नेपाल में मधेसियों को नागरिकता देने का मामला : माओवादियों का ब्राह्मणवादी चेहरा

नेपाल में मधेसियों को नागरिकता देने का मामला : माओवादियों का ब्राह्मणवादी चेहरा

मधेसियों को नागरिकता देने से कौन सी क़यामत आ जायेगी !

आजकल नेपाली अख़बारों और नेपाली सोशल मीडिया में मधेस के सामाजिक-राजनीतिक कैनवास (Socio-political canvas of the Madhes) पर निर्मित दो खबरें बड़े पैमाने पर प्रसारित हो रही हैं. यह कटु सत्य है कि आमतौर पर मधेस से सम्बंधित खबरों पर पहाड़िया ब्राह्मणवादी मानसिकता के रस में रस में सर से पाँव तक डूबी नेपाली मीडिया बिभेद्कारी दृष्टिकोण से भाष्य निर्मित करती है. जैसे कि दो ताजा उदाहरण लें. हाल ही में नेपाली संसद में नागरिकता विधेयक पास हुआ है. इसको लेकर राजा महेंद्र के पंचायती राष्ट्रवाद से पालित पोषित नेपाल की लगभग सभी ब्राह्मणवादी कम्युनिस्ट और उदारवादी डेमोक्रेटिक व राजतन्त्रवादी पार्टियाँ (या अपने को स्वतन्त्र कहने वाले बुद्धिजीवी) सभी एक मत से एक विमर्श खड़ा कर रहे हैं कि इस विधेयक के पास हो जाने से नेपाल में जाने क्या क़यामत आ जायेगी !

मैं हफ्ते भर से तमाम खबरें, वीडियो और फेसबुक पर बुद्धिजीवियों की पोस्टस पढ़ रहा हूँ कि कैसे नेपाल के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार उदारवादी कनकमणि दीक्षित से लेकर युबराज घिमिरे तक और सत्ता से बाहर अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले ओली के नेकपा-एमाले, मोहन वैद्य-बिप्लव माओवादियों के नेतागण संसद में नागरिकता विधेयक पास होने पर क्या-क्या विषवमन कर रहे हैं. तब मेरे मन में एक ख्याल आया कि इन सबसे पूछता कि कहिये महोदय, नेपाल के अमेरिका का सैन्य अड्डा बनाये जाने वाला एमसीसी विधेयक जब संसद में पास हुआ था, तब क़यामत नहीं आई थी ! और अब मधेसियों को नागरिकता देने से क़यामत आ जायेगी ! शताब्दियों तक शाह वंश और राणा शासक जब भारत की रियासतों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते हुए भारतीय लड़कियों को अपनी बहू बनाकर नेपाली नागरिकता वितरित करते फिरते थे, तब तो क़यामत नहीं आई थी. मतलब शासक वर्ग के लिए अलग कानून और नेपाली भूभाग पर बसे आम जनमानस के लिए अलग कानून. इसको कहते हैं, प्रगतिशीलता के मुखौटे पहने ब्राह्मणवादी महेन्द्रिय पहाड़िया वीर गोरखाली बुद्धिजीवियों का असली चेहरा, जो अपने से इतर मधेसिओं को अपने सामानांतर नागरिक (अर्थात हाड माँस का मनुष्य) मानने को तैयार ही नहीं है.

इन सब तत्वों का कहना है कि मधेसी पुरुषों के भारतीय स्त्रियों के साथ विवाह होने पर उन्हें नेपाल की नागरिकता प्रदान कर देने के बाद आगामी बीस से तीस सालों में नेपाल में नेपाली नागरिक ही अल्प जनसंख्या में पड़ जायेंगे और बीर गोरखाली राष्ट्र की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी. यह तो नेपाली जनता की पीठ पर सवार सत्ता में बैठे सरकारी कम्युनिस्टों अर्थात कैश माओवादियों, मधेसी दलों और नेपाली कांग्रेस की अपने को प्रासंगिक बनाए रखने की राजनैतिक जरूरत है कि यह तथाकथित साझा ‘वाम-लोकतांत्रिक’ गठबंधन मधेसियों को नागरिकता देने पर मजबूर हुआ है, जिससे कि काठमांडू की पहाड़िया राज्यसत्ता सदियों से अपने ही नागरिकों को नागरिकताविहीन रखने के शताब्दियों के अपराध से पर्दा डाल सके.

और एक दूसरा प्रसंग है, जिसमें मुख्यधारा के नेपाली अखबार मधेसी मुख्यमंत्री द्वारा किशोर लड़कियों को साइकिल वितरण करने में किये गए करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की बात बड़े पैमाने पर प्रचारित कर रहे हैं.

नेपाल की मधेस प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री ने “बेटी पढाओ, बेटी बचाओ” अभियान के तहत पिछले साल सितम्बर, २०२१ साल में लड़कियों को स्कूल जाने में प्रोत्साहित करने के लिए साइकिल वितरित की थी. अब सुनने में आया है कि संघीय नेपाल सरकार की भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गयी समिति ने इस मामले में १० करोड़, ३३ लाख रुपये के भ्रष्टाचार के होने का पर्दाफाश किया है. इस मामले में मधेस प्रदेश के गृह सचिव समेत आठ लोगों के विरुद्ध मुकदमा दायर किया गया है. लेकिन मधेस प्रदेश के मुख्यमंत्री लाल बाबु राउत समेत प्रदेश सरकार के मुख्य गृहसचिव के दामन पर आँच तक नहीं आई.

१७ हजार २३८ किशोरियों को साइकिल वितरण करने से सम्बन्धित इस बहुचर्चित काण्ड में गुण स्तरहीन और बिना ब्रांड की साइकिलें खरीदीं गयी थी. इस मामले के उजागर होने पर जब मुख्यमंत्री राउत से पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने बिना लाग लपेट के इस भ्रष्टाचार में अपरोक्ष रूप से शामिल होने की बात स्वीकारते हुए कहा कि “साइकिल खरीदने और उन्हें वितरित करने का काम उनका नहीं है. यह तो प्रदेश सरकार के सम्बंधित विभाग का काम है. हाँ इस (साइकिल वितरण वाली) फाइल को पास मैंने ही किया था. लेकिन यह देखने का जिम्मा उनका बिलकुल नहीं है कि बेकार व सड़ी गली साइकिल वितरित की गईं.”

राउत का यह वक्तव्य दिखाता है कि कैसे यह सत्ता में बैठा शख्स नेपाली जन-गण-मन का उपहास कर रहा है. उसको कतई फर्क नहीं पड़ता है कि एक मधेसी राजनेता और एक पहाड़िया राजनेता आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले में एक जगह खड़े हैं. सत्ता की मलाई बंदरबाँट करने में दोनों एक जगह पर खड़े हैं.

भले ही राउत अपने को वैकल्पिक राजनीति के प्रतीक मधेस आन्दोलन की उपज कहते हों, यह कोई इत्तफाक थोड़े है कि राउत का सत्ताधारी दल अर्थात जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) २००८ में हुए मधेस आन्दोलन के गर्भ से जन्मा है. और इस समय काठमांडू की संघीय सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा के मंत्रिमंडल का प्रमुख घटक दल है.

कई बरस पहले लेखक ने मधेसी आन्दोलन से जन्मे नेताओं द्वारा काठमांडू की सत्ता पर सदियों से विराजमान ब्राह्मणवादी पहाड़िया राज्यसत्ता के साथ मिलकर मधेसी जनता पर ढाए जा रहे जुल्मों का पर्दाफाश करते हुए एक व्यंग्य कविता लिखी थी. सात बरस पहले जब यह रची गयी थी, तब बहुत सारे मधेसी लिट्राटी अर्थात सुन्दर पढ़े लिखे सुसंस्कृत प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने इस कविता पर खूब नाक भौं सिकोड़ी थी. समाजशास्त्र के मेरे आदि पूर्वज मैक्स वेबर से लिट्राटी उधार इस आशय के साथ लिया गया है कि मधेस आन्दोलन वैकल्पिक राजनीति का प्रतीक कभी नहीं था, जिसको लेकर ये सुन्दर लोग अभी भी मुगालते में रहते हैं और मधेसी जनता की दयनीय स्थिति का रोना रोकर देश विदेश घूमते हुए खूब डॉलर-यूरो खाते पचाते हैं.

चेले मधेसी

दिल्ली के चेले मधेसी
काढ़कर उधार बुद्धि लैनचोर की
पहनकर धोती
पीटें डुगडुगी
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
बनते नवउपनिवेशी
होने राजा मधेस
कर शासन एकछत्र
जपते चलें
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
बजाते डंका
भुनाने दौरा सुरुवाल में समायी
दिव्य उपदेश में लिपटी घृणा को
“मनु मख्या मस्या !!!”
आदमी नहीं मधेसी है!
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
पीट डुगडुगी आन्दोलनधर्मी
लूटने दोआबा की उर्बर जमीन
पचाने हरी भरी फसलें
पीने खाड़ी का गरमागरम मधेसी खून
भर अपनी संघीय तिजोरियां
जनता के नाम
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
जला उधार की ब्लाकेड लालटेन
करते उजाला भूकंप से दहली दरकी धरती में
खुले गगन के नीचे घुप्प अँधेरे तले बसे टेंटों में
गाने फौजी बूटों की संबैधानिक ऋचाएं
कर प्रकाशित दमन का वीर गोर्खाली इतिहास
टिकापुर से ले जलेश्वर तक
हिंसा के नृशंस तांडव में छुपी आपराधिक चुप्पी
हिमाल पहाड़ तराई से उपजे राष्ट्रवादी नेपाल के नाम
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
कर ओली से यारी
करते तस्करी की वैध कालाबाजारी
भरने पहाड़ी जेबों में
राष्ट्रीय रंग अनेक
भारतीय विस्तारवाद मुर्दाबाद!
खाने मेवा माल रात भर
ले जनता की खाल
कर आन्दोलन दिशाहीन
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
आदमी नहीं भारतीय हैं
कमाऊ पूत हैं
इसलिए करते हैं दूध का कर्ज अदा
बन तुरुप के इक्के
खेलने सुशील हाथों
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
रचते झूठ सरेआम
बन गठबंधन के महंत
खा लच्छेदार जलेबी
बनकर मधेसी मोर्चे के केसरिया सिपाही
पैदा करते नित नए मंत्र
ॐ भारतीय नाकाबंदी गयी तेल लेने सीमापारी !
ॐ दो प्रदेश-स्वायत्त मधेस स्वाहा !!
जय मधेस जय मधेस.

दिल्ली के चेले मधेसी
असल में दिल्ली के
वीर गोर्खाली चेले हैं
करके रूप रंग परिधान मधेसी
बने स्वदेशी
कर काठमांडू से यारी
करते देश बेचने की तैयारी
सो पैदा हों अदद बिखंडनकारी.

दिल्ली के चेले मधेसी
दरअसल उस राह के पथिक हैं
जो ली थी प्रचण्ड पथ के बाबुओं ने
करने देश की पुनर्संरचना
ब्रह्मा के लाल रथ पर हो सवार
रौंदने दोआबा के हरे भरे दरख़्त.

दिल्ली के चेले मधेसी
दरअसल इतिहास की उस फसल की भी खरपतवार हैं
जो बोई गयी थी सुगौली में जनता के नाम
सींचा था जिसे जंगे ने
बेलायत का कुत्ता गुरखा बहादुर बन
भाड़े की दर से
काटा जिसे पहले पंचों ने

प्रजातंत्र के नाम
फिर झापलियों ने

बहुदल के नाम
बनाने स्वाधीन-संप्रभु-सार्वभौमिक श्री ५ नेपाल

काट रहा है अब
प्रचंड मजे के साथ
संघीय-धर्मनिरपेक्ष-लोकतान्त्रिक-गणतंत्र के नाम
चेले मधेसियों को उस फसल में
बस एक हिस्सा चहिये
इसलिए बहादुर चेलों से
मुक्ति की उम्मीद रखना नाजायज है.

मधेस को फलने फूलने देने के लिए
दरकार है केवल
हिमाल पहाड़ तराई से उपजे अदद नेपाली मन की
क्यूंकि बहादुर चेले मात्र
दिल्ली के चेले मधेसी ही पैदा करते हैं.

(“एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी. २०२१, मैत्री पब्लिकेशन: पुणे में प्रकाशित)

डॉ. पवन पटेल

नोट:

मनु मख्या मस्या = यह मूलतः नेपाल भाषा में मधेसियों के बारे में बोला जाने वाला प्रचलित मुहावरा है; जिसका मतलब होता है, ‘आदमी नहीं मधेशी है’.

टिकापुर, जलेश्वर = टीकापुर हत्याकाण्ड और जलेश्वर हत्याकांड २०१५ में घटित हुआ थे, जिसमें नेपाली पुलिस ने तराई/मधेसी इलाकों में रहने वाले उत्पीड़ित थारु समुदाय के लोगों पर अधाधुन्ध फायरिंग कर दर्जनों लोगों की हत्या की थी.

सुशील = नेपाली कांग्रेस के नेता स्वर्गीय सुशील कोइराला गणतंत्र घोषित होने के बाद नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं.

झापलियों = १९७० के दशक में नक्सलवाद की तर्ज पर नेपाल के झापा जिले में भी सशस्त्र आन्दोलन चलाया गया. जिसे झापा विद्रोह कहा गया और उनके नेताओं को झापाली की संज्ञा दी गयी. नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) इसी के गर्भ से पैदा हुई.

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(लेखक डॉ. पवन पटेल नेपाली समाज के एक स्वतंत्र भारतीय अध्येता हैं. आजकल अपने गृह जनपद बाँदा में रहकर खेतीबाड़ी करते हैं. आपकी “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थबांगी पर्सपेक्टिव, २०१९” और “एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी, २०२१” नामक दो पुस्तकें प्रकाशित हैं.)

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