लव जिहाद, धर्म परिवर्तन और धार्मिक स्वातंत्र्य पर हमला

Dr. Ram Puniyani - राम पुनियानी

Love jihad, conversion and attack on religious freedom 

पिछले दिनों (27 नवंबर 2020) उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020‘‘ लागू किया। उसके बाद मध्यप्रदेश और हरियाणा सहित कई अन्य भाजपा-शासित प्रदेशों ने भी इसी तर्ज पर कानून बनाए। इस बीच अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले दम्पत्तियों की प्रताड़ना का सिलसिला भी शुरू हो गया और कुछ मुस्लिम पुरूषों को जेलों में डाल दिया गया। इस नए कानून के पीछे साम्प्रदायिक सोच है यह इससे साफ है कि अवैधानिक धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने वाले कानून पहले से ही हमारे देश में हैं। नए कानूनों का उद्देश्य संदिग्ध है और इनका दुरूपयोग होने की गंभीर आशंका है।

उत्तरप्रदेश के अध्यादेश में ‘लव जिहाद शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी समूहों के कार्यकर्तागण इस कानून के नाम पर ऐसे अंतर्धार्मिक दम्पत्तियों को परेशान कर रहे हैं जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू है। विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों में इस तरह के दम्पत्तियों को प्रताड़ित करने और उनके खिलाफ हिंसा की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। सबसे दुःखद यह है कि कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है और वे समाज की फिज़ा में साम्प्रदायिक रंग घोलने के अपने कुत्सित लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ती जा रही है। वे समाज को बांट रहे हैं और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को पीछे धकेलकर उसका हाशियाकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही वे हिन्दू महिलाओं की स्वतंत्रता को भी गंभीर रूप से बाधित कर रहे हैं।

हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने के लिए हिन्दू महिलाओं के मुस्लिम पुरूषों से संबंधों को जिम्मेदार बताया जा रहा है।

किसी भी ऐसे बहुधार्मिक समाज में जिसमें लोग एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, अलग-अलग धर्मों के लोगों का दूसरे से प्रेम हो जाना एवं विवाह कर लेना अत्यंत स्वाभाविक व सामान्य है।

अंतर्धार्मिक विवाहों में धर्म परिवर्तन अनिवार्य है ?

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर चुके हैं कि वे अंतर्धार्मिक विवाहों के खिलाफ हैं। इलाहबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय, जिसमें यह कहा गया था कि केवल विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन करना उचित नहीं है, का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘लव जिहाद करने वालों को सुधर जाना चाहिए अन्यथा उनका राम नाम सत्य हो जाएगा‘‘। उत्तरप्रदेश सरकार की माता-पिता से भी यह अपेक्षा है कि वे अपनी लड़कियों पर ‘नजर‘ रखें।

उत्तर प्रदेश सरकार के अध्यादेश को अदालत में चुनौती दिए जाने की जरूरत है क्योंकि वह संविधान में हम सबको अपने धर्म में आस्था रखने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने के मूल अधिकार का उल्लंघन है। देश में हर व्यक्ति को अपनी पसंद से अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी है। उत्तरप्रदेश सरकार का अध्यादेश और इसी तरह के अन्य कानूनों में यह निहित है कि हिन्दू संस्कृति खतरे में है, हिन्दू महिलाएं इतनी मूर्ख हैं कि वे अपना हित-अहित नहीं समझ सकतीं और इसलिए उन्हें हिन्दू पुरूषों के संरक्षण की आवश्यकता है।

स्पष्टतः इन कानूनों के निशाने पर अंतर्धार्मिक विवाह हैं विशेषकर ऐसे विवाह जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू हो। आरोप यह है कि मुसलमान पुरूषों से विवाह करने वाली हिन्दू महिलाओं को अपने धर्म का पालन नहीं करने दिया जाता और उन्हें इस्लाम कुबूल करने पर मजबूर किया जाता है।

हमारे देश में वैसे भी अंतर्धार्मिक विवाह (Inter-religious marriage) बहुत कम संख्या में होते हैं। अन्य प्रजातांत्रिक और स्वतंत्र देशों में ऐसे विवाहों की संख्या कहीं अधिक होती है। इनमें भी मुस्लिम महिलाओं और हिन्दू पुरूषों के बीच और कम विवाह होते हैं। कई मामलों में ऐसे संबंध रखने वाले या विवाह करने वाले हिन्दू पुरूषों को भी परेशानियां भुगतनी पड़ती हैं (अंकित सक्सेना)। तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां को एक हिन्दू से विवाह करने पर जमकर ट्रोल किया गया था। परंतु कुल मिलाकर अधिकांश मामलों में मुस्लिम पुरूष ही निशाने पर रहते हैं।

महाराष्ट्र में हिन्दू रक्षक समिति नामक एक संस्था को ऐसे विवाह तोड़ने में खासी विशेषज्ञता हासिल है जिनमें पति मुसलमान और पत्नी हिन्दू हो।

लव जिहाद पर मराठी में प्रकाशित एक पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर जो चित्र प्रकाशित किया गया है उसमें एक मुस्लिम लड़के को एक हिन्दू महिला को पीछे बैठाकर बाईक चलाते हुए दिखाया गया है। अगर कोई मुस्लिम महिला, हिन्दू पुरूष से शादी करती है तो उससे हिन्दू धर्म के स्वनियुक्त रक्षकों को कोई आपत्ति नहीं होती। वे इसे घरवापसी मानते हैं।

पुलिस की कई जांचों से यह जाहिर हुआ है कि लव जिहाद जैसी कोई चीज नहीं है। परंतु इस मुद्दे पर इतना शोर मचाया गया है कि लोग यह मानने लगे हैं कि देश में सचमुच लव जिहाद हो रहा है।

आखिर अंतर्धार्मिक विवाहों का इतना विरोध क्यों होता है?

क्या यह सही है कि मुस्लिम युवक योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू महिलाओं को अपने प्रेमजाल में फंसाकर मात्र इसलिए उनसे विवाह करते हैं ताकि उन्हें मुसलमान बनाया जा सके? दरअसल यह सफेद झूठ है। लोग यह भूल जाते हैं कि जब वे यह कहते हैं कि मुसलमान युवक हिन्दू युवतियों को बहला-फुसलाकर उनसे विवाह कर लेते हैं तो वे न केवल हिन्दू महिलाओं की अपना जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता समाप्त कर रहे होते हैं, वरन् वे यह भी कह रहे होते हैं कि हिन्दू महिलाएं इतनी मूर्ख हैं कि वे किसी के भी जाल में फंस जाती हैं।

मुस्लिम पुरूषों को हिन्दू धर्म के लिए खतरा बताया जाता है और हिन्दू युवतियों को बेअक्ल सिद्ध दिया जाता है। इसी सिलसिले हिन्दू अभिभावकों को यह सलाह दी जाती है कि वे इस पर कड़ी नजर रखें कि उनकी लड़कियां कहां आ-जा रही हैं, किससे मिल रही हैं और किससे फोन पर बात कर रही हैं। कुल मिलाकर वे यह चाहते हैं कि हिन्दू महिलाओं का जीवन पूरी तरह से उनके अभिभावकों के नियंत्रण में हो।

All communal nationalist ideologies are patriarchal.

सभी साम्प्रदायिक राष्ट्रवादी विचारधाराएं पितृसत्तात्मक होती हैं। उनकी यह मान्यता होती है कि महिलाएं पुरूषों की संपत्ति हैं और उन्हें पुरूषों के अधीन रहना चाहिए। वे सभी पितृसत्तात्मकता को राष्ट्रवाद के रैपर में लपेटकर प्रस्तुत करती हैं। भारत के स्वतंत्र होने और हमारे देश में संविधान लागू होने के बाद से महिलाओं को कई बंधनों से मुक्ति मिली है और वे देश के सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षणिक जीवन में महती भूमिका निभाने की ओर बढ़ रही हैं। यह उन लोगों को रास नहीं आ रहा है जो बात तो समानता की करते हैं परंतु दरअसल उन प्राचीन धर्मग्रंथों में श्रद्धा रखते हैं जो महिलाओं को पुरूषों के अधीन मानते हैं।

हम केवल यह उम्मीद कर सकते हैं कि न्यायपालिका इन कानूनों को अमल में नहीं आने देगी। धार्मिक सद्भावना को हर हाल में बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है और अंतर्धार्मिक विवाह, साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने का औजार हैं।

राम पुनियानी

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

लव जिहाद के टक्कर में ग्रामीण भारत में “राइट टू लव” कैंपेन

Right to Love Campaign

“राइट टू लव” कैंपेन ग्रामीण भारत में अंतर्जातीय-अंतर्धार्मिक जोड़ों को प्रदान कर रहा है सुरक्षा

Right to Love Campaign Protecting Interfaith and Intercaste Couples in Rural Maharashtra

राइट टू लव कैंपेन सुशांत आशा और अभिजीत द्वारा चलाया जा रहा है, दोनों पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं (Sushant Asha and Abhijeet are both journalists and social workers), वे विरोध का सामना कर रहे जोड़ों को पुलिस सुरक्षा, शादी पंजीकृत कराने में कानूनी मदद, तनाव से निपटने के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था करवाते हैं। सुशांत और अभिजीत ऐसे जोड़ों को नौकरियों के मौके भी उपलब्ध करवाने की कोशिश करते हैं।

वर्षा तोरगालकर

35 साल के हुसैन की पत्नी श्रद्धा (33) उच्च जाति की हिंदू महिला हैं। दोनों का विश्वास है कि अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक जोड़ों को धमकियों या ब्लैकमेलिंग की परवाह नहीं करनी चाहिए। उन्हें मनमर्जी से साथ में वक़्त बिताना चाहिए और शादी करनी चाहिए।

हुसैन और श्रद्धा ने अपने परिवारों वालों की मर्जी के खिलाफ़ 2015 में शादी की थी। दोनों बाद में अपने माता-पिता की नफ़रत को कम करने में कामयाब रहे। हालांकि इसमें उनकी शादी के बाद कुछ सालों का वक़्त लग गया।

हुसैन (बदला हुआ नाम) आगरा के रहने वाले हैं और श्रद्धा (बदला हुआ नाम) झांसी की रहने वाली हैं। दोनों पुणे में काम करते हैं और उन्होंने 2012 से डेटिंग शुरू की थी।

श्रद्धा कहती हैं,

“जब मेरे माता-पिता को शक हुआ कि मैं किसी और को डेट कर रही हूं, तब उन्होंने मुझ पर शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्हें बिलकुल नहीं पता था कि मैं एक मुस्लिम लड़के के साथ डेटिंग कर रही हूं। हमने अपनी सुरक्षा के लिए शादी कर ली, क्योंकि अगर मैं कानूनी तौर पर शादीशुदा हूं, तो वे चाहकर भी कुछ नहीं करेंगे। हमें राइट टू लव कैंपेन के बारे में भी पता चला।”

जानिए क्या है राइट टू लव कैंपेन | Know what is right to love campaign

राइट टू लव कैंपेन सुशांत आशा और अभिजीत के चलाते हैं। दोनों पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे लोग विरोध का सामना कर रहे जोड़ों को पुलिस द्वारा सुरक्षा उपलब्ध करवाने में मदद करते हैं, शादी के पंजीकरण में उनकी कानूनी सहायता करते हैं, अगर ऐसे लड़के-लड़कियों को तनाव का सामना कना पड़ रहा है, तो उन्हें चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराते हैं। यह लोग नौकरियां हासिल करने में भी उनकी मदद करते हैं।

हरियाणा, उत्तरप्रदेश और कर्नाटक में अंतर्धार्मिक विवाह पर प्रतिबंध लगाने की बातों का बाज़ार गर्म है, ऐसे वक़्त में RTL ने जो काम किया है, वह फीका पड़ जाता है। महाराष्ट्र में राइट टू लव (Right to love in Maharashtra) ने अब तक 50 से ज़्यादा शादियों में मदद की है, इनमें तीन अंतर्धार्मिक हैं, जबकि बाकी अंतर्जातीय हैं।

RTL से मिली मदद के बारे में बताते हुए हुसैन ने न्यूज़क्लिक से कहा,

“हमें इस बात का पता ही नहीं था कि अंतर्धार्मिक जोड़ों को अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत दर्ज कराना होता है। हमने अप्रैल, 2015 में सुशांत और अभिजीत की मदद से शादी की थी। हम डर के मारे दुबई भाग गए और एक साल बाद पुणे वापस लौटे। हमें ज़्यादा डर श्रद्धा के परिवार से था। सौभाग्य से अब उसके और मेरे परिवार ने हमें अपना लिया है।”

सुशांत कहते हैं,

“अपने माता-पिता के खिलाफ़ जाने से उनके मानसिक स्वास्थ्य पर तनाव पड़ता है। हमें जोड़ों को काउंसलिंग और मदद देनी होती है। ग्रामीण इलाकों में माता-पिता हिंसात्मक तौर पर भी प्रतिक्रिया दे सकते हैं, यहां तक कि वे हत्या तक भी कर सकते हैं। इतने गंभीर मामलों में हम पुलिस को शिकायत देते हैं और सुरक्षा की मांग करते हैं। पुलिस इस प्रक्रिया में मददगार रही है।”

वह आगे कहते हैं,

“हमें शादी करने वालों के सामने कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या भी करनी होती है। उदाहरण के लिए, अगर शादी करने वाले जोड़ा हिंदू है, तो वे हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के हिसाब से काम कर सकते हैं। हम उनके लिए नौकरी खोजने की भी कोशिश करते हैं, हालांकि हर बार हम इसमें सफल नहीं हो पाते। हमारे पास किसी तरह का निवेश नहीं है। हमारे काउंसलर, वकील और दोस्त हमारी मदद करते हैं।”

भारत में अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक शादियां | Inter-caste and inter-religious marriages in India

एक सर्वे के मुताबिक़, 2019 में दिल्ली में दर्ज हुई कुल शादियों में से सिर्फ़ दो फ़ीसदी ही स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत दर्ज हुई हैं। वहीं 2011 की जनगणना के मुताबिक़, सिर्फ़ 5.8 फ़ीसदी शादियां ही अंतर्जातीय रहीं। जबकि इन्हें प्रोत्साहन देने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही थीं।

रविंद्र साठे (नाम बदला गया) एक स्थानीय निजी कार्यालय में ड्राइवर हैं। वे आज भी पांच पहले की स्थितियों को यादकर सहम जाते हैं। रविंद्र और उनकी गर्लफ्रेंड को उसके परिवार से जान बचाने के लिए शहरों-शहर भागना पड़ा था। रविंद्र अनुसूचित जनजाति से आते हैं, वे महाराष्ट्र में सांगली के रहने वाले हैं। उन्होंने 8 साल पहले श्रुति के साथ डेटिंग शुरू की, जो उच्च जाति से आती हैं।

रविंद्र कहते हैं,

“जब उसके परिवार को पता चला कि हम डेटिंग कर रहे हैं, तो उन्होंने श्रुति की जबरदस्ती 2015 में शादी करने की कोशिश की। श्रुति का परिवार अमीर था और उसके अंकल विधायक थे। इसलिए उन्होंने अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए उसकी शादी तय करने का फ़ैसला किया। इसके बाद हम वहां से भाग गए।”

वह कहते हैं,

“उसका परिवार हमें मार सकता था, इसलिए हम त्रयंबकेश्वर चले गए, उसके बाद हैदराबाद, फिर वाराणसी पहुंचे। लोग समझ जाते थे कि हम स्थानीय नहीं हैं और घर से भागकर आए हैं। हम परेशान हो चुके थे, हमें लगा कि महाराष्ट्र ही हमारे रहने के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। सौभाग्य से रेलवे में एक टिकट चेकर, जो महाराष्ट्रियन था, उसने हमारी स्थिति भांप ली और उसने हमें एक हजार रुपये दिए और हमसे घर वापस लौटने के लिए कहा। मैं भी लगातार चार महीनों तक भाग-भागकर परेशान हो चुका था।”

वह आगे कहते हैं,

“इस बीच एक दोस्त ने राइट टू लव का फोन नंबर दिया। सुशांत और उनकी टीम ने हमें भरोसा दिलाया कि उनके पास वकीलों, डॉक्टरों की एक टीम है और मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है। उनके काउंसलर ने हमें बताया कि क्यों हमें अपनी जान की चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने मुझे एक स्कूल बस में ड्राइवर की नौकरी दिलवाने में मदद की। अब मैं बेहतर कर रहा हूं। श्रुति की मां और भाई हमसे बात करते हैं, लेकिन उसके पिताजी अब भी नाराज हैं।”

हिंदुत्व समूहों द्वारा मांग की जा रही है कि शादी के बाद धर्म बदलने पर प्रतिबंध लगाया जाए। इस तरह के कदम की निरर्थकता बता हुए मुस्लिम सत्यशोधक मंडल (Muslim Satyashodhak Mandal) के शम्सुद्दीन तमबोली ने न्यूज़क्लिक से कहा,

“गोहत्या रोकथाम कानून की तरह लह जिहाद भी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर बनाई गई धारणा है। हिंदुत्ववादी संगठन इनका उपयोग समाज को ध्रुवीकृत करने के लिए करते हैं, जो संविधान के खिलाफ है। गोहत्या रोकथाम कानून के बाद से ही मॉब लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। हमारे पास पहले से ही धर्म परिवर्तन विरोधी कानून हैं, फिर एक नए कानून की क्या जरूरत है?  इस कानून के आने के बाद, मुस्लिमों पर हमले या उनकी लिंचिंग में इज़ाफा होगा।”

MSM ने भी कई अंतर्धार्मिक जोड़ों की शादियां करने में मदद की है।

वह कहते हैं,

“इसके बजाए समाज को जोड़ने के लिए अंतर्धार्मिक शादियों को प्रोत्साहन देने के लिए योजनाएं होनी चाहिए। राइट टू लव एक ऐसा संगठन है, जो ऐसा समाज बनाने में योगदान दे रहा है, जिसकी कल्पना महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर ने की थी। इसी तरह के कई संगठनों को अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय जोड़ों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।”

(न्यूजक्लिक में प्रकाशित रिपोर्ट का संपादित रूप साभार)

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता की राय : धर्मांतरण कानून संविधान विरोधी ही नहीं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी

yogi adityanath

यूपी सरकार द्वारा लाया धर्मांतरण कानून संविधान विरोधी ही नहीं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी है।

The conversion law brought by the UP government is not only anti-constitutional but also a violation of fundamental rights.

आज जहां दुनिया टेक्नोलॉजी / साइंस, व्यवसाय आदि में  कामयाबी हासिल कर रही है वही हमारी सरकार सिर्फ सिर्फ लव जिहाद (कथित धर्म परिवर्तन) को रोकने पर आतुर है. किसी अन्य क्षेत्र पर क्यों कोई बात नहीं हो रही, हमारे पास शिक्षा पर काम करने के लिए कोई मुद्दा नहीं है, रोजगार, स्वास्थ्य पर बात करने का समय नहीं है. पर आरएसएस के प्रोजेक्ट पर काम कर रही सरकार नए धर्मांतरण विरोधी कानून को लाकर लव जिहाद (love jihad) पर समाज में बात करा रही है. सरकार यह दिखा रही है कि हम सिर्फ धर्म बचाने का ठेका लेकर पैदा हुए हैं.

धर्म जो व्यक्ति का निजी मामला है और हर कोई इसे मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है उसे जबरन राजनीति का विषय बनाया जा रहा है.

आजादी के आंदोलन के नेताओं व विद्वानों ने संविधान का निर्माण किया था क्या उस समय धर्म नहीं था या लोगों के विचार नहीं थे या उनके सोचने समझने की क्षमता क्षीण थी? नहीं ! आज राज्य सरकार धर्मांतरण कानून बनाने हेतु तत्पर है क्या यह कानून संविधान के दायरे में है क्या यह कानून लोगों के विचार को समाप्त करने के लिए है?  क्या आज जनमानस के सोचने की क्षमता सिर्फ सरकारों पर निर्भर है?  क्या चुनाव करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ सरकार का होगा (क्या खाना है, कहां रहना है, क्या पहनना है किसी से मिलना है आदि इत्यादि) अथवा ये आम आदमी के अधिकार रहेंगे यह बड़ा सवाल आज खड़ा हो गया है.

शायद सरकार भी अब संविधान या किसी कानून या माननीय उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की दी गई विभिन्न व्यवस्थाओं को नहीं मानती है। या यूं कहें सत्ता की हनक जो मर्जी वही करेंगे हर जोर जुल्म करने का कानून हमारा है. समाज कहां जा रहा है सबको पता है और बहुत सारे मामले अदालतों में जाते हैं जहां बात सिर्फ कानून की होती है और अदालतें निर्णय देती हैं जिसमें न्यायालय द्वारा व्याख्या भी किया जाता है।

वर्ष 2014 में एक मामला नूरजहां उर्फ अंजलि बनाम उत्तर प्रदेश सरकार माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में गया जिसमें धर्म परिवर्तन को मान कर दो लोगों के पवित्र बंधन को समाप्त कर दिया. एक अन्य मामला प्रियांशी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार हुआ जिसमें न्यायालय ने इसे अभिव्यक्ति व स्वतंत्र विवाह को नहीं माना. लेकिन वर्ष 2020 की 11 नवंबर में एक और मामले में सलामत अंसारी व प्रियंका खरवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि प्रियांशी हुआ नूरजहां मामले में एकल पीठ का फैसला सही नहीं है, और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो रहने का अधिकार है. यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का मूल तत्व है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि हम यह समझने में नाकाम हैं कि जब कानून दो व्यक्तियों को चाहे वह समान लिंग के ही क्यों ना हो शांति पूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो किसी को भी चाहे वह किसी व्यक्ति, परिवार द्वारा ही क्यों ना हो उनके रिश्ते पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है. (जहां न्यायालय ने समलैंगिकता को माना है व्यभिचार को समाप्त कर दिया गया है एवं लिव इन रिलेशनशिप को भी माना है)

कोर्ट ने दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण किया और अपने निर्णय में यह भी तय कर दिया कि कानून से बढ़कर कोई नहीं. कोर्ट ने इस सम्बन्ध में लिखी एफआईआर को भी रद्द कर दिया.

कोर्ट के अनुसार हर किसी को अपनी मर्जी से चुनाव करने का अधिकार प्राप्त है. हम सभी को अपने मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने का हक है. जो हमसे कोई अवैधानिक कानून बना कर छीन नहीं सकता और अगर ऐसा करना है तो वह संविधान विरोधी/विधि विरुद्ध है।

पर योगी सरकार को इससे क्या वास्ता वह तो न संविधान को मानती न ही न्यायालय का सम्मान ही करती है तब ऐसे में नागरिक समाज का ही यह दायित्व है कि वह उसे संविधान का सम्मान करने और न्यायालय के निर्णय मानने के लिए बाध्य करे. धर्मांतरण विरोधी कानून के खिलाफ भी नागरिकों की एकता वक्त की जरूरत है.

कमलेश सिंह

एडवोकेट, हाईकोर्ट

डॉ. राम पुनियानी से समझिए जिहाद का असली अर्थ

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

जिहाद के असली अर्थ को समझने की ज़रूरत

Jihad and Jihadi : ARTICLE BY DR RAM PUNIYANI IN HINDI – JIHAD

जिहाद और जिहादी – इन दोनों शब्दों का पिछले दो दशकों से नकारात्मक अर्थों और सन्दर्भों में जम कर प्रयोग हो रहा है. इन दोनों शब्दों को आतंकवाद और हिंसा (Terrorism and violence) से जोड़ दिया गया है. 9/11 के बाद से इन शब्दों का मीडिया में इस्तेमाल आम हो गया है. 9/11/2001 को न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (World Trade Center in New York) की इमारत से दो हवाईजहाजों को भिड़ा दिया गया था. इस घटना में लगभग 3,000 निर्दोष लोग मारे गए थे. इनमें सभी धर्मों और राष्ट्रीयताओं के व्यक्ति शामिल थे.

Osama bin Laden called the attack on the World Trade Center in New York a jihad.

ओसामा बिन लादेन ने इस हमले को जिहाद बताया था. इसके बाद से ही अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद(Islamic terrorism) शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. मुस्लिम आतंकी गिरोहों द्वारा अंजाम दी गई हर घटना को इस्लामिक आतंकवाद बताया जाने लगा. देवबंद और बरेलवी मौलानाओं सहित इस्लाम के अनेक अध्येताओं के बार-बार यह साफ़ करने के बावजूद कि इस्लाम निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा की इज़ाज़त नहीं देता, इस शब्द का बेज़ा प्रयोग जारी है.

The word Jihad has become a weapon in the hands of communal and disruptive forces.

जिहाद शब्द सांप्रदायिक और विघटनकारी ताकतों के हाथों में एक हथियार बन गया है. सोशल मीडिया के अलावा मुख्यधारा के मीडिया में भी इसका धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. गोदी मीडिया इस जुमले का प्रयोग मुसलमानों के विरुद्ध ज़हर घोलने के लिए कर रहा है.

हाल (11 मार्च 2020) में ज़ी न्यूज़ के मुख्य संपादक श्री सुधीर चौधरी  (Chief Editor of Zee News, Mr. Sudhir Chaudhary) ने तो सभी हदें पार कर दीं. उन्होंने बाकायदा एक चार्ट बनाकर जिहाद के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया – लव जिहाद, लैंड जिहाद और कोरोना जिहाद (Love Jihad, Land Jihad and Corona Jihad)! चौधरी साहब का कहना था कि इन विभिन्न प्रकार के  जिहादों द्वारा भारत को कमज़ोर किया जा रहा है. चौधरी जी क्या कहना चाह रहे थे, ये तो वही जानें परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि टीवी पर इस तरह के कार्यक्रमों से मुसलमानों और जिहाद के बारे में मिथ्या धारणाएं बनती हैं.

Such propaganda is not new to the dock media.

गोदी मीडिया के लिए इस तरह का दुष्प्रचार कोई नई बात नहीं है. परन्तु इस बार जो नया था वह यह कि संपादक महोदय के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई. इसके तुरंत बाद उनका सुर बदल गया. अगले कार्यक्रम में उन्होंने जिहाद शब्द का काफी सावधानी से और सम्मानपूर्वक इस्तेमाल किया. यह कहना मुश्किल है कि उन्हें अचानक कोई इलहाम हुआ था या फिर वे क़ानूनी कार्यवाही से डर गए थे.

आज जिहाद शब्द का इस्तेमाल हिंसा और आतंकवाद के पर्यायवाची बतौर किया जाता है. परन्तु कुरान में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है. इस्लामिक विद्वान असग़र अली इंजीनियर के अनुसार कुरान में इस शब्द के कई अर्थ हैं. इसका मूल अर्थ है अधिकतम प्रयास करना या हरचंद कोशिश करना. निर्दोषों के साथ खून-खराबे से जिहाद का कोई लेनादेना नहीं है. हां, बादशाह और अन्य सत्ताधारी इस शब्द की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं. अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्तार की लडाई को वे धार्मिक रंग देते रहे हैं. ठीक इसी तरह, ईसाई राजाओं ने क्रूसेड (The crusade) और हिन्दू राजाओं ने धर्मयुद्ध (Religious war) शब्दों का दुरुपयोग किया.

कुरान और हदीस के गहराई और तार्किकता से अध्ययन से हमें जिहाद शब्द का असली अर्थ समझ में आ सकता है. भक्ति संतों की तरह, सूफी संत भी सत्ता संघर्ष से परे थे और धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर जोर देते थे. उन्होंने इस शब्द के वास्तविक और गहरे अर्थ से हमारा परिचय करवाया.

इंजीनियर के अनुसार,

“यही कारण है कि वे युद्ध को जिहाद-ए-असग़र और अपनी लिप्सा व इच्छाओं पर नियंत्रण की लडाई को जिहाद-ए-अकबर (महान या श्रेष्ठ जिहाद) कहते थे”

(‘ऑन मल्टीलेयर्ड कांसेप्ट ऑफ़ जिहाद’, ‘ए मॉडर्न एप्रोच टू इस्लाम’ में, धर्मारम, पृष्ठ 26, 2003, बैंगलोर).

कुरान में जिहाद शब्द का 40 से अधिक बार उपयोग किया गया है और अधिकांश मामलों में इसे ‘जिहाद-ए-अकबर’ के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है – अर्थात अपने मन पर नियंत्रण की लडाई.

जिहाद शब्द के गलत अर्थ में प्रयोग – चौधरी जिसके एक उदाहरण हैं –  की शुरुआत पाकिस्तान में विशेष तौर पर स्थापित मदरसों में मुजाहिदीनों के प्रशिक्षण के दौरान हुई. यह प्रशिक्षण अमरीका के इशारे पर और उसके द्वारा उपलब्ध करवाए गए धन से दिया गया था. यह 1980 के दशक की बात है. उस समय रूसी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और वियतनाम में अपनी शर्मनाक पराजय से अमरीकी सेना का मनोबल इतना गिर गया था कि वह रुसी सेना का मुकाबला करने में सक्षम नहीं थी. इसलिए अमरीका ने मुजाहिदीनों के ज़रिये यह लड़ाई लड़ी.

The US used the extreme Salafi version of Islam to obsess over a section of Muslim youth.

अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी सलाफी संस्करण का इस्तेमाल मुस्लिम युवाओं के एक हिस्से को जुनूनी बनाने के लिए किया. मुस्लिम युवाओं को अमरीका के धन से संचालित मदरसों में तालिबान बना दिया गया. उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम का पाठ्यक्रम  वाशिंगटन में तैयार किया गया. उन्हें अन्य समुदायों से नफरत करना सिखाया गया और काफिर शब्द का तोड़ा-मरोड़ा गया अर्थ उनके दिमाग में ठूंसा गया. उन्हें बताया गया कि कम्युनिस्ट काफ़िर हैं और उन्हें मारना जिहाद है. और यह भी कि जो लोग जिहाद करते हुए मारे जाएंगे उन्हें जन्नत नसीब होगी जहाँ 72 हूरें उनका इंतज़ार कर रहीं होंगीं.

अमरीका ने ही अल कायदा को बढ़ावा दिया (America promoted al Qaeda) और अल कायदा रूस-विरोधी गठबंधन का हिस्सा बन गया. महमूद ममदानी ने अपनी पुस्तक ‘गुड मुस्लिम, बेड मुस्लिम’ में लिखा है कि सीआईए के दस्तावेजों के अनुसार, अमरीका ने इस ऑपरेशन पर लगभग 800 करोड़ डॉलर खर्च किये और मुजाहीदीनों को भारी मात्रा में आधुनिक हथियार उपलब्ध करवाए, जिनमें मिसाइलें शामिल थीं.

डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani) लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं
डॉ. राम पुनियानी (Dr. Ram Puniyani)
लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन्  2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं

हम सबको याद है कि जब अल कायदा के नेता अमरीका की अपनी यात्रा के दौरान वाइट हाउस पहुंचे तब राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उनका परिचय ऐसे लोगों के रूप में दिया जो कम्युनिज्म नामक बुराई के खिलाफ लड़ रहे हैं और अमरीका के निर्माताओं के समकक्ष हैं.

यह बात अलग है कि बाद में यही तत्त्व भस्मासुर साबित हुए और उन्होंने बड़ी संख्या में मुसलमानों की जान ली. इस्लामिक स्टेट और आईएसआईइस जैसे संगठन भी अस्तित्व में आ गए. ऐसा अनुमान है कि पश्चिम एशिया के तेल के कुओं पर कब्ज़ा करने के अमरीकी अभियान के तहत जिन संगठनों को अमरीका  ने खड़ा किया था उन्होंने अब तक पाकिस्तान के 70,000 नागरिकों की जान ले ली है.

सुधीर चौधरी जैसे लोग ‘जिहाद’ शब्द का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए कर रहे हैं. यह संतोष की बात है कि कानून का चाबुक फटकारते ही वे चुप्पी साध लेते हैं. हम आशा करते हैं कि इस तरह के घृणा फैलाने वाले अभियानों का वैचारिक और कानूनी दोनों स्तरों पर मुकाबला किया जायेगा और भारतीय संविधान इसमें हमारी सहायता करेगा.

डॉ. राम पुनियानी

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

हिन्दू राष्ट्र की ओर रणनीतिकारों के कदम | सड़कों पर लड़ाई की तैयारी केवल संघ परिवार के पास है

Amit Shah Narendtra Modi
Steps of strategists towards Hindu Rashtra

अच्छा कमांडर युद्ध में लड़ते लड़ते दुश्मन की फौज (Enemy forces) को ऐसी जगह लाने की कोशिश करता है जहाँ सामरिक स्थिति उसके पक्ष में और दुश्मन के प्रतिकूल होती है। आज भाजपा (BJP) ने देश में अपने विपक्ष को ऐसी ही स्थिति में ला कर घेर लिया है। लोकतंत्र के सारे कच्चे व अधबने स्तम्भ धाराशायी कर दिये गये हैं व लड़ाई को सड़कों पर ला दिया गया है। स्थिति यह है कि सड़कों पर लड़ाई की तैयारी केवल संघ परिवार के पास है। जब लोकतंत्र नहीं होता तब संख्या बल नहीं सैनिक बल ही काम करता है। पिछली अर्ध शताब्दी में सत्तारूढ़ रहे निजी स्वार्थ में अंधे लोगों ने सड़क की लड़ाई की कल्पना तक नहीं की होगी।

संघ परिवार ना तो अंग्रेज शासकों को भारत से हटाने का पक्षधर था और ना ही वर्तमान संविधान को लागू करने के पक्ष में था।

संविधान बनते समय ही संघ परिवार का कहना था कि जब हमारे यहाँ मनु स्मृति के रूप में संविधान मौजूद है तब नया संविधान बनाने की क्या जरूरत। ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान‘ का नारा देकर अलग पाकिस्तान की मांग का बीजारोपण करने वाला यह विचार और इसका संगठन विभाजन के दौर में हुए साम्प्रदायिक दंगों में एक घटक की भूमिका निभाता रहा, और ऐसी मानसिकता तैयार करता रहा जिसमें देश की विविधता के महत्व को समझने वाले धर्म निरपेक्ष महात्मा गाँधी की हत्या हुई। उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा तो बाद में मिला किंतु स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाने वाली काँग्रेस के पिता की भूमिका वे निभा रहे थे। उन्हें परिवार के उस बुजुर्ग की तरह देखा जाता था जिसका निर्देश अंतिम माना जाता है। ऐसे व्यक्ति की हत्या के बाद भी काँग्रेस ने उस विचारधारा का मुकाबला करने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया, जिसने उसके ‘पिता’ की हत्या की पृष्ठभूमि तैयार की थी। इसे एक आपराधिक घटना मान कर और गोली चलाने वाले व्यक्ति को नियमानुसार सजा दिलाने के साथ ही उन्होंने कर्तव्य की इतिश्री मान ली।

स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार में सभी तरह की विचारधारा के लोग सम्मलित किये गये थे जिनमें एक ओर अम्बेडकर थे तो दूसरी ओर श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे। समाजवादी सोच के लोग भी थे तो रूस की क्रांति से प्रभावित लोग भी थे। पार्टी में पूंजीपतियों के प्रभाव के कारण औद्योगिक श्रमिकों और किसानों का पक्ष लेने वाले कम्युनिस्ट उनके प्रमुख शत्रु थे जो पहले और दूसरे आम चुनाव में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभर कर सामने आये। राज्यों में पहली गैर कांग्रेसी सरकार भी 1957 में केरल में कम्युनिस्टों की ही बनी। इनका मुकाबला करने के लिए भी काँग्रेस सरकार परोक्ष में संघ को पालती पोसती रही।

1962 में चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद ने जब सैनिक हस्तक्षेप का रूप ले लिया तब देश के अन्दर उसके सभी विरोधियों को कम्युनिस्टों की आलोचना का बहाना मिल गया। परिणाम यह हुआ कि वे अलोकप्रिय हुए और तत्कालीन सरकार द्वारा आरएसएस की एक टुकड़ी को 26 जनवरी की परेड तक में बुला लिया गया था।

उल्लेखनीय है कि संघ को गाँधीजी की हत्या के बाद प्रतिबंधित किया गया था। इसी के दो साल बाद देश में कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ और वे और कमजोर हो गये।

जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद पाकिस्तान के साथ युद्ध और उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इन्दिरा गाँधी व मोरारजी देसाई के बीच शक्ति परीक्षण हुआ जिसमें इन्दिरा गाँधी चुनी गयीं।

1967 में काँग्रेस के कमजोर होने से कई राज्यों में गैरकाँग्रेसवाद के आधार पर संविद सरकारें चुनी गयीं। कुछ औद्योगिक घरानों ने श्रीमती गाँधी की जगह मोरारजी देसाई गुट को सत्ता में देखना चाहा तो श्रीमती गाँधी ने कम्युनिस्टों से समझौता कर अपनी सरकार बचा ली और उम्र में वरिष्ठ नेताओं के दूसरे गुट को बाहर का रास्ता दिखा दिया जो बाद में पुरानी काँग्रेस के नाम से जाना गया। कम्युनिस्टों से सहयोग लेने के लिए श्रीमती गाँधी को उनकी कुछ शर्तें माननी पड़ीं जिनमें बैंकों और बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण व पूर्व राज परिवारों को मिलने वाले प्रिवी पर्स व विशेष अधिकारों की समाप्ति भी थी।

विभाजित पुरानी काँग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने तत्कालीन भारतीय जनसंघ, पूर्व राजाओं वाली स्वतंत्र पार्टी, और संसोपा आदि से मिल कर मोर्चा बनाया। इस मोर्चे में सबसे संगठित घटक जनसंघ ही था जो आरएसएस का आनुषांगिक संगठन था जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया। दूसरे घटक दल या तो सामंती प्रभाव केन्द्रित थे जैसे राजा महाराजा, इतिहास केन्द्रित जैसे पुरानी काँग्रेस के वरिष्ठ नेता, या कमजोर संगठन वाले समाजवादी थे जैसे संसोपा आदि। जनसंघ एक हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाली विचारधारा का संगठन वाला दल था जो राष्ट्रवाद का मुखौटा लगा कर प्रकट होता था व जिसे विभाजन के दौरान हुए साम्प्रदायिक दंगों में हिन्दू पक्षधरता की भूमिका निभाने के कारण बहुसंख्यकों की सहानिभूति मिली हुई थी। यही कारण रहा कि इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

1971 में कम्युनिस्टों के साथ से श्रीमती गाँधी ने अपनी छवि गरीब हितैषी और पूंजीपति, राजा महाराजा विरोधी बना कर चुनाव जीत समाजवाद के नाम पर सबका सफाया कर दिया था। उन्होंने 1971-72 में पाकिस्तान के विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर स्वतंत्र बांग्लादेश बनवा दिया जिससे वे देश की एकक्षत्र लोकप्रिय नेता बन गयीं, छिटके कांग्रेसी काँग्रेस में वापिस आने लगे थे। बाद में उन्हें अदालती आदेश से पदच्युत करने के प्रयास हुए, जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन, इमरजैंसी और जनता पार्टी का गठन, काँग्रेस की पराजय व पुनः वापिसी के काम हुए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने तो 1971 में ही उनका साथ छोड़ दिया था व 1978 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की समझ में भी आ गया कि कांग्रेस का वर्ग चरित्र क्या है। श्रीमती गाँधी ने भी समाजवाद का चोला उतार फेंका व चुनिन्दा पूंजीपतियों और पूर्व राज परिवारों के सदस्यों को काँग्रेस में उचित स्थान दिया।

1971 से ही श्रीमती गाँधी ने समझ लिया था कि दलित और संघ से आतंकित मुस्लिम समुदाय के सुनिश्चित वोटों के साथ जब लोकप्रिय उम्मीदवारों को जोड़ लिया जाये तो चुनाव जीते जा सकते हैं और सत्ता बनाये रखी जा सकती है। सत्तारूढ़ दल को कार्पोरेट घराने तो भरपूर आर्थिक मदद करते ही हैं। इसी कारण श्रीमती गाँधी ने काँग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र को समेट दिया व दिल्ली से मनोनीत अस्थायी समितियों के सहारे पार्टी चलायी। वे स्वयं पार्टी अध्यक्ष भी बनी रहीं। काँग्रेस पार्टी वन मैन शो बन गयी थी, इन्दिरा इज इण्डिया कहा जाने लगा था इसलिए उनकी हत्या से इण्डिया की हत्या का प्रयास हुआ। उनके बाद अनाथ काँग्रेसियों द्वारा राजीव गाँधी को लाया गया, जिन्हें कभी राजनीति में रुचि नहीं थी। थोड़े दिनों बाद उनके खिलाफ विद्रोह हो गया और उनकी भी हत्या हो गयी। उसके बाद वर्षों तक देश संयुक्त मोर्चों और विभिन्न बेमेल गठबन्धनों में खिंचता रहा।

1977 में जब जनता पार्टी में, जो प्रमुख गैरकाँग्रेसी दलों के विलय से बनी थी, तब दूरदृष्टि से भारतीय जनसंघ ने भी उसमें अपना दिखावटी विलय कर दिया था।

बाद में इसी नकली विलय की पहचान होने व संघ और पार्टी की दोहरी सदस्यता के कारण ही जनता पार्टी का विभाजन हुआ था। जनसंघ के लोग जैसे गये थे वैसे के वैसे बाहर निकल कर आ गये और उन्होंने भारतीय जनसंघ का ‘भारतीय’ लेकर उसे जनता पार्टी में जोड़ ‘भारतीय जनता पार्टी’ का गठन कर लिया। अब वे ज्यादा अनुभवी, समर्थ, और व्यापक थे। भले ही श्रीमती गाँधी की हत्या से उत्पन्न प्रभाव के कारण उन्हें 1984 में कुल दो सीटें मिली हों किंतु वोट भरपूर और दूर-दूर तक मिले थे। इसी स्थिति में उन्होंने अयोध्या के राम जन्मभूमि मन्दिर विवाद को अपना राजनीतिक आन्दोलन बनाया और रथ यात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद तोड़ने तक से उत्पन्न उत्तेजना को वोटों में बदल लिया। बाबर के बहाने सम्पूर्ण मुस्लिम समाज से नफरत फैलाने से जो ध्रुवीकरण हुआ, उससे उन्हें चुनावी लाभ मिला। अनाथ काँग्रेस सिमटती गयी और भाजपा के समर्थन में बढ़ोत्तरी होती गयी।

वे सत्ता के महत्व को पहचान गये थे कि हिन्दू राष्ट्र का उनका लक्ष्य इसी के सहारे मिलेगा इसलिए उन्होंने सारी नैतिकताओं को ताक पर रखते हुए सत्ता के लिए हर सम्भव समझौते किये। विधायकों की खरीद, बेमेल गठबन्धन, अवैध धन की व्यवस्था, जातिवादी समझौते, दुष्प्रचार, हिंसा, सैलीब्रिटीज से सौदा, मतदाताओं को प्रलोभन से लेकर वोटों की लूट तक किसी भी हथकण्डे से गुरेज नहीं किया। साम्प्रदायिक नफरत और तनाव तो उनकी मूलभूत पूंजी ही थी। छह वर्ष तक अटल बिहारी की सरकार से लेकर दस साल मनमोहन सिंह की सरकार तक लोकसभा इनकी ही मर्जी से चली। कभी ईवीएम के खिलाफ किताब निकालने वाले क्यों बाद में ईवीएम का बचाव करते दिखे यह रहस्य है।

2004 में अटल बिहारी सरकार की पराजय पर मोदी को हटाये जाने की मांग ले अनशन पर बैठ जाने वाली स्मृति ईरानी हों, या मोदी को विकास नहीं विनाश पुरुष बताने वाली उमा भारती हों, सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद पर बैठाने की इच्छा रखने वाले बाल ठाकरे हों या महात्वाकांक्षी अरुण जैटली जैसे अन्य लोग, सबने अचानक ही संघ के निर्देश पर 2002 के कलंकित मोदी को 2013 में प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में स्वीकार कर लिया था और क्रमशः मोदी ने अपने विश्वासपात्र अमितशाह को भाजपा अध्यक्ष बनवा कर व गृहमंत्री की जिम्मेवारी दे कर श्रीमती गाँधी की तरह से सरकार और पार्टी पर अपना अधिकार जमा लिया था। इन्दिरा इज इण्डिया की जगह मोदी ने ले ली, पार्टी और सरकार में कोई कद्दावर नहीं बचा। कहीं से छुटपुट आवाजें उठीं भी तो पालतू बना लिये गये मीडिया ने उसे फैलने नहीं दिया।

इस अभियान में सबसे पहले कार्पोरेट घरानों को इस विश्वास में लिया गया कि उनके दूरगामी हित केवल मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा से ही सध सकते हैं। इन घरानों से सारे प्रमुख मीडिया घरानों  को खरीदवा लिया गया जिनमें एक साथ एक जैसी सामग्री का प्रसारण कराया गया। यह काम इस तरह से हुआ कि मीडिया का नाम ही गोदी मीडिया पड़ गया। चुनाव प्रबन्धन के लिए प्रशांत किशोर जैसे चुनावी प्रबन्धकों के तकनीकी ज्ञान का उपयोग किया गया। पहली बार थ्री डी तकनीक के सहारे एक साथ सैकड़ों जगह भाषण का प्रसारण दिखाया गया। रैलियों का प्रसारण एक साथ सैकड़ों चैनलों पर हुआ जिसमें भीड़ को कई गुणित दिखाने वाले कैमरों का प्रयोग किया गया। मीडिया को बेहतरीन दरों पर भरपूर विज्ञापन दिये गये। अतिरिक्त सहायता के लिए कार्पोरेट घरानों के उत्पादों के विज्ञापन दिलाये गये बदले में उन्होंने वही लिखा जो पार्टी चाहती थी। विपक्षी नेताओं को कमजोर साबित करना और उनका मजाक बनाना भी इसी अभियान का हिस्सा रहा। सोशल मीडिया के लक्षित ग्रुप बनवाये गये और एक सूचना के अनुसार उन्हें सामग्री उपलब्ध कराने के लिए ग्यारह हजार विशेषज्ञ लोग नियुक्त किये गये।

व्यापक स्तर पर छोटे व जातिवादी दलों को मिला कर 40 से अधिक दलों से गठबन्धन किया गया व जहाँ सम्भव था दलबदल कराया गया। यहाँ तक कि मनमोहन सिंह के मंत्रिमण्डल के अनेक सदस्यों तक को फुसला लिया गया। सेना और पुलिस के अधिकारियों सहित पूर्व प्रशासनिक अधिकारी तक पार्टी में लिये गये व उन्हें टिकिट व पद दिये गये। कुछ नौकरशाहों को पुराने पापों को माफ कर देने के वादों पर झुका लिया गया। मुरली मनोहर जोशी, अडवाणी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा आदि पुराने नेताओं को कोने में समेट दिया गया। इसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी, मनोहर पारीकर, अरुण जैटली, सुषमा स्वराज, मदन लाल खुराना, अनंत कुमार अनिल माधव दवे, आदि दिवंगत हो गये। सारे फैसले लेने के लिए ऊपर आरएसएस प्रमुख और नीचे मोदीशाह ही बचे। शेष केवल समर्थन में हाथ उठाने वाले ही बचे थे क्योंकि उनका मुँह खोलना प्रतिबन्धित था।

राजनीति पर पकड़ तो बना ली किंतु अर्थ व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं कर सके, वह बिगड़ती गयी, जीडीपी गिरता गया, मन्दी से कारखाने बन्द होते गये, नोटबन्दी जैसे कदमॉं के बाद भी काला धन नहीं निकाल सके, बेरोजगारी से युवा परेशान होता गया, मँहगाई पर कोई नियंत्रण नहीं रहा, जरूरी चीजें दिन प्रति दिन पहुँच से दूर होने लगीं। इतना सब होते हुए भी विपक्ष के पास ना तो नेतृत्व था और ना ही संगठन। उसके अनेक नेताओं पर पिछले दिनों किये गये भ्रष्टाचार की तलवार अलग से लटक रही थी। इधर विरोध करने वालों पर दमन की पूरी तैयारी रही। गुजरात 2002 की तरह आन्दोलनकारी छात्रों और युवाओं पर पालतू बाहुबलियों से हमले करवाये जाने लगे और पीछे से पुलिस उन्हीं बाहुबलियों की सुरक्षा करती रही व पिटने वालों पर ही मुकदमे लादती रही। न्यायाधीशों पर इतना दबाव बनाया गया कि इतिहास में पहली बार उन्हें सामने आकर प्रैस काँफ्रेंस करना पड़ी। सीबीआई जैसे संस्थानों व अन्य जाँच एजेंसियों में नियुक्तियों का सच भी सामने आया। पुलिस और फौज का साम्प्रदायीकरण किया जाने लगा। प्रशासन में चयन का तरीका बदला गया और शासन की पसन्दगी के अनुसार किसी को भी कहीं से भी पदस्थ करने की नीति बना दी गयी। कुल मिला कर पुलिस, फौज, न्याय, प्रशासन, मीडिया और कथित जनप्रतिनिधि सब पर नियंत्रण कर लिया गया। इसके साथ साथ कम समझ और कम राजनैतिक चेतना वाला ऐसा अन्धभक्त समुदाय भी तैयार कर लिया गया जो सोशल मीडिया पर फैलायी गयी हर अफवाह को सच मानता है और उसके लिए बिना आगा पीछा सोचे हिंसा करने व सहने को तैयार रहता है।

चुनावी प्रबन्धन से मोदीशाह ने दूसरी बार भी लोकसभा का चुनाव जीत लिया व दल बदल का सहारा ले राज्यसभा में भी बहुमत बना लिया। अब वे कानून बनाने में सक्षम थे और उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाये जाने का संघ का कर्ज उतारना था।

हिन्दुओं का वर्चस्व स्थापित करने के साथ साथ मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाये जाने के लिए उत्तेजना बनानी थी इसलिए ऐसे कई काम किये जिसमें मुसलमानों का स्वाभिमान आहत हो। मुसलमानों में विवाह एक समझौता होता है जिसे उसकी कीमत चुका कर व कुछ नियमों का पालन कर के बाहर आया जा सकता है। यह इतना सरल है कि तीन बार तलाक कह कर भी अलग हुआ जा सकता है।

इस घेरे में आने वाली स्त्रियों के लिए यह सचमुच दुखद है, पर भारत में ऐसी पीड़ित महिलाओं की संख्या आधा प्रतिशत भी नहीं होगी, पर तलवार सब के सिर पर लटकी रहती है। तीन तलाक विरोधी कानून पास करा लिया गया। मुसलमान इसे अपने धर्म में हस्तक्षेप मानते हुए किसी तरह का विचलन नहीं चाहते थे, किंतु संख्या बल के आधार पर इसे बदल दिया गया। मुस्लिमों को मानसिक आघात लगा किंतु वे चुप रहे क्योंकि पीड़िताएं खुद कुछ नहीं बोल रही थीं। उसके बाद बाबरी मस्जिद का फैसला आया जो न्याय की जगह एक समझौते की तरह था जिसमें शांति को ध्यान में रखते हुए हिन्दुओं को विवदित स्थल सौंप दिया गया और मुसलमानों को दूर इलाके में मस्जिद बनाने हेतु कई गुना जमीन दी गयी। इतने सालों के मुकदमे और विवाद के आधार पर तनाव व सैकड़ों मौतें देख चुके मुस्लिम समाज ने इसे भी अपना अपमान समझा, पर चुप रहे।

कश्मीर में धारा तीन सौ सत्तर की समाप्ति में कश्मीर के आतंकवादियों समेत पूरे कश्मीरियों और शेष अन्य मुसलमानों को भी आतंकी, पाकिस्तानी और गद्दार कह कर अपमानित किया गया। उन्होंने इसे भी सहन कर लिया। बाद में नागरिकता कानून में संशोधन का जो बिल आया उसमें तो सीधे सीधे धर्म के आधार पर विभाजन कर मुसलमानों को वंचित कर दिया गया। भले ही वह पाकिस्तान, बांगला देश और अफगानिस्तान के शरणार्थियों को नागरिकता देने के मामले में था, पर सरकार की नफरती और उकसाने वाली मानसिकता का संकेत तो दे ही रहा था। इसी बीच असम में नागरिकता रजिस्टर बनाने में जो लोग बाहर हो गये उनमें गैर मुस्लिम अधिक थे। इससे पूरे देश के लोगों को समझ में आ गया कि प्रमाण न होने पर कोई भी नागरिक संदिग्ध माना जा सकता है और डिटेंशन कैम्प में भेजा जा सकता है। इससे उठे असंतोष से बचने के लिए ही नागरिकता संशोधन कानून लाया गया था। इसमें खतरा तो सबको था किंतु मुसलमानों के साथ लगातार हो रहे भेदभाव और बार बार पाकिस्तान भेज देने की धमकियो को देखते हुए उन्हें ज्यादा खतरा महसूस हुआ। उन्होंने विरोध किया तो उत्तर प्रदेश और ज़ामिया में उन्हें गोलियां मिलीं।

ज़ामिया के विरोध में निर्मम दमन को देखते हुए दृढ संकल्पित महिलाओं को आगे किया गया जिसका प्रभाव हुआ कि पूरे देश में शाहीन बाग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। इस आन्दोलन को भले ही सभी गैर भाजपा दलों के लोगों का समर्थन था किंतु बुर्काधारी महिलाओं की अधिक संख्या के कारण वह मुस्लिम महिलाओं का आन्दोलन नजर आया। सत्तारूढ दल भी इसे हिन्दू बनाम मुसलमान ही बनाना चाहता था। वामपंथी बुद्धिजीवियों के भरपूर सहयोग के बाबजूद भी इसका स्वरूप गोदी मीडिया ने धर्मनिरपेक्षता बनाम कट्टर हिन्दू साम्प्रदायिकता नहीं बनने दिया। दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान इसे बहुत बदनाम किया गया, महिलाओं को बिरयानी खाने या 500/- रुपये रोज पर बैठी हुई बताया गया। पर इस बात का असर नहीं हुआ और एक बार फिर भाजपा बुरी तरह चुनाव हार गयी। यह पांचवें राज्य में उसकी लगातार गिरावट तो थी किंतु केन्द्र में उनकी पूर्न बहुमत वाली सरकार है।

दमन की सरकारी व अपने संगठन की ताकत से सम्पन्न केन्द्र सरकार दिल्ली में दूसरा शाहीन बाग खुलने का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं थी। यही कारण रहा कि उत्तरी दिल्ली में जहाँ से ही उसके विधायक जीते थे, के जाफराबाद में महिलाओं के धरने पर उसने दिल्ली और बाहर के राज्यों से बहुबलियों को बुला व दिल्ली पुलिस से सुरक्षा दिलवा कर हमला करवा दिया। इस समय मुसलमानों ने भी मुकाबला किया जिससे जानमाल का खतरा ज्यादा हुआ। बहुत सारे घर् गाड़ियां जला दी गयीं, दुकानें और मकान आग की भेंट चढ गयीं। पचास के आस पास दोनो समुदाय के लोग मारे गये और अनेक गम्भीर रूप से घायल हुए।

Virendra Jain वीरेन्द्र जैन स्वतंत्र पत्रकार, व्यंग्य लेखक, कवि, एक्टविस्ट, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं।
Virendra Jain वीरेन्द्र जैन स्वतंत्र पत्रकार, व्यंग्य लेखक, कवि, एक्टविस्ट, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं।

जब भी हिन्दू राष्ट्र की बात होती है तो हिन्दुओं के कम समझ वाले हिस्से के अहम को बड़ी संतुष्टि मिलती है। उन्हें इतना और ऐसा पौराणिक इतिहास पढ़ा दिया गया है कि यह जगतगुरु देश हिन्दुओं का ही था, और मुसलमानों ने आकर इसे नष्ट किया, जबकि सच एकदम से भिन्न है। जो देश सात सौ साल तक मुसलमानों के शासन में रह कर भी अपने धर्म और संस्कृति को बचाये रख सका उसे उसके धर्म पर खतरे का भय दिखाया जाने लगा। इक्का दुक्का घटनाओं को उदाहरण बता कर उसे पूरी कौम पर लादा जाने लगा। कभी घर वापिसी, कभी लव जेहाद, कभी गौरक्षा के नाम माब लिंचिंग, कभी वेलंटाइन डे के नाम संस्कृति रक्षा, कभी नमाज के समय मस्जिद के आगे से बैंड बजाते हुए कथित शोभा यात्राएं निकालना, कभी जलूसों में आपत्तिजनक नारे लगवाना , कभी कुछ तो कभी कुछ कर के टकराने के मौके तलाशे जाते रहे। उनकी सूची बहुत लम्बी है और सत्ता के भरोसे वे नये नये मुद्दे सामने लाते रहेंगे। दूसरी ओर मुस्लिम समाज भी अपना रक्षा घेरा मजबूत करने के चक्कर में अलगाव का शिकार होता गया व टकराव की तैयारियां करता दिखने लगा।

घटती लोकप्रियता के समय में संघ परिवार और भाजपा के पास यह सीमित समय है जब उसके पास लोकसभा और राज्यसभा में पूर्ण बहुमत है। राष्ट्रपति और सरकार उसकी है। प्रशासन, पुलिस और फौज उसके नियंत्रण में है। वैसे तो कार्पोरेट घराने जिन्होंने पूरे मीडिया को खरीद रखा है, उसके पास है, किंतु राज्यों की पराजयों से लगता है कि आर्थिक समस्याओं के कारण उनका जनसमर्थन छीज रहा है। पार्टी के अन्दर भी घुटन बढ रही है, इसलिए उनके पास समय कम है। कथित हिन्दू राष्ट्र के लिए अपने प्रयास वे इसी दौरान कर सकते हैं। और यही समय टकराव का समय होगा। दिल्ली के दंगे इसी तेजी के परिणाम हैं।

देखना होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है!

वीरेन्द्र जैन