निष्प्राण देह बनकर रह गई है हिंदी कविता

Has Hindi poetry become antisocial

Hindi poetry has become a dead body कितनी ही सुंदर हो, कितने ही जेवरात सजे हों, सेज फूलों से लबालब लदी फन्दी हो, अगरबत्ती और चंदन की खुशबू हो, लेकिन उसकी सड़ांध सही नहीं जाती। हिंदी कविता में तत्सम शब्दों का, विशुद्धता का, भाषिक दक्षता का, बाजार की ब्रान्डिंग का, अमेज़न की मार्केटिंग का, इंटरनेट

बल्लीमारान की चूड़ी वाली तंग गली में.. इन दिनों खनक नहीं है..

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बल्लीमारान की चूड़ी वाली तंग गली में.. इन दिनों खनक नहीं है .. बाज़ार में लड़कियों की धनक नहीं है… ज़रा ज़रा से बहाने मेंहदी लगवाने .. भइया पक्का रचेगी ना .. करती हुई बातें … शगुनों वाली औरतों की जमातें .. काशीदा दुपट्टे कानों के झूलते बाले .. वो रौनक़ों के उजाले.. सब ग़ायब