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Tag Archives: सारा मलिक

लेकर चली मां हजारों मील मासूमों को/ शर्म नहीं आती हुक्मरानों को और कानूनों को

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व्यवस्था पर चोट करती सारा मलिक की तीन लघु कविताएं Sara Malik’s three short poems hurting the system भूख और गरीबी से मजबूर हो गए जख्म पांव के नासूर हो गए कदमों से नाप दी जो दूरी अपने घर की, हजारों ख्वाब चकनाचूर हो गए छालों ने काटे हैं जो रास्ते बेबसी का दस्तूर हो गए. कभी पैदल कभी प्यासे, …

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सारा मलिक की कहानी “पहला रोजा”

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

Sara Malik’s story “Pehla Roja” इबादत करना फर्ज है, और हक भी। रमजान का महीना (Month of ramadan) रोजा और इबादत का महीना, बरकतों वाला महीना है। अल्लाह खैर करे इस साल हालात मुख्तलिफ हैं। दुनिया में वबा फैली है। मुल्क भी उसी की चपेट में है। ऐसे में हुकूमत ने एहतियात के तौर पर तालाबंदी कर दी है।  पिछले …

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