सर्वोच्च न्यायालय में एक भी मुस्लिम जज न होना संयोग नहीं, राजनीति है- शाहनवाज़ आलम

सर्वोच्च न्यायालय में एक भी मुस्लिम जज न होना संयोग नहीं, राजनीति है- शाहनवाज़ आलम

कॉलेजियम व्यवस्था को बदले बिना सभी को न्याय नहीं मिल सकता

सरकार के प्रभाव में काम कर रही है कॉलेजियम व्यवस्था

लखनऊ, 7 सितंबर 2022। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेश अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम ने तमिलनाडू के मुख्यमन्त्री एमके स्टालिन के उस बयान का समर्थन किया है जिसमें उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में सभी वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व की मांग की है। 

शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के कुल 31 जजों में देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी मुस्लिम वर्ग से एक भी जज नहीं है। यह जानबूझकर अल्पसंख्यक समुदाय के साथ किया जाने वाला न्यायिक अन्याय है, जिसका मकसद इस समुदाय का न्यायपालिका पर से भरोसा कमज़ोर करना है।

उन्होंने दलित, आदिवासी और अतिपिछड़े वर्गों की सर्वोच्च न्यायालय में उनके अनुपात में भागीदारी नहीं होने को भी गंभीर समस्या बताया।

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि 2012 में नियुक्त दो मुस्लिम जजों जस्टिस एमवाई इक़बाल और फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के 2016 में सेवा निवृत्त हो जाने के बाद से एक भी मुसलमान जज को सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम व्ययवस्था ने नामित नहीं किया, जो कॉलेजियम व्यवस्था के सांप्रदायिक चरित्र को उजागर करता है। जबकि त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अकील क़ुरैशी वरिष्ठता क्रम में देश के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश थे। लेकिन मोदी सरकार के दबाव में कॉलेजियम ने उनका नाम नहीं भेजा। 

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि कॉलेजियम किस कदर मोदी सरकार के सामने नतमस्तक है इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि जस्टिस कुरैशी जब गुजरात हाईकोर्ट में कार्यरत थे तब हाई कोर्ट में मुख्यन्यायाधीश का पद खाली था लेकिन कॉलेजियम ने उन्हें मुख्यन्यायाधीश नियुक्त करने के बजाए उन्हें मुंबई हाईकोर्ट का मुख्यन्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। इसके एक साल बाद कॉलेजियम ने उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए उनका नाम केंद्र सरकार को भेजा लेकिन सरकार ने नाम स्वीकार नहीं किया। लेकिन सरकार से अपनी लिस्ट पर अधिकार के तहत अड़ जाने के बजाए कॉलेजियम ने नतमस्तक होने का विकल्प चुना। जिसके बाद उन्हें देश के सबसे छोटे हाईकोर्ट त्रिपुरा का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया, जो एक तरह से उनका डिमोशन था।

उन्होंने कहा कि जस्टिस कुरैशी की गलती सिर्फ़ यही थी कि उन्होंने सोहरबुद्दीन शेख फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में आरोपी अमित शाह को विधि के अनुसार सीबीआई की हिरासत में भेजा था। 

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था के पूरी तरह सरकार के आगे झुक जाने का ही परिणाम है कि बिना हाई कोर्ट में कभी जज रहे लोग भी सीधे सर्वोच्च न्यायालय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठ जा रहे हैं। 

जो काम सरकार ख़ुद नहीं कर सकती उसे न्यायपालिका से करवा रही है : शाहनवाज़ आलम hastakshep

The collegium system is working under the influence of the government

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