राष्ट्र को बचाने के लिए नई आर्थिक व औद्योगिक नीति को बदलना वक्त की जरूरत

narendra modi flute

The need of the hour is to change the new economic and industrial policy to save the nation

उदार अर्थनीति (Liberal economy) के समर्थकों द्वारा पब्लिक सेक्टर और कल्याणकारी नीतियों को देश के विकास में बाधक व अर्थव्यवस्था पर बोझ होने का प्रोपेगैंडा कर निजीकरण, विनिवेशीकरण और बाजारोन्मुखी आर्थिक सुधारों को तर्कसंगत और देशहित में जरूरी बताया जाता है।

1990 में गंभीर भुगतान संकट पैदा होने के बाद इन नीतियों को एकमात्र उपाय के बतौर मानते हुए इन नीतियों को लागू किया गया। देशी-विदेशी कॉरपोरेट वित्तीय पूंजी के निर्बाध छूट देने से तीव्रगति से विकास, गरीबी उन्मूलन और रोजगार के भारी अवसर पैदा होने जैसी बड़ी बड़ी बातें की गई थीं।

आज जब कोल, बिजली से लेकर रेलवे, रक्षा जैसे रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों में अंधाधुंध निजीकरण, एफडीआई व विनिवेशीकरण के खिलाफ मजदूरों का देशव्यापी आंदोलन हो रहे हैं तब ऐसे में देश में 3 दशक से जारी उदार अर्थनीति और आर्थिक सुधारों की समीक्षा व समग्र मूल्यांकन किया जाना बेहद जरूरी है, क्या उस लक्ष्य को हासिल किया जा सका जिसकी देशहित के नाम पर वकालत की जा रही थी ?

 आजादी के बाद जब देश में बुनियादी ढांचा न के बराबर था, बुनियादी ढांचे के बिना देश के विकास की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। तब बुनियादी ढांचा को खड़ा करने में पब्लिक सेक्टर ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

उस दौर में कॉरपोरेट सेक्टर की बुनियादी ढांचा तैयार करने, उसमें पूंजी निवेश में उसकी कोई दिलचस्पी थी(दरअसल आज भी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के बजाय पब्लिक सेक्टर के इंफ्रास्ट्रक्चर को हड़पने में ही ज्यादा दिलचस्पी है)। तब देश के विकास के लिए जरूरी इस बुनियादी ढांचा को जनता के पैसे से खड़ा किया गया। देश के शीर्ष 8 पूंजीपतियों द्वारा 1945 में तैयार किये गए बाम्बे प्लान में बुनियादी ढांचा तैयार करने और आर्थिक गतिविधियों में सरकार की सक्रिय भूमिका अदा करने की सिफारिश की गई थी।

इसी दिशा के अनुरूप 1951 में Industrial (development & regulation) Act 1951 पारित किया गया और 1956 में इंडस्ट्रियल पालिसी बनाई गई और कमोवेश 1990 तक इसी के अनुरूप जारी रही। 60 व 70 के दशक में बैंकिंग व कोल सेक्टर का राष्ट्रीय करण किया जाना इस विकास मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी था। लेकिन विकास के इस मॉडल में कृषि क्षेत्र जिस पर आजादी के वक्त 70 फीसद आबादी निर्भर थी और जीडीपी में करीब 50 फीसद योगदान था, इस महत्वपूर्ण क्षेत्र उपेक्षित छोड़ दिया गया। व्यापक कृषि सुधार और पूंजी निवेश की कोई समग्र कृषि नीति नहीं ली गई। राज्य नियंत्रित पब्लिक सेक्टर में लालफीताशाही, नौकरशाही और भ्रष्टाचार के फलने फूलने जैसी तमाम कमजोरियां भी उभरी।

अपनी इन कमजोरियों व सीमाओं के बावजूद पब्लिक सेक्टर ने राष्ट्र निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। आईटी और सेवा क्षेत्र को छोड़ दिया जाये तो आज भी स्टील, बिजली, कोल सेक्टर, माईनिंग, रेलवे, हेल्थ, शिक्षा से लेकर संपूर्ण बुनियादी ढांचा ही इसी पब्लिक सेक्टर की देन है।

दरअसल कॉरपोरेट सेक्टर के बलबूते कल्याणकारी राज्य की अवधारणा जोकि हमारे संविधान का लक्ष्य है, संभव ही नहीं है। गरीबी उन्मूलन हो, रोजगार सृजन, पिछले क्षेत्रों का विकास या प्राकृतिक आपदाएं हो या पोलियो उन्मूलन जैसे अन्य कोई अभियान की सफलता पब्लिक सेक्टर की भूमिका के बिना संभव नहीं है।

दरअसल कॉरपोरेट सेक्टर आपदा तक में मुनाफाखोरी व लूट के अपने वर्ग चरित्र को छोड़ नहीं सकता है।

दरअसल 1991 में उदार अर्थनीति को स्वीकार करने के बाद से ही कॉरपोरेट सेक्टर की गिद्ध दृष्टि देश के मौजूदा पब्लिक सेक्टर के इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने पर थी। शुरुआत में लाईसेंस-परमिट राज का खात्मा, कॉरपोरेट सेक्टर पर लगाये गए नियंत्रण को खत्म कर निर्बाध पूंजी के प्रसार की ईजाजत देने, पब्लिक सेक्टर के बीमार ईकाईयों के पुनर्जीवन जैसे कदमों का देश हित में बता जोरशोर से प्रोपैगैंडा किया गया।

1991 में जिन आर्थिक सुधारों को शुरू किया गया था उसमें तेजी अटल सरकार में आयी। सरकार ने बाकायदा विनिवेश मंत्रालय बना कर विनिवेशीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया को तेज किया। पहले बीमार ईकाइयों के पुनर्जीवन के लिये बीआईएफआर बनाया गया था। लेकिन अटल सरकार में बीमार ईकाईयों को नहीं बल्कि भारी मुनाफा देने वाली बालको, हिंदुस्तान जिंक जैसे तमाम कंपनियों को बेच दिया गया।

अटल सरकार के दौर में ही बिजली सेक्टर में भी निजीकरण की प्रक्रिया में तेजी आयी, इसके लिए कानून बनाये गये और राज्य बिजली बोर्डों का निगमीकरण किया गया। अत्यधिक फायदा देने वाले तमाम पब्लिक सेक्टर की कंपनियों में विनिवेशीकरण की शुरुआत भी इसी दौर में हुई।

आप निम्न आंकड़े को देख सकते हैं, वित्तीय वर्ष 2018-19 में ONGC को 26717 करोड़, Indian Oil Corporation को 16894 करोड़, NTPC को 11750 करोड़, Coal India Limited को 10470 करोड़, Power Grid Corporation of India Limited को 7132 करोड़, Power Finance Corporation Limited को 6953 करोड़, HPCL को 6029 करोड़, GAIL को 6029 करोड़ का मुनाफा अर्जित किया। इन सभी में विनिवेश की प्रक्रिया अरसे से जारी है।

विनिवेशीकरण व निजीकरण से प्राप्त संसाधनों का इस्तेमाल रोजगार सृजन व गरीबी उन्मूलन और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास खर्च करने का प्रोपेगैंडा कर इसे जनहित व राष्ट्र हित में बता कर प्रोपेगैंडा किया गया।

आज मोदी सरकार ने तकरीबन रक्षा, रेलवे जैसे सभी रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों को भी देशी विदेशी कंपनियों के निवेश के लिए खोल दिया। प्राकृतिक संसाधनों व सार्वजनिक संपत्तियों को औने-पौने दाम पर बेचने से होने वाली आय को मोदी सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि के बतौर पेश कर रही है। जबकि एक तरफ जनता पर भारी टैक्स और मंहगाई का बोझ डाला गया और दूसरी तरफ कॉरपोरेट्स को लाखों करोड़ की रियायतें, बैंकों में लोन का एनपीए के द्वारा माफी के द्वारा अकूत फायदा पहुंचाया गया। आप इसे समझने के लिए इस उदाहरण को देख सकते हैं। 2014 से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल में भारी गिरावट दर्ज की गई, लेकिन इसका फायदा जनता को पहुंचाने के बजाय पेट्रोलियम पदार्थों में भारी टैक्स लगा दिया गया।

मोदी सरकार के 2014-19 में पेट्रोलियम पदार्थों में लगाये गए टैक्स से केंद्र व राज्यों को 24 लाख करोड़ से ज्यादा की कमाई हुई। चाहें पेट्रोलियम पदार्थों में भारी टैक्स लगा कर कमाई हो या फिर पब्लिक सेक्टर को बेचने-विनिवेश से कमाई हो, इन सभी संसाधनों को किसी न किसी तरह से कॉरपोरेट सेक्टर के हवाले करने की नीति मोदी सरकार की है।

दरअसल कॉरपोरेट सेक्टर को तरजीह देने और पब्लिक सेक्टर को बर्बाद करने की नीति से ही कॉरपोरेट सेक्टर फलता फूलता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पावर सेक्टर है।

बिजली उत्पादन में कॉरपोरेट बिजली कंपनियों की दिलचस्पी के बाद हम लोगों ने देखा है कि उत्तर प्रदेश में किस तरह पब्लिक सेक्टर की बिजली उत्पादन ईकाईयों को बर्बाद किया जा रहा है।

संविदा के तहत काम का कोई औचित्य नहीं था, लेकिन इसे शुरू किया गया। कॉरपोरेट कंपनियों से बिजली खरीद के ऐसे एग्रीमेंट किये गए हैं कि अत्यधिक मंहगी बिजली राज्य सरकार को खरीदना पड़ता है जबकि इन कॉरपोरेट कंपनियों को सस्ती जमीन, लोन आदि सरकार ने ही मुहैया कराया है।

हाल में जो इलेक्ट्रीसिटी(अमेंडमेंट) बिल का मसौदा पेश किया गया है, का मकसद ही पब्लिक पावर सेक्टर के इंफ्रास्ट्रक्चर को हड़पना है। इस बिल के पास होने के बाद पावर सेक्टर कॉरपोरेट की मुनाफाखोरी के लिए पूरी छूट मिल जायेगी। इससे बिजली की दरों में भारी ईजाफा होगा।

दरअसल इन सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कॉरपोरेट सेक्टर के एकाधिकार होने से आम जनता पर ही बोझ और बढ़ेगा। विनिवेशीकरण व निजीकरण और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमलों के खिलाफ मजदूरों ने हमेशा संघर्ष किया है। जबरदस्त हड़ताले भी हुई हैं, देशव्यापी आंदोलन हुये हैं लेकिन मजदूरों के इन आंदोलनों की कमजोरी यह रही कि आंदोलन ट्रेड यूनियन दायरे में ही चले, यानी आंदोलन आर्थिक मांगों तक सीमित रहे।

आज महामारी के दौर में जनता के बुनियादी सवाल उभर कर सतह पर आ गए हैं, मोदी सरकार के पास जिनका न तो हल है और न ही जवाब है। लेकिन कोविड-19 महामारी के इस दौर में आपदा को अवसर में बदलने के प्रधानमंत्री के आवाहन को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि मानों देश में रोजगार सृजन से लेकर गरीबों-किसानों और जनता की तकलीफों को दूर करने के लिए मोदी सरकार के पास रोड मैप है और इसे हल करने के लिए सरकार गंभीर है। जबकि जमीनी हकीकत इसके ठीक विपरीत है।

श्रम कानूनों के खात्मे से लेकर कर्मचारियों के भत्ते में कटौती, कोयला, रेलवे, बिजली, रक्षा आदि में निजीकरण-विनिवेशीकरण में तेजी लाने और सब कुछ प्राकृतिक संसाधनों-सरकारी संपत्ति को कॉरपोरेट के हवाले किया जा रहा है। इसके खिलाफ मजदूरों की देशव्यापी हड़ताल, आंदोलन हो रहे हैं।

Rajesh Sachan राजेश सचान, युवा मंच
Rajesh Sachan राजेश सचान, युवा मंच

दरअसल मौजूदा हालात में अब यह आंदोलन आर्थिक क्षेत्र से राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। अब जरूरत इस बात की है कि कैसे प्रभावी राजनीतिक हस्तक्षेप हो जिससे महामारी के दौर में जारी अंधाधुंध निजीकरण पर अंकुश लग सके, भयावह हो रही बेकारी जैसे सवालों के हल के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य किया जा सके। इसके लिए उन सभी ताकतों को जो उदार अर्थनीतियों के विरूद्ध हैं, उनकी एकजुटता और आम जनता को बड़े पैमाने पर इस राजनीतिक कार्यवाही में लामबंद कर ही ऐसा संभव है। इसके लिए पहलकदमी लिया जाना बेहद जरूरी है।

ट्रेड यूनियन संगठन जो इस हड़ताल और आंदोलनों में शरीक हैं, वह किसी न किसी रूप में राजनीतिक दलों से भी जुड़े हुए हैं, उन्हें चाहिए कि उदारीकरण की नीतियों से जो नुकसान है, के विरुद्ध जनता को शिक्षित करने, संवाद करने व लामबंद करने के लिए इन राजनीतिक दलों को तैयार करें। तभी यह आंदोलन अपने लक्ष्य को हासिल कर सकता है।

राजेश सचान,

युवा मंच

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