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द इनइक्वैलिटी वायरस रिपोर्ट : असमानता के इस वायरस का वेक्सीन कब बनेगा? कोरोना काल में वायरस की तरह फैली गरीबी

A new Oxfam report Oxfam shows how socioeconomic inequalities rose during the pandemic, where the richest section’s wealth grew exponentially while most Indians reeled from destitution and hunger.

द इनइक्वैलिटी वायरस रिपोर्ट : भारत का लोकतंत्र (Democracy of india) अपने णतंत्र दिवस (The Republic Day) के अवसर पर एक इतिहास का हिस्सा बन रहा है जब देश का गण अपने तंत्र को  लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने और अपनी जिम्मेवारी निभाने देश की राजधानी की सड़कों पर है. यह तब हुआ है जब भीषण कोरोना काल में लाये गए किसान सम्बन्धी अध्यादेशों को किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों के प्रतिरोध के बावजूद संसद द्वारा बहुमत के आधार पर कानूनों में बदल दिया गया. यह संघर्ष किस करवट बैठेगा और लोक  जीतेगा अथवा तंत्र, यह अभी भविष्य के गर्भ में है. लेकिन कोरोना अभी अतीत का हिस्सा नहीं बना है, हालाँकि इसके अनेक टीके दुनिया भर में आ गए हैं और एक ऐतिहासिक टीकाकरण अभियान भी आरम्भ हो चुका है. इस कोरोना टीकाकरण के बारे में कई सवाल (Many questions about corona vaccination) भी हैं लेकिन अभी उनके बारे में चर्चा करने के बजाय हम एक और गंभीर वायरस की चर्चा इस आलेख के माध्यम से कर रहे हैं जिसका नाम है- असमानता अर्थात गैर बराबरी.

गणतंत्र दिवस हम लोग देश के संविधान के लागू होने की स्मृति के तौर पर मनाते हैं.

हमारे संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है इसकी प्रस्तावना जो वास्तव में संविधान की मूल  उसकी दिशा को तय करती है. हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble to the Constitution) भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बनाने का वायदा करता है. आज इस संविधान के ये तमाम मूल्य गंभीर संकट में हैं लेकिन समाजवाद तो शायद कभी भी हमारी नीतियों में लक्ष्य रहा ही नहीं. समाजवाद का मतलब आर्थिक समानता से है जो निरंतर पूंजीवादी नीतियों के चलते कभी भी साकार हो नहीं सकी है.

आर्थिक उदारीकरण के आने के बाद अमीरी और गरीबी की खाई निरंतर बढ़ती ही जा रही है. दुनिया भर में वंचित समुदायों की स्थिति पर काम करने वाली वैश्विक संस्था ऑक्सफेम प्रतिवर्ष इस मुद्दे पर एक अध्ययन कर रिपोर्ट जारी करती है. इस बार ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट ‘असमानता के वायरस’ के नाम से हाल ही में प्रकाशित हुई है जो भारत के सन्दर्भ में कई गंभीर चुनौतियों की और इंगित करती है. रिपोर्ट के लिए ऑक्सफैम (Oxfam) द्वारा किए गए सर्वेक्षण में 79 देशों के 295 अर्थशास्त्रियों ने अपनी राय दी है, जिसमें जेफरी डेविड, जयति घोष और गेब्रियल ज़ुक्मैन सहित 87 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने महामारी के चलते देश में आय असमनता में बड़ी या बहुत बड़ी बढ़ोतरी का अनुमान जताया है.

कोरोना काल में वायरस की तरह फैली गरीबी : द इनइक्वैलिटी वायरस रिपोर्ट :

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार द इनइक्वैलिटी वायरस नाम की इस रिपोर्ट (This report named The Inequality Virus) से पता चला है कि कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम गई है, बड़ी संख्या में गरीब भारतीय बेरोजगार हो गए हैं, तो दूसरी ओर भारत के अरबपतियों की संपत्ति में 35 फीसदी का इजाफा हुआ है. अप्रैल 2020 में हर घंटे 170,000 लोग बेरोजगार हो रहे थे. लॉकडाउन के दौरान भारत की सबसे बड़ी असंगठित कामगार आबादी को सबसे अधिक नुकसान हुआ. इस दौरान 12.2 करोड़ रोजगारों का नुकसान हुआ, जिसमें से 75 फीसदी असंगठित क्षेत्र से थे. असंगठित श्रमिकों के पास घर से काम करने के कम अवसर थे और संगठित क्षेत्र की तुलना में उनका रोजगार अधिक प्रभावित हुआ. निर्माण स्थलों, कारखानों आदि में मजदूरी में लगे चार से पांच करोड़ प्रवासी मजदूर विशेष रूप से प्रभावित हुए. लॉक डाउन के लगते ही देश भर में करोड़ों मजदूरों की उन कतारों को इस जीवन में कौन भूल सकता है जो रोजगार छीन जाने पर अपने गाँवों की तरफ पैदल ही चल पड़े थे. कितने ही लोग रास्ते में ख़त्म हो गए तो कितने अपंग हो गए.

असंगठित क्षेत्र पर कोरोना की ज्यादा मार

ऑक्सफैम ने कहा कि महामारी और लॉकडाउन का अनौपचारिक मजदूरों पर सबसे बुरा असर पड़ा. इस दौरान करीब 12.2 करोड़ लोगों ने रोजगार खोए, जिनमें से 9.2 करोड़ (75 प्रतिशत) अनौपचारिक क्षेत्र के थे. रिपोर्ट में कहा गया कि इस संकट के चलते महिलाओं ने सबसे अधिक कष्ट सहा और ”1.7 करोड़ महिलाओं का रोजगार अप्रैल 2020 में छिन गया. महिलाओं में बेरोजगारी दर लॉकडाउन से पहले ही 15 प्रतिशत थी, इसमें 18 प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो गई.स्कूलों से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी होने की आशंका भी जताई गई है. क्योंकि कोरोना काल में जो बच्चे शिक्षा से बाहर होकर बाल श्रम से जुड़ गए हैं उन्हें शिक्षा से वापिस जोड़ पाना बहुत ही कठिन है, खासकर तब जब कि शालाएं बंद हैं.

समृद्धि के बढ़ते हुए टापू 

एक तरह जहाँ कोरोना के कारण बेरोजगारी और उसके चलते गरीबी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई. मार्च 2020 से दिसंबर 2020 के बीच लॉकडाउन और अन्य परेशानियों की वजह से जहां करोड़ों लोग और गरीब हो गये हैं, वहीं दुनिया के टॉप अमीरों की संपत्त‍ि में 3.9 ट्रिलियन डॉलर (करीब 285 लाख करोड़ रुपये) का इजाफा हुआ है.

Indian billionaires’ wealth grew by 35 percent during lockdown

ऑक्सफेम की रिपोर्ट में कहा गया है- ‘लॉकडाउन के दौरान भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 35 फीसदी बढ़ी है और 2009 से इन अरबपतियों की संपत्ति 90 फीसदी बढ़कर 422.9 अरब डॉलर हो गई है. जिसके बाद भारत अरबपतियों की संपत्ति के मामले में विश्व में अमेरिका, चीन, जर्मनी, रूस और फ्रांस के बाद छठे स्थान पर पहुंच गया है.’

ऑक्सफैम के मुताबिक, मार्च 2019 से जब से केंद्र सरकार ने लॉकडाउन का ऐलान किया, भारत के शीर्ष 100 अरबपतियों की संपत्ति 12.97 ट्रिलियन बढ़ी है. यह धनराशि इतनी अधिक है कि इससे देश के 13.8 करोड़ गरीब भारतीयों में से हरेक को 94,045 रुपये की राशि प्रदान की जा सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक मुकेश अंबानी, गौतम अडाणी, शिव नादर, सायरस पूनावाला, उदय कोटक, अजीम प्रेमजी, सुनील मित्तल, राधाकृष्ण दमानी, कुमार मंगलम बिरला और लक्ष्मी मित्तल जैसे अरबपतियों की संपत्ति मार्च 2020 के बाद महामारी और लॉकडाउन के दौरान तेजी से बढ़ी.

असमानता का वायरस

ऑक्सफेम की इस रिपोर्ट में भारतवासियों की आमदनी की असमानता का जिक्र करते हुए बताया गया है  कि महामारी के दौरान मुकेश अंबानी को एक घंटे में जितनी आमदनी हुई, उतनी कमाई करने में एक अकुशल मजदूर को दस हजार साल लग जाएंगे। मुकेश अंबानी ने जितनी आमदनी हर एक सेकेंड में हासिल की है, उसे प्राप्त करने में एक अकुशल मजदूर को कम से कम तीन साल लग जायेंगे. रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2020 के बाद की अवधि में भारत के 100 अरबपतियों की संपत्ति में 12,97,822 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है. अगर देश के ये रईस इतनी राशि 13.8 करोड़ सबसे गरीब लोगों में बांट दें तो हर व्यक्ति को 94,045 रुपये दिए जा सकते हैं. इस राशि का इस्तेमाल देश की गरीब जनता को कोरोना वेक्सीन मुफ्त में लगाने अथवा सबको निःशुल्क शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराने में किया जा सकता है.

कब बनेगा इस वायरस का टीका

यह अचानक नहीं है जब अमीरी और गरीबी की यह तस्वीर सामने आई है. 1990 के दशक के बाद से निरंतर आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. कोरोना काल में इसकी गति अचानक से तेज हो गई है. बेशक इसके लिए वे नीतियां जिम्मेवार हैं जो आम आदमी के खिलाफ कॉरपोरेट  घरानों के फायदे के लिए काम करती हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि  ये सब यूँ ही कब तक चलता रहेगा? क्या किसानों की तरह असंगठित क्षेत्र के कामगार और आम आदमी भी इस असमानता के खिलाफ उठ खड़ा होगा? या सत्ता में बैठे हुए लोग संविधान की भावना के अनुरूप आय की असमानता को कम करने के लिए और देश को वास्तव में समाजवादी गणतंत्र बनाने के लिए काम करेंगे?

सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय

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