भाजपा के पक्ष में ही जा रहा है राम मंदिर निर्माण में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी

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The issue of corruption in the construction of the Ram temple is also going in favour of the BJP.

विपक्ष को ही नहीं हर सेकुलर व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि जब हम भाजपा समर्थकों को अंधभक्ति की संज्ञा देते हैं तो किसी भी तरह के आरोप का उन पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। आज की तारीख में न ही विपक्ष के आरोपों को कोई जिम्मेदार तंत्र गंभीरता से ले रहा है। मोदी सरकार की गलत नीति के चलते बेरोजगार होने, कोरोना महामारी में सरकार की विफलता के चलते अपनों के खोने, पेट्रो पदार्थों की बेहताशा वृद्धि, गैस सिलेंडर की सब्सिडी बिना बताये खत्म करने के बावजूद जो लोग मोदी और योगी सरकार के खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं, उनके लिए कोई आरोप बेकार है। राम मंदिर निर्माण मामले में तो वे कुछ सुनने को तैयार नहीं।

विपक्ष यह भूल रहा है कि भक्तों की नजरों में राम मंदिर निर्माण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निगरानी में हो रहा है और ये लोग मोदी और योगी को अपनी भगवान समझते हैं।

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कराते हुए सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए विवादित जमीन को दिलाने का आदेश नहीं दिलाया है ? क्या मोदी के हस्तक्षेप क चलते तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा में नहीं भेजा गया है ? भक्तों को बस अयोध्या में राम मंदिर चाहिए। इसके लिए वे करोड़ों नहीं बल्कि अरबों का भ्रष्टाचार भी झेलने को तैयार हैं।

संजय सिंह जिन लोगों के चंदे में भ्रष्टाचार होने पर मुखर हुए, उन्हें लोगों ने उनके आवास पर हमला कर दिया।

राम मंदिर निर्माण मामले में भाजपा, आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद यह कहते-कहते नहीं थकते थे कि मंदिर निर्माण की सभी सामग्री तैयार है। राजस्थान से मिट्टी लाकर मंदिर के पिलर बना दिये गये हैं। बस उठा-उठाकर लगाने हैं।

विपक्ष यह समझने को तैयार नहीं कि जिस देश में लाखों बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं, जिस देश में राज लाखों लोग भूखे मर जाते हैं, जिस देश में कोरोना महामारी में इलाज के अभाव में लोगों ने दम तोड़ दिया उसी देश में राम मंदिर निर्माण के लिए 19 दिन में 2100 करोड़ रुपये इकट्ठे हुए हैं। मतलब चंदा इकट्ठा करना था 1100 करोड़ और इकट्ठा हो गया 2100 करोड़। यह तो तब है जब चंदा इकट्ठा करने में भी कितने घोटाले हुए। मतलब राम मंदिर निर्माण मामले में मंदिर समर्थक कोई भी भ्रष्टाचार सुनने को तैयार नहीं। यदि ऐसे घोटाले नहीं होंगे तो कहां से आरएसएस का खर्चा चलेगा ?  कहां से विहिप का और कहां से दूसरे हिन्दू संगठन तैयार होंगे ? यह सब चंदे का ही तो खेल है।

क्या यह खेल अकेले चंपत राय ने किया होगा ? Would Champat Rai have done this game alone?

चंदे में से ऐेसे ही तो दूसरे मदों के लिए पैसे बचाये जाते हैं।

राम मंदिर निर्माण में जमीन घोटाले पर विपक्ष अपना समय बर्बाद कर रहा है। विपक्ष खुद ही उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को सुलगा दे रहा है। भाजपा यही तो चाहती है कि अगले साल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत कई राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राम मंदिर निर्माण का मुद्दा अपना असली स्वरूप प्राप्त कर ले। भाजपा को उत्तर प्रदेश ही नहीं 2024 का लोकसभा चुनाव भी राम मंदिर निर्माण के नाम पर जीतना है।

विपक्ष यह भी समझ ले कि राम मंदिर निर्माण में आरएसएस और भाजपा की रणनीति इस स्तर की है कि यदि जमीनी घोटाले में भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध भी हो जाए तो वे चंदा देने वाले लोगों को ही ट्रस्ट के पक्ष में खड़ा कर देंगे।

Isn’t corruption the first time in Ram temple construction case?

विपक्ष यह समझने को तैयार नहीं कि राम मंदिर निर्माण मामले में पहली बार भ्रष्टाचार नहीं हुआ है ? जब से भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाया है तब से चंदा तो ही इकट्ठा किया है। क्या किसी ने कोई हिसाब मांगा ?  भाजपा के समर्थक तो चंदा देते ही इसलिए हैं कि वे हिन्दुत्व को आगे बढ़ा रहे हैं।

जमीनी हकीकत तो यह है कि देश में राम नाम का शब्द आस्था नहीं राजनीतिक शब्द बनकर रह गया है। जहां भाजपा ने राम मंदिर निर्माण के नाम पर सत्ता हासिल की वहीं अब विपक्ष राम मंदिर निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए माहौल बनाने में लगा है। जहां कभी लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए रथयात्रा निकालकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया था वहीं अब आम आदमी पार्टी राम मंदिर निर्माण में घोटाले के नाम पर उत्तर  प्रदेश में जमीन तलाशने में लग गई है तो वहीं कांग्रेस खोई हुई जमीन को पाने में।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी प्रियंका गांधी ने ट्रस्ट के लोगों को प्रधानमंत्री का करीबी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले की जांच कराने की मांग की है। मौजूदा हालात में विपक्ष को चाहिए वह राम मंदिर निर्माण मामले में बस चुप ही रहे। उसे बस यह समझ लेना चाहिए कि जहां राम और राम मंदिर का नाम आएगा वहां उसका फायदा भाजपा को मिलेगा। 

जमीनी हकीकत तो यह है कि राम नीति में न तो कभी भाजपा की आस्था रही है न ही राम मंदिर निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वालों की। राम नाम पर तो बस सत्ता हासिल करने का हथियार बनकर रह गया है।

राम मंदिर निर्माण में आरोप है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 10 मिनट पहले खरीदी गयी दो करोड़ की जमीन का रजिस्टर्ड एग्रीमेंट 18. 5 करोड़ रुपये से करा लिया। अरे भाई क्या ये पैसे ये लोग अपनी जमीन बेचकर लाये हैं ? राम भक्तों ने दिया और ये उड़ा रहे हैं। इनके अपने भी तो खर्चे हैं। अरे भाई राम मंदिर निर्माण के लिए 2100 करोड़ का चंदा तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश देने बाद आया है। इससे पहले जमा किये गये चंदे का तो कोई हिसाब ही नहीं। कितना घोटाला करेंगे। लोग तो और चंदा देने को तैयार हैं। बस भगवान राम का मंदिर बन जाए। क्यों समय बर्बाद कर रहे हो। रोजी-रोटी और महंगाई का मुद्दा उठाओ। उनका पैसा, उनके लोग। मंदिर भी वे अपना ही मानते हैं। जब मुद्दा उठाने में सियासत है तभी तो टीवी चैनलों पर एंकर चंदे की रसीद मांग ले रहे हैं।

जमीनी हकीकत यह है कि आज की तारीख में हर राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करना चाहता है। जमीनी मुद्दों पर कोई काम करने को तैयार नहीं। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी पार्टी सपा क्या कर रही है ? बसपा क्या कर ही है ? बस हर कोई दल भावनात्मक मुद्दे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहता है।

क्या किसी सांसद या विधायक ने सांसदों या विधायकों को मिलने वाली सुविधाओं और पेंशन को मुद्दा बनाया है ? क्या किसी जनप्रतिनिधि ने सांसदों और विधायकों की होने वाली वेतनवृद्धि के खिलाफ आवाज उठाई है ? क्या किसी सांसद और विधायक ने जनप्रतिनिधियों के साथ ही संसद और विधानसभा में होने वाली फिजूलखर्ची को मुद्दा बनाया है ? नहीं न। सभी राजनीतिक दलों को सत्ता दे दो।

आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल या नेता जनता की पीड़ा को समझने को तैयार है। विपक्ष तो पूरे देश में नाकारा है। लोग व्यक्तिगत स्तर पर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

चरण सिंह राजपूत

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
CHARAN SINGH RAJPUT, CHARAN SINGH RAJPUT, चरण सिंह राजपूत, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

डॉ. राम पुनियानी से जानिए कहाँ जन्मे थे भगवान राम

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

Learn from Dr. Ram Puniyani where Lord Ram was born

आगामी पांच अगस्त को उस स्थान पर राम मंदिर का निर्माण (Construction of ram temple) शुरू किया जाना प्रस्तावित है जहाँ एक समय बाबरी मस्जिद हुआ करती थी. इसी बीच, इस मुद्दे पर दो विवाद उठ खड़े हुए हैं. पहला यह कि कुछ बौद्ध संगठनों ने दावा किया है कि मंदिर के निर्माण के लिए ज़मीन का समतलीकरण किये जाने के दौरान वहां एक बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं, जिससे ऐसा लगता है उस स्थल पर मूलतः कोई बौद्ध इमारत (Buddhist building) थी. दूसरे, नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली (Prime Minister of Nepal K.P. Sharma Oli) ने दावा किया है कि वह अयोध्या, जिसमें राम जन्मे थे, दरअसल, नेपाल के बीरगंज जिले में है. यह कहना मुश्किल है कि ओली ने इसी मौके पर यह मुद्दा क्यों उठाया. उनके इस दावे की उन्हीं के देश में जम कर आलोचना हुई जिसके बाद उनके कार्यालय ने एक स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री का इरादा किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का नहीं था.

This is not the first controversy about Ramkatha.

रामकथा को लेकर यह पहला विवाद नहीं है. सन 1980 के दशक में जब महाराष्ट्र सरकार ने बी.आर. आंबेडकर के वांग्मय का प्रकाशन शुरू किया था उस समय भी उनकी पुस्तक ‘रिडल्स ऑफ़ राम एंड कृष्ण’ (Ambedkar’s book “Riddles of Rama and Krishna “) को इस संग्रह में शामिल किये जाने का भारी विरोध हुआ था. इस पुस्तक में आंबेडकर ने शम्बूक नामक शूद्र की तपस्या करने के लिए हत्या करने, जनप्रिय राजा बाली को धोखे से मारने और अपनी गर्भवती पत्नी सीता को त्यागने के लिए भगवान राम की आलोचना (Lord Ram criticized in Ambedkar’s book) की है. इसके अलावा, सीता को अग्निपरीक्षा देने के लिए मजबूर करने के लिए भी आंबेडकर राम की निंदा करते हैं.

आंबेडकर के पहले जोतीराव फुले ने राम द्वारा छुप कर बाली को बाण मारने की निंदा की थी. बाली एक स्थानीय राजा था, जो अपने प्रजाजनों का बहुत ख्याल रखता था और उनमें बहुत लोकप्रिय था.

पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर ने भगवान राम के व्यक्तित्व के इन पक्षों पर केन्द्रित ‘सच्ची रामायण’ लिखी थी. रामकथा के प्रचलित संस्करण के पात्र जिस तरह का लैंगिक और जातिगत भेदभाव करते दिखते हैं, पेरियार उसके कटु आलोचक थे. पेरियार तमिल अस्मिता के पैरोकार थे. उनके अनुसार, रामायण की कहानी ऊंची जातियों के संस्कृतनिष्ठ, जातिवादी उत्तर भारतीयों द्वारा राम के नेतृत्व में दक्षिण भारत के लोगों पर अपने आधिपत्य स्थापित करने के ऐतिहासिक घटनाक्रम का रूपक मात्र है.

पेरियार के अनुसार, रावण, प्राचीन द्रविड़ों के सम्राट थे और उन्होंने सीता का अपहरण केवल अपनी बहन शूर्पनखा के अपमान और उसके विकृत किये जाने का बदला लेने के लिए किया था. पेरियार के अनुसार, रावण एक महान भक्त और एक नेक और धर्मात्मा व्यक्ति थे.

बाबरी मस्जिद के ध्वंस (The demolition of Babri Masjid) के बाद सन 1993 में सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) द्वारा पुणे में लगाई गई एक प्रदर्शनी में तोड़-फोड़ की गई थी. वह इसलिए क्योंकि वहां बौद्ध जातक कथा पर आधारित एक पेंटिंग प्रदर्शित की गई थी, जिसमें सीता को राम की बहन बताया गया था. इस कथा के अनुसार, राम और सीता उच्च जाति के एक ऐसे कुल से थे जिसके सदस्य अपनी पवित्रता बनाये रखने के लिए अपने कुल से बाहर शादी नहीं करते थे.

कुछ वर्ष पूर्व, आरएसएस की विद्यार्थी शाखा एबीवीपी ने ए.के. रामानुजन के लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायणास’ को पाठ्यक्रम से हटाने की मांग को लेकर आन्दोलन किया था. इस लेख में रामानुजन बताते हैं कि रामायण के कई संस्करण हैं जिनमें अनेक विभिन्नताएं हैं और जिनमें घटनाओं का स्थान अलग-अलग बताया गया है.

संस्कृत के विद्वान और भारत में पुरातत्वीय उत्खनन के अगुआ एच.डी. सांकलिया के अनुसार यह हो सकता है कि रामायण में वर्णित अयोध्या और लंका, आज की अयोध्या और लंका से अलग कोई स्थान रहे हों. उनके अनुसार, लंका शायद आज के मध्यप्रदेश में कोई स्थान रहा होगा क्योंकि इस बात की प्रबल संभावना है कि ऋषि वाल्मीकि, विंध्य पर्वतमाला के दक्षिण में स्थित इलाके के बारे में कुछ नहीं जानते होंगे. आज जिसे श्रीलंका कहा जाता है, उसका पुराना नाम ताम्रपर्णी था.

रामायण के अलग-अलग आख्यान भारत ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाते हैं और इनमें से कई बहुत दिलचस्प हैं. पौला रिचमन की पुस्तक ‘मेनी रामायणास’ (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) में भगवान राम की विभिन्न कथाओं की दिलचस्प झलकियाँ दी गयीं हैं.

भारत में राम कथा का जो संस्करण आज सबसे अधिक प्रचलित है वह वाल्मीकि की ‘रामायण’, गोस्वामी तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ और रामानंद सागर के टीवी सीरियल ‘रामायण’ पर आधारित है. इस सीरियल का कोरोना लॉकडाउन के दौरान पुनर्प्रसारण किया गया. राम के कथा का अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है जिनमें बाली, संथाली, तमिल, तिब्बती और पाली शामिल हैं. पश्चिमी भाषाओं में इसके अनेकानेक संस्करण हैं, जिनकी कथाएँ एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं.

थाईलैंड में प्रचलित रामकीर्ति या रामकियेन संस्करण में भारतीय संस्करण के विपरीत, हनुमान ब्रह्मचारी नहीं हैं. रामायण के जैन और बौद्ध संस्करणों में राम, क्रमशः महावीर और गौतम बुद्ध के अनुयायी हैं. इन दोनों संस्करणों में रावण को एक विद्वान और महान ऋषि बताया गया है.

कुछ संस्करणों, जो विदेशों में लोकप्रिय हैं, में सीता को रावण की पुत्री बताया गया है. मलयालम कवि वायलार रामवर्मा की कविता ‘रावणपुत्री’ भी यही कहती है. कई संस्करणों के अनुसार, दशरथ अयोध्या के नहीं वरन वाराणसी के राजा थे.

फिर, रामायण के एक वह संस्करण भी है जो महिलाओं में प्रचलित है’. तेलुगू ब्राह्मण महिलाओं द्वारा जो ‘महिला रामायण गीत’ गाए जाते हैं, उन्हें रंगनायकम्मा ने संकलित किया है. इनमें महिलाओं की केन्द्रीय भूमिका है. इन गीतों में बताया गया है कि अंत में सीता राम पर भारी पड़तीं हैं और शूर्पनखा राम से बदला लेने में सफल रहती है.

इन आख्यानों की समृद्ध विविधता से पता चलता है कि भगवान राम की कथा दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी लोकप्रिय है और इसके कई रूप हैं. राममंदिर आन्दोलन पूरी तरह से रामकथा के उस आख्यान पर केन्द्रित है जिसे वाल्मीकि, तुलसीदास और रामानंद सागर ने प्रस्तुत किया है. उन तीनों में भी कुछ मामूली अंतर हैं, विशेषकर लैंगिक और जातिगत समीकरणों के सन्दर्भ में.

वर्तमान में भारत में प्रचलित आख्यान, लैंगिक और जातिगत पदक्रम के पैरोकार हैं. और यही पदक्रम, सांप्रदायिक राजनीति के मूल में भी हैं. रामकथा के इस संस्करण के जुनूनी समर्थक पैदा कर दिए गए हैं. वे इस कथा के हर उस संस्करण, हर उस व्याख्या पर हमलावर हैं, जो सांप्रदायिक राजनीति के हितों से मेल नहीं खाते.

रामायण पर विद्वतापूर्ण रचनाएं (Scholarly works on Ramayana), तत्कालीन समाज में व्याप्त मूल्यों और परम्पराओं में विविधता को रेखांकित करतीं हैं. हर राष्ट्रवाद, अतीत का अपना संस्करण रचता है.

राष्ट्रवाद पर एरिक हॉब्सबाम की प्रसिद्ध उक्ति | Eric J. Hobsbawm’s famous statement on nationalism

एरिक होब्स्वाम के अनुसार, “राष्ट्रवाद के लिए इतिहास वह है जो अफीमची के लिए अफीम”. ऐसा लगता है कि विभिन्न प्रकार के राष्ट्रवाद, इतिहास की नहीं वरन पौराणिकी के भी वही संस्करण चुनते हैं जिनसे उनके निहित स्वार्थों की पूर्ति होती हो.

डॉ. राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

मेहनतकशों के नरसंहार का महिमामंडन कर रहा है सम्पन्न नवधनाढ्य तबका

How many countries will settle in one country

The rich middle class is glorifying the massacre of working people

अमेरिका में एक लाख से ज्यादा लोगों की कोरोना से मृत्यु हो गई है। चार करोड़ लोग बेरोज़गार हो गए हैं, लेकिन सम्पन्न ट्रम्प समर्थकों के लिए यह मृत्यु पर्व महोत्सव बन गया है।

डॉ पार्थ बनर्जी, जो रोजनामचा लिख रहे हैं, उसमें मज़दूरों, अश्वेतों और गरीबों के इस नरसंहार का सिलसिलेवार ब्यौरा है।

भारत में भी अमेरिका जैसे हालात हैं। मेहनतकशों के नरसंहार का महिमामंडन कर रहा है सम्पन्न नवधनाढ्य तबका और बुद्धिजीवी अब भी खामोश हैं।

आम जनता में अंध राष्ट्रवाद, धर्म और जाति का असर इतना ज्यादा है कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।

कोरोना बहुत तेज़ी से फैल रहा है। दो महीने तक कोरोना इलाकों में कैद रखने के बाद उन्हें घर वापस भेज जा रहा है। बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश की बात छोड़ें, उत्तराखण्ड के ऊंचे पहाड़ों में भी तेजी से फैलने लगा है कोरोना। यह योजनाबद्ध नरसंहार के अलावा और क्या है?

कोरोना से निपटने का ट्रम्प की तरह नीरो का भी कोई इरादा नहीं है। उनकी वंशी की धुन में मग्न हैं बलि के लिए चुने गए लोग। जो आज भी दैत्य, दांव, असुर, किन्नर, राक्षस, वानर माने जाते हैं और जिनकी हत्या धर्म यानी मनुस्मृति के मुताबिक अनिवार्य है।

कल अयोध्या में बात हुई। विवादित स्थान पर बुद्ध प्रतिमा मिलने के बावजूद कहीं कोई सुनवाई नहीं है।

जो लोग सन्तों पर हमले को लेकर मुसलमानों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं, वे लोग पुष्यमित्र के समय पूरे भारत में और बल्लाल सेन के समय बंगाल में बौद्धों पर हुए हमलों की तरह खामोशी का कफ़न ओढ़े हुए हैं।

लॉकडाउन और कर्फ्यू के बावजूद राममंदिर का निर्माण हो गया है।

कश्मीरी जनता और आदिवासी भूगोल के दमन का समर्थन करने वाले योगों को अहसास ही नहीं है कि उनके भाग्य विधाता पूरे देश को कश्मीर और आदिवासी भूगोल बनाने पर तुले हैं।

कोरोना फैलाकर देश को 188 के तहत अनिश्चतकालीन आपातकाल के अंधेरे में धकेला जा रहा है ताकि देश को अमेरिका बनाया जा सके।

आर्थिक सुधारों का सुपर साइक्लोन आया हुआ है, जिससे बचनी की कहीं कोई राह नहीं है।

श्रम कानून खत्म हैं।

नागरिकता खत्म है।

मानवाधिकार खत्म हैं।

कानून का राज खत्म है।

संविधान खत्म है।
देश की सम्पत्ति, संसाधन अमेरिका और विदेशी कम्पनियों और उनके दलालों के हवाले किया जा रहा है।

यह राजकाज ईस्ट इंडिया कम्पनी की विदेशी हुक़ूमत को भी शर्मिंदा कर देगा।

आज कोलकाता में मशहूर साहित्यकार कपिल कृष्ण ठाकुर से बातचीत हुई। सुंदरवन इलाके में एक भी द्वीप सही सलामत नहीं है।

पूरे बंगाल में एक भी गांव सही सलामत नहीं है।

न पेड़ बचे हैं और न कच्चे मकान और न खेत और खेतों पर खड़ी फसल।

कोलकाता में सिर्फ पेड़ गिरे हैं, सिर्फ तेज़ आंधी पानी का सदमा लगा है। मीडिया वही दिखा रहा है।

बाकी बंगाल की किसी को कोई परवाह नही है।

गांवों में किसान आबादी दलित और मुसलमान हैं। उनके मरने जीने की किसी को परवाह नहीं है।

गांव खेत समुंदर के पानी में डूबे हैं, वहां राहत के नाम पर पूरे परिवार के लिए दिन में एकबार दो सौ ग्राम चूड़ा।

कोरोना काल में राहत की परिभाषा यही है।

हमने बंगाल में दूसरे लोगों से भी बात की है। हर कहीं तबाही और मौत का मंजर है।

ऐसे में भी लोग तमाशबीन बने हुए हैं।

डॉ पार्थ बनर्जी ने लिखा है

Just think — 100,000 — America’s Coronavirus deaths in only 2 months. Yes, 100,000 people died here in USA. But millions of Americans have celebrated this Memorial Day weekend with crowded beach parties, pool parties, and other gatherings. They call it “fun.”

They also call themselves patriotic, and this is their way to celebrate such a sacred, patriotic day! In my book, this is not just flouting science and common sense. This is pure hypocrisy. God forbid, this country will see a huge surge in COVID-19 deaths, soon. And we’re all going to be put in renewed danger — because of the stupidity.