मोशा जी ! जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जायेंगे

Amit Shah Narendtra Modi

प्रेमचन्द से राजेन्द्र यादव तक के देखे सपनों का पूरा होना आज अगर राजेन्द्र यादव होते तो बहुत खुश होते। जनवरी 1993 में हंस के सम्पादकीय में उन्होंने एक अलग रुख लिया था। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़ने पर, जब सभी बुद्धिजीवी , पत्रकार , सम्पादक राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता एक स्वर से कट्टर