स्वास्थ्य सेवाएं : खुद बीमार सरकार कोई साहूकार नहीं है जो हर काम व्यावसायिक लाभ के लिये ही करे

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स्वास्थ्य सेवाएं – क्या हम सच मे एक लोक कल्याणकारी राज्य हैं ?

 Health Services – Are We Really A Public Welfare State?

हमारा संविधान हमें एक लोक कल्याणकारी राज्य का दर्जा देता है। लोक कल्याणकारी राज्य का अर्थ (Meaning of public welfare state) समाज के हर तबके को उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति और उसके सम्यक विकास हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी, रोटी, आवास की सुविधा प्रदान करना और एक ऐसे समाज तथा परिवेश का निर्माण करना, जो न केवल विचारों से प्रगतिशील हो बल्कि वह आर्थिक दृष्टि से भी उन्नतिकामी हो। पर हमारी सरकार अपने बजट का जितना स्वास्थ्य और चिकित्सा पर व्यय करती है वह दुनिया मे चौथे नम्बर पर सबसे कम है। यानी नीचे से हम चौथे नम्बर पर हैं।

हर साल हमारी सरकार चुनाव में शहर-शहर एम्स जैसे उन्नत और आधुनिक अस्पताल का वादा तो करती है पर वह वादा पूरा नहीं होता है तब तक नया चुनाव आ जाता है। अब नया चुनाव तो नया वादा।

अब सवाल उठता है कि क्या बजट 2020-21 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किया गया आवंटन काफी है?

वित्तमंत्री ने 2020-21 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट (Allocation made for health sector in budget 2020-21) में 10 फीसदी की वृद्धि ज़रूर की है, लेकिन तब भी विशेषज्ञों ने इस वृद्धि पर सवाल उठाया था और अब जब कोरोना के कारण हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा चरमरा रहा है, तब भी सवाल उठा रहे हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वस्थ्य मिशन (एनआरएचएम) को इस साल बजट में मिला फंड पिछले साल के बजट के बराबर तो है पर अगर हम पिछले साल किये गए आवंटन के रिवाइज हुए आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि आवंटन कम ही हुए हैं।

आंकड़े एक खूबसूरत तिलिस्म की तरह होते हैं, सच जानने के लिये उन्हें तोड़ना पड़ता है।

 एनआरएचएम को पिछले साल बजट में 27,039 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। हालांकि नए आंकड़े बताते हैं कि असल में आवंटन इससे कुछ ज्यादा था। यह 27,833.60 करोड़ रुपए था। लेकिन इस साल का आवंटन पिछले साल के बजट में किये गए 27039.00 करोड़ रुपए के आवंटन के बराबर है।

विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा पन्द्रवें वित्त कमीशन को सौंपी गयी एक रिपोर्ट समेत कई अन्य रिपोर्ट्स ने यह बताया है कि ग्रामीण आबादी को उपचार मुहैया कराने वाली प्राथमिक चिकित्सा में ज्यादा फंडिंग की जरुरत है।

एनएचआरएम ग्रामीण स्वास्थ्य की एक धुरी है | NHRM is an axis of rural health

एनएचआरएम का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि, ग्रामीण स्वास्थ्य की यह एक धुरी है। समस्या, अपोलो, मैक्स, मेदांता में इलाज कराने वाले तबके के सामने नहीं है, समस्या उस तबके के सामने है जो कंधे, चारपाई और साइकिल पर कई किलोमीटर दूर से मरीज लेकर सरकारी अस्पतालों में पहुंचता है और फिर वहां सुविधाओं और डॉक्टरों के अभाव में धक्के खाता है।

 इस साल बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र का कुल 69,000 करोड़ रुपये का है जो, पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी बढा हुआ है। अब अगर इसको मुद्रास्फीति दर के समानुपातिक लायें तो, दिसंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सालाना आधार पर मुद्रास्फीति दर (इंफ्लेशन रेट) 7.5% ठहरता है।

भारतीय स्वास्थ्य संगठन के सचिव अशोक केवी ने मीडिया को बताया कि,

“बढ़े हुए आवंटन में से आधे से ज्यादा महंगाई दर को रोकने में ही चला जाएगा। इससे सरकार को क्या हासिल होगा। हम किसी भी तरीके से स्वास्थ्य को जीडीपी का 2.5 फीसदी आवंटन करने के 2011 के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएंगे।”

2011 में सरकार ने कहा था कि स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 2.5 % होना चाहिए, पर यह हो न सका। अब तो फिलहाल जीडीपी की बात ही न की जाय क्योंकि वह माइनस 23.9% पर है।

वित्त मंत्री ने पीपीपी मोड पर जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों से जोड़ने के नीति आयोग के प्रस्ताव पर भी मुहर लगाई। देश की सबसे बड़ी समस्या देश का नीति आयोग है जो हर योजना में पीपीपी का मॉडल घुसेड़ देता है जो सीधे-सीधे निजीकरण की एक साजिश है। सरकार ने अभी इस स्कीम की डिटेल्स तय नहीं की है। जब विस्तृत शर्ते सामने आ जायें तभी कुछ इस बिंदु पर कहा जा सकता है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने यह पहले ही साफ कर दिया है कि वे इस पीपीपी स्कीम को लागू नहीं करेंगे। आयोग का कहना है कि कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों ने कई टुकड़ों में पीपीपी मॉडल को लागू किया है। लेकिन उसके कोई बेहतर परिणाम नहीं निकले हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे आप यह अंदाजा लगा सकें कि इन राज्यों का यह प्रयास सफल रहा है, क्योंकि इन राज्यों के बाद कहीं और इस स्कीम को लागू नहीं किया गया। साथ ही अगर निजी मेडिकल कॉलेजों को जिला अस्पतालों से जोड़कर डॉक्टरों की कमी पर ध्यान लाने की कोशिश की जा रही है, तो यह संभव नहीं है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने इस कदम का विरोध किया है और इसे, ‘घर का सोना बेचने’ जैसा बताया है।

 अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने कहा था कि विदेश में हमारे स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी डिमांड है, लेकिन उनकी स्किल (योग्यता) वहां की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं। उन्होंने कहा ‘मेरा प्रस्ताव है कि स्वास्थ्य मंत्रालय और कौशल विकास मंत्रालय पेशेवर संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसे कोर्स डिजायन करें, जिससे हमारे स्वास्थ्य कर्मियों की क्षमताएं बढ़ सकें।’

 हालांकि विशेषज्ञों को ऐसे कोर्सेज की जरूरत नहीं लगती है। डाउन टू अर्थ नामक एक एनजीओ के अनुसार,

“हमारे यहां डॉक्टरों की कमी है। किसी भी सरकार को सबसे पहले भारतीय टैलेंट को यहीं बनाए रखने और उसे जरूरी संसाधन मुहैया कराने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर जनता का पैसा ठीक इसका उलटा करने में क्यों ज़ाया किया जाए।”

 संक्रामक रोगों के प्रति आवंटन को पिछले साल के 5003 करोड़ रुपये से घटाकर 4459.35 रुपये कर दिया गया है। पिछले साल प्रकाशित हुई नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट (National sample survey organization report) में कहा गया था कि सभी बीमारियों में से संक्रामक रोग भारतीयों को सबसे ज्यादा बीमार बनाते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा इस मद में आवंटन घटाने की बात समझ नहीं आती है। इन इन्फेक्शंस में मलेरिया, वायरल हेपेटाइटिस/पीलिया, गंभीर डायरिया/पेचिश, डेंगू बुखार, चिकिनगुनिया, मीसल्स, टायफॉयड, हुकवर्म इन्फेक्शन फाइलारियासिस, टीबी व अन्य शामिल हैं।

विडंबना देखिये हम इस साल अब तक के सबसे जटिल और लाइलाज संक्रामक रोग, कोरोना-19 से रूबरू हो रहे हैं। इस संदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है, किसी से छुपा नहीं है।

Government Health Insurance Schemes in India

 एक योजना जिसके आवंटन में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है, वह है राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (National Health Insurance Scheme in India)। पिछले साल इस योजना को 156 करोड़ रुपये मिले थे, इस साल यह सिर्फ 29 करोड़ रह गए। आयुष्मान भारत के आवंटन में भी कोई वृद्धि नहीं की गयी है, यह भी तब जब इस योजना को बड़े धूमधाम से प्रधानमंत्री जी ने प्रचारित किया था। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक संस्थान (Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI),) को मिलने वाले फंड को भी 360.00 करोड़ रुपये से कम करके 283.71 करोड़ रुपये कर दिया गया है। जन औषधि केंद्रों (Jan Aushadhi Center (Kendra,) का सभी जिलों तक विस्तार देने की बात कही गयी है। राज्य सभा में जून, 2019 में दी गई एक जानकारी के अनुसार, यह केंद्र खोलने के लिए केवल 48 जिले ही बाकी रह गए हैं।

सरकार हर योजना में पीपीपी मॉडल लाकर उनका निजीकरण करने की सोचती है। निजी क्षेत्रों में अस्पताल हैं और उनमे से कुछ बेहद अच्छे भी हैं। ऐसे अस्पतालों को सरकार रियायती दर पर ज़मीन देती है पर ये अस्पताल गरीब वर्ग की चिकित्सा में रुचि नहीं दिखाते हैं। हालांकि अदालतों के ऐसे आदेश भी हैं कि ऐसे अस्पताल, गरीब वर्ग के लिये कुछ प्रतिशत बेड सुरक्षित करें। सन 2000 ई में न्यायाधीश ए. एस. कुरैशी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी जिसका उद्देश्य निजी अस्पतालों में गरीबों के लिए निशुल्क उपचार से संबंधित दिशानिर्देश तय करना था। इस कमेटी ने सिफारिश की कि, रियायती दरों में जमीन हासिल करने वाले निजी अस्पतालों में इन-पेशेंट विभाग में 10 फीसदी और आउट पेशेंट विभाग में 25 फीसदी बेड गरीबों के लिए आरक्षित रखने होंगे। लेकिन यह धरातल पर नहीं हो रहा है।

कोविड-19 महामारी जन्य स्वास्थ्य आपातकाल (COVID-19 Epidemic Public Health Emergency) से बहुत पहले ही सर्वोच्च् न्यायालय ने ईडब्ल्यूएस ( दुर्बल आय वर्ग ) के मरीजों की पहुंच निजी स्वास्थ्य सेवाओं तक हो सके, इसलिए उनके हक़ में, एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। जुलाई 2018 के उक्त फैसले में सर्वोच्च् न्यायालय ने उन निजी अस्पतालों को, जो सरकारी रियायती दरों पर भूमि प्राप्त कर बने हैं को, आदेश दिया था कि, वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को निशुल्क उपचार मुहैया कराएं। अदालत के अनुसार,

“अगर अस्पताल इस आदेश का अनुपालन नहीं करेंगे तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।”

अब सवाल उठता है कि अदालत के इन निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं, इसे कौन सुनिश्चित करेगा ? उत्तर है सरकार। पर सरकार क्या इसे मॉनिटर कर रही है ? क्या सरकार ने ऐसा कोई तंत्र विकसित किया है जो नियमित इन सबकी पड़ताल कर रहा है।

हिंदी वेबसाइट कारवां के कुछ लेखों के अनुसार, सोशल जूरिस्ट नाम के एनजीओ के संचालक अशोक अग्रवाल कहते हैं,

“सरकारी जमीन पर बने दिल्ली के निजी अस्पतालों की पहचान की जा चुकी है। और उनमें आज कम से कम 550 बेड ईडब्ल्यूएस मरीजों के लिए आरक्षित हैं.”

अग्रवाल नियमित रूप से जनहित याचिका दायर कर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के स्वास्थ्य और शैक्षिक अधिकारों को सुनिश्चित करने का प्रयास करते रहते हैं।

2002 में सोशल जूरिस्ट ने 20 निजी अस्पतालों के खिलाफ दिल्ली उच्च अदालत में याचिका दायर की थी, क्योंकि इन अस्पतालों ने गरीबों का निशुल्क इलाज नहीं किया था।

मार्च 2007 के फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा था कि न्यायाधीश कुरैशी समिति ने जो अनुशंसा की थी उनका पालन सिर्फ याचिका में उल्लेखित प्रतिवादी अस्पतालों को नहीं करना है बल्कि उनके जैसी स्थिति वाले सभी अस्पतालों को करना है। यह आदेश केवल दिल्ली के अस्पतालों के लिये नहीं है बल्कि देश भर के अस्पतालों के लिये दिया गया है। इसे मॉनीटर करने की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार पर ही नहीं बल्कि समस्त राज्य सरकारों पर भी है।

एक शोध पत्र के अनुसार, जो कारवां वेबसाइट पर है,

“एक बड़ी समस्या यह है कि नियमों के होने के बावजूद निजी स्वास्थ्य क्षेत्र नियमों का पालन नहीं करते हैं। डीजीएचएस के 14 मई के आदेश में यह बात दिखाई देती है। उस आदेश में डीजीएचएस ने निर्देश दिया था कि ईडब्ल्यूएस मरीजों के संबंध में जो नियम हैं उनका पालन अस्पताल करें। आदेश में लिखा है, “हमारे ध्यान में लाया गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चिन्हित अस्पतालों को पात्र मरीजों को निशुल्क उपचार देने के संबंध में जो निर्देश दिए हैं, उन नियमों के विपरीत जाकर ये अस्पताल ऐसे मरीजों से कोविड-19 किटी या जांच की फीस वसूल रहे हैं. ऐसा करना सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है.” महानिदेशालय ने सभी चिन्हित निजी अस्पतालों को ईडब्ल्यूएस मरीजों को निशुल्क उपचार मुहैया कराने का आदेश देते हुए कहा है,

“यदि ईडब्ल्यूएस के मरीज को उपचार देने से इनकार किया जाता है तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी.”

लेकिन अदालत के इस आदेश के बावजूद चीजें नहीं बदलीं है। निजी क्षेत्र द्वारा नियमों की अवहेलना का एक उदाहरण सोशल जूरिस्ट ने दिया जो इस प्रकार है।

“1997 से दिल्ली सरकार ने दिल्ली सरकार कर्मचारी स्वास्थ्य योजना (डीजीईएचएस) के तहत अपने कर्मचारियों और पेंशनधारियों का इलाज राहत दरों में करने वाले निजी अस्पतालों का पैनल बनाया था। जब ज्यादा मरीजों का सीजन होता है तो ये अस्पताल मरीजों को बेड देने से इनकार करते हैं। ये लोग उनको भाव देते हैं जो पैसा खर्च करते हैं. यह एक तरह का फ्रॉड है. अगर ये अस्पताल जरूरत के समय मरीजों का उपचार नहीं करेंगे तो मरीजों को वहां भेजा ही क्यों जाए? उन्हें पैनल में रखना ही क्यों?”

9 जून के डीजीएचएस के आदेश में लिखा है कि निजी अस्पताल डीजीईएचएस के उन लाभार्थियों को जिनमें कोविड-19 संक्रमण का शक है या जिन्हें कोविड-19 संक्रमण है उन्हें तब तक भर्ती नहीं कर रहे जब तक कि ऐसे मरीज भारी-भरकम फीस जमा नहीं कर रहे।

उस आदेश में लिखा है कि अस्पताल सामान्य दर पर मरीजों का इलाज कर रहे हैं जबकि उन्हें राहत दरों में उपचार करना चाहिए। आदेश में पैनल के अस्पतालों को याद दिलाया गया है कि

“उन्हें कोविड-19 सहित सभी रोगों का इलाज स्वीकृत दरों में या पेंशनरों के मामले में निशुल्क करना होगा. अग्रवाल ने समझाया कि सरकारी स्वास्थ्य उपचार योजना के लाभार्थी सरकारी अस्पताल में उपचार नहीं कराना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे निजी अस्पताल में इलाज कराने के पात्र हैं. दूसरा कारण सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत है. गरीब से गरीब आदमी भी इन अस्पतालों में नहीं जाना चाहता।”

कोरोना ने जिंदगी जीने का तरीका बदल दिया है। बदले हालात में सरकारी से लेकर निजी चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा सेवा की सेहत व चाल बदलने लगी है। इससे देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों सहित स्वास्थ्य कर्मियों पर मानसिक, शारीरिक और प्रोफेशनल रूप से असर पड़ा है। शुरू में पीपीई किट, अस्पतालों में दवा, वेंटिलेटर के अभाव, बेड की अनुपलब्धता और जांच की समस्या तथा कोरोना से जुड़े भय ने, स्वास्थ सेवाओ को लगभग बेपटरी कर दिया है। अधिकतर चिकित्सक कोरोना के अतिरिक्त अन्य मरीजों को भी ठीक से न तो देख पा रहे थे और न ही, उनका नियमित इलाज कर पा रहे है। कई ऐसे भी चिकित्सक हैं जिन्होंने कोरोना के डर से अपने क्लीनिक बंद कर दिये तो कई चिकित्सक ऐसे भी हैं, जो चिकित्सा को सेवा भावना के समकक्ष रख मरीजों का इलाज करने में जुटे हैं।

अधिकतर निजी अस्पताल प्रबंधन कह रहे हैं कि कोरोना से निपटने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने के लिए वृहत पैमाने पर कार्ययोजना बनानी होगी। किसी भी तंत्र की परख और परीक्षा संकट काल में ही होती है, और कोरोना के इस संकट, आफत और आपातकाल ने हमारी स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारों की उनके प्रति नीयत तथा उदासीनता को उधेड़ कर रख दिया है।

आज़ादी के पहले से अंग्रेजों ने देश भर में सिविल अस्पताल और कुछ मेडिकल कॉलेज खोले थे। लेकिन आज़ादी के बाद सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत देश भर में अस्पताल, प्राइमरी हेल्थ और कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के रूप में सरकारी चिकित्सा सेवाओं का एक संजाल बिछाना शुरू कर दिया था। तब भी निजी अस्पताल थे पर कम थे। तब अधिकतर निजी अस्पताल, किसी ट्रस्ट या, धर्मादा द्वारा संचालित थे, जो मूलतः व्यावसायिक मनोवृत्ति के नहीं थे, बल्कि उनका उद्देश्य चैरिटी था। पर बाद में बड़े धनपतियों ने चैरिटी पर आधारित अस्पताल बनवाने और संचालित करने बंद कर दिए और ‘दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता है’ के स्वार्थी पूंजीवादी सिद्धांत पर महंगे अस्पताल बनवाने और संचालित करने लगे। अस्पताल अब उद्योग हो गया और वह जितना गुड़ डालियेगा उतना मीठा होगा, के सिद्धांत पर चलने लगे। इसी के साथ साथ मेडिक्लेम जैसी चिकित्सा बीमा की योजनाएं आने लगीं और इससे निजी अस्पतालों की एक नयी संस्कृति ही विकसित होने लगी।

सरकारी अस्पताल कभी बजट की कमी से, तो कभी प्रशासनिक लापरवाही से तो कभी भ्रष्टाचार के कारण तो कभी निजी अस्पतालों के साथ सांठ-गांठ से उपेक्षित होते चले गए और एक समय यह भी आया कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ही अपने मरीजों को उचित चिकित्सा के लिये निजी अस्पतालों के नाम बताने लगे और सरकार द्वारा निजी प्रैक्टिस पर रोक और नॉन प्रैक्टिसिंग भत्ता के बाद भी उनका झुकाव निजी अस्पतालों की ओर बना रहा। जिनके पास पैसा है, जिन्होंने मेडिक्लेम करा रखा है या जिनको सरकार और कंपनियों द्वारा चिकित्सा प्रतिपूर्ति की सुविधाएं हैं उन्हें तो कोई बहुत समस्याएं नहीं हुयी पर उन लोगों को जो असंगठित क्षेत्र में है और ऐसी किसी सुविधा से वंचित हैं, वे या तो अपनी जमा पूंजी बेचकर निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं या फिर अल्प सांधन युक्त सरकारी अस्पताल की शरण में जाते हैं।

The first objective of a public welfare state is to provide health and education facilities to all citizens.

लोककल्याणकारी राज्य का पहला उद्देश्य ही है स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा सब नागरिकों को मिले। लेकिन सरकार स्वास्थ्य बीमा की बात करती है, पर बेहतर सरकारी अस्पतालों की बात नहीं करती है। सरकार का कोई भी नियंत्रण निजी अस्पतालों द्वारा लगाए गए शुल्क पर नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह निजी अस्पतालों के चिकित्सा दर को एक उच्चस्तरीय कमेटी बना कर कम से कम ऐसा तो कर ही दे, जिससे लोगो को उनकी आर्थिक क्षमता के अनुरूप स्वास्थ्य सुविधाएं तो मिल सके। अगर सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों के प्रति उदासीनता बरतनी शुरू कर दी तो अनाप-शनाप फीस लेने वाले निजी अस्पतालों का एक ऐसा मकड़जाल खड़ा हो जाएगा जो देश की साठ प्रतिशत आबादी को उचित चिकित्सा के अधिकार से वंचित कर देगा। सरकार द्वारा जिला अस्पतालों को पीपीपी मॉडल पर सौंपना, पूरी चिकित्सा सेवा के निजीकरण और सभी अस्पतालों को पूंजीपतियों को बेच देने का एक छुपा पर साथ ही अपना एजेंडा भी है।

भारत में ही, पहले भी सामुदायिक स्वास्थ्य के लिये मलेरिया, डिप्थीरिया, पोलियो, चेचक आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये सघन टीकाकरण कार्यक्रम चलाए गए हैं, और यह सब एक अभियान के अंतर्गत निःशुल्क ही चलाये गए थे। लेकिन जब खुली अर्थव्यवस्था का दौर आया तो सब कुछ निजीकरण के उन्माद में सरकार ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्वास्थ्य को भी निजी क्षेत्रों के हवाले छोड़ दिया और पीपीपी मॉडल की बात करने लगी।

निजी अस्पतालों का विकास हो, उन्हें सरकार जो सुविधा देना चाहे वह दे भी, पर सरकारी अस्पताल या सरकारी चिकित्सा इंफ्रास्ट्रक्चर जिंसमें गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर से लेकर एम्स जैसे सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और चिकित्सा विज्ञान संस्थान हैं, की उपेक्षा तो न हो। अगर शिक्षा और चिकित्सा की मूलभूत सुविधाएं आम जनता को सरकार उपलब्ध नहीं करा सकती तो लोककल्याणकारी राज्य की बात करना महज एक पाखंड ही होगा।

सरकार कोई साहूकार नहीं है जो हर काम व्यावसायिक लाभ के लिये ही करे। सरकार को चाहिए कि, वह एक सुगठित चिकित्सा तंत्र को विकसित करे जिससे समाज के उंस तबके को भी उपयुक्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो, जो बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में धनाभाव के कारण इलाज कराने में सक्षम नहीं है। यह सरकार की कृपा नहीं बल्कि सरकार का दायित्व है और सरकारें इसीलिए चुनी भी जाती हैं।

विजय शंकर सिंह

विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं
विजय शंकर सिंह (Vijay Shanker Singh) लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर हैं

मई दिवस : महामारी के बाद पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का चेहरा और क्रूर रूप में सामने आयेगा

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मई दिवस की परम्परा और कोरोना में मजदूर वर्ग का कार्यभार | Tradition of May Day and working class in Corona

‘‘मई दिवस वह दिन जो पूंजीवादियों के दिल में डर और मजदूरों के दिल में आशा पैदा करता है।’’ – चार्ल्स ई. रथेनबर्ग

मई दिवस की 130 वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। लेकिन असंगठित क्षेत्र के 70 प्रतिशत मजदूरों की हालत आज भी वही है जो कि 1886 में थी। इन मजदूरों के काम के घंटे सरकार ने आठ कर दिया, लेकिन ये मजदूर आज भी 12-14 घंटे काम करने को मजबूर हैं। उनको श्रम कानून का पालन तो दूर मजदूर ही मानने से इनकार किया जाता रहा है। आज कोरोना महामारी के दौरान वही मजदूर सड़कों पर घर जाते हुए और खाने की लाईन में घंटो खड़े दिख रहे हैं जो कि सरकार की नजर में मजदूर की श्रेणी में ही नहीं आते हैं। हालत यह थी कि लॉक डाउन के पांच दिन बाद से ही इन मजदूरों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा और वे पैदल ही पांच सौ से पन्द्रह सौ किलोमीटर दूर बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं, विकलांग, नौजवान घर के लिए निकल पड़े।

यह मई दिवस दूसरे मई दिवस से भिन्न है क्योंकि कोई भी संगठन हर साल की तरह इस मई दिवस पर जुलूस नहीं निकाल सकते। कोरोना महामारी के बीच मजदूर वर्ग आज भारत में ही नहीं दुनिया भर में संकट में है और अपने-अपने घरों में कैद होकर नौकरियां गंवा रहे हैं। हम भारत सहित पूरी दुनिया में मजदूरों को बेरोजगार होते हुए देख रहे हैं। यहां तक कि अमेरिका में मध्य मार्च से अप्रैल तक डेढ़ महीने में 3 करोड़ लोग बेरोजगार हुए हैं, अप्रैल के तीसरे सप्ताह में 38 लाख लोगों ने बेरोजगारी भत्ता के लिए आवेदन किया। सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल माह में भारत में 23.7 प्रतिशत बेरोजगारी दर हो गयी हैं और यह संख्या 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। हालत यह है कि जिस राज्य ने इन मजदूरों के बल पर उन्नत्ति की, आज वही नहीं चाहता कि ये मजदूर उनके राज्य में रहें। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने 6 राज्यों से कहा है कि महाराष्ट्र में फंसे 3.5 लाख प्रवासी मजदूरों को बुला लें। इन मजदूरों की हालत यह है कि भूख से परेशान होकर वे  28 मार्च को हजारों की संख्या में घर जाने के लिए आनन्द बिहार में इक्ट्ठे हो गये।

इसी तरह 14 अप्रैल को मुम्बई के रेलवे स्टेशनों पर भीड़ देखी गई, इसके अलावा गुजरात में भी कई बार मजदूरों और पुलिस में झड़प हो चुकी है। भूखे-प्यासे सैकड़ों मजदूर घर जाते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। कोयंबटूर में मजदूरों ने सरकार को धमकी दी है कि अगर तीन मई तक उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था नहीं की गई तो वह पैदल ही 2000 कि.मी. दूर अपने घर के लिए निकल पड़ेंगे। यह वही मजदूर हैं जिनके परिवार के सदस्य गांव में खेती करते हैं तो वह उनके खाद, बीज का पैसा शहर से भेजा करते थे। आज उन्हीं किसानों की उपजाई हुई फसल पर सरकार अपनी छाती चौड़ी कर रही है, लेकिन उन्हीं के बच्चे शहरों में भूख से तड़प रहे हैं।

29 अप्रैल को केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि दबाव झेल रहे क्षेत्रों के लिए सरकार पैकेज लाएगी तो इन मजदूरों के लिए पैकेज क्यों नहीं लाया जा रहा है? विदेशी कम्पनियों के संगठनों ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से मांग की है कि ई-वाणिज्य कम्पनियों पर लगने वाला दो फीसदी कर को नौ माह की लिए टाल दिया जाए। 50 बड़े उद्योगपतियों का 68 हजार करोड़ रू. से अधिक का कर्ज माफ कर दिया लेकिन इन मजदूरों के लिए सरकार ने कोई रियायत नहीं दी है, जबकि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन का कहना है कि 65 हजार करोड़ इन मजदूरों को देने से संकट का हल किया जा सकता था। राशन कार्ड पर बंटने वाला एक किलो दाल घोषणा के एक माह बाद भी लोगों तक नहीं पहुंच पाया है।

करोना में मजदूर वर्ग पर हमला

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मालिकों से अपील की है कि कामगारों को काम से नहीं निकाला जाये और उनको वेतन भी दिया जाए। भारत के प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद खुद ही केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियां को डेढ़ साल का महंगाई भत्ता रोकने की घोषणा कर दी, जिसका अनुसरण और राज्य भी कर रहे हैं। इसी में दो कदम और आगे बढ़ते हुए स्पाइस जेट ने कहा है कि अप्रैल माह में 92 प्रतिशत कर्मचारियों को आंशिक वेतन ही दिया जायेगा। इसी से दो कदम और आगे जाते हुए औद्योगिक क्षेत्र ने घोषणा कर दी है कि वह इस हालत में नहीं है कि अप्रैल और मई महीने का सैलरी दे सकें। छोटे उद्योग तो इनसे भी आगे हैं, काफी छोटे उद्योग मालिक ने मार्च में कमाया हुआ पैसा भी मजदूरों को नहीं दिया है, यानी जो जितना ही दबा है उसको उतना ही कष्ट झेलना पड़ रहा है। भारत के प्रधानमंत्री की अपील मजदूरों के लिए झुनझूना भी साबित नहीं हो रही है।

कोरोना संकट के बहाने पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपनी नाकामियों को छिपाने में कामयाब हो रहा है। कोरोना से पहले ही पूरी दुनिया में बेरोजगारी दर बढ़ रही थी, यहां तक कि भारत में बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी थी। भारत में मोदी सरकार भी अपनी नाकामियों को छुपाते हुए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी, संघवाद के एजेंडे को कोरोना महामारी के नाम पर लागू कर रही है।

Through transparent knowledge-sharing, tailored support on the ground, and steadfast solidarity we will beat COVID-19 : WHO Europe

नई शिक्षा नीति को लागू करते हुए ऑन लाईन क्लास ली जा रही है लेकिन सरकारी स्कूलों में हालात यह है कि ज्यादातर कक्षाओं में 10 प्रतिशत ही विद्यार्थी होते हैं, कुछ में अधिक से अधिक 20-25 प्रतिशत ही भागीदारी हो रही है। कारखाना अधिनियम, 1948 में बदलाव करके काम के घंटे 8 की जगह 12 की जा रही है। कोरोना के बाद पूंजीवाद अपने मुनाफे को और बढ़ाने के लिए स्थायी मजदूर की जगह काम के हिसाब से घंटों और दिनों के लिए मजदूर रखे जा सकते हैं। भविष्य में फ्री लांसर मजदूरों की संख्या बढ़ सकती है। गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स ने तो मांग रखा है कि यूनियनों पर एक साल तक प्रतिबंध लगा दिया जाए और लॉक डाउन का वेतन न देने का प्रस्ताव पास किया है। बहुत दिनों से कुछ संगठनों द्वारा भारत में मुस्लिमों के आर्थिक बहिष्कार करने की बात की जा रही थी जो कि नहीं हो पा रहा था, लेकिन कोरोना महामारी के द्वारा झूठ फैलाया गया कि मुस्लिम समुदाय के लोग थूक लगाकर सब्जियो, फलों को बेच रहे हैं और कोरोना महामारी फैला रहे हैं। इस डर से मुस्लिम समुदाय के लोग हिन्दू कॉलोनियों में फल और सब्जी बेचने नहीं आ रहे हैं। सोशल साईट पर कई ऐसे विडियो देखने को मिला जहां नाम पूछ-पूछ कर मुस्लिम रेहड़ी-पटरी वालों की पिटाई की जा रही है। सब्जी और फल के दुकानों पर भगवा झंडे लगाये जा रहे हैं।

मई दिवस से सबक

भारत की ट्रेड यूनियनें भी इन मजदूरों के असंतोष को सही दिशा देने में असफल रही है और उनकी पूरी लड़ाई आर्थिक रूप में फंस कर रह गई है। मई दिवस मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने या कोई सुविधाएं बढ़ाने के लिए नहीं होती है। मई दिवस की मुख्य मांग थी- आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे मनोरंजन, यानी गुलामी से मुक्ति।

ज्यूरिख में 1893 में होने वाली इण्टनेशनल कांग्रेस की प्रस्तावना में कहा गया कि ‘‘एक मई के दिन आठ घण्टे के कार्य दिवस के प्रदर्शन के साथ ही साथ सामाजिक परिवर्तन के जरिये वर्ग विभेदों को खत्म करने का मजदूर वर्ग की दृढ़निश्चय का प्रदर्शन होना चाहिए। इस तरह से मजदूर वर्ग का उस रास्ते पर कदम रखना चाहिए जो सभी मनुष्यों के लिए शान्ति यानी विश्व शान्ति की ओर ले जाने वाला एकमात्र रास्ता है।’’ लेनिन ने कहा था कि- ‘‘हमारा लक्ष्य सिर्फ बड़ी संख्या में मजदूरों का भाग लेना ही नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह से संगठित होकर भाग लेना है। एक संकल्प के साथ भाग लेना है, जो एक ऐसे संघर्ष का रूप लें जिसे कुचला न जा सके, जो रूसी जनता को राजनीतिक आजादी दिला सके।’’ आज भारत का ट्रेड यूनियन संगठित-असंगठित, स्थायी-ठेकेदार, सरकारी-प्राइवेट, सेक्टर वाइज बंटे हुए हैं जिसका परिणाम है कि  किसी को सही मजदूरी नही मिल रही तो किसी का डीए काट लिया जा रहा है। कभी पेंशन समाप्त कर दी जाती है तो कभी कोई अधिकार में कटौती कर दी जा रही है। ऐसी ही परिस्थितियों से निपटने के लिए मार्क्स लिखते हैं-

‘‘जब तक दास प्रथा गणराज्य के एक हिस्से पर कलंक के समान चिपकी रही, तब तक अमेरिका में कोई भी स्वतंत्र मजदूर आन्दोलन पंगु बना रहेगा। सफेद चमड़ी वाला मजदूर कभी भी स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता, जब तक काली चमड़ी वाले मजदूरों को अलग करके देखा जाएगा।’’

कोरोना महामारी जहां एक तरफ शासक वर्ग को श्रम लूटने का और मौका देगा वहीं क्रांतिकारी परिस्थिति भी तैयार करेगा। कोरोना के बाद पूरी दुनिया में बेरोजगारी और लोगों की परेशानी बढ़ेगी। लेकिन अगर हम इन परेशानियों को अमेरिका में 1884-85 में आई मन्दी से जोड़ कर देखें- जब जनता परेशान थी, बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही थी तो ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’ ने इसे एक मौके के रूप में देखा। फेडरेशन को लगा कि ‘आठ घण्टे कार्य दिवस’ की मांग ऐसी मांग होगी जो सभी मजदूरों को एक साथ ला सकता है। जो मजदूर फेडरेशन में या ‘नाइट्स ऑफ लेबर’ (मजदूरों का पुराना संगठन था)  के साथ नहीं जुड़े हैं वह भी इस मांग पर एक साथ आ सकते हैं। फेडरेशन यह भी जानता था कि यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती है इसके लिए व्यापक मोर्चे की आवश्यकता है। फेडरेशन ने ‘नाइट्स ऑफ लेबर’ से भी आन्दोलन में सहयोग करने को कहा। आज कोरोना महामारी के बाद जो दुनिया बदलने वाली है और जिस तरह से मजदूर, किसान, छात्र, नौजवान बेरोजगारी से परेशान होंगे उसके लिए भारत में भी एक नारा ढूंढना होगा। इसमें यूनियनों की आपसी कड़वाहट, छोटे-बड़ा यूनियन यह सब भूल कर एक मंच पर एक नारे के साथ आगे आना होगा, तभी आने वाले समय में हम एकताबद्ध होकर लड़ पायेंगे। नहीं तो महामारी के बाद पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का चेहरा और क्रूर रूप में आगे आयेगा जिसमें कोई भी छोटा-बड़ा, नवजनवादी या समाजवादी नहीं बचेगा।

सुनील कुमार

 

अगर भारत बचा तो यह किसी लॉक डाउन या किसी 36-72 इंच के सीने की वजह से नहीं, बल्कि गांव और किसान की वजह से बचेगा

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

The lock down will last longer. This is the only way to avoid an epidemic

अब तक जितनी शानदार रही है जिंदगी, कोरोना के बाद की दुनिया में शायद उतनी खूबसूरत न भी हो ज़िंदगी।

दुनिया सिरे से बदल रही है। इस नई दुनिया में हममें से कितने ज़िंदा बचेंगे, सही सलामत होंगे, कहना मुश्किल है। हर आस्था में जिस महाप्रलय की कथा है, उसे हम साकार होते देख रहे हैं।

अब जांच में तेज़ी आने के बावजूद 130 करोड़ लोगों में से सिर्फ पौने दो लाख लोगों की जांच हुई है और उनमें संक्रमित 10 हजार। मृत तीन सौ पार।

संक्रमित और मृतकों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। लॉक डाउन लंबा चलेगा। महामारी टालने का यही एकमात्र उपाय है।

जिस तेजी से मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों, आगरा, भोपाल, इंदौर और दूसरे शहरों में कोरोना का कहर तेज़ हो रहा है, जैसे राज्यों में जिले के जिले सील हो रहे हैं, थर्ड स्टेज शुरू हुआ या नहीं, इससे हालात में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

देश मे इस वक्त कोरोना के अलावा किसी दूसरी बीमारी का इलाज सिरे से बन्द हो गया है। महानगर से लेकर गांव तक के लोग इस लिहाज से बराबर हो गए हैं।

कोरोना के अलावा दूसरी सारी गम्भीर बीमारियां महामारी में तब्दील हो रही हैं।

कोरोना न हो तो इस अराजकता, असमानता और अन्याय के माहौल में दूसरी बीमारियों से हम आप जैसे लोगों के बीच निकलने की संभावना कम है।

किसानों, मजदूरों, बेरोज़गार युवाजनों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों,  हिमालयी राज्यों के लोगों के लिए इस माह प्रलय से बचने की संभावना बहुत कम है।

इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली के पूर्व सम्पादक, मशहूर लेखक, अम्बानी अडानी एकाधिकार के खिलाफ लड़ने वाले एकमात्र महायोद्धा, फिल्मकार प्रंजॉय गुहा ठाकुरता (Pranjoy Guha Thakurta) से आज इस सिलसिले में लम्बी सिलसिलेवार बात हुई।

दिनेशपुर आने से पहले नई दिल्ली में मित्र राजीव कुमार के घर पर आकर मिले थे वे। अपनी किताबें दी थीं। गैस वॉर भी। तब हम लोग विकल्प मीडिया खड़ा करने की योजना बना रहे थे। यह अक्टूबर 2017 की बात है।

उस वक्त हिन्दू के पूर्व सम्पादक पी साईनाथ और नागपुर से कृषि संकट पर खास काम कर रहे जयदीप हार्डीकर भी विकल्प मीडिया बनाने की कोशिश में थे।

आज सुबह उन्होंने दो बार फ़ोन किया और मैं कहीं और व्यस्त होने की वजह से बात नहीं हो सकी। ऐसा अक्सर होता है गांव में। तीसरी बार कोलकाता वाले एयरटेल के नम्बर पर उनका कॉल आया तो सविता जी ने रिसीव कर ली।

मीडिया के मौजूदा हालात पर उन्होंने कल रवीश कुमार के साथ न्यूज क्लिक पर बात की थी।

यह वीडियो मैंने कल ही शेयर किया है।

आज दिनेशपुर, रुद्रपुर, सिडकुल, तराई और पूरे उत्तराखण्ड के हालात पर चर्चा हुई।

वे बोले, पर्यटन और धार्मिक पर्यटन सिरे से खत्म हो गया औऱ उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था सुधरने के आसार नहीं है।

मैंने कहा, कोरोना के बाद फिर दुनिया पहले की तरह खुलने वाली नहों है। पहले की तरह पर्यटन और धार्मिक पर्यटन शायद न ही हो।

असनोड़ा जी के अस्वस्थ होने और एयरलिफ्ट करके देहरादून में भर्ती होने के क्रम में पहाड़ के गांवों और दुर्गम स्थलों में स्वास्थ्य संकट पर खुलकर बात हुई।

उन्होंने मुझे अखबारों के लिए नियमित लिखने को कहा। मैंने कहा, कोई छापता नहीं है। हमारे साथ के सारे लोग पत्रकारिता से बाहर हैं। जो लोग हैं वे आस्थाई और सम्विदा पर है और मीडिया भी कारपोरेट है। कोई जोखिम उठाने को आज़ाद नहीं है।

इस पर उन्होंने कहा कि विकल्प मीडिया भी खतरे में है। जैसे तैसे चल रहा है। पता नहीं, कब कौन सा पोर्टल बन्द हो जाये।

मैंने कहा कि न्यूज क्लिक और वायर की तरह हस्तक्षेप जारी है। वहां मेरा लिखा रोज़ लगता है।

अब मैंने साफ साफ कहा कि महामारी, भुखमरी और बेरोज़गारी से कोरोना के बाद भी अगर भारत बच गया तो यह किसी लॉक डाउन या किसी छतीस बहत्तर इंच के सीने की वजह से नहीं, बल्कि भारत के गांव और किसान, उनके लोक और सामुदायिक जीवन, सामाजिक सुरक्षा की वजह से बचेगा। अमेरिका और यूरोप के पास न गांव है और न किसान। कोरोना के बाद यह पृथ्वी सिरे से बदल जाएगी। शक्ति सन्तुलन बदलेगा। विश्व व्यवस्था बदलेगी। सभी देशों की अर्थ व्यवस्था बदलेगी। राजनोति बदलेगी। नीतियां, विदेश नीतियां बदलेंगी।

कृषि अर्थ व्यवस्था को दुनिया भर में बहाल करने का मौका होगा यह और बदहाल अर्थ व्यवस्था के चलते, मुक्त बाजार और पूंजी के फेल होने के कारण यह मजबूरी भी होगी।

उन्होंने कहा कि सारे अर्थशास्त्री मुक्त बाजार के पक्ष में नहीं हैं। मैंने कहा, जो हैं, उन्हें भी सच का सामना करना होगा।

उन्होंने बसंतीपुर के बारे में जानना  चाहा और इस सिलसिले में भी बात हुई। मैंने कहा कि बसंतीपुर ग्रामीण भारत का प्रतीक है।

पलाश विश्वास

कोरोना वायरस के बारे में कितना जानते हैं आप और क्या जानना है जरूरी!  जानिए वरिष्ठ वैज्ञानिक से

Corona virus COVID19, Corona virus COVID19 image

What do we know and what do we need to know about Novel Coronavirus

नई दिल्ली, 27 मार्च (डॉ टीवी वेंकटेश्वरन) : नोवेल कोरोना वायरस के बारे में कई तरह की बातें सोशल मीडिया, वाट्सऐप और इंटरनेट के माध्यम से फैल रही हैं। इनमें से कुछ सही हैं, तो बहुत-सी बातें बिल्कुल निराधार हैं। ऐसे समय में जब कोरोना वायरस महामारी बनकर दुनियाभर में हजारों लोगों की जान ले चुका है, तो इससे जुड़े कुछ अनिवार्य पहलुओं के बारे में जानना जरूरी है।

संक्रमण (Infection): वायरस गले और फेफड़ों में उपकला (epithelial) कोशिकाओं को संक्रमित करता है। SARS-CoV-2 मानव कोशिकाओं के संपर्क में आने पर ACE2 रिसेप्टर्स से बंध जाता है, जो अक्सर गले और फेफड़ों में पाए जाते हैं। हालाँकि, त्वचा पर चिपकने के बावजूद वायरस नुकसान नहीं पहुँचाता क्योंकि बाहरी त्वचा पर उसका संपर्क ACE2 से नहीं होता है। यह वायरस नाक, आँखों और मुँह से होकर शरीर में प्रवेश करता है। हमारे हाथ इसका मुख्य साधन हो सकते हैं, जो हमारे मुँह, नाक और आँखों तक वायरस को पहुँचा सकते हैं। जितनी बार संभव हो 20 सेकंड तक साबुन के पानी से हाथ धोना संक्रमण को रोकने में मदद करता है।

संक्रामक खुराक (Infectious dosage) : मैकाक बंदर को संक्रमित करने के लिए सात लाख पीएफयू खुराक की आवश्यकता पड़ती है। पीएफयू (प्लाक बनाने की इकाई) नमूना संक्रामकता के मापन की एक इकाई है। हालाँकि, बंदर में कोई नैदानिक लक्षण नहीं देखे गए हैं, नाक और लार के द्रव कणों में वायरल लोड था। मनुष्य को इस वायरस से संक्रमित होने के लिए सात लाख पीएफयू से अधिक खुराक की आवश्यकता होगी। ACE2 रिसेप्टर्स वाले आनुवंशिक रूप से संशोधित चूहों पर एक अध्ययन से पता चला है कि वह केवल 240 पीएफयू खुराक से SARS से संक्रमित हो सकता है। इसकी तुलना में, चूहों को नये कोरोना वायरस से संक्रमित होने के लिए 70,000 पीएफयू की आवश्यकता होगी।

संक्रामक अवधि: यह अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है कि कोई व्यक्ति कितनी अवधि तक दूसरों को संक्रमण पहुँचा सकता है, लेकिन अब तक यह माना जा रहा है कि यह अवधि 14 दिन की हो सकती है। संक्रामक अवधि को कृत्रिम रूप से कम करना समग्र संचरण को कम करने का एक महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है। संक्रमित व्यक्ति को अस्पताल में एकांत कमरे में भर्ती करना, दूसरे लोगों से अलगाव और लॉकडाउन संक्रमण रोकने के प्रभावी तरीके हो सकते हैं।

कौन कर सकता है संक्रमित: वायरस से संक्रमित कोई भी व्यक्ति लक्षण प्रकट होने से पहले ही दूसरों को संक्रमित कर सकता है। खाँसी या छींक आने पर हमारे मुँह और नाक को ढंकने से संक्रमण को कम करने में मदद मिल सकती है। वायरस पूरी संक्रामक अवधि में संक्रमित व्यक्ति की लार, थूक और मल में मौजूद रहता है।

हम कैसे करते हैं संक्रमित: संक्रमण प्रायः द्रव कणों के माध्यम से होता है। इसके लिए, छह फीट से कम नजदीकी संपर्क की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि यह सिफारिश की जाती है कि हम सार्वजनिक स्थानों जैसे- सब्जी बाजार या सुपरमार्केट में एक-दूसरे से 1.5 मीटर दूर रहें। हांगकांग में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सामाजिक दूरी बनाए रखकर 44% तक संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। फोन, दरवाजे की कुंडी और दूसरी सतहें वायरस के संचरण का संभावित स्रोत हो सकती हैं, लेकिन इसके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। दरवाजे की कुंडी, लिफ्ट का बटन और सार्वजनिक स्थानों पर काउंटर को छूने के बाद हाथों को सैनेटाइज करना बचाव का सुरक्षित विकल्प हो सकता है।

हम कितने लोगों को संक्रमित करते हैं: एक विशिष्ट संक्रामक व्यक्ति के कारण होने वाले नए संक्रमणों की औसत संख्या मानव संक्रामकता सीमा 2.2 से 3.1 के बीच है। सरल शब्द में, एक संक्रमित व्यक्ति औसतन लगभग 2.2 से 3.1 व्यक्तियों को संक्रमित करता है। एक-दूसरे से दूरी बनाए रखकर हम वास्तविक संचरण क्षमता को कृत्रिम रूप से कम कर सकते हैं, इस प्रकार संक्रमण की दर को धीमा कर सकते हैं।

वायरस कहां से आया: यह चमगादड़ का सूप पीने से तो नहीं हुआ है। जब खाद्य उत्पादों को उबाला जाता है, तो वायरस नष्ट हो जाता है। प्रारंभ में, यह अनुमान लगाया गया था कि SARS-CoV-2 वायरस चमगादड़ से मनुष्यों में पहुँचा है। लेकिन, हाल ही में हुए जीनोम के अध्ययन से पता चलता है कि इनसानों में पहुँचने से पहले इसे किसी मध्यस्थ प्रजाति तक जाना चाहिए था। एक अन्य अध्ययन से संकेत मिलता है कि SARS-CoV-2 वायरस का एक वंश बीमारी फैलने से पहले मनुष्यों में मौजूद था।

कैसे विकसित हुआ नोवेल कोराना वायरस :

मनुष्यों में पहुँचने से पहले SARS-CoV-2 या तो किसी जंतु मेजबान में वायरल रूप के प्राकृतिक चयन या फिर जूनोटिक ट्रांसमिशन के बाद मनुष्यों में वायरल रूप के प्राकृतिक चयन से उभरा है। केवल अधिक अध्ययन से पता चलेगा कि दोनों में से कौन-सा तथ्य सही है। यह अभी भी स्पष्ट नहीं हैं कि SARS-CoV-2 में कौन से रूपांतरण हैं, जिन्होंने मानव संक्रमण और संचरण को बढ़ावा दिया है।

SARS-CoV2 कब सामने आया (When did  SARS-CoV2 emerge) :

दिसंबर 2019 से पहले SARS-CoV2 के कोई दस्तावेजी मामले सामने नहीं आए हैं। हालाँकि, प्रारंभिक जीनोमिक विश्लेषण बताता है कि SARS-CoV-2 के पहले मानव मामले मध्य अक्तूबर से मध्य दिसंबर 2019 के बीच सामने आए थे। इसका मतलब है कि प्राथमिक जूनोटिक घटना और मनुष्यों में इसके प्रकोप के फैलने के बीच की अवधि के बारे में जानकारी नहीं है।

क्या यह जानवरों को संक्रमित कर सकता है: आणविक मॉडलिंग से पता चलता है कि SARS-CoV-2 मानव के अलावा, चमगादड़, सिवेट, बंदर और सुअर की कोशिकाओं को प्रभावित कर सकता है। हालाँकि, यह घरेलू पशुओं को संक्रमित नहीं करता है। अंडे या अन्य पॉल्ट्री उत्पादों का सेवन करने से भी SARS-CoV-2 संक्रमण नहीं होता।

क्या कोई दो बार संक्रमित हो सकता है: एक बार खसरा होने के बाद अधिकतर लोगों में जीवन भर के लिए इस बीमारी के प्रति प्रतिरक्षा विकसित हो जाती है। इसके बाद शायद ही उन्हें फिर से खसरा होता है। प्रायोगिक रूप से संक्रमित मैकाक बंदर में दोबारा इससे संक्रमित होने के मामले नहीं देखे गए हैं। इसी तरह, मनुष्यों में भी SARS-CoV-2 से उबरने के बाद दोबारा इससे संक्रमित होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। हालाँकि, यह प्रतिरक्षा कब तक बनी रह सकती है, यह कहना मुश्किल है।

कितनी गंभीर है बीमारी: COVID-19 मौत की सजा नहीं है। इसके अधिकांश मामले हल्के (81%) हैं, लगभग 15% मामलों में अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है और 5% को महत्वपूर्ण देखभाल की आवश्यकता होती है। अधिकतर संक्रमित लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

कौन हैं सबसे अधिक संवेदनशील : हेल्थकेयर कार्यकर्ता इस वायरस के खतरे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। लोम्बार्डी, इटली में लगभग 20% स्वास्थ्यकर्मी मरीजों को चिकित्सा सुविधा प्रदान करते हुए संक्रमित हो रहे हैं। विशेष रूप से 60 वर्ष से अधिक उम्र के वृद्धों, हृदय रोगियों, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और साँस संबंधी रोगों से ग्रस्त लोगों में इसका खतरा अधिक होता है।

मौत का कारण क्या है: अधिकांश मौतें श्वसन तंत्र फेल होने या फिर श्वसन तंत्र से जुड़ी परेशानी एवं हृदय संबंधी समस्याओं के संयुक्त प्रभाव के कारण होती हैं। फेफड़ों में द्रव का रिसाव, जो श्वसन को रोकता है और रुग्णता को बढ़ावा देता है। वर्तमान में, COVID-19 के लिए उपचार मुख्य रूप से सहायक देखभाल है, यदि आवश्यक हो तो वेंटिलेशन उपयोग किया जा सकता है। फिलहाल, कई चिकित्सीय परीक्षण जारी हैं, और परिणामों की प्रतीक्षा की जा रही है।

क्या वायरस दूध के पाउच या समाचार पत्रों द्वारा प्रेषित होते हैं: SARS-CoV-2 प्लास्टिक और स्टेनलेस स्टील सतहों पर 3 दिनों तक बना रह सकता है। जब वायरल लोड 10,000 पीएफयू था, तो यह केवल 5 मिनट के लिए अखबार और सूती कपड़े पर रह सकता था। हालाँकि, वायरस को हटाने के लिए दूध के पाउच को धोना पर्याप्त है।

क्या यह हवा में फैल सकता है: हवा में, वायरस केवल 2.7 घंटे तक जीवित रह सकता है। इसलिए, घर की बालकनी या छत जैसे खुले स्थानों में इससे होने वाले  नुकसान का खतरा नहीं होता है।

क्या कोई कम प्रभावकारी रूप है: इस वायरस के विभिन्न उपभेदों की पहचान की जा रही है, लेकिन अब तक के अध्ययनों में किसी भी रूपांतरण का संकेत नहीं मिला है, जो संचरण या रोग की गंभीरता से जुड़ा हो।

क्या गर्मी या बरसात से मिल सकती है राहत : तापमान और आर्द्रता में वृद्धि के साथ संचरण में कमी को दर्शाने के कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।

(इंडिया साइंस वायर)

(लेखक विज्ञान प्रसार में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। यह आलेख विभिन्न शोध निष्कर्षों पर आधारित है।)

भाषांतरण : उमाशंकर मिश्र

मप्र के भाजपा विधायकों ने नहीं मानी पीएम मोदी की सलाह, इकट्ठा होकर राजभवन पहुंचे

Narendra Modi new look

BJP MLAs from MP did not listen to PM Modi’s advice, gathered and reached Raj Bhavan

भोपाल, 16 मार्च 2020.  प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एक तरफ सार्क देशों के प्रमुखों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनकी पार्टी के ही विधायक कोरोना से लड़ने की पहली शर्त “एकत्र होना” का पालन नहीं कर रहे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही कोरोना वायरस के चलते 26 मार्च तक स्थगित किए जाने के बाद भाजपा विधायक राजभवन पहुंचे हैं। भाजपा विधायक बस में सवार होकर राजभवन पहुंचे हैं।

PM Modi’s advice on corona virus

बता दें कि राज्य विधानसभा का बजट सत्र राज्यपाल लालजी टंडन के अभिभाषण के साथ शुरू हुआ। राज्यपाल ने अभिभाषण का एक पैरा ही पढ़ा। उसके बाद हंगामा हुआ तो कार्यवाही पांच मिनट के लिए स्थगित की गई। विधानसभा अध्यक्ष एन.पी. प्रजापति ने उसके बाद कोरोनावायरस को ध्यान में रखकर कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।

Madhya Pradesh Public Relations Minister P.C. Sharma said that corona virus is epidemic

राज्य के जनसंपर्क मंत्री पी.सी. शर्मा ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी है, और इसी के चलते विधानसभा की कार्यवाही 26 तक के लिए स्थगित की गई है।

भाजपा ने विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थगित किए जाने का विरोध किया है, और इसे लेकर भाजपा विधायक बस में सवार होकर राजभवन पहुंचे हैं। विधायकों का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव कर रहे हैं।