क्या आप जानते हैं सरकारों ने अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे करने का वादा किया है?

Road Safety

क्यों सरकारों ने अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे करने का वादा किया है?

Why have governments promised to limit the maximum speed to 30 kmph? : कोविड महामारी के दौरान पिछले साल हुई तालाबंदी के कारणवश सड़क दुर्घटनाएं तो कम हुई हैं पर सड़क दुर्घटनाओं में मृत होने वालों की संख्या उस अनुपात में कम नहीं हुईं क्योंकि लोग बहुत तेज़ गति से मोटर वाहन चलाते हैं जिसके कारणवश जानलेवा सड़क दुर्घटनाएं होती रहीं.

More than 1.3 million people die in road accidents every year

हर साल 13 लाख से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मृत होते हैं – हर 24 सेकंड में 1 व्यक्ति मृत. तेज़ रफ़्तार से मोटर वाहन चलाना सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण रहा है जिससे पूर्णत: बचाव मुमकिन है. 40-50 प्रतिशत लोग तय गति सीमा से अधिक रफ़्तार से गाड़ी चालते हैं. हर 1 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार बढ़ाने पर 4-5% जानलेवा सड़क दुर्घटना होने का खतरा बढ़ जाता है.

6th UN Global Road Safety Week focuses on Streets for Life

इसीलिए 6वें संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह (17-23 मई 2021) का प्रमुख सन्देश ही यही है कि सरकारें अपने किये वादानुसार अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे को सख्ती से लागू करें जिससे न केवल सड़क दुर्घटनाएं कम हों और सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु दर में गिरावट आये बल्कि अन्य लाभ भी मिलें जैसे कि सड़क सबके लिए सुरक्षित जगह बनें, पर्यावरण लाभान्वित हो और अन्य सतत विकास लक्ष्य की ओर हम सब प्रगति कर सकें.

नेल्सन मंडेला की पोती ज़ोलेका मंडेला (Zoleka Mandela (born 9 April 1980) is a South African writer, activist, and Nelson Mandela’s granddaughter.) ने 11 साल पहले अपनी 13 वर्षीय बच्ची ज़ेनानी को सड़क दुर्घटना में खो दिया. ज़ोलेका मंडेला अब इसी मुहीम में समर्पण के साथ लगी हैं कि सड़क सबके लिए सुरक्षित बनें, लोग सड़क पर सुरक्षित महसूस करें और आराम से आवागमन करें – पैदल चलें, साइकिल चलायें, बच्चे अपने विद्यालय बेझिझक सुरक्षित जा सकें.

ज़ोलेका मंडेला भी यही मांग कर रही हैं कि अधिकतम गति सीमा 30 किमी प्रति घंटे से अधिक न हो.

ज़ोलेका मंडेला का यह कहना है कि 30 किमी प्रति घंटे से अधिक गति सीमा करना एक तरह से मृत्यु दण्ड देने जैसा है.

30 किमी प्रति घंटे से अधिक रफ़्तार पर गाड़ी चलाने से जो लोग पैदल चलते हैं उनको लिए घातक सड़क दुर्घटना का खतरा अत्याधिक बढ़ जाता है. पैदल चलते बच्चे-युवा एवं वृद्ध पर भी सड़क दुर्घटना में मृत होने का खतरा अनेक गुणा अधिक मंडराता है. जितनी दूरी में 30 किमी प्रति घंटे से आती कार रुक जाती है उतनी दूरी पर 50 किमी प्रति घंटे से आती कार ब्रेक लगने पर भी काफ़ी तेज़ गति से आ रही होती है जिसके कारण दुर्घटना होने का खतरा बढ़ जाता है.

शोध बताते हैं कि हर 1 मील प्रति घंटे की रफ़्तार कम करने पर 6% सड़क दुर्घटना होने का खतरा कम हो जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार बढ़ाने पर 3% सड़क दुर्घटना और 4-5% सड़क दुर्घटना में मृत होने का खतरा बढ़ जाता है.

Stockholm Declaration on Road Safety Current Affairs 2020

पिछले साल 19-20 फरवरी 2020 को, स्टॉकहोम में दुनिया के सभी देशों के मंत्री के लिए उच्च-स्तरीय बैठक हुई और सड़क सुरक्षा (road safety) के लिए सबने संयुक्त रूप से एक स्टॉकहोम डिक्लेरेशन (स्टॉकहोम घोषणापत्र) ज़ारी किया.

इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे हमारे देश के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी.

इस स्टॉकहोम घोषणापत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण वादा है कि सभी देश अधिकतम गति सीमा को 30 किमी प्रति घंटा करे और सख्ती के साथ प्रभावकारी ढंग से उसको लागू करवाएं.

इस बैठक और घोषणापत्र में इस बात का भी उल्लेख है कि मंत्रियों ने इस बात को माना कि अधिकतम गति सीमा कम करने से सड़क दुर्घटनाएं और इनमें होने वाली मृत्यु कम होती है इसका ठोस प्रमाण है.

अधिकतम गति सीमा को कम करना सड़क सुरक्षा की ओर एक मज़बूत कदम होगा, तथा पर्यावरण और वायु पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

फरवरी 2020 के स्टॉकहोम घोषणापत्र के बाद अगस्त 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में 194 देशों के प्रमुख ने भी सड़क सुरक्षा के प्रति अपना समर्थन दिया और 2020 तक जो लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया (सड़क दुर्घटना और मृत्यु दर को 50% कम करने का), उसको 2030 तक पूरा करने के वादे को पुन: दोहराया गया.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में देशों के प्रमुख ने स्टॉकहोम घोषणापत्र के वादों के अनुरूप ही (जिसमें 30 किमी प्रति घंटा अधिकतम गति सीमा शामिल है), सड़क सुरक्षा के लिए अपना समर्थन दिया. 2030 तक सिर्फ 115 माह शेष हैं पर किसी भी असामयिक मृत्यु को रोकने में एक पल भी देरी नहीं होनी चाहिए.

दुनिया में अनेक शहरों में 30 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति सीमा लागू हो गयी है. ब्रुसेल्स (बेल्जियम), पेरिस (फ्रांस) और स्पेन देश के अनेक शहर, बोगोटा (कोलंबिया), अक्रा (घाना), हो ची मिंह सिटी (वियतनाम) आदि इनमें प्रमुख हैं.

तंज़ानिया देश में अधिकतम गति सीमा कम करने से सड़क दुर्घटनाएं 26% कम हो गयी हैं. टोरंटो (कनाडा) में 2015 में जब अधिकतम गति सीमा 40 किमी प्रति घंटे से 30 किमी प्रति घंटे की गयी तो वहां सड़क दुर्घटनाएं 28% कम हो गयीं, और गंभीर प्राणघातक सड़क दुर्घटनाएं तो दो-तिहाई कम हो गयीं!

कोलंबिया (बोगोटा) में अधिकतम गति सीमा कम करने से सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु 32% कम हो गयी.

लन्दन (इंग्लैंड) में पाया गया कि अधिकतम गति सीमा को कम करने से सड़क दुर्घटनाएं 42% कम हो गयी. इंग्लैंड के एक और शहर ब्रिस्टल में 2008 में जब 30 किमी (20 मील) प्रति घंटे की अधिकतम गति सीमा लागू की गयी तो 2016 तक जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं में 63% गिरावट आ चुकी थी.

अधिकतम गति सीमा को 30 किमी प्रति घंटे करने की मुहीम में वैश्विक स्तर पर एक बुलंद आवाज़ हैं लीना हुदा (Lena Huda – Founder and campaign manager – 30Please) जिन्होंने 30 प्लीज” (30please) नमक अभियान भी सक्रिय किया हुआ है.

लीना हुदा ने सिटिज़न न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) से कहा कि वह जर्मनी में पली-बड़ी हुयी हैं जहाँ लोग कार-पसंद तो हैं और कार उद्योग भी बहुत प्रभावशाली है परन्तु पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों की सुरक्षा के लिए भी सशक्त इंतज़ाम हैं. उन्हें जर्मनी में पैदल चलने या साइकिल चलाने में कभी भी असुरक्षित नहीं लगा. कार चलाने वालों को यह नहीं लगता है कि ‘वह सड़क के मालिक हैं’ बल्कि सड़क को सबके साथ सुरक्षा से साझा करने की समझ को प्राथमिकता दी गयी है. सड़क पर खेलते हुए बच्चे या साइकिल चलाते हुए लोग या पैदल चलते लोग नहीं वरन कार चलाने वाले लोग ‘देख के चलते हैं’ कि बच्चों, पैदल या साइकिल पर चलने वाले लोग सुरक्षित रहें और सड़क अधिकार की प्राथमिकता पायें. यदि सड़क पर बच्चे खेल रहे हैं तो जर्मनी में इसका स्वागत किया जाता है परन्तु जर्मनी के अलावा अन्य जगह पर इसी बात पर लोग नाराजगी व्यक्त करते हैं.

लीना जब जर्मनी से वोल्लोंगोंग, ऑस्ट्रेलिया, आ गयीं, तो उनको सड़क सुरक्षा में अंतर और गहराई से समझ आया. ऑस्ट्रेलिया में अधिकतर जगह अधिकतम गति सीमा 50 किमी प्रति घंटे की है और स्कूल आदि के पास 40 किमी प्रति घंटे की है. यदि 30 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आ रही गाड़ी से किसी की दुर्घटना हो जाती है तो मृत होने का 10% से भी कम खतरा है. परन्तु यदि गाड़ी 50 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से आ रही हो तो दुर्घटना होने पर मृत होने का खतरा 85% है. इसीलिए वह ’30 प्लीज’ अभियान का नेतृत्व कर रही हैं जिससे सड़क सभी लोगों के लिए सुरक्षित बने, बच्चे सुरक्षा और आराम से पैदल या साइकिल से स्कूल आदि जा सकें और अन्य सभी वर्ग के लोग भी सड़क का पूरा उपयोग कर सकें.

बॉबी रमाकांत –

(विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत, बॉबी रमाकांत स्वास्थ्य अधिकार और न्याय पर लिखते रहे हैं और सीएनएस(सिटिज़न न्यूज़ सर्विस), आशा परिवार और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) से जुड़े हैं.)

बाज़ार-समाधान से ही हो रही हैं सड़कें असुरक्षित : बढ़ गयी है भारत में सड़क दुर्घटना मृत्यु दर

Road Safety

Market solutions will make roads unsafe for everyone.

बढ़ गयी है भारत में सड़क दुर्घटना मृत्यु दर | Road accident death rate in India has increased

भारत और अन्य 193 देशों ने सतत विकास लक्ष्य के तहत वादा तो किया था कि सड़क दुर्घटना मृत्यु दर (और उनमें होने वाली चोट और शारीरिक विकृति दर) में 2020 तक 50% की गिरावट आएगी परन्तु हुआ इसका उल्टा है: सड़क दुर्घटना मृत्यु दर भारत में बढ़ गयी है

2015 में भारत में 146,133 लोग सड़क दुर्घटना में मृत हुए थे. आधे होने के बजाये सड़क में मृत होने वालों की संख्या बढ़ गयी – 2019 में देश भर में सड़क दुर्घटना में 154,000 लोग मृत हुए थे. इससे अनेक गुणा लोग, सड़क दुर्घटना में ज़ख़्मी हुए थे या शारीरिक विकृति के साथ जीने को मजबूर हुए.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अधिकाँश सड़क दुर्घटनाएं (लगभग 60%), अति-तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चलाने के कारण हुईं.

ज़रूरी है यह समझ लेना कि हर सड़क दुर्घटना में होने वाली मृत्यु असामयिक है जिसका पूर्ण रूप से बचाव संभव था.

दुनिया में मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में से 10वें नंबर पर है सड़क दुर्घटना, जिसके कारणवश 13 लाख से अधिक लोग हर साल मृत होते हैं और 5 करोड़ से अधिक लोग ज़ख़्मी होते हैं, या शारीरिक/ मानसिक विकृति के साथ जीने को मजबूर होते हैं. सार्वजनिक आवागमन या परिवहन ज़रूरी है और मौलिक अधिकार है, पर इसकी कीमत हमें अपने हाथ-पैर तुड़वा के या जान गवां के देने की क्या ज़रूरत है?

National Road Safety Month from 18 January to 17 February 2021

भारत सरकार 18 जनवरी से 17 फरवरी 2021 तक, राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह मना रही है और अनेक जागरूकता कार्यक्रम हो रहे हैं. भारत सरकार भी यही कह रही है कि सड़क दुर्घटना से पूर्ण बचाव मुमकिन है, और लोगों को सड़क दुर्घटना के कारण अनावश्यक आर्थिक, शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा और त्रासदी झेलनी पड़ती है.

सरकार का कहना यह भी है कि सड़क सुरक्षित होनी ज़रूरी हैं क्योंकि यह कैसे स्वीकार किया जा सकता है कि आवागमन की स्वतंत्रता की कीमत हमें अपने हाथ-पांव तुड़वा के या जान गवां के देनी पड़े?

यह अनावश्यक त्रासदी है क्योंकि सड़क दुर्घटना से बचाव मुमकिन है.

पिछले अनेक सालों से दुनिया के देश, सड़क सुरक्षा पर कार्य कर रहे हैं परन्तु अपेक्षित नतीजा नहीं निकल रहा है क्योंकि दुर्घटना भी अनेक जगह बढ़ोतरी पर हैं और मृत्यु दर भी.

दुनिया की सभी सरकारों ने पूरा दशक 2010-2020 को सड़क सुरक्षा अभियान को समर्पित किया था.

उत्तर प्रदेश सरकार के एक विज्ञापन के अनुसार, 400 लोग हर रोज़ प्रदेश में सड़क दुर्घटना के कारणवश मृत होते हैं. सरकार के अनुसार, इसका मुख्य कारण है सड़क यातायात नियमों की जानकारी का अभाव.

इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि सभी यातायात नियमों का, सभी को, हर समय सख्ती से अनुपालन करना चाहिए. पर बड़ा सवाल यह भी है कि क्या यातायात नियमों के पालन करने से सड़क आवागमन सबके लिए सुरक्षित हो जायेगा, खासकर कि वह लोग जो बिना-मोटर वाले वाहन का उपयोग करते हैं या पैदल चलते हैं, सड़क पर ही रोज़गार करते हैं या रहने को मजबूर हैं?

दुनिया की सरकारें मानती हैं कि सड़क दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण तेज़-गति से मोटर-वाले वाहन चलाना है. पर यह क्यों नहीं बता रही कि जब अत्याधिक गति-सीमा निर्धारित है तो मोटर वाले वाहन को कौन अनुमति देता है कि इनका निर्माण ऐसा हो कि इनकी अत्याधिक गति-सीमा, सरकार द्वारा निर्धारित गति-सीमा से अनेक गुणा अधिक रहे? उदाहरण के तौर पर, यदि 80किमी प्रति घंटा की अत्याधिक गति-सीमा निर्धारित है, तो मोटर वाहन में क्यों यह प्रावधान है कि उनको इसके ऊपर चलाया जा सके?

अधिकाँश सड़क दुर्घटना, जो अति-तेज़ गति से मोटर वाले वाहन चलाने से होती हैं, उनमें सिर्फ वाहन सवार लोग ही नहीं ज़ख़्मी होते हैं या मृत होते हैं. सड़क दुर्घटना में ज़ख़्मी होने वाले या मृत होने वाले लोगों में साइकिल या रिक्शा सवार, पैदल चलने वाले लोग, सड़क पर रोज़गार करने वाले लोग, रहने वाले लोग, आदि भी होते हैं. सड़क तो सबकी है तो सिर्फ मुठ्ठी भर कार सवार लोगों की सुविधा देख कर ही क्यों नियम और सड़क-इंतज़ाम और सुरक्षा-इंतज़ाम बनाया जा रहा है?

हमारा लक्ष्य यह नहीं है कि मोटर वाले वाहन सवार लोगों के लिए सड़क सुरक्षित हों बल्कि लक्ष्य तो यह है कि हर इंसान के लिए सड़क आवागमन और यातायात सुरक्षित और आरामदायक बने.

यदि हम मोटर वाले वाहन की संख्या बढ़ाते जायेंगे तो सड़क असुरक्षित तो होंगी ही, क्योंकि सभ्य समाज में निजी-वाहन की किसी को भी क्या आवश्यकता हो सकती है? विकसित देशों/शहरों में अमीर-गरीब सभी सार्वजनिक यातायात का उपयोग करते हैं तभी वहां सड़क दुर्घटना दर कम हो सकी है. निजी वाहन की संख्या कम ही नहीं करनी है बल्कि निजी वाहन को बेमतलब करना है जैसे कि निजी हवाई जहाज या निजी ट्रेन की क्या आवश्यकता है? यह तब तक मुमकिन ही नहीं जब तक सार्वजनिक यातायात या परिवहन सेवा, हर इंसान के लिए आरामदायक, सुविधाजनक, सस्ती और सुरक्षित नहीं बनायीं जाएगी. और यह सरकार की जिम्मेदारी है. उसी तरह से जब सरकारी शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा मज़बूत होती है तो निजी उद्योग बेमतलब हो ही जायेगा. और यदि सरकारी शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा कमज़ोर रहेगी तो निजी उद्योग पनपेगा ही और अनेक लोग सेवा से वंचित हो जायेंगे.

क्योंकि सरकार सार्वजनिक यातायात परिवहन सेवा जर्जर किये हुए है इसीलिए निजी उद्योग पनप रहा है और लोगों को ब्याज तक पर मोटर वाले वाहन लेने को उकसा रहा है.

Road Safety Up
Road Safety Up

सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि उनका ही एक वादा (सतत विकास लक्ष्य 11.2) के अनुसार, 2030 तक हर इंसान के लिए सुरक्षित, सस्ती, सुविधाजनक और सतत सरकारी यातायात परिवहन सेवा उपलब्ध करवाना है. 2030 के इस लक्ष्य को पूरा करने में सिर्फ 118 महीने शेष बचे हैं.

मैं, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहता हूँ और आवागमन के लिए साइकिल का ही उपयोग करता हूँ. पिछले सालों में मैंने चियांग मई (उत्तरी थाईलैंड) और अमरीका के बोस्टन शहर में भी आवागमन के लिए साइकिल का उपयोग किया है.

मेरा अपना अनुभव यह है कि सुरक्षित सड़क की जो परिभाषा बाज़ार में उद्योग हमें समझाता है वैसी सड़कें मेरे लिए सबसे असुरक्षित हैं. उदाहरण के तौर पर चौड़े हाईवे/ एक्सप्रेसवे या बड़ी-बड़ी सड़कें. इन्हीं ‘आदर्श’ जैसी आधुनिक नए ज़माने वाली सड़कों पर, जानलेवा और हृदय-विदारक दुर्घटनाएं अक्सर होती हैं. जबकि जो सड़कें पुराने ज़माने वाली मानी जाएँगी जैसे कि पुराने शहर की सड़कें और गलियां आदि, वह साइकिल और सभी के लिए इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वहां पर जानलेवा दुर्घटना होने का खतरा ही कम है. सवाल यह है कि सड़क सुरक्षा और सुरक्षित सड़क और आवागमन की परिभाषा हमें मोटर वाले वाहन को मद्देनज़र रख कर क्यों गढ़नी है? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मोटर वाले वाहन और उससे सम्बंधित उद्योग धनाढ्य है?

उद्योग का बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए या फिर हर इंसान के लिए सड़कें और यातायात परिवहन/ आवागमन को सुरक्षित और आरामदायक करना प्राथमिकता होनी चाहिए?

बॉबी रमाकांत

(विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत बॉबी रमाकांत, सीएनएस, आशा परिवार और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) से जुड़े हैं.)

सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतों का कारण तेज रफ्तार

National News

सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतों का कारण तेज रफ्तार

Breaking traffic rules on the road is by no means correct.

नई दिल्ली, 30 नवंबर (इंडिया साइंस वायर): सड़क पर यातायात नियमों को तोड़ना किसी भी तरह से सही नहीं है। लेकिन, नियमों को ताक पर रखकर अधिक रफ्तार में गाड़ी चलाना सबसे अधिक जानलेवा साबित हो रहा है। वर्ष 2018 में सड़क दुर्घटनाओं में 64 प्रतिशत मौतें अधिक रफ्तार में गाड़ी चलाने कारण हुई हैं।

Report of the Ministry of Road Transport and Highways based on road accidents

वर्ष 2018 में सड़क दुर्घटनाओं पर आधारित सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल भारत में कुल 4.67 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, जिनमें गाड़ियों की तेज रफ्तार 3.11 लाख हादसों का कारण बनकर उभरी है। तेज रफ्तार के कारण हुए सड़क हादसों में बीते वर्ष 97,588 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी थी।

Statistics of deaths in road accidents due to violation of traffic rules

वर्ष 2018 में यातायात नियमों के उल्लंघन से सड़क दुर्घटनाओं में हुई मौतों के ये आंकड़े राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस विभाग से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा लोकसभा में बृहस्पतिवार को एक प्रश्न के उत्तर में इन आंकड़ों को पेश किया गया है।

गलत दिशा में गाड़ी चलाने के दौरान दुर्घटनाओं में 5.8 प्रतिशत मौतें होती हैं। वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 2.8 प्रतिशत मौतें शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोगों की हुई हैं। ड्राइविंग करते समय मोबाइल फोन का उपयोग भी सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है। पिछले वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में 2.4 प्रतिशत मौतों का कारण गाड़ी चलाते हुए मोबाइल फोन के उपयोग को माना गया है।

नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-सड़क अनुसंधान संस्थान में ट्रैफिक इंजीनियरिंग ऐंड सेफ्टी डिविजन के प्रमुख सुभाष चंद ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “निर्धारित सीमा से अधिक गाड़ियों की रफ्तार सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण हैं। हालांकि, गाड़ियों की अधिक रफ्तार के आंकड़े मूल रूप से पुलिस एफआईआर पर केंद्रित होते हैं, जिसे प्रायः प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर दर्ज किया जाता है। इसलिए इन आंकड़ों को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।”

उन्होंने कहा कि “गाड़ियों की रफ्तार की निगरानी के लिए राष्ट्रीय एवं राज्यों के राजमार्गों पर कैमरे लगाया जाना उपयोगी हो सकता है। ऐसा करने से गाड़ियों की रफ्तार के साथ-साथ यातायात नियमों को तोड़ने वाले लोगों पर नजर रखी जा सकेगी। दिल्ली, लखनऊ और चेन्नई जैसे शहरों में इस तरह की पहल की जा चुकी है, जिसके सकारात्मक परिणाण देखने को मिले हैं। कुछ समय बाद गाजियाबाद में भी सड़कों पर यातायात नियम तोड़ने वालों की निगरानी कैमरों के जरिये शुरू हो जाएगी।”

करीब 78 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओं के लिए आमतौर पर ड्राइवर की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जाता है। यातायात नियमों के उल्लंघन में सड़क पर चलते हुए लेन तोड़ना, गलत दिशा में गाड़ी चलाना, शराब पीकर या ड्रग्स का सेवन करके ड्राइविंग, मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए गाड़ी चलाना, रेड लाइट नजअंदाज करना और दूसरे मामले शामिल हैं।

सड़क दुर्घटनाओं के लिए कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें साइकिल सवारों, पैदल यात्रियों और दूसरे वाहन चालकों की गलती (7.1 प्रतिशत), सार्वजनिक निकायों की लापरवाही (2.8 प्रतिशत), गाड़ियों की बनावट संबंधी खामियां (2.3 प्रतिशत) और खराब मौसम (1.7 प्रतिशत) शामिल हैं।

सड़क दुर्घटनाओं में जख्मी होने के मामले वर्ष 2018 में भारत में होने वाली मौतों का आठवां सबसे बड़ा कारक बनकर उभरे हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दिन होने वाले औसतन 1,280 सड़क हादसों में करीब 415 लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ती है। वर्ष 2018 में 1.5 लाख से अधिक लोगों को सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गवांनी पड़ी थी। यह संख्या वर्ष 2017 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में हुई करीब 1.48 लाख मौतों की तुलना में 2.4 प्रतिशत अधिक है।

Most road accidents occur in Tamil Nadu

राज्यों के स्तर देखें तो सबसे अधिक 13.7 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं तमिलनाडु में होती हैं। मध्य प्रदेश मे 11 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 9.1 प्रतिशत सड़क हादसे होते हैं। हालांकि, सड़क हादसों में सर्वाधिक 22 हजार से अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 13,261 और तमिलनाडु में 12,216 मौतों के लिए सड़क दुर्घटनाओं को जिम्मेदार पाया गया है।

About 28.8 percent of the total deaths in road accidents last year were due to not wearing helmets.

हेलमेट न पहनना या फिर सीट बेल्ट न लगाना दुर्घटनाओं का कारण भले ही न हो, पर गंभीर चोटों से बचाव में इनकी भूमिका अहम होती है। पिछले साल सड़क दुर्घटनाओं में हुई कुल मौतों में करीब 28.8 प्रतिशत मौतें हेलमेट न पहनने के कारण हुई हैं। जबकि, सड़क हादसों में होने वाली 16.1 प्रतिशत मौतों के लिए सीट बेल्ट न लगाने को जिम्मेदार पाया गया है।

उमाशंकर मिश्र

(इंडिया साइंस वायर)