आज संपादक इवेंट मैनेजर है तो तब वो हुआ करता था बनिये का मुनीम या मंत्र पढ़ता पंडत

पिछली सदी के नवें दशक की शुरुआत में दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर कतार से लगी बाटा की दुकान (Bata shop lined up on Bahadur Shah Zafar Marg, Delhi) पर रैक में सजे जूतों के डिब्बों सरीखी इमारतों में एक बैनेट कोलमैन (Bennett Coleman) में जब अपन ने प्रवेश किया तो तब अखबार पाठक के लिए छपा करते थे,  तो इसी मीडिया हाऊस के नूर ए जिगर समीर जैन ने कुछ समय बाद अख़बार को जूता सरीखी कमोडिटी बता कर उसे ग्राहक के लिए लुभावना बनाने की शुरुआत की।

अक्षय कुमार जैन संपादक कम मुनीम ज्यादा थे

नवभारत टाइम्स (Navbharat Times), जिसमें कई सारे प्रायद्वीप, जिन पर अलग-अलग किसिम के जलचर-उभयचर, उन सबको कंट्रोल करने को कोई जैन साब, तब तक अक्षय कुमार जैन की विदाई हो चुकी थी, उन दिनों दिल्ली की राष्ट्रीय पत्रकारिता में संपादक की कुर्सी मालिक के जातिभाई यानी बनियों के नाम हुआ करती थी और तिलकधारी पंडित सूबाई पत्रकारिता की धरोहर हुआ करते थे। अक्षय कुमार जैन (Akshay Kumar Jain) संपादक कम मुनीम ज्यादा थे और अपने दड़बेनुमा कक्ष में बैठने के बजाए तीसरी मंज़िल पर मालिक की ताबेदारी में दस से पांच किया करते थे,

उनके जाने के बाद वहां गुटबाजी का बोलबाला था और मालिक संपादक को फर्जी बना कर उसे प्यादे से पिटवा रहा था, तो जब वहां अपने चरण पड़े तो हवा में खूनी संघर्ष की खुशबू तैर रही थी। आनंद जैन घायलावस्था में पड़े किसी केबिन में अंतिम सांसें ले रहे थे और रामपाल सिंह अपनी कोमल कलाइयों के साथ तलवार के बजाए खुरपी चला रहे थे। ( एक साल बाद यही सज्जन लखनऊ में नवभारत टाइम्स के शुरू होने पर उसके संपादक बना कर भेजे गए थे तब जा कर इनकी ठाकुराई लहराई)।

संपादकीय हॉल के एक तरफ खोखों की कतार, हिंदी अंग्रेजी के सम्पादक, सहायक सम्पादक अचार, सहायक सम्पादक विचार, सहायक सम्पादक मुरब्बा, सहायक सम्पादक चटनी बैठते, (यही हाल कस्तूरबा गांधी मार्ग पर बिड़ला जी के अखबार का था।)

तो एक दड़बे के दरवाजे पर सम्पादक की नामपट्टिका देखी, रामपाल सिंह, कार्यवाहक सम्पादक, कान में रामधुन बजने लगी, और जुबां पर गायत्री मंत्र, लेकिन हौसले बुलंद थे क्योंकि अपने पास कंपनी के सर्वेसर्वा रमेश चन्द्र जैन की कलम से से लिखी – ज़रा देख लें – वाली पुर्जी जो थी,  उन्होंने पुर्जी देख मीठी सी मुस्कान मारी और समाचार सम्पादक पदधारी किन्हीं जैन साहब को बुलवाया और मुझे उन्हें सौंप एक आंख छोटी कर रमेश जी का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया।

जैन साब ने बस गोद में नहीं उठा लिया, लेकिन भाव वही था। अपन भी उसी भाव में ही उनकी गोदी में सवार हो गए।  मुझे गोदी में लिये पूरे संपादकीय विभाग के चक्कर काटते रहे लेकिन किसी ने भाव नहीं दिया क्योंकि तब नवभारत टाइम्स मेरे जैसे सिफारिशी टाइप लोगों से लबालब था।

वो मुख्य उप सम्पादक पंत जी के पास ले गए। उनके सामने की मेज पर जैसे ही जैन साब ने मुझे रखा, पंत जी बिलबिलाए। यह किसको उठा लाए, क्या मैंने ट्रेनिंग सेन्टर खोल रखा है, हटाइये मेरे सामने से।

जैन साब ने उनकी ठोड़ी चूमी और निकल लिये।

पंत जी कड़कड़ाए, जहां जगह मिले बैठ जाओ, खबर बनाने को नहीं दूंगा, डस्टबिन से उठाओ और रियाज़ करो।

वहां खबरें बनाने का काम उस तरह चल रहा था जैसे लखनऊ के मोहन मार्केट में रेवड़ी बनते देखी थी। कुछ दिन वहां हरामखोरी में गुजरे, फिर सौंप दिया गया सत सोनी के हाथों में, जिन्होंने खेंचखांच के पत्रकार बना ही दिया।

इब्बार रब्बी के दर्शन यहीं हुए, जो उन दिनों खलासीनुमा पत्रकारों के रहनुमा बने हुए थे।

कुछ दिन बाद ही राजेन्द्र माथुर नवभारत टाइम्स के पूर्णकालिक सम्पादक बन कर वहां आ गए, उनके लेखन से परिचय था ही, ब्रेझनेव की मौत पर टीप मार कर लिखा लेख उनके पास लेकर पहुंच गया, उन्होंने कोई लिफ्ट नहीं मारी।

कुल मिला कर नवभारत टाइम्स प्रवास में माथुर साहब की अच्छी-बुरी किसी बुक में अपना नाम नहीं था, एक साल दिल्ली और फिर तीन साल लखनऊ-कुल चार साल में दस बार उनसे बात करने का मौका मिला, अकेले में दो-चार बार ही।

उन्हीं दिनों दिल्ली नवभारत टाइम्स के संपादकीय हॉल में एक त्रासदायक दृष्य देखने को मिला। रद्दी अखबारों से भरे एक केबिन में दिनमान के प्रतापी संपादक रघुवीर सहाय बदहवास से बैठे हैं। समीर जैन की वलीअहद के रूप में ताजपोशी हो चुकी थी। उन्हें दिनमान, सारिका या धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं भार लग रहीं थीं और उनके भारी भरकम संपादक कबाड़ लग रहे थे। रघुवीर सहाय हों या, धर्मवीर भारती या कन्हैया लाल नंदन, सब अपनी गति को पहुंचा दिए गए।

The atmosphere of slave dynasty continued in Hindi journalism

हिंदी पत्रकारिता में गुलाम वंश वाला माहौल जारी था,  इसी माहौल वाले उस नवें दशक को हिंदी पत्रकारिता को नया रंगरूप, नयी तर्ज और नयी भाषा देने के लिये याद किया जाएगा। इस दशक में राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा, मृणाल पांडे जैसे दिग्गज पत्रकार हुए, तो घनश्याम पंकज जैसे कई संपादक पत्रकारिता को अय्याशी का रूप देने में जुट गये।

इन दस सालों में दो दिग्गज संपादकों में एक राजेन्द्र माथुर ने तो पूरी निष्ठा से पत्रकार धर्म निभाया, तो जहीरूद्दीन बाबर की तरह हिंदी पत्रकारिता में धमाका करने वाले प्रभाष जोशी पांच साल में ही अपनी मिशनरी पत्रकारिता के मकड़जाल में फंस गए और हिंदी पत्रकारिता बहुमूल्य वचनों की लुगदी में दफन हो गयी।

राजीव मित्तल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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