आत्मनिर्भर भारत में पांच मांगें, 26 संगठन, 10 जून को करेंगे छत्तीसगढ़ में राज्यव्यापी आंदोलन

Kisan

होगा राज्य और केंद्र सरकार की कृषि और किसान विरोधी नीतियों का विरोध

रायपुर, 06 जून 2020. छत्तीसगढ़ में विकसित हो रहे साझे किसान आंदोलन से जुड़े 26 संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार की कृषि और किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ पांच प्रमुख मांगों को केंद्र में रखकर 10 जून को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।

गांव-गांव में ये प्रदर्शन फिजिकल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 के प्रोटोकॉल को ध्यान में रखकर आयोजित किये जायेंगे।

इन संगठनों में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, किसानी प्रतिष्ठा मंच, भारत जन आंदोलन, छग प्रगतिशील किसान संगठन, राजनांदगांव जिला किसान संघ, क्रांतिकारी किसान सभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, छमुमो मजदूर कार्यकर्ता समिति, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, छग आदिवासी कल्याण संस्थान, छग किसान-मजदूर महासंघ, किसान संघर्ष समिति कुरूद, दलित-आदिवासी मंच, छग किसान महासभा, छग आदिवासी महासभा, छग प्रदेश किसान सभा, किसान जन जागरण मंच, किसान-मजदूर संघर्ष समिति, किसान संघ कांकेर, जनजाति अधिकार मंच, आंचलिक किसान संगठन, जन मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय किसान मोर्चा, किसान महापंचायत और छत्तीसगढ़ कृषक खंड आदि संगठन शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ किसान सभा के राज्य अध्यक्ष संजय पराते और किसान संगठनों के साझे मोर्चे से जुड़े विजय भाई ने बताया कि सब संगठन मिलकर :

  1. राज्य सरकार से कोरोना संकट के मद्देनजर पंजीयन की बाध्यता के बिना सभी मक्का उत्पादक किसानों द्वारा उपार्जित मक्का की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद किये जाने;
  2. हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा खरीफ फसलों के लिए घोषित समर्थन मूल्य को नकारते हुए स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फार्मूले के अनुसार फसल की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने और धान का समर्थन मूल्य 3465 रुपये घोषित करने;
  3. केंद्र सरकार द्वारा मंडी कानून और आवश्यक वस्तु अधिनियम को अध्यादेश के जरिये बदलने और ठेका कृषि को कानूनी दर्जा देने के मंत्रिमंडल के फैसले को निरस्त करने;
  4. छत्तीसगढ़ के प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों-घरों तक मुफ्त पहुंचाने, उनके भरण-पोषण के लिए मुफ्त खाद्यान्न, मनरेगा में रोजगार और नगद आर्थिक सहायता देने और
  5. बिजली क्षेत्र के निजीकरण करने के फैसले पर रोक लगाने व बिजली कानून में कॉर्पोरेट मुनाफे को सुनिश्चित करने के लिए किए जा रहे प्रस्तावित जन विरोधी, किसान विरोधी संशोधनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

इस विरोध प्रदर्शन की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा इस वर्ष मक्का की सरकारी खरीद न किये जाने के कारण प्रदेश के किसानों को 1700 करोड़ रुपयों से ज्यादा का नुकसान होने का अंदेशा है, क्योंकि बाजार में मक्का की कीमत 1000 रुपये प्रति क्विंटल से भी नीचे चली गई है। इसी प्रकार, केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य में औसतन 4.87% की ही वृद्धि की है, जो महंगाई तो क्या, लागत की भी भरपाई नहीं करती। राज्य का विषय होने के बावजूद और संसद से अनुमोदन के बिना ही कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेटपरस्त बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे हमारे देश की खाद्यान्न सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ही खतरे में पड़ जाएगी।

इन किसान संगठनों का मानना है कि बिजली क्षेत्र के निजीकरण और क्रॉस-सब्सिडी खत्म किये जाने के प्रावधानों के कारण खेती-किसानी और घरेलू रोशनी पूरी तरह चौपट हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि आज भी छत्तीसगढ़ के तीन लाख प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे पड़े हैं। इन्हें सुरक्षित ढंग से अपने घरों में वापस लाने की चिंता न केंद्र सरकार को है और न राज्य सरकार को। क्वारंटाइन सेन्टर अव्यवस्था के शिकार है, जहां इन मजदूरों को न पोषक आहार मिल रहा है, न इलाज की सही सुविधा। इन केंद्रों में गर्भवती माताओं और बच्चों सहित एक दर्जन से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इन सभी प्रवासी मजदूरों को एक स्वतंत्र परिवार मानते हुए उन्हें राशन कार्ड और प्रति व्यक्ति हर माह 10 किलो मुफ्त अनाज देने, मनरेगा कार्ड देकर प्रत्येक को 200 दिनों का रोजगार देने और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा देने के लिए हर ग्रामीण परिवार को 10000 रुपये मासिक मदद देने की मांग ये संगठन कर रहे हैं।

मोदी सरकार के देश बेचो अभियान के तहत विद्युत संशोधन कानून-2020 राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध – दिनकर

दिनकर कपूर Dinkar Kapoor अध्यक्ष, वर्कर्स फ्रंट

Electricity Amendment Act -2020 under the Modi government’s Country Sell campaign is against national interest – Dinkar

1 जून के देशव्यापी काला दिवस को प्रतिबंधित करना गैरकानूनी

It is illegal to ban the nationwide black day of June 1

लखनऊ, 30 मई 2020, पावर सेक्टर के निजीकरण (Privatization of power sector) के लिए लाये गये विद्युत संशोधन बिल-2020 (Electricity Amendment Bill –2020) के खिलाफ 1 जून 2020 के प्रस्तावित देशव्यापी काला दिवस को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंधित करना गैरकानूनी व संविधान विरुद्ध है साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के बाध्यकारी नियमों के भी खिलाफ है.

वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर ने इसकी निंदा करते हुए प्रेस को जारी अपने बयान में कहा कि बिजली कामगारों का आंदोलन किसान, आम नागरिक के हित में है और पावर सेक्टर को कारपोरेट्स को सौंपने की मोदी सरकार की कार्यवाही राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध है।

उन्होंने कहा कि इस बिल में प्रस्तावित देश के बाहर बिजली बेचने का प्रावधान मोदी जी के एक कार्पोरेट मित्र के लिए लाया गया है जो कच्छ गुजरात में बन रही अपनी बिजली को पाकिस्तान को बेचने के लिए बेताब है. इसीलिए प्रधानमंत्री आये दिन इस बिल को लाने के लिए प्रयास कर रहे है. इसके विरोध से बौखलाई आरएसएस-भाजपा की सरकार ने प्रतिबन्ध लगाया है.

उन्होंने बिजली कामगारों से अपील की कि लेकिन इससे निराश होने या घबराने की जगह जनता को सचेत करने और सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ बड़े जन जागरण की जरुरत है जिसे पूरा करना होगा. देश के लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाले दलों, संगठन व व्यक्तियों और किसान आन्दोलन, व्यापार मंडलों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर इस विरोध को राजनातिक प्रतिवाद में बदलना होगा. यह बेहद डरी हुई सरकार है इससे राजनीतिक तरीके से ही मुकाबला किया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि इस बिल मुख्य प्रावधान सब्सिडी व क्रास सब्सिडी खत्म करना, डिस्कॉम(वितरण) को कारपोरेट कंपनियों के हवाले करना और टैरिफ की नयी व्यवस्था से न सिर्फ कोरोना महामारी में जमीनी स्तर पर जूझ रहे बिजली कामगारों के भविष्य को खतरे में डाला जा रहा है बल्कि इससे आम उपभोक्ताओं खासकर किसानों पर भारी बोझ डाला जायेगा, जिसकी शुरुआत बिजली दरों में बढ़ोतरी कर पहले ही हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि इस बिल के बाद किसानों और आम उपभोक्ता को करीब दस रुपया बिजली प्रति यूनिट खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.

Modi government is engaged in selling and ruining the public property of the country under the pretext of economic crisis created by Corona epidemic.

दरअसल लोकल पर फोकस करने वाली मोदी सरकार कोरोना महामारी से पैदा हुए आर्थिक संकट के बहाने देश की सार्वजनिक संपत्ति को बेचने और बर्बाद करने में लगी है. कोयले के निजीकरण के लिए अध्यादेश लाया जा चुका है, रक्षा जैसे राष्ट्रीय हित के महत्वपूर्ण सेक्टर में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दे दी गयी. बैंक और बीमा को बर्बाद कर दिया गया. वास्तव में बिजली सेक्टर पर ये हमला भी इसी देश बेचो योजना का हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि बिजली के घाटे का तर्क भी बेईमानी है क्योकि घाटा कारपोरेटपरस्त नीतियों की देन है. उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण देख लें, यूपीपीसीएल द्वारा न सिर्फ केंद्रीय पूल से राष्ट्रीय औसत से काफी सस्ते दर से बिजली खरीदी जाती है बल्कि अनपरा, ओबरा और जल विद्युत गृहों से काफी निम्न दर से बिजली का उत्पादन किया जाता है। लेकिन इन सस्ते बिजली पैदा करने वाले उत्पादन केन्द्रों में थर्मल बैकिंग करा कर उत्पादन रोका जाता है वही कार्पोरेट घरानों से अत्यधिक मंहगी दरों से बिजली खरीदी जाती है। यह भी सर्वविदित है कि देश में निजी घरानों को सस्ते दामों पर जमीन से लेकर लोन तक मुहैया कराया गया और हर तरह से पब्लिक सेक्टर की तुलना में तरजीह दी गई तब इनके यहां उत्पादित बिजली की लागत ज्यादा आना लूट के सिवाय और कुछ नहीं है। यही नहीं इन कार्पोरेट घरानों ने बैंक से लिए कर्जो का भुगतान तक नहीं किया जो आज बैंकों के एनपीए में एक बड़ा हिस्सा है.