सोनिया गांधी का लेख : मनरेगा क्यों जरूरी है और मोदी सरकार लाख कोशिशों के बावजूद क्यों खत्म नहीं कर पाई इसे

Sonia Gandhi at Bharat Bachao Rally

Sonia Gandhi’s article on MNREGA in Hindi.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, 2005 (मनरेगा) { The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA), 2005} एक क्रांतिकारी और तर्कसंगत परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है। यह क्रांतिकारी बदलाव का सूचक इसलिए है क्योंकि इस कानून ने गरीब से गरीब व्यक्ति के हाथों को काम व आर्थिक ताकत दे भूख व गरीबी पर प्रहार किया। यह तर्कसंगत है क्योंकि यह पैसा सीधे उन लोगों के हाथों में पहुंचाता है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। विरोधी विचारधारा वाली केंद्र सरकार के छः साल में व उससे पहले भी, लगातार मनरेगा की उपयोगिता साबित हुई है। मोदी सरकार ने इसकी आलोचना की, इसे कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन अंत में मनरेगा के लाभ व सार्थकता को स्वीकारना पड़ा।

कांग्रेस सरकार द्वारा स्थापित की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ-साथ मनरेगा सबसे गरीब व कमजोर नागरिकों को भूख तथा गरीबी से बचाने के लिए अत्यंत कारगर है। खासतौर से कोरोना महामारी के संकट के दौर में यह और ज्यादा प्रासंगिक है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की संसद द्वारा सितंबर, 2005 में पारित मनरेगा कानून एक लंबे जन आंदोलन तथा सिविल सोसायटी द्वारा उठाई जा रही मांगों का परिणाम है। कांग्रेस पार्टी ने जनता की इस आवाज को सुना व अमली जामा पहनाया। यह हमारे 2004 के चुनावी घोषणापत्र का संकल्प बना और हममें से इस योजना के क्रियान्वयन के लिए अधिक से अधिक दबाव डालने वाले हर व्यक्ति को गर्व है कि यूपीए सरकार ने इसे लागू कर दिखाया।

What was the The idea of MGNREGA

इसका एक सरल सिद्धांत है: भारत के गांवों में रहने वाले किसी भी नागरिक को अब काम मांगने का कानूनी अधिकार है और सरकार द्वारा उसे न्यूनतम मजदूरी के साथ कम से कम 100 दिनों तक काम दिए जाने की गारंटी होगी। इसकी उपयोगिता बहुत जल्द साबित भी हुई। यह जमीनी स्तर पर, मांग द्वारा संचालित, काम का अधिकार देने वाला कार्यक्रम है, जो अपने स्केल एवं आर्किटेक्चर में अभूतपूर्व है तथा इसका उद्देश्य गरीबी मिटाना है। मनरेगा की शुरुआत के बाद 15 सालों में इस योजना ने लाखों लोगों को भूख व गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला है।

महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘जब आलोचना किसी आंदोलन को दबाने में विफल हो जाती है, तो उस आंदोलन को स्वीकृति व सम्मान मिलना शुरू हो जाता है’’।

स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की इस बात को साबित करने का मनरेगा से ज्यादा अच्छा उदाहरण और कोई नहीं। पद संभालने के बाद, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को भी समझ आया कि मनरेगा को बंद किया जाना व्यवहारिक नहीं। इसीलिए उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी पर हमला बोला और इस योजना को ‘कांग्रेस पार्टी की विफलता का एक जीवित स्मारक’ तक कह डाला।

पिछले सालों में मोदी सरकार ने मनरेगा को खत्म करने, खोखला करने व कमजोर करने की पूरी कोशिश की। लेकिन मनरेगा के सजग प्रहरियों, अदालत एवं संसद में विपक्षी दलों के भारी दबाव के चलते सरकार को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा। इसके बाद केंद्र सरकार ने मनरेगा को स्वच्छ भारत तथा प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे कार्यक्रमों से जोड़कर इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की, जिसे उन्होंने सुधार कहा। लेकिन, वास्तव में यह कांग्रेस पार्टी की योजनाओं का नाम बदलने का एक प्रयास मात्र था। यह और बात है कि मनरेगा श्रमिकों को भुगतान किए जाने में अत्यंत देरी की गई तथा उन्हें काम तक दिए जाने से इंकार कर दिया गया।

Sonia Gandhi at Bharat Bachao Rally  कोविड-19 महामारी और इससे उत्पन्न आर्थिक संकट ने मोदी सरकार को वास्तविकता का अहसास करवाया है। पहले से ही चल रहे अभूतपूर्व आर्थिक संकट व मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था ने सरकार को आभास दिलाया कि पिछली यूपीए सरकार के फ्लैगशिप ग्रामीण राहत कार्यक्रमों को दोबारा शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। काम स्वयं बोलता है। चाहे देर से ही सही, वित्तमंत्री द्वारा हाल में ही मनरेगा का बजट बढ़ा एक लाख करोड़ रु. से ज्यादा का कुल आवंटन किए जाने की घोषणा ने इस बात को साबित कर दिया है। अकेले मई 2020 में ही 2.19 करोड़ परिवारों ने इस कानून के तहत काम की मांग की, जो आठ सालों में सबसे ज्यादा है।

कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों को यथावत स्वीकार करने के लिए मजबूर मोदी सरकार अभी भी कमियां खोजने के लिए कुतर्कों का जाल बुनने में लगी है। लेकिन पूरा देश जानता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े जन आंदोलन ने किस प्रकार न केवल लाखों भारतीयों को गरीबी के कुचक्र से बाहर निकाला, अपितु पंचायती राज संस्थाओं का स्वरूप बदल दिया, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने में मदद की तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया। इसने सभी के लिए समान वेतन सुनिश्चित कर, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों तथा कमजोर वर्गों को सशक्त बनाकर एक नए सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत की। इसने उन्हें संगठित होने की ताकत दी और उन्हें सम्मान व स्वाभिमानपूर्ण जीवन प्रदान किया। आज के संकट में भारत को सशक्त बनाने के लिए इन तथ्यों को जानना बहुत आवश्यक है।

आज निराश मजदूर व कामगार विभिन्न शहरों से समूहों में अपने गाँवों की ओर लौट रहे हैं। उनके पास न तो रोजगार है और न ही एक सुरक्षित भविष्य।

जब अभूतपूर्व संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तो मनरेगा की जरूरत व महत्व पहले से कहीं और ज्यादा है। इन मेहनतकशों का विश्वास पुनः स्थापित करने के लिए राहत कार्य उन पर केंद्रित होने चाहिए। सबसे पहला काम उन्हें मनरेगा का जॉब कार्ड जारी किया जाना है। श्री राजीव गांधी ने अपने विशेष प्रयासों द्वारा जिस पंचायती राज तंत्र को सशक्त बनाने का संघर्ष किया, आज मनरेगा को लागू करने की मुख्य भूमिका उन्हीं पंचायतों को दी जानी चाहिए, क्योंकि यह कोई केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है। जन कल्याण की योजनाएं चलाने के लिए पंचायतों को और मजबूत किया जाए तथा प्राथमिकता से पैसा पंचायतों को दिया जाए। ग्राम सभा यह निर्धारित करे कि किस प्रकार का काम किया जाए। क्योंकि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि ही जमीनी हकीकत, श्रमिकों की स्थिति व उनकी जरूरतों को समझते हैं। वो अच्छी तरह जानते हैं कि गाँव व स्थानीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप, अपने बजट को कहाँ खर्च करना है।

श्रमिकों के कौशल का उपयोग ऐसी टिकाऊ संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जिनसे कृषि उत्पादकता में सुधार हो, ग्रामीण आय में वृद्धि हो तथा पर्यावरण की रक्षा हो।

MGNREGA has proved its worth

संकट के इस वक्त केंद्र सरकार को पैसा सीधा लोगों के हाथों में पहुंचाना चाहिए तथा सब प्रकार की बकाया राशि, बेरोजगारी भत्ता व श्रमिकों का भुगतान लचीले तरीके से बगैर देरी के करना चाहिए। मोदी सरकार ने मनरेगा के तहत कार्यदिवसों की संख्या बढ़ाकर 200 करने तथा कार्यस्थल पर ही पंजीकरण कराने की अनुमति देने की मांगों को नजरंदाज कर दिया है। मनरेगा के तहत ओपन-एंडेड फंडिंग सुनिश्चित होनी चाहिए, जैसा पहले होता था।

मनरेगा की उपयोगिता बार बार साबित हुई है क्योंकि यूपीए सरकार के दौरान इसमें निरंतर सुधार व बढ़ोत्तरी हुई। विस्तृत सोशल ऑडिट, पारदर्शिता, पत्रकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा जाँच-परख व लोकपाल की नियुक्ति के माध्यम से सरकार व नागरिकों ने मिलकर इसे मौजूदा आकार दिया। राज्य सरकारों ने सर्वश्रेष्ठ विधियों को अपनाकर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पूरी दुनिया में गरीबी उन्मूलन के एक मॉडल के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

अनिच्छा से ही सही, मोदी सरकार इस कार्यक्रम का महत्व समझ चुकी है। मेरा सरकार से निवेदन है कि यह वक्त देश पर छाए संकट का सामना करने का है, न कि राजनीति करने का। यह वक्त भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं। आपके पास एक शक्तिशाली तंत्र है, कृपया इसका उपयोग कर आपदा के इस वक्त भारत के नागरिकों की मदद कीजिए।

आत्मनिर्भर भारत में पांच मांगें, 26 संगठन, 10 जून को करेंगे छत्तीसगढ़ में राज्यव्यापी आंदोलन

Kisan

होगा राज्य और केंद्र सरकार की कृषि और किसान विरोधी नीतियों का विरोध

रायपुर, 06 जून 2020. छत्तीसगढ़ में विकसित हो रहे साझे किसान आंदोलन से जुड़े 26 संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार की कृषि और किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ पांच प्रमुख मांगों को केंद्र में रखकर 10 जून को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।

गांव-गांव में ये प्रदर्शन फिजिकल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 के प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर आयोजित किये जायेंगे।

इन संगठनों में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, किसानी प्रतिष्ठा मंच, भारत जन आंदोलन, छग प्रगतिशील किसान संगठन, राजनांदगांव जिला किसान संघ, क्रांतिकारी किसान सभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, छमुमो मजदूर कार्यकर्ता समिति, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, छग आदिवासी कल्याण संस्थान, छग किसान-मजदूर महासंघ, किसान संघर्ष समिति कुरूद, दलित-आदिवासी मंच, छग किसान महासभा, छग आदिवासी महासभा, छग प्रदेश किसान सभा, किसान जन जागरण मंच, किसान-मजदूर संघर्ष समिति, किसान संघ कांकेर, जनजाति अधिकार मंच, आंचलिक किसान संगठन, जन मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय किसान मोर्चा, किसान महापंचायत और छत्तीसगढ़ कृषक खंड आदि संगठन शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते और किसान संगठनों के साझे मोर्चे से जुड़े विजय भाई ने बताया कि सब संगठन मिलकर :

  1. राज्य सरकार से कोरोना संकट के मद्देनजर पंजीयन की बाध्यता के बिना सभी मक्का उत्पादक किसानों द्वारा उपार्जित मक्का की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद किये जाने;
  2. हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा खरीफ फसलों के लिए घोषित समर्थन मूल्य को नकारते हुए स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फार्मूले के अनुसार फसल की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने और धान का समर्थन मूल्य 3465 रुपये घोषित करने;
  3. केंद्र सरकार द्वारा मंडी कानून और आवश्यक वस्तु अधिनियम को अध्यादेश के जरिये बदलने और ठेका कृषि को कानूनी दर्जा देने के मंत्रिमंडल के फैसले को निरस्त करने;
  4. छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों-घरों तक मुफ्त पहुंचाने, उनके भरण-पोषण के लिए मुफ्त खाद्यान्न, मनरेगा में रोजगार और नगद आर्थिक सहायता देने और
  5. बिजली क्षेत्र के निजीकरण करने के फैसले पर रोक लगाने व बिजली कानून में कॉर्पोरेट मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए किए जा रहे प्रस्तावित जन विरोधी, किसान विरोधी संशोधनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

इस विरोध प्रदर्शन की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा इस वर्ष मक्का की सरकारी खरीद न किये जाने के कारण प्रदेश के किसानों को 1700 करोड़ रुपयों से ज्यादा का नुकसान होने का अंदेशा है, क्योंकि बाजार में मक्का की कीमत 1000 रुपये प्रति क्विंटल से भी नीचे चली गई है। इसी प्रकार, केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य में औसतन 4.87% की ही वृद्धि की है, जो महंगाई तो क्या, लागत की भी भरपाई नहीं करती। राज्य का विषय होने के बावजूद और संसद से अनुमोदन के बिना ही कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेटपरस्त बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे हमारे देश की खाद्यान्न सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ही खतरे में पड़ जाएगी।

इन किसान संगठनों का मानना है कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण और क्रॉस-सब्सिडी खत्म किये जाने के प्रावधानों के कारण खेती-किसानी और घरेलू रोशनी पूरी तरह चौपट हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि आज भी छत्तीसगढ़ के तीन लाख प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे पड़े हैं। इन्हें सुरक्षित ढंग से अपने घरों में वापस लाने की चिंता न केंद्र सरकार को है और न राज्य सरकार को। क्वारंटाइन सेन्टर अव्यवस्था के शिकार है, जहां इन मजदूरों को न पोषक आहार मिल रहा है, न इलाज की सही सुविधा। इन केंद्रों में गर्भवती माताओं और बच्चों सहित एक दर्जन से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इन सभी प्रवासी मजदूरों को एक स्वतंत्र परिवार मानते हुए उन्हें राशन कार्ड और प्रति व्यक्ति हर माह 10 किलो मुफ्त अनाज देने, मनरेगा कार्ड देकर प्रत्येक को 200 दिनों का रोजगार देने और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा देने के लिए हर ग्रामीण परिवार को 10000 रुपये मासिक मदद देने की मांग ये संगठन कर रहे हैं।

वैश्विक तालाबंदी और पर्यावरण

climate change

Global Lockdown and Environment

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष | Special on world environment day

जबसे मनुष्य अस्त्तिव में आया है, तबसे व्यक्ति का अन्तिम उद्देश्य प्रकृति पर आधिपत्य जमाना रहा है। प्रकृति पर आधिपत्य जमाने की इस प्रक्रिया को ही मनुष्य ने ‘‘विकास‘‘ कहा है। पर्यावरण प्रदूषण (environmental pollution) सारी दुनिया के लिए एक गम्भीर रूप ले चुका है। प्रदूषित प्राकृतिक पर्यावरण सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण कुप्रभावित करते हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताएं, प्राकृतिक पर्यावरण पर कुप्रभाव डालती हैं। इससे मानव सभ्यता को खतरा (Threat to human civilization) पैदा हो गया है।

In the blind race of development, humans have created a bad environment.

पर्यावरण को जो एक शब्द से पहले ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है, वो है ‘‘विकास‘‘। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने पर्यावरण का बुरा हाल कर दिया है और यह पिछले कई दशकों से चिन्ता का कारण बना हुआ है। विकास की रफ्तार का पर्यावरण पर हो रहे अत्याचार से निपटने के लिए दुनिया के सभी देश कोशिश कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों से पर्यावरण में एक अनोखा बदलाव आ गया है, और इस आकस्मिक बदलाव का कारण बना कोरोना वायरस (कोविड-19)

कोरोना वायरस (कोविड-19) और पर्यावरण का संबंध | Corona virus (Covid-19) and environmental relationship

इस जानलेवा वायरस की शुरूआत चीन के वुहान शहर से हुई और थोड़े ही समय में इसने दुनिया में उथल-पुथल मचा कर रख दिया। दिसम्बर 2019 में यह वायरस पहली बार वुहान शहर में आया और तालाबंदी अर्थात लॉकडाउन की शुरूआत वुहान शहर से ही हुई। लेकिन तब तक यह खतरनाक वायरस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंच गया था। इटली, ईरान, स्पेन, अमेरिका, फ्रांस, भारत और दुनिया के अनेक बडे राष्ट्र इसके दंश को झेलते हुए तबाह हो रहे है। संक्रमण को रोकने के लिए तालाबंदी और सामाजिक दूरी को ही सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना गया है।

लॉकडाउन क्यों किया गया | Why was the lockdown done?

तालाबंदी का कदम इसलिए उठाया गया कि संक्रमण को रोका जा सके और कोविड-19 के कारण हो रही मौतों के सिलसिले को रोका जा सके। हालाकि इन पाबंदियों का एक नतीजा ऐसा भी सामने आया जिसके बारे में किसी ने शायद सोचा भी न था। यह नतीजा पर्यावरण सुधार के रूप में सामने आया।

The steps taken to prevent corona virus infection played a big role in improving the environment.

दिल्ली को दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में गिना जाता है लेकिन 21 दिन के लॉकडाउन के बाद वहां की आबोहवा एकदम बदली नजर आयी। इतना साफ और नीला आसमान दिल्ली में रहने वाले बहुत से लोगों ने शायद पहली बार देखा हो। सड़कें सुनसान जरूर दिखीं लेकिन यमुना के निर्मल पानी और पक्षियों के चहचहाने की आवाज दिल को छू जाने वाली लगी।

आश्चर्य की बात यह भी कि जो काम सरकार हजारों करोड रूपये खर्च करने के बावजूद भी न कर पायी वह लॉकडाउन के 21 दिनों ने कर दिखाया।

ऐसे ही नजारे दुनिया के और कई महानगरों में भी देखने को मिले हैं। इसमें कोई शक नहीं कि कोविड-19 दुनिया के लिए एक बड़ी त्रासदी बनकर आया है और इसने बेशुमार लोगों को निगल लिया है। अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, फ्रांस, जैसी महाशक्तियां भी इसका सामना कर पाने में खुद को बेबस पा रही हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बीच एक बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि लॉकडाउन प्रकृति के घावों पर मरहम लगाने में काफी कामयाब साबित हुआ है। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए जो कदम उठाये गये उनकी पर्यावरण को सुधारने में एक बड़ी भूमिका रही।

लॉकडाउन के कारण विश्व भर में तमाम फैक्ट्रियां बंद हैं। अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जरूर चरमराई है और परिणामस्वरूप लाखों करोड़ों लोग बेरोजगार भी हो गये हैं। यह दुख और सहानुभूति का विषय अवश्य है लेकिन इसका एक सकारात्मक प्रभाव यह जरूर हुआ है कि विश्व स्तर पर कार्बन उत्सर्जन लगभग उतने समय के लिए थम सा गया है। विकसित देशों में कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट देखने को मिली है।

वायु प्रदूषण का मनुष्य, जीव-जन्तुओं व पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने वाले हरे पेड-पौधों पर अत्यन्त प्रतिकूल असर होता होता है। सल्फर डाई-ऑक्साइड और आद्यौगिक कचरें से मृत्यु दर, रोगों और अपंगता में वृद्धि होती। नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड व ओजोन गैस सांस लेने में तकलीफ पैदा करने के अलावा आंख व गले में जलन पैदा करती है। ओजोन गैस से सिर दर्द भी हो सकता है। जबकि कार्बन मोनो-ऑक्साइड खून में ऑक्सीजन को हटा कर स्वयं मिल जाती है। जिससे हृदय और मस्तिष्क के रोग हो सकते हैं। सीसा से हड्डियों पर बुरा असर पडता है और जिगर व गुर्दा प्रकिया प्रभावित होती है।

लॉकडाउन के दौरान वाहनों और फैक्ट्रियों के बंद रहने से इन विषाक्त पदार्थों पर पर्यावरण ने काबू पा लिया और हवा सांस लेने लायक बन सकी।

स्थाई नहीं है लॉकडाउन का सकारात्मक परिणाम | Positive result of lockdown is not permanent

अमेरिका के न्यूयार्क शहर में पिछले साल की तुलना में इस साल प्रदूषण 50 प्रतिशत कम हो गया है। चीन में भी कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसदी की कमी आयी है। चीन के 6 बडे पॉवरहाउस में 2019 के अन्तिम महीनों से ही कोयले के इस्तेमाल में 40 फीसदी की कमी आयी है। पिछले साल के मई-जून के दिनों की तुलना में चीन के 337 शहरों की हवा की गुणवत्ता में 11.4 फीसदी का सुधार हुआ है।

Dr. Mohammad Sharique Assistant Professor Deptt. of Physical Education Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi- Farsi University, Lucknow.
डॉ. मो. शारिक,
असिस्टेंट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग,
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ।

हालांकि कुछ लोगों का यह भी मत है कि इस महामारी को पर्यावरण में अनुकूल परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि यह अस्थाई उपचार है। लॉकडाउन महज थोड़े समय के लिए है और इसका सकारात्मक प्रभाव बहुत लम्बे समय तक नहीं रहने वाला। साथ ही यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि जिस तरह मौजूदा समय में जान बचाना लोगो की प्राथमिकता बना हुआ है उसी तरह की पहल पर्यावरण को बचाने के लिए भी की जानी चाहिए।

जिस प्रकार इस महामारी से लड़ने के लिए पूरी दुनिया एकजुट है उसी प्रकार की इच्छा शक्ति और निश्चय की जरूरत पर्यावरण को स्वच्छ बनाने के लिए होनी चाहिए।

आज की परिस्थति कुछ ऐसी है कि भोजन, वस्त्र और आवास की अनिवार्य आवश्यकता से कहीं पहले पर्यावरण को सुरक्षित रखने की आवश्यकता है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के अत्यन्त विकराल एवं विनाशकारी नतीजे सामने आ रहे हैं। अगर इन्सान ने अब भी प्रर्यावरण को सुधारने और प्राकृतिक तरीके से जीवन जीने की शुरूआत नहीं की तो आगे के हालात कहीं ज्यादा गम्भीर हो सकते हैं।

डॉ. मो. शारिक,

असिस्टेंट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग,

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ।

 

रायपुर, कोरबा,चांपा वायु : अध्ययन में विषाक्त भारी धातु के अधिक मात्रा में जहरीले छोटे कण मिले

Environment and climate change

प्रदूषण नियंत्रण के लिए तत्काल कार्रवाई का आह्वान

Raipur, Korba, Champa Air: Study found toxic small particles of the high amount of toxic heavy metal;

Call for immediate action for pollution control

कोरबा / जांजगीर – चंपा / रायपुर 02 जून 2020 : कोरबा, चंपा और रायपुर में वायु गुणवत्ता की रेंज जनवरी से फरवरी तक खतरनाक लेवल से अत्यधिक अस्वस्थ के लेवल तक रही और पीएम 2.5 का स्तर सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में राष्ट्रीय मानक जो कि 60 ug / m3 का है, से लगभग नौ गुना ज्यादा रहा।

ये जानकारी राज्य के स्वास्थ्य संसाधन केंद्र (SHRC), छत्तीसगढ़ द्वारा जारी किए गए एक अध्ययन में सामने आई है।

प्रदूषण की ऐसी खतरनाक स्थिति जानने के लिए नमूनों को विभिन्न स्थानों से लिया गया था, जिसमें यह पता चलता है कि वायु प्रदूषण का यह संकट न तो किसी स्थान विशेष का है और न ही ये मौसमी घटना है।

अध्ययन में पीएम 2.5 के लिए 24 घंटे के हवा के नमूनों और भारी धातुओं के एक समूह का विश्लेषण किया गया, जिसमे पीएम 2.5 के बढ़े हुए स्तर के अतिरिक्त, मैंगनीज, निकल, सीसा और क्रिस्टलीय सिलिका जैसी भारी धातुओं के स्तर हवा में काफी अधिक पाए गए।

मैंगनीज और लेड न्यूरोटॉक्सिन (Neurotoxin) हैं, जबकि क्रिस्टलीय सिलिका एक श्वसन प्रक्रिया में तकलीफ़ देने वाली वस्तु है, और सिलिकोसिस का कारण बन सकता है ये एक घातक बीमारी है जिसको ज़्यादातर उस कार्यस्थल पर काम कर रहे कर्मचारियों को अपनी चपेट में लेने के लिए जाना जाता है।

‘’वायु के नमूने के परिणाम स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाले हानिकारक पदार्थों के बहुत चिंताजनक स्तर को दर्शाते हैं। ऐसे उच्च स्तरों पर उनकी उपस्थिति से पता चलता है कि इससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों के होने की उच्च संभावना है। कई अध्ययनों से पता चला है कि पीएम 2.5 के बढ़े हुए स्तर का फेफड़ों और हृदय रोगों के बीच संबंध हैं। इसके अलावा ये भी अच्छी तरह से ज्ञात है कि, मैंगनीज, सीसा और निकल विष हैं और मानव स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों को अच्छी तरह से प्रमाणित किया गया है। मैंगनीज और सीसा न्यूरोटॉक्सिन होते हैं जबकि निकल एक कार्सिनोजेन है। मानव घरों और स्वास्थ्य देखभाल सुविधा केंद्रों की छतों से विषाक्त पदार्थों के इतने उच्च स्तर की खोज चिंता का एक वास्तविक कारण है ”, SHRC के पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉक्टर प्रबीर चटर्जी ने कहा।

मिशन अस्पताल में गैर-संचारी रोगों (उच्च रक्तचाप, मधुमेह), pulmonary रोग और अन्य सामान्य रोगियों के रोगियों को देखने वाले डॉ ऑबिन मैथ्यू के अनुसार, pulmonary रोगों के साथ त्वचा संबंधी समस्याओं के रोगियों के मामले बहुत अधिक हैं। डॉ मैथ्यू को लगता है कि त्वचा की समस्याएं भोजन की आदत के कारण नहीं हैं शायद पर्यावरणीय कारकों के कारण हो सकती हैं।

कोरबा में एक अन्य हालिया अध्ययन में पाया गया कि Katghora में जिन लोगों समूह इसके सम्पर्क में नहीं थे की तुलना में कोरबा में जो समूह इसके सम्पर्क में थे उस आबादी के बीच श्वसन रोगों का प्रसार काफी बढ़ गया है। इसी तरह, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस  के लक्षण exposed समूह के बीच 11.79% और 2.96% थे, जबकि  unexposed समूह में यह 5.46% और 0.99% था।

क्रॉस-सेक्शनल तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि थर्मल पावर प्लांटों के आसपास रहने वाले समुदायों में इस रोग के होने का भार अधिक था और इसी के कारण पर्यावरण प्रदूषण भी बड़ा हुआ पाया गया। ये अध्ययन आबादी के श्वसन रोगों से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों की स्थिति पर विशेष जोर देता है।

मार्च से मई 2019 तक पीएम 2.5 के स्तर का विश्लेषण रायपुर में पांच स्थानों पर और कोरबा में तीन स्थानों पर किया गया जिसमे कम लागत वाले मॉनिटर – ATMOS का उपयोग किया गया, इसके परिणाम बताते है कि 2019 और 2020 के बीच के रुझान दोनों वर्षों के लिए लगातार समान हैं, मार्च में उच्चतम और अप्रैल और मई का स्तर दोनों वर्षों के लिए लगभग समान है, 2020 जो अन्तर है वो ग़ैरमामूली रहा है।

साल दर साल के आधार पर PM2.5 के स्तर में लगभग 10 से 15% की गिरावट है। इस ग़ैरमामूली गिरावट के साथ दोनों वर्षों के तीन महीनों के लगातार व्यवहार से ये  संकेत मिलता है कि रायपुर में अधिकांश प्रदूषण का कारण स्थानीय रहा जबकि क्षेत्रीय स्रोतों का न्यूनतम प्रभाव रहा। यहाँ राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन कि वजह से भी हवा की गुणवत्ता में कोई नाटकीय रूप से सुधार नहीं हुआ जबकि अहमदाबाद, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे अन्य शहरों में पीएम 2.5 के स्तर में 35% से 65% की गिरावट देखी गई है।

“हवा में इस तरह के विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति को कम करने के लिए न केवल तत्काल कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है, बल्कि व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में  यह आकलन करने कि भी आवश्यकता है कि इस प्रदूषण से क्या नुकसान पहले ही हो चुका है, और यह भी आकलन करने कि आवश्यकता है कि जो आबादी लंबे समय तक इससे प्रभावित रही है उसकी जाँच करने कि आवश्यकता है कि वो आबादी किस हद तक प्रभावित हुई है। इसके अलावा, स्वास्थ्य निकाय को इन रसायनों को ध्यान में रखते हुए उन लोगों के लिए प्रासंगिक और पर्याप्त देखभाल प्रदान करने के बारे में एक योजना विकसित करनी चाहिए जो इससे अभी तक प्रभावित हुए हैं ” अध्ययन करने वाले शोधकर्ता पुनीता कुमार ने कहा।

वायु नमूने के परिणाम स्पष्ट रूप से संकेत देते हैं कि कई कोयला खनन और औद्योगिक बेल्टों में स्थिति बहुत चिंताजनक है। पर्यावरण प्रतिबंधों को और कमज़ोर होने और COVID महामारी के बाद मिलने वाले प्रोत्साहन पैकेजों के साथ, इस तरह के उद्योगों से होने वाले प्रदूषण का प्रभावित क्षेत्रों पर और अधिक हानिकारक स्वास्थ्य प्रभाव होने की संभावना है। समय की आवश्यकता होगी कि इन क्षेत्रों में पर्यावरण और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार किया जाए और समुदायों को और अधिक जोखिम में न डाला जाए।

“जहां एक ओर खनन होने वाले क्षेत्र मानव विकास सूचकांक पर बेहद नीचली पायदान पर हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार का ऐसा मानना है कि कोयले की खोदाई विकास की दिशा में बढ़ता सर्वोत्तम कदम है।

कोरबा रिपोर्ट बताती है कि वहाँ हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर है। जब हम हवा और पानी की गुणवत्ता को ठीक करने में असमर्थ हैं, तब अधिक खनन की अनुमति देना गंभीर चिंता का कारण है। जब तक सरकार यह आश्वासन नहीं देती कि मौजूदा खनन क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता मनुष्यों के लिए सुरक्षित है, तब तक किसी भी नए खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ” एनवायरनमेंट वकील ऋत्विक दत्ता ने कहा

अध्ययन से नमूने साइटों के बारे में :

कोरबा, चंपा और रायपुर में चिन्हित स्थानों से अध्ययन के लिए 9 वायु नमूने लिए गए। इसमें से 7 सैंपलिंग लोकेशन कोरबा में थे जबकि एक चंपा और एक रायपुर में था। ये सैंपलिंग स्थल थे – एमपी नगर, चिमनी भट्टा, दर्री, जिला अस्पताल और कोरबा में रानी धनराज कुमार पीएचसी; चम्पा में मारुति टाउनशिप और रायपुर में प्रियदर्शनी नगर।

तम्बाकू उन्मूलन के बिना कैसे होगा तम्बाकू-जनित महामारियों का अंत?

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विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष : special story on world no tobacco day

इस समय पूरे विश्व में कोरोनावायरस महामारी के कारण स्वास्थ्य-सुरक्षा की सबसे विकट परीक्षा है. यदि भारत समेत उन देशों के आंकड़ों पर नज़र डालें जहाँ कोरोनावायरस महामारी विकराल रूप लिए हुए है तो यह ज्ञात होगा कि जिन लोगों को उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह (डायबिटीज), दीर्घकालिक श्वास रोग, आदि है, उनको कोरोनावायरस संक्रमण होने पर, अति-गंभीर परिणाम होने का खतरा अत्याधिक है (जिसमें मृत्यु भी शामिल है). गौर करने की बात यह है कि तम्बाकू इन सभी रोगों का खतरा बढ़ाता है. तम्बाकू पर जब तक पूर्ण-विराम नहीं लगेगा तब तक यह मुमकिन ही नहीं है कि तम्बाकू-जनित रोगों की महामारियों पर अंकुश लग पाए, और इनमें कोरोनावायरस महामारी भी शामिल हो गयी है.

World no tobacco day theme | तम्बाकू नियंत्रण नहीं, तम्बाकू उन्मूलन की दिशा में बढ़ाएं कदम

किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ) सूर्य कान्त ने कहा कि भारत में हर साल 12 लाख लोग तम्बाकू से मृत होते हैं. तम्बाकू से विश्व में हर साल 80 लाख लोग मृत होते हैं. दुनिया में 70% से अधिक मृत्यु का कारण हैं गैर-संक्रामक रोग (जिनमें हृदय रोग, पक्षाघात, मधुमेह (डायबिटीज), दीर्घकालिक श्वास रोग आदि) जिनका जानलेवा खतरा तम्बाकू सेवन बढ़ाता है. दुनिया के सबसे घातक संक्रामक रोग (टीबी) का खतरा भी तम्बाकू बढ़ाता है. कोरोनावायरस संक्रामक रोग महामारी के गंभीर परिणाम जिनमें मृत्यु भी शामिल है उसका खतरा भी तम्बाकू बढ़ाता है.

COVID-19 And Tobacco

जिन लोगों में तम्बाकू जनित रोग नहीं हैं उन्हें कोरोनावायरस संक्रमण (Novel Coronavirus SARS-CoV-2) होने पर, गंभीर परिणाम का खतरा भी कम है और अन्य तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों का खतरा भी कम है.

तो सवाल यह है, कि यदि सरकारों को सतत विकास लक्ष्य पर खरा उतरना है, यदि हर इंसान के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा और न्याय व्यवस्था दुरुस्त करनी है तब तो तम्बाकू उन्मूलन एक बड़ी प्राथमिकता है. तम्बाकू नियंत्रण नहीं, तम्बाकू उन्मूलन की दिशा में बिना विलम्ब कार्य करने की ज़रूरत है.

कोरोनावायरस महामारी के कारण हुई तालाबंदी में शराब-तम्बाकू आदि का विक्रय कानूनन रूप से तो नहीं हो रहा था. इससे व्यसनी को तकलीफ हुई होगी पर सबसे बड़ी तकलीफ शराब-तम्बाकू उद्योग को हुई क्योंकि मुनाफ़ा बंदी जो हो गयी थी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तम्बाकू और शराब दोनों के सेवन की कोई ‘सुरक्षित सीमा’ नहीं है क्योंकि एक-एक कण घातक हो सकता है. ई-सिगरेट हो या वेपिंग, बीड़ी हो या सिगरेट या चबाने वाली तम्बाकू या हुक्का या तम्बाकू सेवन का कोई अन्य उत्पाद, सबका सेवन घातक हो सकता है और सब पर प्रतिबन्ध लगाना अनिवार्य है.

world no tobacco day विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

सरकारों ने 2030 तक (126 महीने शेष हैं) टीबी, एड्स या मलेरिया के उन्मूलन का वादा किया है पर शराब के सेवन में गिरावट का सिर्फ 10% का वादा क्यों है? ज़रा सोचें, कि रोग का उन्मूलन आसान है या तम्बाकू-शराब का? कोरोनावायरस महामारी के दौरान हुई तालाबंदी में, शराब और तम्बाकू की अस्थायी बंदी तो हो ही गयी थी पर क्या रोगों का उन्मूलन सिर्फ-एक-सरकारी आदेश से हो पाना संभव है?

तम्बाकू का उन्मूलन इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इसके सेवन से उन रोगों का खतरा बढ़ता है जिनके उन्मूलन का सरकार ने वादा किया है.

सरकार ने 2025 तक टीबी के उन्मूलन का वादा किया है, गैर-संक्रामक रोगों के दर में एक-तिहाई गिरावट का वादा किया है. यदि यह स्वास्थ्य लक्ष्यों को पूरा करना है तो यह ज़रूरी है कि तम्बाकू उन्मूलन भी बिना-विलम्ब हो.

तम्बाकू और शराब उद्योग ने एक झूठ फैला रखा है कि इनके विक्रय से आये राजस्व से ही विकास होता है. विश्व बैंक के अर्थ-शास्त्रियों के अनुसार, तम्बाकू के कारण हर साल, वैश्विक अर्थ-व्यवस्था को अमरीकी डालर 1400 अरब का नुक्सान होता है. वैसे भी ज़रा सोचें कि जिन प्रदेशों में शराबबंदी है जैसे कि गुजरात वहां कैसे विकास हो रहा है बिना शराब राजस्व के? अमरीका और सिंगापूर में तम्बाकू सेवन अत्यंत कम हो गया है पर वहां कैसे बिना तम्बाकू राजस्व के विकास है?

दक्षिणपूर्वी एशिया तम्बाकू नियंत्रण संगठन के डॉ उलिसेस दोरोथियो ने कहा कि चूँकि हर साल तम्बाकू से 80 लाख से अधिक लोग मृत होते हैं, इसीलिए तम्बाकू उद्योग को नए बच्चे-युवा को तम्बाकू की लत लगवानी ही होती है जिससे कि मुनाफ़ा न बंद हो जाए. उद्योग का पुराना हथकंडा है कि “आज के युवा, कल के ग्राहक” हो सकते हैं इसीलिए सभी प्रकार के तम्बाकू उत्पाद पर सख्त प्रतिबन्ध ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि नए तम्बाकू उत्पाद पर भी सख्त प्रतिबन्ध लगना चाहिए जैसे कि ई-सिगरेट, वेपिंग आदि.

इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग डिजीज के एशिया पसिफ़िक क्षेत्र के सह-निदेशक डॉ तारा सिंह बाम ने कहा कि 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट किया था कि अभी कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि ई-सिगरेट वेपिंग आदि का उपयोग, तम्बाकू नशा छुड़वाने में हो. इसीलिए तम्बाकू वाले हर उत्पाद, जैसे कि ई-सिगरेट आदि पर प्रतिबन्ध अनिवार्य है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि कोरोनावायरस महामारी से पहले भी, तम्बाकू जनित महामारियों से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा रही थी. हृदय रोग, पक्षाघात, तमाम प्रकार के कैंसर, मधुमेह (डायबिटीज), दीर्घकालिक श्वास रोग, आदि और सबसे घातक संक्रामक रोग टीबी – इन सबका खतरा बढ़ाता है तम्बाकू. आर्थिक नुक्सान भी अमरीकी डालर 1400 अरब का हर साल हो रहा था परन्तु अब जब कोरोनावायरस महामारी से भी तम्बाकू का घातक संबंध स्थापित हो रहा है, तब तो सरकारों को चेत जाना चाहिए और पूर्ण-प्रतिबन्ध का निर्णय बिना-विलम्ब लेना चाहिए!

शोभा शुक्ला, बॉबी रमाकांत – सीएनएस

(शोभा शुक्ला और बॉबी रमाकांत, सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) और आशा परिवार से जुड़ें हैं.)

No excuse for inaction: #EndTobacco to prevent epidemics of diseases and deaths

लॉकडाउन के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के चलते भीषण गर्मी, आंधी, तूफ़ान जैसी चरम मौसम घटनाओं की चेतावनी

Environment and climate change

“उत्तरी गोलार्ध में आसमान से बरसती आग और समुद्रों में उठते तूफ़ान का मौसम आ गया

Warning of extreme weather events like severe heat, storm, storm due to lockdown as well as climate change

विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली हीटवेव, उष्णकटिबंधीय तूफान (Heatwave, tropical storm) और आग के मौसम इस वर्ष और भी घातक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन से बिगड़ी घटनाओं की परिस्थितियों कोविड महामारी के चलते हो रहे लॉकडाउन की वजह से और भी बेढब हो जाएँगी।

भारत और बांग्लादेश पहले से ही प्रकृति का प्रकोप झेल रहे हैं | India and Bangladesh are already facing the wrath of nature

गर्मी की शुरुआत के साथ, उत्तरी गोलार्ध के देश खतरे के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले होते हैं जब चरम मौसम के जोखिम सबसे बड़े होते हैं। भारत और बांग्लादेश पहले ही वर्ष के अपने पहले बड़े तूफान, चक्रवात अम्फान (Storm, cyclone amphAn) की चपेट में आ चुके हैं। अमेरिका और कैरिबियन में तूफान का मौसम 1 जून से शुरू होता है, पूर्वानुमान के साथ कि इस साल तूफान सामान्य से अधिक खराब हो सकते है। Pacific  northwest windstorms

उत्तर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में टाइफून (Typhoon in the Northwest Pacific) आमतौर पर मई से तेज होता है।

आम तौर पर जुलाई और अगस्त से आने वाली उत्तरी गोलार्ध की गर्मी के चरम के साथ, आने वाले हफ्तों में अत्यधिक गर्मी और जंगल की आग (Forest fire) का खतरा भी बढ़ जाएगा, और सबसे खतरनाक आग आमतौर पर एक ही समय से शुरू होती है और कभी-कभी कई महीनों तक चलती रहती है। यह संभावना है कि 2020 रिकॉर्ड पर दुनिया का सबसे गर्म वर्ष होगा।

Combined effects of heatwave and COVID-19

डब्लू.एच.ओ. और डब्लू.एम.ओ. के साथ ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (Global Heat Health Information Network) ने इस हफ्ते हीटवेव और कोविड-19 के संयुक्त प्रभाव को संभालने के बारे में तत्काल मार्गदर्शन जारी किया।

दक्षिणी गोलार्ध सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में पहले से ही चरम मौसम का सामना करना पड़ रहा है, उदाहरण के लिए, पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में वर्तमान में भारी बारिश के बाद विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का सामना करना पड़ रहा है, और साथ में सैकड़ों अरबों टिड्डी अभी भी अधिकांश क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों के साथ, चरम मौसम की स्थिति से प्रेरित भाग में।

Carbon emissions promote hazards from hurricanes, heatwaves and fires.

जलवायु परिवर्तन ने चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और गंभीरता में वृद्धि की है, विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन से तूफान, हीटवेव और आग से खतरों को बढ़ावा मिलता है। उच्च तापमान के प्रभावों में लंबे समय तक चलने वाले, अधिक गर्म और अधिक लगातार, हीटवेव होते हैं, जिससे जंगल की आग का खतरा भी बढ़ जाता है, और तूफान जो अधिक बलवान होते हैं और अत्यधिक बहाव में भारी वर्षा जारी करते हैं।

इस साल ये घटनाएं और भी खतरनाक हो सकती हैं, विशेषज्ञों का कहना है, क्योंकि आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ उपाय कोरोनावायरस महामारी से निपटने वाली आबादी के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होंगे। इन उपायों में सांप्रदायिक आपातकालीन आश्रय हैं जो व्यापक रूप से तूफान, बवंडर और अत्यधिक गर्मी से शरणार्थी के रूप में उपयोग किए जाते हैं – लेकिन ये सामाजिक दूरी की आवश्यकताओं से सीमित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह चक्रवात अम्फान के लिए निकासी के दौरान सफल समायोजन किए गए हैं, लेकिन ये आगे कमजोर समुदायों और पहले उत्तरदाताओं के सामने आने वाली चुनौतियों को जटिल बनाते हैं।

Other factors that can increase the risk from extreme weather this year

अन्य कारक इस वर्ष अत्यधिक मौसम से जोखिम भी बढ़ा सकते हैं। बहुत से लोग – विशेष रूप से सबसे कमजोर – वायरस के संपर्क से बचने के लिए अपने घरों को छोड़ने के लिए शायद तैयार नहीं हो सकें, जिससे उन्हें अत्यधिक गर्मी और तूफानों से खतरा झेलने की सम्भावना बढ़ सकती है। कुछ देशों में अति-विस्तारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं मांग में अचानक वृद्धि के साथ असमर्थ हो सकती हैं, जबकि अग्निशामक वायरस के प्रकोप के दौरान विल्डफोर्स का मुकाबला करने के लिए संघर्ष कर सकते हैं।

महामारी की आर्थिक लागत (Epidemic economic cost) भी इस साल चरम मौसम से प्रभावित लोगों का समर्थन करने और उनके पुनर्निर्माण में मदद करना अधिकारियों के लिए कठिन बना सकती है।

विशेषज्ञों का तर्क है, कि चरम घटनाओं के जोखिम वाले स्थानों पर स्थानीय और राष्ट्रीय प्राधिकरण को महामारी के लिए प्रतिक्रियाओं को कम करने के बिना मौसम की आपदाओं से लोगों की रक्षा के लिए योजनाओं को तुरंत तैयार करना और संवाद करना चाहिए।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि जो कार्बन उत्सर्जन जारी है, और इसके परिणामस्वरूप जो पृथ्वी ग्रह का ताप बढ़ेगा, उससे तेजी से यह होने की संभावना है कि कई आपात स्थिति एक ही समय में होगी, जैसा कि इस गर्मी में हो सकता है – भविष्य में इस तरह की संयुक्त आपदाओं की संभावना को सीमित करने के लिए बढ़ते जोखिमों के सामने लचीलापन में बहुत बड़े निवेशों के साथ कार्बन उत्सर्जन में आमूल-चूल कटौती की आवश्यकता की ज़रूरत है। कोविड -19 वसूली निवेश जीवन काल में अधिक लचीला दुनिया को आकार देने का एक अवसर है।

Climate change itself is a huge risk

डॉ. कैट क्रैमर, ग्लोबल क्लाइमेट लीड, क्रिश्चियन एड, ने कहा :

“ जलवायु परिवर्तन अपने आप में एक बहुत बड़ा जोखिम है, लेकिन यह एक जोखिम गुणक के रूप में भी काम करता है। हमें कोविड से एक ऐसे तरह से वापस निर्माण करने की आवश्यकता है जो समाज और प्राकृतिक दुनिया का लचीलापन बढ़े और तेजी और मौलिक रूप से हमारे उत्सर्जन को कम करे, अन्यथा हम बस एक और आपदा को कम कर रहे हैं।“

We have to deal with both coronavirus and climate crisis simultaneously

नैरोबी स्थित थिंक टैंक पावर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद अडो (Mohamed Adow is the Director of Power Shift Africa, a climate and energy think tank based in Nairobi) ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन से प्रभावित चरम मौसम की घटनाएं पहले से ही कुछ देशों के लिए एक नियमित संकट बन रही हैं। लेकिन जैसे राष्ट्र कोविड -19 का सामना करने की कोशिश और प्रतिक्रिया करते हैं हम जो मानवीय पीड़ा देखनी की उम्मीद कर सकते हैं वो दूसरे स्तर पर होंगे। बचावकर्मियों के लिए सामाजिक रूप से उन लोगों से दूरी बनाना लगभग असंभव है जिन्हें वे बचाने की कोशिश कर रहे हैं और अकसर बचे हुए लोग कुछ समय के लिए तंग परिस्थितियों में रहते हैं। यह अधिक प्रमाण है कि हमें कोरोनावायरस और जलवायु संकट दोनों से एक साथ निपटना होगा और शून्य कार्बन समाज के संक्रमण में तेजी लाने के लिए आर्थिक सुधार निधि तैनात करनी होगी।

यूनिसेफ फ्रांस के जनरल डायरेक्टर सेबास्टियन लियोन ने कहा:

“गर्मी के दिनों में भीषण गर्मी की स्थिति में सबसे अधिक वंचित आबादी सबसे अधिक जोखिम में होती है और वे महामारी के परिणामों के लिए सबसे अधिक असुरक्षित भी होती हैं। अनिश्चित आवास में रहने वाले लोग, जिनमें से आधे बच्चे या युवा हैं, पहले से ही स्वच्छता, भोजन और बिजली के लिए पानी तक पहुंचने में कठिनाई झेल रहें है। बेघर लोगों को कारावास के दौरान शरण दी गई है पर वो उनसे छिन जाएगी (इसमें युवा और परिवार शामिल हैं), और सड़कों पर रहने की स्थिति और भी कठिन हो सकती है और उनके जीवन को खतरे में डाल सकती है। ”

अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के अर्थ सिस्टम साइंस सेंटर के निदेशक प्रोफेसर माइकल मैन ने कहा :

“जैसा कि हम गर्मियों के महीनों में बढ़ते हैं, हम निस्संदेह चरम मौसम की घटनाओं के एक और हमले को देखेंगे -सुपरस्टॉर्म, बाढ़, सूखा, हीटवेव और वाइल्डफायर-जो हमें और जलवायु परिवर्तन की ओर उजागर करती हैं-अतिरंजित जोखिम। परन्तु इस बार हमारी भेद्यता वर्तमान महामारी से बढ़ गई है क्योंकि हम एक साथ कई संकटों का सामना करने, और अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर अधिक बाधाओं का सामना करने, के लिए मजबूर हैं, जिससे क्षति और स्वास्थ्य खतरों को कम करने की हमारी क्षमता सीमित है। यह ‘खतरों के गुणक’ की अनु स्मारक है, के जलवायु परिवर्तन वास्तव में लगभग हर दूसरे खतरे जिसका हम सामना कर रहें है उससे हमारे लिए बदतर कर रहा है। “

रेड क्रॉस रेड क्रीसेंट क्लाइमेट सेंटर के प्रोफेसर मार्टिन वैन आल्स्ट ने कहा :

“यह महत्वपूर्ण है कि हम कोविड पर तत्काल प्रतिक्रिया कार्य करें, जिसमें सामाजिक दूरी भी शामिल है, लेकिन इस ही समय में हमें निरंतर जलवायु खतरों के लिए तैयार रहना चाहिए और उनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ताकि हमारी आकस्मिक योजनाओं को मौजूदा महामारी की वास्तविकताओं से समायोजित किया जा सके। इस सटीक दुविधा का सामना पहले से ही अमेरिका के बवंडर, दक्षिण प्रशांत के चक्रवात हेरोल्ड, फिलीपींस में टाइफून अम्बो और बांग्लादेश और भारत में चक्रवात अम्फान के साथ हो चुका है।”

“यह महामारी हमारी वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को एक एक्स-रे प्रदान कर रही है, और विशेष रूप से सबसे अधिक खतरों वाले जोखिमों को उजागर कर रही है, अकसर कई खतरों को एक साथ। इन बाढ़ों और तूफानों का सामना करने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि अब बेहतर कार्रवाई का समय है।”

डॉ. निक वाट्स, लैंसेट काउंटडाउन के कार्यकारी निदेशक ने कहा:

“जलवायु परिवर्तन पहले से ही लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है। जबकि कई देश अब चरम घटनाओं से कमजोर लोगों को बचाने में मदद करने के लिए गर्मी और चक्रवात आश्रयों जैसे आपातकालीन उपायों का उपयोग करते हैं, ये उपाय कभी भी चरम घटनाओं से स्वास्थ्य जोखिमों को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पहले से ही खतरनाक गर्मी से अधिक लोगों को उजागर कर रहा है, श्रम उत्पादकता को कम कर रहा है और फसल की उपज क्षमता में कटौती कर रहा है। महामारी इस साल लोगों को चरम घटनाओं से बचाना कठिन बना सकती है, लेकिन केवल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती लोगों को भविष्य के चरम घटनाओं से बचाएगा। “

डॉ. सलीमुल हक, इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डेवलपमेंट, बांग्लादेश के निदेशक ने कहा :

“चक्रवात अम्फान ने कोविड 19 महामारी के साथ-साथ लॉकडाउन और सामाजिक दूरी करने के उपायों को संयोजित कर दिया है। जबकि बांग्लादेश में चक्रवात चेतावनी और चक्रवात आश्रयों की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, उन आश्रयों में सामाजिक दूरी का अभ्यास करना लगभग असंभव है।”

संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) में जलवायु और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के प्रमुख गर्नोट लागंदा (Gernot Laganda, Head of Climate and Disaster Risk Reduction at United Nations World Food Program (WFP)) ने कहा :

“कोविड -19 महामारी जलवायु संकट से टकराती रहती है। जबकि कई देशों की तात्कालिक प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा करना और कोविड -19 के प्रसार को रोकना है, ऐसे में सुरक्षा जाल होना आवश्यक है जो कमजोर लोगों को कोविड के दोहरे खतरे और जलवायु प्रभावों से बचाए। हीटवेव, बाढ़, तूफान और सूखा, महामारी के आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभावों को बढ़ा रहे हैं, जो कि अत्यधिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। इस तरह के परस्पर जोखिम से केवल परस्पर सिस्टम ही निपट सकता है जो खतरे के पूर्वानुमान और सूचना प्रबंधन, निरंतर भेद्यता आकलन और सामाजिक सुरक्षा को सक्षम बनाता है जो जलवायु जोखिम बीमा और पूर्वानुमान आधारित वित्तपोषण के साथ काम करता है। “

 

पांचवे लॉकडाउन की आहट के बीच कोरोना महामारी पर नए सिरे से सोचने की जरूरत

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Need to rethink corona epidemic amidst the fifth lockdown

एक नए शोध (New research on corona virus) के मुताबिक शांत समय में कोरोना वायरस छींक, खांसी, यहाँ तक कि बातचीत के दौरान 20 फिट तक जा सकता है। छींकने, खाँसने, या सामान्य बातचीत में 40.000 नन्हीं बूंदें निकल सकती हैं जो एक सेकंड में कुछ मीटर से लेकर कुछ सौ मीटर तक जा सकती ही हैं। जाहिर सी बात है ऐसा हवा के प्रवाह और उसमें मौजूद नमी पर निर्भर होगा।

The sound of the fifth lockdown has been heard in India

भारत में पांचवें लॉकडाउन की आहट सुनाई देने लगी है। लेकिन लॉक डाउन कितना प्रभावी है इसपर भी बहस जारी है। अब इस नए शोध के बाद गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि लॉक डाउन का भारतीय परिपेक्ष्य में इस तरह से पालन कर पाना संभव है कि संक्रमण की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके या लॉक डाउन से होने वाले नुकसान की तुलना में फायदा कितना है।

यह बात भी अपनी जगह अटल है कि लॉकडाउन अपने आप में समस्या का हल नहीं है। इसको लागू करने के पीछे धारणा यह थी कि कोरोना के फैलाव को नियंत्रित किया जाए और इस प्रकार मिलने वाले समय का इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाने, जरूरी उपकरणों की व्यवस्था करने और अन्य प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करने के लिए किया जाए ताकि स्थाई समाधान की तरफ बढ़ा जा सके।

What was found from the lockdown, what is lost also needs to be reviewed

लॉक डाउन से क्या पाया, क्या खोया इसकी समीक्षा की भी जरूरत है ताकि आगे की रणनीति बनाने में इस अनुभव से सीख मिल सके।

राजनीतिक व्याख्या अपनी जगह कि लॉक डाउन न होता तो अब तक संक्रमितों की संख्या 10-15 लाख होती। इस तरह के दावों के लिए कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन यह कटु सत्य है की अगर जांच बड़े पैमाने पर की गई होती तो संक्रमितों की संख्या अवश्य ही काफी अधिक होती लेकिन हम इसके स्थाई समाधान के भी उतने ही करीब होते।

Masihuddin sanjari  अमेरिका में कुल संक्रमितों की संख्या 17 लाख से भी अधिक है। लेकिन वहाँ करीब 10 प्रतिशत या 3.5 करोड़ लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है। जबकि भारत में भारत में अब तक केवल करीब 32 लाख लोगों की ही कोरोना जांच हुई है और संक्रमितों की संख्या करीब 1.5 लाख है। संक्रमण की इस दर से अगर 3.5 लोगों की जाच होती है या 10 प्रतिशत भारतीयों की जांच की जाती है तो संभावित मरीजों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है।

जांच कम करने का मतलब है संक्रमितों को खुला छोड़कर संक्रमण के बढ़ते रहने की संभावना को प्रबल बनाना। इससे न केवल ज्यादा क्षति होगी बल्कि देश लंबे समय तक कोरोना के नाम पर अछूत बना रहेगा, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा और आम आदमी का जीना दूभर हो जाएगा।

मसीहुद्दीन संजरी

लोकतंत्र की तरफ बढ़ते अफ्रीका में कोविड-19

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Credit NIAID NIH

COVID-19 in Africa, moving towards democracy

कोविड-19 के जनवरी में विश्वव्यापी प्रसार के समय से वैज्ञानिकों और सामाजिक वैज्ञानिकों का अनुमान था कि यदि यह अफ्रीका तक पहुंचा तब वहां के छोटे और गरीब देशों को इससे निपटना मुश्किल होगा और भारी तबाही होगी. कोविड-19 अफ्रीका पहुँच तो पर, अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. जिस दिन भारत में एक लाख का आंकड़ा पार कर रहा था और लगभग साढ़े तीन हजार लोगों की मौत हो चुकी थी, उस समय पूरे अफ्रीका महाद्वीप पर संक्रमितों की संख्या (Number of infected on the continent of Africa) भी एक लाख थी और लगभग 3000 मौतें हुईं थीं.

Testing for COVID-19

कुछ अफ्रीकी देशों को अपनी लचर स्वास्थ्य व्यवस्था का अहसास था, इसलिए जनवरी में विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहली चेतावनी के साथ ही ये देश हरकत में आ गए, और सीमित संसाधनों से ही टेस्टिंग और मरीजों के लिए आइसोलेटेड वार्ड, कांटेक्ट ट्रेसिंग इत्यादि की व्यवस्था शुरू कर दी. अमेरिका और यूरोप के कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने अफ्रीका के हरेक देश में पीपीई किट को पंहुंचा दिया था. सरकारों ने लॉकडाउन की नीतियाँ तैयार कीं और लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में जागरूक किया.

सेनेगल के स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने मिलकर एक स्वदेशी टेस्टिंग किट (Corona’s indigenous testing kit) भी तैयार की है, जिसमें प्रति टेस्ट की लागत एक डॉलर से भी कम है, जबकि यूरोपीय देशों में यह लागत लगभग 300 डॉलर प्रति टेस्ट है.

Difference between Suriname’s Corona Testing Kit Saliva and European Testing Kit

यूरोपीय टेस्ट पोलीमरेज चैन रिएक्शन पर आधारित होते है जबकि सूरीनाम की किट सैलिवा में एंटीजन या एंटीबाडीज की जांच करती है. इसके परिणाम भी 10 मिनट में आ जाते हैं. सेनेगल ने जनवरी में ही विदेशों से आने वाले विमानों को रोक दिया था, कांटेक्ट ट्रेसिंग शुरू कर दिया था और अस्पतालों और स्वाश्य केन्द्रों में कोविड-19 के मरीजों के लिए अलग इंतजाम कर दिया था. सेनेगल की आबादी लगभग 1 करोड़ 60 लाख है और वहां पिछले सप्ताह तक कोविड-19 से केवल 30 मौतें हुई थी. हरेक मौत को सरकार द्वारा बताया गया और सरकार द्वारा हरेक मृतक के घर शोकसन्देश भेजा गया.

घाना की आबादी लगभग 3 करोड़ है और वहां भी पिछले सप्ताह तक केवल 30 मौतें दर्ज की गई थीं. यहाँ भी कांटेक्ट ट्रेसिंग को सघन किया गया और बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को कोविड-19 से निपटने के लिए तैयार किया गया. घाना के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने व्यक्तिगत टेस्टिंग से अधिक पूल टेस्टिंग पर जोर दिया, और अब इस व्यवस्था की खूबियों का अध्ययन विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कर रहा है. कुछ ऐसे भी देश हैं जहां स्थानीय उपलब्ध वनस्पतियों से इसकी दावा तैयार की जा रही है. मेडागास्कर के राष्ट्रपति अन्द्री राजोएलिना तो अर्तेमेसिया एन्युरा नामक वनस्पति से इसकी दवा तैयार करने के दावे के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध हो चुके हैं. इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उन्हें चेताया है, पर इस दवा की लोकप्रियता का आलम यह है कि अब तक 20 से अधिक अफ्रीकी देश इसकी मांग कर चुके हैं. गेर्मानी स्थित मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट ऑफ़ कोलोइड्स एंड इन्टरफेसेस के वैज्ञानिक भी कोविड-19 की दवा के खोज के क्रम में इस पौधे पर अध्ययन कर रहे हैं और इसके उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये हैं. अब यह संस्थान इस दवा का मनुष्यों पर परीक्षण की योजना बना रहे हैं. अन्द्री राजोएलिना के अनुसार अफ्रीका के विज्ञान को कोई समझना नहीं चाहता, पूरी दुनिया के लिए विज्ञान वहीं है जो यूरोप, अमेरिका या फिर कुछ एशियाई देशों में खोजा जाता है और यदि यही दवा किसी यूरोपीँयन देश ने आगे की होती तो दुनिया इसपर ध्यान देती.

अफ्रीका के अधिकतर देश पिछले दशक से लोकतंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं और युवा आबादी भी यही चाहती है. इससे पहले प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह महाद्वीप विकास के पैमाने पर लगभग उपेक्षित ही रहा और तानाशाही, राजशाही और निरंकुश शासकों की अधीन रहा. अब, पिछले दशक से अधिक देशों में चुनाव होने लगे हैं और यही लोकतंत्र की पहचान भी है. ये चुनाव कानूनन सही होते हैं, पर इनमें धांधली भरपूर की जाती है.

अफ्रीकी देशों की सबसे बड़ी समस्या है, प्राकृतिक संसाधन और जिसकी लूट में औद्योगिक देश भागीदारी निभाते हैं. जाहिर है, औद्योगिक देशों का वहां की सरकारों में बहुत दखल रहता है और ये देश निरंकुश शासक चाहते हैं, जो उनके अनुसार हरेक चीज को नियंत्रित कर सके. इसी कारण से लोकतंत्र होने के बाद भी, अधिकतर शासक निरंकुश और भ्रष्ट हैं. वर्तमान में भी अधिकतर अफ्रीकी देशों के शासकों के पसंदीदा शासक अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प हैं.

यूगांडा में छठी बार चुने गए राष्ट्रपति तो सार्वजनिक तौर पर आई लव ट्रम्प का नारा लगा चुके हैं. इनके अनुसार अमेरिका में आज तक जितने भी राष्ट्रपति बने हैं, उनमें ट्रम्प सर्वश्रेष्ठ हैं.

ट्रम्प को निरंकुश शासक इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि राष्ट्रपति अपने शासनकाल में कितने भी घपले करे, वह हरेक अभियोग से बच निकलेगा.

अफ्रीका के कुल 54 देशों में से 10 में स्वतंत्र लोकतंत्र है, 15 में दोषपूर्ण लोकतंत्र है, 19 में निरंकुश शासन है और शेष में तानाशाही या फ़ौज का शासन है. सबसे अच्छा लोकतंत्र सेनेगल, घाना, बेनिन, नामीबिया, बोट्सवाना, साउथ अफ्रीका, मॉरिशस, तुनिशिया और जिबोटी जैसे देशों में है. कुछ स्वतंत्र लोकतंत्र माली, गिनी, आइवरी कोस्ट, ज़िम्बाब्वे और लेसोथो जैसे देशों में है. दोषपूर्ण लोकतंत्र वाले देशों में मॉरिटानिया, गैबन, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, बुरुंडी, यूगांडा और इथियोपिया हैं.

लम्बे शीत युद्ध के बाद वर्ष 1991 में अधिनायकवाद के बाद सबसे पहले बेनिन और ज़ाम्बिया ने पार्टी के आधार पर चुनाव को आरम्भ कर लोकतंत्र की नीव रखी थी. इसके बाद धीरे-धीरे अन्य देशों में लोकतंत्र स्थापित होना आरभ हुआ. लोकतंत्र की सफलता चुने गए प्रतिनिधियों पर बहुत निर्भर करती है. आज के दौर में अंगोला और इथियोपिया की सरकारें अपने देश को एक सफल लोकतंत्र देने की और अग्रसर हैं.

एफ्रोबैरोमीटर नामक मीडिया हाउस द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के अनुसार अफ्रीका की 68 प्रतिशत जनता एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक प्रणाली की पक्षधर है.

एफ्रोबैरोमीटर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर एमानुएल ग्यिमा बोअडी के अनुसार अफ्रीका की अधिकतर जनता लोकतंत्र से अधिक परिणाम चाहती है, लोग भ्रष्टाचार में कमी चाहते हैं, अधिक पारदर्शिता चाहते हैं और अधिक आर्थिक संभावनाएं भी.

एमानुएल ग्यिमा बोअडी के अनुसार अधिकतर देशों में चुनाव के माध्यम से लोकतंत्र बहाल किया जा रहा है पर समस्या यह है कि चुनाव में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है. कुछ देशों ने टेक्नोलॉजी का सहारा लेकर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की पहल की पर इसमें अधिक सफलता नहीं मिली है. दरअसल कुछ देश इतने गरीब हैं कि इन देशों ने सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ा आर्थिक फायदा नजर आता है.

अमेरिका में ट्रम्प के आने के बाद से अफ्रीका के सफल लोकतंत्र बनने की राह और कठिन हो गई है, क्योंकि ट्रम्प निरंकुश शासकों को ही बढ़ावा देते हैं. वर्ष 2018 में उनकी घोषित अफ्रीकी पालिसी में लोकतंत्र, स्वतंत्र चुनाव और मानवाधिकार जैसे मुद्दे थे ही नहीं. अमेरिका के अलावा इस पूरे महादेश में रूस और चीन का भी वर्चस्व है और वर्चस्व स्थापित करने की यही लड़ाई अफ्रीका का पूरा माहौल बिगाड़ देती है.

जाहिर है, कोविड-19 का अब तक अफ्रीका में सफ़र धीमा है, पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी तो बस शुरुआत है, इसके बाद का सफ़र देशों की सरकारों पर निर्भर करेगा. जहां लोकतांत्रिक सरकारें हैं वहां स्वास्थ्य सेवा जैसी जन-कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है, पर तानाशाही और निरंकुश शासकों वाले देशों में स्वास्थ्य सेवाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता इसलिए यदि कोविड-19 तेजी से फ़ैलने की दशा में संक्रमितों और मौत के आंकड़े भी तेजी से बढ़ेंगे.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अफ्रीका ऑफिस के अनुसार कोविड-19 के सन्दर्भ में अफ्रीका का भविष्य भयावह है. इसने अफ्रीका के 47 देशों का इस सन्दर्भ में विस्तृत अध्ययन किया है. इन देशों की सम्मिलित आबादी लगभग एक अरब है. इस अध्ययन के अनुसार अगले एक वर्ष के भीतर अफ्रीका में कोविड-19 के कारण लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु होगी और लगभग 4 करोड़ आबादी इसके संक्रमण की चपेट में होगी.

अफ्रीका में स्वास्थ्य सेवायें (Health Services in Africa) बुरी स्थिति में हैं.

यहाँ प्रति दस लाख आबादी पर मात्र 9 आईसीयू बीएड उपलब्ध हैं, और प्रति दस लाख आबादी पर कोविड-19 के केवल 685 टेस्ट किये गए हैं. साउथ अफ्रीका में बहुत पहले ही कम्युनिटी ट्रांसमिशन फ़ैल चुका है. अनेक देश दुनिया को वास्तविक आंकड़े नहीं बता रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सोमालिया, नाइजीरिया और तंज़ानिया जैसे देशों से अपने आंकड़े दुबारा प्रस्तुत करने को कहा है.

महेंद्र पाण्डेय

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशांबी, गाजियाबाद में शुरू हुई कोरोनावायरस की टेस्टिंग

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Credit NIAID NIH

Coronavirus testing started at Yashoda Super Specialty Hospital, Kaushambi, Ghaziabad

साहिबाबाद इंडस्ट्रियल एरिया एवं गाजियाबाद की इंडस्ट्रीज को कोरोनावायरस टेस्टिंग लैब के खुलने से बहुत लाभ मिलेगा: डॉक्टर पी एन अरोड़ा

गाजियाबाद, 25 मई 2020. गाजियाबाद एवं ट्रांस हिंडन के इलाके के लोग अब यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कौशांबी, गाजियाबाद कोरोना वायरस की टेस्टिंग करा सकते हैं। यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशांबी स्थित लैब में कोरोना की जांच (Lab to investigate corona virus in Ghaziabad) की शुरुआत 21 मई 2020 बृहस्पतिवार से प्रारंभ की गई है।

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशांबी के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ पीएन अरोड़ा ने बताया कोरोना जांच के लिए सैंपल लेना शुरू किया गया है। साथ ही घर से भी या कंपनियों, फैक्ट्री साइट से सैंपल लेने की सुविधा उपलब्ध है.

अस्पताल के डायरेक्टर क्लीनिकल सर्विसेज डॉ राहुल शुक्ला ने बताया कि यशोदा हॉस्पिटल कौशांबी की एनएबीएल से मान्यता प्राप्त टेस्टिंग लैब में कोरोना जांच शुरू की गई है। इसके लिए आरटी पीसीआर कोविड 19 को आईसीएमआर से मान्यता मिलने के बाद जांच शुरु की गई है।

अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर सुनील डागर ने बताया कि यह जांच रोजाना सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक सरकार द्वारा तय रेट साढ़े चार हजार रुपए में कराई जा सकती है। सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखकर हॉस्पिटल के ट्रेंड स्टाफ द्वारा सैम्पल लिए जा रहे हैं।

डॉ. सुनील डागर ने बताया कि सैंपल लेते समय पीपीई किट पहनकर ही प्रशिक्षित लैब टेक्नीशियन द्वारा क्लोज क्यूबिकल बॉक्स में मरीजों का सुरक्षित तरीके से नमूना लिया जा रहा है।

डॉ. सुनील डागर ने बताया कि इस संबंध में गाजियाबाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लिखित रूप में सूचित कर दिया गया है एवं जिलाधिकारी गाजियाबाद द्वारा इस टेस्ट को करने के लिए स्वीकृति भी ले ली गई है।

Helpline number for corona virus test

कोरोना वायरस के टेस्ट के लिए अस्पताल द्वारा एक हेल्पलाइन मोबाइल नंबर 7835008732 भी जारी किया गया है इस नंबर पर सैंपल एकत्र कराने के लिए अनुरोध किया जा सकता है व अन्य जानकारी ली जा सकती है।

डॉक्टर पी एन अरोड़ा ने कहा कि जिस प्रकार से लॉकडाउन खुल रहा है और धीरे-धीरे सभी लोगों को और फैक्ट्रियों को फिर से चालू किया जा रहा है ऐसे में सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप कर्मचारियों की कोरोना टेस्टिंग कराने के लिए साहिबाबाद इंडस्ट्रियल एरिया में एवं गाजियाबाद की इंडस्ट्रीज को इस कोरोनावायरस टेस्टिंग लैब के खुलने से बहुत लाभ मिलेगा।

राहुल की डॉक्यूमेंट्री में प्रवासियों ने बयां किया दर्द, खाली पेट चले, पीटा और धमकाया गया लेकिन फिर भी नहीं रुके

Rahul Gandhi

नई दिल्ली, 23 मई 2020. पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शनिवार को प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा पर बात (Former Congress President Rahul Gandhi talks on migrant workers) करते हुए कहा कि कोरोनावायरस महामारी (Coronavirus epidemic) के चलते सबसे बुरी हालत इन्हीं लोगों की हुई है। राहुल ने एक डॉक्यूमेंट्री (Rahul Gandhi’s documentary on migrant workers) जारी की, जिसमें हरियाणा से उत्तर प्रदेश के झांसी वापस लौटे प्रवासी श्रमिकों के साथ उन्होंने बातचीत की है।

लोकसभा सांसद राहुल ने बीती 15 मई को राष्ट्रीय राजधानी में दक्षिण पूर्वी दिल्ली में सुख देव विहार फ्लाईओवर के पास प्रवासी मजदूरों से मुलाकात की थी। 16 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री को कांग्रेस के यूट्यूब चैनल पर रिलीज किया गया है।

डॉक्यूमेंट्री के रिलीज होने से पहले राहुल गांधी ने ट्विटर पर कहा,

“झांसी के पास अपने कस्बों में घर वापसी को लेकर यहां घूम रहे इन भाइयों और बहनों से मैं कुछ दिन पहले ही मिला। मेरे यूट्यूब चैनल पर आज सुबह 9 बजे उनके धैर्य, ²ढ़ संकल्प और आत्म निर्भरता की कहानी देखते हैं।”

डॉक्यूमेंट्री में कांग्रेस नेता को प्रवासी कामगारों के साथ सड़क पर बैठकर उनसे बात करते हुए देखा जा सकता है।

प्रवासी कामगारों की कहानी सुनाते हुए राहुल गांधी ने कहा, “कोरोना ने बहुत से लोगों को चोट पहुंचाई है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान सैकड़ों किलोमीटर तक सड़कों पर चलेने वाले मजदूरों को हुआ है।”

उन्होंने आगे कहा,

“वे खाली पेट चले, उन्हें पीटा और धमकाया गया लेकिन फिर भी वे नहीं रुके और अपने घरों की ओर आगे चलने में कामयाब रहे। मैं आपको दिखाना चाहता हूं कि उनकी आशंकाएं, उनकी आकांक्षाएं और उनका भविष्य कैसा है और वे इसके बारे में क्या महसूस करते हैं।”

कांग्रेस के पूर्व प्रमुख के साथ बातचीत के दौरान झांसी के एक प्रवासी वर्कर महेश ने अपनी परेशानियों का वर्णन करते हुए कहा कि 120 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर चुका उनका यह समूह पिछले एक दिन से चल रहा है। वे बिना किसी सरकारी समर्थन और सहायता के अपने मूल स्थान पर वापस जा रहे हैं।

 

कोरोना : अपनी सुरक्षा पर स्वयं ध्यान दें

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Credit NIAID NIH

कोरोना वायरस की शुरूआत कहां से हुई? (Where did the corona virus originate?) यह अब भी समय के गर्भ में छुपा हुआ है। जब तक कि यह पूर्णतः स्पष्ट न हो जाय कि बुहान से कोरोना के फैलाने का या फैलने का राजनीतिक सामरिक उद्देश्य क्या था, या मात्र चीन की विश्व विजय करने की नीति का एक मात्र छोटा सा शस्त्र था। खैर जो भी रहा हो जब तक स्पष्ट नहीं हो जाता कुछ भी साफ-साफ कहना मुश्किल होगा। परन्तु स्पष्ट है कि कोरोना से अपार जन-धन की हानि हुई, लाखों जिंदगियां काल कवलित हो गयीं और बड़े-बड़े उद्योग तबाह हो गये। विश्व भयानक मंदी की चपेट में आ गया है.

विश्व की महान शक्तियां सिमट कर रह गयीं और एक वायरस के सामने विवश लाचार हो गयीं। अमेरिका इटली फ्रांस स्पेन जर्मनी भयानक चपेट मे आ गये और खुद को भगवान भरोसे छोड दिया था।

एक तरफ जहां विश्व की मानव सभ्यता सकंट से गुजर रही तो दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है। ऐसी अवस्था में हमें सर्वप्रमुख जीवन को महत्व देना होगा। जिस तरह से रतन टाटा ने कहा 2020 नफा कमाने या नुकसान बचाने का वर्ष नहीं है, यह सिर्फ और सिर्फ जीवन बचाने का वर्ष है।

मेरी बात जहा तक है इस समय मैं यह झमेले में भी नहीं प़ड़ूंगा कि देश की विकास दर क्या है या सेंसेक्स मार्केट कितना ऊंचा जा रहा है या नीचे की चरफ झांक रहा है, परन्तु एक बात मुख्य रूप से सोचने वाली है कि हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि स्वास्थ्य सुविधाओं  के साथ दैनिक जरूरतें भी आम नागरिकों की पूरी हो सकें, इस अवस्था मे जब बेरोजगारी बढ़ रही है और आम जनता के साथ-साथ लघु एंव कुटीर उद्योग को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहायता की आवश्यकता है।

डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के नाम पर 20 लाख करोड़ रु. का पैकेज देने की घोषणा की गई है और यह प्रत्यक्ष रूप से न देकर सरकार लोन के रूप में प्रदान कर रही है। सरकार का यह कदम वाकई प्रोत्साहन देने वाला है। परन्तु इस दशा में उस शान्तिदेवी को क्या लाभ होगा जो शान्तिदेवी अभी-अभी दिल्ली से भोपाल पहुंची और उन्हें दिल्ली के नाम से ही डर लगता है, जहां उनका पति मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करता था। अब तो इनकी जीविका कोई साधन नहीं रहा। तो इस स्थिति में सरकार बताये कि तमाम शान्तीबाई, रमाबाई के लिये सरकार की क्या योजना है।

brajesh Kumar R9 बृजेश कुमार लेखक टीवी पत्रकार हैं।
बृजेश कुमार
लेखक टीवी पत्रकार हैं।

मनरेगा में हम कितने लोगों के रोजगार सुनिश्चित कर सकते हैं। आज जनता को लम्बे लच्छेदार भाषण की आवश्यकता नहीं है। आज आवश्यकता है कि सरकार हर घर तक पहुंचे और सुनिशिचित करे कि कोई परिवार भूखा न रहे। साथ ही पैनी नजर भारत की अर्थव्यवस्था पर रखनी होगी। कोरोना के बाद विश्व अर्थव्यवस्था का ऊंट किस करवट बैठेगा। और भारतीय बाजार विशेषज्ञ को चाहिये कि चीन से पलायन कर रही कम्पनियों को भारत की तरफ मोड़ने में कामयाब हो सके।

सरकार को कम्पनियों के साथ-साथ स्वदेशी पर ध्यान देना होगा, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था जल्दी ही पटरी पर लौट सके। यहां सरकार के साथ आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि अपनी सुरक्षा पर स्वयं ध्यान दे। जितना भी कम उम्मीद सरकार से करें वह बेहतर होगा। साथ ही सरकार बैंकिग सेक्टर विनिर्माण क्षेत्र पर ध्यान देने के साथ कृषि पर ध्यान दे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने हमें 40 साल पहले ही मूल मंत्र दे दिया था जय जवान जय किसान। हमें ध्यान देना होगा देश का किसान खुशहाल होगा तो देश खुशहाल होगा।

बृजेश कुमार

लेखक टीवी पत्रकार हैं।

डॉ. राम पुनियानी से समझिए जिहाद का असली अर्थ

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

जिहाद के असली अर्थ को समझने की ज़रूरत

Jihad and Jihadi : ARTICLE BY DR RAM PUNIYANI IN HINDI – JIHAD

जिहाद और जिहादी – इन दोनों शब्दों का पिछले दो दशकों से नकारात्मक अर्थों और सन्दर्भों में जम कर प्रयोग हो रहा है. इन दोनों शब्दों को आतंकवाद और हिंसा (Terrorism and violence) से जोड़ दिया गया है. 9/11 के बाद से इन शब्दों का मीडिया में इस्तेमाल आम हो गया है. 9/11/2001 को न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (World Trade Center in New York) की इमारत से दो हवाईजहाजों को भिड़ा दिया गया था. इस घटना में लगभग 3,000 निर्दोष लोग मारे गए थे. इनमें सभी धर्मों और राष्ट्रीयताओं के व्यक्ति शामिल थे.

Osama bin Laden called the attack on the World Trade Center in New York a jihad.

ओसामा बिन लादेन ने इस हमले को जिहाद बताया था. इसके बाद से ही अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद(Islamic terrorism) शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. मुस्लिम आतंकी गिरोहों द्वारा अंजाम दी गई हर घटना को इस्लामिक आतंकवाद बताया जाने लगा. देवबंद और बरेलवी मौलानाओं सहित इस्लाम के अनेक अध्येताओं के बार-बार यह साफ़ करने के बावजूद कि इस्लाम निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा की इज़ाज़त नहीं देता, इस शब्द का बेज़ा प्रयोग जारी है.

The word Jihad has become a weapon in the hands of communal and disruptive forces.

जिहाद शब्द सांप्रदायिक और विघटनकारी ताकतों के हाथों में एक हथियार बन गया है. सोशल मीडिया के अलावा मुख्यधारा के मीडिया में भी इसका धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. गोदी मीडिया इस जुमले का प्रयोग मुसलमानों के विरुद्ध ज़हर घोलने के लिए कर रहा है.

हाल (11 मार्च 2020) में ज़ी न्यूज़ के मुख्य संपादक श्री सुधीर चौधरी  (Chief Editor of Zee News, Mr. Sudhir Chaudhary) ने तो सभी हदें पार कर दीं. उन्होंने बाकायदा एक चार्ट बनाकर जिहाद के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया – लव जिहाद, लैंड जिहाद और कोरोना जिहाद (Love Jihad, Land Jihad and Corona Jihad)! चौधरी साहब का कहना था कि इन विभिन्न प्रकार के  जिहादों द्वारा भारत को कमज़ोर किया जा रहा है. चौधरी जी क्या कहना चाह रहे थे, ये तो वही जानें परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि टीवी पर इस तरह के कार्यक्रमों से मुसलमानों और जिहाद के बारे में मिथ्या धारणाएं बनती हैं.

Such propaganda is not new to the dock media.

गोदी मीडिया के लिए इस तरह का दुष्प्रचार कोई नई बात नहीं है. परन्तु इस बार जो नया था वह यह कि संपादक महोदय के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई. इसके तुरंत बाद उनका सुर बदल गया. अगले कार्यक्रम में उन्होंने जिहाद शब्द का काफी सावधानी से और सम्मानपूर्वक इस्तेमाल किया. यह कहना मुश्किल है कि उन्हें अचानक कोई इलहाम हुआ था या फिर वे क़ानूनी कार्यवाही से डर गए थे.

आज जिहाद शब्द का इस्तेमाल हिंसा और आतंकवाद के पर्यायवाची बतौर किया जाता है. परन्तु कुरान में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है. इस्लामिक विद्वान असग़र अली इंजीनियर के अनुसार कुरान में इस शब्द के कई अर्थ हैं. इसका मूल अर्थ है अधिकतम प्रयास करना या हरचंद कोशिश करना. निर्दोषों के साथ खून-खराबे से जिहाद का कोई लेनादेना नहीं है. हां, बादशाह और अन्य सत्ताधारी इस शब्द की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं. अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्तार की लडाई को वे धार्मिक रंग देते रहे हैं. ठीक इसी तरह, ईसाई राजाओं ने क्रूसेड (The crusade) और हिन्दू राजाओं ने धर्मयुद्ध (Religious war) शब्दों का दुरुपयोग किया.

कुरान और हदीस के गहराई और तार्किकता से अध्ययन से हमें जिहाद शब्द का असली अर्थ समझ में आ सकता है. भक्ति संतों की तरह, सूफी संत भी सत्ता संघर्ष से परे थे और धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर जोर देते थे. उन्होंने इस शब्द के वास्तविक और गहरे अर्थ से हमारा परिचय करवाया.

इंजीनियर के अनुसार,

“यही कारण है कि वे युद्ध को जिहाद-ए-असग़र और अपनी लिप्सा व इच्छाओं पर नियंत्रण की लडाई को जिहाद-ए-अकबर (महान या श्रेष्ठ जिहाद) कहते थे”

(‘ऑन मल्टीलेयर्ड कांसेप्ट ऑफ़ जिहाद’, ‘ए मॉडर्न एप्रोच टू इस्लाम’ में, धर्मारम, पृष्ठ 26, 2003, बैंगलोर).

कुरान में जिहाद शब्द का 40 से अधिक बार उपयोग किया गया है और अधिकांश मामलों में इसे ‘जिहाद-ए-अकबर’ के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है – अर्थात अपने मन पर नियंत्रण की लडाई.

जिहाद शब्द के गलत अर्थ में प्रयोग – चौधरी जिसके एक उदाहरण हैं –  की शुरुआत पाकिस्तान में विशेष तौर पर स्थापित मदरसों में मुजाहिदीनों के प्रशिक्षण के दौरान हुई. यह प्रशिक्षण अमरीका के इशारे पर और उसके द्वारा उपलब्ध करवाए गए धन से दिया गया था. यह 1980 के दशक की बात है. उस समय रूसी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और वियतनाम में अपनी शर्मनाक पराजय से अमरीकी सेना का मनोबल इतना गिर गया था कि वह रुसी सेना का मुकाबला करने में सक्षम नहीं थी. इसलिए अमरीका ने मुजाहिदीनों के ज़रिये यह लड़ाई लड़ी.

The US used the extreme Salafi version of Islam to obsess over a section of Muslim youth.

अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी सलाफी संस्करण का इस्तेमाल मुस्लिम युवाओं के एक हिस्से को जुनूनी बनाने के लिए किया. मुस्लिम युवाओं को अमरीका के धन से संचालित मदरसों में तालिबान बना दिया गया. उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम का पाठ्यक्रम  वाशिंगटन में तैयार किया गया. उन्हें अन्य समुदायों से नफरत करना सिखाया गया और काफिर शब्द का तोड़ा-मरोड़ा गया अर्थ उनके दिमाग में ठूंसा गया. उन्हें बताया गया कि कम्युनिस्ट काफ़िर हैं और उन्हें मारना जिहाद है. और यह भी कि जो लोग जिहाद करते हुए मारे जाएंगे उन्हें जन्नत नसीब होगी जहाँ 72 हूरें उनका इंतज़ार कर रहीं होंगीं.

अमरीका ने ही अल कायदा को बढ़ावा दिया (America promoted al Qaeda) और अल कायदा रूस-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन गया. महमूद ममदानी ने अपनी पुस्तक ‘गुड मुस्लिम, बेड मुस्लिम’ में लिखा है कि सीआईए के दस्तावेजों के अनुसार, अमरीका ने इस ऑपरेशन पर लगभग 800 करोड़ डॉलर खर्च किये और मुजाहीदीनों को भारी मात्रा में आधुनिक हथियार उपलब्ध करवाए, जिनमें मिसाइलें शामिल थीं.

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं
डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani)
लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

हम सबको याद है कि जब अल कायदा के नेता अमरीका की अपनी यात्रा के दौरान वाइट हाउस पहुंचे तब राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उनका परिचय ऐसे लोगों के रूप में दिया जो कम्युनिज्म नामक बुराई के खिलाफ लड़ रहे हैं और अमरीका के निर्माताओं के समकक्ष हैं.

यह बात अलग है कि बाद में यही तत्त्व भस्मासुर साबित हुए और उन्होंने बड़ी संख्या में मुसलमानों की जान ली. इस्लामिक स्टेट और आईएसआईइस जैसे संगठन भी अस्तित्व में आ गए. ऐसा अनुमान है कि पश्चिम एशिया के तेल के कुओं पर कब्ज़ा करने के अमरीकी अभियान के तहत जिन संगठनों को अमरीका  ने खड़ा किया था उन्होंने अब तक पाकिस्तान के 70,000 नागरिकों की जान ले ली है.

सुधीर चौधरी जैसे लोग ‘जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए कर रहे हैं. यह संतोष की बात है कि कानून का चाबुक फटकारते ही वे चुप्पी साध लेते हैं. हम आशा करते हैं कि इस तरह के घृणा फैलाने वाले अभियानों का वैचारिक और कानूनी दोनों स्तरों पर मुकाबला किया जायेगा और भारतीय संविधान इसमें हमारी सहायता करेगा.

डॉ. राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

कोविड 19 की आड़ में मोदी सरकार ने किया पर्यावरण का विनाश

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Modi government did destruction of environment under the cover of COVID-19

देशव्यापी लॉकडाउन (Nationwide lockdown) के दौर में भी केंद्र सरकार के किसी एक मंत्रालय ने अपना नियमित से भी अधिक काम किया है, तो वह है पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change). सामान्य दिनों से अधिक काम इस मंत्रालय ने इसलिए नहीं किया कि उसे पर्यावरण की चिंता है, बल्कि इसलिए किया कि उसे उद्योगपतियों की चिंता है.

जितनी भी बड़ी परियोजनाओं को सामान्य स्थितियों में पर्यावरण स्वीकृति के समय स्थानीय जनता और पर्यावरणविदों के विरोध का सामना करना पड़ता, उन सभी परियोजनाओं को आनन्-फानन में मंत्रालय ने पर्यावरण स्वीकृति प्रदान कर दी, या फिर ऐसा करने की तरफ बढ़ रहे हैं.

मंत्रालय में पर्यावरण स्वीकृति के लिए जो एक्सपर्ट एप्रेजल कमेटी है, उसकी सामान्य स्थितियों में नियमित बैठक होती या न होती हो पर लॉकडाउन के दौर में विडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा नियमित बैठकें की गईं और पर्यावरण का विनाश (Environmental destruction) करने वाले लगभग सभी खनन परियोजनाओं, उद्योगों और जल-विद्युत् परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई. इस दौर में तो न पब्लिक हियरिंग का झंझट है और ना ही स्थल पर किसी विस्तृत अध्ययन का. कोविड 19 की आड़ में सब माफ़ कर दिया गया.

पर्यावरण से सम्बंधित विशेषज्ञ कांची कोहली के अनुसार, इस दौर में मंत्रालय ने ऐसे काम किया मानो कोई हेल्थ इमरजेंसी (Health emergency) नहीं हो, लगातार बैठकें होतीं रहीं और पर्यावरण का विनाश करने वाले अधिकतर परियोजनाओं को स्वीकृति दे दी गई.

इस दौर में एक एलीफैंट रिज़र्व में कोयला खदान को अनुमति (Permission for coal mine in Elephant Reserve) दी गई, वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में ड्रिलिंग की अनुमति (Permission for drilling in Wildlife Sanctuary) दी गई और प्रधानमंत्री के पसंदीदा सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट, जिसके अंतर्गत नया संसद भवन और दूसरे भवन बनाने हैं को भी मंजूरी दी गई. वन्यजीवों और जनजातियों के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण दिबांग घाटी में 3097 मेगावाट के जल विद्युत् परियोजना और मध्य प्रदेश में टाइगर रिज़र्व के बीच यूरेनियम के खनन परियोजना को भी जल्दी ही स्वीकृति मिलने वाली है.

वर्ष 2014 से लगातार पर्यावरण कानूनों को पहले से अधिक लचर करने की कवायद लगातार की जा रही है. 23 मार्च को फिर से मंत्रालय ने पहले के पर्यावरण स्वीकृति के नियमों में ढील देने से सम्बंधित एक ड्राफ्ट प्रकाशित किया है, इसमें जन-सुनवाई का समय कम करने, अनेक उद्योगों को जनसुनवाई के दायरे से बाहर करना इत्यादि का प्रस्ताव है.

कुल मिलाकर एक ऐसी स्थिति बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें जनता की भागीदारी ख़त्म की जा सके. इस ड्राफ्ट को प्रकाशित भी 23 मार्च को सोच समझ कर किया गया होगा, 22 मार्च को जनता कर्फ्यू था और 24 मार्च से लॉकडाउन का प्रथम चरण शुरू किया गया था. पर्यावरण मंत्रालय ने सोचा होगा कि परेशान जनता इसे नहीं देखेगी और फिर 60 दिनों बाद इसे ही क़ानून बना दिया जाएगा. पर, पर्यावरणविदों के विरोध के बाद अब इसपर सुझाव/शिकायत की तारीख बढाकर 30 जून कर दिया गया है.

पर्यावरण मंत्रालय, एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के कामकाज को नजदीक से देखकर यही लगता है कि यदि ये संस्थान बंद कर दिए जाएँ तो संभव हे देश का पर्यावरण बेहतर हो जाए, क्योंकि तब जनता इसका विरोध करना शुरू करेगी.

इस दौर में एनजीटी किसी एक स्वतंत्र निकाय की तरह नहीं बल्कि पर्यावरण मंत्रालय के एक विभाग की तरह काम कर रहा है, जिसका काम मंत्री जी के इशारों पर नाचना है.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तो शुरू से ही एक रीढ़-विहीन जंतु की तरह है और जिसका एक भी काम ऐसा नहीं है जिसे कहा जा सके कि इससे वास्तव में प्रदूषण कम हो रहा है. प्रधानमंत्री के चहेते प्रोजेक्ट, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के विरोध में इसने कभी कुछ नहीं कहा, जबकि दिल्ली/नई दिल्ली वायु प्रदूषण कण्ट्रोल क्षेत्र है, इसका नजफगढ़ बेसिन का हिस्सा अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र है, यह वर्तमान में दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है, यहाँ की यमुना दुनिया की सबसे प्रदूषित नदी खंड में शुमार है, यहाँ शोर का स्तर कभी भी मानक के अनुरूप नहीं रहता, दिल्ली से इतना कचरा उत्पन्न होता है जिसका प्रबंधन नहीं किया जा सकता है, यहाँ भूजल ख़त्म होने के कगार पर है, और इसमें संरक्षित रिज के क्षेत्र को भी बर्बाद किया जाना है.

जाहिर है, इस सरकार के लिए पर्यावरण संरक्षण कोई मुद्दा नहीं है, जनता कोई मुद्दा नहीं है और वन्य जीव भी कोई मुद्दा नहीं हैं. यह सरकार पहले दिन से कुछ चुनिन्दा उद्योगपतियों के हितों को साध रही है और निकट भविष्य में कोई बड़ा बदलाव होगा, ऐसी उम्मीद नहीं है.

महेंद्र पाण्डेय

डब्ल्यूएचओ ने शी जिनपिंग और डॉ. टेड्रोस के बीच कोरोनोवायरस कवर-अप फोन कॉल से इनकार किया

World Health Organization WHO

WHO denies coronavirus cover-up phone call between Xi Jinping and Dr. Tedros

नई दिल्ली 10 मई, 2020। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक रिपोर्ट का खंडन किया जिसमें कहा गया था कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक जनवरी के फोन कॉल में कोरोनोवायरस प्रकोप के बारे में सच्चाई को छिपाने के लिए डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयस पर दबाव डाला।

डेर स्पीगल की रिपोर्ट क्या थी? | What was Der Spiegel’s report ?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जर्मन समाचार आउटलेट, डेर स्पीगल ने इस सप्ताह के अंत में एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें कहा गया था कि जर्मनी की संघीय खुफिया सेवा (जिसे “बुंडेसनच्रीचेंटेंडिंसस्ट” या बीएनडी के रूप में जाना जाता है) ने पाया कि चीन ने “डब्ल्यूएचओ” से कोरोनावाइरस प्रकोप की “वैश्विक चेतावनी में देरी” करने का आग्रह किया। ।

डेर स्पीगल की रिपोर्ट में विशेष रूप से, कहा गया है कि बीएनडी ने पाया कि शी जिनपिंग और टेड्रोस ने 21 जनवरी को फोन पर बात की थी और चीनी नेता ने डब्ल्यूएचओ प्रमुख से “मानव-से-मानव संचरण के बारे में जानकारी दबाए रखने और महामारी संबंधी चेतावनी में देरी करने के लिए” कहा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखबार ने बीएनडी को “अनुमान” कहा कि कोरोनावायरस के बारे में जानकारी छिपाने की चीन की नीति के परिणामस्वरूप दुनिया भर में वायरस के खिलाफ लड़ाई में चार से छह हफ़्ते लग गए।

डब्ल्यूएचओ ने शनिवार को एक बयान जारी कर लेख का जोरदार खंडन किया।
डेर स्पीगेल में झूठे आरोपों पर डब्ल्यूएचओ का बयान

21 जनवरी, 2020 की डेर स्पीगेल की रिपोर्ट, चीन के महानिदेशक टेड्रोस एडहोम घेब्येयियस और चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के बीच टेलीफोन पर बातचीत निराधार और असत्य है। डॉ। टेड्रोस और राष्ट्रपति शी ने 21 जनवरी को बात नहीं की और उन्होंने कभी फोन पर बात नहीं की। इस तरह की गलत खबरें WHO की और COVID-19 महामारी को खत्म करने की दुनिया की कोशिशों से ध्यान भटकाती हैं।

नोट करें: चीन ने 20 जनवरी को नोवेल कोरोनावायरस के मानव-से-मानव संचरण की पुष्टि की।”

ईद सादगी के साथ कैसे मनाएं ?

Eid celebrated with great simplicity

How to celebrate Eid with simplicity?

ईद निहायत सादगी के साथ लेकिन पुर-वक़ार ढंग से कैसे मनाई जाती है (How is Eid celebrated with great simplicity but in a virtuous manner), यह बात मेरे वालिद हज़रत मौलाना अब्दुस्समद ( रह.) ने बचपन में दो कहानियों के ज़रिया मुझे समझाई थी।

पहली कहानी सुप्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद की मशहूर कहानी “ईदगाह“ है जो हिन्दी/उर्दू के कम-ओ-बेश सभी पाठकों ने पढ़ी होगी. इस कहानी में किस तरह एक ग़रीब अनाथ बच्चा, अपनी बूढ़ी नानी का नवासा ‘हामिद’ बिना किसी हीन-भावना में मुब्तला हुए निहायत पुर-वक़ार ढंग से, आत्मसम्मान के साथ निहायत सादगी से ईद की नमाज़ अदा करने के लिए ईदगाह जाता है और अपने दौलतमंद दोस्तों को अपनी पुर-वक़ार सादगी से मरऊब (प्रभावित) कर देता है।

दूसरी कहानी एक तारीख़ी वाक़ेआ है जिस में यह बताया गया है कि किस तरह बादशाह-ए-वक़्त अमीरुल्मोमिनीन हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह-अलैह और उनके बच्चे पैवंद लगे हुए पुराने साफ़-सुथरे लिबास पहन कर ईदगाह जा कर ईद की नमाज़ अदा करते हैं।

बचपन में वालिद बुज़ुर्गवार ( पिताश्री) की इस तालीम ने मेरे दिलो-दिमाग़ पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि फिर मेरे नज़दीक ईद के मौक़े पर नए कपड़ों की कोई अहमियत बाक़ी नहीं रही।

दरअसल ईद की सच्ची ख़ुशी (Eid’s true happiness) तो इस बात के अहसास में पोशीदा है कि अल्लाह तआला के बंदे ने अल्लाह तआला की रज़ा के लिए अल्लाह तआला की दी हुई तौफ़ीक़ और रूहानी कु़व्वत से रमज़ान का रोज़ा मुकम्मल किया। ईद की नमाज़ (Eid prayer) के ज़रिया बंदा इसी जज़्बे के तहत अल्लाह-रब्बुल-इज़्ज़त का शुक्रिया अदा करता है और उससे उसकी रहमत और मग़्फ़िरत का तलबगार बनता है।

पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ ने फ़रमाया कि, “रोज़ादार के लिए दो खुशियाँ हैं – एक जब वह इफ़्तार करता है दूसरी ख़ुशी उसको उस वक़्त मिलेगी जब वह अपने रब से मिलेगा।” और ईद की ख़ुशी इसी की झलक है.

अब जबकि कोरोना वायरस के ख़तरों के बीच रमज़ान (Ramadan amidst the dangers of corona virus) का दूसरा अशरा गुज़र रहा है, विभिन्न इस्लामी विद्वानों एंव संगठनों के द्वारा यह अपील की जा रही है कि COVID-19 महामारी की रोकथाम के पेश-ए-नज़र लॉक-डाउन और सोशल- डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए इस वर्ष ईद निहायत सादगी से मनाई जाये और अगर ईद की ख़रीदारी के लिए लॉक-डॉन में कुछ ढील भी दी जाती है तो हरगिज़-हरगिज़ ईद की ख़रीदारी के नाम पर बाज़ार में निकलने की कोशिश न की जाये। हर समझदार मुसलमान इस अपील का स्वागत करेगा।

जब CORONA COVID-19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए हम अपनी सारी इबादात अपने घरों में ही अदा कर रहे हैं, मस्जिद में नमाज़-बा-जमाअत/तरावीह, जुमे की नमाज़ और ईद की नमाज़ भी हम पर साक़ित हो चुकी है तो फिर ईद भी हम निहायत सादगी के साथ क्यूँ न मनायें ?

नाम :- मोहम्मद खुर्शीद अकरम तख़ल्लुस : सोज़ / सोज़ मुशीरी वल्दियत :- मौलाना अब्दुस्समद ( मरहूम ) जन्म तिथि :- 01/03/1965 जन्म स्थान : - बिहार शरीफ़, ज़िला :- नालंदा (बिहार) शिक्षा :- 1) बी.ए.             2) डिप. इन माइनिंग इंजीनियरिंग     उस्ताद-ए-सुख़न :-( स्व) हज़रत मुशीर झिन्झानवी देहलवी काव्य संकलन : - सोज़-ए-दिल सम्मान :- 1. आदर्श कवि सम्मान, और साहित्य श्री सम्मान संप्रति :- कोल इंडिया की वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड में कार्यरत संपर्क :- बी-22, कैलाश नगर, पोस्ट :- साखरा(कोलगाँव), तहसील :- वणी ज़िला :- यवतमाल , पिन:- 445307 (महाराष्ट्र)
मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़

दरअसल इस्लाम एक निहायत ही सादगी पसंद मज़हब और दीन-ए-फ़ितरत है। यहाँ हर क़िस्म की तक़रीबात और ख़ुशी के मौक़े पर भी सादगी बरतने की तालीम दी गयी है। ख़ुद पैग़म्बर-ए-इस्लाम ﷺ हर मामले में सादगी से ही पेश आते और सादगी को ही पसंद फ़रमाते थे, यही हाल तमाम असहाब-ए-रसूल और बुज़ुर्गान-ए-दीन का रहा।

दीगर मज़ाहिब के सूफ़ी-संतों के यहाँ भी सादगी की बड़ी अहमियत रही है। आज अगर किसी भी सतह पर मुसलामानों की एक बड़ी तादाद इस फ़ितरी सादगी से दूर हो रही है और ईद से लेकर शादी ब्याह तक ग़ैर-ज़रूरी नमूद-ओ-नुमाइश का शिकार हो रही है तो इसकी वजह अपने मज़हब से महज़ रस्मी लगाओ और मज़हब की हक़ीक़ी/वास्तविक तालीमात से दूरी है। चलिए कोरोना वायरस ने कम अज़ कम हमारी ज़िंदगी के रुख़ को फ़ित्री सादगी की तरफ़ मोड़ तो दिया।

अतः ईद मनाने के लिए नये कपड़ों की ख़रीदारी और लम्बे-चौड़े मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं है। हमारे पास जो भी लिबास मौजूद है उसमें जो मुझे ज़्यादा पसंद है उसी को पहन लें, ईदगाह तो जाना नहीं है क्यूंकि वक़्त-ओ-हालात को मद्देनज़र रखते हुए लॉक-डॉन और सोशल- डिस्टेंसिंग का पालन ज़रूरी है। इसलिए घर में ही शुक्राने की नमाज़ अदा करें और देश-दुनिया में अमन और शान्ति के लिए दुआ करें ! कोरोना वायरस के ख़ातमे और इसके बीमारों की शफ़ायाबी की दुआ मांगें! ज़्यादा से ज़्यादा बेकस, लाचार, ग़रीब और ज़रूरतमंद लोगों तक अपनी मदद पहुँचाने की कोशिश करें ! इसी से ईद की सच्ची ख़ुशी हासिल होगी !

मोहम्मद ख़ुर्शीद अकरम सोज़

राहुल गांधी ने कहा, लॉकडाउन हटाने से पहले सरकार को एग्जिट प्लान में पारदर्शिता लाने की जरूरत

Rahul Gandhi

Countrywide lockdown is not like an on-off switch.

नई दिल्ली, 08 मई 2020. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को कहा कि कोरोना वायरस (कोविड-19) के प्रसार का मुकाबला (Combating the spread of corona virus (covid-19)) करने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन एक ऑन-ऑफ स्विच की तरह नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर लॉकडाउन को खत्म करना चाहती है तो उसे लोगों की मानसिक सोच में क्रियात्मक परिवर्तन और एग्जिट प्लान (निकास योजना) में पारदर्शिता लाना होगा।

मीडियाकर्मियों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने कहा,

“हम सरकार को जो सुझाव दे रहे हैं, उन पर हम आंतरिक चर्चा करते रहे हैं।”

आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मीडिया से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, ‘अगर हम इस लड़ाई को सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय तक सीमित रखेंगे तो हार जाएंगे. प्रधानमंत्री को नीचे के लोगों को भी ताकत देनी होगी।’

राहुल गांधी का कहना था कि इस समय भारत को मजबूत पीएम ही नहीं बल्कि मजबूत सीएम और डीएम भी चाहिए। उन्होंने कहा,

‘हो सकता है कि जिला स्तर पर डीएम के पास बहुत सारी जानकारियां हों, ऐसी जानकारियां जो राष्ट्रीय स्तर तक न पहुंची हों. तो उनके वहां पहुंचने और फिर वापस जाने के बजाय हमें समय बचाना होगा और मामला स्थानीय स्तर पर ही निपटाना होगा।’

राहुल ने कहा कि देश थोड़ी समस्या में चलने लगा है। उन्होंने कहा,

“एक मजबूत भावना है कि हमें तुरंत एमएसएमई को पैकेज जारी करने की आवश्यकता है, गरीबों के हाथों में पैसा देने और लॉकडाउन खोलने की तैयारी के अलावा प्रवासियों के लिए एक रणनीति तैयार करने की जरूरत है।”

राहुल गांधी ने केंद्र सरकार से अपने कार्यों में थोड़ी ‘पारदर्शिता’ लाने का भी आग्रह किया।

कांग्रेस नेता ने कहा,

“हमें यह समझने की जरूरत है कि जब वे लॉकडाउन हटाते हैं, तो इसके लिए क्या मापदंड होंगे, वे कौन से बॉक्स हैं, जिन्हें वास्तव में प्रक्रिया शुरू करने से पहले वे टिक करना चाहते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि सरकार इन मानदंडों के बारे में लोगों को बताए।”

कांग्रेस नेता ने कहा कि लॉकडाउन खोलने के लिए कई चीजों की आवश्यकता होती है, इसके लिए मनोवैज्ञानिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है।

राहुल गांधी के अनुसार, कोविड-19 बीमारी वर्तमान में बुजुर्गों और मधुमेह, हृदय संबंधी समस्या और फेफड़ों की बीमारी जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए बहुत खतरनाक है।

We need to bring a psychological change in people’s minds

उन्होंने कहा,

“हमें लोगों के दिमाग में एक मनोवैज्ञानिक बदलाव लाने की जरूरत है। अगर सरकार खोलना चाहती है, तो उसे इस डर को विश्वास की भावना में बदलना होगा। अन्यथा लोग उस पल से बाहर जाना शुरू कर देंगे, जब लॉकडाउन हटा दिया जाएगा।”

राहुल ने कहा कि हमें लॉकडाउन खोलने के लिए एक रणनीति की आवश्यकता है। इसके लिए राज्यों, केंद्र सरकार, जिला अधिकारियों और कई अन्य लोगों के बीच समन्वय की आवश्यकता है। यह सरकार के सामने चुनौती है।


गैस के चूल्हे से भी फैलता है घातक प्रदूषण

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क्या एलपीजी प्रदूषण मुक्त है | Is lpg pollution free

लगभग पूरी दुनिया इस समय लॉकडाउन (Lockdown) वाली स्थिति में है, लोग घरों में बंद हैं और फिर जाहिर है महिलाओं का चूल्हे के सामने सामान्य से अधिक समय बीत रहा है. अब देश में अधिकतर घरों में गैस के चूल्हे (Gas stove) आ गए हैं. ये चूल्हे लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस– Liquid petroleum gas (एलपीजी) या फिर पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) से जलते हैं. हमारे देश में प्रधानमंत्री से लेकर गैस आपूर्ती करने वाली कम्पनियां इन गैसों को लगातार प्रदूषण मुक्त बताती रहीं हैं. प्रधानमंत्री जी ने तो आँखों में आंसू भरकर अपनी माँ का किस्सा सुनाया था कि किस तरह उन्हें लकड़ी के चूल्हे से उत्पन्न प्रदूषण (Pollution caused by wood stove) से परेशानी होती थी और किस तरह एलपीजी प्रदूषण मुक्त है. पर, अब नए अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि गैस के चूल्हे पर जिन घरों में खाना पकाया जाता है, यदि उन घरों में एग्जॉस्ट या चिमनी या फिर रसोई में हवा के आने-जाने का माध्यम नहीं हो तो ऐसे घरों के अन्दर वायु प्रदूषण का स्तर बाहर की तुलना में दो से पांच गुना तक अधिक हो सकता है.

इस शोधपत्र को रॉकी माउंटेन इंस्टिट्यूट और पर्यावरण पर काम करने वाले अनेक विश्विद्यालयों के वैज्ञानिकों द्वारा पिछले दशक में किये गए सम्बंधित अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है. इसके प्रमुख लेखक ब्रैडी साल्स हैं. इस शोधपत्र के अनुसार अधिकतर रसोई में हवा के आवागमन की सुविधा नहीं होती, और गैस जलने पर पार्टिकुलेट मैटर के साथ ही विभिन्न गैसें भी उत्पन्न होतीं हैं. इनमें नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें प्रमुख हैं. इन गैसों को कोविड 19 के व्यापक प्रभाव से भी जोड़ा गया है क्योंकि सभी गैसें फेफड़े को नुकसान पहुंचातीं हैं और कोविड 19 का भी सबसे अधिक असर फेफड़े पर ही पड़ता है.

New study links air pollution to increase in newborn intensive care admissions

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की अधिक सांद्रता में कम समय तक रहने पर भी बच्चों में दमा का खतरा बढ़ जाता है. अमेरिका में किये गए अध्ययन में पाया गया कि जिन घरों में गैस का चूल्हा था, वहां के बच्चों में दमा का दर 42 प्रतिशत अधिक था. ऑस्ट्रेलिया में किये गए दूसरे अध्ययन के अनुसार जितने बच्चों को दमा होता है, उनमें से 12.3 प्रतिशत का कारण गैस के चूल्हे से निकालने वाला प्रदूषण है. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की अधिक सांद्रता में लम्बे समय तक रहने से ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, ह्रदय की समस्या, डायबिटीज और कैंसर भी हो सकता है.

कार्बन मोनोऑक्साइड के अल्पकालिक प्रभाव से सरदर्द और उल्टी हो सकती है, जबकि इसके दीर्घकालिक प्रभाव अनियमित ह्रदय धड़कन, ह्रदयगति रुकना और असामयिक मौत है. शोधपत्र के अनुसार बिजली के चूल्हे से इस प्रदूषण को कम किया जा सकता है. यदि आप गैस के चूल्हे पर ही खाना पकाना चाहते हैं तो जहां तक संभव हो पिछले बर्नर का उपयोग कीजिये, रसोई को हवादार बनाइये या फिर इलेक्ट्रिकल चिमनी को स्थापित कीजिये.

Cardiovascular disease due to the effect of air pollution

यूरोपियन हार्ट जर्नल (European Heart Journal) के अगस्त अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार वायु प्रदूषण के असर से पूरी दुनिया में कार्डियोवैस्कुलर रोग तेजी से असर दिखा रहे हैं.

जोहान्स गुटेनबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक थॉमस मुन्जाल की अगुवाई में यह अध्ययन जर्मनी, अमेरिका और इंग्लैंड के विशेषज्ञों के साथ किया गया. इसके अनुसार वायु प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों मे से 60 प्रतिशत से अधिक का कारण कार्डियोवैस्कुलर रोग होते हैं.

थॉमस मुन्ज़ेल के अनुसार प्रदूषित हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड – सभी कार्डियोवैस्कुलर रोग का कारण हैं.

Thomas Münzel MD, is Chief of the Department of Cardiology at the University Medical Center, Johannes Gutenberg University Mainz, Germany.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास के वैज्ञानिक जोशुआ आप्टे की अगुवाई में किये गए अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया में लोगों की औसत आयु वायु प्रदूषण के कारण कम से कम एक वर्ष कम हो रही है. एशियाई देशों में तो औसत आयु दो वर्ष के लगभग कम हो जाती है.

Joshua Apte is an Assistant Professor at the University of Texas at Austin. His research group investigates air pollution, energy, and public health.

एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी नामक जर्नल के 22 अगस्त के अंक में प्रकाशित शोध पत्र के लिए वैज्ञानिकों ने कुल 185 देशों के वायु प्रदूषण और इनके प्रभावों का अध्ययन किया है. जोशुआ आप्टे के अनुसार एशिया में यदि वायु प्रदूषण में 15 से 20 प्रतिशत की कमी लाई जा सके तब अधिकतर बुजुर्ग आसानी से 85 वर्ष या इससे भी अधिक जीवित रहेंगे.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

वायु प्रदूषण को दमा, अंदरूनी अंगों में जलन और सूजन, मधुमेह और इसी प्रकार के दूसरे खतरों से लगातार जोड़ा जाता रहा है पर पहली बार यह पता चला है कि इससे किडनी भी प्रभावित होती है. प्लोस वन नामक जर्नल में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन के वैज्ञानिकों के एक शोधपत्र में यह बताया गया है, वायु प्रदूषण के कारण पूरी दुनिया में क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) तेजी से बढ़ रहे हैं. सीकेडी अनेक रोगों का समूह है, इसमें किडनी ठीक काम नहीं करती है और रक्त को साफ़ नहीं कर पाती. यह पहले से पता था कि धूम्रपान से अनेक रसायन उत्सर्जित होते हैं और इससे किडनी प्रभावित होती है. इसी तरह वायु प्रदूषण भी अनेक रसायनों का समूह है और इसके अनेक रसायन किडनी सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं.

Air Pollution may further impact coronavirus patients – Doctors

घरों के बाहर के प्रदूषण पर तो बहुत चर्चा की जाती है पर घरों के अन्दर के प्रदूषण (Indoor pollution) पर कोई चर्चा नहीं होती. अनेक अध्ययन साबित कर चुके हैं कि घरों के अन्दर प्रदूषण बाहर की तुलना में अधिक रहता है, इसलिए अब सरकारों को इस दिशा में ध्यान देना आवश्यक हो गया है.

महेंद्र पाण्डेय

लॉकडाउन में दोस्ती शब्दों की आभासी दुनिया से : इंसान होने और एक विवेकशील समाज के नागरिक होने के रूप में हमारी परीक्षा बहुत गहरी होती जा रही है

LockDown 3

नई दिल्ली, 06 मई 2020. लॉकडाउन की मियाद (Lockdown period) एक बार फिर बढ़ा दी गई है। बहुत सारे लोगों के लिए लॉकडाउन भागम-भाग की दौड़ से दूर सुकून का समय है, तो बहुत लोगों की जिंदगी अचानक परेशानियों और भूख की पीड़ा के केन्द्र में आ खड़ी हुई है। इंसान होने और एक विवेकशील समाज के नागरिक होने के रूप में हमारी परीक्षा बहुत गहरी होती जा रही है। वायरस से लड़ाई जैविक और वैज्ञानिक स्तर पर लड़ी जा सकती है, लेकिन अगर इसे हम जाति या धर्म के चश्मे से देखने लगेंगे तो हम यह लड़ाई हमेशा के लिए हार जाएंगे।

हम रोज़ नई-नई कहानियाँ गढ़ते हैं, या किसी और की कहानी का हिस्सा बनते हैं। बुधवार की दोपहर राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर लेखक दुष्यंत ने कहानियों के बीच जिंदगी या कहें ज़िंदगी से बनती कहानियों पर लोगों से बात कर कहानी लिखने की बारीकियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि,

“हम ज़िदगी से कहानियाँ एक सेट पैटर्न में उठाते हैं। लेकिन, अच्छी कहानी वही होती है जो आपको आश्चर्य में डाल दे। प्रयोगों की आंधी के बीच कहानी के सच को बचा पाना बहुत जरूरी है।“

हमारा साहित्य इस बात का प्रमाण है कि हमने महामारियों से लड़ाई एक होकर ही लड़ी है। मंगलवार की दोपहर कथाकार कमालाकांत त्रिपाठी ने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लाइव जुड़कर कहा कि, “महामारी का इतिहास भारत में पुराना है। प्लेग और हैजा से भारत में लाखों लोगों की जाने गईं हैं। हर बार महामारी बाहर से आती थी और इसे कोई न कोई लेकर आता था। सालों पहले हैजा और प्लेग ने झटके में कई गाँवों को ख़त्म कर दिया था। लेकिन यह गाँव के लोग ही थे जिन्होंने अपने सरल जीवन और साहचर्य से इन बीमारियों को अपने जीवन से, समाज से दूर भगाया।“

आभासी दुनिया के मंच से साहित्यिक चर्चाओं का सिलसिला लॉकडाउन के तीसरे फेज़ में भी जारी है। यह ऐसा साथ है जो लगातार पाठकों, लेखकों और साहित्य-प्रमियों को आपस में जोड़े हुए है।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लॉकडाउन के अकेलेपन को दूर करने के इस साझा प्रयास से अब तक 122 लेखकों एवं कलाकारों ने साथ जुड़कर, किताबों की दुनिया के रंगों से थोड़ा सा रंग निकालकर आभासी दुनिया के मंच पर बिखेर दिया है।

इसी सिलसिले में मंगलवार की शाम #StayAtHomeWithRajkamal के तहत राजकमल के फ़ेसबुक पेज से बात करते हुए लेखक वीरेन्द्र सारंग ने कहा,

“महामारियां चली जाएंगी। लेकिन, हमारा व्यवहार, हमारा विचार, हमारी मित्रता हमेशा हमारे साथ रहेंगी। शब्द और अक्षर ही सबकुछ है। हमारा आपस में बोलना बात करना हमारे होने का प्रमाण है।“

लाइव कार्यक्रम में लेखक वीरेन्द्र सारंग ने अपने उपन्यास ‘जननायक कृष्ण’ से कुछ अंश भी पढ़े  और लोगों से बातचीत की। साथ ही उन्होंने कविताओं का भी पाठ किया। उपन्यास ‘जननायक कृष्ण’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।

वहीं, कमलाकांत त्रिपाठी के उपन्यास ‘पाहीघर’ में हैजा का वर्णन है। 1857 के इतिहास पर आधारित इस उपन्यास में हैजा से गाँव में होने वाली परेशानियों का जिक्र है। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लाइव में कमलाकांत त्रिपाठी ने उपन्यास से अंश पाठ करने के बाद साहित्य में महामारियों पर बातचीत की।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने अपने कविता संग्रह ‘सूरज को अंगूठा’ से कई कविताओं का पाठ किया। उन्होंने लागों के आग्रह पर अपनी चर्चिता कविता ‘सोनचिरई’ का भी पाठ किया-

“वह स्त्री थी / और स्त्रियाँ कभी बांझ नहीं होती / वे रचती हैं तभी हम आप होते हैं / तभी दुनिया होती है / रचने का साहस पुरुष में नहीं होता / वे होती हैं तभी पुरुष होते हैं।“

साथ जुड़ें साथ पढ़ें

अनिश्चितता की इस परिस्थिति में हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ किताबों का अथाह संसार है। ’सभी के लिए मानसिक खुराक’ उपलब्ध कराने की राजकमल प्रकाशन की मुहिम के तहत वाट्सएप्प के जरिए पाठकों को रोज़ एक पुस्तिका साझा की जाती है। अबतक 10,000 से अधिक पाठक इस मुहिम के तहत भिन्न आस्वाद से भरपूर रोज़ एक पुस्तिका प्राप्त कर रहे हैं।

बुधवार को साझा की गई पुस्तिका ‘बॉयज़ लॉकर रूम’ की हैरान-परेशान करने वाली चर्चाओं के बीच स्त्रियों के प्रति सामाजिक संवेदनशीलता की जरूरत को रेखांकित करती कहानियों से तैयार की गई है।

राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी का कहना है,

“लॉकडाउन में लोग अपने को अकेला महसूस न करें इसलिए हम वाट्सएप्प के जरिए फ्री में लोगों को पढ़ने की सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं। पिछले 40 दिनों से हम लगातार फ़ेसबुक लाइव के जरिए लेखकों और साहित्य-प्रेमियों को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। लाइव में अपने प्रिय लेखक से जुड़ना पुरानी यादों को ताज़ा कर देता है, साथ ही इस विश्वास को मजबूत करता है कि इस मुश्किल घड़ी में हम एक हैं। अगर, हम एक हैं तो मुश्किलें छोटी हो जाती हैं।“

“पाठ-पुनर्पाठ” में रोज़ अलग-अलग तरह की पाठ्य सामग्री को चुनकर तैयार किया जाता है। फ़ेसबुक और ट्विटर के जरिए पाठकों ने इस पहल की भरपूर प्रशंसा की है।

इस पुस्तिका को पाठक वाट्सएप्प से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए राजकमल प्रकाशन समूह के व्हाट्सएप्प नम्बर 98108 02875 को फोन में सुरक्षित कर, उसी नम्बर पर अपना नाम लिखकर मैसेज भेज दें। आपको नियमित नि:शुल्क पुस्तिका मिलने लगेगी।

पानी के बीच कोच्चि के व्यंजनों का स्वाद

कोच्चि, लगभग पौने सात सौ साल पुराना शहर है। इसकी सांस्कृतिक विरासत ईसा के जन्म की सदी के आसपास से मिलती है जिसे इस शहर ने प्यार से संजो कर रखा है। इसके जन्म की कहानी कुछ इस तरह है – पेरियार नदी की बाढ़ में मोहिरी का ऐतिहासिक बंदरगाह नष्ट हो गया था। वहीं कोचिन में एक प्राकृतिक बंदरगाह बनने की संभावना प्रकट होने लगी। उसके बाद से ही यहाँ अधिकतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया और कोच्चि अस्तित्व में आया।

ये शहर एक जुड़वां शहर है। इसके साथ एरनाकुलम शहर भी जुड़ा हुआ है।

Taste of Kochi Cuisine

खाने में यहाँ लोगों का झुकाव ज्यादा नॉन वेज की ओर है। लेकिन, शाकाहारी व्यंजनों में भी यहाँ विविधता देखने को मिल जाती है। कापा करी, थड डोसा (डोसा और उत्तपम के बीच की चीज), तरह-तरह के रोस्ट जैसे, मटन, अंडा, सब्ज़ी यहाँ के आम व्यंजनों में शामिल हैं।

वैसे, बहुलतावादी सांस्कृतिक समुदायों के प्रभाव और समुद्र के पास होने की वजह से यहाँ के पसंदीदा व्यंजनों में मछली और अन्य समुद्री जीव-जन्तुओं से बनने वाले व्यंजन ही शामिल हैं।

कोच्छी करी (चिकन करी) – इसे नारियल के दूध और काजू के साथ भी पकाया जाता है। कापा करी, अपप्म, आलू स्टु, कडला करी, पुलेन करी आम घरों में भी पकाया जाता है।

कोच्चि के खाने में वहाँ के आयुर्वेद का असर भी देखने को मिलता है। दरअसल, कोच्चि कई तरह के खाने-पीने का सार है। यहाँ हर तरह का व्यंजन मिलता है जिसके लिए पर्यटन के लिए मशहूर केरल में दर-दर भटकना पड़ सकता है। यहाँ के खानों में गोवा, तमिलनाडु, मैसूर, केरल और पुर्तगाली खानों का असर साफ़ दिखाई देता है।

लॉकडाउन के तीसरे फ़ेज में भी लगातार जारी फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में अबतक 163 लाइव सत्र हो चुके हैं जिसमें 122 लेखकों और साहित्य प्रमियों ने भाग लिया है।

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राजकमल फेसबुक पेज से लाइव हुए कुछ ख़ास हिंदी साहित्य-प्रेमी : चिन्मयी त्रिपाठी (गायक), हरप्रीत सिंह (गायक), राजेंद्र धोड़पकर (कार्टूनिस्ट एवं पत्रकार), राजेश जोशी (पत्रकार), दारैन शाहिदी (दास्तानगो), अविनाश दास (फ़िल्म निर्देशक), रविकांत (इतिहासकार, सीएसडीएस), हिमांशु पंड्या (आलोचक/क्रिटिक), आनन्द प्रधान (मीडिया विशेषज्ञ), शिराज़ हुसैन (चित्रकार, पोस्टर आर्टिस्ट), हैदर रिज़वी, अंकिता आनंद, प्रेम मोदी, सुरेंद्र राजन, रघुवीर यादव, वाणी त्रिपाठी टिक्कू, राजशेखर. श्रेया अग्रवाल, जितेन्द्र कुमार, नेहा राय अतुल चौरसिया, मिहिर पंड्या एवं धर्मेन्द्र सुशांत।

हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन  से मर रहे हैं कोविड 19 के मरीज…. भारत कहीं दरियादिली में दुनिया में मौत का सामान तो नहीं भेज रहा है?

Coronavirus CDC

Covid-19 patients dying of hydroxychloroquine

दुनिया में आज के दौर के शासक निरंकुश हैं, दक्षिणपंथी हैं, कट्टरवादी हैं, छद्म-राष्ट्रवादी हैं, जनता से दूर हैं, और सबसे बड़े बेवकूफ भी हैं – इसका उदाहरण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से अच्छा मिलाना कठिन है. दुनिया का इतिहास अगर आगे लिखा जाएगा तो उसमें आज के दौर के शासकों की बेवकूफियों (Idiots of rulers) पर जरूर एक अध्याय होगा. भारत के प्रधानमंत्री तो केवल प्राचीन ग्रंथों में विज्ञान खोजते हैं और बादलों में रडार को विफल करते हैं, डोनाल्ड ट्रम्प तो रोज कोविड 19 की दवा खोज लाते हैं. पहले मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, फिर एंटी-वायरल दवा रेम्देसेविर, फिर पराबैगनी किरणें और अब तो डिसइन्फेक्टैंट पीने की सलाह भी देने लगे हैं. अब तो अमेरिका के बड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञ (US Big Health Specialist) भी कहने लगे हैं की ट्रम्प अपने प्रेस ब्रीफिंग (Donald Trump’s press briefing) द्वारा जनता के स्वास्थ्य से सक्रिय खिलवाड़ करने लगे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोविड 19 के मरीजों पर किये गए एक बड़े प्रयोग में रेम्देसेविर अप्रभावी साबित हो गई है. इसे एक अमेरिकी कंपनी ने बनाया था और यह कुछ वायरस को मारने में सक्षम है. पर, एबोला वायरस के संक्रमण के दौर में भी यह दवा अफ्रीका में बेअसर थी.

कोविड 19 के 237 मरीजों के साथ किया गए प्रयोगों में 158 रोगियों को यह दवा दी गई और शेष 79 का उपचार बिना इस दवा के किया गया. जिन्हें रेम्देसेविर दी गयी थी उसमें 14 प्रतिशत व्यक्तियों की मृत्यु हो गई, जबकि जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी उसमें मृत्य दर 13 प्रतिशत ही रही. रेम्देसेविर लेने वाले मरीजों में इस दवा के कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी देखे गए.

Trump admin ignored concern over hydroxychloroquine import from India, Pakistan: Fired US scientist

कुछ समय पहले तक अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प के अनुसार मलेरिया की दवाएं (Malaria medicines) ही कोविड-19 का एकमात्र इलाज (The only treatment of Covid-19) थीं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मना करने के बाद भी भारत को धमका कर उन्होंने ये दवाएं हासिल कीं. अब तक अमेरिका में कुछ मौतें केवल मलेरिया की दवाओं से उपचार के कारण दर्ज की गयीं हैं.

ट्रम्प की धमकी के बाद भारत सरकार ने आनन्-फानन में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की टैबलेट बड़ी संख्या में अमेरिका भेज दीं. इसके बाद ब्राज़ील समेत लगभग 55 देशों में भारत सरकार मलेरिया की यह दवा भेज चुकी है.

पर सवाल यह है कि कोविड 19 के इस घातक दौर में एक ऐसी दवा दुनियाभर में क्यों भेज रही है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और फिर यदि इससे मौतें होतीं हैं तो क्या हमारी सरकार इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार है? इस दवा से कोई ठीक तो नहीं होता है, पर कम से कम दो देशों में इससे संकट जरूर खड़ा हो गया.

ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो के अनुसार कोविड 19 सामान्य फ्लू से अधिक कुछ नहीं है और मीडिया इसे बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा है. कोविड 19 से निपटने के लिए सख्त पाबदियों के हिमायती पूर्व स्वास्थ्य मंत्री लुइज़ हेनरिक मंदता को उन्होंने 16 अप्रैल को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इस सम्बन्ध में वहां की समाजवादी विचारधारा वाली लिबर्टी पार्टी के एक सदस्य ने कहा था कि ब्राज़ील दुनिया का अकेला देश होगा, जहां कोविड 19 को नियंत्रित करने के कारण स्वास्थ्य मंत्री को हटना पड़ा.

WHO delivers more medicines to Islamic Republic of Iran for COVID-19 “Solidarity” clinical trial

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Colorized scanning electron micrograph of a cell showing morphological signs of apoptosis, infected with SARS-COV-2 virus particles (green), isolated from a patient sample. Image captured at the NIAID Integrated Research Facility (IRF) in Fort Detrick, Maryland.  भारत ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का तोहफा ट्रम्प के साथ ही जेर बोल्सोनारो को भी दिया था, जिस पर जेर बोल्सोनारो (Jer Bolsonaro) ने मोदी जी को हनुमान बताया था. राष्ट्रपति और स्वास्थ्य मंत्री में इस हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन पर भी तीव्र मतभेद थे. राष्ट्रपति इस दवा को रामवाण बता रहे थे, जबकि स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि मैं विज्ञान के साथ हूँ और जिस दवा का कोविड 19 के मरीजों पर कोई व्यापक परीक्षण नहीं किया गया हो उसे मैं बढ़ावा नहीं दे सकता था.

अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के विरोध के कारण बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी के प्रमुख, रिक ब्राइट, को भी पद से हटा दिया है. रिक ब्राइट का आरोप है कि ट्रम्प हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को कोविड 19 के इलाज के लिए रामवाण मानते हैं और उन्हें भी इसके प्रचार के लिए कहा था.

रिक ब्राइट के अनुसार ट्रम्प चाहते थे कि न्यू यॉर्क और न्यू जर्सी के सभी अस्पतालों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन भरपूर मात्रा में पहुंचाया जाए, और डोक्टरों पर दबाव डाला जाए कि वे इसी से इलाज करें. पर, रिक ब्राइट ने इसके लिए मना कर दिया था और कहा था कि वे विज्ञान के साथ हैं और जानते हैं कि कोविड 19 के मरीजों के साथ इसका व्यापक परीक्षण कहीं नहीं हुआ है. रिक ब्राइट के अनुसार हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को भारी मात्रा में पाकिस्तान और भारत से मंगाया गया, पर इसकी जांच अमेरिकी फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (American Food and Drug Administration) ने नहीं की थी, जो अमेरिकी क़ानून के हिसाब से जरूरी थी. बाद में फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के उपयोग के विरुद्ध चेतावनी जारी कर दी थी.

Concern over hydroxychloroquine

सबसे पहले फ्रांस के डॉक्टरों ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का परीक्षण कोविड 19 के मरीजों पर (Trial of hydroxychloroquine on Covid 19 patients) किया था. इसमें वैज्ञानिकों के अनुसार इससे फायदा नजर आया था, पर बाद में जब प्रयोग का विस्तृत विश्लेषण किया गया तब पता चला कि इस प्रयोग में बहुत सारी गलतियां की गयीं थीं, और इसे प्रयोग और निष्कर्ष को दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने सिरे से खारिज कर दिया. पर, डोनाल्ड ट्रम्प को कोविड 19 से लड़ने का एक यही तरीका समझ आया. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लगातार विरोध के बाद भी ट्रम्प इसे रामवाण बताते रहे.

महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

अमेरिका में एनबीसी न्यूज़ के अनुसार न्यू यॉर्क में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन देने के बाद एक महिला की मृत्यु हो गई. अमेरिका में कोविड 19 से ग्रस्त 368 बुजुर्गों पर किये गए एक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन लेने वाले मरीजों में मृत्यु दर अधिक रहती है. ब्राज़ील में 81 मरीजों पर किये गए अध्ययन के भी यही नतीजे मिले. चीन में 150 मरीजों पर किये गए अध्ययन का नतीजा था, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन देने के बाद मरीजों की हालत में सुधार के कोई साक्ष्य नहीं हैं.

न्यू यॉर्क स्थित मेयो क्लिनिक के कार्डियोलोजिस्ट माइकल एकरमैंन के अनुसार क्लोरोक्विन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के प्रभाव से कुछ समय तक दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है, इसे मेडिकल की शब्दावली में अर्रीथीमा (अतालता – arrhythmias meaning in hindi) कहा जाता है. कोविड 19 से जूझते मरीज की सामान्य अवस्था में भी दिल की धड़कन असामान्य रहती है, ऐसे में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के असर से उसकी धड़कन भी रुक सकती है. अब तक किसी भी बड़े पैमाने के प्रयोग में कोविड 19 के मरीजों को किसी भी फायदे की खबर नहीं आयी है, अलबत्ता इससे नुकसान तो बहुत देखे गए.

Azithromycin: Side Effects COVID-19 (under study)

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन से जुडी दूसरी चिंता भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों को है. हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को अक्सर एंटीबायोटिक अज़िथ्रोमाइसिन (Antibiotic Azithromycin) के साथ दिया जा रहा है और इसके बेवजह उपयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया उत्पन्न होंगे. इससे दूसरी गंभीर समस्याएं पैदा होंगीं. इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है, भारत कहीं दरियादिली में दुनिया में मौत का सामान तो नहीं भेज रहा है?

महेंद्र पाण्डेय

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विदेशों में देश की छवि मोदी ख़राब कर रहे हैं बुद्धिजीवी नहीं – शाहनवाज़ आलम

Shahnawaz alam at Bulandshahar

दिल्ली हिंसा में पुलिस की साम्प्रदायिक भूमिका उजागर करने के कारण ज़फरुल इस्लाम खान पर पुलिस ने किया फ़र्ज़ी मुकदमा

अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किसी भी देश का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि पूरी मानवता का मामला है

The persecution of minorities is not an internal matter of any country, but a matter of humanity.

लखनऊ, 5 मई 2020। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष और प्रख्यात विद्वान ज़फरुल इस्लाम खान के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस द्वारा कथित आपत्तिजनक ट्वीट पर मुक़दमा क़ायम किये जाने की उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक कांग्रेस ने निंदा की है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के चेयरमैन शाहनवाज़ आलम ने जारी बयान में कहा है कि श्री ज़फरुल इस्लाम खान को केंद्र सरकार नियंत्रित दिल्ली पुलिस हाल में दिल्ली में हुए मुस्लिम विरोधी जनसंहार में पुलिस की भूमिका उजागर करने के कारण प्रताड़ित कर रही है।

उन्होंने कहा कि जिस कथित ट्वीट को दिल्ली पुलिस ने विवादित और देश की छवि ख़राब करने वाला बताया है वो तथ्यहीन है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि पूरी दुनिया में प्रधानमंत्री और उनके मातृ संगठन आरएसएस की अल्पसंख्यक विरोधी फ़ासिस्ट विचारधारा के कारण भारत की छवि ख़राब हुई है। यहां तक कि कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों तक ने मोदी को ट्वीटर पर फॉलो करना बंद कर दिया है, पूरी दुनिया में भारत सरकार की साम्प्रदायिक नीतियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए हैं जिनमें भारतीय मूल के अप्रवासियों ने सबसे ज़्यादा भागीदारी की है। जिससे भारत और भारतीय लोगों की 70 साल में निर्मित धर्मनिरपेक्ष छवि ख़राब हुई है। जिसके लिए प्रधानमंत्री जी को शर्मिंदा होकर देश से माफ़ी मांगनी चाहिए थी।

PM Modi Speech On Coronavirus   शाहनवाज़ आलम ने कहा कि एक तरफ मोदी सरकार खाड़ी के मुस्लिम देशों में सोशल मीडिया पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भारतीयों को नसीहत दे रही है कि ऐसा करना भारतीय मूल्यों के ख़िलाफ़ है लेकिन देश के अंदर ऐसे पोस्ट्स पर सवाल उठाने वाले ज़फरुल इस्लाम खान जैसे लोगों पर फर्जी मुक़दमे लादे जा रहे हैं।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि किसी भी देश के अंदर अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न उस देश का आंतरिक मामला नहीं बल्कि पूरी इंसानियत का सवाल है। ठीक जैसे जर्मनी में यहूदियों का जनसंहार जर्मनी का आंतरिक मामला नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सवाल था।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम राजनेताओं, पूर्व मुस्लिम मुख्यमंत्रियों, छात्र नेताओं, बुद्धिजियों को एक-एक कर जेल में डालने की कार्यवाई एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। इसका मकसद मुसलमानों को हर क्षेत्र में नेतृत्वविहीन उनका मनोबल तोड़ना है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस, भाजपा और संघ के इस देश विरोधी योजना को कभी पूरा नहीं होने देगी।

अच्छे दिन : राशन और दवाएं नहीं हैं पर शराब है, अर्थव्यवस्था के बाद समाज को भी गर्त में धकेल देगी सरकार

Masihuddin sanjari

शराब बिक्री, राजस्व के साथ अपराध में वृद्धि भी लेकर आएगी- रिहाई मंच

Increase in crime along with revenue will also bring liquor sales – Rihai Manch

 समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ को झेलना पड़ेगा इसका दुष्प्रभाव, महिलाएं-बच्चे होंगे सबसे अधिक प्रभावित

आज़मगढ़ 5 मई 2020। लॉक डाउन से उपजे हालात ने करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीन ली है। बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर है। आम आदमी को राशन और दवाएं नहीं मिल पा रही हैं, ऐसी हालत में शराब की दुकानों को खुलवाने का सरकार का फैसला और प्रशासनिक स्तर पर उसे लागू करने का उत्साह समझ से परे है।

Liquor shops have also been given more time to open than ration and medicine

आज़मगढ़ रिहाई मंच प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि जीवन रक्षक दवाओं तक की आपूर्ति (Supply of life saving drugs) अभी बाधित है, राशन ना मिल पाने की शिकायतें भी बरकरार हैं। लेकिन इन चीजों के प्रति इतना उत्साह कभी दिखाई नहीं पड़ा। भोजन के लिए लॉक डाउन तोड़ने वालों पर पुलिस की लठियाँ न जाने कितनों पर बरसीं, कितने लोगों को आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी के लिए बाहर निकलने पर पीट गया। शराब की बिक्री के पहले दिन ही लॉक डाउन की धज्जियां उड़ाती कई खबरें आईं लेकिन कहीं भी पुलिस की वह सख्ती देखने को नहीं मिली। शराब की दुकानों को खुलने के लिए राशन और दवा के मुकाबले में अधिक समय भी दिया गया है।

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आर्थिक रूप से कंगाल हो चुके निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों के पुरुष शराब पर पैसे खर्च करने के लिए अपने बच्चों की रोटी पर डाका डालेंगे। इससे घरेलू हिंसा के बढ़ने की प्रबल संभावना बनती है। नशे की लत, शराबखाने का आकर्षण, धन का अभाव जब एक साथ होंगे तो चोरी, छिनेती की घटनाओं का कारण भी बनेंगे। समाज की सबसे छोटी इकाई को संकट में डालकर कोरोना जैसी महामारी से निपटना और मुश्किल हो जाएगा।

कोई शक नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था पहले ही चरमरा गई थी लॉक डाउन से इसका हाल और बुरा हो गया है, राजस्व की कमी है, लेकिन उसे पूरा करने के लिए शराब की बिक्री की अनुमति देने के अलावा दूसरे विकल्प तलाशे जाने चाहिए थे।