आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ : हिंदी के प्रथम छंद शास्त्री और हिंदी के सर्वप्रथम ‘महामहोपाध्याय’

biography of acharya jagannath prasad 'bhanu'

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ की जीवनी | Biography of Acharya Jagannath Prasad ‘Bhanu’

हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के प्रारंभिक वर्षों में साहित्य नियमन के तीन अंग (three parts of literary regulation), भाषा, व्याकरण और साहित्य शास्त्र के नेतृत्व की बागडोर मूल रूप से ‘द्विवेदी… गुरू… भानु’ की महत्त्रयी के हाथों में रही।

भारतेन्दु काल में आधुनिक समीक्षा (Modern Review in Bharatendu Period) को प्रौढ़ रूप नहीं मिलता है किंतु उसका प्रारंभिक स्वरूप महत्व है। इस युग से ही समीक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रारंभ हो गया। हिंदी को विगत युग के साहित्य के अलावा प्रांतीय भाषाओं के साहित्य से भी पर्याप्त सामग्री मिली और हिंदी का नवीन रूप एक युग आवश्यकता की पूर्ति के रूप में प्रस्तुत हुआ। साहित्य के प्रेरणा तत्व बने सुरुचि, नैतिकता और बौद्धिकता।

परवर्तीकाल में साहित्यशास्त्र के सैद्धांतिक व्यवहारिक पक्षों में पश्चिमी तत्वों की स्वीकृति क्रमश: अधिक होती गई। पूर्व स्थापित भारतीय मानदण्ड के आधार पर समीक्षा कम होती गई।

साहित्य शास्त्र विवेचना का यह प्रत्यावर्तन, उसमें समाज शास्त्रीय तथा वैज्ञानिक तत्वों के सूचक बिन्दुओं का स्वभावत: ही बहुत महत्व है।

भानुजी के पूर्व शास्त्रीय ग्रंथों में निश्चय ही संस्कृति की परम्परा का पिष्ट पोषण ही किया जा रहा था।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख साहित्य सेवी आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु

आधुनिक हिंदी साहित्य शास्त्र परम्परा का अध्ययन आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ के छंद और ‘प्रभाकर’ और ‘काव्य प्रभाकर’ को छोड़कर नहीं किया जा सकता, किंतु आधुनिक शोध-ग्रंथों में आचार्य भानु की वैसी ही स्थिति है जैसी ‘मानस’ में उर्मिला की।

भानु जी ने पच्चीस से अधिक कृतियों की रचना किंतु उपरोक्त दो कृतियों द्वारा उनके आचार्यत्व की स्थापना हुई।

हिंदी के सर्वप्रथम महामहोपाध्याय आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु

वे हिंदी के सर्वप्रथम विद्वान हैं जिन्हें ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि से विभूषित किया गया। उनसे पूर्व यह सम्मान केवल संस्कृत के ब्राह्मण विद्वान को ही मिलता था। सन् 1942 में भानुजी को महात्मा गांधी, डॉ. ग्रियर्सन आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, पं. गौरीशंकर ओझा, बाबू श्यामसुन्दरदास तथा ‘हरिऔध जी’ के साथ नागरी प्रचारिणी समिति ने सम्मानित किया था।

आचार्य भानु का जन्म अगस्त 8, 1859 को नागपुर में हुआ था। आपके पिता बख्शीराम भोंसले सेना में सेवा करते थे। भानुजी की औपचारिक शालेय शिक्षा बहुत ही कम हुई थी किंतु उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फारसी, प्राकृत, उड़िया, मराठी तथा अंग्रेजी और साहित्य को गहन अध्ययन किया। इसके उन्होंने दर्शन, धर्म, गणित तथा ज्योतिष शास्त्रों का भी अध्ययन किया। सन् 1875 में रायपुर में मोहर्रिर के पद पर सेवा प्रारंभ कर वे सन् 1912 में सीनियर असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के पद पर से सेवानिवृत्त हुए। इस बीच वे बिलासपुर, खंडवा, वर्धा, सागर तथा सम्बलपुर जिला में रहे। सेवानिवृत्त होकर वे बिलासपुर में ही रहने लगे थे। जहां उन्होंने सहकारी शासकीय आन्दोलन तथा स्त्री शिक्षा प्रसार का कार्यक्रम आरंभ किया। उन्हें बिलासपुर जिले में ‘सहकारी आन्दोलन का जनक’ कहा जाता है। बिलासपुर सहकारी संस्था द्वारा भानुजी की स्मृति में एक भवन निर्मित कराया गया है।

‘एक भारतीय आत्मा’ पं. माखनलाल जी चतुर्वेदी जब प्राथमिक शाला में शिक्षक थे और साहित्य क्षेत्र में बढ़ने का क्रमिक उत्साह संजोए हुए थे। उन्हें भानुजी से शक्तिमयी प्रेरणा और सहायता प्राप्त हुई। इसी प्रकार गंगाप्रसाद अग्निहोत्री तथा सैयद अमीर अली ‘मीर’ को भी वे लगातार उत्साहित करते रहे। उनके साहित्य व्यक्तित्व की निर्मित में भानुजी को योगदान उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त, मध्यप्रदेश के स्थान-स्थान पर कवि समाज की स्थापना कर उन्होंने इस क्षेत्र में साहित्यिक जागरण की चेतना का प्रसार किया था।

भानुजी को प्रारंभिक ख्याति कवि के रूप में मिली थी। उनकी पैतृक सम्पत्ति कविता ही थी। वे मनीषी थे, अर्जित ज्ञान और गंभीर अध्ययन द्वारा उन्होंने अपनी प्रतिभा का आत्यन्तिक विकास किया था। उनकी प्रारंभिक कृतियों से तत्कालीन विद्वत् समाज काफी प्रभावित हुआ था सन् 1885 में उन्हें ‘भानु’ की उपाधि प्राप्त हुई थी।

‘छन्द प्रभाकर’ भानुजी की सबसे पहली कृति है। इसकी रचना सन् 1893 में हुई और प्रकाशन सन् 1894 में हुआ। इस ग्रंथ में पहली बार हिंदी में छन्द: शास्त्र का विस्तृत सुचिंतित वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। इसमें छन्द लक्षण मात्रा, वर्ण, प्रत्यय आदि का विराट वर्णन विद्वतापूर्वक किया गया। इस ग्रंथ की कुछ अभूतपूर्व उपलब्धियां हैं। छन्दों का वर्णन गद्य में करने के अतिरिक्त जिस छंद का वर्णन किया गया है उसके लक्ष्ण तथा उदाहरण इसी छन्द में बताए गए हैं। इस तरह वह एक साथ लक्षण तथा उदाहरण दोनों का ही कार्य सिद्ध करते हैं। साथ में, सुकवियों की रचनाओं में से भी उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किए और स्थान-स्थान पर संस्कृत तथा मराठी के छन्दों को हिंदी के छन्दों के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया है। परवर्ती संस्करण में भानुजी ने तुकान्त का अध्ययन विश्लेषण भी इसमें जोड़ दिया और उर्दू, फारसी के बहरों का हिंदी छन्दों के साथ तुलना की। इस संदर्भ में भानुजी के निष्कर्ष ऐतिहासिक तथा शास्त्रीय महत्व के हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि फारसी की अरकान को उर्दू में ग्रहण किया गया और उर्दू की बहर हिंदी के मात्रिक छन्द के अंतर्गत आ जाते हैं। भानुजी ने अंग्रेजी के ‘मीटर’ का भी हिंदी के छंदों के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया, साथ ही हिंदी छन्दों का अंग्रेजी में संक्षिप्त स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत किया। भानुजी के छंद वर्णन में छन्द शास्त्र का वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। उनके द्वारा प्रस्तुत छन्द विषयक परिभाषा तथा मान्यता आज भी अभिमान्य है।

‘छन्द प्रभाकर’ के परावर्ती छन्द विषयक प्राय: समस्त ग्रंथ उसी के आधार पर ही प्रणीत किए गए हैं। ‘छन्द प्रभाकर’ के प्रकाशन के तीन वर्ष उपरांत सन् 1897 में भानुजी का दूसरा ग्रंथ ‘नव पंचामृत रामायण’ प्रकाशित हुआ। उस ग्रंथ में छन्द शास्त्र का सम्पूर्ण वर्णन रामचरितमानस के आधार पर किया गया है। उल्लेखनीय है कि भानुजी तुलसीदास जी के भक्त थे। वे महाकवि तुलसीदास जी के छन्दशास्त्र ज्ञान की प्रतिष्ठा की।

सन् 1909 में ‘काव्य प्रभाकर’ का प्रकाशन हुआ। इस ग्रंथ का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना है। ‘काव्य प्रभाकर’ में पहली बार साहित्य शास्त्र का सर्वांग वर्णन हुआ। छन्द ध्वनिनंद, काव्यगुण, गद्य, पद्य, नाटक, संगीत, नायक-नायिका भेद, अनुमान, उद्दीपन, संचारीभाव, स्थायीभाव, रस, अलंकार आदि विविध शास्त्रीय अंगों का विश्लेषण नवीन दृष्टि से करने का प्रयास किया गया है। इस ग्रंथ में ‘कोश तथा लोकोक्ति संग्रह’ भी है। आधुनिक काल ने लोकोक्ति संग्रह करने की दिशा में पहला प्रयास भानुजी ने ही किया है।

‘काव्य प्रभाकर’ एक प्रकार से प्राचीन काव्य शास्त्र का वृहद कोष है। किंतु पूर्व आचार्यों के मतों का खण्डन मंडन करके भानुजी ने अपनी मौलिकतापूर्ण नवीन दृष्टि का परिचय भी दिया है। इस संदर्भ में सैद्धांतिक शब्दावली दृष्टव्य है। अर्थ, संदर्भ तथा दृष्टि के नए आयामों को भानुजी ने स्थान-स्थान पर उदाहरण तथा छुट-पुट व्याख्याओं द्वारा निरूपित किया है। उनकी परिभाषिक शब्दावली न तो संस्कृत की परम्परा का अनुमोदन करती हैं, न रीत्याचार्यों की भांति उसमें क्लिष्टता और दुरूहता है, साथ ही, वह पश्चिम के प्रभाव से भी पूर्णत: मुक्त है।

भानुजी के अन्य साहित्य शास्त्रीय ग्रंथों में ‘छन्द प्रभाकर’ में प्रस्तुत सिद्धांतों का अधिक विश्लेषणात्मक किन्तु सुगम अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। ये कृतियां हैं, ‘छंद सारावली’, ‘अलंकार प्रश्नोत्तरी’, ‘हिंदी काव्यालंकार’, ‘रस रत्नाकर’, ‘काव्य प्रबन्ध’, और ‘नायिका भेद’ शंकावली।

भानुजी की गणित तथा ज्योतिष संबंधी कृतियों का भी बहुत सम्मान किया गया है। काल विज्ञान से संबंधित इतनी कृति ‘काल विज्ञान’ तथा ‘काल प्रबोध’ के अतिरिक्त ‘की टू परपेचुअल केलेण्डर, ए.डी. एण्ड बी.सी.’ विख्यात हैं। ‘अंक विलास’ नाम ग्रंथ में गणित संबंधी अनेक समस्याओं का हल प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही ‘की टू परम्युटेशन ऑफ फीगर्स’ भी गणित संबंधी रचना है।

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानुकी काव्य कृतियां (Poetry works of Acharya Jagannath Prasad ‘Bhanu’)

भानुजी की दो काव्य कृतियां ‘तुम्हीं तो हो’ तथा ‘जय हार चालीसी’ भी उपलब्ध है। ‘जयहार चालीसी’ का मराठी अनुवाद उन्होंने किया था। वे ‘फैज’ उपनाम से उर्दू में भी रचनाएं किया करते थे। ‘गुलजारे फैज’ उनका काव्य संग्रह है जबकि ‘गुलजारे सुखन’ में भानुजी ने उर्दू के प्रसिद्ध रचनाकारों के पद का संग्रह सम्पादित किया है।

साहित्य प्रसार में पत्रिकाओं के महत्व (Importance of magazines in literary dissemination) को ध्यान में रखकर उन्होंने दो साहित्यिक मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी आरंभ करवाया था। ‘काव्य कला निधि’ का प्रकाशन मिरजापुर से और ‘काव्य सुधा निधि’ का जबलपुर से होता था।

भानुजी को आधुनिक हिंदी साहित्य शास्त्र का प्रथम आचार्य कहें तो वह उचित ही होगा।

कार्य महत्ता की दृष्टि से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को नहीं भुलाया जा सकता किंतु उनका कार्य परवर्ती है। अपने रचनाकाल में भानुजी अकेले हैं। उनके साथ ही सर्वश्री कन्हैयालाल पोद्दार, भगवानदीन, रसाल, सीताराम शास्त्री, अर्जुनदास केडिया, हरिऔघ आदि की गणना की जाती है किंतु सन् 1894 से 1909 तक हिंदी साहित्य शास्त्र का, विशेषकर छंद शास्त्र का, विश्लेषणात्मक ढंग से इतना विशाल कार्य किसी अन्य साहित्य शास्त्री ने नहीं किया था जितना भानुजी ने किया था। अत: ऐतिहासिक क्रम में भानुजी प्रथम हैं।

हिंदी में सौंदर्यशास्त्र के अग्रणी विद्वान आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु (Acharya Jagannath Prasad ‘Bhanu’, a leading scholar of aesthetics in Hindi)

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ ने सामाजिक पक्ष को ध्यान में रखकर परिवर्तित आधारों तथा मूल्यों से सैद्धांतिक विवेचन को सम्बद्ध कर निष्कर्ष दिए हैं। उनके निष्कर्ष युग चेतना से अनुप्राणित है। उस काल में उनका भाषा वैज्ञानिक तथा साहित्य इतिहासज्ञ स्वरूप नई संभावना से युक्त रहा था। वे अंतर्दृष्टि सम्पन्न समीक्षक थे। सैद्धांतिक समीक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा से नया आलोक प्रकीर्ण हुआ जिससे भविष्य की रूपरेखा की सृष्टि हो सकी।

वे कर्मठ साहित्य सेवा की भांति जीवन के अंतिम क्षणों तक साहित्य साधना करते रहे थे। अक्टूबर 25, 1945 को उनके निधन से हिंदी साहित्य का एक पुंज आलोकपुंज बुझ गया था। वे छत्तीसगढ़ के साहित्य सेवियों में अग्रगामी थे।

डॉ. सुशील त्रिवेदी

क्यू-3 श्रीरामनगर

फेज-2, शंकर नगर

रायपुर

Notes : Acharya Jagannath Prasad Bhanu’s best known work was Chandaḥprabhākara, a work of Hindi prose, published in nine editions during his life. (आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु की सबसे प्रसिद्ध कृति चंदप्रभाकर थी, जो उनके जीवन के दौरान नौ संस्करणों में प्रकाशित हिंदी गद्य की एक कृति थी।)

आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु की प्रमुख कृतियाँ

चन्दप्रभाकर (1894): एक हिन्दी गद्य कृति। उनके जीवनकाल में इस लोकप्रिय कृति के कई संस्करण देखे गए और 1939 में इसके नौवें संस्करण में प्रकाशित हुआ।

नवपंचामृत रामायण (1897): यह रामचरितमानस पर आधारित एक कृति है।

काव्यप्रभाकर (1909): हिंदी में काव्य पर एक काम।

चंदा सारावली (1917)

अलंकार प्रणोत्तरी (1918)

हिंदी काव्यालंकार (1918)

काव्या प्रबंध (1918)

काव्या कुसुमांजलि (1920)

नायिका भेदा शंकावली (1925)

रसरत्नकार (1927): ए वर्क ऑन एस्थेटिक्स इन हिंदी।

श्री तुलसी तत्त्व प्रकाश (1931)

रामायण वर्णावली (1936)

अलंकार दर्पण (1936)

श्री तुलसी भव प्रकाशन (1937)। (स्रोत – विकिपीडिया)

वेबोक्रेसी में विश्व हिंदी दिवस माने हिंदी के पराभव का आख्यान

world hindi day

विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी पर विशेष | Special on World Hindi day 10 january

आज विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day 2022) है। यह लोकतंत्र के पराभव और वेबोक्रेसी के उत्थान का युग है। यह बौने को महान और महान को बौना बनाने का युग है। इस दिवस पर कम से कम एक पोस्ट यूनीकोड हिंदी में किसान समस्या पर जरूर लिखें।

प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन | विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को क्यों मनाया जाता है?

विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित – प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन (First World Hindi Conference) 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था इसीलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था।

विश्व हिन्दी दिवस का उद्देश्य | विश्व हिंदी दिवस मनाने का उद्देश्य क्या है?

इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार – प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। आप भी फेसबुक पर हिंदी की समस्याओं पर कुछ जरूर लिखें। लेकिन हिंदी वाले निरंतर हिंदी त्याग रहे हैं, उनके बच्चे हिंदी की बजाय अंग्रेजी में बात करना पसंद करते हैं। इनमें अधिकांश मोदी और दक्षिणपंथी विचारधारा से गहरे प्रभावित हैं, लेकिन यह सब विमर्श से गायब है।

हिंदी रसातल में है। मित्रगण और भी नीचे ले जाने में लगे हैं। 

हिंदी फेसबुक में सब सच लिखते हैं! कोई गलत नहीं लिखता! हिंदी महान है। यही वजह है उसके पास लेखक कम है, लेखकनुमा अधिक हैं!

मोदीभक्त हिंदी का अहित कर रहे हैं

हिंदी साहित्य, लेखकों और बुद्धिजीवियों के खिलाफ सुनियोजित ढंग से घृणा पैदा की जा रही है। हिंदी के इस फिनोमिना की जड़ें कहां हैं ? असल में साहित्य संस्कारों और कला-आस्वाद से वंचित हिंदी वाले साहित्यकार और साहित्य की पीड़ा और नजरिए को नहीं समझ सकते। इस तरह के कला शून्य मोदीभक्तों की फेसबुक पर संख्या बेशुमार है, यही वे लोग हैं जो  लेखकों के द्वारा उठाए गए असहिष्णुता के सवाल को आज तक समझ नहीं पाए। वे वोटबैंक राजनीति से आगे देख नहीं पाए। लेखक के नजरिए का संबंध उसकी सामाजिक अवस्था में मच रही हलचलों, अशान्ति और असुरक्षा से है।

हर साम्प्रदायिक घटना पर प्रतिवादी लेखकों से कैफियत मांगना असहिष्णुता का घृणिततम रूप है। समाज में घट रही हर साम्प्रदायिक घटना पर कैफियत देने का दायित्व सरकार का है, खासकर केन्द्र सरकार और साम्प्रदायिक संगठनों का है।

हाल ही में  साम्प्रदायिकता ने जिस तरह आक्रामक भाव से अपने को प्रदर्शित किया है वह निंदनीय है, हम सब धर्मनिरपेक्ष लोग उनकी हरकतों की निंदा करते हैं। फेसबुक पर साम्प्रदायिकता के पक्षधरों को जहरीला प्रचार करते सहज ही देखा जा सकता है।

भाषा के लिए साम्प्रदायिकता बेहद ख़तरनाक है (Communalism is very dangerous for language)

साम्प्रदायिकता माने विष है, खासकर भाषा के लिए तो यह बेहद ख़तरनाक है। जो इसमें अमृतरस खोज रहे हैं वे भारत-विभाजन को भूल रहे हैं। साम्प्रदायिक ताकतें (बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक) एक-दूसरे को जागृत-संगठित कर रही हैं और समाज का विभाजन कर रही हैं। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर बना रही हैं। सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रकामी नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि इन दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करें।

मुझे तीन चीजों से नफरत है एक है साम्राज्यवाद, दूसरी है वर्चस्व भावना और तीसरी है साम्प्रदायिकता। जबकि हमारे बहुत सारे फेसबुक मित्र आज भी इन तीनों से प्यार करते हैं। हम कहते हैं जरा इनसे नफरत करके तो देखो विवेक और समाज सुधर जाएगा। भाषा का समाज, लेखक, प्रकाशक, शिक्षा व्यवस्था, राजनीति, मीडिया और विज्ञापन आदि से गहरा संबंध है।

हिंदी लेखकों और प्रकाशकों की समस्याएं (Problems of Hindi writers and publishers)

जिस तरह हिंदी लेखकों की समस्याएं हैं उसी तरह हिंदी प्रकाशकों की भी समस्याएं हैं। प्रकाशकों की मूल समस्या है पुस्तकों के प्रति अभिरुचि का अभाव। मध्यवर्ग की रूचि नौकरी में है, कम्पटीशन में है, वैभवपूर्ण उपभोक्तावाद में है। पुस्तक प्रेम को हमने सामाजिक हैसियत नहीं बनाया,  बल्कि अन्य चीजों को सामाजिक हैसियत का प्रतिनिधि बना दिया। पुस्तक की मार्केटिंग बहुत ही पुरातनपंथी तरीके से होती है। इसमें जीवनशैली, सामाजिक हैसियत और ज्ञान शामिल नहीं है। हमें  पुस्तक के प्रचार को सूचनात्मकता के दायरे से निकालना चाहिए।

हिंदी में अधिकांश लेखक, लेखिकाएं अपने निजी खर्चे पर लेखन करते हैं, उनको कोई रॉयल्टी नहीं मिलती। जिन गिनती के लेखकों को रॉयल्टी मिलती है उससे वे अपने घर का एक महीने का खर्चा तक नहीं निकाल सकते। यह स्थिति फिलहाल बदलती नजर नहीं आती।

अब बताओ हिंदी दिवस पर खुश हों या आलोचना करें ?

इंटरनेट के लाभ हानि (advantages and disadvantages of internet)

हमारे युवा इंटरनेट के दीवाने हैं और उनको बताया जा रहा है कि इंटरनेट से क्या-क्या लाभ हैं, हम कभी यह भी सोचें कि इंटरनेट से हमारी किस तरह की हानि हो रही है ।इंटरनेट समग्रता में देखें तो नौकरी देने नहीं छीनने वाला माध्यम है।

इंटरनेट के कारण सारी दुनिया में किस तरह नौकरियां चली गयी हैं इन पर भी हम ठंडे दिमाग से सोचें। मसलन्, यदि ई-कॉमर्स सफल रहता है तो उससे सीधे जमीनी स्तर पर काम करने वाले लाखों लोगों का धंधा चौपट हो जाएगा। डाक तार सेवाओं में काम करने वाले हजारों -लाखों लोगों की यह माध्यम नौकरी खा चुका है। ऑनलाइन चौर्यकर्म के कारण अखबारों-पत्रिकाओं में लेखों का दुरुपयोग हो रहा है, समस्त किस्म की सर्जनात्मकता पर इसका बुरा असर पड़़ रहा है, लेकिन हम कभी रुककर सोच ही नहीं रहे हैं।

प्रेस में इंटरनेट ने बड़े पैमाने पर नौकरियां खाई हैं। खासकर रि्पोर्टर-फोटोग्राफर की नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इसके अलावा और भी क्षेत्र हैं जिन पर सोचने की जरुरत है।

वेबोक्रेसी के साइड इफेक्ट क्या हैं? | What are the side effects of Webocracy?

इंटरनेट आने के साथ डेमोक्रेसी का नहीं वेबोक्रेसी का हंगामा चल रहा है। वेबोक्रेसी के साइड इफेक्ट के बारे में कोई सवाल नहीं उठा रहा,उलटे इसका महिमा मंडन हो रहा है। वेबोक्रेसी ने एमेच्योर को महान बनाया है, कम जानकार को महिमामंडित किया है। हम तकनीक के प्रति क्रिटिकल कम उलटे उसके भक्त ज्यादा बने हैं।

संस्कृति को हाशिए पर फेंका है वेबोक्रेसी ने

ऑनलाइन फ्री कंटेंट की उपलब्धता के कारण फिल्म, पुस्तक लेखन, मौलिकशोध, संगीत आदि गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है। कहने के लिए वेबोक्रेसी का जन्म लोकतंत्र में हुआ है लेकिन इसके मूल आचरण में लोकतंत्र की उपलब्धियां (achievements of democracy) ही निशाने पर हैं।

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

इतिहास की प्रासंगिकता | हिंदी साहित्येतिहास की समस्याएं – पहला एपिसोड

relevance of history

Problems of Hindi Literary History – Episode 1 – Relevance of History

इतिहास में कितने काल होते हैं?

सामान्यीकरण क्या है इतिहास लेखन में सामान्यीकरण की भूमिका?

इतिहास जानने के स्रोत कौन कौन से हैं?

इतिहास की विषय वस्तु क्या है?

Hindi Sahitya Ka Itihas और उसका विभाजन

हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास

M.A. Hindi Literature

हिंदी साहित्य का इतिहास नोट्स

m.a. प्रीवियस हिंदी साहित्य का इतिहास

इन सारे विषयों को इस वीडियो कक्षा में प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी से समझें

लोकमान्य तिलक की दृष्टि में हिंदी एवं वर्तमान हिंदी अनुसंधान कार्य की दिशा

Direction of Hindi and current Hindi research work in the opinion of Lokmanya Tilak

किसी भी राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया की सबसे कमज़ोर कड़ी उसके वर्तमान द्वारा अतीत की उपेक्षा होती है. राष्ट्र – निर्माण की वैचारिकी के संदर्भ में इस समस्या को गहराई के साथ समझा जा सकता है. अतीत के विचारकों के संदर्भ में यदि इस समस्या पर विस्तार से विचार किया जाए तो हम देखते हैं कि लोकमान्य तिलक और भगत सिंह के राष्ट्र निर्माण संबंधी विचार लगभग उपेक्षित रहे हैं. जबकि यह साफ़ स्पष्ट है कि लोकमान्य तिलक के विचारों का स्वरूपगत अध्ययन वर्तमान भारतीय सामाजिक समस्याओं के समक्ष एक विचारणीय समाधान का स्वरूप मुहैया कराता है.

आज जब हम वर्तमान हिंदी अनुसंधान की दिशा और दशा पर अध्ययन करते हैं तब हम पाते हैं कि एक खास रणनीति के तहत भाषा और साहित्य के बीच संरचनात्मक अंतर को अलगाववादी दृष्टि से दर्शाया जाता है. जबकि स्वरूपगत अंतर के बावजूद भाषा और साहित्य एक दूसरे के पूरक होते हैं, खासकर भाषा संबंधी आंदोलन के संदर्भ में. लोकमान्य तिलक हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार करने के क्रम में भाषा और साहित्य के बीच इस अंतर का स्पष्ट खंडन करते हैं.

साहित्य और भाषा के संदर्भ में ऐतिहासिक परिघटनाओं का अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि 19 वीं सदी में इन समस्याओं पर भारत समेत अन्य राष्ट्रों में भी इस विषय पर गहराई से विचार किया जा रहा था.

अमेरिका के कला और विज्ञान अकादमी के सदस्य वाल्टर चेनिंग ने कहा था कि – “राष्ट्रीय साहित्य या यूँ कहें कि सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है. साहित्यिक विशिष्टताएँ भाषा की विशिष्टताओं से अंश मात्र ही भिन्न होती हैं और साहित्यिक मौलिकता मस्तिष्क की उस स्वतंत्र क्रिया का फल है जिसमें अन्य भाषा की दास्ता आवश्यक रूप से बाधा डालती है.”

कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी भाषा को अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों से बचाने के क्रम में वाल्टर चेनिंग भाषा और साहित्य के अलगाव को स्पष्ट रूप में ख़ारिज करते हुए उसे एकरूप में विचार करने पर ज़ोर देते हैं. किसी भी राष्ट्र के निर्माण और उसके एकीकरण के लिए भाषा और साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है.

साहित्यिक विशिष्टतों और भाषा की विशिष्टताओं के बीच गहरे संबंध को लोकमान्य तिलक बखूबी समझते हैं. उनकी दृष्टि में भाषा का महत्व राष्ट्र की सांगठनिक एकता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है.

लोकमान्य तिलक कहते हैं कि – “राष्ट्र के संगठन के लिए आज एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जिसे सर्वत्र समझा जा सके. लोगों में अपने विचारों का अच्छी तरह प्रचार करने के लिए बुद्ध ने भी एक भाषा को प्रधानता देकर कार्य किया था.”

यहाँ यह ध्यान रखना जरुरी है कि आज जिस रूप में हम अपने ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत से कटने के क्रम में तिलक जैसे विचारकों को भूलने की प्रक्रिया से ग्रस्त हैं, वहीं तिलक स्वयं इस समस्या से मुक्त हैं और यही कारण है कि भाषा पर विचार और उसकी सांस्कृतिक चेतना की शक्ति को पहचानते हुए वे बुद्ध तक का सफ़र करने से परहेज नहीं करते हैं.

लोकमान्य तिलक के विचारों के आलोक में वर्तमान भाषाई समस्याओं की शिनाख्त भी जरुरी है. इस क्रम में विचार करें तो पूर्व में हिंदी भाषा की स्वीकार्यता पर यह कहते हुए प्रश्न उठाया गया कि संविधान में अंग्रेजी की जरुरत को दक्षिण भारतीयों की मांग पर रखा गया है. हिंदी की स्वीकार्यता पर सिर्फ़ प्रान्तीय भाषाओं को आधार ही नहीं बनाया गया बल्कि प्रान्तीय भाषाओं की आड़ में अंग्रेजी को स्थापित करने का षड्यंत्र भी किया गया. प्रान्तीय भाषाओं के आधार को लोकमान्य तिलक के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है.

तिलक कहते हैं कि – “नि:संदेह हिंदी दूसरे कार्यों के लिए प्रान्तीय भाषाओं की जगह तो ले ही नहीं सकती. सब प्रान्तीय कार्यों के लिए प्रान्तीय भाषाएँ ही पहले की तरह काम में आती रहेंगी. प्रान्तीय शिक्षा और साहित्य का विकास प्रान्तीय भाषाओं के द्वारा ही होगा; लेकिन एक प्रान्त दूसरे प्रान्त से मिले, तो पारस्परिक विचार विनिमय का माध्यम हिंदी ही होनी चाहिए ; क्योंकि हिंदी अब भी अधिकांश प्रान्तों में समझ ली जाती है और बोलने तथा चिट्ठी लिखने लायक हिंदी थोड़े ही समय में सीख ली जाती है. इस विषय में कोई भी प्रान्तीय भाषा हिंदी का स्थान नहीं ले सकती.”

लोकमान्य तिलक के इन विचारों को कई स्तर पर समझा जा सकता है.

जिन अध्ययनकर्ताओं का संबंध भाषा संबंधी विचारों से है वे बखूबी समझते हैं कि भाषा पर किए गए विचारों में थोड़ी सी भी लापरवाही उसे सांप्रदायिक बना देता है. इस आधार पर देखें तो तिलक प्रान्तीय भाषाओं की अस्मिता के वजूद को स्वीकारते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारने की बात करते हैं. उनकी भारतीयता के प्रति किया गया यह चिंतन स्पष्ट कर देता है कि राष्ट्र निर्माण के प्रति वे कितने सचेत हैं. उनके इस चेतन को इस प्रसंग से भी समझा जा सकता है कि मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा जब हिंदी जाति की अवधारणा पर बात करते हुए मैथिली भाषा पर आलेख में अपने विचार को व्यक्त करते हैं तब बाबा नागार्जुन उन्हें भाषाई सांप्रदायिकता के आधार पर रेखांकित करते हैं. लेकिन लोकमान्य तिलक के विचार सांप्रदायिकता की पहुँच से कोसों दूर लक्षित होते हैं. तिलक के विचारों के आधार पर एक और मूल्यांकन सामने आता है.

तिलक हिंदी को प्रान्तीय पारस्परिक विचार विनिमय के रूप में देखते हैं जबकि दूसरी तरफ अंग्रेजी को दक्षिण भारतीयों की मांग पर रखने की बात कही जाती है.

अब प्रश्न यह उठता है कि तिलक की दृष्टि में प्रान्तीय पारस्परिक संबंधों के क्या मायने थे?

इस प्रश्न के आलोक में गहराई से शोध करने पर हम पाते हैं कि दक्षिण भारत के शंकरराव कम्पिकेरी, एम. वेंकटेश्वरन, नागप्पा, आय.पांडुरंग, सात्यिकी, वेणुगोपाल, टी.एल. नारायण, श्री गो. परमशिवन जैसे सैंकड़ों दक्षिण भारतीय विचारकों ने तथा सैंकड़ों दक्षिण पत्र पत्रिकाओं ने साफ़ तौर पर हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में अपनाने की सिर्फ़ सहमति ही नहीं दी बल्कि उसी प्रान्तीय पारस्परिक संबंधों के आधार पर हिंदी को स्वीकारने की बात की, जिसकी चर्चा पूर्व में लोकमान्य तिलक स्पष्ट रूप में कर चुके थे. ये लोकमान्य तिलक की दूरदर्शिता का सबसे सटीक उदाहरण साबित होता है. अगर हमने इस दूरदर्शिता का सकारात्मक उपयोग किया होता तो अंग्रेजी के संदर्भ में बनाए गए प्रोपगेंडा से हम कबका निजात पा चुके होते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसका परिणाम बेहद खतरनाक निकला. आज इंजीनियरिंग और एम्स जैसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में हिंदी माध्यम से पढ़कर आने वाले छात्र आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं.

आज जब यह साबित हो चुका है कि अपनी भाषाई प्रक्रिया में प्राप्त किया गया ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है बावजूद इसके हम अनुवाद की प्रक्रिया से ज्ञान हासिल करने के लिए श्रापित हैं. फिर बरबस यह सवाल भी उठता रहता है कि आज हम चरक, शुश्रुत, बुद्ध, महावीर, पाणिनी, आर्यभट्ट, पतंजलि, कौटिल्य क्यों नहीं तैयार कर पाते हैं?

गांधी ने कहा था कि – “यदि मैं तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा का दिया जाना बंद कर देता. सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषा अपनाने को मजबूर कर देता. जो आना कानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता. मैं पाठ्य पुस्तकों को तैयार किए जाने का इंतजार नहीं करता.”  

गाँधी का संपूर्ण जीवन और सारा संघर्ष अहिंसा के प्रति समर्पित रहा लेकिन यहाँ भाषा के संदर्भ में वे तानाशाह होने तक की परिकल्पना से चूकते नहीं. इससे समझा जा सकता है कि अपनी भाषा का क्या महत्व होता है?

गाँधी से पूर्व ही तिलक पाठ्य पुस्तकों और विद्यालयों के संदर्भ में कहते हैं कि – “राष्ट्रभाषा की बहुत जरुरत है. विद्यालयों में हिंदी की पुस्तकों का प्रचार होना चाहिए. इस प्रकार यह कुछ ही वर्षों में राष्ट्रभाषा बन सकती है.”

इस संदर्भ में पहले तिलक ने विचार किया या गाँधी ने, यह मसला महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि इन विचारों का हमारे भविष्य के साथ कैसा संबंध स्थापित होता है? क्योंकि जब तक हम इन सभी स्थितियों पर गहराई से विचार नहीं कर लेते हैं तब तक हिंदी में अनुसंधान कार्य की दिशा और दशा पर ठीक से बात नहीं कर पाएंगे. इस विषय पर बात करने से पूर्व हमें यह भी ध्यान रहे कि अतीत पर बात करना अतीतजीवी होना नहीं है और न तो ऋग्वेद पर बात करना पुरोहितवाद का समर्थक होना है.

ऐसी व्याख्याएं कमजोर मार्क्सवादियों की मुख्य समस्याएं रही हैं. यही कारण है कि वे अपने खेमे के प्रबल मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा को परंपरावादी सिर्फ़ इसलिए घोषित करते रहे क्योंकि उन्होंने अपनी संस्कृति को जानने समझने के लिए ऋग्वेद तक की यात्रा की थी. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस क्रम में जहाँ उन्हें रुढ़ि विरोधी होना था वहां वे अपने फ़तवों के कारण संस्कृति विरोधी होते चले गए…..

डॉ. संजीव कुमार

(रूसी-भारतीय मैत्री संघ दिशा, मास्को, रूस द्वारा आयोजित कार्यक्रम में डॉ. संजीव कुमार द्वारा दिये गये भाषण का पहला अंश)

(आलेख के अगले हिस्से में वक्तव्य का दूसरा अंश प्रकाशित किया जाएगा)…..    

प्रकृति की सुंदरता को कविताओं में उतारने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत

sumitranandan pant biography in hindi

सुमित्रानंदन पंत : व्यक्तित्व और कृतित्व (Sumitranandan Pant: Personality and Creativity)

भारत माता

ग्रामवासिनी

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैला सा आँचल

गंगा यमुना में आँसू जल,

मिट्टी की प्रतिमा

उदासिनी

भारत माता

ग्राम वासिनी

और

धरती का आँगन इठलाता

शस्य श्यामला भू का यौवन

अंतरिक्ष का हृदय लुभाता

जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली

भू का अंचल वैभवशाली

इस अंचल से चिर अनादि से

अंतरंग मानव का नाता…

जैसी सुंदर और मनमोहक कविताएँ लिखने वाले, प्रकृति की सुंदरता को कविताओं में उतारने वाले सुमित्रानंदन पंत हिंदी के जाने-माने कवि रहे हैं।

Sumitranandan Pant biography in Hindi | सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन परिचय |सुमित्रानंदन पंत का जन्म कब हुआ?

सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में 20 मई, सन् 1900 ई. को हुआ था। उनके पिता गंगादत्त कौसानी में एक चाय बागान के प्रबंधक थे।

सुमित्रानंदन पंत का वास्तविक नाम क्या था?

सुमित्रानंदन पंत के बचपन का नाम गुसाई दत्त था।

सुमित्रानंदन पंत की प्राथमिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्युलर स्कूल में हुई। वे ग्यारह वर्ष की आयु में अल्मोड़ा आ गए।

उन दिनों अल्मोड़ा में साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ लगातार चलती रहती थीं। पंत जी उनमें भाग लेने लगे। उन्होंने अल्मोड़ा से प्रकाशित होने वाली हस्तलिखित पत्रिका सुधाकर और अल्मोड़ा अखबार के लिए रचनाएँ लिखना शुरू कर दिया।

वे सत्यदेव जी द्वारा स्थापित शुद्ध साहित्य समिति नामक पुस्तकालय से पुस्तकें लाकर पढ़ते, जिससे उन्हें भारत के विभिन्न विद्वानों के साथ ही विदेशी भाषाओं के साहित्य के अध्ययन का अवसर सुलभ हो गया था।

पंत जी शुरुआत में अपने परिचितों और संबंधियों को कविता में चिट्ठियाँ भी लिखा करते थे। अल्मोड़ा में उनका परिचय हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार गोविंद वल्लभ पंत से हुआ। इसके साथ ही वे श्यामाचरण दत्त पंत, इलाचंद्र जोशी और हेमचंद्र जोशी के संपर्क में आए। इन साहित्यकारों के संपर्क में आकर सुमित्रानंदन पंत के व्यक्तित्व का विकास हुआ।

अल्मोड़ा में पंत जी को ऐसा साहित्यिक वातावरण मिला, जिसमें उनकी वैचारिकता का विकास हुआ। वैचारिकता के विकास के इस क्रम में उन्होंने सबसे पहले अपना नाम बदला। रामकथा के किरदार लक्ष्मण के व्यक्तित्व से, लक्ष्मण के चरित्र से प्रभावित होकर उन्होंने अपना नाम गुसाई दत्त से बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। बाद में पंत जी ने नेपोलियन बोनापार्ट के युवावस्था के चित्र से प्रभावित होकर लंबे और घुंघराले बाल रख लिए।

सन् 1918 में वे अपने भाई के साथ वाराणसी आ गए और क्वींस कॉलेज में अध्ययन करने लगे।

क्वींस कॉलेज से माध्यमिक की परीक्षा पास करके वे इलाहाबाद आ गए और म्योर कॉलेज में इंटरमीडिएट के छात्र के रूप में अध्ययन करने लगे।

इलाहाबाद आकर पंतजी गांधी जी के संपर्क में आए। सन् 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने म्योर कॉलेज को छोड़ दिया और आंदोलन में सक्रिय हो गए। वे घर पर रहकर और अपने प्रयासों से हिंदी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन करने लगे।

सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति के उपासक और प्रकृति की सुंदरता का वर्णन करने वाले कवि के रूप में जाना जाता है। पंत जी को ऐसी कविताएँ लिखने की प्रेरणा उनकी अपनी जन्मभूमि से ही मिली। जन्म के छह-सात घंटे बाद ही माँ से बिछुड़ जाने के दुख ने पंत जी को प्रकृति के करीब ला दिया था।

प्रकृति की रमणीयता ने, प्रकृति की सुंदरता ने पंत जी के जीवन में माँ की कमी को न केवल पूरा किया, बल्कि अपनी ममता भरी छाँह में पंत जी के व्यक्तित्व का विकास किया। इसी कारण सुमित्रानंदन पंत जीवन-भर प्रकृति के विविध रूपों को, प्रकृति के अनेक आयामों को अपनी कविताओं में उतारते रहे।

सुमित्रानंदन पंत का जीवन-दर्शन (Life Philosophy of Sumitranandan Pant), उनकी विचारधारा, उनकी मान्यताएँ और उनकी स्थापनाएँ प्रकृति के विभिन्न रूपों को साथ लेकर पनपती और विकसित होती रहीं।

बर्फ से ढंके पहाड़ों और उनके नीचे पसरी कत्यूर घाटी की हरी-भरी चादर; पर्वतों से निकलते झरनों; नदियों; आड़ू, खूबानी, चीड़ और बांज के सुंदर पेड़-पौधों और चिडिय़ों-भौंरों के गुंजार से भरी-पूरी उनकी मातृभूमि कौसानी ने उन्हें माँ की गोद का जैसा नेह-प्रेम दिया। इन सबके बीच पंत जी का प्रकृति-प्रेमी कवि अपनी अभिव्यक्ति पाया।

प्रकृति का सुकुमार कवि किसे कहा जाता है? प्रकृति के सुकुमार कवि कौन हैं?

जिस तरह एक बच्चे के लिए उसकी माँ ही सब कुछ होती है, उसी तरह पंत जी के लिए प्रकृति ही सबकुछ थी। इसी कारण सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता है।

प्रकृति-प्रेम का ही प्रभाव था कि जब वे चौथी कक्षा में पढ़ते थे, तब सात वर्ष की उम्र में ही कविताएँ रचने लगे थे। गिरजे का घंटा, बागेश्वर का मेला, वकीलों के धनलोलुप स्वभाव और तंबाकू का धुआँ आदि उनकी शुरुआती दौर की कविताएँ हैं।

हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद या रोमांटिसिज़्म (Romanticism or Romanticism in Hindi Literature)

सुमित्रानंदन पंत को हिंदी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख कवि के रूप में जाना जाता है। 18वीं शती. के अंत में परंपरावाद की प्रतिक्रिया के रूप में स्वच्छंदतावाद या रोमेंटिसिज़्म का जन्म हुआ। यूरोप में स्वच्छंदतावाद (Romanticism in Europe) रूसो, वाल्टेयर, गेटे, कीट्स और शैली आदि के द्वारा रचे गए लिरिकल बैलेड्स के माध्यम से विकसित हुआ।

अंग्रेजी साहित्य के रोमेंटिसिज़्म का प्रभाव गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के माध्यम से बांग्ला साहित्य पर पड़ा। बांग्ला साहित्य से होता हुआ यह प्रभाव हिंदी साहित्य में आया। रोमेंटिसिज़्म का यह प्रभाव सुमित्रानंदन पंत की काव्य-साधना पर पड़ा।

पंत जी के साथ ही जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा की काव्य-साधना पर भी इसका प्रभाव पड़ा।

अंग्रेजी साहित्य के रोमेंटिसिज़्म ने भारतीय सांस्कृतिक चेतना के साथ मिलकर हिंदी में एक नए युग की शुरुआत की।

सन् 1918 से 1938 तक के कालखंड में हिंदी साहित्य में अपना व्यापक प्रभाव डालने वाला यह युग छायावाद के नाम से जाना जाता है। छायावाद के प्रतिनिधि कवि के रूप में सुमित्रानंदन पंत की कविताओं में भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इसके साथ ही स्वतंत्रता पाने की तीव्र इच्छा, बंधनों से मुक्ति, विद्रोह के स्वर और अपनी बात कहने के नए तरीकों को पंत जी की कविताओं में देखा जा सकता है।

छायावाद के अन्य कवियों; जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा की तरह सुमित्रानंदन पंत की कविताओं में प्रकृति-प्रेम के माध्यम से सौंदर्यवाद और मानववाद की भावनाओं को देखा जा सकता है।

पंत जी जब अपनी कविताओं में भारत के ग्रामीण समाज का चित्रण करते हैं, तब वे भारत के ग्रामीण समाज के दुखों, कष्टों, भेदभावों और गाँव के लोगों के सुख-सुविधाविहीन जीवन को भी प्रकट करते हैं। वे अमीर और गरीब के बीच के भेद को मिटाने की बात भी कहते हैं। वे सामाजिक समरसता की स्थापना की बात अपनी कविताओं में कहते हैं। वे अमीर और गरीब का भेद भी मिटाते हैं। वे कहते हैं-

अस्थि मांस के इन जीवों का ही यह जग घर,

आत्मा का अधिवास न यह, यह सूक्ष्म अवश्वर।

न्योछावर  है  आत्मा नश्वर  रक्त  मांस पर,

जग का अधिकारी है वह, जो है दुर्बलतर।

पंत जी आज के अभावग्रस्त, शोषित, दलित और साधनविहीन समाज के दुखों और कष्टों को बड़ी गहराई तक उतरकर देखते हैं। इन सबके बीच वे अपराध और आतंक से भरी देश की स्थितियों को भी प्रकट करते हैं। उनकी यह भावधारा राष्ट्रीय स्तर पर भी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है। पंत जी की इस भावधारा के पीछे उनके मार्क्सवादी चिंतन को देखा जा सकता है। वे जीवन के विकास के लिए एकता, समता, श्रद्धा, परिश्रमशीलता और मन की निर्मलता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। वे इसके लिए ऐसी क्रांति की बात करते हैं, जो मानवता के धरातल पर विकसित हो। पंतजी ऐसी क्रांति की बात करते हैं, जो विभिन्न प्रकार के मतभेदों को भुलाकर नेह-प्रेम से भरे देश का और साथ ही सारे संसार का निर्माण कर सके। इसी कारण सुमित्रानंदन पंत के काव्य-संसार को सत्यं, शिवं, सुंदरम् की साधना का काव्य कहा जाता है।

सत्य, शांति, अहिंसा, दया, क्षमा और करुणा जैसे मानवीय गुणों की चर्चा बौद्ध धर्म-दर्शन में प्रमुख रूप से होती है। इन्हें पंत जी की कविताओं में भी देखा जा सकता है। वे लिखते हैं-

बिना दुख के सब सुख निस्सार, बिना आँसू के जीवन भार,

दीन दुर्बल है रे संसार, इसी से दया, क्षमा और प्यार।

इसके साथ ही दो लड़के नामक कविता में वे लिखते हैं-

क्यों न एक हो मानव मानव सभी परस्पर,

मानवता निर्माण करे जग में लोकोत्तर!

जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,

मानव का साम्राज्य बने,–मानवहित निश्चय।

सुमित्रानंदन पंत ने अध्यात्म और दर्शन के साथ विज्ञान के समन्वय की बात अपनी कविताओं में कही है। इनके आपसी समन्वय के माध्यम से वे मानवता के कल्याण की कामना करते हैं। पंतजी का मानना है कि ये युग-शक्तियाँ हैं और युग-उपकरण हैं, जिनका प्रयोग अगर मानवता के कल्याण के लिए किया जाएगा तो सारे विश्व का कल्याण होगा, दीन-दुखियों और जरूरतमंदों का कल्याण होगा। वे लिखते हैं-

नम्र शक्ति वह, जो सहिष्णु हो, निर्बल को बल करे प्रदान,

मूर्त प्रेम, मानव मानव हों जिसके लिए अभिन्न समान!

वह पवित्रता, जगती के कलुषों से जो न रहे संत्रस्त,

वह सुख, जो  सर्वत्र सभी  के  लिए  रहे  संन्यस्त!

रीति नीति, जो विश्व प्रगति में बनें नहीं जड़ बंधन-पाश,

–ऐसे उपकरणों से हो भव-मानवता का पूर्ण विकास!

सुमित्रानंदन पंत की काव्य-यात्रा में गांधी-दर्शन का प्रभाव इसी कारण प्रमुख रूप से दिखाई देता है।

सन् 1964 में पंत द्वारा रचित लोकायतन प्रबंध-काव्य गांधी दर्शन और चिंतन को बड़े ही भावनात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। 12 मार्च, 1930 से शुरू हुए गांधी जी के नमक सत्याग्रह ने पंत जी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था। वे गांधी जी को आधुनिक युग का ऐसा मसीहा मानते थे, जिनके जरिए देश में नई क्रांति आ सकती थी, जिनसे सारे देश को उम्मीद थी। लगभग सात सौ पृष्ठों का यह महाकाव्य पंत जी ने अपने पिता को समर्पित किया। इस महाकाव्य पर उन्हें सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार मिला और उन्हें उत्तरप्रदेश शासन द्वारा भी सम्मानित किया गया।

सुमित्रानंदन पंत अपने जीवन में कई दार्शनिकों-चिंतकों के संपर्क में आए। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और श्री अरविंद के प्रति उनकी आस्था थी। वे अपने समकालीन कवियों- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और हरिवंशराय बच्चन से भी प्रभावित हुए। हरिवंशराय बच्चन के पुत्र और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को अपना यह नाम भी पंत जी से ही मिला था।

पंत जी की रचनाओं में विचारधारा, दर्शन और चिंतन के स्तर पर ऐसी प्रगतिशीलता नजर आती है, जिसमें प्रकृति के बदलावों की तरह एक नयापन देखा जा सकता है। उनका प्रकृति-चित्रण प्रगतिशीलता को साथ लेकर चलता है। वीणा, ग्रंथि, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, उत्तरा, युगपथ, चिदंबरा, कला और बूढ़ा चाँद तथा गीतहंस आदि काव्य-कृतियों के साथ ही पंत जी ने कुछ कहानियाँ भी लिखीं हैं। उन्होंने हार शीर्षक से एक उपन्यास की रचना भी की है। इसके साथ ही साठ वर्ष : एक रेखांकन नाम से पंत जी ने आत्मकथा भी लिखी है।

भारत में टेलीविजन की शुरुआत कब हुई? भारत में टेलिविजन प्रसारण कब शुरू हुआ और इसे दूरदर्शन नाम किसने दिया ?

पंत जी ने सन् 1950 से 1957 तक आकाशवाणी, इलाहाबाद में हिंदी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। इसके बाद वे साहित्य सलाहकार के रूप में आकाशवाणी से जुड़े रहे।

इसी दौरान 15 सितंबर, सन् 1959 को भारत में टेलिविजन इंडिया नाम से भारत में टेलिविजन प्रसारण शुरू हुआ। इसे दूरदर्शन नाम देने वाले भी सुमित्रानंदन पंत ही थे।

इस ऊर्जावान, युग प्रवर्तक, भावुक और संवेदनशील कवि ने 28 दिसंबर सन् 1977 को इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) में हमसे हमेशा के लिए विदाई ले ली।

डॉ. राहुल मिश्र

शिक्षक, लेखक और अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद का निधन

Mata-Prasad माता प्रसाद

Former Arunachal Pradesh Governor Mata Prasad passed away

लखनऊ, 20 जनवरी. अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व राजस्व मंत्री माता प्रसाद का मंगलवार देर रात लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नानकोत्तर आर्युविज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई)- Sanjay Gandhi Postgraduate Institute of Medical Sciences (SGPGI), Lucknow में निधन हो गया। वह लगभग 97 वर्ष के थे।

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद का जीवन परिचय | Biography of Mata Prasad, former Governor of Arunachal Pradesh

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के कजियाना मोहल्ले में 11 अक्टूबर 1924 को जगरूप राम के पुत्र के रूप में जन्मे माता प्रसाद 1942 – 43 में मछलीशहर से हिंदी-उर्दू में मिडिल परीक्षा पास की।

शिक्षक और लोकगायक भी थे माता प्रसाद

गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल से ट्रेनिंग के बाद जिले के मडियाहू क्षेत्र के प्राइमरी स्कूल बेलवा में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गोविंद, विशारद के अलावा हिंदी साहित्य की परीक्षा पास की। अध्यापन काल में ही ये लोकगीत लिखना और गाना इनका शौक हो गया था । इनकी कार्य कुशलता को देखते हुए इन्हें 1955 में जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव बनाया गया।

लगातार पांच बार विधायक रहे माता प्रसाद

राजनीति में स्वर्गीय बाबू जगजीवन राम को अपना आदर्श मानने वाले माता प्रसाद जिले के शाहगंज (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर 1957 से 1974 तक लगातार पांच बार विधायक रहे।

1980 से 1992 तक 12 वर्ष तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इन्हें अपने मंत्रिमंडल में 1988 से 89 तक राजस्व मंत्री बनाया था ।

केंद्र की नरसिंह राव सरकार ने 21 अक्टूबर 1993 को इन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया और 31 मई 1999 तक ये राज्यपाल रहे। राज्यपाल पद पर रहते हुए श्री प्रसाद को तत्कालीन गृह मंत्री गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने पद छोड़ने को कहा तो उन्होंने दरकिनार कर दिया था।

एक साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते रहे माता प्रसाद

पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद एक साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते रहे उन्होंने एकलव्य खंडकाव्य, भीम शतक प्रबंध काव्य, राजनीत की अर्थ सतसई, परिचय सतसई, दिग्विजयी रावण जैसी काव्य कृतियों की रचना ही नहीं की वरन अछूत का बेटा, धर्म के नाम पर धोखा, वीरांगना झलकारी बाई, वीरांगना उदा देवी पासी, तड़प मुक्ति की, धर्म परिवर्तन प्रतिशोध, जातियों का जंजाल, अंतहीन बेड़ियां, दिल्ली की गद्दी पर खुसरो भंगी जैसे नाटक भी रचे। इसके साथ ही राज्यपाल रहते उन्होंने मनोरम अरुणाचल पूर्वोत्तर भारत के राज्य, झोपड़ी से राजभवन आदि उल्लेखनीय कृतियां लिखी हैं।

सादगी की प्रतिमूर्ति रहे माता प्रसाद ने उन राजनेताओं को आईना दिखाया है, जो आज के दौर में एक बार विधायक या मंत्री बनते ही गाड़ी बंगले और धन संपदा के फेर में लग जाते हैं, वही पांच बार विधायक, दो बार एमएलसी, उत्तर प्रदेश के राजस्व मंत्री और राज्यपाल रहे माता प्रसाद पैदल या रिक्शे पर बैठे बाजार से सामान खरीदते देखे जाते थे, पैदल चलना उनकी आदत थी।

पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद के निधन पर महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह, प्रतापगढ़ के अपना दल के पूर्व सांसद हरिवंश सिंह, प्रदेश के आवास एवं शहरी नियोजन राज्य मंत्री गिरीश चंद यादव सहित अनेक गणमान्य लोगों ने शोक संवेदना प्रकट की है।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार वीरेंद्र यादव ने फेसबुक पर लिखा,

“दुखद समाचार. वयोवृद्ध आंबेडकरवादी लेखक और पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद  जी बीती रात नहीं रहे. 96 वर्ष की आयु के बावजूद वे लगातार बौद्धिक रूप से सक्रिय रहे.  25 से अधिक पुस्तकों के लेखक  माता प्रसाद जी की  वर्ष 2019 में  अंतिम पुस्तक ‘जौनपुर और उसकी विभूतियाँ’ प्रकाशित हुई. इस पुस्तक के लिए सामग्री संचयन और विचार विमर्श के सिलसिले में कई बार उनका घर पर आना हुआ. उनकी विनम्रता, सादगी और इस उम्र में भी बौद्धिक सक्रियता अप्रतिम थी. वे जौनपुर की मड़ियाहूं तहसील के एक मिडिल स्कूल में मेरे पिता के सहपाठी भी रहे थे. यह भी संयोग है कि उनका  नामी चिकित्सक पौत्र  मेरी बेटी का सहपाठी रहा है. अब वे  लखनऊ के ही रहवासी थे.उनके बेटे और पौत्र चिकित्सा  क्षेत्र के जाने पहचाने नाम हैं. उनकी स्मृति में सादर नमन.”

पुस्तक समीक्षा : महफ़िल लूटना चाहते हैं तो मुक्तक रट लीजिए

Main Aisa Vaisa nahin hoon

मुक्तक क्या है

हिंदी साहित्य में व्यवस्थित रूप से मुक्तकों को लिखने की परंपरा का विकास रीतिकाल में हुआ। इस दौर में कबीरदास, रहीम तथा मीरा बाई ने कई मुक्तक अथवा छंद लिखे। कविता का वह संक्षिप्त रूप जो दोहा अथवा मुक्तक शैली या विधा में लिखा जाए उसे मुक्तक कहा जाता है। कबीर आदि के बाद वर्तमान में यह विधा राहत इंदौरी, मुन्नवर राणा, कवि गोपालदास नीरज और वसीम बरेलवी आदि के माध्यम से मुखरित हुई है।

हिन्दी-काव्य में मुक्तक-काव्य-परम्परा का इतिहास (History of muktak-kavya-tradition in Hindi-poetry) देखा जाए तो यह पर्याप्त प्राचीन है। संस्कृत साहित्य से चली आ रही इस परंपरा को हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में पर्याप्त मान, सम्मान मिला। हिन्दी के प्राय: सभी छोटे-बड़े कवियों ने अपनी रुचि के अनुसार मुक्तक लिखे हैं। पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने तो ‘चोखे चौपदे’ और ‘चुभते चौपदे’ शीर्षक से स्वतंत्र मुक्तक-संग्रह भी प्रकाशित करवाया है।

लंबे समय से मुक्तक हिन्दी कवि-सम्मेलन तथा मंचों के प्रिय बने हुए हैं। किसी भी सभा-सम्मेलन को लूटना हो या उसमें चार चांद लगाने हों तो दो-चार मुक्तकों की फुलझड़ियाँ छोड़ दीजिए।

मुक्तक में चार पंक्तियाँ होती हैं, जिनमें पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति सतुकांत रहती है।

क्यों पसंद किए जाते हैं मुक्तक

मुक्तकों को वाहवाही मिलने का मुख्य कारण यह है कि एक छोटे-से मुक्तक में पूर्ण भाव तथा विचार गुम्फित रहता है, जिससे कम शब्दों में ही श्रोता या पाठक को रस की प्राप्ति हो जाती है। उसे गीत या अन्य लम्बी कविताओं की तरह लक्ष्य-प्राप्ति के लिए देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। मुक्तकों का आपस में पूर्वापर सम्बन्ध भी नहीं होता तथा इसकी अभिव्यक्ति शैली भी बहुत प्रभावपूर्ण होती है। मुक्तकों का कोई निश्चित छन्द भी नहीं होता। इन्हें किसी भी छन्द में लिखा जा सकता है।

ख़ैर आज पुस्तक समीक्षा की कड़ी में पुस्तक मेरे पास है ‘डॉक्टर महेंद्र प्रजापति’ द्वारा लिखित मुक्तक संग्रह “मैं ऐसा वैसा नहीं हूँ।” इस छोटी सी पॉकेट बुक में कुल इक्यासी मुक्तक हैं।

नयी किताब प्रकाशन दिल्ली से हालिया प्रकाशित यह किताब और इसमें दर्ज मुक्तक आप यदि कंठस्थ कर लें तो किसी भी महफ़िल को अपने नाम कर सकते हैं। या उस शाम अथवा अपने महबूब के हाल को रंगीन कर सकते हैं। इक्यासी मुक्तकों में चार-पांच मुक्तकों को छोड़ दिया जाए तो सभी मुक्तक दिल की गहराई तक जाकर वार करते हैं और अगर कहूँ कि आपके दिल को भीतर तक भेदते हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

लेखक महेंद्र प्रजापति दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीनस्थ हंसराज महाविद्यालय में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं तथा कहानी, मुक्तक आदि लिखने के अलावा विभिन्न विषयों पर लेख भी लिखते रहते हैं। इसके अलावा सिनेमा में उनकी विशेष रुचि है। सिनेमा पर भी कई महत्वपूर्ण लेख उन्होंने लिखे हैं।

प्रस्तुत है मुक्तक संग्रह मैं ऐसा वैसा क्यों हूँ के कुछ महत्वपूर्ण मुक्तक –

ख्वाहिशें ज़ुबान तक न आने पाए

दर्द कभी मुस्कान तक न आने पाए

दुश्मनों से भी इतनी सहूलियत रखो

उनका हाथ गिरेबान तक न आने पाए।

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दिल टूटा है इतनी बार, एतबार कर न पाउँगा

मैं चाहकर भी किसी से प्यार कर न पाउँगा

मगर जाने क्यूँ ऐसा लगता है बार-बार

वो इज़हार करेगी तो, इंकार नहीं कर पाउँगा।

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माना कि हम मजबूर थे मगर इतने भी नहीं

माना कि तुमसे दूर थे मगर इतने भी नहीं

तूने अपनी महफ़िल में शामिल नहीं किया

माना कि तुमसे दूर थे मगर इतने भी नहीं।

-0-

हो सकता है तेरी नफ़रत मेरे लिए लाज़िमी हो जाए

मगर ये हो नहीं सकता है मेरी चाहत में कमी हो जाए

खुदा बनने का ख़्वाब तू दिल से निकाल से पागल

ज्यादा है अगर इस दौर में आदमी आदमी हो जाए।

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जुबाँ पर वास्ते उसके कोई फ़रियाद न आए

दीवाना फिर कोई दुनिया में मेरे बाद न आए

खुदा मेरे रहम इतना तू मुझपे कर दे एक बारी

मैं उसको याद न आऊँ वो मुझको याद ना आए।

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दुश्मनी में किसी से चाहत भी की जा सकती है

सुकूँ खोकर किसी को राहत भी दी जा सकती है

जो जुबाँ पर है, वो दिल में भी हो ज़रूरी तो नहीं

प्यार दिखाकर तो नफ़रत भी की जा सकती है।

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सुना है जमाने भर से शिकायत करता है

कौन है जो मुझसे इतनी मुहब्बत करता है

किसे है वक़्त किसी को वक़्त दे अपना

कोई तो है जो मुझ पर इतनी इनायत करता है।

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लेखक – महेंद्र प्रजापति

समीक्षक – तेजस पूनियां

विधा – मुक्तक संग्रह

प्रकाशक – नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य – 100 रुपए

संस्करण – 2021