महाश्वेता देवी के शब्दों में “आंदोलन” यानी चितरंजन सिंह आज आपातकाल की बरसी पर हम सबको छोड़कर चले गए

Chitranjan Singh

क्यों जी कहां हो क्या हो रहा है कहने वाले चितरंजन जी नहीं रहे महाश्वेता देवी के शब्दों में “आंदोलन” यानी चितरंजन सिंह आज आपातकाल की बरसी पर हम सबको छोड़कर चले गए. मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकार आंदोलन से जुड़े तो यूपी के किसी जिले में शुरुआती दौर में किसी प्रशासनिक या पत्रकारिता से जुड़े शख्श से

वो चितरंजन सिंह बीमार हैं जिन्हें देखकर महसूस किया कि जनसंघर्ष की आग में कैसे इस्पात ढलता है

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पलाश विश्वास मन बहुत दुःखी है। कोलकाता में इंडियन एक्सप्रेस की नौकरी के दिनों हम देश के किसी भी कोने में जब तब पहुंच जाते थे। अब कोरोना काल में पांव में बेड़ियां पड़ी हुई हैं। मेरे पिता पुलिन बाबू की बात अलग थी। वे कभी भी खाली जेब देश विदेश कहीं नकल सकते थे।