कोविड 19 और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के दावे : सरकार और मीडिया की गलतबयानी

Novel Cororna virus

Covid 19 and claims to increase immunity: misconceptions of government and media

हमारे देश में कोविड 19 के फ़ैलाने की रफ़्तार भले ही अपेक्षाकृत धीमी हो, पर इसकी आड़ में समाज का हिन्दू-मुसलमान विभाजन (Hindu-Muslim division of society) और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के दावे (Claims to increase immunity) और कोविड 19 के दावे फैलाने की रफ़्तार बहुत तेज है. सरकारी स्तर पर तो कोविड 19 से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारियाँ आ ही नहीं रहीं हैं, पर इससे सम्बंधित नीमी-हकीमी दावे लगातार किये जा रहे हैं.

The AYUSH ministry of the Government of India is working day and night to spread misleading news these days.

भारत सरकार का आयुष मंत्रालय तो इन दिनों ऐसी ही भ्रामक खबरें फैलाने का काम दिन-रात कर रहा है. प्रधानमंत्री जी भी देशवासियों को संबोधित करते हुए काढ़ा पीने और गर्म पानी पीने की सलाह देते हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया भी ऐसी ही भ्रामक दावों का प्रचार कर रहा है.

इसी बीच में दुनिया के महान व्यापारी रामदेव भी सरसों के तेल को नाक में डाल कर कोविड 19 को दूर करने का दावा कर रहे हैं. गौमूत्र और गोबर का उपयोग तो सभी देश चुके हैं, जब इसकी चर्चा शुरू हुई थी तब देश में कोरोना के एक हजार मरीज भी नहीं थे पर अब गौमूत्र और गोबर का सेवन करते-करते लगभग 45 हजार रोगी हो गए हैं.

Does COVID-19 transmit through houseflies

अब लगभग 100 वैज्ञानिकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने कोविड 19 के वैकल्पिक उपचार से सम्बंधित दावों की वैज्ञानिक व्याख्या से सम्बंधित एक बयान जारी किया है. इसके अनुसार,

“कोविड 19 के आरम्भ से ही देश में हरेक स्तर पर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने और इसके उपचार के भी अनेक भ्रामक प्रचार किये जा रहे हैं. इन उपायों में सरसों का तेल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, चाय, काढ़ा, गौ-मूत्र और यहाँ तक कि ताबीज भी प्रमुख हैं. इन्हें वैकल्पिक दवा के तौर पर बताया जा रहा है. इस तरह की कुछ मान्यताएं राज्य सरकारों या केंद्र सरकार की तरफ से भी व्यापक तौर पर प्रचारित की जा रहीं हैं. हम, वैज्ञानिक समुदाय, इस बयान के माध्यम से इन दावों की वैज्ञानिक व्याख्या जनता के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं”.

“अब तक कोई भी वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित करने में नाकाम रहा है कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी आधुनिक औषधि या फिर अर्सेनिकम अल्बम डी30 जैसी होमियोपैथिक औषधि या फिर कोई भी आयुर्वेदिक दवा कोविड 19 के विरुद्ध शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है. इन सबका यह प्रभाव बड़े पैमाने पर कोविड 19 के मरीजों पर गहन परीक्षण के बाद ही पता चल सकता है, और ये परीक्षण किये नहीं गए हैं. संभव है कुछ स्थितियों में इनसे आराम हो, या फिर कुछ अन्य रोगों में इनसे लाभ हो रहा हो, इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी कोविड 19 के विरुद्ध भी प्रभावी होंगीं.”

Air Pollution may further impact coronavirus patients – Doctors

“किसी भी बैक्टीरिया या वायरस के विरुद्ध शरीर में प्रतिरोधक क्षमता केवल दो स्थितियों में उत्पन्न हो सकती है – या तो इसने शरीर पर आक्रमण किया हो और फिर हम इससे ठीक हो गए हों, या फिर हमने इसका टीका लगवाया हो. दोनों ही स्थितियों में शरीर में एंटीबाडीज उत्पन्न होते हैं, जो उस रोग से मुकाबला करते हैं. बोलचाल की भाषा में लोग अच्छे स्वास्थ्य का मतलब रोगप्रतिरोधक क्षमता समझ लेते हैं, पर ऐसा नहीं होता. व्यायाम या फिर बेहतर दिनचर्या से आप स्वास्थ्य हो सकते हैं, और कुछ हद तक सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता बाधा सकते हैं, पर इसका कोविड 19 की प्रतिरोधक क्षमता से कोई नाता नहीं है. दूसरी तरफ कोविड 19 के सन्दर्भ में अति गंभीर मामलों में बेहतर सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता कोविड 19 से निपटने की प्रक्रिया को और जटिल बना देती है. इसलिए कोविड 19 के मामले में सामान्य रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना या फिर जिन तरीकों का परीक्षण नहीं किया गया है उन्हें अपनाना, दोनों ही खतरनाक हैं”.

गौ मूत्र से फायदे का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं | There is no scientific basis of benefit from cow urine

गौ मूत्र से फायदे, पराबैंगनी किरणों वाले बल्ब के नीचे खड़ा होना, या फिर कीटाणुनाशक का सेवन करना – ऐसे दावों का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है, दावों के विपरीत ये सभी तरीके स्वास्थ्य शरीर को भी नुकसान पहुंचाते हैं. इसी तरीके से अन्य उपाय जैसे लहसुन से शरीर को कम से कम नुक्सान नहीं पहुंचेगा, पर धतूरे के बीज या फिर जिंक का अधिक मात्र में सेवन बहुत हानिकारक असर डाल सकता है. ऐसे भ्रामक प्रचार से लोगों को यह महसूस हो सकता है कि इन सबके सेवन के बाद उनपर कोविड 19 का अब कोई असर नहीं हो सकता है और फिर वे सामान्य निर्देशों, जैसे शारीरिक दूरी, लॉकडाउन, चेहरे पर मास्क लगाना इत्यादि के पालन में लापरवाह हो सकते हैं. यह लापरवाही कोविड 19 के संकट को और विकराल बना सकती है”.

Indian Scientists’ Response to CoViD-19 (ISRC) | कोरोना वायरस पर अफवाहों का वैज्ञानिक समाधान

corona virus live update  इससे पहले 400 से भी अधिक वैज्ञानिकों ने “इंडियन साइंटिस्ट्स रेस्पोंस टू कोविड 19” यानि आईएसआरसी नामक समूह तैयार किया है. यह समूह विभिन्न माध्यमों से कोविड 19, यानि कोरोना वायरस को लेकर जनता के बीच फ़ैली, या फैलाई जा रही भ्रांतियों के निवारण का प्रयास कर रहा है. प्रायः वैज्ञानिकों के समुदाय की भाषा अंग्रेजी रहती है, पर इस समुदाय ने देश की बड़ी आबादी तक पहुँचने के लिए अंग्रेजी के साथ 14 अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी सामग्री उपलब्ध कराई है. इस समुदाय ने अभी तक लगभग 19 पोस्टरों के माध्यम से चुनिन्दा अफवाहों या झूठी खबरों का तार्किक और वैज्ञानिक पक्ष उजागर किया है.

हरेक पोस्टर को तीन खण्डों – दावा, निर्णय और क्यों खण्डों में विभाजित किया गया है. उदाहरण के लिए, एक पोस्टर में दावा है, ज्योतिषियों ने कोविड 19 बीमारी को समझने में मदद के लिए महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं. आईएसआरसी का निर्णय है – असत्य/झूठ और फिर “क्यों” में बताया गया है कि “खगोलीय मंडलों की गति और स्थान से मानव जीवन और विषाणुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. इस कारण ज्योतिषीय भविष्यवाणियाँ भी उपयोगी नहीं हैं. कोरोना विषाणु के बारे में हमारी सभी जानकारी वैज्ञानिक अनुसंधान से प्राप्त की गई है.”

Daily life and Covid-19

जाहिर है, हमारे देश के वैज्ञानिक भ्रामक खबरों से जनता को आगाह करने में और वैज्ञानिक तथ्य के प्रसार में अपनी सामाजिक भूमिका निभा रहे हैं, पर बड़ा सवाल तो यह है कि जिस देश में सरकार ही भ्रम और अफवाह फैला रही हो वहां इन वैज्ञानिकों की आवाज कितने लोगों तक पहुंचेगी?

महेंद्र पाण्डेय

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

विश्व अस्थमा दिवस : कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए दमा के मरीज विशेष सावधानी बरतें – डॉ के के पांडे

विश्व अस्थमा दिवस World Asthma Day

विश्व अस्थमा दिवस | World Asthma Day 5 May 2020

One in 10 people affected by asthma in India

गाजियाबाद, 5 May 2020 . दमा (अस्थमा) फेफड़ों का रोग है जो सांस की समस्याओं के कारण होता है। यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ पी एन अरोड़ा ने जानकारी देते हुए बताया कि इससे दुनियाभर में करीब 1.5 करोड़ लोग प्रभावित हैं। भारत में 10 में से एक व्यक्ति अस्थमा से प्रभावित है। इसमें बचाव ही कारगर है। अवेयरनेस और सही समय पर इलाज के जरिए इससे काफी हद तक बचा जा सकता है।

पहली बार वर्ल्ड अस्थमा डे कब मनाया गया | When was World Asthma Day celebrated for the first time

1998 में पहली बार वर्ल्ड अस्थमा डे मनाया गया। इसके बाद हर साल 5 मई को वर्ल्ड अस्थमा डे मनाया जाता है।

अस्थमा के लक्षण क्या हैं | What are the symptoms of asthma
Yashoda Super Specialty Hospital Senior Lung and Respiratory Specialist Dr. KK Pandey,
Yashoda Super Specialty Hospital Senior Lung and Respiratory Specialist Dr. KK Pandey,

यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के वरिष्ठ फेफड़ा एवं श्वांस रोग विशेषज्ञ डॉ के के पांडे, डॉ अर्जुन खन्ना एवं डॉ अंकित सिन्हा ने जानकारी देते हुए बताया कि बताया कि अस्थमा के लक्षणों में सांस लेने में परेशानी, खांसी, छाती में जकड़न और बार-बार ऐसे होना शामिल हैं। अगर इसे समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो इससे सांस लेने में गंभीर समस्या भी हो सकती है। हालांकि अस्थमा को ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन बचाव, दवाइयों और इलाज से मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है।

Corona virus may prove to be a significant risk to asthma patients

डॉक्टरों ने बताया कि कोरोना वायरस से अस्थमा के मरीजों को काफी जोखिम साबित हो सकता है। इसलिए ऐसे लोगों को कोरोनावायरस के संक्रमण से बचे रहने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

What precautions should asthma patients take

डॉक्टरों द्वारा ऐसे लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई, क्योंकि अस्थमा रेस्पिरेटरी सिस्टम से जुड़ी हुई बीमारी है जबकि कोरोना वायरस का संक्रमण भी रेस्पिरेटरी सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। यदि कोई व्यक्ति कोरोनावायरस से संक्रमित हो जाए, जिसे अस्थमा की भी बीमारी है, तो कोरोना वायरस का संक्रमण ऐसे मरीजों के लिए काफी गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है। इसलिए ऐसे लोगों की कोशिश यही होनी चाहिए कि वह घर से बिल्कुल भी बाहर ना निकलें और अगर जरूरत पड़ने पर बाहर निकल भी रहे हैं तो, संक्रमण से बचे रहने के लिए पूरे दिशा-निर्देशों का गंभीरतापूर्वक पालन करें।

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Air Pollution may further impact coronavirus patients – Doctors

प्रकाश अंबेडकर ने सरकार से पूछा – प्रवासी मजदूर किराए के लिए पैसे कहाँ से लायेंगे ?

Prakash Ambedkar

Prakash Ambedkar asked the government – From where will the migrant laborers get the money for fare?

नई दिल्ली, 04 मई 2020.  वंचित बहुजन आघाड़ी के राष्ट्रीय अध्यक्ष (National President of Vanchit Bahujan Aaghadi) प्रकाश अंबेडकर (Prakash Ambedkar) ने कहा है कि प्रवासी मजदूर किराए के लिए पैसे कहाँ से लायेंगे ? सरकार उन्हें तुरंत मुफ्त में अपने गांव जाने दे।

श्री अंबेडकर ने ट्वीट किया,

“वो किराये के लिये पैसे कहाँ से लायेंगे ? सरकार उन्हें तुरंत मुफ्त में अपने गांव में जाने दे। सरकार से अनुरोध है कि वे इस पर तुरंत कार्रवाई करे।“

एक वीडियो संदेश जारी करते हुए श्री अंबेडकर ने लिखा,

लॉकडाउन के दौरान राज्य में फंसे कई मजदूरों को उनके गांव ले जाने के लिए रेल और एसटी की सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें मजदूरों के साथ भेदभाव और शोषण कर रही हैं। उनसे किराया वसूला जा रहा है। मजदूरों के पास खाने के लिए पैसे नहीं ये।


क्या हम इस्लामोफोबिया के बढ़ते संक्रमण को रोक सकते हैं?

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

Can we stop the growing infection of Islamophobia?

9/11 2000 के डब्ल्यूटीसी हमले के बाद ‘इस्लामोफोबिया’ (इस्लाम के प्रति डर या घृणा का भाव) शब्द का प्रचलन अचानक बहुत बढ़ गया. इस घटना के बाद अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द का भी बड़े पैमाने पर उपयोग करना शुरू कर दिया. दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी धर्म को आतंकवाद से जोड़ा गया. भारत में इसके पहले से ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का वातावरण था परन्तु इसके कारण दूसरे थे. इसके पीछे थी सांप्रदायिक राजनीति, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरुप अस्तित्व में आई थी. हिन्दू सांप्रदायिक तत्व, इस्लाम को एक हिंसक धर्म बताते थे. वे कहते थे कि देश में इस्लाम का प्रसार तलवार की नोंक पर हुआ, मुसलमानों ने हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त किया, उनकी कई पत्नियां होतीं हैं, वे ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं, आक्रामक होते हैं और गौमांस खाते है. ये सारी धारणाएं देश की सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा थीं.

पिछले कुछ महीनों के देश के घटनाक्रम ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले तत्वों को एक सुनहरा मौका दे दिया. इसमें शामिल था अनुच्छेद 370 का हटाया जाना, नागरिकता संशोधन अधिनियम का लागू किया जाना और शाहीन बाग़ में हुआ शानदार प्रजातान्त्रिक प्रदर्शन. तबलीगी जमात के कुछ सदस्यों की लापरवाही और मूर्खतापूर्ण आचरण के बहाने देश के सभी मुसलमानों को कोरोना संक्रमण के प्रसार के लिए दोषी ठहराया जाने लगा. ‘कोरोना बम’ और ‘कोरोना जिहाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू हो गया और देश में मुसलमानों का चैन से जीना दूभर कर दिया गया. यहाँ तक कि महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की लिंचिंग के लिए भी मुसलमानों को दोषी ठहरा दिया गया जबकि इस घटना को स्थानीय ग्रामवासियों ने अंजाम दिया था और उनमें से एक भी मुसलमान नहीं था.

सामान्यतः अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के इस तरह के मामलों में विश्व समुदाय मामूली विरोध और निंदा कर चुप हो जाता है. परन्तु कोरोना को लेकर मुसलमानों का इस हद तक दानवीकरण किया गया कि कई अंतर्राष्ट्रीय मंचो से भारत में मुसलमानों के साथ किये जा रहे व्यवहार की कड़ी आलोचना हुई. आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन और इसके स्वतंत्र स्थाई मानवाधिकार आयोग ने भारत में मुसलमानों की सुरक्षा के लिए उपयुक्त कदम उठाये जाने की मांग की.

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनमें से अनेक हिन्दू हैं, इनमें से कुछ घोर सांप्रदायिक हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपने फोटो प्रदर्शित करने में शान का अनुभव करते हैं. उनमें से कुछ ने ट्वीट कर तबलीगी जमात पर भड़काऊ टिप्पणियां (Inflammatory comments on tabligi Jamaat) करते हुए भारतीय मुसलमानों पर ‘इस्लामिक जिहाद’ करने और ‘इस्लामिक वायरस’ व ‘मुस्लिम वायरस’ फैलाने का आरोप (Accused of spreading ‘Islamic virus’ and ‘Muslim virus’) लगाया.

इसके साथ ही, भाजपा के उभरते सितारे तेजस्वी सूर्या का एक पुराना ट्वीट आभासी दुनिया में तैरने लगा.

इस ट्वीट में तेजस्वी ने तारिक फ़तेह के एक ट्वीट का समर्थन किया था. इस ट्वीट में अरब महिलाओं के बारे में अपमानजनक और अश्लील टिपण्णी की गई थी. कुछ लोगों ने यह दावा भी किया कि खाड़ी के देशों के विकास में भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान है. कुल मिलाकर, वातावरण में ज़हर घोल दिया गया और मुसलमानों को हर तरह से अपमानित किया जाने लगा.

नफरत के इन योद्धाओं के खिलाफ यूएई के शाही परिवार के कुछ सदस्यों ने आवाज़ उठाई. वहां की शहजादी हिंद अल कासमी ने ट्वीट किया कि शाही परिवार भारत का मित्र है

“परन्तु आपकी अशिष्टता बर्दाश्त नहीं की जाएगी…आप इस धरती से अपनी रोज़ी-रोटी कमाते हैं और उसी का तिरस्कार और अपमान करते हैं. इसे भुलाया नहीं जायेगा”.

फिर उन्होंने यूएई के उन कानूनों का हवाला दिया जिनके अंतर्गत नागरिकों या गैर-नागरिकों द्वारा नफरत फैलाने वाली बातें कहना प्रतिबंधित है

उन्होंने आगे यह भी कहा,

“क्या इन तथाकथित ताकतवर अरबपतियों को यह पता नहीं है कि नफरत, कत्लेआम की भूमिका होती है. नाजीवाद एक दिन में पैदा नहीं हुआ था. उसे खरपतवार की तरह बढ़ने दिया गया था. वह चारों ओर इसलिए फैला क्योंकि लोगों ने दूसरी ओर देखना बेहतर समझा. चुप्पी उसकी खाद-पानी बनी. भारत में खुले आम मुसलमानों के खिलाफ नफरत भड़काई जा रही है – एक ऐसे देश में जहाँ 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं.”

नरेन्द्र मोदी, जिनकी ऐसे मामलों में नींद काफी देरी से खुलती है, ने अंततः अपनी चुप्पी तोड़ी. हम सब जानते हैं कि इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वे करोड़ों डॉलर भारत भेजते हैं. भारत खाड़ी के देशों का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है.

मोदी ने एक ट्वीट कर कहा, “कोरोना जाति, धर्म, रंग, पंथ, भाषा या सीमाओं को नहीं देखता। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया और आचरण में एकता और भाईचारे को प्रधानता दी जानी चाहिए. इस परिस्थिति में हम एक हैं.”

मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि मीडिया और सोशल मीडिया में इस नफरत को कौन हवा दे रहा है परन्तु उन्होंने ऐसे लोगों के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा.

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं  इसी तर्ज पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि चंद लोगों के आचरण के लिए पूरे समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. ये दोनों हिन्दू राष्ट्रवादी नेता तब सक्रिय हुए जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की जम कर थू-थू हुई और यूएई और खाड़ी के देशों ने नफरत फैलाने वाले कुछ भारतीयों को नौकरियों से निकालना शुरू कर दिया. यह दिलचस्प है कि उसी समय मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ने भारत को मुसलमानों के लिए ‘जन्नत’ बताया.

कई टिप्पणीकारों को उम्मीद है कि मोदी और भागवत के इन बयानों से असहाय अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का ज़हर फैलाने वालों की जुबान पर लगाम लग जाएगी. परन्तु यह इतना आसान नहीं है. सांप्रदायिक ताकतों ने यह वातावरण लगभग एक शताब्दी की कड़ी मेहनत से तैयार किया है. इतिहास के साम्प्रदायिकीकरण और इस्लाम व मुसलमानों के बारे में अमरीका के वर्चस्व वाले मीडिया द्वारा फैलाई गई मिथ्या धारणाएं भारतीयों में गहरे तक घर कर गयीं हैं.

कोरोना के मामले में जो कुछ हुआ उससे यह पता चलता है कि इस सोच की जड़ें कितनी गहरी हैं. यह एक लम्बे प्रचार अभियान का नतीजा है जिसने देश को बाँट कर रख दिया है और जो बंधुत्व के उस मूल्य के खिलाफ है जो भारतीय राष्ट्रवाद की नींव है. यूएई, जिसने नरेन्द्र मोदी को अपने उच्चतम नागरिक सम्मान से नवाज़ा था, के विरोध से इस अभियान पर थोड़ी-बहुत रोक लग सकती है. इसका स्थाई इलाज यही कि हम गाँधी और नेहरु के राष्ट्रवाद को इस देश के लोगों की सोच का हिस्सा बनाएं.

डॉ. राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

अच्छे दिन : कोरोना से भारत की लड़ाई को कमजोर कौन कर रहा है? आपदा में भी घोटाला !

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कोविड-19 महामारी (Covid-19 Epidemic,) के खिलाफ भारत के बारूद को गीला किए जाने में, एक घपलेबाजी के तत्व के ही सामने आने की कसर थी। कोरोना वाइरस के रैपिड टैस्ट किट के आयात के घोटाले के उजागर होने से, वह कसर भी पूरी हो गयी है।

बस घोटाले की ही कमी थी

अभी इस घोटाले की पर्तें खुल ही रही हैं। बहरहाल, इतना तो अब तक भी साफ हो चुका है कि टैस्ट किटों की इतनी महत्वपूर्ण तथा नाजुक खरीद, केंद्र सरकार द्वारा या उसकी ओर से आइसीएमआर द्वारा सीधे उत्पादकों से करने के बजाए, बिचौलिया कंपनियों के जरिए की गयी थी। इतना ही नहीं, इसमें बिचौलियों की दो-दो परतें काम कर रही थीं। नतीजा यह कि साढ़े बारह करोड़ रु. के करीब में खरीदी गयी टैस्टिंग किट, आयातकर्ता ने एक और बिचौलिये को 20 करोड़ रु. में बेचीं और इस बिचौलिये ने, जिसने जाहिर है कि मौजूदा शासन में अपनी पहुंच के बल पर, बिना आयात तक पहुंच के ही टैस्टिंग किट मुहैया कराने का आर्डर हासिल कर लिया था, अपनी खरीद से डेढ़ गुने दाम पर, 30 करोड़ रु. में वही टैस्टिंग किट सरकार को बेच दी।

उत्पादक कंपनी से खरीद के ढाई गुना दाम पर यह टैस्टिंग किट खरीदने की सफाई में, सरकार ने दुहरी दलील दी है, जो अपने दोनों पहलुओं में हास्यास्पद है। पहली दलील तो यह कि रैपिड टैस्टिंग किट (Rapid testing kit) की यही सबसे सस्ती पेशकश थी।

याद रहे कि यह दलील इसके बावजूद दी जा रही थी कि कोरियाई कंपनियों से इससे ठीक आधे दाम पर रैपिड टैस्टिंग किट, भारत के ही कुछ राज्यों ने खरीदे थे।

दूसरी दलील यह कि अब जबकि संदिग्ध गुणवत्ता के चलते उक्त आयातित टैस्टिंग किट वापस लौटाए जा रहे हैं, सरकार को इस सौदे में रत्तीभर नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि उसने इन किटों के आयात के लिए कोई अग्रिम भुगतान नहीं किया था।

कहने की जरूरत नहीं है मुख्यधारा के मीडिया तथा खासतौर पर इलैक्ट्रिोनिक मीडिया पर अपनी ऑक्टोपसी जकड़ के बल पर मोदी सरकार ने आसानी से इस पूरे प्रकरण को उठने से पहले ही दबा दिया है।

यहां तक कि इस सवाल तक को दबा दिया गया है कि महामारी से लड़ाई के उपायों में भी घोटालेबाजी के पक्ष को अगर छोड़ भी दें तो, इस सौदे के चक्कर में रैपिड टैस्टिंग किटों जैसे अनिवार्य हथियार की अति-प्रतीक्षित उपलब्धता के काफी समय के लिए टल जाने से, महामारी के खिलाफ लड़ाई को लगे धक्के की जिम्मेदारी कौन लेगा?

रही बात प्रधानमंत्री मोदी के ‘‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’’ के दावों की तो, सिर्फ इतना याद दिला देना काफी होगा कि इस ‘‘टैस्ट किट घोटाले’’ को रोकने या पकड़ने में, मोदी सरकार की दूर-दूर तक कोई भूमिका नहीं है। सरकार की छोडि़ए, इसमें मुख्यधारा के मीडिया की भी शायद ही कोई भूमिका है।

यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब गुणवत्ता की शिकायतें आने के बाद, बिचौलियों की दो परतों के बीच की लड़ाई अदालत में पहुंच गयी और इस सौदे के विभिन्न पहलू सामने आ गए।

तानाशाहाना तौर-तरीके | Dictator modus operandi

PM Modi Speech On Coronavirus          बेशक, ‘‘टेस्ट किट घोटाला’’ (Test kit scam) तो सिर्फ हिमखंड का पानी की सतह के ऊपर नजर आने वाला हिस्सा है। विभिन्न स्तरों पर आपात खरीद के नाम पर क्या कुछ नहीं हो रहा होगा, इसका इस उदाहरण से थोड़ा-बहुत अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।

फिर भी, जैसाकि हमने शुरू में ही इशारा किया, घपले-घोटालों का पहलू, मौजूदा सरकार की कारगुजारियों का ऐसा अकेला या सबसे महत्वपूर्ण पहलू नहीं है, जो महामारी के खिलाफ भारत की लड़ाई को कमजोर कर रहा है। इससे कहीं महत्वपूर्ण पहलू, मोदी सरकार का महामारी जैसी स्वास्थ्य इमर्जेंसी (Health emergency) का फायदा उठाकर, अपना तानाशाहाना शिकंजा और ज्यादा कस लेना है। अब जबकि महामारी की चुनौती और उसका मुकाबला करने के इकलौते उपाय के रूप में देशबंदी थोपने के जरिए, असहमति व विरोध की राजनीतिक आवाजों को एक प्रकार से ‘‘पॉज’’ ही किया जा चुका है, एक प्रकार से शासन की सारी शक्तियों को मोदी-शाह जोड़ी ने, अपने हाथों में केंद्रित कर लिया है।

इस अधिनायकवाद का प्रदर्शन केंद्र के स्तर पर और अधिकांश भाजपा-शासित राज्यों में भी, खासतौर पर सीएए-विरोधी आंदोलन के महत्वपूर्ण (स्थानीय) संगठनकर्ताओं के खिलाफ तथा जम्मू-कश्मीर में पत्रकारों के खिलाफ और तथाकथित ‘‘शहरी नक्सली’’ ब्रांड किए गए सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ, महामारी के विरुद्घ लड़ाई के बीच में भी और सरासर अनुपातहीन दमनकारी कार्रवाइयों में तो हो ही रहा है। गौतम नवलखा व आनंद तेलमुम्बड़े से लेकर, डा0 कफील अहमद, दारापुरी, शफूरा जरगर और ऐसे ही दूसरे अनेक लोगों की अति-दमनकारी धाराओं में गिरफ्तारियां, इसी का उदाहरण हैं। कश्मीर को तो खैर, यह सरकार पहले ही भारतीय जनतंत्र के दायरे से बाहर धकेल चुकी थी।

लड़ाई के मोर्चे में सांप्रदायिक सेंध

सभी जानते हैं कि इस सबके पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण/ विभाजन को आगे बढ़ाने का खेल भी है। बेशक यह संयोग ही नहीं है कि कोरोनावाइरस के खतरे को, एक पूरे समुदाय से ही खतरे में बदल दिया गया है। तब्लीगी जमात की गैर-जिम्मेदारी को हथियार बनाकर, खुद सरकार समेत समूचे संघ परिवार द्वारा छेड़ी गयी वाइरस को सांप्रदायिक टोपी पहनाने की इस मुहिम ने, जब तक शेष दुनियाभर में भारत की थू-थू नहीं करा दी और मुस्लिम जगत से कड़ी चेतावनियां नहीं आने लगीं, तब तक न प्रधानमंत्री को इसकी याद आयी और न उनके वैचारिक गुरु, आरएसएस प्रमुख को, कि ‘इस लड़ाई में हम सब का एक होना जरूरी है।’ और इस अपील के भी संघ-परिवार द्वारा महज रस्मअदायगी के ही रूप में लिए जाने का सबूत देते हुए, अगले ही दिन बिहार में बजरंगदलियों ने फल-सब्जी की दूकानों की हिंदू दूकानों के रूप में पहचान कराने के लिए झंडे लगा दिए और उत्तर प्रदेश के एक भाजपा विधायक ने इसकी सार्वजनिक अपील जारी कर दी कि मुसलमानों से सब्जी वगैरह नहीं खरीदें! यह इसके बावजूद है कि एक ग्रुप के रूप में तब्लीगी जमात से जुड़े लोग ही सबसे बड़ी संख्या में, कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद, इस बीमारी से लडऩे में दूसरे गंभीर रोगियों को बचाने के लिए, अपना रक्त-प्लाज्मा देने के लिए आगे आए हैं। कहने की जरूरत नहीं है मौजूदा शासन द्वारा संरक्षित इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने, भयावह महामारी से जुड़ी आशंकाओं के साथ जुडक़र, इस महामारी के सामुदायिक प्रसार को रोकने के काम को, बहुत मुश्किल बना दिया है।

लड़ाई में राज्यों का साथ देने से इंकार

Modi in Gamchha         फिर भी, महामारी का फायदा उठाकर तानाशाही थोपे जाने का, महामारी के खिलाफ लड़ाई को और भी कमजोर करने वाला पहलू, मोदी सरकार का राज्यों पर अपने मनमाने फैसले थोपने का है। लॉकडॉउन का निर्णय प्रधानमंत्री मोदी ने, जिस तरह से सिर्फ चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश पर थोपा था, उसके बारे में सभी जानते हैं। इसके चलते न तो राज्यों को तैयारी करने का मौका मिला और न लोगों को। इसके चलते जैसी भारी मुश्किलें लोगों को झेलनी पड़ीं और खासतौर पर प्रवासी मजदूरों के महापलायन जैसी लॉकडॉउन को ही खोखला करने वाली महा-समस्याएं सामने आयीं और अब तक बनी हुई हैं, उनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन, इसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई है कि मोदी सरकार, राज्यों को महामारी के खिलाफ लडऩे के लिए व्यावहारिक माने में कोई भी मदद देने के लिए ही तैयार नहीं है, जबकि राज्य ही हैं जो सिर्फ चिकित्सकीय पहलू से ही इस लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर नहीं हैं, देशबंदी के बीच जनता को और खासतौर पर आय व भोजन के साधनों से दूर कर दिए गए मेहनतकशों व अन्य गरीबों को, वाइरस के साथ ही भूख-बेघरबारी के हमले से बचाने की लड़ाई में भी, वे ही अग्रिम मोर्चे पर हैं। पंजाब के वित्त मंत्री की मानें तो, इस सीमावर्ती राज्य को, इस महामारी से लड़ाई के लिए केंद्र से सिर्फ 72 करोड़ रु. की सहायता मिली है।

उधर केरल समेत कई राज्य सरकारें तो इसकी शिकायत कर रही हैं कि खतरनाक वाइरस के खिलाफ लड़ाई में केंद्र सरकार से कोई अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलना तो दूर, जीएसटी क्षतिपूर्ति से लेकर मनरेगा तक, अनेक मदों में राज्यों का बकाया तक केंद्र ने नहीं चुकाया है। इसके अलावा, इस संकट के समय में भी, ऋण लेने के मामले में राज्यों के हाथ बांधकर रखे जा रहे हैं और उनसे सख्ती से केंद्र की थोपी ऋण सीमा का पालन करने के लिए कहा जा रहा है, जबकि केंद्र सरकार खुद फिर भी तरह-तरह के उपायों से, अपने लिए लगी सीमा को खींच-खांचकर बड़ा कर लेती है। इसके ऊपर से प्रधानमंत्री राहत को खाली कर, पीएम केयर के नाम से राजनीतिक सत्ता के शीर्ष से और भी सीधे-सीधे नियंत्रित फंड की ओर सारे सहायता अंशदान मोडऩे के जरिए, न सिर्फ ये सारे संसाधन प्रधानमंत्री के मनमाने नियंत्रण में ले आए गए हैं बल्कि राज्यों का इन साधनों से एक तरह से वंचित ही कर दिया गया है। सरकारी कर्मचारियों के सारे अंशदान ही इस निजी कोष में नहीं भेजे जा रहे हैं बल्कि बेशर्मी से यह एलान भी किया जा चुका है कि कार्पोरेटों के सीएसआर फंड से चंदा भी सिर्फ और सिर्फ इसी कोष में दिया जा सकता है, मुख्यमंत्री सहायता कोषों में नहीं।

केंद्रीयकृत और एकतरफा निर्णय | Centralized and unilateral decision

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जनविरोधी रणनीति | Anti-people strategy

बहरहाल, इस सबसे भी बढ़कर कोरोना वाइरस के खिलाफ भारत की लड़ार्ई को कमजोर कर रही है मोदी सरकार की इस लड़ाई की बुनियादी रणनीति। मोदी सरकार सिर्फ और सिर्फ लॉकडॉउन के हथियार से यह लड़ाई लडऩा चाहती है। और इस लॉकडॉउन का पालन भी वह मूलत: कानून और व्यवस्था के  तकाजे के तौर पर और सबसे बढ़कर, पुलिस के डंडे तथा बलपूर्वक थोपे जा रहे प्रतिबंधों के जरिए, कराना चाहती है। इसका नतीजा यह है कि लॉकडॉउन की मदद से, संक्रमण के फैलाव की तेजी को कम करने के जरिए जो समय मिला है, उसका टैस्टिंग से लेकर उपचार तक की सामथ्र्य बढ़ाने के लिए जिस तरह उपयोग किया जाना चाहिए था, उसमें भारत पिछड़ता नजर आ रहा है। टैस्टिंग किट घोटाला इसी का एक संकेतक है, जिससे टैस्टिंग तेजी से बढऩे की उम्मीदों पर कम से कम फिलहाल पानी फिर गया है।

इसी का एक और संकेतक, खुद केंद्र की शीर्ष नौकरशाहों के स्तर की बैठक रेखांकित हुई यह सचाई है कि लॉकडॉउन के पूरे एक महीने बाद, 23 अप्रैल तक देश के 183 जिलों में कोविड मरीजों के लिए 100 आइसोलेशन बैड भी नहीं थे, जबकि इनमें से कम से कम 67 जिलों में इस वाइरस के संक्रमण के केस आ चुके थे। इसी प्रकार, 143 जिलों में गंभीर मरीजों के लिए एक भी आइसीयू बैड नहीं था, जबकि इनमें से 47 जिलों में संक्रमण के केस आ चुके थे। इसी प्रकार,123 जिलों में वेंटीलेटर की सुविधा वाला एक भी बैड नहीं था, जबकि इनमें से 39 जिलों में कोरोना संक्रमण के केस (Corona infection cases) आ चुके हैं। यानी इन जिलों में कोरोना के गंभीर मरीज तो पूरी तरह से भगवान के ही भरोसे हैं।

A welcome initiative from Rahul Gandhi

 

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

इस सब के चलते, लॉकडॉउन का जो कुछ भी लाभ मिल सकता था, हाथ से निकलता जा रहा है। लेकिन, मोदी सरकार ने चूंकि इस लॉकडॉउन से गरीब मजदूरों-किसानों पर पड़ रही मार की चिंता से खुद को मुक्त ही कर लिया है और गरीबों को उनके हाल पर तथा दानदाताओं के ही भरोसे छोड़ दिया है, उसे लॉकडॉउन जारी रखना ही आसान और सस्ता उपाय लग रहा है। आखिर, उसे लॉकडॉउन के चलते अपनी आजीविका से लेकर, शहरों में छत तक गंवा चुके और भुखमरी के कगार पर पहुंच गए मजदूरों के लिए कुछ करना तो है नहीं, सिवा भाषणों में उनकी चिंता का स्वांग करने के। अचरज नहीं होगा कि मोदी सरकार, सारी दुनिया में (जीडीपी के हिस्से के तौर पर) सबसे कम खर्चे में मुकम्मल लॉकडॉउन कराने वाली सरकार का रिकार्ड बना ले। ऐसे में 3 मई के बाद, कुछ बदलावों के साथ लॉकडॉउन-3 लगा दिया गया है। मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की ताजा बैठक के संकेत तो ऐसे ही हैं। यह मजदूरों की हालत और खराब कर, कोरोना के खिलाफ देश की लड़ाई को और कमजोर करने का ही काम करेगा।

0 राजेंद्र शर्मा

 

कोविड-19 के खिलाफ तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है आईआईटीआर

Corona virus

IITR has now taken up three verticals against COVID-19

नई दिल्ली, 01 मई (उमाशंकर मिश्र ): कोविड-19 के खिलाफ जारी संघर्ष में परीक्षण एक प्रमुख घटक है, जो इस महामारी के प्रसार की निगरानी और उसे प्रतिबंधित करने में सहायक हो सकता है। यही वजह है कि कोविड-19 का परीक्षण बढ़ाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। लखनऊ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) अब कोरोना वायरस के खिलाफ वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा अपनाए गए पांच में से तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है, इनमें 2 मई से शुरू हो रही एक नई कोविड-19 परीक्षण सुविधा शामिल है।

आईआईटीआर क्या है | What is IITR

आईआईटीआर वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से संबद्ध एक प्रमुख प्रयोगशाला है। सीएसआईआर ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में पांच-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इनमें कोविड-19 के मामलों की निगरानी, रैपिड और सस्ते डायग्नोसिस, नई थैरेपियों एवं दवाओं का विकास, दवाओं का नये रूप में पुनः उपयोग,  अस्पतालों के सहायक उपकरण और आपूर्ति एवं लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। कोरोना से लड़ने के लिए सीएसआईआर द्वारा चलाए जा रहे मिशन में शामिल पांच कार्यक्षेत्रों में से आईआईटीआर जिन तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है उनमें रोकथाम, निदान और उपचार शामिल हैं।

Sanitizers and personal protective equipment can be useful in the prevention of corona virus infection.

कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम में सैनिटाइजर और निजी सुरक्षा उपकरण उपयोगी हो सकते हैं। इस बात को केंद्र में रखते हुए सीएसआईआर-आईआईटीआर अब तक लखनऊ, वाराणसी तथा रायबरेली में कोरोना के विरुद्ध अग्रिम पंक्ति में तैनात कार्यकर्ताओं को 2500 लीटर से अधिक हैंड सैनिटाइजर वितरित कर चुका है। इस पहल को विभिन्न कॉरपोरेट्स के कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व योगदान से पूरा किया गया है।

Coronavirus CDC  आईआईटीआर के दूसरे कार्यक्षेत्र के तहत राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार कोविड-19 परीक्षण हेतु अत्याधुनिक सुविधा को स्थापित किया गया है। लगभग 24 कर्मियों की एक टीम इस अभियान में शामिल है। इन सभी को जैव-सुरक्षा एवं अन्य विषयों पर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) द्वारा प्रशिक्षण दिया गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री, सुरेश खन्ना के साथ हुई बैठक में प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने परीक्षण की तैयारी से अवगत कराया। डॉ धवन ने कोविड-19 की परीक्षण क्षमता बढ़ाने का आश्वासन दिया है। प्रमुख सचिव, चिकित्सा शिक्षा ने कहा है कि 2 मई से सीएसआईआर-आईआईटीआर को परीक्षण के लिए नमूने भेजे जाएंगे।

केजीएमयू के सुझाव के अनुसार सीएसआईआर-आईआईटीआर में प्रारंभ में प्रति दिन 50 नमूनों का परीक्षण किया जाएगा, जिसे कुछ समय बाद बढ़ाया जा सकता है। महानिदेशक, सीएसआईआर तथा आईसीएमआर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने सीएसआईआर-आईआईटीआर, लखनऊ को कोविड-19 के परीक्षण हेतु मंजूरी प्रदान कर दी है। (इंडिया साइंस वायर)

भारतीय पेट्रोलियम संस्थान में स्थापित होगा कोविड-19 परीक्षण केंद्र

Novel Cororna virus

CSIR-IIP to set up viral testing facility to fight COVID-19

नई दिल्ली, 01 मई (उमाशंकर  मिश्र ): कोरोना वायरस की भारत में दस्तक (Corona virus in India) के साथ ही वैज्ञानिक तथा औद्योगिक संस्थान (सीएसआईआर) की दो प्रयोगशालाओं में कोविड-19 के परीक्षण केंद्र शुरू किए गए थे, जिनके द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के बाद सीएसआईआर की कई प्रयोगशालाओं में कोविड-19 परीक्षण किया जा रहा है। इस सूची में देहरादून स्थित सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) भी शामिल हो गया है। सीएसआईआर-आईआईपी में भी अब आरटी-पीसीआर आधारित कोविड-19 परीक्षण केंद्र स्थापित किया जा रहा है।

सीएसआईआर-आईआईपी के निदेशक डॉ अंजन रे ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि

कोविड-19 के नमूनों का परीक्षण एक ऐसा अवसर है, जहां हम भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के प्रोटोकॉल और मानक प्रक्रियाओं के अनुरूप पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। यह नई कोविड-19 परीक्षण सुविधा प्रशिक्षित टीम से लैस होगी, जहां समुचित जैव सुरक्षा सावधानियों के साथ प्रतिदिन कम से कम 30 रोगी नमूनों का परीक्षण किया जा सकेगा।”

कोविड-19 के परीक्षण की मुहिम को तेज करने के लिए सीएसआईआर-आईआईपी की जैव रसायन तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग की टीमों को जीव-विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत सीएसआईआर की दूसरी प्रयोगशालाओं का सहयोग मिल रहा है। जिन संस्थानों का सहयोग सीएसआईआर-आईआईपी को मिल रहा है, उनमें इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) दिल्ली,  इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (इम्टेक) चंडीगढ़ और सेंटर फॉर सेलुलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) हैदराबाद शामिल हैं।

Corona virus मई के पहले पखवाड़े में इस परीक्षण केंद्र को शुरू करने के लिए सीएसआईआर-आईआईपी उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्रालय और सभी सरकारी अस्पतालों के निरंतर संपर्क में है। यह अत्याधुनिक परीक्षण सुविधा वायरल परीक्षण के लिए राज्य संसाधन केंद्र के रूप में दीर्घकालीन रूप से उपलब्ध होगी, साथ ही यह सीएसआईआर-आईआईपी की योजना में शामिल पर्यावरण जैव प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता केंद्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

डॉ अंजन रे ने कहा है कि

“यह प्रयास पूरे उत्तराखंड में सीमित सार्वजनिक परीक्षण सुविधाओं की क्षमता को बढ़ा सकता है। इससे देहरादून के मरीजों के नमूनों के परीक्षण के बोझ को साझा करने में मदद मिल सकती है, फिलहाल यह भार एम्स (ऋषिकेश) और दून अस्पताल के परीक्षण केंद्रों पर है। सीएसआईआर-आईआईपी भी सीएसआईआर-आईजीआईबी की तकनीकी देखरेख में नमूनों की जांच के लिए एक तेज माइक्रो आरटी-पीसीआर आधारित विश्लेषण पद्धति को अपनाने की योजना बना रहा है।”

What is real-time reverse transcription PCR (RT-PCR) technique,

रियल टाइम रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पीसीआर (आरटी-पीसीआर) तकनीक विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) से मान्यता प्राप्त निदान के तरीकों में से एक है। शोधकर्ता व्यक्तियों से एकत्र नमूनों से न्यूक्लिक एसिड निकालते हैं और आरटी-पीसीआर के माध्यम से वायरल जीनोम अंशों को बढ़ाया जाता है। स्वैब नमूने आमतौर पर नाक, गले या लार से प्राप्त किए जाते हैं। यदि नमूने में वायरल आरएनए हो तो परीक्षण को पॉजिटिव और वायरल आरएनए न हो परीक्षण नेगेटिव माना जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक परीक्षण से कोविड-19 के प्रकोप की निगरानी में मदद मिल सकती है। कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के साथ ही सीएसआईआर की रणनीति सामुदायिक परीक्षण की रही है, ताकि बीमारी के नए प्रकोपों निगरानी सुनिश्चित की जा सके और इस प्रकार उसे फैलने से रोका जा सके। (इंडिया साइंस वायर)

मुसलमान विक्रेताओं से सब्जी न खरीदने को कहने वाले यूपी भाजपा के विधायक सुरेश तिवारी के विरुद्ध बदायूँ के सिविल लाइन्स थाना में शिकायत दर्ज

Ajit Yadav, अजीत सिंह यादव

राजनीतिक कार्यकर्ता अजीत सिंह यादव ने भाजपा विधायक पर लगाया दंगा भड़काने का आरोप, एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग की

Complaint against UP BJP MLA Suresh Tiwari for not buying vegetables from Muslim vendors, filed in Civil Lines Police Station of Badaun

बदायूँ, 30 अप्रैल 2020. उत्तर प्रदेश में देवरिया जनपद के बरहज विधान सभा क्षेत्र के भाजपा विधायक सुरेश तिवारी (BJP MLA Suresh Tiwari of Barhaj Vidhan Sabha constituency of Deoria district in Uttar Pradesh) पर दंगा भड़काने, समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा एवं वैमनस्य व अफवाह फैलाने के मामले को लेकर बदायूँ जनपद के सिविल लाइन्स थाने में शिकायत दर्ज की गई है।

आज भाजपा विधायक सुरेश तिवारी पर एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तार करने की मांग राजनीतिक कार्यकर्ता अजीत सिंह यादव ने ऑनलाइन शिकायत में की।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे अजीत सिंह यादव ने शिकायत में कहा है कि वे कानून एवं संविधान में यकीन करने वाले जिम्मेदार नागरिक हैं। विगत कई दिनों से मीडिया रिपोर्टों को पढ़ने व सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को देखने सुनने पर जानकारी मिली कि जहां देश एक तरफ देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है वहीं उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद की बरहज विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक श्री सुरेश तिवारी साम्प्रदायिक दंगा भड़काने, समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा एवं वैमनस्य की भावनाएं पैदा करने के लिए अफवाह व झूठ फैलाने का देश को कमजोर करने का आपराधिक कृत्य कर रहे हैं।

एक वीडियो में वह लोगों से यह कहते हैं कि मियां (मुसलमान )लोगों से सब्जी न खरीदें। ट्विटर पर जिसका लिंक निम्न है https://twitter.com/DNLIMBACHIYA/status/1254681460948086784?s=08

और इस तरह विधायक सुरेश तिवारी विभिन्न समुदायों के बीच नफरत फैलाते दिखते हैं जिससे समाज में धार्मिक उन्माद पैदा हुआ है। उन्होंने जान बूझकर एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है और देश में धर्म के आधार पर समुदायों को दंगे के लिए उकसाया है।

एक अन्य वीडियो में विधायक सुरेश तिवारी अपने उक्त वक्तव्यों को स्वीकार करते हुए जायज ठहराते दिखते हैं जिसका ट्विटर पर लिंक निम्न है

इसमें विधायक सुरेश तिवारी स्वीकार करते हैं कि बरहज विधान सभा क्षेत्र के दौरे के फौरन 17 -18 अप्रैल 2020 को नगर पालिका में लोगों के पूछने पर उन्होंने यह कहा कि मियां लोगों से सब्जी न खरीदें इससे लोग कोरोना से बचेंगे। वे इस अफवाह को बढ़ावा देते दिखते हैं कि मियां लोग सब्जी पर थूक लगा दे रहे हैं।

उक्त खबरें टीवी चैनलों समेत अखबारों आदि में भी छपी हैं। द इंडियन एक्सप्रेस में छपी उक्त खबर का लिंक निम्नवत है

https://www.google.com/amp/s/indianexpress.com/article/india/coronavirus-no-one-should-buy-vegetables-from-muslims-up-bjp-mla-6382120/lite/

उन्होंने शिकायत में थानाध्यक्ष से मांग की है कि उक्त वीडियो व प्रिंट साक्ष्यों के आधार पर भाजपा के बरहज विधायक सुरेश तिवारी पर धर्म के आधार पर लोगों में नफरत फैलाने, दंगा भड़काने, धार्मिक भावनाओं को आहत करने, समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा एवं वैमनस्य पैदा करने को झूठी अफवाहें फैलाने, देश में धार्मिक उन्माद पैदा करने, देश को तोड़ने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने के अपराध में भारतीय दंड सहिंता की धारा 117,153, 153 A, 153B, 295A,298,504,505, 505(2),506, 120 B समेत अन्य संबंधित धाराओं में एफआईआर /मुकदमा पंजीकृत कर कानूनी कार्यवाही करें एवं तत्काल गिरफ्तार करें।

श्री यादव ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा आरोपी विधायक सुरेश तिवारी को नोटिस दिए जाने को महज दिखावा बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा और आरएसएस के लोग कोरोना महामारी के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराने को झूठी अफवाहें फैला रहे हैं और देश में मुसलमानों के विरुद्ध नफरत और घृणा का माहौल पैदा कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के फासिस्ट प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। कोरोना संकट के इस समय में भी नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी व एनपीआर के विरुद्ध लोकतांत्रिक आंदोलन चलाने वाले जामिया मिलिया,जेएनयू के छात्र कार्यकर्ताओं समेत आंदोलनकारियों को आतंकवाद निरोधक यूएपीए जैसे काले कानूनों के तहत फर्जी मुकदमें लगाकर जेल भेजा जा रहा है। यहां तक कि महिला कार्यकर्ता को भी दिल्ली दंगों के लिए झूठे आरोप में और कश्मीर के पत्रकारों को फर्जी मुकदमा लगाकर जेल में डाल दिया गया है। देश में तानाशाही लादकर लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।

कोरोना संकट का पूरा भार मजदूरों, गरीबों, किसानों पर डाला जा रहा है। कर्मचारियों के भत्ते बंद किये जा रहे हैं और पूँजीघरानों के कर्जे माफ किये जा रहे हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। देश के हर जिम्मेदार नागरिक को संघ भाजपा के इस नफरत के फासिस्ट अभियान और कारपोरेट परस्ती के विरुद्ध आवाज उठानी होगी।

कोरोना से हृदय रोगी को डरने की नहीं, सचेत रहने की जरूरत : विशेषज्ञ

Health News in Hindi

The heart patient does not need to be worried but to be alert to the global epidemic corona infection

लखनऊ, 29 अप्रैल 2020. वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण से हृदय रोगी को डरने की नहीं बल्कि सचेत रहने की आवश्यकता है। नियमित दवाओं का सेवन करने के साथ-साथ रोगी को चाहिए कि वह योग व व्यायाम को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करे। हृदय रोग विशेषज्ञ ने यह बात कही है।

केजीएमयू लारी के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अक्षय प्रधान (Cardiologist Dr. Akshay Pradhan) ने कहा, “हृदय रोगी कोविड-19 संक्रमण से डरे नहीं बल्कि सचेत रहें। इसके मरीजों को चाहिए कि वह कोरोना का अधिक भय न रखें। नियमित दवा लें, योग-व्यायाम भी करते रहें। साथ ही अन्य लोगों की तरह सोशल डिस्टेंसिंग (Social Distancing) का पालन करने पर कोरोना उन्हें छू भी नहीं पाएगा।”

प्रधान ने कहा,

“शुगर, ब्लड प्रेशर इसमें रिस्क फैक्टर नहीं है। हालांकि, हृदय रोग सहित कोविड-19 संक्रमण से संक्रमित होने पर हलात गंभीर हो सकते हैं। यह बातें अभी तक बाहर के मरीजों में देखने को मिली है। हृदय रोगियों को चाहिए कि वह सामान्य व्यक्ति से थोड़ी अधिक सावधानी बरतें।”

Exercise indoors so that sugar and BP are under control

डॉक्टर ने कहा,

तनाव मुक्त रहने के लिए (To be stress free) योग, मेडिटेशन को बढ़ा दें। घर में बैठे लोगों की कैलोरी बढ़ रही होगी। ऐसे में उन्हें अपनी डाइट को बदलना होगा। घर के अंदर ही व्यायाम करें जिससे शुगर और बीपी कंट्रोल में रहे।”

उन्होंने बताया,

“कोरोना के कारण हार्ट अटैक पड़ने के चांस कम है। ऐसे मामले अभी देखने को नहीं मिले हैं। खासकर हार्ट पेशेंट को तो बिल्कुल भी नहीं। उनको अपना ज्यादा ख्याल रखना चाहिए। दवा हमेशा समय पर ही लेनी चाहिए। इसके साथ किसी बात का तनाव न लें। कोरोना वायरस संबंधी गाइडलाइन अपनाकर हृदय रोगी खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।”

Stay home and don’t tension

प्रधान ने कहा,

“घर पर रहें और बिना वजह की न टेंशन लें, लॉकडाउन नियमों का पालन करें। खाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ा दें। दालें और हरी सब्जी, ताजे फल खाए जाने चाहिए। रोटी-चावल कम कर दें। नमक का सेवन कम करें, दवा नियमित और समय पर लें।”

Heart patients take their medicines regularly

वहीं, कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अतुल अग्रवाल ने बताया कि दिल के मरीज अपनी दवाएं नियमित रूप से लें। आसपास अगर बीपी की डिजिटल मशीन मिल जाए, तो अपना बीपी नपवा लें। बीपी घटा या बढ़ा होने पर तनाव न लें। परेशानी होने पर अपने डॉक्टर से फोन पर संपर्क करें।

डॉ.अतुल के मुताबिक लॉकडाउन-2 (Lockdown-2) लागू होने पर लोग अलग-अलग वजहों से तनाव में हैं। दिल के 90 प्रतिशत मरीज भी तनाव के कारण परेशान हैं। वह नियमित दवा खाकर और अपने खानपान पर ध्यान रखकर बीपी को काफी हद तक कंट्रोल कर सकते हैं।

उन्होंने कहा,

“बहुत परेशानी होने पर ही डॉक्टर को दिखाएं।”

डॉक्टर अतुल का कहना है कि हार्ट डिजीज के हर मरीज से यही कहना है कि घर पर रहिए, फैमिली के साथ समय बिताएं और टेंशन फ्री रहें क्योंकि आप लोग अधिक टेंशन लेंगे तो कोरोना से कुछ हो ना हो, हृदय को जरूर समस्या हो जाएगी।

देशबन्धु

लॉकडाउन : खेलों में सक्रियता और सामाजिक दूरी

sports news in Hindi

Lockdown: sports activity and social distance

खेल तथा व्यायाम हमारे जीवन के अभिन्न अंग है। बुद्धिजीवियों का यह कथन कि ‘‘एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है‘‘ अक्षरशः सही है। खेलों के माध्यम से हम अपने शरीर को क्रियाशील तथा स्वस्थ बनाये रखते हैं। साथ ही यह मन मस्तिष्क को प्रसन्नता से भर देता है। खेल बहुत ही अच्छी शारीरिक गतिविधि है जो न केवल तनाव व चिन्ता से मुक्ति प्रदान करता है, बल्कि पेशेवर जीवन का क्षेत्र भी प्रदान करता है। यह खिलाडियों को नाम, प्रसिद्धि और आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करता है। यह ऐसी शारीरिक गतिविधि हैए जो प्रतियोगी स्वभाव के कौशल विकास में भी अत्यधिक सहायक है।

The most important benefits of the game

खेल के दो सबसे महत्वपूर्ण लाभ हैं-अच्छा स्वास्थ्य और शान्त मस्तिष्क। देश के युवा जिनके कंधों पर कल देश व समाज की जिम्मेदारियों का भार होगा उनके लिए स्वस्थ शरीर और तेज दिमाग (Healthy body and sharp mind) बहुत ही महत्तवपूर्ण है। यह दोनों आवश्यक और अमूल्य उपलब्ध्यिां खेल तथा अध्ययन के मध्य एक बेहतर तालमेल कायम करके प्राप्त की जा सकती है। जो अभिभावक खेलकूद को अनावश्यक तथा अध्ययन में बाधा समझते हैं उनकी मानसिकता संकुचित ही कही जायेगी।

Importance of sports

खेल के महत्व को आज से ही नही बल्कि प्राचीन समय से ही बुद्धिजीवियों द्वारा समझा गया है। प्राचीन समय में कुश्ती, भालाफेंक, तलवार-बाजी, रथ-दौड, तीरंदाजी आदि अनेक खेलों में लोग प्रतिभाग करते थे। आज के समय में क्रिकेट, हॉकी, वॉलीवाल, फुटबाल इत्यादि खेल युवाओं में लगन, नियमितता, धैर्य, अनुशासन, सहयोग आदि गुणों को विकसित करते हैं। इनसे समूह कार्य तथा सौहार्द की भावनायें प्रोत्साहित होती हैं। इसके साथ-साथ खिलाड़ियों के शारीरिक और मानसिक क्षमता का भी विकास होता है।

इन्डोर खेल जो चार-दिवारी के अन्दर, घर के अन्दर या स्कूल के अन्दर भी खेले जाते हैं बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं। शतरंज, सुडूको आदि खेल हमारे मानसिक शक्ति और मन एकाग्र करने की क्षमता को विकसित करते हैं।

नियमित रूप से खेल खेलना एक व्यक्ति के चरित्र व स्वास्थ को निखारने में सहायक होता है। ऐसा अक्सर देखा जाता है कि बचपन से खेल में शामिल रहने वाला व्यक्ति बहुत ही साफ और सशक्त चऱि़त्र के साथ ही अच्छे स्वास्थ्य को विकसित करता है।

आज जबकि भारत देश व सम्पूर्ण विश्व नोवेल कोरोना वायरस (कोविड-19) के संक्रमण (Novel corona virus (covid-19) infection) से बुरी तरह जूझ रहा है, कई महत्वपूर्ण खेल प्रतियोगिताओं को रदद् अथवा स्थगित किया जा रहा है। निश्चित रूप से खिलाडि़यों के लिए भी यह अभूतपूर्व रूप से प्रतिकूल समय है किन्तु खिलाडि़यों में आत्मविश्वास तथा धैर्य ही उनके व्यक्तित्व की पहचान है।

आज अनेक खिलाड़ी लोगों को लॉकडाउन के दौरान स्वयं को स्वस्थ रहने के तरीकेे बता रहें तथा उनमें सकारात्मक सोच  को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इंग्लैंड क्रिकेट टीम के कप्तान इयॉन मोर्गन ने हॉल ही में बहुत महत्वपूर्ण बात कही- ‘‘करोना से उबरने में बड़ी भूमिका निभा सकते है खेल।‘‘

उन्होंने कहा-

‘‘ अलग-थलग रहने से दिमाग निष्क्रिय हो जाता है। खेलों से दिमाग को सक्रिय बनाया जा सकता है।‘‘

लॉकडाउन में क्या खेलें. What to play in lockdown.

लॉकडाउन के दौरान सामाजिक दूरी बनाये रखना हमारा कर्तव्य है। हम समूह में बिल्कुल नहीं खेल सकते लेकिन एकांत में ध्यान-योग-प्राणायाम तथा अन्य प्रकार के व्यायाम करना चाहिए। परिवार के सदस्यों के साथ कैरम, लूडो, शतरंज आदि खेलों को खेलकर खाली समय का सही उपयोग किया जा सकता है। समय कठिन जरूर है लेकिन हौसला रखकर ही इस विषम परिस्थति से बाहर निकला जा सकता है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी इस वायरस के खात्मे को लेकर लगातार प्रयासरत हैं। तथा लगातार योग एवं व्यायाम के अभ्यास पर बल दे रहे हैं और इसके लाभों को बता रहे हैं कि ‘‘इससे शरीर स्वस्थ एवं मन प्रसन्न रहता है, साथ ही यह तनाव व चिन्ता भी कम करता है।‘‘

इस तरह हम सामाजिक दूरी का पालन करते हुए अपनी तन्दरुस्ती का ख्याल रख सकते हैं।
Dr. Mohammad Sharique Assistant Professor Deptt. of Physical Education Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi- Farsi University, Lucknow.
Dr. Mohammad Sharique
Assistant Professor
Deptt. of Physical Education
Khwaja Moinuddin Chishti Urdu Arabi- Farsi University, Lucknow.

वास्तव में जीवन में खेलों का महत्व र्निविवाद है। खेल न केवल जीवन में गति व लय का संचार करते हैं बल्कि हमें जीवन के महत्वपूर्ण सबक भी सिखाते हैं। हममें से प्रत्येक को यह समझना होगा कि कोविड-19 के कारण हमारे अस्तित्व पर खतरा आ गया है। उसको सामाजिक दूरी के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। साथ ही हम स्वयं को नकारात्मक विचारों एवं कुन्ठा से ग्रस्त न होने दें। ऐसे खेलों का आनन्द लेतें रहें जो सामाजिक दूरी का उल्लंघन न करें।

योग तथा व्यायाम से मन मस्तिष्क को सकारात्मक व प्रसन्न बनाये रखें, जिससे आने वाले समय में हम बेहतर ऊर्जा तथा उत्साह के साथ राष्ट्र निर्माण एवं उन्नति के कार्यों में अपना योगदान दे सके। अंधेरा कितना ही गहरा क्यों न हो, उजाले की एक किरण के आगे टिक नही सकता। ध्यान- व्यायाम व क्रीडा ऐसा प्रकाश है जो नकारात्मक विचारों के अंधेरे को समूल नष्ट करने की क्षमता रखता है। आइये सकारात्मक सोच के साथ हम स्वणर्णिम भविष्य की कामना करें।

घर पर रहें सुरक्षित रहें।

डॉ. मो. शारिक,

असिस्टेंट प्रोफेसर, शारीरिक शिक्षा विभाग,

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ।

कोविड-19 मचा रहा दुनिया में तबाही : वैश्विक मौतों का आंकड़ा दो लाख के पार, ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट

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Kovid-19 causing havoc in the world: global death toll crosses two lakh

नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2020. कोरोना वायरस संक्रमण से वैश्विक मौतों का आंकड़ा (Data on global deaths from corona virus infection) रविवार सुबह तक दो लाख के पार पहुंच गया। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने इस बात की जानकारी दी।

यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 संक्रमण के चलते रविवार सुबह तक पूरे विश्व में दो लाख दो हजार 846 मौतें दर्ज की गईं।

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अमेरिका में सबसे अधिक 53,755 संक्रमितों की मौत हुई है, जबकि इटली, स्पेन, फ्रांस व ब्रिटेन में क्रमश: 26, 384, 22, 902, 22, 614, और 20,319 लोगों की मौतें देखने को मिली हैं।

सीएसएसई के अनुसार, कोरोनावायरस के कुल संक्रमित मामलों का वैश्विक आंकड़ा रविवार को 28 लाख 96 हजार 746 पहुंच गया है।

अमेरिका में कोविड-19 संक्रमण के सबसे अधिक 9 लाख 38 हजार 154 मामले सामने आए हैं। वहीं इस सूची में इसके बाद कुल 2 लाख 23 हजार 759 मामलों के साथ स्पेन का स्थान है।

इटली, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और तुर्की में संक्रमण के कुल मामलों की संख्या क्रमश: एक लाख 95 हजार 351, एक लाख 61 हजार 644, एक लाख 56 हजार 513, एक लाख 49 हजार 569 और एक लाख सात हजार 773 है।

मन की बात : मोदी से मांग, अपने कहे का पालन मीडिया घरानों से कराएं, विपत्तिकाल में पत्रकारों को मुसीबत में न डालें

Modi in Gamchha

Mann ki Baat: Demand from Modi, follow your word with media houses,

भोपाल, 26 अप्रैल, 2020. ठीक उस समय जब प्रधानमंत्री मन की बैत कर रहे ते, उसी समय वरिष्ठ पत्रकार एल एस हरदेनिया ने वक्तव्य जारी कर प्रधानमंत्री से मांग की कि वे मीडिया घरानों से अपने कहे का पालन कराएं और विपत्तिकाल में पत्रकारों को मुसीबत में न डालें।

श्री हरदेनिया ने कहा कि “इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समय मीडिया गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। मीडिया की आर्थिक व्यवस्था मुख्यतः विज्ञापन पर निर्भर करती है। चूँकि इस समय विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं इसलिए मीडिया पर संकट आ गया है।

परंतु मीडिया एवं अन्य व्यवसायों की स्थिति में अंतर  यह है कि जहां बाकी उद्योग-धंधे बंद हो गए हैं वहीं मीडिया चालू है।“

उन्होंने कहा कि इस समय चारों तरफ से खबरें आ रही हैं कि इस संकट का सर्वाधिक प्रभाव पत्रकारों पर पड़ रहा है। अनेक संस्थानों में पत्रकारों को नौकरी से निकाला जा  रहा है, उनका वेतन कम किया जा रहा है या तबादले की धमकी देकर नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी बार-बार अपील कर रहे हैं कि कोई भी नियोक्ता अपने किसी भी कर्मचारी को नौकरी से न निकाले।

इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन की ओर से एल. एस. हरदेनिया ने प्रधानमंत्री एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री से अपील की है कि वे यह सुनिश्चित करें कि मीडिया समूहों के संचालक उनकी इस अपील का शत-प्रतिशत पालन करें।

श्री हरदेनिया ने कहा कि कोरोना वायरस स्थायी विपत्ति नहीं है। इसलिए मीडिया समूहों के संचालकों से अपील है कि वे इस विपत्तिकाल में पत्रकारों को मुसीबत में न डालें।

उन्होंने कहा कि,

“मेरी सरकार से प्रार्थना है कि जो पत्रकार फील्ड डयूटी कर रहे हैं उन्हें भी वे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराए जो पुलिस और स्वास्थ्य कर्मियों को दी जा रही हैं। ऐसे पत्रकारों को 50 लाख रूपये की बीमा योजना में भी शामिल किया जाए।“

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संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं सीमैप के हर्बल उत्पाद

Novel Cororna virus

CIMAP’s Herbal products may boost immunity to avoid infection

नई दिल्ली, 25 अप्रैल (उमाशंकर मिश्र): सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट्स (सीमैप), लखनऊ के शोधकर्ताओं ने वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दो नये हर्बल उत्पाद विकसित किए हैं। ये हर्बल उत्पाद रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ावा देने के साथ-साथ सूखी खांसी के लक्षणों को कम करने में भी मददगार हो सकते हैं, जिसका संबंध आमतौर पर कोविड-19 संक्रमण में देखा गया है।

सीमैप, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक घटक प्रयोगशाला है, ने अपने हर्बल उत्पादों ‘सिम-पोषक’ और ‘हर्बल कफ सिरप’ की तकनीक को उद्यमियों और स्टार्ट-अप कंपनियों को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। ये दोनों उत्पाद प्रतिरक्षा को बढ़ाने में प्रभावी पाए गए हैं। इन उत्पादों में पुनर्नवा, अश्वगंधा, मुलेठी, हरड़, बहेडा और सतावर सहित 12 मूल्यवान जड़ी बूटियों का उपयोग किया गया है।

सीमैप के निदेशक डॉ प्रबोध के. त्रिवेदी ने कहा, “इन हर्बल उत्पादों के निर्माण के लिए संस्थान स्टार्ट-अप कंपनियों एवं उद्यमियों से करार के बाद उन्हें पायलट सुविधा प्रदान करेगा। सीमैप में स्थित यह पायलट प्लांट अत्याधुनिक सुविधाओं और गुणवत्ता नियंत्रण सेल से लैस है।”

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“वैज्ञानिक अध्ययनों में ‘सिम-पोषक’ को बाजार में उपलब्ध दूसरे प्रतिरक्षा बढ़ाने वाले उत्पादों की तुलना में बेहतर पाया गया है। यह अन्य उत्पादों के मुकाबले सस्ता भी है तथा इसे जैविक परीक्षणों में सुरक्षित और प्रभावी पाया गया है। इसी तरह, हर्बल कफ सिरप को आयुष मंत्रालय के नवीनतम दिशा-निर्देशों के आधार पर विकसित किया गया है, और इसे आयुर्वेद के ’त्रिदोष’सिद्धांत के आधार पर तैयार किया गया है।”

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोना वायरस संक्रमित व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को सीमित कर देता है। यह भी देखा गया है कि इस महामारी ने ज्यादातर कम प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार संक्रमण के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है और कोविड-19 से लड़ने में कारगर साबित हो सकता है। (इंडिया साइंस वायर)

क्या 5G मोबाइल नेटवर्क कोरोना वायरस फैलाता है

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5G mobile networks DO NOT spread COVID-19 | 5G मोबाइल नेटवर्क COVID-19 नहीं फैलाते हैं

Viruses cannot travel on radio waves/mobile networks. COVID-19 is spreading in many countries that do not have 5G mobile networks.

नई दिल्ली, 25 अप्रैल 2020. कोरोना वायरस (COVID -19) के तेजी से फैलने के साथ ही इसके विषय में अफवाहें भी बहुत फैल रही हैं। इसी तरह एक अफवाह है कि 5G मोबाइल नेटवर्क कोरोना वायरस फैलाता है।

Coronavirus disease (COVID-19) advice for the public: Myth busters

इस सिलसिले में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई मिथकों का अपनी वेबसाइट पर निराकरण किया है। (The World Health Organization has dispelled myths related to the corona virus.)

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 5G मोबाइल नेटवर्क COVID-19 का प्रसार नहीं करते हैं। वायरस रेडियो तरंगों / मोबाइल नेटवर्क पर यात्रा नहीं कर सकते हैं। COVID-19 कई देशों में फैल रहा है जिनके पास 5G मोबाइल नेटवर्क नहीं है।

डब्ल्यूएचओ के मुताबिकCOVID-19 श्वसन की बूंदों से फैलता है जब एक संक्रमित व्यक्ति खांसता है, छींकता है या बोलता है। लोग दूषित सतह और फिर उनकी आंख, मुंह या नाक को छूने से भी संक्रमित हो सकते हैं।

5G mobile networks DO NOT spread COVID-19
5G mobile networks DO NOT spread COVID-19

यह भी पढ़ें – कोरोना वायरस के बारे में कितना जानते हैं आप और क्या जानना है जरूरी!  जानिए वरिष्ठ वैज्ञानिक से

अमेरिका से सावधान ! कोरोना का एपिसेंटर बना अमेरिका, भारत के लिए सबक है कि अमेरिकी मॉडल

Namaste Trump

Beware of us! America becomes Corona’s epicenter, lesson for India that American model

संयुक्त राज्य अमेरिका (United States of america) में 20 अप्रैल की दोपहर तक कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों की संख्या (Number of people suffering from corona virus in the United States) आठ लाख के पास पहुंच चुकी है और चालीस हजार से अधिक व्यक्ति मौत के मुंह में समा चुके हैं।

America has become the epicenter of this pernicious disease

यह खबर तो पिछले कई दिनों से हम पढ़ ही रहे हैं कि अमेरिका इस सांघातिक रोग का केंद्र या एपिसेंटर बन चुका है। सबसे पहले रोग फैलने का समाचार चीन से आए, उसके बाद इटली, दक्षिण कोरिया और ईरान के सबसे अधिक संक्रमित होने की सूचना मिली।

Why was America doomed to withstand the most intractable invasion of the Corona virus?

जल्दी ही स्पेन और इंग्लैंड, फिर फ्रांस, बेल्जियम और जर्मनी के नाम भी इस शोकाकुल करने वाली सूची में जुड़ गए। लेकिन क्या कारण था कि इन सब देशों से अलग-थलग, सुदूर अमेरिका कोरोना वायरस का सबसे विकराल आक्रमण झेलने के लिए अभिशप्त हुआ? यद्यपि यह अभी साफ नहीं है कि यूरोप के विकसित और समृद्ध देश क्यों इस विषाणु के सामने त्राहिमाम करते नजर आए, तथापि शायद उचित होगा कि पहले अमेरिका के घटनाचक्र को समझने का प्रयत्न किया जाए, जिसे पिछले सौ साल से विश्व की प्रथम महाशक्ति होने का दर्जा हासिल है।

यह इसलिए भी आवश्यक है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) अमेरिका में महामारी फैलने की जिम्मेदारी में अपने शासनतंत्र की जवाबदेही नियत करने से लगातार मुकर रहे हैं। उल्टे उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) को ही दोषी ठहराते हुए उसे दी जाने वाली सहायता राशि रोकने का ऐलान कर दिया है। विगत 16 अप्रैल को जब मृतकों की संख्या तीस हजार का आंकड़ा पार कर गई तब भी उन्होंने अटपटा बयान दिया कि वायरस संक्रमण अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है और अब स्थिति जल्दी सामान्य हो जाएगी। हालांकि उनके शासन में स्वास्थ्य सलाहकार डॉ. फाउची लगातार राष्ट्रपति के वक्तव्यों का खंडन कर रहे हैं।

पिछले हफ्ते यह खबर भी आई कि ट्रंप ने डॉ. फाउची को हटाने का फैसला कर लिया है, यद्यपि बाद में वे इससे पीछे हट गए।

यह अच्छी बात है कि राष्ट्रपति स्वयं प्रतिदिन व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करने बाहर आते हैं, किंतु वे जो कहते हैं उससे यही लगता है कि ट्रंप को जमीनी हकीकत का कुछ भी इल्म नहीं है और उन्हें शायद सही सलाह भी नहीं मिल रही है।

America’s corporate capitalism is the culprit

मैं अगर कहूं कि इस शोचनीय स्थिति में लाने के लिए अकेले डोनाल्ड ट्रंप नहीं, बल्कि अमेरिका का कॉरपोरेट पूंजीवाद अपराधी है तो यह अतिरंजना नहीं होगी।

अमेरिका में एक ओर व्यक्ति स्वातंत्र्य को सर्वोपरि माना जाता है, दूसरी ओर उसी स्वतंत्रता को पूंजी के जूते तले कुचला जाता है।

यह विडंबना ही तो है तो नेशनल राइफल एसोसिएशन (एनआरए) अमेरिका का अत्यन्त शक्तिशाली संगठन है जो व्यक्ति स्वातंत्र्य के नाम बंदूक खरीदने की खुली छूट की पैरवी करता है। इससे हथियारों के सौदागरों के सिवाय और किसे फायदा होता है?

इसी अमेरिका में एक समय उद्योगपति चार्ल्स विल्सन का राष्ट्रपति हैरी ट्रूमेन से यह कहने का साहस होता है कि ”जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है, वही अमेरिका के लिए अच्छा है”।

पूंजी हित को देशहित के ऊपर मानने का यह अहंकार ही है, जिसके चलते विश्व के सबसे समृद्ध देश में गरीब आदमी को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।

बिल क्लिंटन ने 1992 में अपने चुनाव प्रचार में सबके लिए स्वास्थ्य सुविधा का नारा बुलंद किया है। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद बिल और हिलेरी ने जब इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश की तो पूंजीवादी ताकतों ने कदम-कदम पर रोड़े अटकाए और प्रस्ताव को सफल नहीं होने दिया।

बराक ओबामा ने उनके नक्शे-कदम पर चलते हुए 2009 में सर्वसुलभ चिकित्सा तंत्र विकसित करने की जद्दोजहद की। इसकी ओबामा केयर (Obama care) कहकर खिल्ली उड़ाई गई। ओबामा किसी हद तक सफल हुए और 2010 में विधेयक भी पारित हो गया। लेकिन इस कानून को कमजोर करने में पूंजीवादी शक्तियों ने पूरा जोर लगा दिया। अदालतों में कितने ही केस इसके खिलाफ दाखिल किए गए।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन (Famous Economist Paul Krugman) ने कहा कि बिल पारित कराने के लिए ओबामा को बहुत से समझौते करना पड़े; कई जगह झुकना पड़ा; फिर इसके लिए पर्याप्त धनराशि का प्रावधान नहीं किया गया; रिपब्लिकन पार्टी शासित राज्यों में जानबूझ कर इसे सफल नहीं होने दिया गया; कुल मिलाकर अच्छी मंशा से बना एक कानून षड़यंत्र का शिकार हो गया। यहां पूंजी की ताकतों की बात करते समय मेरा आशय मुख्यत: निजी बीमा कंपनियों से है, जिन्होंने अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों में अपने साम्राज्य खड़े कर लिए हैं। इन्हें लोगों के जीने-मरने की कोई परवाह नहीं है। जिसके पास पैसा है, वह अपना इलाज करवा ले, इनकी सोच यहीं तक सीमित है।

यह हमारे समय का दुर्भाग्य है कि जिस ब्रिटेन ने 1948 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाNational Health Service (एनएचएस) की स्थापना कर सबके लिए स्वास्थ्य सुविधा (Health facility for all) उपलब्ध कराने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया था, आज वह देश भी कोरोना वायरस से निबटने में किसी हद तक असहाय नजर आ रहा है।

इसमें एक विडंबना अभी जुड़ी जब एनएचएस के विरोधी अनुदारवादी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को अपने इलाज के लिए उसी सेवा की शरण में जाना पड़ा। अस्पताल से बाहर आने के बाद उन्होंने एनएचएस को धन्यवाद दिया। अब देखना होगा कि वे सत्तर साल से चली आ रही इस सार्थक व्यवस्था को पुख्ता करने की दिशा में कदम उठाते हैं या फिर निजी क्षेत्र को पूवर्वत बढ़ावा देते हैं।

Aneurin Bevan PC, often known as Nye Bevan, was a British Labour Party politician. Born into a working-class family in south Wales, he was the son of a coal miner. He left school at 13 and worked as a miner during his teens where he became involved in local union politics. Wikipedia
Aneurin Bevan PC, often known as Nye Bevan, was a British Labour Party politician. Born into a working-class family in south Wales, he was the son of a coal miner. He left school at 13 and worked as a miner during his teens where he became involved in local union politics. Wikipedia

पाठकों को शायद याद हो कि द्वितीय विश्व युद्ध (second World War) के बाद जब लेबर पार्टी की सरकार बनी तो समाजवादी स्वास्थ्य मंत्री एन्यरिन बेवन (Socialist Health Minister Aneurin Bevan) ने एनएचएस को खड़ा किया था। मार्गरेट थैचर के प्रधानमंत्री बनने के बाद इंग्लैंड में एक के बाद एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण किया गया, उसी के तहत एनएचएस को भी कमजोर किया गया, जिसके दुष्परिणाम आज देखने में आ रहे हैं।

अमेरिका और ब्रिटेन में स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण (Privatization in health sector in US and UK) को जिस तरह बढ़ावा मिला, अन्य पूंजीवादी जनतांत्रिक देशों ने भी उसी का अनुसरण किया। इसके ठीक विपरीत हमारे सामने क्यूबा की तस्वीर है।

फिडेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्रांति होने के बाद क्यूबा में सबसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर ध्यान दिया गया। पूरे देश में सब जगह क्लीनिक खोले गए, जिनमें सामान्य रोगों यथा बुखार, सर्दी-खांसी, उल्टी-दस्त प्राथमिक उपचार की व्यवस्था की गई। गर्भवती महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके साथ ही मेडिकल शिक्षा को समुन्नत करने की दीर्घकालीन योजना बनाई गई। परिणामस्वरूप आज क्यूबा की स्वास्थ्य सेवा (Cuban Health Services) सारी दुनिया में सबसे अच्छी है, और उसके काबिल डॉक्टर वेनेजुएला आदि पड़ोसी देशों के अलावा विश्व में जहां आवश्यकता हो, वहां जाकर सेवाएं देने के लिए तत्पर रहते हैं।

ध्यान रहे कि क्यूबा के डॉक्टरों को सामान्य वेतन-भत्ते ही मिलते हैं, वे अनाप-शनाप कमाई नहीं करते। मुझे रूस की भी सीमित जानकारी है, जहां राजकीय नीति के तहत जनस्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है।

Lalit Surjan ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं. वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है. यह आलेख देशबन्धु से साभार लिया गया
Lalit Surjan ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं. वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है. यह आलेख देशबन्धु से साभार लिया गया

सिविल सोसायटी पूंजीवादी जनतांत्रिक देशों में भी जनस्वास्थ्य पर ध्यान देने की वकालत करती रही है। छत्तीसगढ़ में जनस्वास्थ्य सहयोग, गनियारी (बिलासपुर) व शहीद अस्पताल, दल्ली राजहरा इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

राहुल गांधी भी यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal basic income) के साथ-साथ यूनिवर्सल हेल्थ केयर (Universal Health Care) के पक्षधर हैं। विख्यात मेडिकल जर्नल लैंसेट की पहल पर अनेक देशों में एनसीडीआई कमीशन (गैर संक्रामक रोगों एवं दुर्घटनाओं की रोकथाम आयोग) गठित किए गए हैं।

2019 के आम चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ में भी इस दिशा में पहल की गई थी। इसका मकसद ही है कि जनसाधारण को त्वरित और कम खर्चीली चिकित्सा उपलब्ध हो सके।

आज हम देख रहे हैं कि कोरोना वायरस का इलाज (Corona virus treatment) मुख्यत: एम्स व अन्य सरकारी अस्पतालों में ही हो रहा है। भारत के लिए सबक है कि अमेरिकी मॉडल (निजी अस्पताल व बीमा आधारित सेवा) को छोड़कर स्वास्थ्य सेवाओं का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण करे, तभी भविष्य में हर भारतवासी को यथासमय, यथाआवश्यक चिकित्सा सुविधा मिल पाएगी।

ललित सुरजन

कोरोना वायरस से लड़ने में एक शल्य चिकित्सीय रणनीति, लॉकडाउन में किस तरह की कसरत करना है?

Corona virus

What type of exercise to do in lockdown, a surgical strategy in fighting the corona virus?

स्वास्थ्य सेवा पर चौतरफा विचार All-round thoughts on healthcare

लेखक: डॉक्टर संजय नागराल- Sanjay Nagral (जनरल सर्जन, हेपेटोपैंक्रैथोबिलरी सर्जरी, मुम्बई- General Surgeon, Hepatopancreatobiliary Surgery, Mumbai)। मूल लेख, 27 मार्च, मुंबई मिरर में छपा है: “ A surgical Strategy to fight Coronavirus”। अनुवाद अनुराग मोदी

यह लेख हाथ धोने, मास्क पहनने, और सोशल डिसटेंसिंग आदि के बारे में नहीं है। इसलिए नहीं कि वो जरूरी नहीं है, बल्कि इसलिए कि अभीतक उसकी तो आपको आदत कर दी गई होगी। जो आप कुछ दिन पहले टीवी में देख रहे थे, वो अब मैं मुम्बई के अस्पताल में घटता देख रहा हूँ। महामारी तेजी से बढ़ रही है। हम घर पर बैठकर, क्या अपने आपको तैयार करने के लिए कुछ कर सकते हैं?

मैं कुछ ऐसे सुझावों के बारे में चर्चा कर रहा हूँ, जो हमें कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार करने में मदद करेगा। यह कोई ईलाज नहीं है बल्कि एक तरह कि मददगार रणनीति है, जिसका वैज्ञानिक आधार है। और, सबसे बड़ी बात है, इसे किसी भी दवाई और उपकरण के बिना घर पर ही अपने से किया जा सकता है। इसे ‘प्रिहेब्लीटेशन’ कहते हैं – यह एक सोच है, जिसका उद्देश्य इन्सान के शरीर को कुछ गतिविधि के जरिए आने वाली बीमारी के लिए तेजी से तैयार करना, जिससे बीमारी के भारी असर को शरीर बेहतर तरीके से झेल सके।

आधुनिक स्वास्थ्य सेवा के अन्य तरीकों की तरह, इसकी शुरुआत भी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई। ढेर सारे आदमी जो ब्रिटिश सेना में भर्ती के लिए आते थे, लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप कमजोर होने के कारण उनको सेना में नहीं लिया जाता था। चूंकि, ब्रिटेन एक छोटा सा देश है इसलिए वो बहुत ज्यादा लोगों को इस आधार पर नकार नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने लोगों के शैक्षणिक, शारीरिक और पोषण के स्तर में सुधार के लिए एक प्रोग्राम शुरू किया।

जो 12,000 लोग इस ‘प्रिहेब्लीटेशन’ प्रोग्राम में शामिल हुए, उसमें से 85% लोगों में शारीरिक और मानसिक रूप से सुधार देखा गया। पर्वतारोही भी इसी विधि से किसी भी बड़े अभियान के पहले कुछ हफ्ते तक अपने आपको तैयार करते हैं। यह पर्वतारोही ज्यादा ऊँचाइयों पर ज्यादा टिक पाते हैं।

हाल ही में, इसका स्वास्थ्य सेवा में भी उपयोग होने लगा है। यह अब आधुनिक शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का भी हिस्सा बन गया है।

पूरे विश्व में शल्य प्रक्रियाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, सर्जरी की तकनीक काफी आधुनिक हुई है, लेकिन फिर भी कई तरह जटिलता का सामना करना पड़ता है। खासकर, मधुमेह, हृदय रोग और फेफेड़े के रोग से पीड़ित बूढ़े मरीज की सर्जरी में काफी दिक्कत आती है; और अब भारत में ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है।

What is hepatopancreatobiliary surgery

आप जो भी कहो, सर्जरी से एक तरह से शरीर पर अचानक काफी तनाव पड़ता है, एक हिंसक तनाव। इस सबके चलते सर्जरी के पहले कुछ हफ्तों में मरीज को तैयार करने के लिए ‘प्रिहेब्लीटेशन’ की प्रक्रिया का उपयोग शुरू हुआ। और अब कुछ देशों में यह एक तरह का मानक बना गया है।

इसमें यह बातें शामिल हैं : शारीरिक अनुकूलन और कसरत के जरिए मांस पेशियों को बनाना और हृदय और फेफड़ों की कार्य क्षमता बढ़ाना, पोषक खाना, सिगरेट पीना बंद करना, शुगर लेवल पूरी कड़ाई से सही रखना, फेफड़ों को मजबूत करने के लिए प्राणायाम आदि सांस की कसरत करना और अपने आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाना।

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि इस सब नियमों का तीन-चार हफ्तों तक कड़ाई से पालन करने से सर्जरी में होने वाली कई जटिलता में कमी लाता है, और जिन लोगों को जल्दी कैंसर सर्जरी के जरुरत होती है, उनके लिए इस तकनीक का उपयोग होता है।

इस बात के काफी शोध हैं कि जब आपकी शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है, तब आपकी मांसपेशिया कमजोर हो जाती हैं और आपके हृदय और फेफड़े में भी शिथिलता आती है। और फेफड़ों का संक्रमण (इन्फेक्शन) होने की दशा में, इन दोनों का असर आपके शरीर में आक्सीजन का स्तर बनाए रखने या वेंटीलेटर पर रखने के समय आपकी क्षमता पर पड़ता है।

किस तरह की कसरत करना है?

आप शुरुआत ज्यादा समय बैठे ना रहने से कर सकते हैं। लॉक डाउन के कारण घर में ही चलते रहना, एक जगह खड़े रहकर जॉगिंग करने से लेकर एरोबिक कर सकते हैं। या आप कोई उच्च तीव्रता वाली कसरत कर सकते हैं। डांस करना एक विकल्प हो सकता है। जैसा प्राणायाम में करते हैं, वैसे गहरी सांस लेकर उसे कुछ समय तक सांस रोके रखने की कसरत दिन में अनेक बार कर सकते हैं, इससे फेफड़े मजबूत होंगे।

भारतीय लोगों बीमारी के दौरान कई तरह के भोजन से परहेज करते हैं। भारत में किए गए शोध के अनुसार सर्जरी के लिए आने वाले मरीजों में प्रोटीन की भारी कमी पाई जाती है। और थोड़े समय के लिए पौष्टिक खाना देने से सर्जरी के बेहतर परिणाम आते है। प्रचुर मात्रा में प्रोटीन लेना जरूरी है। मांसाहारी लोगों के लिए अंडा, चिकन, मछली जैसे अनेक विकल्प हैं। शाकाहारी लोग पनीर, अंकुरित अनाज, सोया, दाल, दूदूध आदि एक अच्छा स्रोत है।

मैं अपने ऐसे शाकाहारी मरीज जिन्हें मांसाहार से परहेज नहीं है या जो पहले से ही मांसाहारी है, उन्हें सर्जरी के पहले खूब अंडे और चिकन खाने की सलाह देता हूँ। बाजार में मिलने वाले प्रोटीन पाउडर इसका विकल्प नहीं है।

कुछ और बातें ‘प्रिहेब्लीटेशन’ का हिस्सा है। पहला है, धूम्रपान बंद करना। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सर्जरी के बाद धूम्रपान करने वाले मरीजों को काफी जटिलता का सामना करना पड़ता है। इन लोगों को कोरोना होने पर भी मौत का खतरा है। मधुमेह वालों को अपना शुगर का लेवल सही रखना है – किसी भी बीमारी से लड़ने में सबसे जरूरी बात। अस्थमा पीड़ित लोगों को अपनी दवाई और बाकी चीजों का बराबर ध्यान रखना है।

‘प्रिहेब्लीटेशन’ का संक्रामक महामारी में क्या असर होगा, इसका अभी तक कोई आकलन नहीं किया गया है। हालांकि, यह एक आम समझ और तार्किक भी है और इससे कोई नुकसान भी नहीं होगा। एक हावर्ड प्रोफेसर ने भी इस बात की सलाह दी है, हालांकि अमेरिका में अब देर हो चुकी है।

हालांकि, भारत के पास अभी भी मौका है। सोशल डिसटेंसिंग, क्वारंटाइन और प्रिहेब्लीटेशन सब साथ-साथ हो सकता है। जिन लोगों को बीमारी का खतरा ज्यादा है, यह उनके लिए ठीक है – खासकर ऐसे बूढ़े जिन्हें पहले से कोई बीमारी है।

महामारी का फैलाव रोकने में लॉक डाउन एक महत्वपूर्ण कदम है, मगर ना चाहते हुए भी इसमें लोगों की शारीरिक गतिविधि कम हो जाएगी जिससे से हृदय और फेफड़े में शिथिलता आती है।

मुझे इस बात की गहरी समझ है कि, इसमें से अनेक सलाह का पालन करना आसान नहीं है, खासकर गरीबों के लिए। खासकर पोषण के मामले में, मुख्य रूप से खाने में प्रोटीन, इस मामले में सरकार को लोगों की मदद करना चाहिए।

जैसा मैंने पहले लेखों में भी लिखा है, सरकार को स्वास्थ्य सेवा में बढ़ोतरी करना, इसमें जरूरी राशि उपलब्ध करना, जैसे निर्णायक कार्यवाही करना ईलाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मगर बहुत सारी स्वास्थ्य सबंधी चुनौतियों का सामना बड़े कदम से नहीं, मगर सारे समुदाय के व्यवहार और जीवन शैली में छोटे-छोटे बदलाव से किया गया है।

भारत पहले से ही गैर संक्रामक की बीमारी से स्थाई रूप से पीड़ित है। ‘प्रिहेब्लीटेशन’ एक ऐसी रणनीति जो सिर्फ अभी ही नहीं मगर भविष्य में भी हमारे लिए लाभकारी हो सकती है।

COVID-19 alert

देश में 21 दिन कर्फ्यू जैसा लॉकडाउन तो कर दिया मोदीजी, लेकिन घर में कैद गरीब खाएगा क्या, यह भी तो बताते

PM Narendra Modi at 100 years of ASSOCHAM meet

Modiji made a lockdown like a curfew for 21 days in the country

प्रधानमंत्री जी, देश आपसे सुनना चाहता था कि पहले से रसातल में पहुंची देश की आर्थिक स्थिति और जमींदोज न हो जाए, इसके लिए क्या कर रही है आपकी सरकार ?

तसलीम खान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश को आज रात 12 बजे से अगले 21 दिन तक लॉकडाउन करने की घोषणा की है। उन्होंने इसे एक तरह का कर्फ्यू कहा है और अपील की है कि इस दौरान लोग घरों से न निकलें। लेकिन सवाल है कि गरीब के घर का चूल्हा कैसे जलेगा, मजदूर के बच्चों का पेट कैसे भरेगा, आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई कैसे होगी, इसका कोई रोडमैप या खाका देश के सामने नहीं रखा। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने यह भी नहीं बताया कि उनकी सरकार गरीबों-मजदूरों के चूल्हे की आंच के लिए क्या कदम उठा रही है। क्या गरीबों और मजदूरों, दिहाड़ी कमाई करने वालों, ठेला-खोमचा लगाने वालों को कोई आर्थिक मदद दी जाएगी? आखिर इस वर्ग की भूख कैसे शांत होगी?

अपने करीब 30 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस की भयावहता का जिक्र करते हुए एक ही बात बार-बार दोहराई कि दुनिया के सभी विकसित देश भी इस समय असहाय हैं।

उन्होंने इस रविवार हुए जनता कर्फ्यू के लिए लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि जनता कर्फ्यू से भारत ने दिखा दिया कि जब देश पर संकट आता है, जब मानवता पर संकट आता है तो किस प्रकार सभी भारतीय मिलकर एकजुट होकर मुकाबला करते हैं। लेकिन इस संकट की घड़ी में सरकार लोगों के लिए, देशवासियों के लिए, अपने नागरिकों के लिए क्या कर रही है, इसका कोई जिक्र नहीं किया।

प्रधानमंत्री ने अप्रत्यक्ष रूप से माना कि दुनिया के कई देशों के मुकाबले हमारे यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं और संसाधन पर्याप्त और गुणवत्ता वाले नहीं हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने यह नहीं बताया कि हमारे देश में इस बीमारी की पहचान करने के लिए कितनी प्रयोगशालाएं हैं, कितने आइसोलेशन सेंटर हैं, कितने क्वेरंटाइन सेंटर हैं और कितनी नई सुविधाएं तैयार की जा रही हैं।

प्रधानमंत्री ने सोशल डिस्टेंसिंग का हवाला दिया और इसी कारण पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान किया, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि जो लोग अपने घरों से दूर फंसे हैं, और जिनके पास रहने-खाने की कोई व्यवस्था नहीं है, उनके लिए क्या कर रही है सरकार।

प्रधानमंत्री ने सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए कोरोना वायरस के साइकिल को तोड़ने, चेन ब्रेक करने का आह्नान तो किया, लेकिन बेघरों, गरीबों, मजदूरों, रिक्शे वालों, रेहड़ी लगाने वालों आदि के जीवन का साइकिल चलता रहे, इसकी कोई व्यवस्था या घोषणा नहीं की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर आने वाले 21 दिन हम लॉकडाउन में नहीं रहे तो देश 21 साल पीछे हो जाएगा, लेकिन प्रधानमंत्री के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि अगर 21 दिन तक मजदूर काम नहीं करेगा, रिक्शे वाले घर से नहीं निकलेगा, रेहड़ी वाला बाहर नहीं जाएगा, तो उसका तो जीवन ही मुश्किल में पड़ जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना वायरस से लड़ने का फिलहाल यही एक उपाय है कि इसके संक्रमण के विस्तार को रोका जाए, लेकिन ऐसे में लोगों द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी हुई सरकार की जिम्मेदारी है कि देश के हर नागरिक के भोजन की व्यवस्था हो।

प्रधानमंत्री ने माना कि इस लॉकडाउन की बहुत बड़ी आर्थिक कीमत देश को चुकानी होगी, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित निर्माण मजदूर, खेतिहर मजदूर, फैक्टरियों में ठेके पर काम करने वाला मजदूर, ऑटो वाला, रिक्शा वाला, छोटी-छोटी फेरी लगाने वाला होगा, सबसे बड़ी कीमत तो वही चुकाएगा। इस तबके के लिए सरकार के पास क्या योजना है, इसका कोई रोडमैप प्रधानमंत्री ने सामने नहीं रखा।

बाकी तो प्रधानमंत्री ने वही सबकुछ दोहरा दिया जो व्हाट्सऐप पर पहले से मौजूद है। मसलन कोरोना का अर्थ कोई रोड पर न निकले। मसलन इस वायरस के लक्षण नहीं दिखते, मसलन एक आदमी सैकड़ों हजारों को संक्रमित कर सकता है।

प्रधानमंत्री जी, इन सबके लिए तो डॉक्टर, स्वास्थ्य विशेषज्ञ पर्याप्त हैं। देश आपसे सुनना चाहता था कि पहले से रसातल में पहुंची देश की आर्थिक स्थिति और जमींदोज न हो जाए, इसके लिए क्या कर रही है आपकी सरकार। देश जानना चाहता था कि दफ्तर, कारखाने और बाजार बंद हो जाने से जिन दुकानदारों, मजदूरों, मध्यम, निम्न और निम्न मध्यम वर्ग पर जो मार पड़ने वाली है, उसके लिए सरकार क्या कर रही है या करने वाली है। प्रधानमंत्री जी, सॉरी, आपने इस मोर्चे पर एक बार फिर निराश किया है।

तसलीम खान
तसलीम खान

प्रधानमंत्री जी आपने कुछ देशों की जिक्र किया जिन्होंने इस महामारी को काफी हद तक नियंत्रित किया है, और इसके लिए लोगों के घरों से न निकलने को कारण बताया, लेकिन अच्छा होता कि अगर आप यह बताते कि इन देशों ने जब लोगों को घरों से न निकलने की हिदायत दी थी तो इसके साथ ही हर वर्ग, हर तबके और नागरिक के भोजन, स्वास्थ्य और आवश्यकताओं की व्यवस्था भी की थी।

प्रधानमंत्री जी आपने खुद कहा कि अमेरिका और इटली जैसे देशों की स्वास्थ्य सेवाएँ और संसाधन विश्व में सबसे बेहतरीन माने जाते हैं यानी आप मान रहे हैं कि हमारे देश में यह सुविधाएं और संसाधन पर्याप्त नहीं हैं, फिर भी आपने इस मद में सिर्फ 15,000 करोड़ रुपए का फंड देने का ऐलान किया। क्या इससे 130 करोड़ भारतवासियों के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो पाएंगी।

वैसे प्रधानमंत्री जी, आपकी सरकार कोई आंकड़ा तो सामने रखती नहीं है, लेकिन आपको तो आंकड़े पता ही होते हैं, ऐसे में उन आंकड़ों को एक बार गौर से देखिए और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए समझिए कि देश में जन स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति क्या है।

नवजीवन से साभार

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प्रधानमंत्री ने फिर पिलाया भाषण, आज रात 12 बजे से पूरे देश में 21 दिन का पूर्ण लॉकडाउन

PM Modi Speech On Coronavirus

Prime Minister again feeds speech, full lockdown of 21 days from 12 o’clock tonight

नई दिल्ली, 24 मार्च 2020. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने कहा है कि आज (मंगलवार) रात 12 बजे से 21 दिन के लिए पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन होगा। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस का साइकिल तोड़ने के लिए यह 21 दिन जरूरी हैं। अगर ये 21 दिन नहीं संभले तो फिर कई परिवार तबाह हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस लॉकडाउन को कर्फ्यू की तरह ही समझें।

Modi speech today | PM Modi Speech On Coronavirus

पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि हिंदुस्तान को बचाने के लिए, हर नागरिक को बचाने के लिए, आपके परिवार को बचाने के लिए घरों से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जा रही है। देश के हर राज्य को हर केंद्रशासित प्रदेश, गली-मुहल्ले को लॉकडाउन किया जा रहा है। यह एक तरफ से कर्फ्यू ही है। यह जनता कर्फ्यू से बढ़कर है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का जो संकल्प लिया था, हर भारतवासी ने पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ अपना योगदान दिया। बच्चे, बुजुर्ग, छोटे-बड़े, गरीब, मध्यम हर वर्ग के लोग परीक्षा की इस घड़ी में साथ आए। जनता कर्फ्यू को हर भारतवासी ने सफल बनाया। एक दिन के जनता कर्फ्यू से भारत ने दिखा दिया कि जब देश पर संकट आता है, जब मानवता पर संकट आता है तो किस प्रकार से हम सभी भारतीय मिलकर एकजुट होकर मुकाबला करते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने रात आठ बजे से देश को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी जनता कर्फ्यू के लिए प्रशंसा के पात्र हैं। कोरोना की वैश्विक महामारी पर पूरी दुनिया की स्थिति को समाचारों के माध्यम से सुन और देख रहे हैं। दुनिया के समर्थ से समर्थ देश को भी कैसे इस महामारी ने बिल्कुल बेबस कर दिया है। ऐसा नहीं है कि ये देश प्रयास नहीं कर रहे हैं या फिर उनके पास संसाधनों की कमी है। लेकिन कोरोना वायरस इतनी तेजी से फैल रहा है कि तमाम तैयारियों और प्रयासों के बावजूद इन देशों में चुनौती बढ़ती ही जा रही है। इन सभी देशों के दो महीनों के अध्ययन से जो निष्कर्ष निकल रहा है, इस कोरोना से प्रभावी मुकाबले के लिए एक मात्र विकल्प है सोशल डिस्टेंसिंग। एक दूसरे से दूर रहना, अपने घरों में ही बंद रहना, कोरोना से बचने का इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। कोरोना को फैलने से रोकना है तो उसके संक्रमण की साइकिल है, उस साइकिल को तोड़ना ही होगा।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग गलतफहमी हैं कि सोशल डिस्टैंसिंग केवल मरीज के लिए आवश्यक है। यह सोचना सही नहीं है। सोशल डिस्टैंसिंग हर नागरिक के लिए, हर परिवार के लिए, परिवार के हर सदस्य के लिए है, प्रधानमंत्री के लिए भी है। कुछ लोगों की लापरवाही, कुछ लोगों की गलत सोच, आपको, आपके बच्चों को, आपके माता-पिता को, आपके परिवार को, आपके दोस्तों को और आगे चलकर पूरे देश को बहुत बड़ी मुश्किल में झोंक देगी। अगर ऐसी लापरवाही जारी रही तो भारत को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इतनी कीमत चुकानी पड़ेगी कि अंदाजा लगाना मुश्किल होगी।

गंभीर हो जाइए, इटली की कहानी से जानिए CORONA VIRUS कितना खतरनाक है

Corona virus COVID19, Corona virus COVID19 image

 How is dangerous CORONA VIRUS .

इटली की कहानी | Italian story

CORONA VIRUS कितना खतरनाक है. इससे आप समझ पाएंगे कि इटली में कितनी तेजी और भयानक तरीके से कोरोना फैला है. ये मैसेज अंग्रेजी में लिखा एक ट्विटर थ्रेड (मैसेज श्रंखला) है, जिसे ताबिश सिद्दीकी ने हिंदी में ट्रांसलेट किया (Tabish Siddiqui translated into Hindi) है. पढ़िए और समझिये कि हमारा और आपका सामना किससे हुआ है ?

भाग 1

अगर आप अभी भी अपने दोस्तों के साथ घूम रहे हैं, होटल जा रहे हैं, पार्टी कर रहे हैं और ऐसे दिखा रहे हैं जैसे ये (कोरोनावायरस) आपके लिए कोई बड़ी मुसीबत नहीं है, तो आप बहुत बड़े भ्रम में हैं.. अपने आप को संभाल लीजिये.. नीचे का सारा मैसेज एक इटालियन लोगों के द्वारा पोस्ट किया गया है.. जो कुछ भी उन्होंने जैसा भी लिखा है उसे वैसा ही लिखा जा रहा है:

“सारी दुनिया के लिए सन्देश,, जिन्हें ये पता नहीं है कि उनका सामना किस आपदा से होने वाला है”

जैसा कि मैं समझता हूँ इस वक़्त सारी दुनिया को पता है कि इस वक़्त सारा इटली क्वारंटाइन किया जा चूका है.. यानि उसे पूरी तरह से बंद किया जा चुका है.. ये स्थिति बहुत बुरी है.. मगर उन लोगों के लिए ज़्यादा बुरी है जो ये सोचते हैं कि ये उनके साथ नहीं होगा

हमे पता है कि आप कैसा सोच रहे हैं.. क्यूंकि हम भी पहले ऐसे ही सोच रहे थे..

आईये देखें कि ये सब कैसे शुरू हुवा:

स्टेज प्रथम (पहला चरण):

आपको पता होता है कि कोरोना वायरस ऐसी कोई चीज़ है.. मगर आपके देश में ये अभी अभी दिखना शुरू हुवा है.. इसलिए आप सोचते हैं कि डरने की कोई बात नहीं हैं.. क्यूंकि ये बस एक तरह का ज़ुकाम है.. और वैसे भी मैं 75+ साल का हूँ नहीं इसलिए मुझे इस से क्या डरना

फिर प्रथम चरण आगे बढ़ता है:

और आप सोचते हैं कि ये क्या हर कोई पागल हो रहा है मास्क और टॉयलेट पेपर के लिए.. ऐसा कुछ तो होने वाला है नहीं.. मेरी ज़िन्दगी तो आराम से चलती रहेगी

फिर आता है..

स्टेज द्वितीय (दूसरा चरण)

धीरे धीरे.. देश में मरीजों की संख्या बढ़ने लगती है.. और सरकार एक दो शहरों कि सीमाएं प्रतिबंधित कर देती है.. और आपको ये समझाती है कि डरने की कोई बात नहीं है.. सब कुछ ठीक है (22 फ़रवरी को ऐसा इटली में हुवा था)

द्वितीय चरण यानि दूसरा चरण आगे बढ़ता है:

कुछ लोगों की मौतें होती हैं.. मगर वो सब बूढ़े लोग होते हैं.. और मीडिया उस पर हाय तौबा मचाता है… हम सोचते हैं कि ये अच्छी बात नहीं है.. लोग अपने दोस्तों यारों से मिलते रहते हैं.. नार्मल ज़िन्दगी चलती रहती है.. और हमे ये लगता है कि हमे कुछ नहीं होगा

त्रित्तीय चरण (तीसरा चरण)

धीरे धीरे संक्रमित लोगों का आंकडा बढ़ने लगता है.. एक दिन में ही दुगने लोग संक्रमित हो जाते हैं.. मौतों का आंकड़ा बढ़ जाता है.. और सरकार चार बड़े इलाक़ों को प्रतिबंधित कर देती है जहाँ से सब से ज्यादा केस हैं (ये 7 मार्च को इटली में होता है).. फिर इटली के पच्चीस 25% लोगों को घरों में बंद कर दिया जाता है

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भाग 2

फिर आता है..

स्टेज तृतीय (तीसरा चरण)

फिर कुछ क्षेत्रों में स्कूल, बार और रेस्टोरेंट बंद कर दिए जाते हैं.. मगर ऑफिस अभी भी खुले हैं.. सरकारी नियमों को मीडिया और अखबार पहले ही प्रकाशित कर देते हैं

स्टेज तृतीय आगे बढ़ता है:

इटली के क़रीब दस हज़ार लोग, जिन्हें दूसरे इलाक़ों में सरकार ने रोक कर रखा था वो एक ही रात में वहां से निकलकर अपने अपने घर वापस पहुँच जाते हैं.. और इटली के लगभग पिछत्तर प्रतिशत लोग अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त रहते हैं

स्टेज तृतीय यानि तीसरा चरण और आगे बढ़ता है:

इटली के लोग अभी भी इस वायरस की आपदा नहीं समझ पा रहे हैं.. हर जगह इटली में लोगों को ये बताया जा रहा है कि थोड़ी थोड़ी देर में अपने हाथ धुलें.. लोग ग्रुप में या भीड़ में न खड़े हों.. टीवी पर हर दस मिनट में ये समझाया जा रहा है.. मगर ये बातें लोगों के दिमाग़ में नहीं बैठ रही हैं

फिर आता है..

स्टेज चतुर्थ (चौथा चरण):

इटली में हर जगह स्कूल और कॉलेज कम से कम एक महीने के लिए बंद कर दिए गए हैं.. नेशनल हेल्थ इमरजेंसी लगा दी जाती है.. सारे अस्पतालों को ख़ाली करवा के कोरोनावायरस के मरीजों के लिए जगह बना दी जाती है

स्टेज चतुर्थ (चौथा चरण) और आगे बढ़ता है:

अब इटली में डॉक्टर और नर्सों की कमी पड़ने लगी है.. अब जितने भी डॉक्टर रिटायर हो चुके हैं उन्हें भी वापस नौकरी पर बुला लिया जाता है.. जिस छात्रों कि डॉक्टरी की पढाई का दूसरा साल हुवा है उन्हें भी नौकरी पर बुला लिया जाता है.. किसी भी डॉक्टर और नर्स के लिए कोई भी शिफ्ट नहीं है.. चौबीस घंटे काम करना है सबको अब.. डॉक्टर और नर्स भी संक्रमित हो रहे हैं अब और उन लोगों से उनके परिवारों को भी वायरस अपनी चपेट में ले रहा है

स्टेज चतुर्थ (चौथा चरण) और आगे बढ़ता है:

अब निमोनिया के बहुत ही ज्यादा मरीज़ बढ़ गए हैं… और बहुत सारे लोगों को ICU की ज़रूरत है और अब ICU में सबके लिए जगह नहीं है.. इटली में अब वो स्थिति आ चुकी है जहाँ डॉक्टर अब सिर्फ़ उन्हीं का इलाज कर रहे हैं जिनके बचने की उम्मीद होती है.. मतलब अब बूढ़े, और अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों का इलाज डॉक्टर नहीं कर पा रहे हैं क्यूंकि अब डॉक्टर को क्रोना वायरस वाले मरीजों को ही बचाना है.. क्यूंकि अब अस्पताल में सभी के लिए जगह नहीं बची है

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भाग 3

स्टेज चतुर्थ (चौथा चरण) आगे बढ़ता है:

अब लोग मर रहे हैं क्यूंकि अस्पतालों और ICU में जगह नहीं है.. मेरे एक डॉक्टर दोस्त ने मुझे कॉल कर के बताया कि उसने तीन लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया क्यूंकि जगह नहीं थी.. नर्स रो रही हैं क्यूंकि वो मरते हुवे लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकती हैं सिवाए उन्हें ऑक्सीजन देने के

मेरे एक दोस्त का रिश्तेदार कल मर गया क्यूंकि उसका इलाज नहीं हो पाया.. अब क्रोना वायरस हर तरफ़ पूरी तरह से फैल चुका है

फिर आता है..

स्टेज पांच (पाँचवाँ चरण):

याद कीजिये उन बेवकूफों को जिन्हें सरकार ने शुरुवात इटली के कुछ राज्यों में रोक के रखा था, क्वारंटाइन किया था मगर वो अपने अपने घर वापस चले आये थे? उन्हीं की वजह से अब सारी इटली को मार्च 9 को क्वारंटाइन कर दिया गया

अब सरकार का एक ही लक्ष्य है कि कैसे इसे ज्यादा से ज्यादा फैलने से रोका जाय

लोगों को अपने काम पर जाने दिया जा रहा है.. ज़रूरी सामान की खरीदारी करने दी जा रही है.. व्यापार सारे खोल के रखे गए हैं.. क्यूंकि अगर ऐसा न किया तो सारी इकॉनमी धराशायी हो जायेगी.. मगर अभी भी आप अपने इलाक़े से बाहर नहीं जा सकते हैं जब तक आपके पास उसके लिए कोई बहुत ज़रूरी वजह न हो

मगर अभी भी एक समस्या बनी हुई है.. क्यूंकि कुछ लोग समझते हैं कि उन्हें कुछ नहीं होगा.. वो अभी भी दोस्तों के साथ बाहर जा रहे हैं… घूम रहे हैं ग्रुप में.. शराब पी रहे हैं और ऐश कर रहे हैं

फिर आता है..

स्टेज छः (छठां चरण):

 

दो दिन पहले ये घोषणा कर दी गयी कि अब सारे व्यापार, शौपिंग माल, रेस्टोरेंट, बार और हर तरह की दुकाने बंद रहेंगी.. सिर्फ़ सुपर मार्केट और दवाखाने के अलावा.. और अब आप सिर्फ़ तभी अपने इलाके से कहीं बाहर जा सकते हैं अगर आपके पास उसकी कोई बहुत बड़ी वजह है और उसके लिए आपके पास एक सर्टिफिकेट होना चाहिए

उस सर्टिफिकेट में आपके बारे में सारी जानकारी होती है.. जिसमे आपका नाम, पता और आप कहाँ से आ रहे हैं और कहाँ जा रहे हैं ये लिखा होता है

जगह जगह पुलिस के चेक पॉइंट बने हैं जहाँ आपको चेक किया जाता है

इटली में अगर अब आप अपने घर से बाहर अब पकडे जाते हैं तो आपके ऊपर 206 पौंड का जुर्माना लगाया जाता है.. अगर आप बहार निकलते हैं और आप क्रोना वायरस से संक्रमित हैं तो आपको एक से लेकर बारह साल की जेल होगी

आख़िरी सन्देश:

ये मैं १२ मार्च को लिख रहा हूं और इस वक़्त तक के ये हालात है जो मैंने ऊपर बताया.. इसका ध्यान रखिये कि ये सब बस हमारे यहाँ दो हफ्ते के अंदर हो गया.. सिर्फ़ पांच दिन लगे स्टेज तीन से आज तक के दिन तक आने में हमे

दुनिया के दूसरे देश अभी धीरे धीरे उन चरणों में पहुँच रहे हैं जिनसे हम गुज़र चुके हैं.. इसलिए मुझे आप लोगों से ये कहना है कि “आपको कोई अंदाज़ा नहीं है कि आप के साथ क्या होने वाला है”

क्यूंकि दो हफ्ते पहले मैं आपके ही जैसा सोचता था और मुझे लगता था कि हमे कुछ नहीं होगा.. और ये सब इस वजह से नहीं हो रहा है कि ये वायरस बहुत खतरनाक है.. बल्कि ये सब इस वजह से हो रहा है कि ये वायरस ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देता है जिसका सामना करने में हम सक्षम नहीं हैं

ये देख कर बहुत दुःख हो रहा है क्यूंकि कुछ देश ये सोच रहे हैं कि उनको कुछ नहीं होगा.. और वो इसके लिए ज़रूरी बचाव नहीं कर रहे हैं.. जबकि वो समय रहते अगर बचाव कर लें तो बहुत फायदा होगा

इसलिए.. कृपया अगर आप इसको पढ़ रहे हैं तो सजग हो जाईये.. क्यूंकि इसको इग्नोर करने पर इस समस्या का हल नहीं निकलेगा.. अमेरिका जैसे देशों में ऐसे कितने लोग होंगे जो संक्रमित होंगे और उनका पता नहीं चल पाया होगा

हमारी इटली की सरकार ने इस बारे में बहुत अच्छा काम किया.. और वो ये किया कि उन्होंने पूरी कोशिश की अब इस वायरस को जहाँ भी हो रोक दिया जाए.. उसके लिए उन्हें बहुत कठोर क़दम उठाये मगर वो सही थे.. चाइना ने भी इस तरह से इस पर क़ाबू पाया था… सारे इलाके बंद कर के लोगों को घरों में क़ैद कर दिया था

सरकार लोगों की मदद कर रही है.. उनके बैंक की किश्त माफ़ करके और लोगों के व्यापार में मदद कर के.. मुझे ये चीज़ परेशान कर रही है कि अगर ये सारे देशों में हो गया तो क्या होगा

इसलिए अगर आप ऐसे इलाक़े में हैं जहाँ आपके आसपास क्रोना वायरस से संक्रमित मरीज़ हैं.. तो आप बस एक या दो हफ्ते हम से पीछे हैं.. और आप हमारी सारी बातों को धीरे धीरे समझेंगे.. इसलिए मेरी आप लोगों से यही गुजारिश हैं कि आप अपना बचाव ख़ुद करें.. और ऐसा व्यवहार मत कीजिये कि आपको कुछ नहीं होगा.. इसलिए अगर आप रह सकते हैं तो “घरों में ही बंद रहिये”

( @JasonYanowitz के twitter अकाउंट की मैसेज श्रंखला से अनुवादित )

अनुवाद – ताबिश सिद्दीकी

(प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी की एफबी टाइमलाइन से साभार – With courtesy from Jagdishwar Chaturvedi’s FB timeline)