चुनाव कहीं रद्द नहीं हुए और बोर्ड परीक्षाएं रद्द, यह देश कोई महाश्मशान है, जहां लोग सिर्फ रो सकते हैं ?

चुनाव कहीं रद्द नहीं हुए और बोर्ड परीक्षाएं रद्द, यह देश कोई महाश्मशान है, जहां लोग सिर्फ रो सकते हैं ?

चुनाव कहीं रद्द नहीं हुए और बोर्ड परीक्षाएं रद्द हो रही हैं। सब कुछ खुला हुआ है, लेकिन स्कूल कालेज बन्द कर दिए गए। हम सिर्फ मृतकों के लिए शोक जता पा रहे हैं।

शोक और दुःख के अलावा बाकी कोई भावना नहीं है। जैसे कि यह देश कोई महाश्मशान है, जहां लोग सिर्फ रो सकते हैं, बिलख सकते हैं,डर सकते हैं और ज़िन्दगी की कोई उम्मीद नहीं बची।

नई पीढ़ी को खतम करने का इससे बड़ा कोई आयोजन विश्व के इतिहास में कभी हुआ है, इसकी जानकारी हमें नहीं है।

न स्कूल कालेज खुले हैं, न पढ़ाई हो रही है, न परीक्षा हो रही हैं लेकिन बिना परीक्षा के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे हैं।

बच्चे कुछ सीखेंगे नहीं तो ऐसे फर्जी सर्टिफिकेट के भरोसे उनका क्या बनेगा, अभिभावकों को इसकी कोई चिंता नहीं है।

प्रेरणा अंशु का दफ्तर समाजोत्थान विद्यालय परिसर में है। स्कूल के प्रिंसिपल वीरेश कुमार सिंह हमारे सम्पादक भी हैं। हम रोज देखते हैं कि पिछले एक साल से कितनी कठिनाई से स्कूल को ज़िंदा रखने की कोशिश चल रही थी। अनलॉक हुआ तो कितने जोश से छत्र और एक एक टीचर परीक्षाओं की तैयारी में कितनी कड़ी मेहनत कर रहे थे। सब किये कराये पर पानी फिर गया।

दिनेशपुर, गदरपुर, गूलरभोज और रुद्रपूर के ज्यादातर स्कूलों के शिक्षकों और छात्रों के सम्पर्क में हम हैं। ये सभी प्रेरणा अंशु परिवार में शामिल हैं। हम उनकी निराशा को अपने दिलोदिमाग की गहराइयों में महसूस करते हैं। बाकी देश का भी यही हाल है।

आम जनता को अपने बच्चों के भविष्य के साथ इस खतरनाक खिलवाड़ से कोई फर्क पड़ता है?

60 के दशक में जब आजादी से पहला मोहभंग हुआ, सत्तर के दशक में जब पहला प्रतिरोध शुरू हुआ, तब जो आक्रोश और बदलाव के संकल्प नज़र आये वे सिरे से गायब हैं।

आक्रोश और प्रतिरोध की क्या कहे, हम सहमति-असहमति तक व्यक्त करने को स्वतंत्र नहीं हैं।

हमारी भावनाएं हमारी नहीं हैं। हमारी इच्छाएं हमारी नहीं हैं। हमारे सपने हमारे नहीं हैं हम चिंतन मनन नहीं करते।

हम विवेकहीन निर्जीव लोग हैं और सिर्फ जैविकी जीवन जी रहे हैं।

रो-चीखकर शोक मनाकर हम खुद को मनुष्य साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

हम हाड़ मांस के लिफाफे में कैद हैं। न हमारे पास दिल है और न दिमाग। रीढ़ तो है ही नहीं।

इससे बेहतर है कि कोरोना मैया की ऐसी कृपा हो कि हमारी यह रीढ़विहीन प्रजाति एकमुश्त विलुप्त हो और इस कलिकाल का अंत हो जैसे महाभारत के बाद द्वापर का अंत हुआ।

अब अपनी आस्था की पूंजी बटोरकर सपने देखते रहें कि कलिकाल के बाद फिर सतयुग आएगा।

पलाश विश्वास

हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें. ट्विटर पर फॉलो करें. वाट्सएप पर संदेश पाएं. हस्तक्षेप की आर्थिक मदद करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner