सरकारें, पुलिस एक्ट-कानूनों में संशोधन के बजाय पुलिस रिफॉर्म पर काम करें

POLICE

Governments should work on police reform rather than amending police act-laws

Police is an important link and protector of democracy. The police is also responsible for the success of democracy.

•डॉ. लखन चौधरी•

देश में पुलिस सुधार अध्यादेशों एवं कानूनों की आवश्यकताओं पर एक बार फिर से पुर्नविचार करने का समय आ गया है। वैसे तो पुलिस सुधार के इस महत्वपूर्णं मसले पर देश में समय-समय पर चर्चाएं, बहस एवं विमर्श होते रहे हैं, लेकिन इस बार केरल सरकार द्वारा पुलिस एक्ट में धारा 118ए जोड़ने संबंधी नया अध्यादेश लाने और 24 घंटे के भीतर इस अध्यादेश को वापस लेने के कारण इस मुद्दे को एक बार फिर सुर्खियां में आने का मौका मिला है।

सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह अध्यादेश जल्दबाजी में लाया गया था ? क्या इस अध्यादेश के कारण पुलिस अधिकारों की सीमाओं में अवांछित एवं गैर-जरूरी बढ़ोतरी हो रही थी ? क्या वास्तव में पुलिस प्रशासन इस कानून का दुरूपयोग करके आमजन को परेशान कर सकती थी ? क्या वाकई यह अध्यादेश इतना विवादित था, जिसे केरल सरकार द्वारा आनन-फानन में लाया गया और उतनी ही तत्परता के साथ वापस ले लिया गया ?

केरल की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार ने जिस पुलिस एक्ट में धारा 118ए जोड़ने संबंधी नया अध्यादेश लाया था, क्या वह वाकई औचित्यपूर्णं था ? वर्तमान परिवेश में उसकी कितनी जरूरत थी ? क्या इसके बगैर पुलिस के हाथ बंधें हैं, जो समाज में अराजकता फैलाने वालों को गिरफ्तार नहीं कर सकती है ? क्या इस एक्ट को लागू करने के बाद पुलिस एवं सरकार ताकतवर हो जाते ? इस एक्ट के लागू हो जाने के बाद केरल पुलिस को पहले से अधिक अधिकार मिलने की बात कितनी सही है ? क्या यह आशंका सही थी कि पुलिस इनका दुरूपयोग कर किसी को भी किसी मामले में फंसा सकती थी, इसी वजह से इसका विरोध हुआ और सरकार को इस अध्यादेश को महज 24 घंटे के भीतर वापस लेना पड़ा ?

पहले जानिए धारा 118ए क्या है

धारा 118ए के अनुसार किसी भी संचार माध्यम में आपत्तिजनक, अपमानजनक, बदनाम करने वाले या धमकी भरे पोस्ट करने वाले व्यक्ति को पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर कभी भी गिरफ्तार कर सकती है। इसमें तीन साल तक की सजा या दस हजार रूपये जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान था। इस अध्यादेश को केरल के राज्यपाल ने भी मंजूरी दे दी थी, इसके बावजूद इसे सरकार ने वापस ले लिया है। इसका तात्पर्य यह है कि इस अध्यादेश में कुछ तो ऐसा था जिसका पुलिस मनमानी इस्तेमाल करते हुए किसी भी व्यक्ति को कभी भी परेशान कर सकती थी। तो सवाल उठता है कि क्या पुलिस अभी ऐसा नहीं करती है ? या नहीं कर सकती है ?

किसी भी संचार माध्यम से किसी भी तरह के पोस्ट के लिए किसी भी व्यक्ति को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता था। इस अध्यादेश को लेकर जो आपत्ति एवं विरोध की बात हो रही है, उसका महत्वपूर्णं भाग यह है कि इस अध्यादेश को कानून का स्वरूप देने के बाद ’फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन’ के उल्लंघन का मामला (‘Freedom of speech and expression’ violation case) बनता है, जो कि असंवैधानिक है।

संविधान में आर्टिकल 19 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को ’बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का अधिकार मिला हुआ है, और इसी को लेकर इसका विरोध किया गया और कहा गया कि इस एक्ट के द्वारा सरकार किसी भी व्यक्ति को कभी भी परेशान, गिरफ्तार कर सकती है। तो यहां सवाल उठता है कि क्या सरकार अभी ऐसा नहीं करती हैं ? या नहीं कर सकती हैं ? आजादी के सात दशकों में केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने कितनी बार इसका दुरूपयोग किया है ?

दरअसल में आज भी हमारे देश की पुलिस की छवि इतनी अस्पष्ट, पक्षपाती, भ्रामक है कि एक तरफ पुलिस को अपनी इमेज सुधारने के लिए समाज को बताना पड़ता है कि पुलिस उसकी रक्षक है, पुलिस जनता की सेवा के लिए है; तो दूसरी तरफ पुलिस सरकारों के दबाव में आकर वो सब कुछ करती है, जो उसे जनहित में नहीं करनी चाहिए।

एक तरफ पुलिस समाज के अपराधियों, समाज में अराजकता फैलाने वाले अनैतिक लोगों से लड़ती दिखाई देती है; तो दूसरी तरफ उन्हीं अपराधियों एवं समाज के दुश्मनों का संरक्षण करती दिखती है।

सवाल इसलिए उठते हैं कि आखिरकार पुलिस अपनी इमेज, छवि को लेकर इतनी अस्पष्ट, भ्रमित क्यों है ? पुलिस जनता का विश्वास हासिल करने में इतनी पीछे क्यों है ?

आज देश की आम जनता पुलिस पर विश्वास नहीं करती है तो इसके पीछे कौन से, कौन-कौन से कारण हैं ?

देश के सुदूर, ग्रामीण, अंदरूनी, दुर्गम एवं नक्सली क्षेत्रों में पुलिस की भूमिका अक्सर संदेहास्पद क्यों रहती है ? नक्सली हमेशा पुलिस को अपना निशाना क्यों बनाते हैं ? पुलिस का अक्सर अपराधियों के साथ गठजोड़ क्यों देखने को मिलता है ? कई बार जानते हुए भी पुलिस सही, सच्चाई का साथ न देकर गलत का साथ क्यों देती है ? पुलिस अक्सर अपनी भूमिका में गलत क्यों साबित होती है ? न्यायालयों में पुलिस सबूत साबित करने में अक्सर असफल क्यों होती है ? सैकड़ों सवाल हैं जिनका जबाव पुलिस के पास है, लेकिन फिर भी पुलिस बेचारगी की स्थिति में है। क्या यह पुलिस की निर्बलता है, अक्षमता है, अनिर्णयात्मकता है, किंकर्तव्यमूढ़ता है ? विडम्बना है ? बेबसी है ? क्यों है ? किसलिए है ? इन सवालों का उत्तर भी पुलिस को देना होगा, देना चाहिए, क्योंकि पुलिस लोकतंत्र की एक महत्वपूर्णं कड़ी और रक्षक है। लोकतंत्र की सफलता का दायित्व पुलिस पर भी है। पुलिस इस जिम्मेदारी एवं जवाबदेही से बच नहीं सकती है। आज पुलिस को यह समझने की जरूरत है कि पुलिस कहीं न कहीं अपनी भूमिका के निर्वहन में चूक कर रही है। इस दबाव से उसे बचना होगा, निकलना होगा तभी वह अपनी भूमिका के प्रति न्याय कर सकती है।

सबसे महत्वपूर्णं बात जिस पर इस समय अधिक विमर्श एवं परिचर्चा की दरकार है कि पुलिस एवं सरकार मिलकर पुलिस सुधार या पोलिसिंग रिफार्म की बात क्यों नहीं करते हैं ? पुलिस अपनी इमेज-छवि सुधारने की दिशा में ठोस काम क्यों नहीं करती है ? घटना के घटित हो जाने के बाद ही पुलिस घटनास्थल पर क्यों पहुंचती है ? पुलिस जिस दिन समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों की दुखदर्द की भागीदार बन जायेगी, सरकारों की हां में हां मिलाना छोड़कर अपनी जिम्मेदारी एवं जवाबदेही निभाने लगेगी, उसी दिन सही अर्थ में पुलिस की भूमिका देश के लिए सार्थक बन सकेगी।

सार यह है कि इस समय देश में पुलिस एक्ट कानूनों में सुधार एवं संशोधन की जगह देश को पुलिस सुधार या रिफार्म की अधिक जरूरत एवं आवश्यकता है।

सरकारों को चाहिए कि पुलिस एक्ट कानूनों में नई धाराएं जोड़कर पुलिस को शक्तिशाली बनाने के बजाय पुलिस सुधार एवं पुलिस रिफार्म पर काम करें। सरकारों की कठपुतली बनने के बजाय पुलिस जनता की हितैषी बने, जनता का विश्वास अर्जित करे, तो यही पुलिस के लिए बड़ी ताकत बन जाायेगी। पुलिस अपनी जिम्मेदारी एवं जवाबदेही के लिए सरकारों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल करे। पुलिस, आज न सिर्फ जनता की हमदर्द बन सकती है बल्कि समाज सुधार एवं लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में मील के पत्थर की भूमिका भी निभा सकती है, और पुलिस को यह भूमिका अवश्य निभानी चाहिए।

(लेखक; मीडिया पेनलिस्ट एवं सामाजिक-आर्थिक विमर्शकार हैं)

बढ़ते अपराध, पुलिस के समक्ष साख का संकट और जज लोया का रास्ता

HATHRAS हाथरस गैंगरेप : व्यवस्था और मानवता का अंतिम संस्कार

Increasing crime, credit crisis in front of police and judge Loya‘s way

हाथरस गैंगरेप के मामले में एक महत्वपूर्ण अपडेट (An important update in the case of Hathras gangrape) यह है कि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने इस मामले में स्वतः संज्ञान ले लिया है। पीड़िता की रात में, हाथरस जिला प्रशासन (Hathras District Administration) द्वारा चुपचाप अंतिम संस्कार कर दिए जाने के बारे में मीडिया में सरकार और प्रशासन पर लगातार उठ रहे सवालों पर संज्ञान लेते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने आज इस महत्वपूर्ण मामले में दखल दिया है।

हाईकोर्ट के जज, जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए कोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार को गरिमामय अंतिम संस्कार के अधिकार‘ के शीर्षक से एक जनहित याचिका दायर करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।

हाथरस के बलात्कार का मामला अभी थमा भी नहीं था कि, जिला बलरामपुर में गैसड़ी से एक 19 वर्ष की लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म किये जाने की खबर मिली है, जिसमें पीड़िता की मृत्यु हो गयी है।

कहा जा रहा है, महाविद्यालय में प्रवेश लेने के लिए निकली छात्रा का अपहरण कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इस जघन्य अपराध में, अस्पताल पहुंचने से पहले ही पीड़िता ने दम तोड़ दिया। पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म का केस दर्ज कर दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। शव को पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया है।

मीडिया की खबरों के अनुसार, छात्रा मंगलवार सुबह 10 बजे एक निजी महाविद्यालय में दाखिला लेने के लिए गयी थी। देर शाम तक घर नहीं लौटी तो परिजनों ने बेटी की तलाश शुरू की। इसी बीच छात्रा बदहवास एवं गंभीर हालत में घर पहुंची। छात्रा ने कहा कि उसे एक युवक कॉलेज ले गया था। प्रवेश के बाद वही युवक उसे लेकर गैसड़ी बाजार पहुंचा और अपने घर ले गया। जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में ही छात्रा की मौत हो गई है। बुधवार सुबह गैसड़ी की पुलिस ने मामले को संदिग्ध मानते हुए मृतका का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा था। परिजनों की आशंका पर पुलिस दो लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है।

Crimes against women have increased significantly across the country.

पूरे देश में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में उल्लेखनीय ढंग से वृद्धि हुई है। वर्ष 2019 में अब तक दर्ज मामलों के मुताबिक भारत में औसतन 87 बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं। 2019 के शुरुआती नौ महीनों में महिलाओं के खिलाफ अब तक कुल 4,05, 861 आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी ) के आंकड़ों के अनुसार, यह 2018 की तुलना में सात प्रतिशत अधिक है। “भारत में अपराध -2019” रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पिछले साल के मुकाबले 7.3 प्रतिशत बढ़ गए हैं।

वर्ष 2019 में प्रति एक लाख महिला आबादी पर 62.4 % मुकदमे दर्ज हुए हैं, जबकि वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 58.8 प्रतिशत था। देश भर में वर्ष 2018 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,78, 236 मामले दर्ज किए गए थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में देश में बलात्कार के कुल 33,356 मामले दर्ज हुए हैं जबकि वर्ष 2017 में यह संख्या 32,559। इन आंकड़ों के अनुसार,

“भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज इन मामलों में से अधिकांश ‘पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ (30.9 प्रतिशत) के मामले हैं, इसके बाद उनकी ‘शीलता का अपमान करने के इरादे से महिलाओं पर हमले’ (21.8 प्रतिशत), ‘महिलाओं के अपहरण’ (17.9 प्रतिशत) के मामले दर्ज हैं.”

Amazing patience and amazing government.

हाथरस गैंगरेप के मामले में, एक कागज सोशल मीडिया पर घूम रहा है जिंसमें ओमप्रकाश नामक एक व्यक्ति लिख कर दे रहा है कि उसे सरकार से कोई शिकायत नहीं है। धैर्य और शांति की पराकाष्ठा का प्रतीक है यह कागज़ी दस्तावेज। यह दस्तावेज खुद ही यह प्रमाणित करता है कि इसे लिखाने के लिए इलाके के पुलिस अफसर को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी।

क्या यह कल्पना की जा सकती हैं कि, जिसकी बेटी के साथ दुराचार हुआ, गला दबा कर मार डालने की कोशिश की गयी, बलात्कार हुआ, और कई दिन तक मुकदमा नहीं लिखा गया, कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, अभियुक्त खुलेआम घूमते रहे, पीड़िता के परिवार को धमकियां मिलती रहीं, अंतिम संस्कार के समय उसकी मां और भाभी बिलखती रही, पल पल पर सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो आ आ कर हम सबको विचलित करते रहे, और उसी के घर का एक सदस्य सरकार को एक प्रशस्ति पत्र स्वेच्छा से सौंप दे कि वह संतुष्ट है ! कमाल का सब्र है और कमाल की सरकार।

सोशल मीडिया पर जो कागज़ घूम रहा है, उसमें लिखा है,

“मैं ओम प्रकाश पुत्र स्व. बाबूलाल निवासी ग्राम वूलगढ़ी थाना चन्दपा तहसील हाथरस जनपद हाथरस बयान करता हूँ कि मेरी मा0 मुख्यमंत्री जी, उ0प्र0 शासन लखनऊ से दूरभाष पर वार्ता हुई। मा० मुख्यमंत्री जी द्वारा मेरी समरत माँगों को पूरा करने का आश्वासन दिया गया। मैं मा0 मुख्यमंत्री जी के आश्वासन से संतुष्ट हूँ एवं उनका आभार व्यक्त करता हूँ। इस दुख की घड़ी में जिन लोगों ने हमारा साथ दिया उनका भी आभार व्यक्त करता हैं एवं सभी लोगों से अपील करता हूँ कि किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन न करें। शासन/प्रशासन की कार्यवाही से पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।”

दिनांक : 30.09.2020

ओम प्रकाश पुत्र स्व0 बाबूलाल निवासी ग्राम बूलगढ़ी थाना चंदपा तहसील हाथरस

जज लोया प्रकरण और हाथरस प्रकरण में समानता | Similarity between Judge Loya episode and Hathras episode

ठीक इसी प्रकार कुछ सालों पहले, सीबीआई जज लोया के बेटे ने भी कैमरे के सामने आ कर कहा था कि, उनके पिता की मृत्यु एक स्वाभाविक मृत्यु थी। लेकिन लोया की संदिग्ध मृत्यु की जांच का आदेश कहीं कोर्ट न कर दे, इसलिए दिल्ली से मुम्बई तक की सरकारों ने देश के सबसे महंगे वकीलों को पैरवी के लिए सुप्रीम कोर्ट तक तैनात कर रखा था। क्योंकि इस संदिग्ध हत्याकांड में शक की सुई भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से एक, पर आ रही थी।

एक कानूनी स्थिति यहां स्पष्ट कर दूं कि, भारतीय आपराधिक कानून प्रणाली के अनुसार, अपराध, राज्य बनाम होते हैं। घर के किसी व्यक्ति द्वारा उस अपराध के बारे में कोई कार्यवाही न करने या न चाहने के बावजूद, वह मुकदमा न तो खत्म होता है और न खारिज। राज्य उस मुकदमे में एक पक्ष होता है।

हाथरस मामले में, रात के अंधेरे में बिना पीड़िता के माता-पिता की सहमति और अनुमति के चोरी छुपे पीड़िता का शव जला दिये जाने का निंदनीय आइडिया, वहां के डीएम और एसपी के दिमाग से उपजा आइडिया था, या सरकार में बैठे कुछ आला और नज़दीकी अफसरों का कोई ऐसा निर्देश, यह तो पता नही है, पर गैंगरेप पर मचे आक्रोश से कहीं अधिक सरकार के इस मूर्खतापूर्ण निर्णय की चर्चा हो रही है और अब तक सरकार की छीछालेदर हो रही है, और आगे भी होगी।

No offense occurs without bad intent.

अब कहा जा रहा है कि डॉक्टर ने कहा है कि बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई (Rape not confirmed)। यहीं यह सवाल उठता है कि, फिर उक्त पीड़िता से बदतमीजी, गला दबा कर मार डालने की कोशिश, इतने वहशियाना तरह से पीटना कि, रीढ़ की हड्डी टूट जाए, का मोटिव क्या था ? महज़ छेड़छाड़ या बलात्कार की कोशिश ? इतनी मारपीट और ज़बरदस्ती तो, किसी न किसी बद इरादे से ही की गयी होगी ? बलात्कार अगर वह बद इरादा नहीं था तो फिर अपराध का मोटिव क्या था ? बिना बद इरादे के कोई अपराध घटित नहीं होता है।

जब पीड़िता जीवित थी और अस्पताल में रही होगी तब उसका बयान तो लिया ही गया होगा। क्या उस बयान में पीड़िता ने बताया है कि उसके साथ क्या क्या हुआ है ? वह बयान अब मृत्यु पूर्व बयान मान लिया जाएगा। घटना के लगभग एक हफ्ते से अधिक समय तक वह अस्पताल में रही, क्या उस बीच उसका बयान मैजिस्ट्रेट के सामने कराया गया ? मुझे उम्मीद है ज़रूर कराया गया होगा। और अब वही बयान मुकदमे का आधार बनेगा। गांव देहात में पीड़ित लड़कियां अक्सर रेप या बलात्कार शब्द का प्रयोग नहीं करती हैं, वे इसे गलत काम करना कह कर बताती हैं।

इस मामले पर राजनीति हो रही है, और होनी भी चाहिए। जब सरकार राजनीति के कारण ही सत्ता में आती है और सत्ता से बाहर जाती है, जब अफसरों की पोस्टिंग और तबादले राजनीति के आधार पर होते हैं, जब जांच के आदेश और जांच के निष्कर्ष पर कार्यवाही राजनीति के मद्देनजर होती है, जब गनर शैडो और सुरक्षा कर्मी राजनीति के आधार पर लोगों को दिए और लिए जाते हैं, जब मीडिया का हेडलाइन मैनेजमेंट राजनीति (Media Headline Management Politics) के आधार पर तय होता है, तो अगर एक लड़की जिसे बेहद बर्बर तऱीके से तड़पा-तड़पा कर मार दिया गया तो फिर ऐसे गर्हित अपराध पर राजनीति क्यों नहीं होगी ? अगर राजनीति ऐसे अवसर पर मूक और बांझ हो जाए तो, ऐसी निकम्मी और निरुद्देश्य राजनीति का कोई अर्थ नहीं है।

Society cannot be freed from the responsibility of crime like rape.

हाथरस गैंगरेप (Hathras gangrape) की यह घटना कोई पहली बलात्कार की घटना नहीं है। बल्कि हाथरस गैंगरेप के बाद ही, बलरामपुर, बुलंदशहर, खरगौन, राजस्थान अन्य जगहों पर होने वाली ऐसी घटनाओं की सूचना मिल रही हैं। क्या पता यह लिखते पढ़ते कहीं और से न ऐसी ही कोई अन्य, दुर्भाग्यपूर्ण खबर मिल जाए। बलात्कार जैसे अपराध की जिम्मेदारी से समाज को मुक्त नहीं किया जा सकता है। यह जिम्मेदारी देश काल के वातावरण पर भी है। आप यह जिम्मेदारी नेट और अश्लीलता पर भी थोप सकते हैं। पर इन सब मामलों में घटना की सूचना मिलते ही मुकदमा दर्ज करने और मुल्ज़िम को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी तो पुलिस पर ही आएगी। जहां मुकदमा लिखने और गिरफ्तारी की कार्यवाही तुरन्त हो जाती है वहां स्थितियां नियंत्रित रहती हैं, और जहां इसे तोपने ढांकने और दाएं बाएं करने की कोशिश की जाती है, वहीं हाथरस जैसा कोई न कोई कांड उछल जाता है।

आज अगर कोई यह सोचे कि वह किसी अपराध की खबर या उससे जुड़ी कोई बात छुपा लेगा तो वह गफलत में है। जब हर हाथ में स्मार्टफोन हो, कैमरा और वायस रिकॉर्डर हो तो कैसे कोई कुछ छिपा सकता है ?

तमाम ड्यूटियों और घेरेबंदी के बाद भी, पीड़िता के अंतिम संस्कार की तमाम वीडियो (All the videos of the victim’s funeral) दुनिया भर में फैल रही हैं। लगभग सबने उन्हें देखा है। जो न भी देखना चाहे तो भी हथेली में पड़ा फोन उसे दिखाने लगता है। ऐसे में कैसे इस प्रकार की किसी घटना को छुपाया जा सकता है ?

A video of the District Magistrate in Hathras threatening and explaining the victim viral

हाथरस में जिलाधिकारी द्वारा पीड़िता को धमकाने और समझाने का भी एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें डीएम यह कहते हुए सुने जा रहे हैं कि,

“आज मीडिया है, यह चली जायेगी, कल तक बाकी मीडिया भी नहीं दिखेगी और दिखेगा तो सिर्फ यही सरकारी तंत्र, मान भी जाओ।”

एक बात और ….

सरकार या सत्ता या पुलिस, इनके प्रति जनता में अविश्वास का एक स्थायी भाव होता है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। यह आज से नहीं है, बल्कि पुलिस के बारे में तो बहुत पहले से ही है। कुछ अधिकारी इसके अपवाद हैं और यह उस अधिकारी की निजी साख के कारण है न कि संस्थागत साख के कारण। ऐसे में सरकार, और अफसर के बयान पर लोग यक़ीन नहीं करते। वे लोग भी कम ही यक़ीन करते हैं जो अफसर और सरकार के बेहद करीब होते हैं।

यह साख का ही संकट है कि सीबीआई जज ब्रजमोहन लोया के बेटे से सरकार को परोक्ष रूप से टीवी पर कहलवाना पड़ा कि ‘सब चंगा सी’ औऱ अब यही साख का संकट हाथरस पुलिस को बाध्य कर रहा है कि वह एक एनओसी, पीड़िता के घर वालों से प्राप्त करे कि, ‘हम खुश हैं, सरकार आप से !’

जब कानून के तयशुदा मार्ग से भटक कर कानून को लागू करने की कोशिश की जाती है तो ऐसे ही हास्यास्पद शॉर्टकट एलीबाई दिमाग में आती है।

जब देश के सत्ता में बैठे नेतागण अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों को सत्तासीन होते ही येन केन प्रकारेण वापस लेने की जुगत में लग जाएंगे तो ऐसे आपराधिक मनोवृत्ति के नेताओं की रहनुमाई में यदि आप अपराध मुक्त समाज और प्रशासन की कल्पना करते हैं तो यह, हम सबकी मासूमियत है। ठोंक दो के फरमान, अरमान, और इम्तिहान के बाद भी, अगर उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति नहीं सुधरती है तो, क्या किया जाना चाहिए ?

विजय शंकर सिंह

लेखक अवकाशप्राप्त आईपीएस अफसर व कानून विशेषज्ञ हैं

पुलिस-स्टेट की ओर भारत?

debate

(1) पुलिसकर्मी अपने कार्यों, शक्तियों और कर्तव्यों का उपयोग सामान्य जनता और मौजूदा सरकार के निष्पक्ष सेवक के रूप में करेंगे। … किसी भी पुलिसकर्मी को, उसके कार्यों या शक्तियों, या पुलिस संसाधनों का उपयोग करते वक्त, किसी भी राजनीतिक पार्टी या हित-समूह, अथवा वैसी पार्टी या समूह के किसी भी सदस्य को बढ़ावा देने या कमतर आंकने का न आदेश दिया जा सकता है, और न बाध्य किया जा सकता है। पुलिस का कर्तव्य है कि वह बिना किसी डर या पक्षपात के समान रूप से सभी राजनीतिक पार्टियों, व्यक्तियों और संगठनों के अधिकारों को बनाए रखे और सभी को समान रूप से संरक्षण प्रदान करे। (लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका पर संयुक्त राष्ट्र संघ के दिशा-निर्देशUnited Nations Guidelines on the Role of Police in DemocracyHuman Rights, Gender and the Role of Police in Democratic Elections)

उपनिवेशवादी, राजशाही और तानाशाही व्यवस्थाएं मूलत: पुलिस-राज्य होती है. लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी समय-समय पर पुलिस-राज्य की प्रवृत्तियों का उभार देखने को मिलता है.

पुलिस- राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी/सरकार पुलिस-बल का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं, असहमत नागरिक समाज एक्टिविस्टों/बुद्धिजीवियों को उत्पीड़ित करने और नागरिक स्वतंत्रताओं/मानवाधिकारों का हनन करने में करती है. संयुक्त राष्ट्र संघ ने लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की कसौटी पर विभिन्न देशों में पुलिस की भूमिका के बारे में रपटें प्रकाशित होती हैं.

इन रपटों से पता चलता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों में भी राजनीतिक-वर्ग (पोलिटिकल क्लास) अपनी सत्ता कायम रखने के लिए पुलिस-बल का बेजा इस्तेमाल करता है. राजनीतिक सत्ता और पुलिस सत्ता के बीच गठजोड़ होता है, तो पुलिस मनमानी का एक स्वायत्त क्षेत्र भी विकसित कर लेती है. इस क्षेत्र में तस्करों/माफियाओं के साथ मिली-भगत से लेकर हफ्ता-उगाही तक और विचाराधीन कैदियों की हिरासत में मौत से लेकर ‘बदमाशों’ के एनकाउंटर तक अनेक तरह के पुलिस-कृत्य आते हैं.

पुलिस की मनमानी का सबसे बुरा असर समाज के कमजोर तबकों – अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, महिलायें आदि – पर पड़ता है. पुलिस का सत्ता-स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने वाली सरकारें पुलिस की मनमानियों की अनदेखी करती है. कानून में पुलिस के लिए लगभग दंड-मुक्ति (इम्प्युनिटी) का प्रावधान होने के चलते पुलिस-दमन का चक्र कभी थमता नहीं है.

पूर्व-उपनिवेशित देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में पुलिस-राज्य की प्रवृत्तियां स्वतंत्र देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा देखने को मिलती हैं. इसका कारण है कि पूर्व-उपनिवेशित देशों का पुलिस-तंत्र उपनिवेशवादी शासन की देन है. पुलिस और उसकी खुफिया शाखा उस दौर में उपनिवेशवादी व्यवस्था को मजबूती से टिकाए रखने का काम करती थी. समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का दायित्व दूसरे स्थान पर आता था. कानून-व्यवस्था बनाए रखने की पुलिस की भूमिका भी अंतत: उपननिवेशवादी सत्ता की मजबूती से ही जुड़ी होती थी. क्योंकि कानून-व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य जनता के मानस में उपनिवेशवादी सत्ता के प्रति भय और निष्ठा पैदा करना था.

उपनिवेशवादी सत्ता अपने शासन का औचित्य जताने के लिए निष्पक्ष न्याय का दावा करती थी. लेकिन किसी भी मामले की जांच के दौरान दंड-प्रक्रिया संहिता की धाराएं निश्चित करने में पुलिस की पक्षपाती भूमिका निष्पक्ष न्याय की संभावना ख़त्म कर देती थी.

दरअसल, दंड-प्रक्रिया संहिता की धाराओं का निर्माण ही आधिपत्य कायम रखने की नीयत से किया जाता था. प्रत्येक देश के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान नेताओं और जनता के प्रति पुलिस का रवैया दमन और ज़ुल्म भरा होता था. उपनिवेश रहे प्रत्येक देश का इतिहास पुलिस-दमन, पुलिस-ज़ुल्म और पुलिस-भ्रष्टाचार की दहला देने वाली अनेक घटनाओं से भरा है.

इस तथ्य के मद्देनज़र यह जरूरी था कि उपनिवेशवाद से स्वतंत्र होने वाले देशों को लोकतंत्र की संगति में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष पुलिस-प्रणाली का निर्माण करना चाहिए था. अफसोस की बात है कि भारत में यह सबसे जरूरी काम नहीं किया गया. इस सच्चाई को रेखांकित करते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया ने 1967 में लिखा,

“सच्चाई यह है कि कांग्रेस सरकार ने अपने को ब्रिटिश शासन के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने की उत्सुकता में, बजाय लोकप्रिय क्रांति का उत्तराधिकारी बनने के, आंख बंद कर उन सब कानूनों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को गुलाम रखने के लिए बनाया था.”

Lohia’s suggestion with reference to ‘Code of Civil Liberties and Criminal Procedure’

लोहिया उपनिवेशवाद से मुक्ति दिलाने वाले देशव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन को लोकप्रिय क्रांति कहते थे, जिसमें क्रांतिकारियों की भूमिका शामिल थी. 1967 में बनी गैर-कांग्रेसी सरकारों को लोहिया ने ‘नागरिक स्वतंत्रताओं और दंड-प्रक्रिया संहिता’ के संदर्भ में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए. एक धुर लोकतंत्रवादी होने के नाते लोहिया ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद पुलिस-तंत्र से जुड़ी समस्याओं और उनके हल पर लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के मद्देनज़र गहराई से विचार किया है.

समाजवादी होने के नाते स्वाभाविक रूप से इस समस्या पर उन्होंने विशाल गरीब भारत के पक्ष से विचार किया है. स्थापित पुलिस-तंत्र में भी वे कांसटेबलरी के अधिकारों और सुविधाओं के हिमायती थे. वे शायद देश के अकेले राजनेता थे जिसने 1967 के दिल्ली पुलिस आंदोलन का समर्थन किया था. उस आंदोलन में दिल्ली पुलिस के सिपाहियों ने विभाग के गैर-राजपत्रित कर्मियों की यूनियन बनाने के अधिकार की मांग करते हुए राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास को घेर लिया था. लोहिया ऐसी पुलिस की परिकल्पना करते हैं जो गरीब व कमजोर को नागरिक समझ कर व्यवहार करे. लोहिया इसे एक राजनीतिक समस्या मानते थे, जिसका हल स्वतंत्र भारत की राजनीतिक पार्टियों और नेतृत्व को सैद्धांतिक निष्ठां के साथ करना चाहिए था.

(2)

त्रावनकोर-कोचीन (अब केरल) में 16 मार्च 1954 को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा) की अल्पमत सरकार का गठन हुआ था. केरल की राजनीति में ‘भीष्माचार्य’ के रूप में विख्यात पत्तुम ए थानु पिल्लई मुख्यमंत्री थे. त्रावनकोर तमिलनाडु कांग्रेस (टीटीएनसी) की अगुवाई में तमिल-बहुल इलाकों को त्रावनकोर-कोचीन से अलग कर मद्रास राज्य में शामिल करने का आंदोलन चल रहा था.

जो ब्यौरे मिलते हैं उनसे पता चलता है कि आंदोलन व्यवस्थित और शांतिपूर्ण था. विधानसभा में टीटीएनसी के 12 विधायक थे जो तमिल बहुल चुनाव क्षेत्रों से चुने गए थे. 11 अगस्त 1954 को पुलिस ने आंदोलनकारियों पर दो जगह गोली चलाई. पहली गोलीबारी मारतंडम में हाई स्कूल के बाहर जमा आंदोलनकारियों, जिसमें स्कूल के छात्र भी शामिल थे, पर की गई, जिसमें 9 लोग मारे गए. दूसरी गोलीबारी पुदुक्कदाई जंक्शन पर आयोजित जनसभा पर की गई, जिसमें 6 लोग मारे गए.

डॉ. लोहिया प्रसोपा के महासचिव थे और नैनी जेल में कैद थे. उन्होंने 12 अगस्त को मुख्यमंत्री थानु पिल्लई को जेल से ‘व्यक्तिगत सिफारिश’ का तार भेजा,

‘हो सकता है उपद्रवकारी पूरी तरह से गलती पर रहे हों और उन्होंने घृणित स्थिति पैदा की हो. लेकिन पुलिस गोलीबारी, जिसमें लोगों की जानें गई हों, विद्रोह या हत्या की हालत को छोड़, अनुचित है. इस सिद्धांत के अनुसार मैं गैर-सरकारी जांच, अफसरों का निलंबन और साथ-साथ सरकार के इस्तीफे की सिफारिश करता हूं.’

(मृतकों की ऊपर दी गई संख्या बाद की है. जब लोहिया ने तार भेजा था उस समय गोलीबारी 4 लोगों के मारे जाने की खबर थी.)

लोहिया को मुख्यमंत्री का कोई जवाब नहीं मिला. उन्होंने 17 अगस्त और 23 अगस्त को पार्टी अध्यक्ष आचार्य जेबी कृपलानी को दो पत्र लिखे. पहले पत्र में लोहिया ने लिखा,

‘सही है वे (मुख्यमंत्री) जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं. लेकिन पुलिस ने जहां लोगों की हत्या की, उस क्षेत्र का दौरा करने के बाद मुख्यमंत्री ने एक सार्वजनिक बयान दिया है. उन्होंने कहा है शक्ति के उपयोग में जितना ज्यादतियों से बचना जरूरी था उतना ही नरमी से बचना और उनकी पुलिस ने यह कर दिखाया है.’

(इसके पहले 12 जुलाई को मुख्यमंत्री विधानसभा में पेश किये गए एक स्थगन प्रस्ताव के दौरान आंदोलन को सख्ती से दबा देने की घोषणा कर चुके थे. 8 अगस्त को एक जनसभा में उन्होंने कहा था कि तमिल चाहें तो राज्य छोड़ कर जा सकते हैं.)

लोहिया ने मुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा,

‘अभी वह समय नहीं आया है जब एक भारतीय मंत्री स्वयं अपना न्यायधीश का काम करने के योग्य हो सके. इसके अलावा, भारत में पहली सोशलिस्ट सरकार ने शक्ति और नरमी के बारे में ऐसे बेमतलब और खतरनाक सामान्यीकरण करके अच्छा नहीं किया है. सदैव ऐसे सामान्यीकरणों के पीछे निरंकुशता छिपी होती है.’

इसी पत्र में लोहिया ‘लोकतंत्र में गोलीबारी’ के विरोध में महासचिव पद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी से अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को भेज दिया, यह कहते हुए, ‘अगर मैं बाहर होता तो कार्यकारिणी को इस सवाल पर तत्काल विचार करने के लिए कहता. अगर कार्यकारिणी ने अवसरवादी रवैया अपनाया होता इसे मैं जनरल कौंसिल में ले जाता.’ भारत के समाजवादी आंदोलन के इतिहास में यह अध्याय ‘गोली-कांड विवाद’ के नाम से मशहूर है.

गोलीबारी के मुद्दे पर लोहिया की मंत्रिमंडल के इस्तीफे की मांग को गलत ठहराते हुए सरकार के पक्ष में वे सब तर्क दिए गए, जो आज तक दिए जाते हैं. मसलन, कांग्रेस सरकारों में निहत्थे लोगों पर कई बार गोलीबारी हुई है, लेकिन वहां पार्टी नेतृत्व कभी सरकार के इस्तीफे की मांग नहीं करता; किसी अफसर द्वारा गोलीबारी का आदेश देने पर मंत्रिमंडल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, न ही उसे इस्तीफ़ा देने को कहा जा सकता है; इस्तीफ़ा देने से सरकार की प्रतिष्ठा और ख्याति, और अंततोगत्वा पार्टी की प्रतिष्ठा और सम्मान को चोट पहुंचेगी; भीड़ हिंसा और आगजनी पर उतारू थी; कम्युनिस्टों ने आंदोलन को भड़काया था; त्रावनकोर-कोचीन राज्य के असंतुष्ट कांग्रेसियों ने पुलिस को तमिल आंदोलनकारियों के विरुद्ध उकसाया था; इस्तीफ़ा देने पर पुलिस के मनोबल पर विपरीत असर पड़ेगा; पहली बार किसी राज्य में सोशलिस्ट सरकार बनी है, उसे खुद इस्तीफ़ा देकर खो देना समझदारी नहीं है; गांधी भी पुलिस की सरकार के प्रति वफादारी का औचित्य स्वीकार करते थे; पहले सरकार घटना की जांच कराए और दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा दे; जांच में अगर किसी मंत्री को दोषी पाया जाता है तो उसका इस्तीफ़ा होना चाहिए; सरकार का इस्तीफ़ा मांगना तभी जायज़ है जब जांच समिति सरकार को दोषी बताये… आदि.

Lohia believed in principle that police firing in a democracy cannot be justified except in situations of mob killing.

लोहिया का सिद्धांतत: मानना था कि भीड़ द्वारा हत्या की स्थितियों को छोड़ लोकतंत्र में पुलिस गोलीबारी का औचित्य नहीं हो सकता. उन्होंने गोलीबारी के मुद्दे को बुनियादी बताते हुए आग्रह किया कि सभी राजनीतिक दलों द्वारा इसका समाधान ढूंढा जाना चाहिए. साथ ही एक समाजवादी सरकार को इस्तीफ़ा देकर भविष्य के लिए नजीर पेश करनी चाहिए. कोई भी सरकार जो अपनी पुलिस की राइफल पर निर्भर करती है जनता का कुछ भी भला नहीं कर सकती.

उनकी दृढ़ राय थी कि जिस सरकार के शासन में गोली चलाई गई है, उसके रहते निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती. उन्होंने कहा कि अगर गोलीबारी की घटना पर सरकार का इस्तीफ़ा होता तो उससे अन्य पार्टियों और पुलिस का आचरण प्रभावित होता.

गोली-कांड विवाद के चलते पार्टी टूट के कगार पर पहुंच गई. राजनीति छोड़ चुके जयप्रकाश नारायण और प्राय: अस्वस्थ रहने वाले आचार्य नरेंद्र देव जैसे मूर्धन्य नेताओं के हस्तक्षेप के बावजूद पार्टी में उठ खड़ा हुआ गोली-कांड विवाद थमा नहीं.

माना जाता है कि गोलीबारी की घटना के बाद दिल्ली में संपन्न हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जेपी और शायद कृपलानी भी लोहिया की राय से सहमत थे. लेकिन लोहिया की तीखी भाषा ने काम बिगाड़ दिया.

जेपी ने गोलीबारी पर जो पहला ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार किया था, उसे उन्होंने परिवर्तित कर दिया. नवम्बर 1954 में नागपुर में आयोजित पार्टी के विशेष अधिवेशन में लोहिया और उनके समर्थकों की हार हुई. हालांकि इस बीच पार्टी ने ‘सार्वजनिक व्यवस्था पालन’ पर कामथ समिति का गठन कर एक रपट तैयार की. लेकिन विवाद थमा नहीं. नागपुर अधिवेशन में ही पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन हुआ, हालांकि सिद्धांत और व्यवहार की रस्साकसी के चलते पैदा हुई दरार भर नहीं पाई.

अंतत: 1955 में पार्टी टूट गई. उधर थानु पिल्लई सरकार ने प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायधीश के शंकरण की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बैठाया. आयोग ने तीन महीने बाद अपनी रपट में पुलिस गोलीबारी को सही ठहराया. 12 फरवरी 1955 को थानु पिल्लई की ‘लोकप्रिय सरकार’ प्रसोपा के विधायक टीएस रामास्वामी द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के परिणामस्वरूप गिर गई.

(3) Relation of democracy and police

इस 66 साल पुराने राजनीतिक वाकये का जिक्र मैंने इसलिए किया है कि सभी राजनीतिक धाराओं के नेतृत्व को स्वतंत्रता के शुरुआती दौर में लोकतंत्र और पुलिस के सही संबंध के निर्धारण का जरूरी काम करना चाहिए था. ऐसा नहीं होने की स्थिति में राजनीतिक सत्ता-पुलिस सत्ता गठजोड़ उत्तरोत्तर मजबूत होता गया. नतीजतन, लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधारभूत मूल्य एक के बाद एक ध्वस्त होते गए. कई अवसरों पर लगता है कि देश में लोकतंत्र के नाम पर महज़ कंकाल बचा है. सरकारें नागरिक स्वतंत्रताओं/अधिकारों का हनन करने वाले कठोरतम कानून बनाती हैं.

इस कड़ी में 1967 में बना और 2019 में संशोधित आतंकवाद निरोधी कानून (यूएपीए) और उपनिवेशवादी दौर से चला आ रहा कुख्यात राष्ट्र-द्रोह कानून (सेडीशन एक्ट) देखे जा सकते हैं. इन कानूनों का शिकार ज्यादातर समाज का कमजोर तबका और उसके हितों की मुखर वकालत करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता और नागरिक समाज एक्टिविस्ट होते हैं. आंदोलनकारी किसानों, मज़दूरों, छात्रों आदि पर पुलिस गोलीबारी और गिरफ़्तारी की घटनाएं आम बात है.

सांप्रदायिकता की सीढ़ी बना कर सत्ता में आने वाली मौजूदा सरकार और पुलिस के गठजोड़ का फूहड़तम रूप अक्सर सामने आता रहता है. लोगों को बात-बात पर देश-द्रोही और आतंकवादी ठहराया जाता है. केंद्र सरकार के तहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस के बारे कहा जाता है कि वह देश की अभिजात और सभ्य पुलिस है. हाल के दिनों में उसके कुछ कारनामे देखे जा सकते हैं.

पुलिस ने 15 दिसंबर 2019 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के परिसर/पुस्तकालय में धावा बोल कर छात्र-छात्राओं की बेरहमी से पिटाई की और अपमानित किया. शिक्षक होने के नाते मैं महसूस करता हूं कि चोटें छात्र-छात्राओं के शरीर पर ही नहीं, आत्मसम्मान पर भी पड़ी थीं.

कोरोना महामारी के बाद स्थिति सामान्य होने पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन फिर से सिर न उठा सके, इसकी पेशबंदी दिल्ली पुलिस ने कोरोना-काल में कर दी है. उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों को पूर्वनियोजित बताने की दिल्ली पुलिस की स्क्रिप्ट समाज से लेकर अदालत तक सबके सामने खुली है. दिल्ली के विशेष पुलिस आयुक्त प्रवीर रंजन ने दंगों की जांच करने वाले अधिकारियों को आधिकारिक परिपत्र जारी कर निर्देश दिया है कि वे उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के आरोपियों की गिरफ्तारियां करते वक्त ‘हिंदू-भावना’ को ध्यान में रखें.

यह सही है कि पराकाष्ठा पर पहुंची पुलिस-दमन की किसी घटना-विशेष पर पुलिस सुधारों की चर्चा और प्रयास तेज हो जाते हैं. कुछ सरोकारधर्मी बड़े पुलिस अधिकारी अपने अनुभव के आधार पर ठोस सुझाव देते हैं. फौरी राहत के लिए यह जरूरी है.

India towards police-state?

डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi - 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria
डॉ. प्रेम सिंह, Dr. Prem Singh Dept. of Hindi University of Delhi Delhi – 110007 (INDIA) Former Fellow Indian Institute of Advanced Study, Shimla India Former Visiting Professor Center of Oriental Studies Vilnius University Lithuania Former Visiting Professor Center of Eastern Languages and Cultures Dept. of Indology Sofia University Sofia Bulgaria

आज़ादी से अब तक राज्यों और केंद्र द्वारा गठित कई समितियों और आयोगों ने पुलिस सुधारों पर कई सिफारिशें/उपाय प्रस्तुत किये हैं. इनमें राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-81) की 8 रपटों पर आधारित महत्वपूर्ण सिफारिशें भी हैं. उच्चतम न्यायालय 2006 में पुलिस सुधारों के बारे में राज्यों और केंद्र को विस्तृत निर्देश जारी कर चुका है. लेकिन मूलभूत समस्या – राजनीतिक सत्ता-पुलिस सत्ता गठजोड़ – ज्यों की त्यों बनी रहती है. कारण स्पष्ट है, स्वतंत्र भारत की पुलिस व्यवस्था उपनिवेशवादी दौर के पुलिस अधिनियम 1861, और उसके साथ भारतीय दंड संहिता 1862 पर टिकी हुई है. पुलिस अधिनियम और दंड संहिता 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में बनाए गए थे, ताकि भारतीय असहमति (डिसेंट) और प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) जताने की स्थिति में न रहें. 1857 के बाद भारत का करीब 90 सालों का स्वतंत्रता संघर्ष इन्हीं कानूनों की काली छाया में, और उनके विरुद्ध लड़ा गया था.

ध्यान दे सकते हैं कि नव-उपनिवेशवादी दौर में राजनीतिक सत्ता-पुलिस सत्ता गठजोड़ का उपनिवेशवादी चरित्र बखूबी उभर कर सामने आया है. यह स्वाभाविक है. देश के संसाधनों को बेचने में लगे राजनीतिक-वर्ग को पुलिस चाहिए, ताकि वह विरोधियों को देश-द्रोही बता कर वंचित आबादी के आक्रोश से अपनी सुरक्षा कर सके. संसाधनों को खरीदने वाली देशी-विदेशी कंपनियों को भी पुलिस चाहिए, ताकि उनके मुनाफे का कारोबार सुरक्षित रूप से चलता रह सके. नए भारतमें राजनीतिक सत्ता-पुलिस सत्ता गठजोड़ में कारपोरेट सत्ता का नया आयाम जुड़ गया है.

देश के नागरिक समाज का वृहद् हिस्सा इस सत्ता-त्रिकोण का मुखर या मौन समर्थक है. यह अकारण नहीं है. वह नवउपनिवेशवादी लूट से गिरने वाली जूठन खाता है और गाल बजाता है. सवाल है कि क्या नव-उपनिवेशवादी गुलामी के तहत बनने वाला ‘नया भारत’ उपनिवेशित भारत की तरह एक पुलिस-राज्य है?

प्रेम सिंह

(लेखक दिल्ली विश्ववविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)