Home » Latest » सुनो ‘मोशा’! जो बिहार में न हो पाया वो बंगाल के चुनाव में होगा
26th November left Bengal

सुनो ‘मोशा’! जो बिहार में न हो पाया वो बंगाल के चुनाव में होगा

बंगाल के चुनाव में बिहार का अधूरा काम पूरा होगा

जो भी बिहार के चुनाव (Bihar elections) को मोदी की लोकप्रियता का प्रमाण (Proof of Modi’s popularity) मानता है, वैसे, कवि कैलाश वाजपेयी के शब्दों में, “चुका हुआ / नंगे पत्थर के आगे झुका हुआ/ औरों के वास्ते विपदाएं मांगता / नाली में पानी रुका हुआ !”

‘ईश्वरभक्त’ को यदि हम अभी किनारे छोड़ दें, तो कोई अंधा भी देख सकता है कि बिहार का चुनाव मोदी और नीतीश के स्तर के उसके सारे पंडों को एक सिरे से खारिज करने वाला चुनाव रहा है। जब चुनाव का ऐलान हुआ था, वहां प्रत्यक्षतः हालत यह थी कि जैसे चुनाव में सिवाय मोदी-शाह के करोड़ों-अरबों के काले धन के अलावा और किसी का कुछ भी नहीं चलेगा। लालू तो वैसे ही जेल में हैं, कांग्रेस की दशा हर कोई जानता है और वामपंथी तो जैसे अस्तित्व का संकट झेलते दिखाई दे रहे थे। कोरोना के कारण न कोई सभा-प्रदर्शन होंगे, न किसी को घर-घर प्रचार के कार्यकर्ता ही मिलेंगे। मीडिया पर मोदी-शाह के एकाधिकार के कारण और भी कहीं से कोई दूसरी बात के उभरने की संभावना नहीं दिखाई देती थी। अर्थात् लगता था कि चारों ओर जैसे किसी शीश महल में सिर्फ अमित शाह की वर्चुअल सभाओं के नजारे होंगे। रोते हुए प्रवासी मजदूर, बेसहारा किसान और बेरोजगारों की अंतहीन फौज, आम लोगों की दुख-दर्द की कहानियां इस महल से बाहर किसी उपेक्षित कोने में सिसकियां भरती हुई अपने भाग्य को कोसेगी। अर्थात् बिहार में रावण की कथित सोने की लंका का दृश्य पूरी तरह साकार हो उठेगा।  

अपनी लंका की इतनी मोहक तस्वीर की कल्पना की तरंग में ही तो अमित शाह ने अपनी कथित ‘चाणक्य बुद्धि’ का डंका बजाने के लिए चुनाव के मूल नाटक के साथ ही नीतीश बनाम चिराग पासवान वाले एक अतिरिक्त प्रहसन का अंक भी इसमें जोड़ दिया ताकि चुनाव का यह खेल पूरी तरह से ऊबाऊ होने के बजाय उसमें कुछ मजाक, कुछ रोमांच बना और उसी के अंदर से नीतीश का चुनाव के अंत में हमेशा के लिए राम नाम सत्य करके अमित शाह को महाबली घोषित कर दिया जाए; चुनाव के अंत में बादशाह सलामत की छाया तले ‘चाणक्य पहलवान’ अमित शाह की शान में चारों ओर से तुरहियां गूंजती रहें।

बहरहाल, बिहार के चुनाव ने दिखा दिया कि वह सब पूरी तरह से अपनी रंगरेलियों में डूबे हुए अय्याश शासकों का हसीन सपना भर था। लोग जब वैसे ही अपने जीवन-जीविका मात्र के लिए रोजाना मास्क जैसी मामूली चीज को हिकारत के साथ ठुकराते हुए देखे जाते हैं, वैसी स्थिति में ये महामारी और उसकी सारी मास्क और सामाजिक दूरी की नियामतें चुनाव जैसे मौके पर निर्णायक साबित होगी, यह कोई ऐसा पहलवान चाणक्य ही सोच सकता था, जिसने फर्जी डिग्रियां और उपाधियां देने वाले स्कूल से अपने लिये वह उपाधि खरीदी होगी। चाणक्य तो बहुत दूर की बात है, उस स्कूल में तो हर रोज किसी को नेहरू की डिग्री बांटी जाती है तो किसी को पटेल की, तो कभी-कभी गांधी भी हत्थे चढ़ा लिए जाते हैं।

जो भी हो, बिहार के चुनाव का प्रचार शुरू होते ही, जो बिल्कुल स्वाभाविक और अपेक्षित था, जो सतह पर न होने पर भी सबसे प्रबल था, एक तुगलकी राज के खिलाफ लोगों का चरम गुस्सा, नौजवानों में बेरोजगारी की ज्वाला और प्रवासी मजदूरों के जीवन के सबसे यातनादायी अनुभवों की यादें — इन सबका किसी बड़े विस्फोट की तरह फट पड़ना, उसे सामने आने में जरा सा भी समय नहीं लगा। थोड़े से समय के प्रचार में ही यह साफ हो चुका था कि बिहार में बदलाव की लहर बह रही है। मोदी-नीतीश की हैसियत जनता की नजर में खलनायकों से बेहतर नहीं है। और, देखते-देखते सत्ताधारियों का टाट पूरी तरह से उलटता हुआ दिखाई देने लगा। पहलवान चाणक्य को तो इस लड़ाई में पीठ दिखाते जरा सा भी समय नहीं लगा। दो सौ सीटों की उनकी शुरू की हुंकारें किस अंतरिक्ष में खो गई, कि बाद में तो मुहंजोर प्रधानमंत्री के मुंह से भी उसकी आहट तक नहीं सुनाई दी।   

बिहार के चुनाव परिणाम बताते हैं कि पहले चरण के चुनाव में तो एनडीए बुरी तरह पराजित हुआ ; दूसरे-तीसरे चरण में रुपयों के दूसरे खेलों से सांप्रदायिक और जातिवादी गोटियों के जरिये स्थिति को बदलने की ताबड़तोड़ कोशिशें हुईं, फिर भी सच पूछा जाए तो उनसे भी एनडीए की पराजय को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका। अंत में चुनाव के जनतंत्र को दरकिनार कर के नंगा हिटलरी खेल खेला गया, पूरी बेशर्मी से गिनती में हेरा-फेरी हुई और नौकरशाही की जोर-जबर्दस्ती से किसी प्रकार से एनडीए के लिए बहुमत के आंकड़े को कागजों पर लिख दिया गया। आगे, कागज पर लिखे की हिफाजत के लिए राजसत्ता के सारे यंत्र तो तैयार थे ही !

मुख्यमंत्री बन कर भी  नीतीश आज सिर्फ एक कठपुतला है और उनका बाकी मंत्रिमंडल छटियल भ्रष्ट तत्त्वों का निंदित जमावड़ा।

मतलब, जो हासिल हुआ है उसे राजनीति नहीं, शुद्ध लूट-खसोट का अधिकार छीन लेना कहना उचित होगा ; गरीब बिहार के शरीर पर से बचे-खुचे कपड़ों को भी उतारने के अश्लील खेलों का अधिकार।

बहरहाल, इस चुनाव से बिहार की राजनीति अगर किसी रूप में पटरी पर आई है तो यही कि आगे के लिए वह भारत में जनतांत्रिक आंदोलनों की फसल की सबसे उर्वर जमीन बन गई है। बिहार वामपंथी, सामाजिक न्यायवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ताकतों की एकता का नया मंच बन कर उभरा है।  

और, अभी से हम यह साफ देख पा रहे हैं कि बिहार की इस नई राजनीति की फसल बहुत जल्द ही उसके पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में कटने वाली है, जहां आगामी चंद महीनों बाद ही चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक पंडितों की चर्चाओं में अभी बंगाल ही तो छाया हुआ है।

बंगाल के बारे में मीडिया की चर्चा की छटा देख कर अभी तो लगता है जैसे यहां अभी से भाजपा का एकछत्र वर्चस्व कायम हो चुका है। पहलवान चाणक्य के शाही दौर-दौरें शुरू हो गए हैं और उनकी वे ही बार-बार हुआ-हुआ साबित हो चुकी हुंकारे, ‘आपरेशन 1000, 500, 400, 200’ के शोर की गूंज-अनुगूंज भी सुनाई देने लगी है। लेकिन कोई भी गंभीर राजनीतिक विश्लेषक न्यूनतम इतना तो जानता ही है कि पश्चिम बंगाल भी इस देश का ही हिस्सा है और कुछ हद तक यह भी जानता है कि इसकी अपनी खास रंगत होने के बावजूद कश्मीर-हिमाचल से शुरू होने वाली शीत लहरों की चपेट में आने वाले उत्तर भारत के राज्यों में ही बंगाल भी किसी न किसी रूप से शामिल होता ही है। उसमें किसी विंध्य-रेखा का अवरोध नहीं होता है। इसीलिये आराम से यह कहा जा सकता है कि आज राजस्थान, पंजाब, हरियाणा के बाद बिहार में जिस परिवर्तन का सैलाब साफ दिखाई दे रहा है, उस सुनामी की लहरों से बंगाल अछूता नहीं रहने वाला है।

मोदी की मूर्खतापूर्ण लॉकडाउन की करतूत के कारण रोजगार से उखाड़ दिये गए प्रवासी मजदूर बिहार में जितनी बड़ी तादाद में लौटे थे, उससे कम पश्चिम बंगाल में भी नहीं लौटे हैं। इसी प्रकार, पूरे कृषि क्षेत्र को कारपोरेट को सौंप देने की मोदी की नंगी कोशिशों की चिंता बंगाल के लोगों को किसी से कम नहीं है। इन सबके ऊपर, बंगाल में मजदूरों और किसानों के हितों की रक्षा की लड़ाई लड़ने वाले वामपंथ का ताना-बाना देश के किसी भी कोने से बंगाल में कहीं ज्यादा व्यापक और गहरा भी है। इसी वामपंथ की छुअन ने बिहार के चुनाव में वह जादू पैदा किया था, जिसका पहले किसी को जरा सा भान भी नहीं था। आज यदि बंगाल के चुनाव में मतदाताओं में व्यवस्था-विरोध की कोई लहर पैदा होती है, जैसी बिहार में देखी गई तो उसका आधार कत्तई कोई जाहिल सांप्रदायिक सोच नहीं हो सकता है।

मुट्ठी भर उग्र सांप्रदायिक विचार के लोग अपने मन में यह कल्पना कर सकते हैं मोदी का सांप्रदायिक जहर बंगाल के लोगों को पागल बनाने में असरदार साबित होगा, लेकिन किसी  भी संतुलित आदमी के सामने बिहार ने सबसे पहला यही सवाल तो पैदा किया है कि जब बिहार में उनकी सरकार के रहते हुए मोदी का सांप्रदायिक विष कारगर नहीं हो पाया तो वह बंगाल में कैसे प्रभावी हो सकता है ?

आगे के चुनाव अभियानों में अगर कोई नया आलोड़न पैदा होगा तो इसे तय मानने में जरा भी हर्ज नहीं है वह उस आलोड़न को सिर्फ और सिर्फ रोजगार और कृषि अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर ही केंद्रित होना होगा।

आगामी 26 नवंबर को भारत-व्यापी किसानों, मजदूरों और बेरोजगारों से जुड़े मुद्दों पर जिस आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी है, इसकी गूंज अभी से बंगाल के कोने-कोने में किसी न किसी रूप में सुनाई देने लगी है। इसी से इस बात का भी बिल्कुल सटीक अनुमान मिल जाता है कि बंगाल में यदि किसी प्रकार के परिवर्तन की हवा पैदा होती है तो उस हवा का रुख किस ओर होगा।

दक्षिणपंथ सारी दुनिया में अपने रौरव रूप को दिखा कर अब बुरी तरह से ठुकरा दिये जाने के लिए अभिशप्त नजर आने लगा है। इसके संकेत सिर्फ अमेरिका में नहीं, दुनिया के दूसरे कोनों में भी दिखाई देने लगे है। ब्रिटेन की लेबर पार्टी में जिम कोर्बिन को वापस लाने की मांग कम तात्पर्यपूर्ण नहीं है। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी में अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले बर्नी सैंडर्स आज एक सबसे सम्मानित राजनीतिक आवाज माने जाते हैं।

The election of Bengal will not be fought on communal agenda

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि बंगाल का आगामी चुनाव अगर अपेक्षित दिशा ग्रहण करता है तो इसमें आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए कि जो काम बिहार में मोदी-शाह की अंतिम वक्त की करतूतों के चलते अधूरा रह गया, वह बंगाल में पूरा होगा। कम से कम इतना तो अभी से तय है कि बंगाल का चुनाव सांप्रदायिक एजेंडे पर नहीं लड़ा जा सकेगा और इसीलिए अभी से यह भी तय है कि अरबों रुपये खर्च कर के भाजपा अभी जो हवा बांध रही है, उसके गुब्बारे की हवा निश्चित तौर पर असली चुनाव प्रचार शुरू होने के चंद रोज में ही निकल जाएगी। बैठे ठाले लोग इन चुनावों की चर्चा करते वक्त जिस ‘नेता’ नामक तत्व की तलाश में मुब्तिला है, उनके लिए हम इतना ही कहेंगे कि जब कोई नई हवा बहेगी तो वैसे चुंबकीय व्यक्तित्व को सामने आने में भी अधिक समय नहीं लगेगा। अभी से वाम-कांग्रेस गठजोड़ में ऐसे नेताओं के उभार की तस्वीर साफ दिखाई दे रही है, इसके बावजूद अभी की राजनीतिक चर्चा में किसी के नाम का जिक्र करना यथोचित नहीं लगता है। और किसी भी वजह से, ममता बनर्जी के प्रयत्नों से बिहार की तरह की परिवर्तन की कोई लहर पैदा नहीं हो पाती है, तब बात दूसरी है।

Left and democratic forces will return

अंत में हम पुनः इस बात को दोहराएंगे कि बिहार के चुनावों को देखते हुए बंगाल के आगामी चुनाव में भी यदि वैसा ही कोई माहौल बनता है तो इसके अंजाम के तौर पर यहां भाजपा नहीं आएगी, बिहार में जो काम अधूरा रह गया, वही काम पूरा होगा। वामपंथी और जनतांत्रिक ताकतों की वापसी होगी।

—अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हमारे बारे में उपाध्याय अमलेन्दु

Check Also

kanshi ram's bahujan politics vs dr. ambedkar's politics

बहुजन राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

Bahujan politics needs a new radical alternative भारत में दलित राजनीति के जनक डॉ अंबेडकर …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.