिक क्षेत्रों में भी श्रम का मूल्य समान होना चाहिये। किंतु आज इससे बिल्कुल उल्टा होता है। आज शरीरिक काम की अपेक्षा बौद्धिक काम की मजदूरी ज्यादा दी जाती है। उसकी प्रतिष्ठा भी ज्यादा होती है। लेकिन इस तरह का फर्क बिल्कुल बेबुनियाद है। चूँकि साम्ययोग का विचार आत्मा की समता पर निर्भर है, इसलिये आर्थिक क्षेत्र में भी वह कोई भेद स्वीकार नहीं कर सकता। समाज में हरएक की सेवा का प्रकार भिन्न हो सकता है, पर उसका आर्थिक मूल्य समान ही होना चाहिये।

साम्ययोग के सिद्धांत के अनुसार जब नैतिक मूल्यों में अंतर नहीं आता, तो आर्थिक क्षेत्र में भी अंतर नहीं होना चाहिये। हरएक को विकास का पूर्ण मौका मिले, तालीम का अवकाश मिले। समान मौका मिलने पर जिसमें जो योग्यता होगी, वह उस धंधे में प्रवेश कर सकेगा। मजदूरी का परिमाण कमबेशी होने पर विकास गलत तरिके से होगा और व्यर्थ ही दूसरे क्षेत्र का आकर्षण होगा, जैसा कि आज हो रहा है। समान वेतन से यह वृत्ति रुकेगी।

हम देखते हैं कि हमारे समाज में दर्जे पडते गये। कुछ लोग अपने को ऊंचे कहलाने लगे और उन्होंने शरीर परिश्रम से खुद को मुक्त कर लिया। जिन्हें शरीर परिश्रम करना पड़ा, वे सारे नीचे माने गये। अगर देश के लिये परिश्रम करनेवाले नीचे माने जायें, तो वह देश पतन की ओर जाता है।

हमारे चिंतन में शुद्धि होनी चाहिये। संग्रह करना पाप है, शरीर श्रम टालना पाप है, यह विचार रुढ़ होना चाहिये। किसान और मजदूरों को छोड़कर, जो कि अपने पसीने से रोटी कमाते हैं, हम सबकी गिनती लूटने वालों में है। इसलिये हर एक को व्रत लेना चाहिये कि कुछ न कुछ उत्पादक परिश्रम किये बगैर नहीं खायेंगे।

आज समाज में जो यह खयाल है कि ऊंचे वर्ग वालों को जीवन के लिये अधिक से अधिक वेतन और श्रमनिष्ठों के लिये कम से कम वेतन चाहिये, वह हमें हटाना होगा और साम्ययोग स्थापित करना होगा। होना तो यह चाहिये कि अगर मनुष्य कोई बौद्धिक और नैतिक परिश्रम करता हो, तो उसका कोई मूल्य ही नहीं आंका जाना चाहिये। कोई भी व्यक्ति अपनी शक्तिभर समाज का काम करता है, तो वह रोटी का हकदार हो जाता है। कम ज्यादा शक्ति के अनुसार सेवा कम ज्यादा हो सकती है, किंतु पोषण भौतिक वस्तु है और सेवा नैतिक वस्तु। नैतिक वस्तु की कीमत भौतिक वस्तु से नहीं हो सकती।

अगर राष्ट्रपति अपने राष्ट्र की सेवा पूरी ताकत के साथ करते हैं, भले ही वह सेवा मानसिक क्यों न हो, तो उन्हें उतनी ही रोजी मिलनी चाहिये, जितनी उनकी जीवन निर्वाह के लिये जरूरी है। जो न्याय किसान मेहतर के लिये हो, वही राष्ट्रपति के लिये भी होना चाहिये।

ग्रामीण जीवन में, देहात की जिंदगी में रस कैसे पैदा हो, ग्रामीणों की दिलचस्पी जीवन में कैसे बढ़े यह सवाल है। ग्रामीण जीवन सुंदर, सुखमय और जीनेलायक हो सकता है, यह हमें दिखाना होगा। जबतक शरीरश्रम को नैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा नहीं देते, तब तक ग्रामीण जीवन निषिद्ध रहेगा। भारत में हमने शरीरश्रम को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं दी, यह एक बहुत बड़ा पाप किया है। हमने परिश्रम की आर्थिक प्रतिष्ठा भी कम की है। समाज में किसी ने जादा परिग्रह रखा और सारा समाज भूखा है, तो हम मानते है कि उस हालत में समाज को अधिकार है कि उस व्यक्ति की प्रॉपर्टी का एक हिस्सा समाज के हित में ले लिया जाये।

(विनोबा साहित्य खंड 18 से, शब्द विनोबा के हैं, विषय वस्तु स्पष्ट करने हेतु सुविधानुसार क्रमबद्ध किये हैं।)

विवेकानंद माथने 

 

डॉ. अम्बेडकर का श्रमिक वर्ग को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी का सन्देश

Dr B.R. Ambedkar

Dr. Ambedkar’s message of sharing political power in the working class

बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर न केवल महान कानूनविद, प्रख्यात समाज शास्त्री एवं अर्थशास्त्री ही थे वरन वे दलित वर्ग के साथ-साथ श्रमिक वर्ग के भी उद्धारक थे। बाबा साहब स्वयं एक मजदूर नेता भी थे। अनेक सालों तक वे मजदूरों की बस्ती में रहे थे। इसलिये उन्हें श्रमिकों की समस्याओं की पूर्ण जानकारी थी। साथ ही वे स्वयं एक माने हुए अर्थशास्त्री होने के कारण उन स्थितियों के सुलझाने के तरीके भी जानते थे। इसी लिये उनके द्वारा सन 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारिणी में श्रम मंत्री के समय में श्रमिकों के लिये जो कानून बने और जो सुधार किये गये वे बहुत ही महत्वपूर्ण एवं मूलभूत स्वरूप के हैं। सन 1942 में जब बाबा साहेब वायसराय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने थे तो उन के पास श्रम विभाग था जिस में श्रम, श्रम कानून, कोयले की खदानें, प्रकाशन एवं लोक निर्माण विभाग थे.
डॉ. भीम राव अम्बेडकर की श्रमिक वर्ग के अधिकारों एवं कल्याण के प्रति चिन्ता उन शब्दों से परिलक्षित होती है जो उन्होंने 9 सितम्बर, 1943 को प्लेनरी, लेबर परिषद के सामने उद्योगीकरण पर भाषण देते हुए कहे थे,

“पूंजीवादी संसदीय प्रजातंत्र व्यवस्था में दो बातें अवश्य होती हैं। जो काम करते हैं उन्हें गरीबी से रहना पड़ता है और जो काम नही करते उनके पास अथाह दौलत जमा हो जाती है। एक ओर राजनीतिक समता और दूसरी ओर आर्थिक विषमता । जब तक मजदूरों को रोटी कपड़ा और मकान, निरोगी जीवन नहीं मिलता एवं विशेष रुप से जब तक वे सम्मान के साथ अपना जीवन यापन नहीं कर सकते, तब तक स्वाधीनता कोई मायने नहीं रखती। हर मजदूर को सुरक्षा और राष्ट्रीय सम्पत्ति में सहभागी होने का आश्वासन मिलना आवश्यक है।”

उनका ध्यान इस बात पर था कि श्रम का मूल्य बढ़े। इसके अतिरिक्त बाबा साहब ने दिसम्बर 1945 के प्रथम सप्ताह में श्रम अधिकारियों की एक विभागीय बैठक जो बम्बई सचिवालय में सम्पन्न हुई थी, का उदघाटन करते हुए कहा,

“कि औद्योगिक झगड़े टालने के लिये तीन बातें आवश्यक है:- (1) समुचित संगठन, (2) कानून में आवश्यक सुधार और (3) श्रमिकों के न्यूनतम वेतन का निर्धारण। औद्योगिक शांति सत्ता के बल पर नहीं वरन न्याय नीति के तत्वों पर आधारित होनी चाहिये। श्रमिकों को अपने कर्तव्यों की पहचान होनी चाहिए. मालिकों को भी मजदूरों को उचित वेतन देना चाहिये। साथ ही, सरकार और श्रमिक समाज को भी अपने आपसी संबंध सौहार्दपूर्ण बनाए रखने की लगन से कोशिश करनी चाहिए.“

बाबा साहेब लम्बे अरसे तक मजदूरों की बस्ती में रहे थे. अतः वे मजदूरों की समस्याओं (Labor problems) से पूरी तरह परिचित थे. अतः श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने मजदूरों के कल्याण के लिए बहुत से कानून बनाये जिन में प्रमुख इंडियन ट्रेड यूनियन एक्ट, ई एस आई एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुयावज़ा, काम के 8 घंटे तथा प्रसूतिलाभ आदि प्रमुख हैं.

अंग्रेजों के विरोध के बावजूद भी उन्होंने महिलायों के गहरी खदानों में काम करने पर प्रतिबंध लगाया. वे अन्तराष्ट्रीय श्रम संगठन की सिफारिशों पर दृढ़ता से अमल करने की कोशिश कर रहे थे. जो अधिकार एवं सुविधावाएं अन्य देशों में बहुत मुशिकल से मजदूरों ने प्राप्त कीं डा. आंबेडकर ने अपने श्रम मंत्री काल में कानून बना कर मजदूरों को प्रदान कर दीं. वास्तव में वर्तमान में जितने भी श्रम कानून हैं उनमें से अधिकतर बाबा साहेब के ही बनाये हुए हैं जिस के लिए भारत का मजदूर वर्ग उनका सदैव ऋणी रहेगा.

बाबा साहेब सफाई मजदूरों का कल्याण और उन्हें संगठित करने के लिए भी बहुत प्रयासरत थे जबकि गाँधी जी उन्हें भंगी बने रहने की शिक्षा देते थे तथा उन की हड़ताल को अनैतिक कार्य मानते थे. मोदीजी तो कहते हैं इसमें उन्हें अध्यात्मक सुख की प्राप्ति होती है. बाबा साहेब ने सर्वप्रथम बम्बई नगर महापालिका के सफाई मजदूरों को संगठित करके उनकी ट्रेड यूनियन बनवाई. वे इसी प्रकार के संगठन की स्थापना देश के अन्य भागों में भी करना चाहते थे और उसे अखिल भारतीय स्वरूप देना चाहते थे. उन्होंने इसी उद्देश्य से दो सदस्यी समिति भी बनायी तथा उसे विभिन्न प्रान्तों में जाकर सफाई मजदूरों की स्थिति एवं लागू कानूनों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने को कहा. इस से स्पष्ट है कि बाबा साहेब सफाई मजदूरों को न्याय दिलाने तथा उन्हें अन्य ट्रेड यूनियनों की तर्ज़ पर संगठित करने में कितना प्रयासरत थे.

बाबासाहेब स्वयं एक लबर लीडर रह चुके थे. अधिकतर अछूत ही खेत, कारखानों मिलों आदि में छोटे दर्जे के मजदूर थे. बाबासाहेब ने अपने संघर्ष के दौरान इन्हीं मजदूर बस्तियों में जीवन गुज़ारा था. वह उनकी समस्यायों तथा पीड़ा को भी भलीभांति समझते थे. वे श्रमिकों/ मजदूरों आदि से कहते थे,

“इतना ही काफी नहीं कि तुम अच्छे वेतन और नौकरी के लिए, अच्छी सुविधाओं तथा बोनस प्राप्त करने तक ही अपने संघर्ष को सीमित रखो. तुम्हें सत्ता छीन लेने के लिए भी संघर्ष करना चाहिए.”

इसी ध्येय से उन्होंने 1936 में इन्डीपेंडेंट लेबर (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) बनाई थी और 1937 के पहले चुनाव में 17 सीटें भी जीती थीं. उन्होंने इसके माध्यम से श्रमिक वर्ग को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करने हेतु प्रेरित किया था.

वर्तमान में नई आर्थिक नीति के अंतर्गत भूमंडलीकरण और कारपोरेटीकरण के दौर में पूरी दुनियां में श्रम कानूनों को शिथिल किया जा रहा है. हमारे देश में भी मोदी सरकार ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बहुत सारे श्रम कानूनों को शिथिल/रद्द कर दिया है. श्रम के घंटे बढाये जा रहे हैं. वेतन को उत्पादन से जोड़ा जा रहा है. मजदूरों की नियमित नियुक्तियों के स्थान पर ठेका व्यवस्था लागू की जा रही है जो काफी हद तक पहले ही लागू हो चुकी है. मोदी सरकार ने 44 अलग अलग कानूनों को ख़त्म करके इसे केवल 4 में ही संहिताबद्ध कर दिया गया है. इससे मजदूरों को श्रम कानूनों से मिलने वाले अधिकार एवं संरक्षण बहुत हद तक सीमित हो जायेंगे.

वर्तमान कोरोना संकट के दौरान मनमाने ढंग से तथा बिना किसी विचार विमर्श एवं योजना के आकस्मिक लागू किये गए लाक डाउन ने मजदूरों की गरीबी एवं नाज़ुक स्थिति को पूरी तरह से नंगा कर दिया है. इसके दौरान कितने मजदूर भुखमरी का शिकार हुए हैं और कितने जो पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े थे रास्ते में मर गए, भूखे पेट रहना पड़ा और उस पर पुलिस की बर्बरता सहनी पड़ी. इस दौरान सरकार ने न तो खाने पीने का उचित प्रबंध किया और न ही उन्हें उचित आर्थिक सहायता ही दी. तथाकथित क्वारनटीन कैम्प वास्तव में यात्नागृह साबित हुए हैं. अभी इन बदतर हालत वाले मजदूरों को घर भेजने की बात चली है तो केन्द्रीय सरकार उन्हें लाने के लिए स्पेशल ट्रेन चलाने की व्यवस्था करने को तैयार नहीं है और सारी व्यवस्था करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों के गले में डाल दी है. इससे और भी बड़ा संकट और अवय्स्था कड़ी हो जाने की सम्भावना है.

S.R. Darapuri एस आर दारापुरी,
S.R. Darapuri एस आर दारापुरी,

यह भी विचारणीय है कि जो प्रवासी मजदूर अपने गांव वापस लौटेंगें और जो मजदूर अभी वहां पर हैं उनके रोजगार का क्या होगा? उनकी आजीविका कैसे चलेगी, इसकी कोई योजना सरकार के पास नहीं है। आप जानते ही हैं कि मजदूरों के ऊपर तो पहले से ही हमले हो रहे थे, जिन्हें कोरोना महामारी के इस संकटकाल ने और भी बढ़ा दिया है। कुल मिलाकर कहा जाए तो मौजूदा आर्थिक संकट बेहद गहरा है जो लगातार जारी आर्थिक-औद्योगिक नीतियों की देन है।

गौरतलब हो कि इन मजदूर विरोधी, जनविरोधी नीतियों को समूचे राजनीतिक तंत्र ने आगे बढ़ाया है। इसका मुकाबला पूंजीवादी दल करेंगे नहीं क्योंकि इन नीतियों पर उनकी आम सहमति है और वामपंथी दल जो इसका विरोध करते भी हैं उनकी ताकत बेहद सीमित है। ऐसे में एक नयी लोकतान्त्रिक समाजवादी राजनीति खड़ा करने की ज़रुरत है.

अभी भी आप देख लें कि प्रवासी मजदूर बदतर हालातों में है. इसलिए इस मई दिवस का यही संदेश (Message of may day) हो सकता है कि मजदूर वर्ग को ही जनपक्षधर राजनीतिक तंत्र के निर्माण के लिए जन राजनीति को आगे बढ़ाना होगा। यह महज ट्रेड यूनियन के दायरे में सम्भव नहीं है. मजदूर वर्ग को अपने अधिकारों पर लड़ते हुए सरकार को बाध्य करना होगा कि वह जन कल्याण पर खर्च बढ़ाये. अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन करके सार्वजनिक चिकित्सा, शिक्षा को मजबूत करे और लोगों की आजीविका को सुनिश्चित करे. तभी वास्तव में कोरोना महामारी जैसी संकटकालीन परिस्थितियों का मुकाबला किया जा सकता है. उसे किसानों समेत समाज के उन सभी उत्पीड़ित तबकों को अपनी इस जन राजनीति के पक्ष में गोलबंद करना होगा. अतः डा. आंबेडकर का श्रमिक वर्ग को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करने का सन्देश और भी प्रासंगिक हो जाता है.

एस. आर. दारापुरी

आई. पी. एस. (से0 नि0),

अध्यक्ष मजदूर किसान मंच

मई दिवस के अवसर पर दुनियां के मजदूरों एक हो

Ghar Se Door Bharat Ka Majdoor

आज 1 मई (1st May) तथा मई दिवस (may day) है हर साल दुनिया के कई हिस्सों की तरह भारत में भी  मई दिवस मनाया जाता है जिसमें बहुत सी फैक्ट्रीयों में आज के दिन छुट्टी घोषित की जाती थी, कई जगह बहुत से मजदूर यूनियनों के द्वारा रैलियां और जनसभा का आयोजन किया जाता था जिसमें वर्तमान समय में मजदूरों की स्थिति उनके अधिकार और उनसे जुड़े कानूनों के बारे में बात की जाती थी।

मई दिवस का इतिहास (History of may day) 130 साल पुराना है अंतर्राश्टीªय मजदूर दिवस की शुरुआत 1 मई 1886 को हुई थी जब अमेरिका में कई मजदूर यूनियनों ने काम का समय ज्यादा से ज्यादा आठ घंटे निर्धारित करने के लिए हड़ताल रखी की थी इस हड़ताल के दौरान से शिकागों की हेमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और सौ से ज्यादा घायल हो गए।

1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट में मारे गए मजदूरों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (International Labor Day) के रूप में मनाया जायेगा।

भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान ने एक मई 1930 को मद्रास में मई दिवस मनाने की शुरुआत की थी, और तब से लेकर आज तक मई दिवस को एक मजदूरों के बलिदान, और संघर्षों के प्रतीक के रुप में मनाया जाता रहा है।

मजदूरों की दशा भारत हो या बाहर के देश एक जैसी है, 1991 मे वैश्वीकरण आने के बाद जहां एक ओर पूंजीपतियों ने अपने उद्योगों को देश-विदेश तक फैलाया वही मजदूरों का पलायन भी तेजी से बढ़ा यहीं कारण है कि बिहार, उत्तर-प्रदेश, छतीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों से हर साल हजारों की संख्या में मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर जैसे राज्यों की ओर पलायन बढ़ता गया।

अपने घर परिवार से दूर मजदूर बेहतर जिन्दगी का सपना संजोये देश के अलग अलग कोने में पूंजीपतियों को अपनी सेवा प्रदान करते रहे जिससे की पूंजीपतियों को दोगुना चोगुना फायदा पहुंचने लगा लेकिन प्रवासी मजदूरों की जिन्दगी में कोई खास सुधार नहीं हो पाया, मजदूरों को अपने अधिकारों के प्रति हमेशा आवाज उठानी पड़ी है।

वर्तमान में कोरोना कोविड-19 ने दुनियां के अमीर यूरोपीयन देशों को ही पूरी दुनियां को प्रभावित किया ऐसे में साम्राज्यवादी पंूजीवादी देशों और पूंजीपतियों का कुरुप चेहरा स्पष्ट हो गया।

लॉकडाउन की घोषणा होने के साथ प्रधानमंत्री से सभी लोगों से अपील की कि जो लोग फैक्टरी में काम कर रहे थे उनकी सेलेरी न रोकी जाय, इसके बावजूद भी सभी पूंजीपतियों ने अपने मजदूरों को एक दो हजार रुपये थमा कर शहर छोड़ने को मजबूर कर दिया। यही कारण है कि जब लॉकडाउन की घोषणा हुई तब हजारों की संख्या में मजदूरों की भीड़ आनन्द विहार आ गई थी जो अपने घर जाना चाहते थे क्योकि यहां फैक्टरी से बड़ी संख्या में मजदूर निकाल दिये गए थे, बहुत से मजदूर जिनके पास कोई साधन नहीं था, वे अपने बीवी बच्चों के साथ पैदल ही हजारों की संख्या में अपने घर जाने को तैयार हो गए थे।

दूसरे लॉकडाउन के वक्त भी गुजरात और सूरत में ऐसा ही नजारा था जब मजदूरों का गुस्सा फूटा और वे स्टेशन पर एक साथ पहुंच गए। भारत सरकार हो या राज्य सरकार ने अपने शहरों में रुके मजदूरों के लिए भोजन कि व्यवस्था की है जिसमें उन्हे दोपहर के खाने को पाने के लिए सुबह से ही लाइन में लगना पड़ता है तब कहीं जाकर मुश्किल से खाना मिलता है लेकिन वह भी पूरे परिवार के लिए नही हो पाता है।

सालों से पूंजीपतियों को सेवा करने वाला मजदूर वर्ग आज भूखमरी की कगार पर है, राजधानी दिल्ली से लेकर झारखंड के सुदूर गांवो तक करोड़ो लोगो के सामने भुखमरी के हालात पैदा हो गए है करोड़ो परिवार  ऐसे है जिनके पास न तो राशन कार्ड  है और न ही कोई आधार कार्ड जिससे कि वो राशन मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का लाभ ले सके, सरकार की तरफ से किए जा रहे तात्कालिक उपायों से इन लोगो तक खाना पहुंच तो रहा है लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए दो से चार घंटा का इंतजार लाइन मे लगकर करना पड़ता है।

इस बार के मई दिवस को मजदूर किस तरह मनायेगा?

मजदूर यूनियनें किस तरह मई दिवस को देख रही है ये सोचने का विशय है क्योकि इस बार मजदूर के हालात इस हद तक हो गई कि वो भूख से तड़प कर आत्महत्या को मजबूर हो रहा है फिर भी विरोध की कोई आवाज नही उठ रही है। कोरोना के डर से पैदल अपने घर पहुंचे मजदूरों को भी अपने घर से अलग स्कूलों में रखा जा रहा है जहां उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जा रहा है हाल ही में मेरठ में दिल दहला देने वाली घटना आई जिसमें मजदूरो को दूर से खाना पानी फेंक कर दिया जा रहा था।

इसी तरह एक मजदूर से अपनी आपबीती बताई कि ‘‘बहुत दिनों बाद उनके मालिक ने उन्हें फोन करके खिचड़ी खाने के लिए बुलाया’’।

आज मजदूरों को उनके अधिकारों के साथ अपने स्वाभिमान के लिए भी आवाज उठाना होगा और ये आवाज केवल भारत में ही नहीं पूरे दुनियां के मजदूरों को एक आवाज बनकर उठाना होगा। कोरोना संकट के इस दौर में आज के मई दिवस पर हमें यह सबक लेना होगा कि अब पूरी दुनियां के साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ दुनियां को मजदूरों, किसानों, महिला और छात्रों को एकजुट होकर अपने अधिकारों को स्वाभिमान के लिए आवाज बुलन्द करनी होगी।

मई दिवस जिन्दाबाद

दुनियां के मजदूरों एक हो।

अशोक कुमारी