भारत में 2030 के ई-मोबिलिटी लक्ष्‍य के लिए नीतिगत प्रयासों में तेज़ी ज़रूरी

energy power

ई-मोबिलिटी में तेजी लाने के लिये बेहद महत्‍वपूर्ण है

  • चार्जिंग ढांचे को तेजी से विस्‍तार देना;
  • वित्‍तीय समाधान पेश करना, अधिदेश (मैन्‍डेट) पेश करना; और
  • सम्‍बन्धित राष्‍ट्रीय महत्‍वाकांक्षा के अनुरूप सरकारी नीतियां बनाना

नई दिल्ली, 27 जुलाई 2022. भारत में वर्ष 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके तहत तय अवधि तक बेचे जाने वाले वाहनों में 70% वाणिज्यिक कारें, 30% निजी कारें, 40% बसें और 80% दो पहिया तथा तीन पहिया वाहन इलेक्ट्रिक होंगे।

8 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन वर्ष 2030 तक सड़कों पर दौड़ेंगे : विश्लेषण

क्लाइमेट ट्रेंड्स और जेएमके रिसर्च द्वारा जारी एक ताजा विश्लेषण (A recent analysis released by Climate Trends and JMK Research) के मुताबिक इलेक्ट्रिक वाहन संबंधी नीतियों (फेम 2, राज्य सरकार की नीतियां) की मौजूदा लहर और यहां तक कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान बैटरी के दामों में गिरावट और स्थानीय स्तर पर निर्माण संबंधी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में तेजी आने के बावजूद भारत में वर्ष 2030 तक सिर्फ 5 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन ही इस्तेमाल हो सकेंगे जोकि राष्ट्रीय लक्ष्य से 40% कम है।

रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत को 8 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहनों के सुचारू संचालन के लिए 2022 से 2030 के बीच कम से कम 39 लाख (प्रति चार्जिंग स्टेशन 8 इलेक्ट्रिक वाहनों के अनुपात के आधार पर) सार्वजनिक अथवा अर्द्ध-सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की जरूरत होगी। यह संख्या इस अवधि के लिए बनाई जा रही योजना के मुकाबले कहीं ज्यादा है।

परिवहन विद्युतीकरण के लिए भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य की पूर्ति

इस अध्ययन का शीर्षक मीटिंग इंडियास नेशनल टारगेट फॉर ट्रांसपोर्ट इलेक्ट्रिफिकेशन‘ (Meeting India’s National Target for Transport Electrification) है और इसे जेएमके रिसर्च द्वारा नई दिल्ली में आयोजित ‘ईवी मार्केट कॉन्क्लेव’ में जारी किया गया।

इस अध्ययन में सभी अनुमोदित राज्य ईवी नीतियों का विश्लेषण किया गया है और इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य (India’s national goals for electric vehicles) की पूर्ति के लिए राज्य के स्तर पर और बेहतर तथा अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करने की बात मजबूती से रखी गई है। जहां कुछ राज्यों ने इलेक्ट्रिक वाहनों से संबंधित लक्ष्य को संख्यात्मक स्वरूप में रखा है, वहीं कुछ राज्यों ने इसे कुल वाहनों के प्रतिशत के तौर पर निर्धारित किया है जबकि कुछ राज्य ऐसे हैं जिन्होंने इस बारे में कोई भी लक्ष्य तय नहीं किया है। ऐसी गिनी-चुनी नीतियां ही हैं जिनमें चार्जिंग ढांचे से संबंधित लक्ष्य या सरकारी वाहनों के बेड़े को इलेक्ट्रिक वाहनों में तब्दील करने के बारे में चीजों को परिभाषित किया गया है।

इसके अलावा ज्यादातर नीतियों में वर्ष 2030 तक की समयसीमा का निर्धारण नहीं किया गया है। उनमें सिर्फ वर्ष 2022 से 2026 तक के लिए ही सहयोग प्रदान करने की बात की गई है।

वित्तीय रूप से इलेक्ट्रिक वाहन मौजूदा समय में व्यावहारिक हो गए हैं : आरती खोसला
aarti khosla
आरती खोसला

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा, इलेक्ट्रिक वाहन मौजूदा समय में वित्तीय रूप से व्यावहारिक हो गए हैं। भारत के नेटजीरो उत्सर्जन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति में इलेक्ट्रिक वाहनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी। स्वच्छ ऊर्जा– जैसे कि अक्षय ऊर्जा संबंधी लक्ष्यों की प्रगति राज्य की नीतियों की वजह से होती है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के मामले में भी देश को राज्यों के बीच और अधिक तालमेल की जरूरत है। भारत ने ई-मोबिलिटी के क्षेत्र में सही दिशा में कदम आगे बढ़ाना शुरू किया है। कुछ सक्षमकारी नीतियों के कारण वाहनों के कुछ वर्गों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। हालांकि हमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच और भी ज्यादा समन्वित प्रयासों की जरूरत है। खासतौर पर ऐसे लक्ष्यों और प्रोत्साहनों को परिभाषित करने के मामले में, जो राष्ट्रीय लक्ष्यों और नीतियों के अनुरूप हैं। इसके अलावा चार्जिंग ढांचे तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के वित्तपोषण के लिए वित्तीय समाधान उपलब्ध कराने पर और अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत है।”

जेएमके रिसर्च एंड एनालिसिस की संस्थापक और सीईओ ज्योति गुलिया ने कहा, “अगर मौजूदा ढर्रा बना रहा तो भारत वर्ष 2030 तक के लिए निर्धारित अपने लक्ष्य से 40% पीछे रह जाएगा। इस अंतर को पाटने के लिए भारत सामान्य मगर प्रभावी पद्धतियां लागू कर सकता है। सिर्फ प्रोत्साहन से काम नहीं चलेगा। सभी राज्यों को अपने अपने यहां चार्जिंग ढांचे को उन्नत बनाने से संबंधित स्पष्ट लक्ष्य बताने होंगे। यह पहली जरूरत है, जिससे भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने का रुख तय होगा। वैश्विक स्तर पर उभर रहे उदाहरण को अपनाते हुए भारत को सरकारी वाहनों के बेड़े के शत-प्रतिशत विद्युतीकरण का आदेश जारी करने पर विचार करना चाहिए और वाहन एग्रीगेटर बेड़े के कुछ प्रतिशत हिस्से का भी इलेक्ट्रिक होना अनिवार्य किया जाना चाहिए।”

इस अध्ययन में छह सुझाव दिए गए हैं जिनसे भारत वर्ष 2020 तक के लिए निर्धारित अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की संभावनाओं को बेहतर बना सकता है।

ये सुझाव विभिन्न राज्य नीतियों तथा संबंधित सरकारी विभागों के बीच समन्वित प्रयासों और राष्ट्रीय लक्ष्यों के प्रति बेहतर संरेखण पर केंद्रित हैं।

ये सुझाव सरकारी वाहनों तथा एग्रीगेटर बेड़ों के शत-प्रतिशत विद्युतीकरण, खास तौर पर कुछ चुनिंदा शहरों में सरकारी वाहनों तथा तिपहिया वाहनों के लिए अधिदेश जारी करने, ओईएम, बैटरी निर्माताओं तथा उपभोक्ताओं को वित्तीय समाधान पेश करने और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने पर केंद्रित हैं।

इन बातों को लागू करने से भारत अपने आईसीई वाहनों को इलेक्ट्रिक गाड़ियों में तब्दील करने की बेहतर स्थिति में पहुंच जाएगा। देश में छोटे वाहनों जैसे 2 व्हीलर, 3 व्हीलर, इकॉनमी 4 व्हीलर और छोटे माल वाहनों की बड़ी संख्या को देखते हुए भारत के पास छोटे वाहनों के विद्युतीकरण में नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाने का मौका है। इसके अलावा भारत के 3.99 करोड़ दो पहिया वाहनों के इलेक्ट्रिक गाड़ियों में तब्दील होने से विदेश से हर साल भारी मात्रा में तेल के आयात पर होने वाला बहुत बड़ा खर्च भी बचेगा।

एक आत्मनिर्भर ईवी पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए उद्योग और केंद्र तथा राज्य सरकारों को प्रमुख संसाधनों, प्रौद्योगिकी वित्त पोषण और प्रोत्साहनों को एक साथ लाने की जरूरत है।

India’s 2030 e-mobility target calls for intensification of policy efforts

वर्ष 2021 ऑफशोर पवन ऊर्जा उद्योग के लिए सबसे बेहतरीन साल रहा

global wind report 2022

वर्ष 2021 में 21.1 गीगावॉट नई उत्पादन क्षमता स्थापित हुई

तरक्की के नए युग के लिए तैयार हुआ पवन ऊर्जा उद्योग :  ग्लोबल ऑफशोर विंड रिपोर्ट

नई दिल्ली, 30 जून 2022. ऑफशोर पवन ऊर्जाउद्योग (offshore wind power industry) के लिए वर्ष 2021 अब तक का सबसे बेहतरीन साल साबित हुआ। इस साल 21.1 गीगावॉट की नई क्षमता को ग्रिड से जोड़ा गया।

ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल (Global Wind Energy Council जीडब्ल्यूईसी) द्वारा जारी अपनी ताजा ‘ग्लोबल ऑफशोर विंड रिपोर्ट 2022‘ (Global Wind Report 2022) में यह दावा किया गया है। संयोग से इसी समय लिस्बन में यूनाइटेड नेशंस ओशन कॉन्फ्रेंस (United Nations Ocean Conference) भी चल रही है।

ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल, पवन ऊर्जा उद्योग के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संघ है, जो विश्व स्तर पर उद्योग की एकजुट आवाज का प्रतिनिधित्व करता है।

रिपोर्ट से जाहिर होता है कि ऑफशोर विंड इंडस्ट्री नाटकीय वृद्धि के एक नए दौर में कदम रखने के लिए तैयार हो रही है क्योंकि सरकारें इस तकनीक की तरफ रुख कर रही हैं और ऊर्जा सुरक्षा तथा किफायती बिजली की तलाश में नए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर रही हैं। उनकी इस कोशिश का मकसद नेट जीरो उत्सर्जन संबंधी नई महत्वाकांक्षाओं को हासिल करना भी है।

इन उन्नत लक्ष्यों के क्रियान्वयन को लागू करना चाहिए ताकि वर्ष 2025 और उसके बाद से और भी अधिक रिकॉर्ड तोड़ वर्षों का सिलसिला शुरू हो।

जीडब्ल्यूईसी की ग्लोबल ऑफशोर विंड रिपोर्ट 2022 यह दिखाती है कि सरकारें ऑफशोर वायु बिजली के प्रति अपनी महत्वाकांक्षा को और बढ़ा रही हैं।

जीडब्ल्यूएसी मार्केट इंटेलिजेंस ने वर्ष 2030 के लिए अपना नजरिया बदला है और उसने पिछले साल के मुकाबले 45.3 गीगा वाट या 16.7% का अनुमान लगाया है। उसका मानना है कि वर्ष 2022 से 2030 के बीच नयी ऑफशोर वायु बिजली की क्षमता में 260 गीगावॉट की नई वृद्धि हो सकती है। इससे इस दशक के अंत तक वैश्विक स्तर पर कुल 316 गीगावॉट ऑफशोर वायु बिजली क्षमता स्थापित हो जाएगी।

दुनिया भर की सरकारें जिंदगी में कहीं एक बार आने वाले ऐसे अवसर को पहचान रही हैं जब ऑफ शोर वायु बिजली एक सुरक्षित, किफायती और स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन (Economical and clean energy production) का प्रतिनिधित्व कर रही है। इससे औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ रोजगार भी पैदा हो रहे हैं। अब हमें लक्ष्यों और महत्वाकांक्षाओं के तेजी से क्रियान्वयन की दिशा में काम करने की जरूरत है। इसके अलावा विकास के लिए पूरी तरह तैयार वैश्विक आपूर्ति श्रंखला भी बनाने की आवश्यकता है। साथ ही साथ वायु बिजली उद्योग को स्वस्थ महासागरीय पारिस्थितिकी के मुख्य संरक्षक के रूप में खुद को साबित करने की भी जरूरत है क्योंकि यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण सागर आधारित उद्योगों में से एक बन गया है।

हमें महासागरीय वातावरण में विभिन्न हित धारकों तथा समुदायों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है ताकि हम काम को इस तरह से तेजी से आगे बढ़ाएं जिससे समन्वय और योजना सुनिश्चित हो। साथ ही साथ जैव विविधता तथा संरक्षण संबंधी लक्ष्यों के प्रति उच्चतम स्तर का सौहार्द भी सुनिश्चित किया जा सके।

The year 2021 was the best year for the offshore wind power industry

विश्व स्तर पर नहीं हो रहा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण : नवीकरणीय 2022 वैश्विक स्थिति रिपोर्ट (आरईएन21)

Renewable energy

नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में पूरे दुनिया में भारत  तीसरे स्थान पर है।

नई दिल्ली, 16 जन 2022. रिन्यूएबल्स 2022 ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट (the Renewables 2022 Global Status Report REN21 in Hindi) की मानें तो वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन नहीं हो रहा है, जिससे यह संभावना भी नहीं बचती है कि दुनिया इस दशक के अंत तक महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी।

नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) के मामले में पूरे दुनिया में भारत केवल चीन (136 गीगावॉट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावॉट) के बाद, 2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।

एक नज़र में भारत का नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य :

·        2021 में 15.4 गीगावॉट के साथ कुल रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लिए विश्व स्तर पर भारत तीसरे स्थान पर है, केवल चीन (136 गीगावाट) और संयुक्त राज्य अमेरिका (43 गीगावाट) के बाद।

·        भारत ने 2021 में 843 मेगावाट की पनबिजली क्षमता जोड़ी, जिससे कुल क्षमता 45.3 गीगावाट हो गई।

·        नई सौर पीवी क्षमता के लिए भारत एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार था और विश्व स्तर पर तीसरा (2021 में 13 गीगावाट अतिरिक्त)। यह पहली बार, जर्मनी (59.2 GW) को पछाड़ते हुए, कुल स्थापना (60.4 GW) के लिए चौथे स्थान पर रहा।

·        भारत, पवन ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (40.1 GW) के मामले में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी के बाद विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।

·        भारत ने अपने राष्ट्रीय INR 18,100 करोड़ (24.3 बिलियन अमरीकी डालर) के सौर उत्पादन कार्यक्रम का विस्तार किया, जो बैटरी निर्माण संयंत्रों की स्थापना के लिए घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को प्रोत्साहन प्रदान करता है।

·        भारत में, रिन्यूएबल्स में कुल नया निवेश 70% बढ़कर 11.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।

·        रिन्यूएबल ऊर्जा नीतियां और जीवाश्म ईंधन में कटौती (Renewable energy policies and cutting fossil fuels)– भारत अपनी नेट मीटरिंग योजना के तहत सौर पीवी  बढ़ाने से देश का रूफटॉप पीवी बाजार 2021 में अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी देती है कि वैश्विक स्तर पर क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन नहीं हो रहा है, जिससे यह संभावना भी नहीं बचती है कि दुनिया इस दशक के अंत तक महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम होगी। पिछले साल की दूसरी छमाही में आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकट की शुरुआत (The beginning of the biggest energy crisis in history) देखी गई, जो 2022 की शुरुआत में यूक्रेन पर रूसी संघ के आक्रमण और अभूतपूर्व वैश्विक कमोडिटी झटके से और गंभीर हो गयी।

REN21 की कार्यकारी निदेशक राणा आदिब कहती हैं,

“हालांकि कई सरकारों ने 2021 में नेट ज़ीरो एमिशन के लिए प्रतिबद्धता दिखाई मगर सच्चाई यह है कि ऊर्जा संकट के जवाब में अधिकांश देश जीवाश्म ईंधन पर वापस चले गए हैं।”

यह ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट दुनिया भर में रिन्यूएबल ऊर्जा की सालाना स्थिति का जायज़ा लेती है। इस साल की रिपोर्ट इसका 17-वां संस्करण है और इस बात का प्रमाण देती है जिसके बारे में विशेषज्ञ अक्सर चेतावनी देते रहे हैं। और वो बात ये है कि दुनिया की ऊर्जा खपत में रिन्युएब्ल एनेर्जी का कुल हिस्सा स्थिर हो गया है। जहां 2009 में यह 10.6% था, दस साल बाद 2019 में यह मामूली बढ़त के साथ 11.7% पर अटक गया।

बिजली क्षेत्र में, जहां रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता और उत्पादन 2020 से अधिक रहा, फिर भी वो कुल बिजली मांग, जो कि 6 फीसद बढ़ी, के सापेक्ष कम ही रहा। वहीं हीटिंग और कूलिंग में, कुल ऊर्जा खपत में रिन्यूएबल हिस्सेदारी 2009 में जहां 8.9% थी, वो 2019 में बढ़कर 11.2% हो गई।

परिवहन क्षेत्र में, जहां रिन्यूएबल हिस्सेदारी 2009 में 2.4% थी, वो 2019 में बढ़कर 3.7% हो गई। परिवहन क्षेत्र की धीमी प्रगति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा खपत के लगभग एक तिहाई हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है।

नवंबर 2021 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) में, रिकॉर्ड 135 देशों ने 2050 तक नेट ज़ीरो ग्रीनहाउस गैस एमिशन हासिल करने का संकल्प लिया। लेकिन इनमें से केवल 84 देशों के पास रिन्यूएबल ऊर्जा के लिए अर्थव्यवस्था-व्यापी लक्ष्य थे, और केवल 36 के पास 100% रिन्यूएबल ऊर्जा का लक्ष्य था।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन के इतिहास में पहली बार, COP26 घोषणा ने कोयले के उपयोग को कम करने की आवश्यकता का उल्लेख किया, लेकिन यह कोयले या जीवाश्म ईंधन में लक्षित कटौती का आह्वान करने में विफल रहा।

जीएसआर 2022 स्पष्ट करता है कि देशों की नेट ज़ीरो प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयासों की आवश्यकता होगी, और यह कि कोविड-19 से मिला मौका गुज़र गया है।

यह रिपोर्ट बताती है कि जलवायु कार्रवाई के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धताओं के बावजूद सरकारों ने ऊर्जा संकट के प्रभावों को कम करने के लिए अपनी पहली पसंद के रूप में जीवाश्म ईंधन उत्पादन और इस्तेमाल के लिए सब्सिडी प्रदान करने के विकल्प को चुना। 2018 और 2020 के बीच, सरकारों ने 18 ट्रिलियन अमरीकी डालर की भरी रक़म – जो 2020 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 7% था- जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर ख़र्च किया। भारत में तो ऐसा कुछ रिन्यूएबल के समर्थन को कम करते हुए किया गया।

यह प्रवृत्ति महत्वाकांक्षा और कार्रवाई के बीच एक चिंताजनक अंतर का खुलासा करती है।

“रिन्यूएबल ऊर्जा को ठंडे बस्ते में रखने और लोगों के ऊर्जा बिलों को कम करने के लिए जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर निर्भर होने के बजाय, सरकारों को कमज़ोर घर-परिवारों में रिन्यूएबल ऊर्जा प्रौद्योगिकियों की स्थापना को सीधे वित्तपोषित करना चाहिए,” अदीब ने कहा।

Clean energy transition not happening globally: Renewables 2022 Global Status Report (REN21)

2030 लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत को अपने स्वच्छ ऊर्जा सब्सिडी में महत्वपूर्ण वृद्धि करनी चाहिए : सीईईडब्ल्यू-आईआईएसडी

Renewable energy

India must significantly increase clean energy subsidies to meet its 2030 targets: CEEW-IISD

IISD-CEEW has released its report- ‘Mapping India’s Energy Policy 2022: Aligning Support and Revenues with a Net-Zero Future’.

भारत में अक्षय ऊर्जा पर सब्सिडी (Subsidy on Renewable Energy in India) 59 प्रतिशत गिरकर 6,767 करोड़ रुपये हो गई है, जो वित्त वर्ष 2017 में 16,312 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। वहीं जीवाश्म ईंधन को वित्त वर्ष 20-21 में मिल रही सब्सिडी (fossil fuel subsidy in india) अक्षय ऊर्जा को मिल रही सब्सिडी से नौ गुना रही।

अक्षय ऊर्जा को मिलने वाली सब्सिडी में इस गिरावट के लिए कोविड-19 महामारी की वजह से लागू लॉकडाउन के दौरान सोलर प्लांट स्थापित करने की धीमी रफ्तार और ग्रिड स्तर के सौर पीवी व पवन ऊर्जा की कीमत अन्य पारंपरिक स्रोतों से उत्पादित बिजली की कीमत के बराबर होने जैसे कारण जिम्मेदार हैं।

यह जानकारियां काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) की ओर से आज जारी एक संयुक्त स्वतंत्र अध्ययन में दी गई हैं।

2030 स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, सौर विनिर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन और भरोसेमंद विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को विस्तार देने के लिए ज्यादा सब्सिडी सहायता देने की जरूरत होगी।

मैपिंग इंडियाज़ एनर्जी पॉलिसी 2022: अलाइनिंग सपोर्ट एंड रेवेन्यू विद ए नेट-ज़ीरो फ्यूचर रिपोर्ट में पाया गया कि वर्ष 2014 और 2021 के बीच सात साल की अवधि में कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के लिए भारत की कुल सब्सिडी 72% की भारी गिरावट के साथ 68,226 करोड़ रुपये हो गई है। लेकिन, वित्त वर्ष 20-21 में सब्सिडी अभी भी अक्षय ऊर्जा सब्सिडी (renewable energy subsidy) की तुलना में नौ गुना अधिक है। इसलिए, देश को 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता और 2070 तक नेट ज़ीरो (शुद्ध शून्य) उत्सर्जन तक पहुंचने के लिए सब्सिडी सहायता को जीवाश्म ईंधन से घटाने व स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों की तरफ और ज्यादा स्थानांतरित करने की आवश्यकता है।

कुल मिलाकर, भारत ने वित्त वर्ष 20-21 में ऊर्जा क्षेत्र की सहायता करने के लिए 540,000 करोड़ रुपये से अधिक प्रदान किए, जिसमें सब्सिडी के रूप में लगभग 218,000 करोड़ रुपये शामिल हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भारत ने मई 2022 में प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) (PMUY) योजना के लाभार्थियों के लिए 200 रुपये प्रति गैस सिलेंडर (12 सिलेंडर तक) की एलपीजी (LPG) सब्सिडी को दोबारा शुरू कर दिया।

एलपीजी सब्सिडी एक स्वागत योग्य कदम

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इस अध्ययन के सह-लेखक और सीईईडब्ल्यू (CEEW) में फेलो व रिसर्च कोऑर्डिनेशन के निदेशक कार्तिक गणेशन ने कहा, “एलपीजी सब्सिडी को दोबारा शुरू करना एक स्वागत योग्य कदम है। जैसे-जैसे राजकोषीय स्थिति में सुधार होता है, लक्षित एलपीजी (LPG) सब्सिडी को तेज़ी से बढ़ाना ही यह सुनिश्चित करने का एकमात्र उपाय है कि पीएमयूवाई (PMUY) योजना का लाभ लंबे समय तक बना रहे। इसके अलावा, कार्बन उत्सर्जन घटाने के भारत के घोषित लक्ष्यों के अनुरूप केंद्र और राज्यों को स्वच्छ ऊर्जा के लिए मध्यम और लंबी अवधि में पर्याप्त सहायता और वित्तपोषण के विकल्पों को सुनिश्चित करना चाहिए।”

अध्ययन में आगे कहा गया है कि वित्त वर्ष 2021 में इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) सब्सिडी, वित्त वर्ष 2017 की तुलना में तीन गुना से ज्यादा बढ़कर 849 करोड़ रुपये हो गई है। इस वर्ष के दौरान, भारत ने ईवी और कल-पुर्जों के घरेलू निर्माण में निवेश को आकर्षित करने के लिए उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन कार्यक्रम की भी घोषणा की।

रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि भारत की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) (NBFCs) अब सार्वजनिक वित्त को जीवाश्म ईंधन से दूर करने में एक प्रमुख भूमिका निभा रही हैं, लेकिन आज तक, किसी भी सार्वजनिक वित्त संस्थान (पीएफआई) (PFIs) ने जीवाश्म ईंधन के लिए वित्त को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए स्पष्ट योजना स्थापित नहीं की है।

रिपोर्ट के अनुसार, वास्तव में, वित्त वर्ष 2020-21 में सबसे बड़े पीएफआई की ओर से जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादकों को वार्षिक कर्ज वितरण अक्षय ऊर्जा उत्पादकों की तुलना में तीन गुना ज्यादा रहा। भले ही कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) (PSUs) ने नई स्वच्छ ऊर्जा भागीदारी और लक्ष्यों की घोषणा की है, उन्हें व्यापार मॉडल को ऊर्जा संक्रमण और नेट ज़ीरो (शुद्ध-शून्य) लक्ष्यों के अनुरूप बनाने के लिए स्पष्ट रणनीतियां निर्धारित करने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट की सह-लेखक और आईआईएसडी में पॉलिसी एडवाइजर स्वस्ति रायज़ादा ने कहा, “भारत के ऊर्जा संक्रमण की गति को तेज़ करने के लिए, सार्वजनिक वित्त संस्थानों को घोषित नीतिगत लक्ष्यों के अनुरूप स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए ऋण लक्ष्यों को बढ़ाने और जीवाश्म ईंधन के लिए सार्वजनिक वित्त को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने व संभावित फंसी हुई संपत्तियों का प्रबंधन करने के लिए मध्यम से दीर्घकालिक रूपरेखा तैयार करने की जरूरत है।”

स्वस्ति रायज़ादा ने आगे कहा, “उन्हें (सार्वजनिक वित्त संस्थानों को) कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए नए सार्वजनिक वित्त को तेज़ी से समाप्त करने की कोशिश करनी चाहिए, जिसके फंसी हुई संपत्ति में बदल जाने का जोखिम बहुत ज्यादा है।”

साल 2030 के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अधिक सहयोग की ज़रूरत होगी। इस सहयोग में सब्सिडी भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता और जिसकी मदद से अंततः सौर ऊर्जा क्षेत्र में उत्पादन वृद्धि, हरित हाइड्रोजन, और विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा  मिल पाएगा।

न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण के लिए रखना होगा कोयला खदान श्रमिकों के हितों का भी ध्यान

ficci report

Climate change and the need for transition : For equitable energy transition, the interests of coal mine workers will also have to be taken care of.

पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता (commitment to the environment) के अनुरूप, भारत 2070 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कार्बन एमिशन की तीव्रता (Carbon Emission Intensity) को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर लगातार काम कर रहा है। 

दुनिया के सर्वाधिक विविधतापूर्ण बिजली उत्पादन क्षेत्रों में से एक है भारत

भारत में बिजली उत्पादन के स्रोतों पर नज़र डालें तो यह क्षेत्र वैसे तो दुनिया भर का सबसे विविध बिजली उत्पादन क्षेत्रों में से एक है, लेकिन भारत में कोयले द्वारा तापीय विद्युत उत्पादन कुल उत्पादन क्षमता का लगभग 62% है। ऐसे में पारंपरिक बिजली से स्वच्छ ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन में ट्रांज़िशन (Transition from conventional electricity to clean fuel-based energy generation) के लिए, एक समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से, कोयला खदान श्रमिकों के हितों की रक्षा करना बेहद ज़रूरी है। ऊर्जा संक्रमण के नाम पर उन लोगों और उनसे जुड़े परिवारों को अनदेखा नहीं किया जा सकता जिनका जीवन और एक लिहाज से अस्तित्व कोयला खदानों से जुड़ा है। 

कोयला खदान श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए क्या करना होगा?

कोयला खदान श्रमिकों की आर्थिक मजबूरियों को दूर करने के लिए एक कौशल विकास कार्य योजना तैयार करनी होगी। साथ ही, उनका पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए, उनको किसी नए रोजगार के लिए प्रशिक्षित करने का मजबूत ढांचा भी तैयार करना होगा।

ये कहना है ईवाई, एसईडी फंड और फिक्की के साझा प्रयास से तैयार, “भारत में कोयले से अक्षय ऊर्जा में संक्रमण को बढ़ावा देने के लिए कौशल कार्य योजना (स्किल एक्शन प्लान टू फ्यूल ट्रांज़िशन फ़्रोम कोल तो रिन्युब्ल एनर्जी इन इंडियाSkill action plan to fuel transition from coal to renewable energy in India)” नाम की रिपोर्ट का।

एक उभरता हुआ विषय है भारत में न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण

रिपोर्ट के लॉन्च पर बोलते हुए, ईवाई में पार्टनर और लीडर (पावर एंड यूटिलिटीज) जीपीएस, सोमेश कुमार ने कहा, “पर्यावरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं को देखते हुए, देश अब कोयला आधारित ऊर्जा से रीन्यूब्ल एनेर्जी में ट्रांज़िशन के लिए कमर कस रहा है। फ़िलहाल भारत में जस्ट ट्रांज़िशन या न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण एक उभरता हुआ विषय है, लेकिन अब वक़्त है इसके रणनीतिबद्ध तरीके से सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने का। ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्यों की कोयला आधारित बिजली उत्पादन (coal based power generation) की पूरी मूल्य शृंखला में अनगिनत परिवार जुड़े हैं। और इस ट्रांज़िशन के न्यायसंगत होने के लिए उन परिवारों के हितों का दध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। यह जरूरी है कि कोयला श्रमिकों को कोयला क्षेत्र से बाहर निकलने में मदद दी जाए और उन्हें दूसरे वैकल्पिक रोजगारों के लिए आवश्यक कौशल प्रदान किया जाए।”

जस्ट ट्रांज़िशन की सफलता और प्रासंगिकता का आधार क्या है?

आगे, जीपीएस के पार्टनर और लीडर (सोशल एंड स्किल्स सेक्टर) अमित वात्स्यायन कहते हैं, “कोयला खदान श्रमिकों के कौशल और उद्यमिता विकास पर ही जस्ट ट्रांज़िशन की सफलता और प्रासंगिकता टिकी हुई है। ऐसा करना कोयले पर निर्भर क्षेत्रों के आर्थिक विविधीकरण को सुनिश्चित करेगा और इन क्षेत्रों में निवेश को भी आकर्षित करेगा। यह रिपोर्ट एक ऐसे ट्रांज़िशन ढांचे के विकास पर केंद्रित है जिसका उपयोग जिलों या राज्यों द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है कि न सिर्फ़ प्रभावित कोयला खदान श्रमिकों की आजीविका में व्यवधान कम से कम हो, उन्हें पर्याप्त अवसर भी प्रदान किए जाएं। इस ट्रांज़िशन को जस्ट या न्यायसंगत तब ही कहा जा सकता है जब सबसे गरीब और सबसे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के हितों की रक्षा की जाती है।”

एक न्यायपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर देते हुए, विपुल तुली, अध्यक्ष, फिक्की पावर कमेटी और सीईओ-दक्षिण एशिया, सेम्बकॉर्प इंडस्ट्रीज ने कहा, “कोयले से दूर होने से देश पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। यह पूरी कार्य योजना, इसकी लागत, पुनर्नियोजन और इससे जुड़े तमाम पक्ष राष्ट्रीय और बहुपक्षीय स्तर पर महत्व रखता है। ” 

स्किल एक्शन प्लान टू फ्यूल ट्रांज़िशन फ़्रोम कोल तो रिन्युब्ल एनर्जी इन इंडिया रिपोर्ट की मुख्य बातें

जैसे-जैसे ऊर्जा क्षेत्र में थर्मल से नवीकरणीय स्रोत की ओर झुकाव बढ़ेगा, ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी जिससे कोयले पर निर्भरता भी आने वाले वर्षों में और बढ़ने की उम्मीद है। इसलिए, भारत के सामने एक दोहरी चुनौती है – अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और थर्मल क्षेत्र से जुड़े कार्यबल का सही प्रबंधन करना। भारत में लगभग 50% खदानें अत्यधिक लाभहीन हैं और जल्द ही बंद हो सकती हैं जिससे उन खदानों में श्रमिकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

  • कार्यबल पर बदलाव का प्रभाव

कोयला खदानों से 7.25 लाख से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार और कई अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होते हैं। पुराने कोयला संयंत्रों के बंद होने और खदानों के बंद होने से पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र में हजारों कोयला खदान श्रमिकों की आजीविका में व्यवधान का खतरा है। उनमें से ज्यादातर ब्लू-कॉलर कार्यकर्ता हैं जिन्हें समय के नए कौशल के साथ कुशल बनाने की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष श्रमिकों के अलावा, खनन जिलों की पूरी अर्थव्यवस्था कोयले से संबंधित गतिविधियों के इर्द-गिर्द घूमती है, और समुदायों ने पीढ़ियों से इस पर भरोसा किया है।

जस्ट ट्रांजिशनकी अवधारणा (Concept of ‘Just Transition’)

‘जस्ट ट्रांजिशन’ कोयला खदान श्रमिकों की आजीविका के संभावित नुकसान के कारण आर्थिक कमजोरियों को संबोधित करता है। वैकल्पिक उद्योगों में खनिकों के पुन: एकीकरण के लिए आर्थिक विविधीकरण और आजीविका को बढ़ावा देने की सुविधा पर जोर देना महत्वपूर्ण है। विभिन्न रीस्किलिंग कार्यक्रम प्रभावित खनिकों को कोयला खनन उद्योग से बाहर निकलने के लिए नए कौशल और संसाधन हासिल करने में सक्षम बनाएंगे। उद्यमिता विकास और एमएसएमई को बढ़ावा देना कोयला पर निर्भर उद्योग कस्बों की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और विविधता लाने में प्रमुख कारक होंगे।

राज्य कौशल कार्य योजना (State Skill Action Plan)

रिपोर्ट में कौशल कार्य योजनाओं की रूपरेखा दी गई है जो परिवर्तनशील खनिकों के लिए उद्योग-प्रासंगिक कौशल और आजीविका संवर्धन हस्तक्षेपों को डिजाइन करने में मदद करने के लिए कार्यों के खाके/ढांचे के रूप में कार्य करेगी। ये योजनाएं राज्यों को श्रमिकों की संक्रमण संबंधी जरूरतों को पूरा करने की रणनीति के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त बनाएंगी। कौशल कार्य योजना के घटकों में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • संभावित नौकरी के नुकसान का अनुमान लगाते हुए भौगोलिक समूहों की पहचान
  • लक्षित जनसंख्या का आकलन – खनिक
  • प्रमुख उद्योग चालकों और अनिवार्यताओं की पहचान
  • चल रहे कौशल वृद्धि और आजीविका सहायता कार्यक्रमों में तालमेल बनाना
  • वित्त पोषण और कार्यक्रम वितरण सहायता के लिए सहयोग और संस्थागत सुदृढ़ीकरण
  • अभिसरण कार्यक्रम वितरण को साकार करने के लिए पदाधिकारियों की क्षमता निर्माण
  • खनिकों को कार्यक्रमों के लाभों का आकलन करने के लिए निगरानी और प्रभाव मूल्यांकन

ज्ञान प्रबंधन – रेडी रेकनर्स, वैश्विक और राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं आदि का भंडार।

2030 तक सर्दियों में दिल्ली का प्रदूषण एयरशेड स्तर के नियंत्रण से किया जा सकता है कम – टेरी

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एयरशेड स्तर के नियंत्रण से 2030 तक दिल्ली की सर्दियों में प्रदूषण 35% तक किया जा सकता है कम : TERI

जब देश की राजधानी में एक बार फिर सांस फूलने लगी है, तब द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) के अज जारी अध्ययन से कुछ उम्मीद बंधती है। इस अध्ययन में PM2.5 की सांद्रता को कम करने के तरीकों (Ways to reduce the concentration of PM2.5) के साथ भविष्य के विभिन्न परिदृश्यों को प्रस्तुत किया गया है।

Cost-effectiveness of interventions for control of air pollution in Delhi

दिल्ली में वायु प्रदूषण के नियंत्रण के लिए हस्तक्षेपों की लागत-प्रभावशीलता‘ के शीर्षक से आज जारी और ब्लूमबर्ग फिलान्थ्रोपीज़ द्वारा समर्थित यह अध्ययन कई हस्तक्षेपों की लागत प्रभावशीलता की भी जांच करता हैं और PM2.5 सांद्रता में कमी ला सकने में इनकी प्रासंगिकता का भी आकलन करता है।

मूल रूप से यह अध्ययन भविष्य के तीन अनुमान लगाता है – अल्पावधि में 2022 के लिए, मध्यम अवधि में 2025 और विभिन्न हस्तक्षेपों के लिए वायु गुणवत्ता और लागत परिदृश्यों के आकलन के लिए लंबी अवधि में 2030 के लिए। अगर हम इसी गति पर रहे तो, इस अध्ययन के आधार वर्ष 2019 की तुलना में, साल 2022, 2025 और 2030 में सर्दियों में PM2.5 की सांद्रता क्रमशः 9%, 21% और 28% गिरेगी ऐसी उम्मीद है। अध्ययन में नोट किया गया है कि हालांकि PM2.5 की सांद्रता वर्षों में मामूली रूप से गिर सकती है, लेकिन स्तर 60μg per m³ के राष्ट्रीय मानकों से काफी ऊपर बने रहेंगे।

वर्ष 2019 में, दिल्ली में PM2.5 सांद्रता ने वार्षिक औसत मानकों का लगभग तीन गुना उल्लंघन किया।

परिवहन (23%), बिजली संयंत्रों सहित उद्योग (23%), और बायोमास बर्निंग (14%) 2019 के दौरान दिल्ली में सर्दियों के समय प्रचलित PM2.5 सांद्रता में प्रमुख योगदानकर्ता थे।

अगर NCR और बाकी एयरशेड – एक भौगोलिक क्षेत्र है जिसके भीतर हवा सीमित है-  में सर्दियों के मौसम में PM2.5  के स्तर को नीचे लाया जाना है तो उत्सर्जन को रोकने के लिए और अधिक कड़े नियंत्रण की बात की गई है।

बड़ी बात यह है कि एयरशेड स्तर के नियंत्रण से वर्ष 2030 तक सर्दियों के मौसम में PM2.5 सांद्रता को 35% तक कम किया जा सकता है।

पूरे साल एक समस्या के रूप में वायु प्रदूषण पर ध्यान हो केवल सर्दियों के मौसम में ही नहीं

TERI की महानिदेशक डॉ विभा धवन कहती हैं,

“वायु प्रदूषण पर केवल सर्दियों के मौसम में ही नहीं, बल्कि पूरे साल एक समस्या के रूप में इस पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। एनसीआर में वायु गुणवत्ता (Air Quality in NCR) में सुधार के लिए पूरे एयरशेड में सख्त कार्रवाई की जरूरत है। आवश्यक गतिविधियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के बजाय, स्वच्छ विकल्पों पर स्विच करना महत्वपूर्ण है।”

Air pollution level in Delhi

TERI में फेलो और सह-परियोजना अन्वेषक डॉ अंजू गोयल बताती हैं “दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर क्षेत्रीय स्रोतों से और ज़्यादा खराब होता है जो शहर के भीतर स्थानीय स्रोतों को जोड़ते हैं। क्षेत्र में वायु गुणवत्ता के प्रभावी नियंत्रण के लिए एयरशेड-आधारित क्षेत्रीय पैमाने पर वायु गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता होती है”।

ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपी में भारत के जलवायु और पर्यावरण कार्यक्रमों का नेतृत्व करने वाली प्रिया शंकर कहती हैं,

“वायु प्रदूषण संकट की गंभीरता और पैमाने को देखते हुए, हमें सरकार, व्यवसाय, नागरिक समाज और नागरिकों में बहु-स्तरीय कार्रवाई और सहयोग की आवश्यकता है। इस विश्लेषण से पता चलता है कि मज़बूत और निरंतर मिटिगेशन प्रयासों से दिल्ली की वायु गुणवत्ता में सुधार संभव है।”

अध्ययन में परिवहन, बायोमास और उद्योगों जैसे क्षेत्रों में विभिन्न नीतिगत हस्तक्षेपों से उत्सर्जन और PM2.5 सांद्रता में कमी की संभावनाओं का अनुमान लगाया गया है। यह वायु प्रदूषण को संबोधित करने के लिए एक एयरशेड दृष्टिकोण के स्वास्थ्य और आर्थिक सह-लाभों का भी आकलन करता है, और अगर 2022-2030 के बीच क्षेत्रीय PM2.5 नियंत्रण रणनीतियों को लागू किया जाता है तो 430 अरब रुपये (6.2 अरब डॉलर) के अतिरिक्त आर्थिक लाभ जैसे प्रत्यक्ष और संबद्ध लाभों की गणना करता है।

यह उम्मीद की जाती है कि एयरशेड क्षेत्र में वाहनों के विद्युतीकरण, थर्मल पावर प्लांटों के पर्यावरण मानकों के कार्यान्वयन, बेड़े के आधुनिकीकरण, सार्वजनिक परिवहन में शिफ़्ट आदि सहित हस्तक्षेपों से वार्षिक औसत मानक को पूरा किया जा सकता है। लेकिन सर्दियों के दौरान राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों को प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त नियंत्रण, जैसे कि खेतों में अमोनिया की रिलीज़ को रोकना, कचरा जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करना, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तित करना, सबसे कठोर धूल दमन नियंत्रण, ईंट भट्ठों के लिए और स्वच्छ प्रौद्योगिकी, इंडक्शन कुक-स्टोव का उपयोग, और निर्माण गतिविधियों से धूल के सख्त नियंत्रण की आवश्यकता है।

अध्ययन के अनुसार, सामान्य की तरह व्यवसाय परिदृश्य में पूरे एयरशेड में वैकल्पिक नियंत्रण रणनीतियों के कार्यान्वयन से 2022 में 14,000 से अधिक मौतों और 2030 में दिल्ली NCR में 12,000 मौतों से बचा जा सकता है।

इस टाली गई मृतकों की संख्या के परिणामस्वरूप वर्ष 2022-2030 में लगभग 480-430 बिलियन ($6.9 – $6.2 बिलियन) का आर्थिक लाभ हो सकता है।

COP26 में लिया गया यह फैसला क्या कोयले को इतिहास की किताब में भेजेगा?

Coal

Will this decision taken at COP26 send coal to the history book?

ग्लोबल कोल टू क्लीन पावर ट्रांजिशन स्टेटमेंट पर दो दर्जन देशों के हस्ताक्षर

यूनाइटेड किंगडम के नेतृत्व में, दुनिया के कुछ दो दर्जन देशों और अन्य संस्थानों ने, ग्लोबल कोल टू क्लीन पावर ट्रांजिशन स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर कर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई कोयला बिजली उत्पादन में सभी निवेशों को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।

कोयले का अंत निकट है – आलोक शर्मा (जलवायु शिखर सम्मेलन, COP26 के अध्यक्ष)

इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए, इस साल के जलवायु शिखर सम्मेलन, COP26, के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा, “आज, मुझे लगता है कि हम कह सकते हैं कि कोयले का अंत निकट है।”

आगे, ई3जी में जीवाश्‍म ईंधन अनुसंधान प्रबंधक, लियो रॉबर्ट्स कहते हैं, “ग्लासगो में पिछले कुछ दिनों के दौरान कोयले से विमुखता तेजी पकड़ रही है। नयी साझेदारियों और धन कोयले को इतिहास की बात बनाने के लिये एक साथ आ रहे हैं। देशों की प्रतिबद्धताओं को गंभीर दानदाताओं के धन से सम्‍बल मिला है, जो दुनिया के कोयला जलाने वाले देशों को सबसे अधिक प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन से मुंह मोड़ने और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को लागू करने में मदद करने के लिए नए तंत्र और उपकरणों से लैस है।”

अब नजदीक आ रहा है कोयला युग का अंत (Now the end of the coal age is approaching)

वो आगे कहते हैं, “बृहस्‍पतिवार को की गयी घोषणाओं और की गयी पहल की व्‍यापकता और गहराई पर गौर करें तो इससे यह इशारा मिलता है कि कोयले से पीछा छुड़ाने का सिलसिला कितनी तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है। अनेक देश कोयले से चलने वाली नयी परियोजनाओं पर निवेश बंद करने का निर्णायक विकल्‍प चुन रहे हैं। अनेक देशों ने तो अपने-अपने कोयला बिजलीघरों को आवश्‍यक रूप से बंद करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। संयुक्‍त रूप से ये घोषणाएं यह जाहिर करती है कि कोयला युग का अंत अब नजदीक आ रहा है। कोयले को इतिहास के कूड़ेदान में ले जाने वाली कन्वेयर बेल्ट आगे बढ़ रही है। वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्‍य के अनुरूप इसे और तेज करने की आवश्यकता है।”

“सीओपी26 में कोयले की प्रगति दर्शाती है कि वैश्विक कोयले से बाहर निकलने के लिए परिस्थितियाँ परिपक्व हैं। अब हमें बड़े पैमाने पर आने वाले स्वच्छ ऊर्जा वित्त को सभी देशों को तेजी से उपलब्ध कराने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी देश 2030 तक ओईसीडी देशों को कोयला मुक्त और शेष दुनिया को 2040 तक कोयले से स्वच्छ बनाने के लिए आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकें।”

इसी क्रम में, एम्‍बर के ग्‍लोबल लीड डेवी जोंस ने कहा,

“आज की प्रतिबद्धताओं से सभी महाद्वीपों को कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की अपनी यात्रा में मदद मिलेगी। यह इतना बड़ा क्षण है क्योंकि अब तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की महत्वाकांक्षा में सबसे बड़ा अंतर कोयला उत्पादन में तेजी से गिरावट है – यानी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के लिए 2030 तक और शेष दुनिया में 2040 तक कोयला बिजली को चरणबद्ध ढंग से समाप्‍त करना।’’

“यूरोप में, पोलैंड कोयले का आखिरी बड़ा गढ़ है, और यह ज्यादातर यूरोप की कोयला-मुक्त बनने के सफर को अंजाम देगा। अफ्रीका में, दक्षिण अफ्रीका और मोरक्को अफ्रीका के 95% कोयला उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए यह अफ्रीका को कोयला मुक्त बनने की ओर ले जाएगा। एशिया में, वियतनाम जैसे विकासशील देश पहली बार कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। दुनिया के तीन सबसे बड़े कोयला देशों – चीन, भारत और अमेरिका ने पहले ही प्रतिबद्धताएँ बना ली हैं जो अपनी बिजली प्रणालियों को कोयले से दूर ले जाने की शुरुआत कर रहे हैं। यह गति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि कोयले से स्वच्छ बिजली में तत्काल रूपांतरण करना अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और जलवायु के लिए सबसे अच्छा विकल्प है।’’

“यह ब्रिटिश सरकार द्वारा तैयार की गयी साइन-ऑन सूची नहीं है। इन देशों में से प्रत्येक में यह वर्षों का राष्ट्रीय कार्य है और वे इस पर काम कर रहे हैं कि वे कितनी जल्दी कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर सकते हैं। ये देश कोयले को चरणबद्ध ढंग से खत्‍म करना चाहते हैं। इस सूची में फाइनेंसर भी शामिल हैं, जो  कोयला नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा को ऐसी जगह के तौर पर रेखांकित करते हैं, जहां स्मार्ट धन है।’’

“कोयले को लेकर पेरिस से अब तक की कहानी यही रही है कि नए कोयला बिजली संयंत्रों के निर्माण को कैसे रोका जाए। यह घोषणा “कोई नयी कोयला परियोजना नहीं” के लक्ष्‍य से हटकर “कोयले को चरणबद्ध से समाप्‍त” करने की तरफ पूरी तरह से ले जाती है।’’

अफ्रीका के एफसीडीओ मंत्री विकी फोर्ड ने कहा,

स्वच्छ ऊर्जा की ओर न्यायोचित और समावेशी रूपांतरण ब्रिटेन और अफ्रीका के लिए फायदे का सौदा है। कोयले को चरणबद्ध तरीके से खत्म करना ब्रिटेन के सीओपी प्रेसीडेंसी का एक केंद्रीय उद्देश्य है और यह विकासशील दुनिया में सैकड़ों हजार हरित रोजगार पैदा करते हुए ब्रिटिश लोगों के लिए एक स्वच्छ, हरित भविष्य में सहयोग करेगा।’’

Conversion to renewable energy

“यह नया वित्त पोषण अक्षय ऊर्जा में रूपांतरण करने वाले अफ्रीकी देशों के प्रस्ताव पर सहयोग को रूपांतरित कर देगा। द अफ्रीका रीजनल क्‍लाइमेट एंड नेचर प्रोग्राम (The Africa Regional Climate and Nature Program) पूरे अफ्रीका में हरित बिजली नेटवर्क का समर्थन करेगा, जिससे 4 मिलियन से अधिक लोग लाभान्वित होंगे और ट्रांसफ़ॉर्मिंग एनर्जी एक्सेस प्लेटफ़ॉर्म विकासशील दुनिया भर में 25 मिलियन अधिक लोगों को स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करते हुए देखेगा।”

ब्रिटेन पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से कई सबसे महत्वाकांक्षी स्वच्छ ऊर्जा प्रतिबद्धताओं को पूरा कर रहा है। ब्रिटेन वर्ष 2024 तक कोयला बिजली को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है और वह 2035 तक एक डीकार्बोनाइज्ड पावर सिस्टम के साथ अक्षय ऊर्जा उत्पादन को आगे बढ़ा रहा है। यह इस बात को दर्शा रहा है कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ती अर्थव्यवस्था की कीमत पर निपटने की जरूरत नहीं है।

वर्ष 1990 से 2019 के बीच ब्रिटेन की अर्थव्‍यवस्‍था में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं कार्बन उत्‍सर्जन (carbon emission) में 44 प्रतिशत की गिरावट आयी। यह जी7 देशों में शामिल किसी मुल्‍क में सबसे तेजी से आयी गिरावट है। ब्रिटेन में कोयले से बनने वाली बिजली (coal-fired electricity) अब 2 प्रतिशत से भी कम है जो एक दशक पहले करीब 40  प्रतिशत थी। इन उपलब्धियों में पिछले महीने ब्रिटेन के लैंडमार्क नेट जीरो स्‍ट्रैटेजी का प्रकाशन भी शामिल है, जिसमें उद्योगों तथा उपभोक्‍ताओं को अक्षय ऊर्जा को अपनाने के लिये उठाये जाने वाले जरूरी कदमों के बारे में रेखांकित किया गया है। वहीं, इसमें अच्‍छे वेतन वाली सैकड़ों हजारों नौकरियों और वर्ष 2030 तक 90 अरब पाउंड तक के निजी निवेश के बारे में भी बताया गया है। 

वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक 2021 : उभरती ऊर्जा अर्थव्यवस्था 2050 तक नेट ज़ीरो के लिए नाकाफ़ी

energy power

World Energy Outlook 2021 shows a new energy economy is emerging – but not yet quickly enough to reach net zero by 2050

With emissions, climate disasters and energy market volatility all rising, governments need to send an unmistakeable signal of clean energy ambition and action at COP26 to accelerate the transition

नई दिल्ली, 13 अक्तूबर 2021 : जिस रफ्तार से सौर और पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन आदि अन्य कम कार्बन प्रौद्योगिकियां फल-फूल रही हैं, उसके मद्देनज़र यह साफ़ है कि दुनिया में एक नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था उभर रही है। लेकिन यह उभरती अर्थव्यवस्था नेट ज़ीरो के लक्ष्य हासिल करने के लिए काफ़ी नहीं।

यह संकेत मिलता है COP26 से पहले, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा आज जारी वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक से, जो स्पष्ट करता है कि वैश्विक उत्सर्जन को नेट ज़ीरो की ओर बढ़ते हुए उसमें निरंतर गिरावट लाने के लिए मौजूदा गति अभी भी बहुत कम है।

फ़िलहाल जब नीति निर्माता जलवायु परिवर्तन और अस्थिर ऊर्जा बाजारों दोनों के प्रभावों से जूझ रहे हैं, विश्व ऊर्जा आउटलुक 2021 (WEO-2021) को ग्लासगो में COP26 जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिए एक पुस्तिका के रूप में डिज़ाइन किया गया है, जो एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगी जलवायु कार्रवाई और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाने के लिए।

पहली बार, WEO में एक ऐसा परिदृश्य शामिल है जो केंद्रीय परिदृश्य के रूप में 2050 तक नेट ज़ीरो ऊर्जा प्रणाली का मार्ग (Net Zero Emissions by 2050 Scenario) दिखाता है। यह एक वास्तविकता दिखाता है जिसमें :

·         2030 तक, रिन्यूएबल ऊर्जा में वार्षिक निवेश जीवाश्म ईंधन उत्पादन में निवेश (investing in fossil fuel production) को पार कर जाएगा : एक ही वर्ष में रिन्यूएबल ऊर्जा से बिजली उत्पादन के लिए $1.3 ट्रिलियन के निवेश का अनुमान है

·         LNG (एलएनजी) में निवेश एक सुरक्षित विकल्प नहीं है: कुल फंसी हुई पूंजी का अनुमान 75 अरब USD (अमेरिकी डॉलर) है; जिसका मतलब है कि वर्तमान में निर्माणाधीन LNG परियोजनाओं से जुड़े अधिकांश निवेशक अपनी निवेशित पूंजी की वसूली नहीं कर पाएंगे;

·         विश्व की 90% से अधिक आबादी दैनिक आधार पर प्रदूषित हवा में सांस लेती है, जिसके कारण IEA (आईईए) का अनुमान है कि एक वर्ष में 5 मिलियन से अधिक प्रीमैचोर (समय से पहले) मौतें होती हैं। नेट ज़ीरो परिदृश्य के तहत, इस संख्या को गंभीर रूप से कम किया जा सकता है: 2020 की तुलना में, 2030 तक प्रति वर्ष घरेलू वायु प्रदूषण से 1.9 मिलियन कम प्रीमैचोर मौतें होती हैं, जिसमें 95% से अधिक की कमी उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में होती है।

इस वर्ष का WEO एक एनर्जी प्राइस संकटकाल के बीच में आता है, जिसके कारणों को IEA द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक ब्लॉग में स्पष्ट रूप से समझाया गया है।

IEA के कार्यकारी निदेशक फतिह बिरोल (Fatih Birol, the IEA Executive Director) कहते हैं कि, “वैश्विक प्राकृतिक गैस की कीमतों में हालिया वृद्धि कई कारकों का परिणाम है, और क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन (स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण) को ज़िम्मेदार ठहराना गलत और भ्रामक है।”

वह आगे यह भी समझाते हैं कि,

“यह वृद्धि यूरोप में गैस, कोयले और कार्बन की कीमतों में महोर्मि से प्रेरित है।” और “अच्छी तरह से प्रबंधित स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण उन मुद्दों का समाधान है जो हम आज गैस और बिजली बाजारों में देख रहे हैं – उनका कारण नहीं।”

हाल के हफ्तों में गैस, कोयले और बिजली की कीमतें दशकों में अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। ये वृद्धि कारकों के संयोजन के कारण हुई है, लेकिन स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के द्वार पर ज़िम्मेदारी डालना ग़लत और भ्रामक है।

एंबर के ग्लोबल प्रोग्राम लीड डेव जोन्स ने कहा,

“IEA के वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक से पता चलता है कि 2030 के 1.5C के महत्वाकांक्षा के अंतर को पाटने के लिए बिजली क्षेत्र डीकार्बोनाइज़ेशन (electric field decarbonization) सबसे बड़ा एकल लीवर है। इस दशक में पवन और सौर परिनियोजन को देशों द्वारा पहले से घोषित किए गए से दुगुने होने की आवश्यकता है। इससे कोयले का उत्पादन इतना कम हो जाएगा कि 1.5 डिग्री (लक्ष्य) पहुंच के भीतर रह सके। 2030 के लिए आने वाली प्रतिबद्धताओं द्वारा COP26 परिभाषित होगा, इसलिए यह तथ्य कि वो बिजली क्षेत्र है जहां सबसे बड़ा अंतर है, का मतलब है कि 2030 के लिए COP प्रतिबद्धताओं को स्वच्छ बिजली विषय को संबोधित करने की आवश्यकता है। ”

रिपोर्ट स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में काम करने की तात्कालिकता को स्पष्ट करती है : “2030 महत्वाकांक्षा अंतर को पाटने के लिए बिजली क्षेत्र डीकार्बोनाइज़ेशन सबसे बड़ा एकल लीवर है”।

IEA का नंबर एक समाधान बिजली को साफ करने के लिए बड़े पैमाने पर धक्का देना है, इस दशक में पहले से घोषित नीतियों के सापेक्ष दोगुनी सौर और पवन ऊर्जा की आवश्यकता (need for wind power) है। इस पवन और सौर ऊर्जा से कोयला उत्पादन कम होगा। IEA से पता चलता है कि मीथेन में कमी के साथ, कोयले को सौर और पवन से बदलना इस दशक में उपलब्ध सबसे बड़ी शून्य-लागत उत्सर्जन में गिरावट है।

पिछले साल कोविड -19 संकट के शुरुआती महीनों में वैश्विक ऊर्जा खपत (global energy consumption) में ऐतिहासिक गिरावट ने कई ईंधन की कीमतों को दशकों में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया। लेकिन तब से, उन्होंने ज़ोरदार वापसी की है। प्राकृतिक गैस की कीमतों (natural gas prices) में सबसे बड़ी वृद्धि देखी गई है, यूरोपीय और एशियाई बेंचमार्क क़ीमतों ने पिछले हफ्ते एक सर्वकालिक रिकॉर्ड को तोड़ दिया – एक साल पहले के अपने स्तर से लगभग दस गुना।

US में प्राकृतिक गैस की कीमतें अक्टूबर 2020 से तीन गुना से अधिक हो गई हैं और 2008 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं।

पांच गुना बढ़ गईं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोयले की कीमतें

अंतर्राष्ट्रीय कोयले की कीमतें एक साल पहले के अपने स्तर से लगभग पांच गुना हुई हैं, और चीन और भारत में, जो दुनिया के दो सबसे बड़े कोयला उपभोक्ता हैं, कोयला बिजली संयंत्रों के पास सर्दियों के मौसम से पहले बहुत कम स्टॉक है।

बिजली पैदा करने के लिए प्राकृतिक गैस के बजाय कोयले का उपयोग क्यों बढ़ रहा है? Why is there increasing use of coal instead of natural gas to generate electricity?

प्राकृतिक गैस की कीमतों में मज़बूत वृद्धि (Strong rise in natural gas prices) ने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और एशिया सहित प्रमुख बाजारों में बिजली पैदा करने के लिए प्राकृतिक गैस के बजाय कोयले के उपयोग पर पर्याप्त स्विचिंग को प्रेरित किया है। कोयले का बढ़ा हुआ उपयोग विश्व स्तर पर बिजली पीढ़ी से CO2 उत्सर्जन को बढ़ा रहा है।

ऑयल चेंज इंटरनेशनल की अनुसंधान सह-निदेशक केली ट्राउट ने कहा कि :

“हमने देखा है कि कुछ सरकारें और जीवाश्म ईंधन कंपनियां IEA  के 1.5°C परिदृश्य को ‘अवास्तविक’ के रूप में ख़ारिज कर देती हैं, लेकिन यह सोचने से बड़ा कोई भ्रम नहीं है कि हम अधिक से अधिक जीवाश्म ईंधन निकालकर जलवायु संकट को हल कर सकते हैं। जिन सरकारों ने अपने ऊर्जा निवेश को ठीक साबित करने के लिए अतीत में WEO का सहारा लिया है, अब IEA के मार्गदर्शन की अनदेखी करने में उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है, जब यह अंततः पेरिस में उनकी सहमती वाली 1.5 °C सीमा के अनुरूप है।

“विज्ञान की परवाह करने में सरकारें किस तरफ़ हैं इसका एक संकेत यह होगा कि तेल और गैस लाइसेंसिंग को समाप्त करने के लिए COP26 में बियॉन्ड ऑयल एंड गैस एलायंस को लॉन्च करने में डेनमार्क और कोस्टा रिका के साथ कौन शामिल होगा। हम इस पर भी नज़र रख रहें हैं कि जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्त को समाप्त करने और रिन्यूएबल ऊर्जा समाधानों में धन को स्थानांतरित करने के लिए संयुक्त रूप से प्रतिबद्ध होने में यूके और यूरोपीय निवेश बैंक के साथ कौन शामिल होता है।

“यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि IEA  के विश्लेषण में नए तेल और गैस क्षेत्रों के हित में कोई तर्गसंगतता नहीं पाई गई है, बावजूद इसके के इसमें कुछ जोखिम भरे मॉडलिंग विकल्प हैं जो प्रदूषण की मुलतवी करते हैं। पिछले महीने, 150 से अधिक नागरिक समाज समूहों ने IEA से अपने 1.5°C परिदृश्य में कार्बन कैप्चर और भंडारण, जीवाश्म गैस और बायोफ्यूल (जैवईंधन) पर अधिक निर्भरता को कम करने का अनुरोध किया, और हम स्वच्छ और न्यायपूर्ण ऊर्जा समाधानों को प्राथमिकता देने के लिए IEA पर ज़ोर डालना जारी रखेंगे।”

अक्षय ऊर्जा के लिए सब्सिडी, वित्त वर्ष 2017 के बाद से लगभग 45 फीसदी कम

अक्षय ऊर्जा के लिए सब्सिडी,जीवाश्म ईंधन सब्सिडी में रिफ़ार्म,कोविड-19 से आर्थिक सुधार

Subsidies for renewable energy, about 45% less since FY 2017

नए सिरे से समर्थन की ज़रूरत पर विशेषज्ञों का जोर

नए शोध सुझाते हैं कि भारत को कोविड-19 से आर्थिक सुधार के हिस्से के रूप में आत्मनिर्भर भारत और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के अपने लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए रिन्यूएबल ऊर्जा के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने की आवश्यकता है।

नई दिल्ली, 15 जुलाई 2017. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IISD) (आईआईएसडी) और काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) (सीईईडब्ल्यू) द्वारा “मैपिंग इंडियाज़ एनर्जी सब्सिडीज़ 2021: टाइम फॉर रिन्यूड सपोर्ट टू क्लीन एनर्जी” (भारत की ऊर्जा सब्सिडी का मानचित्रण 2021: स्वच्छ ऊर्जा के लिए नए सिरे से समर्थन का समय) शीर्षक वाली, आज जारी  रिपोर्ट में पाया गया है कि रिन्यूएबिल ऊर्जा के लिए सब्सिडी में वित्तीय वर्ष (वित्त वर्ष) 2017 में INR 15,470 करोड़ के शीर्ष स्तर से 45% की गिरावट आई है और वित्त वर्ष 2020 में यह INR 8,577 करोड़ रह गयी है। इसलिए इस व्यवस्था का पुनर्विलोकन अब बेहद ज़रूरी है।

IISD और CEEW विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पहले से चल रहे ट्रांजिशन की प्रगति को निभाय रखने के लिए, स्वच्छ ऊर्जा को नया वित्त पोषण महत्वपूर्ण है।

शोधकर्ता इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बढ़ती सब्सिडी जैसे सकारात्मक रुझानों की ओर इशारा करते हैं, जो कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की बढ़ती सार्वजनिक मांग के कारण वित्त वर्ष 2019 से 135% बढ़कर वित्त वर्ष 2020 में 1,141 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। लेकिन वे यह भी ध्यान देते हैं कि इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट का पूरा लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब इसमें ग्रीन (हरित) इलेक्ट्रिसिटी का मिश्रण हो।

रिपोर्ट व्याख्या करती है कि रिन्यूएबिल ऊर्जा सब्सिडी कई वजहों से एक ठहराव पर है, जैसे सौर और पवन ग्रिड-स्केल बाज़ार समता हासिल करना, कम परिनियोजन स्तर, और सब्सिडी योजनाओं के आवंटन अवधि के अंत में क़रीब पहुंचना शामिल हैं।

अध्ययन के सह-लेखक, IISD के बालसुब्रमण्यम विश्वनाथन कहते हैं,

यह ग्रिड एकीकरण और भंडारण, डीसेंट्रेलाइज़ेड रिन्यूएबल ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और अपतटीय पवन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित समर्थन उपायों की एक नई लहर का समय है। भारत को 2030 तक 450 गीगावॉट रिन्यूएबल ऊर्जा के अपने प्रशंसनीय लक्ष्य को पूरा करने के लिए हर साल लगभग 39 गीगावॉट के ऐतिहासिक स्तर का परिनियोजन करना चाहिए। सही समर्थन नीतियों के बिना इस लक्ष्य को प्राप्त करने की कल्पना करना कठिन है। लेकिन पुरस्कार बड़ा है: वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाना, जलवायु संकट से निपटना और ग्रीन आर्थिक सुधार की शुरुआत करना।”

दूसरी ओर, तेल और गैस सब्सिडी वित्त वर्ष 2019 से वित्त वर्ष 2020 तक 16% बढ़ गयीं, जिसका मुख्य कारण तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) (एलपीजी) की घरेलू खपत के लिए वित्तीय सहायता है। हालांकि, विशेषज्ञ इस पर ध्यान देते हैं कि LPG सब्सिडी को वित्त वर्ष 2021 के तेल मूल्य मे भारी  गिरावट के दौरान निलंबित कर दिया गया था और अभी तक इसे फिर से शुरू नहीं किया गया है। यह भविष्य के वर्षों में तेल और गैस सब्सिडी को कम कर सकता है, लेकिन स्वच्छ ऊर्जा पहुंच के बारे में नई चिंताओं को जन्म दिया है, क्योंकि स्वच्छ खाना पकाने के लिए कोई वैकल्पिक समर्थन प्रदान नहीं किया गया है। इस बीच, शोधकर्ताओं ने वित्त वर्ष 2022 तक केरोसिन सब्सिडी को सफलतापूर्वक समाप्त करने की सरकार की प्रतिबद्धता की सराहना की, जिससे कुल तेल और गैस सब्सिडी भी कम होनी चाहिए।

कुल मिलाकर, अध्ययन में पाया गया है कि व्यापक डाटा के नवीनतम वर्ष तक जीवाश्म ईंधन के लिए समर्थन में वृद्धि हुई है, वित्त वर्ष 2020 में यह INR 70,578 करोड़ तक पहुंची है। यह स्वच्छ ऊर्जा के लिए सभी सब्सिडी के टोटल के सात गुना से अधिक है।

विशेषज्ञ इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि जीवाश्म ईंधन सब्सिडी में रिफ़ार्म (सुधार) से कोविड-19 से आर्थिक सुधार और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश के लिए मूल्यवान अतिरिक्त संसाधन उत्पन्न हो सकते हैं।

रिपोर्ट अन्य सरकारी उपायों की भी पहचान करती है जो ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा दे सकते हैं।

CEEW के सह-लेखक प्रतीक अग्रवाल कहते हैं,

कोयला टैक्स रेवेन्यू (कर-राजस्व) के एक हिस्से को स्वच्छ ऊर्जा और Transition (बदलाव) से प्रभावित समुदायों, क्षेत्रों और आजीविका के लिए पुनर्निर्देशित करने से एक निष्पक्ष और न्यायसंगत ऊर्जा Transition (बदलाव)  सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, सरकार को वर्तमान में जीवाश्म ईंधन में अधिक निवेश करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को स्वच्छ ऊर्जा में उच्च स्तर के निवेश के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करने और विनिर्माण में राष्ट्रीय क्षमता स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।”

ग्रीन रिकवरी को समर्थन देने के लिए सरकार के पास एक उत्कृष्ट अवसर है। आत्मनिर्भर भारत के साथ गठबंधन में अब स्वच्छ ऊर्जा के लिए नई पीढ़ी के समर्थन उपायों को डिज़ाइन कर के यह सुनिश्चित किया  जा सकता है कि कोई भी पीछे न छूटे।