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Tag Archives: poems on migrant laborers

लेकर चली मां हजारों मील मासूमों को/ शर्म नहीं आती हुक्मरानों को और कानूनों को

Migrants

व्यवस्था पर चोट करती सारा मलिक की तीन लघु कविताएं Sara Malik’s three short poems hurting the system भूख और गरीबी से मजबूर हो गए जख्म पांव के नासूर हो गए कदमों से नाप दी जो दूरी अपने घर की, हजारों ख्वाब चकनाचूर हो गए छालों ने काटे हैं जो रास्ते बेबसी का दस्तूर हो गए. कभी पैदल कभी प्यासे, …

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