आओ, बजट-बजट खेलें

nirmala sitharaman

Aao, Budget-Budget Khelen

बजट 2022-23 : व्याख्या तो होती है, पर बजट पर बहस नहीं होती

नियमानुसार फरवरी सन् 2022 के पहले दिन भारत वर्ष की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने लोकसभा में बजट पेश कर दिया। जब एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक ने बजट के विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या आरंभ की तो नैशनल बेस्टसैलर पुस्तक ” व्हाई इंडिया नीड्स द प्रेसिडेंशियल सिस्टम” के यशस्वी लेखक (Author of Why India Needs the Presidential System) भानु धमीजा ने ट्वीट किया कि हमारे देश में बजट की व्याख्या तो होती है, पर उस पर बहस नहीं होती।

अपनी ट्वीट में धमीजा ने स्पष्ट किया कि चूंकि सत्तासीन सरकार, सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन के सदस्य और विपक्ष सभी जानते हैं कि उनका पेश किया बजट ही नहीं, बल्कि कोई भी बिल पास हो ही जाएगा, अंतत: कानून बन ही जाएगा, तो किसी को भी किसी भी बिल पर सार्थक बहस की चिंता ही नहीं होती, उसकी आवश्यकता ही महसूस नहीं होती।

संसद में विपक्ष की क्या भूमिका है?

सत्तासीन सरकार का पेश किया हुआ हर बिल कानून बन ही जाएगा, यह एक निर्विवादित तथ्य है, फिर संसद में न तो विपक्ष की कोई भूमिका है और न ही सत्तासीन दल के किसी ऐसे सदस्य की जो मंत्रिपरिषद् में नहीं है।

जानिए संसद में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है, ऐसे समझें

गौर कीजिए, संसद में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है, इसे समझना शायद ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि विपक्ष, विपक्ष में है ही इस कारण से क्योंकि उसके पास बहुमत नहीं है। बहुमत के अभाव में विपक्ष न तो कोई कानून बनवा सकता है, न रुकवा सकता है और न ही उसमें कोई संशोधन करवा सकता है। इसके साथ ही बड़ा सच यह भी है कि सत्तासीन दल के शेष सदस्य, जो मंत्रिपरिषद् में नहीं हैं, उनकी भी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि नेताओं के भय से वे अपनी सरकार के खिलाफ बोल नहीं सकते और खुद उनका पेश किया कोई बिल, निजी बिल होने के कारण, पास हो नहीं सकता।

नियम यह है कि मंत्रिपरिषद् के सदस्यों के अतिरिक्त किसी भी दल के किसी भी सदस्य द्वारा पेश किये गये बिल को निजी बिल माना जाता है, चाहे वह व्यक्ति सत्तासीन दल का ही क्यों न हो।

यह एक दुखद सच है कि पिछले 50 वर्षों के संसदीय इतिहास में एक भी निजी बिल पास नहीं हुआ है। परिणाम यह है कि सत्तासीन दल के सदस्यों ने निजी बिल पेश करने ही बंद कर दिये।

चूंकि संसद में न विपक्ष की भूमिका रही, न सत्तासीन दल के शेष सदस्यों की, सो बिलों पर बहस में रुचि ही खत्म हो गयी। यह स्थिति धीरे-धीरे बद से बदतर होती चली गई और कानून क्या बने, उसकी धाराएं क्या हों, यह शासक वर्ग पर निर्भर होता चला गया। सार्थक बहस का स्थान कानफोड़ू शोर ने ले लिया और बजट भी अव्यवस्था और कोलाहल के बीच पास होने लग गया। सदन का स्थगन रीति बन गया, यहां तक कि कोरम पूरा करके सदन की कार्यवाही चलाने के लिए सांसदों को घेर कर लाने की आवश्यकता पड़ने लगी। परिणामस्वरूप संसद में पेश बिल बिना किसी जांच-परख के ध्वनि मत से पास होने लगे।

पिंजरे का तोता बन गए सांसद

जब सांसदों के लिए दल के मुखिया से असहमत होना असंभव हो गया। दल की नीति के अनुसार वोट देना कानून हो गया तो सांसद पिंजरे के तोते बन गए। जब यह कानून बन गया कि पार्टी के ह्विप की अवहेलना नहीं की जा सकती और सांसदों के लिए पार्टी की लाइन पर चलना ही विवशता हो गई तो फिर बिल पर मतदान की प्रासंगिकता ही खत्म हो गई।

संसद में बहस का स्तर क्यों गिरा?

मतदान की प्रासंगिकता खत्म होने का परिणाम दूरगामी रहा, इससे बहस का स्तर गिरा, सदन के भाषणों में जनहित की चिंता खत्म हो गई और वोट की चिंता शुरू हो गई। भाषणों का स्वर राजनीतिक हो गया। संसद की बैठकों का समय तेजी से घट गया। पचास के दशक में जहां साल भर में सदन की बैठकें 130 दिन हुआ करती थीं, सन् 2000 आते-आते इनकी संख्या घट कर 50 के आसपास रह गई। यही नहीं, काम का समय भी कम हो गया। संसद, सरकार की रबड़ स्टैंप बन कर रह गई। इससे कानूनों के स्तर और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। सन् 2000 में पास हुए रासायनिक हथियार सम्मेलन अधिनियम पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने के बाद अलग-अलग किस्म की 40 गलतियां पकड़ी गईं।

जब सत्तापक्ष के ही सदस्यों की भूमिका शून्य हो गई, वे सिर्फ कोरम पूरा करने और मेजें थपथपाने के लिए रह गए तो विपक्ष की भूमिका पर किसी टिप्पणी की आवश्यकता ही नहीं है। जब अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए विपक्ष के पास कोई रचनात्मक साधन नहीं बचा तो मीडिया और जनता को अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए विपक्ष शोर-शराबे पर उतर आया। विपक्ष द्वारा शोर मचाने, माइक फेंकने, कुर्सियां तोड़ने आदि की घटनाएं बढ़ गईं।

सांसदों की विवशता यह है कि चुनाव जीतने के लिए पार्टी का मंच होना जरूरी है। पार्टी का टिकट पाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ लोगों की निगाह में रहना, उनकी चापलूसी करना आवश्यक हो गया। चुनाव के लिए टिकट देने का अधिकार हाईकमान के हाथों में सिमट गया। इस प्रकार सत्ता की बागडोर बहुमत वाले दल से आगे बढ़कर बहुमत प्राप्त दल के नेता के पास सिमट गई। इसका परिणाम और भी भयानक हुआ, कोई एक शक्तिशाली व्यक्ति अपने पूरे दल को अपनी उंगलियों पर नचाना आरंभ कर देता है। लोकतंत्र वस्तुत: एक व्यक्ति या एक बहुत छोटे से गुट के शासन में बदल जाता है। सत्तासीन व्यक्ति कोई भी कानून बनवा सकता है, वह जनता की गाढ़ी कमाई से आये टैक्स के पैसे का कितना भी दुरुपयोग करे, कोई सवाल नहीं उठता है।

ये दोष किसी एक व्यक्ति के नहीं हैं, ये प्रणालीगत दोष हैं।

भारतवर्ष में लागू संसदीय प्रणाली इतनी दूषित है कि इसे बदले बिना इन कमियों से निजात पाना संभव नहीं है। इसकी तुलना में अमरीकी शासन प्रणाली बहुत बेहतर है। वहां राष्ट्रपति कानून नहीं बनाता, संसद कानून बनाती है। भारतवर्ष में यदि सरकार द्वारा पेश कोई बिल संसद में गिर जाए तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है, इसीलिए पार्टियां ह्विप जारी करती हैं।

अमरीका में कोई बिल पास हो या न हो इससे राष्ट्रपति को कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपनी निश्चित अवधि तक काम करने के लिए स्वतंत्र है, वह अपने मंत्रिमंडल में विशेषज्ञों को लेने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि उसके मंत्रिमंडल के सदस्य चुनाव नहीं लड़ते, उन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करता है, इसके विपरीत भारत में वही व्यक्ति मंत्रिपरिषद् में शामिल हो सकता है जो किसी सदन का सदस्य हो। इससे योग्यता गौण हो जाती है, चुनाव जीतना प्रमुख कार्य हो जाता है। ऐसे लोग मंत्री हो जाते हैं जिन्हें अपने विभाग का जरा भी ज्ञान नहीं होता, यही कारण है कि नौकरशाही मंत्रियों पर हावी रहती है। शासन व्यवस्था की दूसरी बड़ी कमी यह है कि इसमें जनता की भागीदारी का कोई प्रावधान नहीं है, जनता की राय के बिना बनने वाले कानून अक्सर अधकचरे होते हैं जो जनता का हित करने के बजाए नुकसान अधिक करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में जनहित के कानून नहीं बन पाते।

लब्बोलुबाब यह कि शासन प्रणाली ऐसी हो कि उसमें जनता की भागीदारी हो, विपक्ष की सबल भूमिका हो, हर बिल पर सार्थक चर्चा हो ताकि कानून वो बनें जो जनहित में हों ताकि देश उन्नति कर सके, फल-फूल सके।     

पी. के. खुराना

लेखक एक हैपीनेस गुरू और मोटिवेशनल स्पीकर हैं।

तार तार होती संसद की गरिमा और सवाल संसद की शान का

deshbandhu editorial

Degradation of the dignity of Parliament And the question of the pride of Parliament

संसद का शीतकालीन सत्र (Parliament winter session live updates in Hindi) तय समय से पहले समाप्त हो गया। इस सत्र में कई विधेयक बिना चर्चा के पास करा लिए गए। संसद के शीतकालीन सत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि तीन कृषि कानूनों का निरस्तीकरण माना जा सकता है। पूरे संसद सत्र के दौरान सरकार मनमानी करती नजर आई। तार तार होती संसद की गरिमा व सरकार की हठधर्मिता की विवेचना करते हुए देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today) प्रकाशित हुआ है। उक्त संपादकीय का किंचित् संपादित रूप साभार

संसद का शीतकालीन सत्र समय से पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। 29 नवंबर से शुरु हुए सत्र को 23 दिसंबर तक चलना था, लेकिन दोनों सदनों में बुधवार सुबह ही कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस सत्र के दौरान कृषि विधि निरसन विधेयक 2021, राष्ट्रीय औषध शिक्षा अनुसंधान संस्थान संशोधन विधेयक 2021, केंद्रीय सतर्कता आयोग संशोधन विधेयक 2021, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन संशोधन विधेयक 2021 और निर्वाचन विधि संशोधन विधेयक 2021 जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पेश किये गए। 20 दिसंबर को वर्ष 2021-22 के लिए अनुदान की अनुपूरक मांगों के दूसरे बैच पर चर्चा हुई।

क्या संसद का पूरा सत्र बेकार गया?

यानी ये सोच कर खुद को बहलाया जा सकता है कि संसद का पूरा सत्र बेकार नहीं गया (The entire session of Parliament was not in vain), थोड़ा बहुत काम भी हुआ है। हालांकि ये काम किस तरह से हुआ, इस पर गंभीरता से सोचा जाए, तो समझ आएगा कि संसद में लोकतंत्र का वजन (weight of democracy in parliament) कितना हल्का कर दिया गया है।

संसद के इस शीतकालीन सत्र 2021 की महत्वपूर्ण उपलब्धि क्या है?

इस सत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि कृषि निरसन विधेयक को मान सकते हैं। क्योंकि जिन कृषि कानूनों को इस विधेयक के जरिए निरस्त किया गया, उन्हें खारिज करने की मांग के कारण ही साल भर से लंबा किसान आंदोलन (peasant movement) चला। कम से कम 7 सौ किसानों की मौत इस दौरान हुई। सरकार ने इन कानूनों को लेकर पर्याप्त अड़ियल रवैया दिखाया और जब लगा कि चुनावों में इन कानूनों के कारण मुश्किल आ सकती है, तो उन्हें रद्द करने का विधेयक भी पारित हो गया। हालांकि ये विधेयक भी बिना किसी चर्चा के चंद मिनटों में पारित हुआ।

अब आधार कार्ड से जोड़ना होगा मतदाता पहचान पत्र

सरकार ने अपने बहुमत से निर्वाचन विधि (संशोधन) विधेयक, 2021 को भी पारित करा लिया है, जिसके बाद मतदाता पहचान पत्र को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य हो जाएगा।

निर्वाचन विधि (संशोधन) विधेयक, 2021 का विपक्षी दल विरोध क्यों कर रहे हैं?

कांग्रेस, वामदल, टीएमसी जैसे तमाम विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले (Election Laws Amendment Bill 2021 pass) का विरोध किया है। इसे निजता के लिए खतरा बताया है। मगर सरकार ने विपक्ष की मांगों पर ध्यान नहीं दिया।

गौरतलब है कि मतदान कराना निर्वाचन आयोग का काम है, जो स्वायत्त संस्था है, जबकि आधार कार्ड का जिम्मा यूआईडीएआई के अधीन है, जो सरकार के तहत काम करती है। ऐसे में अगर वोटर आईडी कार्ड और आधार आपस में जुड़ जाएंगे, तो सरकार के लिए सारे वोटर्स की जानकारी लेना आसान हो जाएगा। और चुनाव की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाएगी।

इतनी बड़ी आबादी में आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड में नाम या पते को लेकर भी कई बार गड़बड़ियां हो जाती हैं, और ऐसे में अगर दोनों पहचान पत्र आपस में जुड़ जाएंगे तो मतदाता सूची में गड़बड़ी का डर रहेगा और बहुत से लोग मतदान से वंचित हो सकते हैं। फरवरी 2015 में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में यह काम प्रयोग के तौर पर हो चुका है, जिसमें काफी गड़बड़ी पाई गई थी। लेकिन सरकार ने इन बातों को नजरंदाज करके विधेयक पारित करा लिया।

पूरे संसद सत्र में सरकार की यही मनमानी नजर आती रही।

सत्र के पहले ही दिन, मानसून सत्र में हुए हंगामे के नाम पर राज्यसभा से 12 सांसदों को निलंबित कर दिया गया। इन सांसदों के निलंबन को वापस लेने के लिए विपक्ष रोजाना संसद के बाहर धरना देता रहा।

मंगलवार को भी राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन को राज्यसभा में रूल बुक फेंकने के आरोप में शीतकालीन सत्र के बाकी दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया था। हालांकि ब्रायन ने इस आरोप से इंकार किया और कहा कि वह निर्वाचन विधि संशोधन विधेयक के खतरे के बारे में छह मिनट तक समझाते रहे, लेकिन यह सरकार किसी की नसीहत सुनना नहीं चाहती।

इधर लोकसभा में भी लगभग हर रोज लखीमपुर खीरी मामले और अजय मिश्र टेनी की बर्खास्तगी को लेकर हंगामा हुआ।

विपक्षी सांसदों ने संसद के बाहर भी मार्च निकाला। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार से चर्चा की मांग करता रहा, लेकिन सरकार ने मामले के अदालत में विचाराधीन होने के कारण इस पर बात नहीं की।

ऐसा लगता है कि सरकार को जब सुविधा होती है, तो वह चर्चा के लिए आगे आती है और जहां सवालों से घिरने का खतरा दिखता है, सत्ता के लिए असुविधा होने लगती है, वहां सरकार किसी न किसी बहाने से हट जाती है।

संसद में भारत-चीन विवाद पर भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर चर्चा से बचा गया है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने एक ट्वीट में बताया है कि सितंबर 2020 से लेकर अब तक लोकसभा सचिवालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर पूछे गए 17 सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया।

सरकार की यह बहानेबाजी विपक्ष बार-बार उजागर कर रहा है। इसलिए सत्र को समय से पूर्व खत्म करने का कदम ही सरकार के लिए ठीक रहा।

वैसे भी देश के प्रधानमंत्री इन दिनों चुनावी राज्यों में व्यस्त हैं। मोदीजी ने भाजपा सांसदों को तो सदन में उपस्थित रहने की नसीहत दे दी, लेकिन खुद पहले दिन और आखिरी दिन ही सदन में नजर आए।

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर और विजय वसंत ने इस बारे में एक पोस्टर भी ट्वीट किया, जिसमें पहले दिन से लेकर 20 दिसम्बर तक लगातार मोदीजी की अनुपस्थिति लगाई गई। जबकि इस दौरान वे उप्र में बार-बार नजर आए।

निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों, मजदूरों से जुड़े सवाल, कोरोना ऐसे कई मुद्दे थे, जिन पर सरकार को विपक्ष के साथ खुली चर्चा सदन में करना चाहिए थी। मगर जो हश्र मानसून सत्र का हुआ, वही शीतकालीन सत्र का हो गया।

हम आलीशान सेंट्रल विस्टा बनते देख रहे हैं, मगर संसद की शान कैसे बने रहे, इस बारे में भी सोचना होगा।

आज का देशबन्धु का संपादकीय (Today’s Deshbandhu editorial) का संपादित रूप साभार.

टेनी के इस्तीफे की मांग : सड़क पर उतरे विपक्षी दल, राहुल बोले’हम उन्हें नहीं बख्शेंगे’

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राज्यसभा में 12 सांसदों के निलंबन वापसी एवं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने पैदल मार्च निकाला

नई दिल्ली, 21 दिसम्बर, 2021:  राज्यसभा में 12 सांसदों के निलंबन एवं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की मांग (Demand for withdrawal of suspension of 12 MPs in Rajya Sabha and resignation of Union Minister of State for Home Ajay Mishra Teni) करते हुए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कई विपक्षी दलों के नेताओं ने मंगलवार को संसद से लेकर विजय चौक तक मार्च निकाला।

विपक्ष लखीमपुर खीरी मामले को लेकर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के खिलाफ लगातार हमलावार रुख अपनाए हुए है। संसद के शीतकालीन सत्र (winter session of parliament) के 17वें दिन एक बार फिर विपक्ष ने संदन के अंदर और बाहर दोनों जगह इस मामले को लेकर सरकार पर आक्रमक रुख अपनाया।

अजय मिश्रा टेनी के त्यागपत्र की मांग को लेकर आज विपक्ष ने पैदल मार्च निकाला।

राहुल गांधी भी शामिल हुए विपक्षी दलों के मार्च में

मार्च में शामिल हुए कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी विपक्षी सांसदों के साथ गांधी प्रतिमा से विजय चौक तक मार्च में हिस्सा लिया और कहा, विपक्ष एक बार फिर लखीमपुर खीरी की घटना को उठा रहा है। एक मंत्री के बेटे ने किसानों की हत्या की है, रिपोर्ट में इसे साजिश बताया गया है। प्रधानमंत्री इस मामले पर कुछ नहीं करते। वे किसानों से माफी मांगते हैं, लेकिन मंत्री को नहीं हटा रहे हैं। हम उन्हें नहीं बख्शेंगे, आज नहीं तो कल हम उन्हें जेल भेज कर रहेंगे।

लखीमपुर खीरी कांड पर विपक्ष का पैदल मार्च | Opposition’s foot march on Lakhimpur Kheri incident

प्रधानमंत्री पर आरोप लगाते हुए तृणमूल सांसद डोला सेन ने कहा कि प्रधानमंत्री हर दिन सदन की गरिमा को कम कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों को निरस्त करने और नोटबंदी पर एकतरफा घोषणाएं ही की गईं हैं। इन मामलों पर सदनों में विचार नहीं किया गया। बिना चर्चा के 10 मिनट में बिल पास हो जाते हैं। जब वे हमें बोलने का मौका नहीं देते, तो हम चिल्लाते हैं, नारे लगाते हैं।

उधर शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि किसानों के साथ हिंसक व्यवहार हुआ। हम केंद्र की मोदी सरकार से इस मामले में दोषी केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के इस्तीफे की मांग करते हैं।

गौरतलब है कि संसद के शीतकालीन सत्र के समाप्त होने में अब कुछ ही दिन बचे हैं। ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार अन्य कुछ विधेयकों को जल्द से जल्द पास करवाना चाहती है। लेकिन विपक्ष के हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है।

इस बीच मंगलवार को मतदाता सूची में दोहराव और फर्जी मतदान को रोकने से संबंधित चुनाव सुधार (संशोधन) विधेयक 2021 को राज्यसभा में पेश किये जाने को लेकर भी विपक्ष केंद्र पर हमलावर है। तमाम विपक्षी दलों ने इस बिल का सदन में और पैदल मार्च के दौरान भी विरोध किया।

इससे पहले राजयसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने बैठक की आगामी सत्र को लेकर सदन के तमाम मुद्दों को लेकर रणनीति बनाई।

क्या धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है संसद?

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Is Parliament slowly becoming irrelevant? : Vijay Shankar Singh

संसद के शीतकालीन सत्र पहले ही दिन क्यों निलंबित किए गए 12 राज्यसभा सदस्य?

संसद् के शीतकालीन सत्र के प्रथम दिन ही राज्यसभा के 12 सदस्य निलंबित कर दिए गए। इस पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या संसद शनैः-शनैः अप्रासंगिक होती जा रही है? क्या देश में संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण हो रहा है? क्या लोकतंत्र का अर्थ बहुमत का शासन है? अवकाशप्राप्त वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विजय शंकर सिंह इन सारे प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करते हुए यह भी समझा रहे हैं कि कानून कैसे बनाए जाते हैं, कानून बनाने में संसदीय समितियों की क्या भूमिका है और 2014 के बाद संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर ग्रहण क्यों लग रहा है

लगभग एक दर्जन राज्यसभा सांसदों को संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र (the current winter session of parliament) में पहले ही दिन सदन से निलंबित कर दिया गया। इन सदस्यों को अगस्त में मानसून सत्र के अंत में उनके आचरण के लिए निलंबित कर दिया गया था।

सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) संशोधन विधेयक, 2021 के पारित होने के दौरान इन विपक्षी सदस्यों द्वारा सदन के वेल में हंगामा करने के बाद उस समय मार्शलों को बुलाना पड़ा था। लेकिन इसके बाद एक और घटना घटी कि सदन में राज्यसभा में, संविधान संशोधन बिल पेश किया गया। यह संविधान के उद्देशिका, प्रिएम्बल को संशोधित करने के बारे में था। पर हंगामा हुआ और फिर सन्नाटा।

इस तरह का महत्वपूर्ण बिल बिना जनचर्चा और सभी दलों से बातचीत के बिना लाया जाना, यह दर्शाता है कि सरकार और सत्तारूढ़ दल के मन में संविधान, संसद और संसदीय परम्पराओं को लेकर कितना सम्मान है।

मैं संशोधन के गुणदोष पर कोई चर्चा नहीं कर रहा हूँ, मैं सरकार की लोकतांत्रिक शैली और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति दायित्व बोध (Democratic style of government and sense of responsibility towards constitutional institutions) की बात कर रहा हूँ।

2014 के बाद संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर ग्रहण लग रहा है

2014 के बाद, अगर संवैधानिक संस्थाओं की कार्यक्षमता की ऑडिटिंग या समीक्षा की जाए तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि अधिकतर संवैधानिक संस्थाएं, धीरे धीरे या तो अपने उद्देश्य से विचलित हो रही हैं या उनकी स्वायत्तता पर ग्रहण लग रहा है या उन्हें सरकार या यूं कहें प्रधानमंत्री के परोक्ष नियंत्रण में खींच कर लाने की कोशिश की जा रही है। संविधान का चेक और बैलेंस तंत्र (संविधान का चेक और बैलेंस तंत्र) जो विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के बीच एक महीन सन्तुलन बनाये रखता है, को भी विचलित करने की कोशिश की जा रही है।

मैं उन संस्थाओं की बात नहीं कर रहा हूँ जो कार्यपालिका के सीधे नियंत्रण में थोड़ी बहुत फंक्शनल स्वायत्तता के साथ, गठित की गयी हैं, बल्कि उन संस्थाओं की बात कर रहा हूँ जो सीधे तौर पर संविधान में अलग और विशिष्ट दर्जा प्राप्त हैं और जिनके अफसरों की नियुक्ति में सरकार यानी कार्यपालिका का दखल भी सीमित है, यानी सरकार उनकी नियुक्ति तो कर सकती है, पर बिना एक जटिल प्रक्रिया के उन्हें हटा नहीँ सकती है। उदाहरण के लिये, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, कम्पट्रोलर और ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया, चीफ इन्फॉर्मेशन कमिश्नर जैसे कुछ अन्य संस्थाएं हैं।

भारतीय संसद की गरिमा भी पिछले सात सालों में गिरी है

पर एक और संवैधानिक संस्था है जो संसदीय लोकतंत्र की मातृ संस्था है, भारतीय संसद, उसकी भी गरिमा पिछले 7 साल में गिरी है और उसे भी सत्तारूढ़ दल के दलगत एजेंडे के अनुसार, हांकने का षडयंत्र किया गया है। अफ़सोस कि संसद के दोनों सदनों के सभापति या स्पीकर या उपसभापति भी अपने सदन जिनकी वे अध्यक्षता करते हैं, का मान मर्दन होते देखते रहे। वे अपने दलीय हित के पाश से मुक्त होकर संवैधानिक प्रमुख की भूमिका का निर्वाह करने में विफल रहे। प्रोटोकॉल और सदन में हैसियत रखते हुये भी वे कभी[AU1] -कभी तो, सरकार के एक एक्सटेंशन के रूप में परिवर्तित नज़र आये। इस पतन का सबसे बड़ा प्रमाण है, राज्यसभा में बिना किसी चर्चा और मत विभाजन के, तीनों किसान कानूनों का पास कर दिया जाना और फिर बिना किसी चर्चा और मतविभाजन के उन्हीं पास किये गए तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लेना। सरकार के यह दोनों कृत्य, आगे आने वाले समय में संसदीय इतिहास के छात्रों के लिये सबक बनेंगे कि कैसे और क्यों यह लाये गए थे और कैसे और क्यों यह वापस ले लिए गए। न लाते समय सदन में सदन में विशद चर्चा हुई और न उन कानूनों के तशरीफ़ ले जाते समय कोई बात हुई। बिल्कुल एक शेर की तरह कि, आये भी वो, गए भी गए वो, खत्म हुआ फसाना सारा !

पर क़ायदे क़ानून, कोई दास्तान ए इश्क़ तो है नहीं कि सारा फसाना खत्म मान ही लिया जाए। पर एक साल में, पारित होने और निरस्त होने के बीच इन तीन किसान बिलों ने देश को सरकार और प्रधानमंत्री की प्रशासनिक क्षमता, राजनैतिक कुशलता, सत्तारूढ़ दल की आर्थिक नीतियों के खोखलेपन, जनता के सड़क पर अपने अधिकारों के लिये उतर कर संघर्ष करने की जिजीविषा को उजागर कर दिया। सरकार इन कानूनों को लेकर न केवल एक्सपोज हुई बल्कि यह भी लगा कि, सरकार न तो कानून ड्राफ्ट करना जानती है, न उसके सांसदों को पेश किए जाने वाले बिल के बारे में पता है, न ही वे इस बात के लिए भी, तैयार थे कि इस पर बहस होगी, न ही सरकार ने कोई ऐसा होमवर्क किया था कि, तीनों कानूनों का क्या दूरगामी असर देश की कृषि संस्कृति पर पड़ेगा।

सत्तापक्ष जिसे सदन में ट्रेजरी बेंच कहते हैं, क्योंकि उनके पास राजकोष रहता है, तो यह मान के बैठा था कि मोदी जी यह कानून लाये हैं तो कुछ सोच के ही लाये होंगे,  और मोदी हैं तो मुमकिन है की, तर्ज पर वे यह कानून पास करा ही लेंगे और उनका यह सोचना गलत था भी नहीं। मोदी जी भी यह तीनों कानून ‘कुछ’ सोच कर ही लाये थे, और उन्होंने इसे पास भी करा लिया। पर दुर्भाग्य यह रहा कि राज्यसभा के उपसभापति जब कानून पास हो रहा था तब सदन के अध्यक्ष के रूप में बैठे तो थे पर उनका आचरण एक आदेशपालक की तरह लग रहा था। लगता था वे एक ऐसे आदेश का पालन करने के लिये संकल्पित हैं, जिन्हें वे छोड़ नहीं सकते। राज्यसभा की कार्यवाही का वीडियो जिन्होंने देखा होगा, वे मेरी बात समझ सकते हैं। राज्यसभा के लिये वह, एक काला दिन था। उस कालिमा के लिये सरकार से अधिक राज्यसभा के सभापति और उपसभापति जिम्मेदार हैं, जिन्होंने संसदीय परंपरा और मर्यादा को बनाये रखने के बजाए खुद ही उसे बिखर जाने दिया। यह शर्मनाक था।

कृषि कानून अब अस्तित्वहीन हैं और उसके प्राविधान पर चर्चा करने का अब कोई औचित्य भी नहीं है, पर संसद में जिस तरह से पिछले सात सालों में सरकार ने कुछ कानून बनाये हैं और उन पर न तो विशद चर्चा हुई और न ही नियमानुसार मत विभाजन हुआ, की प्रवृत्ति जो एक तरह से, संसद की अवहेलना ही है पर चर्चा करना ज़रूरी है।

संसद में कानून कैसे बनता है (how law is made in parliament), इस पर एक नज़र डालते हैं।

कानून बनाने के लिये, उसे विधेयक के रूप में, संसद के किसी एक सदन में सरकार या किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा पेश किया जा सकता है। मोटे तौर पर, विधेयक दो प्रकार के होते हैं:

(क) सरकारी विधेयक और

(ख) गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयक।

विधेयक का मसौदा उस विषय से संबंधित सरकार के मंत्रालय में विधि मंत्रालय की सहायता से तैयार किया जाता है। मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद इसे संसद के सामने लाया जाता है। संबंधित मंत्री द्वारा उसे संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। केवल वित्त विधेयक के मामले में यह पाबंदी है कि, वह राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता।

कानून बनने के पहले, प्रत्येक विधेयक के प्रत्येक सदन में तीन वाचन होते हैं-

● विधेयक ‘पेश करना,’ विधेयक का पहला वाचन है। इस स्तर पर चर्चा नहीं की जाती है।

● विधेयक का दूसरा वाचन सबसे अधिक विस्तृत एवं महत्वपूर्ण अवस्था है क्योंकि इसी अवस्था में इसकी विस्तृत एवं बारीकी से जांच और चर्चा की जाती है।

● जब विधेयक के सभी खंडों पर और अनुसूचियों पर, यदि कोई हों, सदन विचार कर उन्हें स्वीकृत कर लेता है। तब मंत्री यह प्रस्ताव कर सकता है कि विधेयक को पास किया जाए। यह तीसरा वाचन कहलाता है।

जिस सदन में विधेयक पेश किया गया हो, उसमें पास किए जाने के बाद उसे सहमति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। वहाँ विधेयक फिर इन तीनों अवस्थाओं में से गुजरता है।

किसी विधेयक पर दोनों के बीच असहमति के कारण गतिरोध होने पर एक असाधारण स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसका समाधान दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में होता है। जब दोनों सदनों द्वारा कोई विधेयक अलग-अलग या संयुक्त बैठक में पास कर दिया जाता है तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। यदि राष्ट्रपति अनुमति प्रदान कर देता है तो अनुमति की तिथि से विधेयक अधिनियम बन जाता है।

संशोधन के द्वारा संविधान के किसी भी अनुच्छेद में बदलाव लाया जा सकता है। किंतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार संविधान के मूल ढांचे या मूल तत्वों को नष्ट या न्यून करने वाला कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

संसद के कार्यों में विविधता के साथ कार्य व्यस्तता भी रहती है। चूंकि समय सीमित होता है, इसलिए संसद के समक्ष प्रस्तुत सभी विधायी या अन्य मामलों पर गहन विचार नहीं हो पाता है। इसलिए, अतिरिक्त विधायी कार्य संसदीय समितियों द्वारा किया जाता है। संसद के दोनों सदनों की समितियों की संरचना कुछ अपवादों को छोड़कर एक जैसी होती है। यह संविधान के अनुच्छेद 118 के अंतर्गत दोनों सदनों द्वारा निर्मित नियमों के तहत अधिनियमित होती है। सामान्यत: ये दो प्रकार की होती हैं-

● स्थायी समितियां, जो प्रतिवर्ष या समय-समय पर निर्वाचित या नियुक्त की जाती हैं। इनका कार्य कमोबेश निरंतर चलता रहता है।

● तदर्थ समितियां, जिनकी नियुक्ति जरूरत पड़ने पर की जाती है तथा अपना काम पूरा कर लेने और अपनी रिपोर्ट पेश कर देने के बाद ये समाप्त हो जाती हैं।

विभागों से संबद्ध स्थायी समितियों की स्थापना संसद ने 1993 में की थी। वर्तमान में विभागों एवं मंत्रालयों से जुड़ी हुई इस प्रकार की 24 समितियां हैं। प्रत्येक कमेटी में 31 सदस्य होते हैं। इनमें से 21 लोकसभा एवं 10 राज्यसभा से होते हैं। संसद में दलों की सदस्य संख्या के हिसाब से उनको इस कमेटी में सदस्यता दी जाती है। कानून बनने वाले बिल पर स्थायी समिति विचार करती है। इसके लिए आम जनता से भी सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। समिति मसले से जुड़े विशेषज्ञों की राय जानने के लिए उनको आमंत्रित भी कर सकती है। इस प्रकार समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है इसे सदन के पटल पर रखा जाता है।

संसदीय समिति की अनुशंसा, सदन में मान ही ली जाए, तरह की कोई बाध्यता नहीं होती। कमेटी का गठन तो इसलिए किया जाता है कि सदन के पास इतना समय नहीं होता कि वह सभी बिलों पर विस्तार से चर्चा करे और सभी बिलों के लिए जनता की राय भी ले। सभी बिल समिति के पास भेजे भी नहीं जाते हैं, लेकिन अधिकांश बिल इसके पास भेजे जाते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब कोई बिल बगैर समिति के पास गए ही पारित हुए।

छोटी संसद की तरह है स्थायी समिति

स्थायी समिति छोटी संसद की तरह है, जो दलगत राजनीति से ऊपर मुद्दों को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखती है। इसमें विभिन्न विचारों पर चर्चा की जाती है और फिर यह लोगों के हित में सिफारिशें देती है। संसद में मुद्दे ज्यादा होते हैं। समय कम। हर पहलू पर व्यापक चर्चा नहीं हो सकती। वह काम संसदीय समिति करती है। इसमें छोटी सी छोटी बातों पर चर्चा होती है और उस हिसाब से मसविदा तैयार किया जाता है।

संसद सत्र कितने दिन चलता है?

संसद सत्र आमतौर पर लगभग सौ दिन ही चलता है, जबकि ये समितियां हमेशा काम करती रहती हैं। ब्रिटेन और अमेरिका में भी इस तरह की समितियों की व्यवस्था है। सदन में किसी सदस्य को जो क‌र्त्तव्य, दायित्व और विशेषाधिकार मिला हुआ है वहीं स्थायी सदस्य के रूप में भी उसे प्राप्त है। स्थायी समिति के कार्यक्षेत्र में न्यायपालिका भी हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। स्थायी समितियों की व्यवस्था इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि यह सरकार की योजनाओं को देखने का काम करती है कि उन्हें जनता के हित में चलाना उपयोगी है या नहीं।

सरकार कानून बनाने के लिए कोई विधेयक सदन में लाती है तो उन पर समाज के हर तबके को मौका देकर उनकी राय लेना और उसके आधार पर एक सुसंगत रिपोर्ट देना समिति का प्रमुख दायित्व है। भले ही सरकार उसकी रिपोर्ट को विधेयक के प्रारूप में शामिल करे या इसे खारिज कर दे।

2014 के बाद सरकार ने कुछ ऐसे क़ानून बनाये हैं जिनके बारे में संसद में चर्चा हुई ही नहीं है और न ही उन संसदीय नियमों का पालन (observance of parliamentary rules) किया गया है जिनका मैंने ऊपर उल्लेख किया है। उदाहरण के लिये, नोटबंदी, अनुच्छेद 370 में संशोधन, नागरिकता संशोधन विधेयक, और सबसे महत्वपूर्ण यह तीन किसान कानून थे।

हर सत्तारूढ़ दल को अपने राजनीतिक एजेंडे को लागू और चुनावी वादे को पूरा करने का अधिकार है, क्योंकि उसे बहुमत जनता ने दिया है, पर वे वादे उन्हीं संसदीय परंपराओं (parliamentary traditions) और कायदे कानून की राह से ही लागू होंगे न कि एक स्वेच्छाचारी शासक की भ्रू भंगिमा के अनुसार। उपरोक्त वर्णित सभी कानून बेहद महत्वपूर्ण हैं और उनका असर व्यापक है, पर न तो वे संसदीय समिति में गए, न उनके एक्सपर्ट से राय मशविरा लिया गया, न ही जनता के बीच तमाम माध्यमों से चर्चा की गयी, बस सदन में आएस बोलवा कर उन्हें पारित कर दिया गया। यह कानून बनाना नहीं, कानून थोपना हुआ। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि इन कानूनों का प्रबल विरोध हुआ और कानून, या तो वापस लेने पड़े या वे नियमावली न बनने के कारण लागू नहीं हो पा रहे हैं।

इसी तरह धड़ाधड़ कानून बनाने और विधेयक पारित करने पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने तंज करते हुए कहा था कि कानून चाट पकौड़ी की तरह बनाये जा रहे हैं।

ऐसे कानूनों का क्या परिणाम हो सकता है, यह एक साल से चल रहे किसान आंदोलन ने बता दिया है। यह आंदोलन सरकार की स्वेच्छाचारिता, ज़िद, अहंकार के खिलाफ भी था, कानून और कृषि नीति के खिलाफ तो था ही।

ढाई लोगों की सरकार!

चोरी-चोरी कानून बनाना, और चुपके-चुपके वापस ले लेना, यह सरकार की एकाधिकारवादी कार्यशैली को प्रमाणित करता है। 2014 के बाद प्रधानमंत्री का पद इतना अधिक शक्ति केंद्रित होता चला जा रहा है कि संविधान में शक्ति पृथक्करण, सेपरेशन ऑफ पॉवर, बहस, चर्चा, कैबिनेट की अवधारणा, जन संवाद आदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है। जबकि हमने वेस्ट मिनिस्टर मॉडल की जो संसदीय व्यवस्था चुनी है उसमें प्रधानमंत्री, कैबिनेट का बॉस नहीं बल्कि सभी बराबरों मे प्रथम होता है। पर आज वह स्थिति नहीं है। यह स्थिति 2014 के बाद ही बननी शुरू हो गयी थी, और इस पर टिप्पणी करते हुए अरुण शौरी ने कहा भी था कि यह ढाई लोगों की सरकार है। यह तंज नरेंद्र मोदी, अमित शाह को दो और अरुण जेटली को आधा मानते हुए किया गया था। अब तो यह दो की ही सरकार कही और मानी जाने लगी है। इसका आशय यह है कि संसद में चर्चा और बहस तो अलग बात है, पर, क्या कैबिनेट में भी इन कानूनों की मेरिट पर खुल कर चर्चा हुई थी इस पर भी संशय है।

याद कीजिए, नोटबन्दी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले के बारे में संसद में भी विपक्ष ने यह संदेह व्यक्त किया था कि, इसका निर्णय लेते समय वित्तमंत्री से कोई चर्चा नहीं की गयी थी। आज नोटबन्दी एक विफल ही नहीं बल्कि वह एक ऐसा आत्मघाती वित्तीय कदम सिद्ध हुआ है कि देश की अर्थव्यवस्था आज तक उबर नहीं पा रही है।

हम सबको सुनिश्चित करना होगा कि संसद सर्वोच्च है, यह पवित्र वाक्य, कहीं जुमलों की भीड़ में एक जुमले की शक्ल न अख्तियार कर ले।

प्रधानमंत्री, सरकार के प्रमुख हैं और उन्हें सरकार चलाने के लिये जनता ने चुना है, पर वे निरंकुश नहीं हैं और न ही उनके समर्थकों को ऐसा सोचना भी चाहिए। पर इधर जिस तरह से सुरक्षा के नाम पर संसद में उनके आने के समय, सांसदों को रोका जा रहा है, सदन में व्यवधान पहुंचाने के नाम सांसदों को निलंबित किया जा रहा है, उनसे संवाद तक नहीं किया जा रहा है, सदन के पीठासीन अध्यक्ष, विशेषकर राज्यसभा के उपसभापति का आचरण, सरकार के एक आज्ञापालक यस मिस्टर प्राइम मिनिस्टर की तर्ज पर होता जा रहा है, उससे न तो प्रधानमंत्री की छवि अच्छी बन रही है और न ही संसद की गरिमा बढ़ रही है। इससे देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्था का महत्व घटाया जा रहा है और राज्यसभा की गरिमा को जितनी चोट उसके सभापति और उपसभापति ने पहुंचाई है,  वह दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।

देश के लिये घातक है संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण (Erosion of constitutional institutions is fatal for the country)

हमें एक सजग, सचेत और सतर्क नागरिक की तरह अपने अधिकारों और दायित्व को याद रखते हुए, देश के संविधान के अनुसार, सत्ता के हर उस कदम के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म कर, एकाधिकारवादी शक्ति केंद्रित सत्ता केंद्र की ओर ले जाती है। किसान आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि (The biggest achievement of the peasant movement) यह है कि उसने जनता के जनार्दन रूप को सामने ला दिया और सत्ता का अहंकार ध्वस्त कर दिया। संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण, देश के लिये घातक है।

© विजय शंकर सिंह


संसद का काम, संसद का चलना!

 पत्रकारिता की चालू भाषा में कहें तो संसद का पूरा मानसून सत्र (full monsoon session of parliament) हंगामे की ही भेंट चढ़ गया। पेगासस जासूसी कांड समेत विभिन्न मुद्दों पर प्राथमिकता देकर तथा विधिवत चर्चा कराए जाने की कमोबेश एकजुट विपक्ष की मांग और सत्तापक्ष के इस मांग से इंकार किए जाने के चलते, मानसून सत्र के पहले दो सप्ताह संसद में सामान्य स्थिति में काम के इंतजार में ही निकल गए। बहरहाल, इसके बाद भी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बना गतिरोध खत्म होने और आखिरी दो-ढ़ाई हफ्तों में संसद के कमोबेश सामान्य तरीके से काम करने की कोई उम्मीद थी भी, तो मंगलवार 3 अगस्त को संसद की बैठक के शुरू होने से पहले ही खत्म हो गयी।

इस रोज, एक ओर राहुल गांधी द्वारा बुलायी गयी नाश्ता बैठक से, 15 पार्टियों के नेताओं के साथ अनेक विपक्षी सांसद, विशेष रूप से तेल के लगातार बढ़ते दामों के मुद्दे पर एकजुट प्रदर्शन करते हुए, साइकिलों पर संसद पहुंचे। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ताधारी पार्टी के संसदीय दल की बैठक में, विपक्ष को संसद न चलने देने का दोषी तो ठहराया ही, उसके ऐसा करने को ‘संविधान के विरुद्ध, संसद के विरुद्ध, लोकतंत्र के विरुद्ध और जनता के विरुद्ध’ भी करार दे दिया! यह टकराव के और बढऩे तथा गतिरोध के टूटने की संभावनाओं के द्वार बंद होने का ही संकेतक है।

         इस संदर्भ में इसका जिक्र करना अप्रासांगिक नहीं है कि वरिष्ठ भाजपा नेता और मोदी सरकार में एक हद तक अपनी स्वतंत्र हैसियत बनाए रहे वरिष्ठ मंत्री, राजनाथ सिंह इसके एक रोज पहले तक, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच के गतिरोध को तोडऩे का प्रयास भी कर रहे थे। विपक्ष के भी बड़े हिस्से का रुख उनके प्रयास के प्रति सकारात्मक था। लेकिन, भाजपा के मोदी-शाह के नेतृत्व ने, समाधान के लिए कोई भी पेशकश करने के मामले में उनके हाथ ही बांध दिए। इस तरह, विपक्ष की एक नहीं सुनने और खासतौर पर पेगासस कांड पर चर्चा तक करने के लिए तैयार न होने के अपने हठपूर्ण रुख से, भाजपा के मौजूदा नेतृत्व ने दोनों पक्षों के बीच समझौते के सारे रास्ते ही बंद कर दिए।

वास्तव में मोदी सरकार ने जुलाई के आखिरी सप्ताहांत पर ही, विपक्ष पर इसके दावे के साथ हमला बोल दिया था कि उसके संसद न चलने देने से देश का बहुत भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।

मानसून सत्र के पहले दो हफ्ते में ही, संसद के दोनों सदनों को मिलाकर, 107 घंटे काम हुआ था, जबकि सिर्फ 17 घंटे काम हुआ था। इस तरह करदाताओं के 130 करोड़ रुपए बर्बाद हो गए थे! संसद के काम करने न करने और करदाताओं के पैसे की बर्बादी के सवाल पर हम जरा बाद में आएंगे, यहां सिर्फ इतना जिक्र करना ही काफी होगा कि ‘देश के नुकसान’ का यह प्र्रचार पहले दो-तीन दिन तक अनाम ‘सरकारी सूत्रों’ के ही जिम्मे रहा था, लेकिन अब खुद प्रधानमंत्री ने इसकी कमान संभाल ली है।

नरेंद्र मोदी के राज के सात साल में संसद की शक्तियों और काम-काज के बेतरह कतर दिए जाने के बावजूद, कम से कम इतना अनुमान तो कोई भी लगा सकता था कि संसद का मानसून सत्र हंगामी होगा।

बेशक, साम-दाम-दंड-भेद के सारे हथियारों के सहारे, मोदी राज ने न सिर्फ राज्य सभा में भी अंतत: बहुमत जुगाड़ लिया है, बल्कि दोनों सदनों में अपने खुल्लमखुल्ला सत्तापक्षी सभापतियों के जरिए, विपक्ष की आवाज को उसकी संख्या के अनुुपात से भी धीमा करने के सारे इंतजाम कर लिए हैं। संसद के पिछले मानसून सत्र में जिस तरह तीन किसानविरोधी कानूनों और चार मजदूरविरोधी संहिताओं को, बहुमत की तानाशाही के सहारे, बिना बहस के और एक तरह से जोर-जबर्दस्ती से तथा सारे संसदीय-नियम कायदों को पांवों तले रोंदते हुए पारित घोषित कराया गया था, वह मोदी सरकार की ओर से इसका भी एलान था कि वह संसद में विपक्ष की रत्तीभर नहीं सुनेगी और जो मन चाहेगा वही करेगी। इसके बावजूद, वर्तमान मानसून सत्र की पृष्ठभूमि ने ही यह सुनिश्चित कर दिया था कि संसद के इस सत्र में विपक्ष अपनी आवाज सुनाने की, पिछले किसी भी सत्र से ज्यादा जोरदार कोशिश करेगा।

इसके पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व तो पिछले साल मानसून सत्र में जबर्दस्ती संसद का ठप्पा लगवा कर थोपे गए मजदूरविरोधी तथा किसानविरोधी कानूनों के लगातार जारी विरोध का ही था। खासतौर पर किसानों के राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर चलते अविराम विरोध आंदोलन के आठ महीने पूरे हो रहे थे और तीनों काले कानूनों के वापस लिए जाने की मांग को लेकर किसान, संसद भवन से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर, अपनी समांतर संसद चला रहे थे। यह मुद्दा, जिस पर मोदी की दूसरी पारी में सत्ताधारी एनडीए में पहली बड़ी फूट पड़ी थी और भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी, अकाली दल सत्ताधारी गठजोड़ तथा उससे भी बढ़कर मोदी की सरकार से अलग हो गयी थी, संसद के सत्र को हंगामी नहीं बनाता तो ही अचरज होता।

ऐसा ही महत्वपूर्ण दूसरा मुद्दा कोरोना की दूसरी लहर के भयावह प्रकोप के बीच, खुलकर सामने आयी मोदी सरकार की तैयारियों तथा व्यवस्थाओं की घोर विफलताओं का था। अस्पताल, वेंटीलेटर, आक्सीजन, रेमडेसिविर, एंबुलेंस और यहां तक कि श्मशानों तथा कब्रिस्तानों की भी भारी कमी के जैसे दर्दनाक मंजर अप्रैल-मई के महीने में देश भर में और खासतौर पर उत्तरी भारत के बड़े हिस्से में देखने को मिले थे और जिस तरह इस सबके बीच सरकार नाम की चीज एक तरह से गायब ही नजर आ रही थी, उस सब का दु:ख और विक्षोभ अगर संसद में सुनाई ही नहीं देता, तो यह संसद के देश और जनता का प्रतिनिधित्व करने के दावे पर ही गंभीर सवालिया निशान लगना होता।

यह भी याद रखना चाहिए कि यह कोई बीते कल की चीर-फाड़ करने का ही मसला नहीं है। यह आने वाले कल का भी मसला है, जिसमें तीसरी लहर का जो कि और भी घातक भी हो सकती है, खतरा सिर पर मंडरा रहा है और यह खतरा इसलिए सिर पर मंडरा रहा है कि मोदी सरकार, कोविड-19 के टीके होने के बावजूद, देश की आबादी के लक्षित हिस्से का वांक्षित तेजी से टीकाकरण सुनिश्चित करने में विफल रही है, जबकि यह टीकाकरण ही संभावित तीसरी लहर या उसकी मारकता के खिलाफ सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी है। यह तब है जबकि भारत के पास, दुनिया भर में सबसे ज्यादा टीका बनाने की क्षमताएं हैं और टीके भी।

इतना ही महत्वपूर्ण तीसरा मुद्दा, महामारी की सीधी मार तथा उसकी रोक-थाम के लिए आजमाए जा रहे लॉकडाउन समेत पाबंदी के विभिन्न उपायों के चलते, खासतौर पर मेहनतकशों के काम तथा आय के छिनने/ घटने से हो रही बदहाली के प्रति, मोदी सरकार की घोर निष्ठुरता का है। इस संकट के बीच, आम जनता के विशाल बहुमत की मदद करने के लिए, आय सुरक्षा तथा नकद सहायता मुहैया कराने जैसे कदम उठाने के बजाए, जो अन्य अधिकांश देशों ने अपनी सामथ्र्य के हिसाब से ही सही, उठाए जरूर हैं, मोदी सरकार ने लक्षित आबादी को सिर्फ 5 किलोग्राम प्रतिव्यक्ति अनाज मुफ्त मुहैया कराने के, भूख से मौतों को टालने के उपाय में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली है। इसके ऊपर से यह सरकार, महामारी की मार से और भी उग्र हो गए, अर्थव्यवस्था के चौतरफा संकट तथा उसके चलते रोजगार के बढ़ते संकट से निपटने के लिए, जनता के विशाल बहुमत के लिए रोजगार तथा आय या सहायता मुहैया कराने के बजाए, बड़ी पूंजी और कार्पोरेटों को प्रोत्साहन के तौर पर ज्यादा से ज्यादा कर रियायतें व छूटें देने पर ही भरोसा कर रही है। और दूसरी ओर इस संकट तथा इस संकट से उबरने के नाम पर कार्पोरेटों को दी जातीं रियायतों के चलते, अपने बढ़ते राजस्व घाटे की भरपाई, यह सरकार तेल उत्पादों की कीमतों में लगातार तथा अनाप-शनाप बढ़ोतरी करने के जरिए, आम जनता पर चौतरफा महंगाई का भारी बोझ थोपने और इस तरह उसकी बदहाली बढ़ाने के जरिए ही कर रही है।

इस जनविरोधी नीति के जरिए, मोदी सरकार मेहनतकश जनता की हालत तो बद से बदतर कर ही रही है, इसके साथ ही बढ़ते आर्थिक संकट को और तीखा तथा दु:साध्य बनाने का ही काम कर रही है।

इन तीनों ही पहलुओं से, जनता के प्रचंड बहुमत की तकलीफों तथा पीड़ा को स्वर देते हुए, विपक्ष को मौजूदा शासन को आलोचनाओं का निशाना बनाना ही था और सत्तापक्ष को जहां तक बन पड़े इन आलोचनाओं को ही रोकने की कोशिश करनी ही थी। यानी सत्तापक्ष और विपक्ष की टक्कर तो हालात ने पहले से तय कर रखी थी। इसके ऊपर से ऐन सत्र की पूर्व-संध्या में पेगासस जासूसी कांड के खुलासे आने शुरू हो गए। और इन खुलासों के आखिर तक जो तस्वीर निकल कर आयी, वह निजी तौर पर किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की, वे चाहे जितने ऊंचे पदों पर हों, निजता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन तथा जासूसी के खतरे की ही तस्वीर नहीं है। यह तो किसी सामथ्र्यवान के हाथों से और इस मामले में उसके सरकार के सिवा कोई दूसरा होने की शायद ही कोई संभावना है, क्योंकि पेगासस की निर्माता इस्राइली कंपनी, एनएसओ का दावा है कि उसने सिर्फ सरकारों या प्रमाणित सरकारी एजेंसियों को ही यह हथियार मुहैया कराया है, पूरी की पूरी जनतांत्रिक व्यवस्था को बेमानी बनाए जा सकने के खतरे का ही मामला है।

बहुराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों व कल्याणकारी एजेंसियों और अनेक देशों के प्रमुख मीडिया संस्थानों के संयुक्त उद्यम से, इस जासूसी के संभावित शिकारों की जो सूची सामने आयी है, उसमें विपक्षी नेताओं के जरिए पूरी राजनीतिक व्यवस्था से लेकर, चुनाव आयोग व शीर्ष न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं और शीर्षस्थ नौकरशाहों से लेकर, सशस्त्र बलों के उच्चाधिकारियों तक यानी संक्षेप में समूची व्यवस्था के ही मैनिपुलेशन की संभावनाओं और सामथ्र्य के संकेत छुपे हुए हैं। समूची जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे बड़े तथा शैतानी खतरे की कल्पना, फिलहाल नहीं की जा सकती है।

इसके बावजूद, मोदी-शाह के नेतृत्व में सत्तापक्ष बजिद है कि पेगासस जासूसी समेत इन मुद्दों पर न बहस की कोई अर्जेंसी है और न व्यवस्थित बहस की जरूरत है। पेगासस के मामले में, कोई उच्चस्तरीय जांच कराने का वादा करना तो दूर, सरकार का दावा है कि उसका इतना भरोसा देना ही काफी होना चाहिए कि ‘कोई अवैध जासूसी नहीं हो रही है!’ वह तो यह स्पष्ट करने के लिए भी तैयार नहीं है कि उसने या किसी सरकारी एजेंसी से पेगासस की सेवाएं हासिल की हैं या नहीं? जनतंत्र समेत, जनता के जीवन-मरण के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा सत्तापक्ष रोक रहा है और विपक्ष पर इल्जाम लगा रहा है कि वह संसद नहीं चलने दे रहा है, संसद को अपना काम नहीं करने दे रहा है! लेकिन, अगर संसद ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं कर सकती है, तो उसका काम ही क्या है?

संसद का काम क्या है

संसद का काम अगर सिर्फ कार्यपालिका के फैसलों पर ठप्पा लगाना है, तो बहुमत से सरकार बन जाने के बाद, इस औपचारिकता की जरूरत ही क्या है? संसदीय व्यवस्था का अर्थ ही है, ऐसी व्यवस्था जिसमें जनता के प्रतिनिधियों के सामने कार्यपालिका की जवाबदेही के माध्यम से, जनता के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। बहस से हो तो बहस से और बहस से न हो तो बहस रोककर, कार्यपालिका को जनता की चिंताओं के प्रति जवाबदेह बनाना ही संसद का मुख्य काम है। और यह जवाबदेही सुनिश्चित करना ही संसद का चलना है। वर्ना हम संसद को किसी डिबेटिंग सोसाइटी में घटा रहे होंगे।

0 राजेंद्र शर्मा

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लोकलहर के संपादक हैं। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

        

संसद परिसर में अकाली और कांग्रेस सांसद में जुबानी जंग

कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (Ravneet Singh Bittu) और अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल के बीच आज संसद परिसर में कृषि कानूनों के मुद्दे पर कहासुनी (Farmers Movement) हो गई। दोनों ने एक-दूसरे पर किसानों को ठगने का आरोप लगाया।

Verbal dispute between Harsimrat Kaur Badal and Ravneet Bittu on agricultural laws

नई दिल्ली, 4 अगस्त 2021 कांग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (Ravneet Singh Bittu) और अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल के बीच आज संसद परिसर में कृषि कानूनों के मुद्दे पर कहासुनी (Farmers Movement) हो गई। दोनों ने एक-दूसरे पर किसानों को ठगने का आरोप लगाया।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि पहले अकाली दल, फिर एनडीए सरकार में कैबिनेट मंत्री ने विधेयक पारित किया और अब विरोध कर रहे हैं। रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा, ‘ये लोग ड्रामा कर रहे हैं। पूरी तरह से झूठे हैं ये लोग। बिल पारित होने के दो महीने बाद तक सुखबीर सिंह बादल और प्रकाश सिंह बादल गायब रहे।’ यही नहीं केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी एकता की बजाय आपस में उलझने के सवाल पर बिट्टू ने कहा कि इनके साथ हम कैसी एकता करें? इन्हीं लोगों ने तो संसद में बिल पारित कराए थे और अब विरोध का रोज ड्रामा करते हैं।

हरसिमरत कौर ने जवाब दिया कि उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था और पूछा कि विधेयक पारित होने पर राहुल गांधी कहां थे।

बिट्टू ने जवाब दिया कि जब कैबिनेट में बिल पास हुआ तो वह सरकार का हिस्सा थीं।

दोनों सांसद संसद परिसर में कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे और तख्तियां लेकर नारेबाजी कर रहे थे।

पंजाब में दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हैं, जहां कृषि कानून एक बड़ा मुद्दा है और राज्य में अगले साल चुनाव होने जा रहे हैं।

कांग्रेस तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रही है। पिछले हफ्ते राहुल गांधी आंदोलन कर रहे किसानों के समर्थन में ट्रैक्टर से संसद पहुंचे। उस समय मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, “मैं संसद में किसानों का संदेश लाया हूं। वे (सरकार) किसानों की आवाज दबा रहे हैं और संसद में चर्चा नहीं होने दे रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार को इन काले कानूनों को निरस्त करना होगा। उन्होंने कहा, “पूरा देश जानता है कि यह (तीन कृषि कानून) किसके फायदे के लिए किया जा रहा है। यह किसानों के पक्ष में नहीं है और सरकार को इन तीन काले कृषि कानूनों को वापस लेना होगा।”

चंद इजारेदारों के कदमों में, नहीं देख सकते हम बंधक, अपने देश की संसद और सरकार

Modi government is Adani, Ambani's servant. Farmers and workers will uproot it - Randhir Singh Suman

तीन काले कानूनों के विरुद्ध दिल्ली में आंदोलनरत किसानों को समर्पित एक रचना :-

ठण्ड मुझे भी लगती है,

खुला आसमान, ठंडी हवाएँ,

मुझे भी सताती हैं

यह अलग बात है,

जब मैं सृज़न करता हूँ

मिट्टी से जाने क्या क्या रचता हूँ,

तो मेरे लिए ठण्ड बेमानी हो जाती है,

धरती मेरा कर्मक्षेत्र और

आकाश मेरे कर्म का साक्षी बन जाता है,

घोर ठिठुरन में भी हाथ की अंगुलियों में

अजीब सा जोश होता है,

जिस्म में अजीब सी गर्माहट और

सारी ठिठुरन काफूर हो जाती है,

हम किसान कड़कती धूप और

हाड़ कंपाती ठंड में,

धरती प्रकृति और आकाश से

एकाकार हो जाते हैं,

जिस्म से साकार होते हुए भी,

समाधिस्थ और निराकार हो जाते हैं।

आज दिल्ली की सड़कों पर

ठिठुरन में बैठे हुए हम,

कोई हंगामा नहीं खड़ा कर रहे हैं,

कोई आंदोलन नहीं कर रहे हैं,

खेतों में न सही,

राजमार्ग में बो रहे हैं,

भविष्य के सपने,

यहाँ भी हम सृजन कर रहे हैं

आने वाली नस्लों का मुस्तकबिल,

ताकि उनके श्रम की पूंजी,

कोई चुरा न सके,

कोई लूट न सके,

उनके पसीने की क़ीमत और

उन्हें भी इस देश में शिक्षा,स्वास्थ्य,

मकान, समृद्धि और सम्मान पाने का हक़ हो,

सबसे बढ़कर एक भारतीय के रूप में,

हँसने मुस्कुराने खिलखिलाने,

आगे बढ़ने का हक़ हो।

सड़कों पर बैठे हम किसान ही भारत हैं,

हम ही भारत का वर्तमान हैं,

हमीं भारत का भविष्य हैं,

हम भी किसी के बाप हैं,

किसी की माँ हैं

किसी के बेटे हैं

किसी की बेटी हैं

हमें भी अपनी व्यथा प्रकट करने का अधिकार है,

हमें भी रूठ जाने का अधिकार है,

और जो सरकार हमें मना नहीं सकती,

वह सरकार हमारी हो नहीं हो सकती।

चंद इजारेदारों के कदमों में,

नहीं देख सकते हम बंधक,

अपने देश की संसद और सरकार,

लोकतंत्र की ख़ूबसूरती इसी में है

कि जो लोक कहे

वही करे संसद और सरकार।

तपेन्द्र प्रसाद शाक्य

तपेंद्र प्रसाद, लेखक अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी व पूर्व कैबिनेट मंत्री व सम्यक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
तपेंद्र प्रसाद, लेखक अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी व पूर्व कैबिनेट मंत्री व सम्यक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

तीन नए कृषि कानूनों के बारे में जानिए सब कुछ, कैसे ये देश के लिए हानिकारक हैं

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तीन नए कृषि कानूनों का एक विश्लेषण | An analysis of three new agricultural laws

इस आलेख में सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री जया मेहता (Economist Jaya Mehta) समझा रही हैं कि तीन नए कृषि कानूनों का विरोध किया जाना क्यों जरूरी है (Why it is important to oppose three new agricultural laws), मौजूदा किसान संघर्ष की पृष्ठभूमि क्या है (What is the background of the current peasant struggle), वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश की जनता को आत्मनिर्भर बनाने का एजेंडा क्या है (What is Prime Minister Narendra Modi’s agenda to make the people of the country self-reliant?), संसद में पारित कृषि विधेयकों (Agriculture Bills passed in Parliament), Essential Commodities (Amendment) Act, 2020The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020,The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Act, 2020, का देश पर क्या असर पड़ेगा और मौजूदा किसान आंदोलन किस तरह उम्मीद पैदा करता है। पूरा पढ़ें और शेयर भी करें.

मौजूदा किसान संघर्ष की पृष्ठभूमि

देशभर में लॉकडाउन घोषित करने के डेढ़ महीने बाद प्रधानमंत्री महोदय को यह ख्याल आया कि कोरोना वायरस की महामारी से निपटने में जनता की कुछ मदद भी करना चाहिए और 12 मई 2020 को उन्होंने बीस लाख करोड़ रुपए के एक राहत पैकेज कि घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “ये पैकेज देश के मजदूरों और किसानों के लिए है जिन्होंने हर हालत में, हर मौसम में और चौबीसों घंटे अपने देशवासियों के लिए काम किया”। बाद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगले पांच दिन तक इस पैकेज में शामिल प्रावधानों की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि खेती के क्षेत्र के लिए इस पैकेज में ग्यारह कदम उठाये गए हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर का कोष स्थापित किया गया है, जानवरों के लिए टीकाकरण, खाने-पीने की चीजों के छोटे उद्यम आदि के लिए इस पैकेज में प्रावधान किये गए हैं। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण घोषणा उन्होंने की खेती के बाजार की संरचना में किये जाने वाले तीन सुधारों के बारे में। इसमें एक सुधार आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित है, दूसरा विभिन्न राज्यों के कृषि उत्पाद मार्केटिंग कमेटी कानूनों को ख़तम करने के बारे में और तीसरा ठेका खेती को संस्थागत रूप देने के बारे में है। ये तीनों सुधार मौजूदा कृषि उत्पादों के बाजार की संरचना पर से सरकार का नियंत्रण हटाने के मकसद से किये गए हैं।

जब कोविड और लॉकडाउन की वजह से खेती में पहले से चले आ रहे संकट में और भी इज़ाफ़ा हो गया, और जब वंचितों और हाशिये पर मौजूद परिवारों को राज्य की सहायता की जरूरत थी ताकि निर्दयी और निरंकुश बाजार की अनिश्चितताओं और क्रूरताओं से राज्य उनकी रक्षा करे तब मोदी सरकार ने बाजार को और अधिक खोलकर और अपना नियंत्रण हटाकर समाज के कमजोर तबकों को बाजार के सामने पूरी तरह असहाय छोड़ दिया। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश की जनता को आत्मनिर्भर बनाने का एजेंडा यही था।

जब संसद का मानसून सत्र 14 सितंबर 2020 को शुरू हुआ तब ये तीनों विधेयक राज्यसभा एवं लोकसभा में रखे गए। लोकसभा में यह विधेयक पास हो गए लेकिन 17 सितंबर को शिरोमणि अकाली दल की सांसद और खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इन विधेयकों के विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया।

20 सितंबर को ये विधेयक राज्यसभा में रखे गए जहाँ समूचे विपक्ष ने इन विधेयकों की बारीक पड़ताल के लिए एक समिति बनाने कि मांग की। विपक्षी सदस्यों ने यह भी मांग की कि इन विधेयकों को अमान्य करने के उनके प्रस्तावों पर राज्यसभा में मतदान करवाया जाये। राज्यसभा के उपसभापति ने उनकी मांग अस्वीकार कर दी और सदन में घमासान मच गया। सभी नियमों और प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर वैसी ही अफरा-तफरी में इन विधेयकों को आनन्-फानन पारित कर दिया।

तीसरा कानून, “आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन 1955” 22 सितंबर 2020 को पारित किया और 27 सितंबर को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ये तीनों विधेयक कानून बन गए।

संसद में पारित कृषि विधेयक

1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में भारत में लागू किया गया था। तब इस नियम को लागू करने का उद्देश्य उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता उचित दाम पर सुनिश्चित करवाना था। अतः इस कानून के अनुसार आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन, मूल्य और वितरण सरकार के नियंत्रण में होगा जिससे उपभोक्ताओं को बेईमान व्यापारियों से बचाया जा सके। आवश्यक वस्तुओं की सूची में खाद्य पदार्थ, उर्वरक, औषधियां, पेट्रोलियम, जूट आदि शामिल थे।

23 सितम्बर 2020 को पारित अधिनियम में संशोधन के बाद बने इस कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा दिया गया है। इस प्रकार, इन वस्तुओं पर जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी को सीमित करने और इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने जैसे प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। अब इन वस्तुओं के व्यापार के लिए लाइसेंस लेना जरूरी नहीं होगा। हालाँकि इस अधिनियम में प्रावधान है कि युद्ध, अकाल या असाधारण मूल्य वृद्धि जैसी आकस्मिक स्थितियों में प्रतिबंधों को फिर से लागू किया जा सकता है लेकिन जिस समय इस प्रतिबंध को हटाया गया है, क्या यह आपातकालीन समय नहीं है? आज कोविड-19 के दौर में करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं। यह ऐसा समय है जब लोग अपनी मौलिक जरूरतों को पूरा करने लायक भी नहीं कमा पा रहे। इस अभूतपूर्व कठिनाई के दौर में लोकतान्त्रिक राज्य की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को उनकी बुनियादी जरूरतों का सामान सस्ती कीमत पर उपलब्ध करवाए। जीने के लिए बुनियादी जरूरतों में खाद्य सामग्री सबसे पहले क्रम पर आती है, लेकिन कानून में इस तरह का बदलाव करके जरूरतमंदों को खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने के बजाए अधिक मूल्य पर उपज बेचने जैसी बेहतर संभावनाओं एवं भंडारण की मात्रा पर प्रतिबंध हटाना बेहद शर्मनाक सोच है। इस कानून से जमाखोरों को वैधता मिल जाती है।

इस संशोधन को उचित ठहराते हुए सरकार तर्क देती है कि किसान अपनी कृषि उपज को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बेचकर बेहतर दाम प्राप्त कर सकेंगे। इससे किसानों को व्यापार एवं सौदेबाजी के लिए बड़ा बाजार मुहैया होगा और उनकी व्यापारिक शक्ति बढ़ेगी। इसी प्रकार खाद्य पदार्थों के भंडारण की मात्रा पर प्रतिबंध हटा देने से भंडारण क्षेत्र (वेयर हाऊसिंग) की क्षमता बढ़ाई जा सकती है और इसमें निजी निवेशकों को भी आमंत्रित किया जा सकेगा।

देश में किसान परिवारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत को देखते हुए ऐसे किसान गिने-चुने ही हैं जो अपना कृषि उत्पाद मुनाफे की तलाश में दूर-दराज के इलाकों तक भेज पाते हों या जिनके पास इतने बड़े गोदाम हों जहाँ वो अपनी फसल का लम्बे समय तक भंडारण कर सकें। ज़ाहिर है इस संशोधन वाले कानून से केवल बड़े व्यापारियों और कंपनियों को ही फायदा होगा। जो खाद्य पदार्थों के बाजारों में गहराई तक पैठ रखते हैं और ये अपने मुनाफे के लिए खाद्य पदार्थों की जमाखोरी और परिवहन करके संसाधनविहीन बहुत सारे गरीब किसानों का नुकसान ही करेंगे।

2. कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य  (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020

1970 के दशक में, राज्य सरकारों ने किसानों के शोषण को रोकने और उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए ‘कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम’ (एपीएमसी एक्ट) लागू किया था। इस अधिनियम के तहत यह तय किया कि किसानों की उपज अनिवार्य रूप से केवल सरकारी मंडियों के परिसर में खुली नीलामी के माध्यम से ही बेची जाएगी। मंडी कमेटी खरीददारों, कमीशन एजेंटों और निजी व्यापारियों को लाइसेंस प्रदान कर व्यापार को नियंत्रित करती है। मंडी परिसर में कृषि उत्पादों के व्यापार की सुविधा प्रदान की जाती है; जैसे उपज की ग्रेडिंग, मापतौल और नीलामी बोली इत्यादि। सरकारी मंडियों या लाइसेंसधारी निजी मंडियों में होने वाले लेन-देन पर मंडी कमेटी टेक्स लगाती है। भारतीय खाद्य निगम (फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया-एफसीआई) द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कृषि उपज की खरीददारी सरकारी मंडियों के परिसर में ही होती है।

कृषि उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम 2020 के अनुसार कृषि व्यापार की यह अनिवार्यता कि मंडी परिसर में ही उपज बेचना जरूरी है खतम कर दी गई। नए कानून के मुताबिक किसान राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित मंडियों के बाहर अपनी कृषि उपज बेच सकता है। यह कानून कृषि उपज की खरीद-बिक्री के लिए नए व्यापार क्षेत्रों की बात करता है जैसे किसान का खेत, फैक्ट्री का परिसर, वेयर हॉउस का अहाता इत्यादी। इन व्यापार क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की भी बात की जा रही है। इससे किसानों को यह सुविधा मिलेगी कि वे कृषि उपज को स्थानीय बाजार के अलावा राज्य के अंदर और बाहर दूसरे बाज़ारों में भी बेच सकते हैं। इसके अलावा, इन नए व्यापार क्षेत्रों में लेन-देन पर राज्य अधिकारी किसी भी तरह का टेक्स नहीं लगा पाएंगे। यह कानून सरकारी मंडियों को बंद नहीं करता बल्कि उनके एकाधिकार को समाप्त करता है, सरकार का दावा है कि इससे कृषि उपज का व्यापार बढ़ेगा।

इस नियम का विरोध इसलिए भी किया जाना जरूरी है क्योंकि यह कानून संविधान में निहित राज्य सरकारों के अधिकार की अवमानना करता है। सत्तर के दशक में कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) को राज्य सरकार की विधानसभाओं ने बनाया था और अब इस नए कानून से कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) निरस्त हो गए हैं और केंद्र सरकार ने इन्हें निरस्त करते समय राज्य सरकार से बात करना भी जरूरी नहीं समझा। केंद्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह लिए बिना उन्हें कैसे खत्म कर सकती है? 2003 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार थी तो यह निर्णय लिया गया था कि निजी कंपनियों को मंडी परिसर के बाहर कृषि उपज खरीदने की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, केंद्र सरकार ने केवल एक मॉडल अधिनियम तैयार किया और उसके मुताबिक राज्य सरकारों को मंडी अधिनियम में संशोधन करने की सलाह दी। इसके विपरीत मोदी सरकार की एनडीए गवर्मेंट ने हर क्षेत्र में, हर मामले में संवैधानिक उल्लंघन करने का रिकॉर्ड बनाया है।

राज्य सरकारों के अधिकारों के हनन से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि किसान खुद इस कानून को किसान विरोधी और कॉरर्पोरेट समर्थक मानते हैं। वे जानते और मानते हैं कि इन सुधारों से उन्हें अपनी उपज के लिए उच्च मूल्य प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलेगा। इसके बजाय इन सुधारों से कॉरपोरेट्स को कृषि उपज की सीधी खरीद की सुविधा होगी, जिस पर किसी हद तक कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसी एक्ट) होने की वजह से राज्य सरकार का कुछ तो नियंत्रण था।

कॉरपोरेट घरानों और बड़े व्यापारियों को खरीद-फरोख्त की खुली छूट मिल जाने से वे उन जगहों से ही किसानों की उपज खरीदेंगे जहाँ लेन-देन के लिए कोई शुल्क या टैक्स नहीं लिया जाएगा। शुरुआत में कंपनियों द्वारा किसानों को लुभाने के लिए कुछ आकर्षक मूल्य के प्रस्ताव दिए जाएंगे लेकिन बाद में फसल के दामों पर पूरा नियंत्रण कंपनियों और व्यापारियों का हो जायेगा। इस नए कानून का यह दुष्परिणाम होगा कि सरकार द्वारा अधिसूचित मंडियों में लेन-देन कमतर होने से व्यापार कम होने लगेगा और अंततः धीरे-धीरे सरकारी मंडियों का विघटन होता जाएगा और साथ ही साथ एफसीआई द्वारा खरीद भी खत्म हो जाएगी। जिसका परिणाम यह होगा कि कृषि मंडियों पर सरकारी एकाधिकार के बजाय कॉरर्पोरेट का एकाधिकार होगा और किसान निजी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दया पर निर्भर हो जाएंगे। कृषि उपज के अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आते उतार-चढ़ाव और अनुचित व्यापार के परिणामों से देश के किसानों को बचने के लिए कोई बफर जोन नहीं होगी।

हालाँकि मोदी सरकार बार-बार आश्वासन दे रही है कि एफसीआई द्वारा कृषि उपज की खरीद जारी रहेगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा। किसानों को इस आश्वासन पर जरा भी भरोसा नहीं है, इस सरकार का रिकार्ड है कि पहले भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के बारे में कई वादे किए गए थे जिन्हें कभी पूरा नहीं किया गया। 2014 के अपने चुनावी घोषणापत्र में, भारतीय जनता पार्टी ने वादा किया था कि वह स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को लागू करेगी। इस घोषणा पत्र में किसानों को आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का वादा किया गया था। स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार उत्पादन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उत्पादन की सारी लागतों को शामिल किया जाये जैसे कि श्रम की लागत, जमीन की परोक्ष-अपरोक्ष लागत, मशीन की लागत इत्यादि। फिर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते वक्त इस कुल लागत पर पचास प्रतिशत कि बढ़ोतरी की जाये।

लेकिन जब चुनाव जीत लिया और सरकार बन गई तब 2015 में मोदी सरकार ने सर्वोच्च अदालत में एक हलफनामा दायर किया। इस हलफनामे में सरकार द्वारा कहा गया कि किसानों को आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दी ही नहीं जा सकती क्योंकि इससे पूरे बाजार में विकृति आ जाएगी। इसके बाद, कृषि मंत्री ने कहा कि उन्होंने आयोग द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने के लिए कभी कोई वादा नहीं किया था। 2018-19 में, वित्त मंत्री ने एक बयान दिया कि वो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के सुझावों को पहले ही लागू कर चुके हैं।

संक्षेप में, सरकार ने इस संबंध में सभी प्रकार के गैरजिम्मेदाराना बयान दिए हैं और यह अंतिम कदम वास्तव में किसानों को किसी भी प्रकार के समर्थन मूल्य देने की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश है। आखिरकार, इस तरह से सरकार द्वारा अपने आप को हर तरह की जिम्मेदारी से मुक्त कर लेना शायद प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए नारे “आत्म निर्भर” का अनुसरण है।

3. कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर करार (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 2020

इस अधिनियम का उद्देश्य अनुबंध या ठेका खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक संस्थागत ढांचा तैयार करना है। ठेका या अनुबंध खेती में वास्तविक उत्पादन होने से पहले किसान और खरीददार के बीच उपज की गुणवत्ता, उत्पादन की मात्रा एवं मूल्य के सम्बंध में अनुबंध किया जाता है। बाद में यदि किसान और खरीददार के बीच में कोई विवाद हो तो इस कानून में विवाद सुलझाने के प्रावधान शामिल हैं। सबसे पहले तो एक समाधान बोर्ड बनाया जाये जो कि विवाद को सुलझाने का पहला प्रयास हो। यदि समाधान बोर्ड विवाद न सुलझा सके तो आगे इस विवाद को सबडिविजनल अधिकारी और अंत में अपील के लिए कलेक्टर के सामने ले जाया जा सकता है लेकिन विवाद को लेकर अदालत में जाने का प्रावधान नहीं है। विधेयक विवाद सुलझाने की बात तो करता है लेकिन इसमें खरीद के अनुबंधित मूल्य किस आधार पर तय होंगे इसका कोई संकेत नहीं है। एक बड़ी कम्पनी तरह-तरह के दबाव बनाकर छोटे किसान से कम से कम मूल्य पर अनुबंध कर सकती है। और चूँकि कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य को आधार नहीं बनाते हुए आस-पास की सरकारी या निजी मंडियों के समतुल्य मूल्य देने की बात की है, इसलिए जरूरी नहीं कि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य हासिल हो। कानून की भाषा की पेचीदगियों से किसान को गफलत में डालकर कंपनियां अपने मुनाफे को सुनिश्चित करने वाला मूल्य अनुबंध में शामिल करवाएंगी।

नवउदारवादी नीतियों के चलते पंजाब और हरियाणा में कई किसानों ने पेप्सीको और अन्य बड़ी कम्पनियों के साथ अनुबंध या ठेका खेती की है। ठेका खेती करने के बाद अनेक किसानों के अनुभव कड़वे रहे हैं। किसान बहुत सावधानीपूर्वक ठेका खेती के अनुबंधों के अनुसार काम करता है और कंपनियां खेत में खड़ी उपज को लेने से इंकार कर देती हैं। अनेक बार कम्पनियों द्वारा किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया जाता है। अनुबंध होने के बावजूद किसान कंपनियों से लड़ने में सक्षम नहीं होता है क्योंकि अधिकांश किसानों के संसाधन कंपनियों कि तुलना में बहुत कम होते हैं। यदि विवाद हो तो उसे इस कानून के तहत सुलझाने की प्रक्रिया तो बताई गई है लेकिन इससे इस बात की कोई गारंटी नहीं कि किसान को न्याय मिलेगा ही। कंपनियों के पास वकीलों कि पूरी फौज होती है जबकि किसान कोर्ट-कचहरी के घुमावदार, पेचीदा चक्करों में बहुत लम्बे समय तक उलझा नहीं रह सकता। ठेका खेती को एक संस्थागत वैधानिक रूप देने से केवल वही किसान नहीं प्रभावित होंगे जो कॉन्ट्रेक्ट खेती कर रहे हैं, बल्कि ठेका खेती समूचे खेती के परिदृश्य को बदल देगी।

हाल में गुजरात में पेप्सीको कम्पनी ने कुछ ऐसे आलू उत्पादक किसानों से मुआवज़े कि मांग की जिन्होंने पेप्सीको के साथ खेती का कोई अनुबंध नहीं किया था। पेप्सीको का इन किसानों पर यह आरोप था कि बिना अनुबंध किये यह किसान आलू की वही किस्म उगा रहे थे जो पेप्सीको कम्पनी अनुबंध करके किसानों से उगवाती है और जिससे ले’ज़ ब्रांड के चिप्स बनते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसी खास उत्पाद के लिए अगर कंपनियां किसानों के साथ ठेका खेती का अनुबंध करती हैं तो वे उस फसल के बीज पर भी अपना कॉपीराइट का अधिकार जताती हैं जो बीज उन्होंने किसान को दिया होता है। यानि जो किसान कंपनियों के साथ खेती का अनुबंध नहीं करेंगे वे कम्पनी के बीज की किस्म को उगा भी नहीं सकेंगे।

इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि भारत की खेती के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश और निर्यात बाज़ारों पर अधिक निर्भरता देश की खेती में फसलों के चयन को बदल देगी। इससे हमारी खेती की पूरी व्यवस्था को बुरी तरह क्षति पहुंचेगी। जिस तरह गुलामी के दौर में हमारे किसान अपनी ज़मीन पर वह फसल उगाने के लिए स्वतंत्र नहीं थे जो वे उगाना चाहते थे या जो उनकी जरूरत थी, बल्कि उन्हें अंग्रेजों के डर से वह उगाना होता था जिसमें अंग्रेजों को फायदा था और जो अंग्रेजों की जरूरत थी। सन 1917 में चम्पारण में गांधीजी ने अंग्रेजों द्वारा करवाई जा रही नील की जबरिया खेती के खिलाफ अपना पहला सत्याग्रह किया था। तब में और अब में फर्क इतना ही है कि अब यही काम डंडे, बूटों और हंटर के बजाए ऊंची कीमत के लालच और मुनाफे की राजनीति के द्वारा किया जा रहा है और हमारे किसान फिर से अपनी जरूरत की फसल चुनने के अधिकार से वंचित किये जा रहे हैं।

Attitude of imperialist countries to agricultural trade

साम्राज्यवादी देशों का कृषि व्यापार में यह रवैया अनेक दशकों से रहा है। उष्णकटिबंधीय देशों यानि गर्म जलवायु वाले देशों में विभिन्न प्रकार के फलों, सब्जियों, फूल, मसाले और ऐसे अनेक कृषि उत्पाद उगाये जा सकते हैं जो यूरोप और अमेरिका के ठंडी और मध्यम या समशीतोष्ण जलवायु वाले देशों में नहीं उगाए जा सकते हैं। साम्राज्यवादी व्यवस्था यह चाहती है कि उष्णकटिबंधीय देश अपनी खेती में उन कृषि उत्पादों की पैदावार करें जिनकी जरूरत विदेशों में है और इसके बदले में वे विकसित देशों में भारी मात्रा में उत्पादित होने वाले खाद्यान्न का आयात कर लें। बहुराष्ट्रीय कंपनियां और आयात-निर्यात बाजार किसानों को खाद्यान्न उत्पादन को छोड़ देने और अपनी खेती को विकसित देशों के मुताबिक ढालने के लिए बहुत से लुभावने और आकर्षक प्रस्ताव दे सकते हैं। अफ्रीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी देशों ने ऐसा ही किया है और वहाँ की बड़ी आबादी की खाद्य सुरक्षा गंभीर खतरे में पड़ गई है। मौजूदा बदलावों को देखते हुए लगता है कि भारत भी अफ्रीका के रास्ते पर ही आगे बढ़ेगा और ऐसा करने में भारतीय राज्य का सक्रिय समर्थन है।

उम्मीद जगाते संघर्ष

यह कानून उन बड़े बदलावों का एक हिस्सा हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था को साम्राज्यवादी देशों की गुलाम अर्थव्यवस्था बनाने के लिए किये जा रहे हैं। हम नवउदारवाद के दौर में अपनी ही चुनी गई सरकारों द्वारा अपने ही देश के सार्वजानिक उद्यमों को निजी हाथों में औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों को बेचा जाता देख रहे हैं। हाल ही में अनेक नए श्रम कानूनों को चार कोड के भीतर समेटकर उन्हें इस तरह बदल दिया गया है कि मालिकों को मजदूरों और कर्मचारियों के शोषण की और ज्यादा कानूनी आज़ादी हासिल हो जाये। यह तीन कृषि कानून भी उन व्यापक बदलावों का ही एक हिस्सा हैं जहाँ जनता द्वारा चुनी गई सरकार देशी-विदेशी महाकाय कंपनियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए अपने मजदूरों और किसानों की मेहनत को, उनकी आजीविका को और उनके जीवन को गिरवी रख रही है। किसानों का पिछले कई दिनों से दिल्ली घेराव का आंदोलन इन नीतियों के प्रतिरोध की एक पुरजोर कोशिश है और आने वाले वक्त में प्रतिरोध की ऐसी बहुत सी जोरदार कोशिशें उभरेंगी और शोषितों के अलग-अलग तबकों का सामूहिक प्रतिरोध एक दिन शोषण की व्यवस्था को खत्म कर एक नई व्यवस्था कायम करेगा।

जया मेहता

अर्थशास्त्री, इंदौर, मध्यप्रदेश

शर्मनाक ज़ुबांबंदी का प्रतीक है उच्च सदन का म्यूट हो जाना

Parliament of India

Mutation of the Upper House is a sign to be silent

The suspension of eight members from the Rajya Sabha is also illegal.

मीडिया की एक खबर के अनुसार, सभापति राज्यसभा द्वारा किया गया राज्यसभा से आठ सदस्यों का निलंबन भी अवैधानिक है, क्योंकि जिन्हें निलंबित किया गया है उनका पक्ष तो सुना ही नहीं गया। उन्हें अनुशासनहीनता का नोटिस (Indiscipline notice) दिया जाना चाहिए थी। सांसद और सभापति के बीच, ब्यूरोक्रेटिक तंत्र के अफसर मातहत टाइप रिश्ता नहीं होता कि जब अफसर को बाई चढ़ी उसने स्टेनो बुलाया और निलंबन आदेश टाइप करा कर दस्तखत कर दिया।

Announced the motion of no confidence against the Deputy Chairman

कल जब विपक्षी सांसदों ने उप सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की, तो उस पर जब सदन में बहस होती तो कई चीजें साफ होती। सत्तापक्ष भी एक्सपोज होता और विपक्ष के खिलाफ में काफी कुछ कहा जाता। इस फजीहत से बचने के लिये सभापति ने आनन-फानन में सांसदों का निलंबन आदेश जारी कर दिया और मानसून सत्र के शेष दिनों के लिये 8 सदस्यों को निलंबित कर दिया।

देखा जाय तो, अब सरकार को सदन की ज़रूरत भी नहीं है। बिल तो उसने जैसे-तैसे दबाव देकर पास करा ही लिया।

उच्च सदन का म्यूट हो जाना नोटबंदी, व्यापारबंदी, और तालाबंदी के बाद ज़ुबांबंदी का एक प्रतीक है। सदन की कार्यवाही को कवर करने वाले और लोकसभा टीवी, राज्यसभा टीवी (Lok Sabha TV, Rajya Sabha TV) से जुड़े कुछ पूर्व सम्पादक और पत्रकारों का कहना है कि यह म्यूट करने की तकनीक या म्यूट बटन, केवल उपसभापति के पास रहती है। या तो वे खुद यह बटन दबा कर ज़ुबांबंदी कर दें या उनके निर्देश पर कोई और सदन की आवाज़ें खामोश कर दे।

मैं कल राज्यसभा टीवी पर इस बिल पर चल रही बहस की कार्यवाही देख रहा था कि अचानक आवाज़ आनी बंद हो गयी।  लोग हंगामा करते दिख रहे थे, सदन के वेल में उत्तेजित होकर घूमते दिख रहे थे, उपसभापति अपने स्टाफ या न जाने किससे कुछ मशविरा करते दिख रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।

मुझे लगा कि, कहीं मेरा ही रिमोट तो नहीं दब गया है। पर वह ठीक था। टीवी दोबारा ऑफ कर के ऑन किया पर सदन की गतिविधियां जारी थीं, पर आवाज़ म्यूट थी। बाद में पता चला कि यह जानबूझकर म्यूट किया गया था।

अब इससे यह नहीं पता चल रहा है कि कौन क्या और किसे कह रहा था। फिर सदन स्थगित हो जाता है। थोड़ी देर बाद सदन पुनः शुरू होता है। फिर एक-एक कर के उपसभापति, बिल के एक एक संशोधनों को पढ़ते जाते हैं और उसी पर यस और नो यानी हुंकारी और नहीं दुहराते जाते हैं। बिल्कुल सत्यनारायण बाबा की कथा की तरह वे धाराप्रवाह पढ़ते जाते हैं, और फिर अंत में बिल पास हो गया, कह कर पीछे पतली गली से अदृश्य हो जाते हैं।

एक कानून विधिनिर्माताओं ने बना दिया और अब इस पर राष्ट्रपति के दस्तखत होने हैं, जो औपचारिकता भी है और नहीं भी। अगर राष्ट्रपति विवेक से देखते हैं तो वे कुछ आपत्ति के साथ या अनापत्ति के साथ उसे संसद को लौटा सकते हैं। पर ऐसा बहुत कम होता है।

हमारे यहां बाथरूम में बैठ कर कानूनों पर दस्तखत करने की आज्ञापालक परंपरा रही है, और हम सब हज़ारों साल की परंपरा निभाने में सदैव गर्व का अनुभव करते हैं, तो यही परंपरा अब भी बाकी है।

राज्यसभा के सांसदों का कहना है कि, जब पहले से सदन को एक बजे तक चलाने की बात तय थी तो, उसे क्यों बढ़ाया गया ?

मत विभाजन की मांग होने पर, उपसभापति ने मत विभाजन क्यों नहीं कराया ?

एक भी सदस्य अगर मतविभाजन की मांग करता है तो मतविभाजन कराया जाना चाहिए।

ध्वनिमत भी बिल पर वोट लेने का एक उपाय है। अगर ट्रेजरी बेंच यानी सरकार एक आरामदायक बहुमत में रहती तो इस उपाय पर किसी को आपत्ति नहीं होती। लेकिन सरकार राज्यसभा में अल्पमत में है और इस बिल पर उसे अकाली दल का भी साथ नहीं था और हो सकता था अन्य दल भी, घोषित विपक्ष के अतिरिक्त इस बिल के विरोध में जाते, तो यह बिल गिर जाता और यह कानून अध्यादेशों की शक्ल में, अगर छह माह तक पास नहीं होता तो ही बना रहता और उसके बाद स्वतः निष्प्रभावी हो जाता।

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

अभद्रता और विधिविहीनता कहीं भी हो, वह निंदनीय है, सदन में कुछ सांसदों द्वारा की गयी अभद्रता भी अवांछित, अनापेक्षित और निंदनीय है। सदन खुद ही ऐसी कार्यवाहियों पर अंकुश लगाने और ऐसे सांसदों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिये सक्षम है। लेकिन इस अभद्रता और विधिविहीनता की आपदा के बीच तुरन्त एक अवसर की तलाश कर के, अविधिक रूप से यह विधेयक पारित करा लेना भी तो निंदनीय ही कहा जायेगा। बल्कि यह अधिक शर्मनाक है, क्योंकि यह कृत्य उसके द्वारा किया गया है जिसके ऊपर सदन को सदन की रुलबुक के अनुसार चलाने का दायित्व है।

सरकार को भी यह पता था, और उपसभापति भी इस दांव पेंच से अनजान नहीं थे। इसलिए उन्होंने यह जिम्मा खुद ओढ़ा और बेहद फूहड़ तऱीके से समस्त संसदीय मर्यादाओं को ताख पर रखते हुए, इस बिल को ध्वनिमत से पास घोषित कर दिया और फिर जो काम उन्हें सौंपा गया था उसे पूरा किया।

सच तो यह है कि अगर विधेयकों के पारित कराने की संवैधानिक बाध्यता नहीं रहती और छह महीने से अधिक दो अधिवेशनों में अंतराल, संवैधानिक रूप रखा जाना आवश्यक नहीं होता तो सरकार कभी संसद ही नहीं बुलाती। पर यह संवैधानिक अपरिहार्यतायें हैं कि सरकार को सदन बुलाना पड़ता है।

विजय शंकर सिंह

( लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारी हैं। )

युवा संसद कर उठाई मांग रोजगार बने मौलिक अधिकार

Roagar Adhikar Diwas

संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आयोजित हुए प्रतिवाद कार्यक्रम

इलाहाबाद में बालसन चौराहे पर युवा मंच द्वारा हुए जबरदस्त प्रदर्शन में अनिल सिंह समेत 10 गिरफ्तार

Counter-notification programs held on the first day of the monsoon session of Parliament

10 arrested, including Anil Singh, in a tremendous demonstration by Yuva Manch at Balsan Crossroads in Allahabad

लखनऊ, 14 सितंबर 2020, मानसून सत्र के पहले दिन आज युवा मंच और युवा हल्ला बोल की तरफ से रोजगार बने मौलिक अधिकार नारे पर वर्चुअल युवा संसद आयोजित की गई जिसका फेसबुक पर लाइव प्रसारण किया गया. इसमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,  उड़ीसा, दिल्ली, बिहार,  झारखंड के युवा संगठनों के प्रतिनिधि और आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष  समेत रोजगार खोने से  पीड़ित महिलाओं, बुनकरों, ग्रामीण गरीबों, प्रवासी मजदूरों  ने अपनी बातचीत रखी.  संसद में 17 सितम्बर को प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर रोजगार के अधिकार के लिए कार्यक्रम करने और सभी राजनीतिक दलों से इस सत्र में प्रस्ताव लाने की मांग करने का फैसला हुआ.

वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, आगरा, सोनभद्र, आजमगढ़, गाजीपुर, जौनपुर, बांदा, शामली, सीतापुर, चंदौली, लखनऊ, मऊ, मिर्जापुर, आजमगढ आदि जनपदों में युवा मंच के बैनर तले प्रदर्शन आयोजित हुए. जिसमें रोजगार व विकास की गारंटी करो, सीमा विवाद हल करो, खाली 24 लाख से ज्यादा पदों को भरने, उत्तर प्रदेश में नौकरी के पहले 5 साल संविदा का योगी सरकार का फरमान खत्म करने, बेकारी भत्ता देने, लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बंद करने जैसे सवालों पर आवाज बुलंद की गई।

इलाहाबाद के बालसन चौराहे पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन में 500 से ज्यादा छात्र युवा थे जिसमें युवा मंच के अध्यक्ष अनिल सिंह, अमरेंद्र सिंह बाहुबली, शशि धर यादव, अरविंद सिंह, राहुल कुमार पटेल, बलराम सिंह, कुलदीप कुमार, शोभित सिंह आदि को गिरफ्तार किया गया.

कार्यक्रमों का युवा हल्ला बोल के अनुपम, आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एन. साईबाला, युवा मंच संयोजक राजेश सचान, वर्कर्स फ्रंट अध्यक्ष दिनकर कपूर, अटेवा अध्यक्ष विजय बंधु, मधुसूदन शेट्टी, गोविन्द मिश्रा, आलोक राजभर, रूबी सिंह गोंड़,  प्रीती श्रीवास्तव, नागेश गौतम, पूजा पांडेय, महनिश, स्नेहा राय, इकबाल अंसारी, गौरव सिंह, योगीराज सिंह पटेल, डा अरविंद मिश्रा, रवि प्रकाश, सूरज कोल, जितेंद्र गुप्ता, रजनी राणा, विनोद कुमार, आलोक यादव, प्रशांत कुमार पाल,जगत कुमार वर्मा, शशीधर यादव ,विनोद कुमार सिंह आदि लोगों ने नेतृत्व किया.

संसद के मानसून सत्र के पहले दिन होगी वर्चुअल युवा संसद. रोजगार बने मौलिक अधिकार का उठेगा सवाल

Parliament of India

Virtual Youth Parliament will be held on the first day of the monsoon session of Parliament. The question of fundamental right to employment will arise

लखनऊ, 12 सितम्बर, 2020: रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने के सवाल पर देशभर के छात्र युवा संगठन मानसून सत्र के पहले दिन 14 सितंबर को वर्चुअल युवा संसद आयोजित करेंगे. इनमें युवा हल्ला बोल, युवा मंच, आइसा, इंकलाबी नौजवान सभा, डीवाईएफआई, युवा शक्ति संगठन, नौजवान सभा, प्रतियोगी छात्रों के संगठन समेत रोजगार जाने से पीड़ित 181 वूमेन हेल्पलाइन, महिला समाख्या, स्कीम वर्कर आंगनबाड़ी, आशा, शिक्षामित्र, बुनकरों के संगठनों के प्रतिनिधि व छात्र संघों के पदाधिकारी भी  शिरकत करेंगे. इसके अलावा मनरेगा, प्रवासी मजदूरों, आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर संघर्षरत युवा भी अपनी बात रखेंगे.

यह जानकारी  युवा हल्ला बोल के संयोजक अनुपम व युवा मंच के संयोजक राजेश सचान ने प्रेस को जारी अपने बयान में दी है.

युवा नेताओं ने बताया कि इस दिन रोजगार के सवाल पर राष्ट्रीय स्तर रोजगार अधिकार दिवस मनाया जाएगा और देशभर में सोशल डिस्टेंशिंग का पालन करते हुए प्रतिवाद कार्यक्रम भी होंगे और हैशटैग #रोजगार_बने_मौलिक_अधिकार के तहत ट्विटर व फेसबुक आदि सोशल मीडिया में कैंपेन चलाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय कार्यक्रम द्वारा मौजूदा रोजगार के संकट के दौर में संसद में रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने के लिए देश के राजनीतिक दलों से अपील की जायेगी और कहा जायेगा इस सत्र में इस पर प्रस्ताव लाया जाए. तात्कालिक तौर पर संसद में कानूनी प्रावधान कर देश भर में खाली 24 लाख पदों को भरा जाये, रोजगार सृजन के लिए ठोस कदम उठाये जायें और बेरोजगारों को जीवननिर्वाह के लिए बेकारी भत्ता दिया जाये।

संसद सत्र के पहले दिन ही 14 सितम्बर को पूरे देश में किसान करेंगे प्रदर्शन

Parliament of India

On the first day of the Parliament session on September 14, farmers will demonstrate across the country

रायपुर, 11 सितंबर 2020. अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर अपनी लंबित मांगों को लेकर पूरे देश में किसान संसद सत्र के पहले दिन ही 14 सितम्बर को देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे। छत्तीसगढ़ में ये प्रदर्शन कोविड-19 के प्रोटोकॉल और फिजिकल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए हर गांव में आयोजित किये जायेंगे।

दिल्ली में समन्वय समिति से जुड़े संगठन एक विशाल धरना का आयोजन करेंगे।

 यह जानकारी समन्वय समिति से जुड़े विजय भाई और छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते ने आज दी।

उन्होंने बताया कि इस देशव्यापी किसान प्रदर्शनों के जरिये केंद्र सरकार से कृषि विरोधी अध्यादेशों और पर्यावरण आंकलन मसौदे को वापस लेने, कोरोना संकट के मद्देनजर ग्रामीण गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न और नगद राशि से मदद करने, मनरेगा में 200 दिन काम और 600 रुपये रोजी देने, व्यावसायिक खनन के लिए प्रदेश के कोल ब्लॉकों की नीलामी और नगरनार स्टील प्लांट का निजीकरण रद्द करने, किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी-2 लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में देने और उन्हें बैंकिंग तथा साहूकारी कर्ज़ के जंजाल से मुक्त करने, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों को जल-जंगल-जमीन का अधिकार देने के लिए पेसा कानून का क्रियान्वयन करने की मांग की जाएगी।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में इन मुद्दों पर किसानों और आदिवासियों के बीच काम करने वाले 25 संगठन एक साथ आये हैं।

इन संगठनों में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, राजनांदगांव जिला किसान संघ, छग प्रगतिशील किसान संगठन, दलित-आदिवासी मंच, क्रांतिकारी किसान सभा, छग किसान-मजदूर महासंघ, छग प्रदेश किसान सभा, जनजाति अधिकार मंच, छग किसान महासभा, छमुमो (मजदूर कार्यकर्ता समिति), किसान महापंचायत, परलकोट किसान संघ, अखिल भारतीय किसान-खेत मजदूर संगठन, वनाधिकार संघर्ष समिति, धमतरी व आंचलिक किसान सभा, सरिया आदि संगठन प्रमुख हैं। अपने प्रदर्शनों के जरिये ये संगठन राज्य की कांग्रेस सरकार से भी सभी किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया खाद उपलब्ध कराने, बोधघाट परियोजना को वापस लेने, हसदेव क्षेत्र में किसानों की जमीन अवैध तरीके से हड़पने वाले अडानी की पर्यावरण स्वीकृति रद्द करने और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, पंजीकृत किसानों के धान के रकबे में कटौती बंद करने, सभी बीपीएल परिवारों को केंद्र द्वारा आबंटित प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज वितरित करने, वनाधिकार दावों की पावती देने, हर प्रवासी मजदूर को अलग मनरेगा कार्ड देकर रोजगार देने और भू-राजस्व संहिता में कॉर्पोरेटपरस्त बदलाव न करने की भी मांग करेंगे।

इन संगठनों से जुड़े किसान नेताओं ने अध्यादेशों के जरिये कृषि कानूनों में किये गए परिवर्तनों को किसान विरोधी बताते हुए कहा कि इससे फसल के दाम घट जाएंगे, खेती की लागत महंगी होगी और बीज और खाद्य सुरक्षा के लिए सरकारी हस्तक्षेप की संभावना भी समाप्त हो जाएगी। ये परिवर्तन पूरी तरह कॉर्पोरेट सेक्टर को बढ़ावा देते हैं और उनके द्वारा खाद्यान्न आपूर्ति पर नियंत्रण से जमाखोरी व कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि किसानों को “वन नेशन, वन एमएसपी” चाहिए, न कि वन मार्केट!

The country is stuck in a severe economic downturn today due to the corporate policies of the Modi government.

इन संगठनों का मानना है कि मोदी सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के कारण देश आज गंभीर आर्थिक मंदी में फंस गया है। इस मंदी से निकलने का एकमात्र रास्ता यही है कि आम जनता की जेब मे पैसे डालकर और मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध करवाकर उसकी क्रय शक्ति बढ़ाई जाए, ताकि बाजार में मांग पैदा हो और उद्योग-धंधों को गति मिले। लेकिन इसके बजाय केंद्र सरकार इस आर्थिक संकट का बोझ आम जनता पर ही लाद रही है और आम जनता के सामने अपनी आजीविका और जिंदा रहने की समस्या पैदा हो गई है। इसलिए ये सभी किसान संगठन केंद्र सरकार से किसानों और प्रवासी मजदूरों की रोजी-रोटी, उनकी आजीविका और लॉक डाऊन में उनको हुए नुकसान की भरपाई की मांग कर रही है। इन संगठनों ने राज्य सरकार से भी आदिवासियों और ग्रामीणों के हाथों से उनकी जमीन छीनने वाली नीतियों पर रोक लगाने की मांग की है और भू-राजस्व संहिता में आदिवासीविरोधी संशोधनों की  खिलाफत की है।

#रोजगारबनेमौलिक_अधिकार पर 14 सितम्बर के कार्यक्रम के लिए हुई देशभर के छात्र युवा संगठनों की बैठक

National News

Meeting of student youth organizations across the country for the September 14 program on Employment should be a fundamental right

लखनऊ, 10 सितंबर 2020. आज युवा मंच द्वारा 14 सितंबर को शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र (Monsoon session of parliament) के दौरान रोजगार बने मौलिक अधिकार (Employment should be a fundamental right) नारे पर आयोजित वर्चुअल बैठक में युवा हल्ला बोल, आइसा, जन जागरण अभियान, बात अधिकार की, युवा शक्ति संगठन, भारत नौजवान सभा, किसान परिवार, राष्ट्रीय विद्यार्थी चेतना परिषद, इंकलाबी छात्र मोर्चा, विद्यार्थी युवजन सभा,निजीकरण व बेरोजगारी विरोधी संगठन समेत देशभर के विभिन्न छात्र, युवा, प्रतियोगी छात्र संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए,

बैठक में सबने सर्वसम्मति से यह तय किया कि रोजगार के सवाल पर संसद के मानसून सत्र के पहले दिन राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा प्रतिवाद आयोजित किया जाएगा और इस दिन सोशल मीडिया समेत प्रतिवाद के विभिन्न स्वरूपों को लिया जाए. इस दिन युवाओं की मांगों पर ईमेल, ट्विटर, फेसबुक, वाट्सएप द्बारा अपने क्षेत्र के सांसदों व प्रधानमंत्री को पत्रक भेज रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग उठाने के लिए दबाव बनाया जायेगा. यह भी तय हुआ कि यदि संभव हो तो उस दिन रोजगार के सवाल पर वर्चुअल छात्र युवा संसद भी आयोजित की जाए जिसका फेसबुक लाइव भी चलाया जाए.

बैठक में युवा हल्ला बोल व अन्य संगठनों द्वारा 17  सितंबर को रोजगार के सवाल पर आयोजित कार्यक्रम व इस दौरान होने वाले अन्य कार्यक्रमों में भी सक्रिय रुप से हिस्सेदारी का निर्णय लिया गया. बैठक में यह सहमति बनी कि निम्नलिखित मांगों को सत्र के दौरान विभिन्न रूपों में उठाया जाएगा.

#रोजगारबनेमौलिक_अधिकार पर होने वाले कार्यक्रम की मांगे इस प्रकार हैं –

  • 24 लाख रिक्त पदों पर भर्ती के लिए !
  • निशुल्क, समयबद्ध, पारदर्शी भर्ती के लिए !
  • शिक्षा व स्वास्थ्य के अधिकार के लिए !
  • काले कानूनों के खात्मे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए !
  • हर बेरोजगार को बेकारी भत्ता के लिए!
  • मानदेय, अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण और सम्मानजनक वेतन के लिए!
  • कुटीर, लघु व कृषि आधारित उद्योगों के विकास लिए!
  • प्राकृतिक संसाधनों व सार्वजनिक उद्योगों की रक्षा के लिए!
  • रोजगार सृजन व संसाधन जुटाने हेतु कारपोरेट पर टैक्स के लिए !
  • कृषि- सहकारी खेती के विकास के लिए!
  • मनरेगा में सालभर काम व ₹500 मजदूरी के लिए!
  • शहरी रोजगार गारंटी कानून के लिए!
  • नई पेंशन स्कीम के खात्मे के लिए!

बैठक में मुख्य रूप से युवा हल्ला बोल के साथी गोविंद मिश्रा, आइसा के सोनू यादव, जन जागरण अभियान उड़ीसा के साथी मधुसूदन शेट्टी, बिहार के  हितेश, बात अधिकार की से दिल्ली से रियासत फैज, युवा शक्ति संगठन के गौरव सिंह, भारत नौजवान सभा के अंबुज मलिक, राष्ट्रीय विद्यार्थी चेतना परिषद के मनोज यादव, किसान परिवार के अंशुल उमराव, इंकलाबी छात्र मोर्चा रामचंद्र, विद्यार्थी युवजन सभा के शैलेश मौर्य, युवा मंच के अनिल सिंह, सोनभद्र से जितेंद्र धांगर, वाराणसी से योगीराज सिंह, आजमगढ़ से जयप्रकाश यादव, आगरा से आराम सिंह गुर्जर, पवन पाल, त्रिभुवन नाथ, विनोवर शर्मा, जेपी कुशवाहा, सुरेंद्र पांडेय, आकृति यादव, आकाश सिंह राठौर, हजारीबाग विश्वविद्यालय में शोध छात्र अनुराग वर्मा, आलोक राजभर आदि ने अपनी बात रखी.

संचालन युवा मंच संयोजक राजेश सचान ने किया.

प्रश्नकाल की अवहेलना संसदीय प्रजातंत्र के मूल चरित्र की अवहेलना है

Parliament of India

The violation of the Question Hour is a violation of the basic character of parliamentary democracy.

प्रश्नोत्तर काल (Question Hour) संसदीय व्यवस्था की आत्मा (Soul of parliamentary system) होता है। प्रश्न पूछकर सांसद या विधायक सच पूछा जाए तो सरकार की मदद करते हैं।

The Q&A period was suspended during the Emergency as well.

आपातकाल के दौरान भी प्रश्नोत्तर काल सस्पेंड कर दिया गया था। सरकार के इस निर्णय के बाद हम सब पत्रकार तत्कालीन मुख्य सचिव श्री एस. सी. वर्मा से मिले थे। उन्होंने आपाताकाल के दौरान लिए गए दो खतरनाक निर्णयों पर गंभीर चिंता प्रगट की थी। पहला निर्णय था विधानसभा के प्रश्नोत्तर काल का सस्पेंशन और दूसरा समाचारों पर सेंसर।

उनका कहना था कि विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर एकत्रित करने के लिए बड़ी कवायद करनी होती है। इस कवायद के दौरान अन्य ऐसी जानकारियां भी मिल जाती हैं जिनसे आम आदमियों की समस्याओं का निराकरण हो जाता है।

इसी तरह समाचार पत्रों में प्रकशित समाचारों से मुझे दूरदराज की जगहों पर क्या हो रहा है इसका पता चल जाता है। उस समय सभी विपक्षी पार्टियों ने सरकार के इन दोनों निर्णयों की कड़ी आलोचना की थी। आलोचना करने वालों में भारतीय जनता पार्टी की पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ भी थी। आज भारतीय जनता पार्टी स्वयं वही कर रही है जिसकी उसने आलोचना की थी।

दुनिया की सबसे प्राचीन संसद ब्रिटेन की है। वहां की संसद का निचला सदन हाउस ऑफ़ कामन्स कहलाता है। इतिहास बताता है कि ब्रिटेन के लंबे संसदीय इतिहास में प्रश्नोत्तर काल केवल एक बार ही सस्पेन्ड हुआ है जो इसलिए सस्पेन्ड हुआ था क्योंकि उस दिन वहां के संसद भवन पर बम गिरने की संभावना थी।

Question Hour is the most important proceedings of the House

यद्यपि प्रश्नकाल सदन की सबसे महत्वपूर्ण कार्यवाही है इसके बावजूद कुछ अवसरों पर स्वयं विपक्षी सदस्य प्रश्नकाल को सस्पेन्ड करने की मांग करते हैं। ऐसी मांग वे इसलिए करते हैं ताकि वे एक अत्यधिक महत्वपूर्ण मुद्दा उठा सकें। इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि यदि विधायक मंत्री से कोई फेवर चाहते हैं और मंत्री उन्हें घास नहीं डालते तो विधायक कोई ऐसा प्रश्न पूछने का प्रयास करते हैं जिससे मंत्री महोदय की प्रतिष्ठा पर आंच आए।

मध्यप्रदेश विधानसभा के एक ऐसे अध्यक्ष थे जो किसी मंत्री पर दबाव बनाने के लिए किसी विधायक से एक विवादग्रस्त मुद्दा उठवाते थे। इन सब कमियों के बावजूद प्रश्न पूछना सांसदों या विधायकों के हाथ में एक जबरदस्त हथियार है जिसका उपयोग वे जनहित में कर सकते हैं।

क्या प्रश्नकाल सस्पेंड किया जा सकता है | Can the question hour be suspended

कभी-कभी सभी की सहमति से प्रश्नकाल सस्पेंड किया जाता है। जैसे सन् 1962 में चीनी आक्रमण के समय और आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र आदि।

हमारे प्रदेश की विधानसभा के अनेक ऐसे सदस्य रहे हैं जिन्हें प्रश्न पूछने की कला पर जबरदस्त पकड़ थी। ऐसे कुछ विधायक मुझे बरबस याद आ रहे हैं। इस तरह के विधायकों में सबसे पहले मोतीलाल वोरा याद आते हैं।

वोराजी सुबह जल्दी उठकर उस स्थान पर पहुंच जाते थे जहां हाकर उनके हिस्से के समाचार पत्र एकत्रित करते थे। उस समय वह स्थान न्यू मार्केट के काफी हाउस के सामने था। वोराजी समाचार पत्र खरीदकर उनमें छपी महत्वपूर्ण खबरों के आधार पर हाथ से लिखकर प्रश्न विधानसभा सचिवालय में पहुंचा देते थे।

इस तरह वे लगभग प्रतिदिन विधानसभा की कार्यवाही पर छाए रहते थे। ऐसे अन्य विधायक बाबूलाल गौर, लक्ष्मीकांत शर्मा और बसंतराव उईके थे। प्रक्रिया के नियमों के अनुसार तारांकित प्रश्न पर पूरक प्रश्न (Supplementary Questions on Starred Questions) पूछे जा सकते हैं। ऐसे में कभी-कभी ऐसा होता था कि एक ही प्रश्न पर इतने पूरक प्रश्न पूछे जाते थे कि प्रश्नकाल का पूरा समय एक ही प्रश्न  पूरक प्रश्नों में निकल जाता था।

एल. एस. हरदेनिया। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जहां प्रश्न पूछना एक कला है वहीं प्रश्न का जवाब देना मंत्री की क्षमता को मापने का आधार है। विशेषकर पूरक प्रश्न के उत्तर से मंत्री की उत्तर देने की क्षमता प्रदर्शित होती है। एक दिन बसंतराव उईके एक प्रश्न के उत्तर में इतनी जानकारी लेकर आए थे कि विधायकों ने कहा कि बस इससे ज्यादा जानकारी नहीं चाहिए। ऐसे ही एक मंत्री बाबू तख्तमल जैन थे।

कभी-कभी प्रश्न काल के दौरान ऐसा विवाद हो जाता है कि सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है।

On the lines of the House of Commons, Digvijay Singh also started the Chief Minister’s Question Hour.  

यहां एक बात का और उल्लेख करना चाहूंगा। ब्रिटेन में सप्ताह में एक दिन ऐसा होता है जिस दिन सिर्फ प्रधानमंत्री से प्रश्न पूछे जाते हैं। उसे प्राईम मिनिस्टर क्वेश्चन ऑवर कहते हैं। हाउस ऑफ़ कामन्स की तर्ज पर दिग्विजय सिंह ने भी मुख्यमंत्री प्रश्नकाल प्रारंभ किया था

कुल मिलाकर प्रश्नकाल की अवहेलना संसदीय प्रजातंत्र के मूल चरित्र की अवहेलना है।

एल. एस. हरदेनिया

मोदी प्रधानमंत्री की तरह बर्ताव नहीं करते, संसद में हमें बोलने की इजाजत नहीं दी जा रही – राहुल

Rahul Gandhi at Bharat Bachao Rally

Modi does not behave like Prime Minister, we are not being allowed to speak in Parliament – Rahul

नई दिल्ली, 07 फरवरी 2020. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राहुल गांधी को लेकर ट्यूबलाइट वाले ओछे तंज पर श्री गांधी ने आज कहा कि मोदी प्रधानमंत्री की तरह बर्ताव नहीं करते हैं।

श्री गांधी ने संसद के बाहर पत्रकारों से कहा, आम तौर पर एक प्रधानमंत्री का विशेष दर्जा होता है, एक प्रधानमंत्री खास तरीके से बर्ताव करता है, उनका एक विशेष कद होता है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री में ये चीजें नहीं हैं।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मोदी प्रधानमंत्री जैसा बर्ताव नहीं करते हैं।

राहुल ने कहा, हमें दबाया जा रहा है और संसद में हमें बोलने की इजाजत नहीं दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि वायनाड में मेडिकल कॉलेज का मुद्दा था, जिसे मैं सदन में उठाना चाहता था। अगर मैं बोलता तो स्पष्ट रूप से भाजपा इसे पसंद नहीं करती। हमें संसद में बोलने की अनुमति नहीं है। आप वीडियो देखिए मणिकम टैगोर (कांग्रेस सांसद) ने किसी पर हमला नहीं किया, बल्कि उन पर हमला किया गया।

इससे एक दिन पहले राहुल ने कहा था कि देश को असल मुद्दों से भटकाना प्रधानमंत्री मोदी की शैली है. वे कांग्रेस की बात करते हैं, जवाहरलाल नेहरू की बात करते हैं, पाकिस्तान पर बोलते हैं, लेकिन मुख्य मुद्दों पर नहीं बोलते।

आज सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी और नौकरियों का है. हमने प्रधानमंत्री से कई बार पूछा, लेकिन उन्होंने इस पर एक शब्द भी नहीं कहा। इससे पहले वित्त मंत्री ने लंबा भाषण दिया, लेकिन वे भी इस पर कुछ नहीं बोलीं।

श्री गांधी ने बाद में ट्वीट कर कहा,

“आज संसद में जो हंगामा हुआ, वह मुझे सरकार से सवाल करने से रोकने के लिए किया गया था। भारत के युवा देख सकते हैं कि बेरोजगारी संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के पास कोई सुराग नहीं है। उनकी रक्षा के लिए, भाजपा बहस को रोकते हुए संसद को बाधित करती रहेगी।“

क्या है पूरा मामला

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रश्नकाल के दौरान लोकसभा में अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन सवाल पूछा। लेकिन सवाल का जवाब देने की बजाय प्रश्नकाल के दौरान स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, पीएम मोदी को लेकर राहुल गांधी द्वारा दिए गए एक बयान की निंदा करने लगे। जबकि उन्हें राहुल गांधी के सवालों का जवाब देना चाहिए था, क्योंकि प्रश्नकाल के दौरान आपको अन्य मुद्दा नहीं उठा सकते हैं।

कांग्रेस सांसदों के विरोध के बावजूद हर्षवर्धन बोलते रहे। जब कांग्रेस सांसदों ने कड़ा विरोध जताया तो बीजेपी के सांसद अपनी सीट से टिप्पणी करने लगे। जब कांग्रेस सांसदों ने उन्हें रोका तो बीजेपी सांसदों ने धक्का-मुक्की शुरू कर दी। हंगामा बढ़ता देख लोकसभा स्पीकर ने सदन की कार्यवाही दोपहर 1 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। इसके बाद लोकसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई।