नेहरूजी के आगे खड़े होने की नाकाम कोशिश

modi at red fort 15 august

आजादी का अमृत महोत्सव पर संपादकीय टिप्पणी (Editorial Comment on Amrit Mahotsav of Azadi)

देशबन्धु में संपादकीय आज (Editorial in Deshbandhu today)

देश में इस वक्त आजादी की 75वीं वर्षगांठ (75th anniversary of India’s independence) का शोर है। देशभक्ति और राष्ट्रवाद से भरे ओजपूर्ण गीत लाउड स्पीकर पर जोर-जोर से बजाए जा रहे हैं। एक तरह की होड़ है कि शहर के किस नुक्कड़, गांव की किस गली से कितने जोर से गाने बज सकते हैं।

तो तिरंगा लहरा कर होगी देशभक्ति साबित?

देशभक्ति साबित करने के लिए अब तिरंगा लहराने का काम भी दे दिया गया है। देश से प्यार, आजादी की खुशी अब मन में मनाने से काम नहीं चलेगा, नए भारत में हर चीज दिखावे की हो गई है। देशभक्ति भी इसी श्रेणी में शुमार है।

1947 में जब देश को आजादी मिली थी, उस वक्त लोगों में नए भारत की, अपने शासन की, लोकतंत्र की ढेर सारी उम्मीदें थीं। कई डर भी थे कि कैसे भारत अपने पैरों पर खड़ा होगा, नयी सरकार किस दिशा में देश को आगे लेकर जाएगी, कैसे गुटों में बंटी हुई दुनिया में भारत अपना स्थान सुरक्षित करेगा, बंटवारे के जख्म से कराहते लोगों को सरकार कैसे संभालेगी, हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई कैसे भरी जाएगी, खेती, उद्योग, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान ऐसे तमाम क्षेत्रों में देश किस नजरिए के साथ आगे बढ़ेगा, ऐसे ढेरों सवाल उस वक्त के नेताओं और लोगों के मन में थे। गनीमत थी कि नेहरू जी जैसे दूरदृष्टा नेता के हाथ में भारत की कमान गयी, जिन्होंने उदार सोच और व्यापक नजरिए के साथ देश को संभाला। उनकी बात हिंदू भी सुनते थे और मुसलमान भी। और वे इतने बेखौफ थे कि खुली जीप में घूमते थे, भीड़ के बीच अकेले घुस जाते थे, कोई विरोध करे या नाराज हो तो उसकी बात गौर से सुनते थे।

Pt. Jawahar Lal Nehru
Pt. Jawahar Lal Nehru
देश के प्रिय नेता और दुनिया के लिए शांतिदूत थे पं नेहरू

देश के भीतर वो लोगों के प्रिय नेता थे और दुनिया के लिए वो शांतिदूत थे, जो अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए देशों के लिए मिसाल थे। 1947 से नेहरूजी ने देश को इस तरह संभाला कि देश कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन गया। और उनके बाद भी आने वाली सरकारों ने उनकी नीतियों पर देश को चलाया और आगे बढ़ाया। कई सार्वजनिक निकाय स्थापित हुए, एम्स, आईआईटी, इसरो जैसी संस्थाएं बनीं, देश में स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय। इन सबके साथ लोगों में देशभक्ति की भावना भी विकसित हुई। कारखानों, उद्योगों, बांधों, सड़कों, रेल लाइनों, में लोगों को देश का विकास दिख रहा था और इसके लिए प्यार जाग रहा था। अपने प्यार को दिखाने के लिए लोग 15 अगस्त और 26 जनवरी को बड़े उत्साह के साथ तिरंगा फहराते थे, प्रभात फेरियां निकालते थे, देशभक्ति के गीत गाते थे। तब तिरंगा फहराने की कोई जबरदस्ती नहीं थी। लेकिन अब सरकार अपने ही लोगों से देशभक्ति का सबूत मांग रही है।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की साजिश!

जब सरकार आपसे कहे कि आपको अपनी आजादी का उत्सव इस ढंग से मनाना है, तो फिर यह सवाल ये उठता है कि क्या हम वाकई आजाद हैं (are we really free)। हमें देशभक्ति साबित करने के लिए तिरंगा फहराकर उसकी फोटो पोस्ट करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। अगर हम ईमानदारी से अपना काम करें, संविधान के खिलाफ कोई कदम न उठाएं, समय पर अपने करों का भुगतान करें, रिश्वत, धोखाधड़ी, बैंकों से कर्ज लेकर वापस न करना, ऐसे गलत काम न करें, समाज और देश को तोड़ने वाले काम न करें, सभी धर्मों की इज्जत करें और सौहार्द्र को कायम रखें तो क्या ये सब देशभक्ति नहीं कहलाएगी।

जाहिर है मौजूदा वक्त में देश से प्यार के ये पैमाने बदल गए हैं और अब इसके साथ स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बदलने की चालाकी भी सरेआम की जा रही है।

खासकर नेहरूजी का नाम किसी भी तरह से धूमिल हो, इसकी कोशिश हो रही है। जैसे कर्नाटक सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान को लेकर एक विज्ञापन अखबारों में दिया है, जिसमें गांधीजी से लेकर वी डी सावरकर तक की तस्वीर है, साथ में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री बोम्मई की भी तस्वीर है, लेकिन नेहरूजी की तस्वीर इस विज्ञापन में नहीं है।

कर्नाटक सरकार ने स्वाधीनता सेनानियों की तस्वीरों में नेहरूजी का चित्र शामिल करना जरूरी नहीं समझा और देश के सबसे तेज समाचार चैनल की तेज तर्रार एंकर ने आजादी के दौरान के एक वीडियो को अपने कार्यक्रम में दिखाते हुए अपने पीछे नेहरू जी को छिपाने की कोशिश की।

इस वीडियो में एंकर खुद सफेद-काली साड़ी में पुराने जमाने की नायिकाओं की तरह तैयार हुई 15 अगस्त 1947 की उन घड़ियों का वर्णन कर रही हैं, जब देश को आजादी मिली थी। इस वीडियो में तकनीकी के कमाल से एंकर ने इस तरह अपना स्थान बनाया है कि जहां नेहरू जी खड़े होकर उत्साही जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं, ठीक उनके सामने एंकर आ कर खड़ी हो जाती है। ये सरासर नेहरूजी को पार्श्व में धकेलने की नापाक साजिश दिख रही है। वीडियो बनाने वाले चाहते तो एंकर का स्थान कहीं और बना सकते थे, लेकिन नेहरूजी को किन के इशारे पर दबाया जा रहा है, यह समझना कठिन नहीं है।

आजादी के अमृत महोत्सव में निकृष्टता का प्रदर्शन

75 बरस पहले जब आजादी मिली थी, देश में तब भी वैचारिक मतभेद कायम थे और जब तक लोकतंत्र रहेगा, ये मतभेद बने रहेंगे। लेकिन उस वक्त विरोधियों को मात देने के लिए खुद इतना नीचे नहीं गिरा जाता था। अब तो नैतिकता, मर्यादा, शिष्टाचार के तमाम तकाजों को कैद कर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। तय है कि इस अमृत पर उन्हीं लोगों का हक होगा, जिन्होंने खुद को बाकियों से ऊंचा मान लिया है। समाज के आम लोग, निचले पायदान के लोग एक बार फिर अमृत की आस में कटोरा लिए ठगे जाएंगे या अमृत पाने के लिए ऊंची जमात में शामिल होने की कोशिश में दंडित किए जाएंगे।

देशबन्धु में आज का संपादकीय का किंचित् संपादित रूप साभार

मुखर्जी, हेडगेवार और सावरकर द्वारा तिरंगे के अपमान के लिए भाजपा देश से माफी मांगे – शाहनवाज़ आलम

Failed attempt to stand before Nehru

पं. नेहरू ! एक नायक

Jawaharlal Nehru

पं. नेहरू ! एक नायक

देश के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता पं. जवाहरलाल नेहरू (India’s first Prime Minister and Congress leader Pt. Jawaharlal Nehru) को आज की युवा पीढ़ी जानती ही नहीं है असल में पं. नेहरू थे कौन? (Who was Pt. Nehru?) वह तो बस वाट्सएप यूनिवर्सिटी और ट्विटर वारियर्स (WhatsApp University and Twitter Warriors ) द्वारा दुष्प्रचारित किये गये उसी नेहरू को जानती है जो अय्याश और औरतों का बहुत शौकीन व्यक्ति था और जिसने एडविना माउंटबेटन के प्यार के लिए भारत को गिरवी रख दिया था।

The propaganda against Nehru has been going on for decades

नेहरू के खिलाफ दुष्प्रचार तो दशकों से चला आ रहा है पर पिछले कुछ सालों में इसमें तेजी आई है और नेहरू के खिलाफ बार-बार यह भी मिथक फैलाया जाता है कि वह गांधी की कृपा से प्रधानमंत्री बने।

अब आप वाट्सएप यूनिवर्सिटी के वारियर्स द्वारा फैलाये गए इन मिथकों छोड़कर यह सच्चाई भी जान लें।

सरदार पटेल भी पंडित नेहरू को अपना नेता घोषित कर चुके थे और उन्होंने कहा था कि बापू के सारे सैनिकों का फर्ज है कि वे जवाहरलाल जी के पूरे आदेशों का पालन करें।

पंडित नेहरू और सरदार पटेल में मतभेद जरूर थे पर मनभेद कभी नहीं

पंडित नेहरू बैरिस्टर थे, उन्होंने कैम्ब्रिज से उच्च श्रेणी में वकालत की डिग्री अपनी काबिलियत के दम पर प्राप्त की थी। वह खानदानी रईस यानी खूब अमीर परिवार से थे। उनका पहला घर “आनंद भवन” विदेशी साज-सामानों से सजाया गया था, जो विलासिता का उदाहरण है। एक दिन उनकी मुलाकात गांधी जी से हो जाती है और वे अपनी शानो शौकत वाली जिदंगी छोड़कर अपनी सारी जिंदगी देश की सेवा में समर्पित कर देने का संकल्प लेते हैं और भारत की आजादी की लड़ाई की खातिर वह अपनी जवानी के कीमती 10 वर्ष जेल में बिता देते हैं।

आजादी के बाद दुनिया के कई देशों ने तो मान लिया था कि भारत एक देश के रूप में फ़ेल हो जाएगा, वो पंडित नेहरू की विलक्षण प्रतिभा का ही कमाल था, जिसके कारण आज भारत का ध्वज विश्व के पटल पर लहरा रहा है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पंडित नेहरू ने 21 वर्षों किया उतना काम तो 200 वर्षों के बराबर है।

पंडित नेहरू का यह सच आपके पसंद करने या नापसंद करने से बदलने वाला नहीं है।

Pandit Nehru favored a strong opposition in democracy

पंडित नेहरू लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष के हिमायती थे और उन्हें इस बात की भी चिंता रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद पहुंचें। नेहरू की इन्हीं खूबियों की बदौलत लोहिया, अटल बिहारी और आडवाणी भी उनकी तारीफ किया करते थे।

वो नेहरू का ही व्यक्तित्व था, जो हर तरफ से अपनी जय जय कार से ऊब कर 1957 में मॉडर्न टाईम्स में खुद के खिलाफ ही जबर्दस्त लेख लिख डाला था।

पंडित नेहरू से शुरू हुआ यह दुष्प्रचार का सिलसिला अब महात्मा गांधी और इंदिरा गाँधी तक आ पहुंचा है। गांधी जयंती और नेहरू जयंती पर ट्विटर में चलने वाले ट्रेंड को देखकर आपको लोगों की ठरकी सोच नजर आने लगेगी।

एयर इंडिया से लेकर भारत पेट्रोलियम जैसी कम्पनियां भी नेहरू, इंदिरा की ही देन हैं जिसे आज बेचा जा रहा है।

नेहरू के खिलाफ मिथकों में एक मिथक यह भी है कि वे भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ थे, जबकि सच्चाई इसके उलट है। नेहरू भगत सिंह से मिले भी थे और ये भी कहा था, “हम भगत सिंह न बचा सके, हमारी इस असर्मथता पर देश दुखी होगा और जब अंग्रेजी हुकूमत हमसे समझौते की बात करेगी तो हमारे और उसके बीच भगत सिंह की लाश भी पड़ी होगी।”

भगत सिंह का त्याग और बलिदान इतने उंचे दर्जे का है कि अहिंसा के दूत बापू भी भगत सिंह के नि:स्वार्थ त्याग और वीरता की प्रशंसा कर रहे हैं और पंडित नेहरू अपने पिता मोतीलाल नेहरू और गांधी जी के खिलाफ भी सुभाष चन्द्र बोस के पक्ष में खड़े हो गए थे जब कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ‘डोमिनियम स्टेट्स’ के प्रस्ताव में सुभाष चन्द्र बोस ने संशोधन पेश किया और कहा कि भारत को सम्पूर्ण आजादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए।

अमेरिका के ह्यूस्टन में हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने एक अमेरिकी सांसद द्वारा कहा जा रहा था कि

“अमेरिका की तरह भारत भी अपनी परंपराओं पर गर्व करता है, जिससे वह अपने भविष्य को गांधी की शिक्षा और नेहरू की उस सोच जिसमें भारत को धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्र बनाने की बात है, उसका बचाव कर सके, जहां प्रत्येक व्यक्ति और उसके मानवाधिकारो का सम्मान किया जाएगा” तो अमेरिकी सांसद की इसी बात से नेहरू के व्यक्तित्व और उनकी लोकप्रियता का पता लगा लीजिए।

नेहरू जब जीवित थे तो उनकी देश में जबरदस्त लोकप्रियता तो थी ही और साथ ही विदेशों में भी धाक थी, जबकि आज की तुलना में न तो इतने भारतीय विदेशों हुआ करते थे और न कोई इवेंट मैनेजमेंट होता था पर नेहरू को भी क्या पता था कि जिस देश के लिए वो अपनी जिंदगी क़ुर्बान कर रहे हैं, एकदिन ऐसा भी आएगा कि उसी देश में उनको नायक से खलनायक बनाया जाएगा और हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

बेशक राजनीति में किसी की नीतियों की आलोचना की जा सकती है परन्तु आलोचना का स्तर इतना भी नहीं गिरना चाहिए कि उसके खिलाफ भ्रामक और झूठी कहानियाँ गढ़ी जाएं।

आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वो वाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा फैलाये गए भ्रामक प्रचार को छोड़कर नेहरू और पटेल दो गांधीवादी नेताओं की जीवनी पढ़े जिससे उसको राष्ट्र निर्माण में उनके त्याग और बलिदान का पता चल सके।

खुर्शीद पठान

(लेखक युवा पत्रकार व एमजेएमसी के छात्र हैं।)