मिट्टी के दिये : पैबंद की हँसी

इन दिनों जाने कौन से सफ़र पर हूँ , जहाँ के रास्तों के दोनों ओर लपट उठ रही हैं । चटखती लकड़ियों की आवाज़ें ,

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पैबंद की हँसी : क्यूँ हम लड़कियों के हिस्से में अपने पूरे खेत कभी नहीं आते ?

यूँ तो  महीनों पहले ही  काम पूरा हो गया था, पर बीते दिनों अजीब सा माहौल था- ज़िंदगी मौत की जंग, चारों तरफ़ हाहाकार, लोगों की आँखो में बारिशें ठहर गयीं। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या कहें क्या लिखें, सहमी सहमी आँखों से भाव टप टप बहे जा रहे थे। किताब का क्या सोचती, क़लम की सांसें ही थमी थमी सी थीं। शायद ऑक्सीजन कम हो गयी थी …

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पीहर

ब्याह कर क्या आई, सब पीछे ही छूट गया अम्मा पुकारती थी मुझे उनकी चिड़िया, तो बाबुल का तो कलेजा ही थी मैं, उनकी रानी

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हाँ! वो माँ ही तो थी

वो माँ ही तो थी, जो तुरपती रहती थी, अपना फटा पल्लू बार-बार, ताकि हम पहन सकें, नया कपड़ा, हर त्यौहार। वो माँ ही तो

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तू तुलसी मेरे आँगन की हो गयी…

मेरे पैरों में डालकर बेड़ियाँ, वे कहते हैं, गर्व से, कि पायलें आज चाँदी की हो गयीं। और हाथों में पहनाकर हथकड़ियाँ, वे कहते हैं,

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चल ना वहाँ …

चल ना वहाँ … उम्र जहाँ से शुरू की थी उसी मोड़ पर रूक कर देखेंगे कितने ? मोड़ आवाज़ देते हैं पीठ के पीछे

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कालिके ! भवबाधा हारिणी

मनुज सभ्यता दहल उठी मां सुनकर के यह चीत्कार। सुनो कालिके अपने बच्चों की अब यह करुण पुकार।। चीनी वृत्तासुर कोरोना रक्तबीज रूप ले फिर

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हस्तक्षेप साहित्यिक कलरव में इस रविवार डॉ. धनञ्जय सिंह का काव्यपाठ

नई दिल्ली, 20 अगस्त 2020. हस्तक्षेप डॉट कॉम के यूट्यूब चैनल के साहित्यिक कलरव अनुभाग (Sahityik Kalrav section of hastakshep.com ‘s YouTube channel) में इस

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