विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस : पिछली शताब्दी में हमने अपनी आधी आर्द्रभूमि को नष्ट कर दिया है

Climate change Environment Nature

 World nature conservation day 2021

नई दिल्ली, 28 जुलाई, 2021: मानव और प्रकृति के बीच एक अटूट संबंध है। प्रकृति मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को निर्धारित करती है तो वहीं वह मानव के विभिन्न क्रियाकलापों से स्वयं प्रभावित भी होती है। जैव-विविधता में ह्रास (loss of biodiversity) और जलवायु परिवर्तन मानव-गतिविधियों द्वारा प्रकृति के चिंताजनक ढंग से प्रभावित होने के उदाहरण हैं। यह मानव-जन्य प्रभाव एक निश्चित समयावधि के बाद स्वयं मानव जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।

Due to the indiscriminate exploitation of the environment by humans, the earth’s ecosystem is constantly being damaged.

मानव द्वारा पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन से पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र को लगातार क्षति पहुँच रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार हर तीन सेकंड में, दुनिया एक फुटबॉल पिच को कवर करने के लिए पर्याप्त जंगल को खो देती है और पिछली शताब्दी में हमने अपनी आधी आर्द्रभूमि को नष्ट कर दिया है।

यूएनईपी ने कहा है कि हमारी 50 प्रतिशत प्रवाल भित्तियाँ पहले ही नष्ट हो चुकी हैं और 90 प्रतिशत तक प्रवाल भित्तियाँ 2050 तक नष्ट हो सकती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मनुष्य ने काफी प्रगति की है। इस तकनीकी प्रगति के तकाजों ने प्रकृति को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। मनुष्य अपने विकास की दौड़ में प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा है, बिना यह सोचने की  इसके परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं।

पृथ्वी पर जीवन के लिए पानी, हवा, मिट्टी, खनिज, पेड़, जानवर, भोजन आदि हमारी मूलभूत आवश्यकताएं है इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी प्रकृति को स्वच्छ और स्वस्थ रखें। प्रकृति के इन्ही संसाधनों और उसके संरक्षण के संदर्भ में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रति वर्ष 28 जुलाई को विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया जाता है।

Objective of World Nature Conservation Day

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस का उद्देश्य है प्रकृति को नुकसान पहुँचाने वाले कारकों  जैसे – प्रदूषण, जीवाश्म ईंधन का जलना, जनसंख्या- दबाव, मिट्टी का क्षरण और वनों की कटाई आदि को लेकर लोगों को आगाह करना और प्राकृतिक संसाधनों जैसे – जल, ईंधन, वायु, खनिज, मिट्टी, वन्यजीव आदि के संरक्षण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना है।

पृथ्वी को जीवंत बनाये रखने के लिए मनुष्यों के साथ–साथ पशु–पक्षी पेड़-पौधों का रहना भी अत्यंत आवश्यक है। आज जीव जंतुओं तथा पेड़ पौधों की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसलिए पारिस्थितिक तंत्र के प्राकृतिक वैभव की रक्षा करना और पृथ्वी पर प्रत्येक जीवित प्राणी के साथ सह-अस्तित्व की एक प्रणाली विकसित करना आज के दौर की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

(इंडिया साइंस वायर)

प्रकृति के ऐसे अद्भुत दृश्य जो आपके आस-पास ही हैं, लेकिन आपकी नज़र से हैं ओझल

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धरती की सेहत सुधारने के लिए हर दिन मने पृथ्वी दिवस

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22 अप्रैल विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष | Special on 22 April World Earth Day in Hindi

आग का गोला न बन जाए धधकती धरती!

तमाम तरह की सुख-सुविधाएं और संसाधन जुटाने के लिए किए जाने वाले मानवीय क्रियाकलापों के कारण आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की भयावह समस्या से त्रस्त है। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता पैदान करने तथा पृथ्वी को बचाने के संकल्प के साथ प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को विश्वभर में पृथ्वी दिवस मनाया जाता है।

पिछले साल कोरोना महामारी के चलते दुनिया के लगभग सभी हिस्सों में लगे लॉकडाउन के दौर में थम गई मानवीय गतिविधियों के कारण यह दिवस ऐसे समय में मनाया गया था, जब दुनिया भर के लोगों को पहली बार पृथ्वी को काफी हद तक साफ-सुथरी और प्रदूषण रहित देखने का सुअवसर मिला था। हालांकि कोरोना संकट के चलते लगाए गए लॉकडाउन के कारण पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण (Environment protection) को लेकर सोचने का बेहतरीन अवसर मिला था, जिससे दुनियाभर के तमाम देश एकजुट होकर ऐसी योजनाओं पर विचार सकें, जिनसे पर्यावरण संरक्षण में अपेक्षित मदद मिल सके लेकिन विड़म्बना देखिये कि लॉकडाउन हटते ही धरती की हालत धीरे-धीरे हर जगह पूर्ववत बदतर होती गई।

Damage to environment by messing with nature

प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें निरन्तर चेतावनियां देती रही है किन्तु जलवायु परिवर्तन (Climate change) से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे हम शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। अगर प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर हम स्वयं इन समस्याओं का कारण बने हैं और गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर हम वाकई चिंतित हैं तो इन समस्याओं का निवारण भी हमें ही करना होगा ताकि हम प्रकृति के प्रकोप का भाजन होने से बच सकें अन्यथा प्रकृति से जिस बड़े पैमाने पर खिलवाड़ हो रहा है, उसका खामियाजा समस्त मानव जाति को अपने विनाश से चुकाना पड़ेगा।

लोगों को पर्यावरण एवं पृथ्वी संरक्षण के लिए जागरूक करने के लिए साल में केवल एक दिन अर्थात् 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ मनाने की औपचारिकता निभाने से कुछ हासिल नहीं होगा। अगर हम वास्तव में पृथ्वी को खुशहाल देखना चाहते हैं तो यही ‘पृथ्वी दिवस’ प्रतिदिन मनाए जाने की आवश्यकता है।

पहले साल में दो बार मनाया जाता था पृथ्वी दिवस | विश्व पृथ्वी दिवस का इतिहास

पृथ्वी दिवस पहले प्रतिवर्ष दो बार 21 मार्च तथा 22 अप्रैल को मनाया जाता था लेकिन वर्ष 1970 से यह दिवस 22 अप्रैल को ही मनाया जाना तय किया गया। 21 मार्च को पृथ्वी दिवस केवल उत्तरी गोलार्द्ध के वसंत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध के पतझड़ के प्रतीक स्वरूप ही मनाया जाता रहा है। 21 मार्च को मनाए जाने वाले ‘पृथ्वी दिवस’ को हालांकि संयुक्त राष्ट्र का समर्थन प्राप्त है लेकिन उसका केवल वैज्ञानिक व पर्यावरणीय महत्व ही है जबकि 22 अप्रैल को मनाए जाने वाले ‘पृथ्वी दिवस’ का पूरी दुनिया में सामाजिक एवं राजनैतिक महत्व है।

संयुक्त राष्ट्र में पृथ्वी दिवस को प्रतिवर्ष मार्च एक्विनोक्स (वर्ष का वह समय, जब दिन और रात बराबर होते हैं) पर मनाया जाता है और यह दिन प्रायः 21 मार्च ही होता है। इस परम्परा की स्थापना शांति कार्यकर्ता जॉन मक्कोनेल द्वारा की गई थी। वैश्विक स्तर पर लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए 22 अप्रैल 1970 को पहली बार पृथ्वी दिवस वृहद् स्तर पर मनाया गया था। तभी से हर साल 22 अप्रैल को यह दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया।

हालांकि पृथ्वी दिवस को मनाए जाने का वास्तविक लाभ तभी है, जब हम आयोजन को केवल रस्म अदायगी तक ही सीमित न रखें बल्कि धरती की सुरक्षा के लिए इस अवसर पर लिए जाने वाले संकल्पों को पूरा करने हेतु हरसंभव प्रयास भी करें। हमें बखूबी समझ लेना होगा कि अगर पृथ्वी का तापमान साल दर साल इसी प्रकार बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में हमें इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के अनुसार पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है और वातावरण में पहले की अपेक्षा 30 फीसदी ज्यादा कार्बन डाईऑक्साइड मौजूद है, जिसकी जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका है।

पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील किया जाता रहा है।

पृथ्वी पर बढ़ते दबाव का एक महत्वपूर्ण कारण बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि भी है। जहां 20वीं सदी में वैश्विक जनसंख्या करीब 1.7 अरब थी, अब बढ़कर करीब 7.8 अरब हो चुकी है। अब सोचने वाली बात यह है कि धरती का क्षेत्रफल तो उतना ही रहेगा, इसीलिए कई गुना बढ़ी आबादी के रहने और उसकी जरूरतें पूरी करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है। इससे पर्यावरण की सेहत पर जो प्रहार हो रहा है, उसी का परिणाम है कि धरती अब धधक रही है।

ब्रिटेन के प्रख्यात भौतिक शास्त्री स्टीफन हॉकिंग की इस टिप्पणी को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि यदि मानव जाति की जनसंख्या इसी कदर बढ़ती रही और ऊर्जा की खपत दिन-प्रतिदिन इसी प्रकार होती रही तो करीब 600 वर्षों बाद पृथ्वी आग का गोला बनकर रह जाएगी। धरती का तापमान बढ़ते जाने का ही दुष्परिणाम है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।

भारत के कई हिस्सों में इस साल जिस प्रकार मार्च महीने में ही बढ़ते पारे का प्रकोप देखा गया, वह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। करीब दो दशक पहले देश के कई राज्यों में जहां अप्रैल माह में अधिकतम तापमान औसतन 32-33 डिग्री रहता था, वहीं अब मार्च महीने में ही पारा 40 डिग्री तक पहुंचने लगा है। 2016 में राजस्थान के फलौदी का तापमान तो 51 डिग्री दर्ज किया गया था और इस तापमान में और वृद्धि की आशंका है। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें चेतावनियां देती रही है किन्तु जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे हम शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। हम नहीं समझना चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं बल्कि विकास के नाम पर हम अपने विनाश का ही मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

कुछ वर्ष पूर्व तक पर्वतीय क्षेत्रों का ठंडा वातावरण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता था किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन और सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरते जाने का ही दुष्परिणाम है कि पहाड़ों की ठंडक भी धीरे-धीरे कम हो रही है और मौसम की प्रतिकूलता लगातार बढ़ रही है। अम्फान जैसा सुपरसाइक्लोन हो या बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि या बाढ़, प्रकृति का ऐसा प्रकोप अब हर साल देखने को मिल रहा है। कहीं भयानक सूखा तो कहीं बेमौसम अत्यधिक वर्षा, कहीं जबरदस्त बर्फबारी तो कहीं कड़ाके की ठंड, कभी-कभार ठंड में गर्मी का अहसास तो कहीं तूफान और कहीं भयानक प्राकृतिक आपदाएं, ये सब प्रकृति के साथ हमारे खिलवाड़ के ही दुष्परिणाम हैं और हमें यह सचेत करने के लिए पर्याप्त हैं कि अगर हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो स्वर्ग से भी सुंदर अपनी पृथ्वी को हम स्वयं कैसी बना रहे हैं और हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है।

पर्यावरण संरक्षण पर मेरी चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में बताया गया है कि शहरों के विकसित होने के साथ-साथ दुनियाभर में हरियाली का दायरा सिकुड़ रहा है और कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं, विश्वभर में प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण हर साल तरह-तरह की बीमारियों के कारण लोगों की मौतों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं, यहां तक कि बहुत से नवजात शिशुओं पर भी प्रदूषण के दुष्प्रभाव स्पष्ट देखे जाने लगे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक प्रतिवर्ष विश्वभर में प्रदूषित हवा के कारण करीब सत्तर लाख लोगों की मौत हो जाती है।

बहरहाल, अगर प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर हम स्वयं इन समस्याओं का कारण बने हैं और हम वाकई गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर चिंतित हैं तो इन समस्याओं का निवारण भी हमें ही करना होगा। यदि हम चाहते हैं कि हम धरती मां के कर्ज को थोड़ा भी उतार सकें तो यह केवल तभी संभव है, जब वह पेड़-पौधों से आच्छादित, जैव विविधता से भरपूर तथा प्रदूषण से सर्वथा मुक्त हो और हम चाहें तो सामूहिक रूप से यह सब करना इतना मुश्किल भी नहीं है।

बहरहाल, यह अब हमें ही तय करना है कि हम किस युग में जीना चाहते हैं? एक ऐसे युग में, जहां सांस लेने के लिए प्रदूषित वायु होगी और पीने के लिए प्रदूषित और रसायनयुक्त पानी तथा ढ़ेर सारी खतरनाक बीमारियों की सौगात या फिर ऐसे युग में, जहां हम स्वच्छंद रूप से शुद्ध हवा और शुद्ध पानी का आनंद लेकर एक स्वस्थ एवं सुखी जीवन का आनंद ले सकें।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार तथा पर्यावरण संरक्षण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के लेखक है।)

Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं
Yogesh Kumar Goyal योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

चीन की ताज़ा पंचवर्षीय योजना : जलवायु के लिए अनिश्चिता के संकेत

Climate change Environment Nature

Indications of uncertainty for the climate in China’s latest five-year plan

चीन में नियोजन की प्रक्रिया | Planning process in china

नई दिल्ली, 08 मार्च, 2021. चीन में इस साल 14-वीं पंचवर्षीय योजना की शुरुआत होगी। लेकिन जलवायु परिवर्तन की चुनौती से लड़ने की नज़र से अगर इस योजना के बारे में मिल रही जानकारी को देखा जाए तो कहना गलत नहीं होगा कि इस योजना से ख़ास उम्मीद नहीं लगायी जा सकती।

यह जानकारी देते हुए वरिष्ठ पत्रकार व पर्यावरणविद् डॉ. सीमा जावेद ने बताया कि वर्ष 1953 से, चीन सरकार अपने देश में प्रमुख सामाजिक और आर्थिक विकास के मुद्दों को पांच साल के नीति नियोजन चक्र की मदद से निर्धारित करती रही है। चीन में नियोजन की यह प्रक्रिया सभी स्तरों और क्षेत्रों में नीति-निर्माण प्रक्रिया को निर्देशित करने वाले आधारभूत ढांचे के रूप में बनी हुई है।

मौजूदा योजना स्पष्ट रूप से जलवायु के ख़िलाफ़ जंग (War against the climate) से जुड़ी अपेक्षाओं पर खरी उतरी नहीं दिखती। इस योजना में बड़े ही औसत स्तर के जलवायु और ऊर्जा लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं और विकास के लिए कम कार्बन वाली व्यवस्था पर भी कोई स्पष्ट रणनीतिक सोच नहीं दिखती इसमें।

उन्होंने बताया कि पिछली पंचवर्षीय के विपरीत, इस ताज़ा योजना में कोई स्पष्ट पंचवर्षीय GDP विकास लक्ष्य भी नहीं है। इसमें बल्कि GDP लक्ष्य वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार वार्षिक आधार पर तय किये जायेंगे।

This five-year plan of China sends an uncertain climate signal.

कुल मिलाकर चीन की यह पंचवर्षीय योजना एक अनिश्चित जलवायु संकेत भेजती है। और इस अनिश्चिता को औद्योगिक समूह निश्चित रूप से व्यापार को पुराने ढर्रे पर चलाने के लिए एक बहाने के रूप में लेंगे।

वैश्विक उत्सर्जन के 26 फ़ीसद के लिए चीन अकेले जिम्मेदार है | China alone is responsible for 26% of global emissions

ध्यान रखने वाली बात है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए, चीन को अपनी उत्सर्जन वृद्धि को बहुत धीमे स्तर पर लाने की आवश्यकता है, और आगामी पांच वर्ष की अवधि में उत्सर्जन वक्र को जल्दी से समतल करना होगा। बल्कि 2025 से पहले उत्सर्जन का अपने उच्चतम स्तर तक पहुंच कर नीचे आना न सिर्फ़ संभव है बल्कि आवश्यक भी है।

ध्यान रहे कि चीन वैश्विक उत्सर्जन के 26 फ़ीसद के लिए अकेले जिम्मेदार है, और इस पंचवर्षीय योजना में दर्ज आर्थिक और ऊर्जा संक्रमण के फैसले मोटे तौर पर चीन में अगले 5 वर्ष और उससे आगे चीन में उत्सर्जन के स्तर (Emission levels in China) को निर्धारित करेंगी।

पिछले सितंबर में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2030 से पहले कार्बन उत्सर्जन को चरम पर पहुंचाने और 2060 तक कार्बन तटस्थता (न्यूट्रैलिटी) तक पहुंचने का वादा किया था। चीन की नई जलवायु प्रतिबद्धताओं के बाद पहले FYP के रूप में, 14-वें FYP का परीक्षण किया जाएगा ताकि इस बात की तसल्ली हो सके कि यह चीन को कार्बन तटस्थ भविष्य की ओर सही रास्ते पर लाएगा या नहीं।

14-वें FYP के मसौदे में जलवायु और ऊर्जा से संबंधित कुछ प्रमुख लक्ष्य (Some of the major targets related to climate and energy in the draft 14-th FYP) हैं जो कि इस प्रकार हैं:

• 13.5% तक कम ऊर्जा की तीव्रता

• 18% तक कम कार्बन की तीव्रता

• ऊर्जा मिश्रण में गैर-जीवाश्म ऊर्जा का हिस्सा 2020 में 15.8% से बढ़ाकर 2025 में लगभग 20% करना

• वन कवरेज को बढ़ाकर 24.1% करना

बड़ी आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच पंचवर्षीय योजना एक अनिश्चित जलवायु संकेत भेजती है। चीन की पंचवर्षीय योजनाओं के केस में अंडर-कमिटिंग और ओवर-डिलिवरिंग की आदत को ध्यान में रखते हुए, उम्मीद है कि ये लक्ष्य आगे की उत्सर्जन वृद्धि में वृद्धि पर बाड़ा लगाएंगे।

अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ग्रीनपीस ईस्ट एशिया (Greenpeace East Asia) के नीति सलाहकार ली शुओ कहते हैं,

“यह तय है कि ऐसी योजना के चलते औद्योगिक समूह इसमें पुराने तरीकों से व्यापार करने बहाने तलाश लेंगे।”

वो आगे कहते हैं,

“जलवायु संकट से निपटने के लिए, चीन को अपनी उत्सर्जन वृद्धि को काफी धीमी स्तर पर लाने की जरूरत है, और आगामी पांच साल की अवधि में उत्सर्जन वक्र को जल्द से जल्द समतल करना है। 2025 से पहले का पीक उत्सर्जन न केवल संभव है बल्कि आवश्यक है। उत्सर्जन पर उत्तरोत्तर अधिक ब्रेक लगाना चीन के आर्थिक परिवर्तन के लिए अच्छा है, और इससे चीन की वैश्विक छवि में सुधार को बढ़ावा मिलेगा। इन पाँच वर्षों के लक्ष्यों से परे बहुत कुछ किया जाना बाकी है। चीन के कोयला संयंत्र निर्माण बूम का अभी भी कोई अंत नहीं नज़र आ रहा है। स्टील, सीमेंट और एल्युमीनियम सेक्टर्स में रनवे की रफ्तार से पता चलता है कि चीन को अपने कोविड रिकवरी को ग्रीन (हरित) बनाने के लिए और बेहतर करने की जरूरत है। जब तक बीजिंग कोयला निर्माण बूम का निरोध नहीं करता है और अपनी कोविड रिकवरी को ग्रीन नहीं करता है तब तक चीन डीकार्बोनाइज़ेशन मार्ग पर वापस नहीं आएगा।”

चीनी प्रधानमंत्री, ली केकियांग, ने NPC (नेशनल पीपल्स कांग्रेस) के वार्षिक सत्र के एक भाषण में राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक विकास पर 14-वीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे के प्रमुख अंश प्रस्तुत किए। फ़िलहाल इस 14-वीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे की NPC सदस्यों द्वारा समीक्षा की जा रही है और इसे 11 मार्च को NPC सत्र के अंत में अनुमोदित किया जाएगा। अनुमोदन के बाद 14 वें वित्त वर्ष का पूरा पाठ सार्वजनिक किया जाएगा। मसौदा योजना में मुख्य लक्ष्यों को बदलने की उम्मीद नहीं है। अनुमोदन के बाद 14-वें वित्त वर्ष का पूरा टेक्स्ट (पाठ) सार्वजनिक किया जाएगा।

वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर सजग होने का समय

world wildlife day

विश्व वन्यजीव दिवस (03 मार्च) पर विशेष : Special on World Wildlife Day (03 March)

 नई दिल्ली, 02 मार्च: पृथ्वी पर अलग-अलग प्रकार से जीवन का विकास हुआ है, जो मानव के अस्तित्व में आने के साथ ही उसकी आवश्यकताओं को पूरा करता रहा है और आज भी कर रहा है। प्रकृति में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के अनुरूप विकसित हुए हैं, और उनका जीवन तब तक सामान्य रूप से चलता रहता है, जब तक पर्यावरण अनुकूल रहता है। लेकिन, मनुष्य ने विकास के क्रम में न केवल पारिस्थितिक तंत्र को बिगाड़ा है, बल्कि वन्यजीवों और समुद्री जीवों के अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।

विश्व वन्यजीव दिवस कब मनाया जाता

मानवीय गतिविधियों के कारण पूरी दुनिया में वन्यजीवों की संख्या लगातार कम हो रही है। इस संकट को देखते हुए हर साल 03 मार्च को वन्यजीवों और वनस्पतियों के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए विश्व वन्यजीव दिवस (WORLD WILDLIFE DAY) मनाया जाता है।

The main objective of World Wildlife Day

विश्व वन्यजीव दिवस का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में जागरूकता, सहयोग और समन्वय स्थापित करना है। वन्यजीवों और वनस्पतियों के संरक्षण से मिलने वाले लाभ के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए इस दिन दुनियाभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

विश्व वन्यजीव दिवस की शुरुआत कब हुई

इसकी शुरुआत 20 दिसम्बर, 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गई थी। तभी से, हर साल 03 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें वन्यजीवों के खिलाफ होने वाले अपराध और मानव द्वारा उत्पन्न विभिन्न व्यापक आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों के कारण प्रजातियों की घटती संख्या के खिलाफ लड़ने की जरूरत की याद दिलाता है।

विश्व वन्यजीव दिवस की 2021 की थीम

विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर विभिन्न वन्यजीव एवं वनस्पति प्रजातियों के संरक्षण, उनके निरंतर प्रबंधन और भविष्य की पहलों पर आधारित प्रतिबद्धताओं पर दृढ़ता से अमल करने का संकल्प दोहराया जाता है। प्रतिवर्ष इस दिवस की अलग-अलग विषयवस्तु होती है, जिसके माध्यम से प्रकृति से विलुप्त हो रहे जीवों, प्रजातियों और प्राकृतिक वस्तुओं का संरक्षण करने हेतु लोगों को जागरूक किया जाता है। इसी क्रम में, वर्ष 2021 की विषयवस्तु ‘वन और आजीविका: लोग और ग्रह को बनाए रखना’ है। अर्थात पृथ्वी को जीवंत बनाये रखने के लिए मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी, और पेड़-पौधों का रहना अत्यंत आवश्यक है। आज जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसलिए, पारिस्थितिक तंत्र के प्राकृतिक वैभव की रक्षा करना, और पृथ्वी पर प्रत्येक जीवित प्राणी के साथ सह-अस्तित्व की एक प्रणाली विकसित करना हमारा कर्तव्य है।

विश्व वन्यजीव दिवस क्यों महत्वपूर्ण है

हाल के दशकों में मानव ने अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप बड़े-बड़े जंगल खत्म होने की कगार पर हैं। वहीं, जीव-जंतुओं का शिकार भी बढ़ा है, जिससे उनकी विलुप्ति का संकट खड़ा हो गया है। जहाँ एक तरफ जंगल खत्म हो रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर प्रदूषण भी लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे प्रकृति में नकारात्मक बदलाव हो रहा है, और ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) जैसे भयावह परिणाम देखने को मिल रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में, प्रकृति और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए विश्व वन्यजीव दिवस बेहद महत्वपूर्ण है।

भारत में वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर शुरू से ही सजग रहा है। वन्यजीव अपराधों की रोकथाम, अवैध शिकार पर लगाम और वन्यजीव उत्पादों के अवैध व्यापार पर प्रभावी रोक के लिए सरकार ने 1972 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों के अवैध शिकार, और उनके जैविक अवशेषों जैसे माँस, चमड़े इत्यादि के व्यापार को रोकना है। यह अधिनियम जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों के  संरक्षण पर जोर देता है। इस अधिनियम के तहत किसी वन्यजीव को पकड़ने की कोशिश करना, उन्हें नुकसान पहुँचाना गैर-कानूनी है। इसके अलावा, वन्यजीवों के लिए बने अभ्यारण्य में आग लगाना, वनों में हथियार के साथ प्रवेश पर भी रोक है। इस कानून के तहत जंगल के पेड़-पौधों को तोड़ना या काटना मना है। सरकार ने वन्य प्राणियों से जुड़े कानून को मजबूत बनाने के उद्देश्य से वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में जनवरी, 02003 में संशोधन किया। इसके तहत सजा और जुर्माने को अधिक कठोर बनाया गया है।

(इंडिया साइंस वायर)

बेकार नहीं, कुदरत का करिश्मा है काई, बन सकती है आपके गले का हार

नैनीताल में मॉस गार्डन,गूगल में काई के बारे में पड़ताल,Google explores about Moss, Moss, Kaai,

Nature’s miracle is Moss

काई के गुणों की पहचान कर पश्चिमी देशों में इस पर काफी प्रयोग किए जा रहे हैं। यूरोप में शहरों के बीच पेड़ों पर काई उगाने (Growing moss on trees between cities in Europe) से लेकर मॉस वॉल (Moss wall) तक बनाने के प्रयोग किए गए हैं। जापान में काई कई तरह से इस्तेमाल में लाई जाती है।

पाश की कविता “मैं घास हूं” आप सबने जरूर पढ़ी होगी। उनके बोए हुए अमूल्य शब्दों में घास की जगह आप काई को भी रख सकते हैं। इसका मिज़ाज भी कुछ ऐसा ही होता है। बंजर हो या बारिश से भीगी ज़मीन, चट्टान हो या सूखी रेतीली मिट्टी, हर मुश्किल हालात में अपना परिवार बसा लेने वाली काई (जिसे अंग्रेजी में मॉस कहेंगे) आपके गले का हार भी बन सकती है। कानों के बूंदे, उंगली पर किसी का वादा बन चमकने वाली अंगूठी की शक्ल भी ले सकती है।

जिस काई को हम अक्सर अपना दुश्मन मान बैठते हैं, जैसे वे आपके पांव फिसला कर गिरा देने पर अमादा हों। यदि आपके आस-पास उग रही है, तो शुक्र है। उसका होना हमारे इको सिस्टम और बायो डायवर्सिटी के लिए बेहद जरूरी है। वे हमारे आसपास के वातावरण की सेहत दर्शाने की इंडीकेटर सरीखी होती हैं। आपकी किताबों वाली आलमारी के कोने के पास कांच की गेंद में चुपचाप मुस्कुराती हुई, घर में आने वाले मेहमानों का स्वागत भी कर सकती है।

काई का सौंदर्य | Google explores about Moss | Moss beauty

हल्द्वानी में उत्तराखंड वन अनुंसधान केंद्र की शोधार्थी तनुजा ने काई के सौंदर्य को पहचाना। उन्होंने काई से आभूषण (Moss jewelery) और सजावटी वस्तुएं तैयार की हैं। तनुजा बताती हैं “मैंने गूगल में काई के बारे में पड़ताल की। जापान में मॉस से बने आभूषण बहुत ट्रेंड में है। तो मुझे लगा कि हम भी इस तरह का कुछ काम कर सकते हैं।”

वह बताती हैं “इस आभूषण के लिए इपॉक्सी रेज़िन का इस्तेमाल किया है। इपॉक्सी रेजिन और इसके मोल्ड, चेन, लॉकेट, अंगूठी सब ऑनलाइन ऑर्डर किया। 12-13 सौ रुपये में सारा सामान आ गया। मॉस को रेजिन के ज़रिये मोल्ड में फिट किया। इससे 15-20 लॉकेट और अंगूठी तैयार हो गई। बाज़ार में ये अपनी लागत से दो-तीन गुने अधिक दाम पर मिलती हैं।” ये आभूषण स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए आजीविका का साधन भी बन सकते हैं। तनुजा के बनाए हुए इन मॉस आभूषणों को नैनीताल के मॉस गार्डन के इंटरपिटेशन सेंटर में रखा गया है। ताकि लोग काई के सौंदर्य से भी परीचित हों।

मॉस का इस्तेमाल (Use of moss) घरों के अंदर छोटे-छोटे पौधे लगाने के लिए भी होता है। तनुजा बताती हैं “

मिट्टी को गेंद नुमा बनाकर उस पर मॉस की एक परत चढ़ानी होती है। कई ऐसे प्लांट होते हैं जो घर में छायादार जगहों पर पनपते हैं जैसे कि सेक्यूलेंट। ऐसे पौधों को इस बॉल के ऊपर लगाना होता है। फिर रस्सियों के सहारे उसे घर के किसी कोने में टांगा जा सकता है। मॉस से बने आभूषण और मॉस बॉल दोनों की ही काफी डिमांड होती है”।

नैनीताल में मॉस गार्डन (Moss Garden in Nainital)

उत्तराखंड वन अनुसंधान केंद्र (Uttarakhand Forest Research Center) ने नैनीताल के सरियाताल के पास लिंगाधार में करीब 7 हेक्टेअर क्षेत्र में मॉस गार्डन तैयार किया है। जिसमें करीब एक हेक्टेअर में काई की 27 प्रजातियां संरक्षित की गई हैं। बाकी क्षेत्र में मॉस ट्रेल बनायी जा रही है। इस ट्रेल पर पर्यटक कुदरत को करीब से निहार सकते हैं। देश में ये अपनी तरह का पहला मॉस गार्डन है। आईयूसीएन की रेडलिस्ट में शामिल काई की दो प्रजातियां भी आप यहां देख सकते हैं। कैंपा योजना के तहत ये मॉस गार्डन तैयार किया गया है। चारों तरफ घने ऊंचे पेड़ और नम मिट्टी काई के विस्तृत संसार के लिए अच्छा माहौल तैयार करते हैं। कम तापमान और स्वच्छ माहौल काई की अलग-अलग प्रजातियों के पनपने और बने रहने के लिए कुदरती माहौल देते हैं।

Moss also has medicinal properties

मॉस गार्डन में प्रथम विश्वयुद्ध में घायल आयरलैंड के सैनिकों की पेन्टिंग दिखेगी। जिसमें काई से सैनिकों का इलाज (Treating soldiers with moss) किया जा रहा है। काई में औषधीय गुण भी होते हैं। आयरलैंड के घायल सैनिकों के जख्मों पर खास किस्म की काई का मरहम लगाया गया था। जिससे उनकी चोट ठीक हुई।

इसी तरह यहां आपको विशालकाय डायनासोर की पेन्टिंग भी दिख सकती है। ये बताने के लिए कि काई डायनासोर के समय से अब तक धरती पर बनी हुई है।

काई की ताकत | Moss strength

वनस्पति विज्ञान में एमएससी करने वाली शोधार्थी तनुजा कहती हैं कि एक इंच से भी छोटे कद की काई दरअसल बहुत ताकतवर होती है। “बंजर ज़मीन हो या सुनामी आने, आग लगने जैसी वजहों से ज़मीन खराब हो गई हो। काई ऐसी ज़मीन पर भी उगने की क्षमता रखती है। ऐसी ज़मीन पर सबसे पहले काई ही आती है।

अलग-अलग ज़मीन पर अलग-अलग तरह की काई आती है। कुछ पानी वाली होती हैं। कुछ पत्थर वाली। कुछ रेत पर आती हैं। ये हैबिटेट स्पेसिफिक (Habitat Specific) होती हैं। जैसा माहौल होता है, वहां वैसी ही काई पनपती है। जैसे कि कुछ काई ऐसी होती हैं जो जंगल की आग के बाद ही आती हैं। वही सबसे पहले अपना परिवार बढ़ाती हैं।

काई का जीवन चक्र (Moss life cycle) पूरा होने के बाद मिट्टी दूसरे पौधों के उगने लायक बनती है। उस पर लाइकन-फर्न के पौधे (Lichen-fern plants) आते हैं। फिर बड़े पौधे उगते हैं। ऊंचे क्षेत्रों में सख्त पत्थरों-चट्टानों पर भी काई उगती है। जिससे वो टूटते हैं और वहां दूसरे पौधे के उगने का माहौल तैयार होता है।

प्रदूषण कम करने में काई का कमाल Moss ‘s work in reducing pollution

काई कुदरत का इंडिकेटर भी है। आसपास का वातावरण अच्छा होगा तो वहां काई होगी। इसकी मौजूदगी से जंगल की सेहत (Forest health) का पता चलता है। इसका होना स्वच्छ हवा, पानी की उपलब्धता, मिट्टी में जरूरी पोषक तत्वों की मौजूदगी दर्शाता है। 

ये नन्हा पौधा वायु प्रदूषण से लड़ता है और हवा की गुणवत्ता में सुधार लाता है। हवा में मौजूद प्रदूषणकारी तत्वों को ये कुदरती तौर पर फिल्टर करता है। नदी-तालाब के पानी को भी ये कुदरती तौर पर फिल्टर करता है और उनमें प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों को सोख लेता है।

काई के इन गुणों की पहचान कर पश्चिमी देशों में इस पर काफी प्रयोग किए जा रहे हैं। यूरोप में शहरों के बीच पेड़ों पर काई उगाने से लेकर मॉस वॉल (moss wall india) तक बनाने के प्रयोग किए गए हैं। जापान में काई कई तरह से इस्तेमाल में लाई जाती है।

तो अगली बार जब आप पुरानी इमारतों, दीवारों, हरे पेड़ों या गीले मैदानों पर पसरी काई देखें तो इस नन्हे पौधे की ताकत जरूर पहचानें। प्रकृति का ये हरा रंग आपके गले या उंगली पर बहार बनकर टिका रह सकता है।

वर्षा सिंह

मूलतः न्यूज़ क्लिक में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार