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हिंदी आम लोगों की भाषा नहीं है : जस्टिस काटजू का लेख

Justice Markandey Katju

हिंदी लोगों की भाषा नहीं है जस्टिस मार्कंडेय काटजू हिंदी एक कृत्रिम रूप से बनाई गई भाषा है, और लोगों की भाषा नहीं है। आम आदमी की भाषा (भारत के बड़े हिस्से में) हिंदुस्तानी है (जिसे खड़ी बोली भी कहा जाता है)। हिंदुस्तानी और हिंदी में क्या अंतर है? एक उदाहरण देने के लिए, हिंदुस्तानी में हम कहते हैं उधर …

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अनसुनी आवाज़ : एक संदर्भ ग्रंथ, जिसमें पिछले तीस सालों का भारत है

Ansuni Awaz

पाठकीय दुनिया में दो तरह की पत्रिकाएं दिखायी पड़ती हैं। एक, जो व्यावसायिक हैं, दूसरी, जो ध्येयपरक हैं। व्यावसायिक पत्रिकाओं का योगदान (Contribution of professional journals) यह है कि वे व्यवसाय-वृत्ति के अंतर्गत पाठकों को साहित्य, संस्कृति, राजनीति आदि से संबंधित सूचनाएं और सृजन उपलब्ध कराती हैं जिसमें लेखक-समूह का एलिट क्लास लगा होता है और इनके​ सम्पादक अप्रतिबद्ध किंतु …

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मोदी सरकार के हिन्दी प्रेम के खतरे और सीमाएं

Narendra Modi Addressing the nation from the Red Fort

Dangers and limitations of Modi government’s Hindi love हिंदी दिवस पर विशेष – Special on Hindi Diwas लेखकों-बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका है जो हिन्दी के नाम पर सरकारी मलाई खाता रहा है। इनमें वे लोग भी हैं जो कहने को वाम हैं, इनमें वे भी हैं जो सोशलिस्ट हैं, ये सब मोदी के हिन्दीप्रेम के बहाने सरकारी मलाई के …

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रांगेय राघव : एक अहिंदीभाषी जिसने हिंदी को समृद्ध किया

रांगेय राघव की कृतियां,Biography of Rangeya Raghava,रांगेय राघव का जीवन परिचय,रांगेय राघव का साहित्यिक परिचय,रांगेय राघव / परिचय

हिंदी साहित्य के ‘शेक्सपियर‘ नाम से भी जाने जाते हैं रांगेय राघव Rangeya Raghav is also known as ‘Shakespeare’ of Hindi literature रांगेय राघव Rangeya Raghav (17 जनवरी, 1923 – 12 सितंबर, 1962) हिंदी के उन चंद विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभावान रचनाकारों में से एक हैं, जो बहुत ही कम उम्र लेकर इस संसार में आए, लेकिन जिन्होंने अल्पायु में …

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हिंदी साहित्य का यह दुस्समय है हिंदी भाषा और साहित्य के सत्यानाश की भी राजनीति है

Kadambini and Nandan cease publication

हिंदी साहित्य का यह दुस्समय है। राजनीति, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की है और हिंदी भाषा और साहित्य के सत्यानाश की भी राजनीति है। Hindi literary magazines have already closed हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएं पहले ही बंद कर दी गईं। लघु पत्रिकाएं किसी तरह निकल रही हैं अजब जिजीविषा और गज़ब प्रतिबद्धता के साथ, जिन्हें न सत्ता का समर्थन है …

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