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1984 सिख क़त्ले-आम की 38 वीं बरसी : क़ातिलों को सज़ा देना तो दूर उन की पहचान होना भी बाक़ी!

देश के दूसरे सब से बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक सम्प्रदाय के जनसंहार पर प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणतंत्र और न्यायपालिका सभी मूक दर्शक बनी रहे हैं या मुजरिमों की तलाश का पाखंड किया है।

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