दलित मीडिया के उत्थान का एकमेव उपाय : विज्ञापन बाज़ार में डाइवर्सिटी

Dr B.R. Ambedkar

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा सम्पादित –प्रकाशित मूकनायक के सौ वर्ष होने के अवसर पर विशेष लेख

Special article on the occasion of hundred years of Mooknayak edited and published by Baba Saheb Dr. Bhimrao Ambedkar

The only way to uplift Dalit media: Diversity in the advertising market

आगामी 31 जनवरी को दलित पत्रकारिता के सौ साल पूरे (100 years of Dalit journalism) हो रहे हैं. कारण, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा सम्पादित –प्रकाशित जिस ‘मूकनायक’ से दलित पत्रकारिता का प्रारम्भ माना जाता है, उसके प्रकाशन के सौ साल पूरे हो रहे हैं. इसे लेकर दलित पत्रकारिता से जुड़े लोगों में भारी उत्साह है. इस खास दिन को यादगार बनाने के लिए देश के विभिन्न प्रान्तों में छोटे-बड़े असंख्य आयोजन हो रहे हैं, जिनमें दिल्ली में ‘दलित दस्तक’ के संपादक अशोक दास तथा मुंबई में ‘प्रभात पोस्ट’ के स्वामी व संपादक राजकुमार मल्होत्रा के द्वारा आयोजित हो रहे प्रोग्राम विशेष चर्चा में हैं.

कहने की जरूरत नहीं कि इस ऐतिहासिक अवसर पर तमाम दलित पत्र-पत्रिकाएं ही विशेषांक निकाल रही हैं, जिनमें बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता (Babasaheb Dr. Ambedkar’s Journalism) को नए सिरे से याद करने के बहाने दलित पत्रकारिता के आरंभ और विकास पर जमकर चर्चा होगी. तो आइये जरा दलित ही नहीं संपूर्ण भारतीय पत्रकारिता के आरंभ पर सरसरी नजर डाल ली जाय.

दलित पत्रकारिता की शुरुआत के पृष्ठ में : सुविधाभोगी वर्ग की पत्रकारिता द्वारा दलित समस्यायों की अनदेखी

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बाबासाहेब ने संविधान द्वारा महिलाओं को वो सारे अधिकार दिए, जो मनुस्मृति ने नकारे थे

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भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत पर डॉ. अम्बेडकर

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हिंदुत्व का एजेंडा फर्जी, यह देश बेचने का नरसंहारी एजेंडा

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पत्रकारिता का इतिहास (history of journalism IN hINDI) लिखने वाले बताते हैं कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेज भारत में प्रशासनिक, वाणिज्यिक और शैक्षिक दृष्टि से सर्वाधिक अग्रसर बंगाल से हुई, जहां से भारतीय पुनर्जागरण के पितामह राजा राम मोहन राय ने भारतीयों में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जागरूकता के प्रसार के लिए 1816 में ‘बंगाल गजट’ तथा 1820 में ‘ ‘बंगदूत’ समाचार पत्र की शुरुआत की. उनके बाद धीरे-धीरे पत्रकारिता के विकसित होने व उद्योग का रूप लेने की शुरुआत हुई.

19 वीं सदी में मुख्यतः सामाजिक कुरीतियों के दूरीकरण के लिए शुरू हुई भारतीय पत्रकारिता बीसवीं सदी में अंग्रेजों के दूरीकरण पर केन्द्रित हो गयी.

देश में जैसे-जैसे आजादी का सूरज उगना शुरू हुआ, वैसे-वैसे वर्ण-व्यवस्था की सुविधाभोगी ताकतें जन्मजात वंचित वर्गों की प्रगति में बाधा बनकर खड़ी होने लगीं. और ज्यों-ज्यों आजादी निकट आती दिखने लगी, आजाद भारत के वे सुविधाभोगी वर्ग के लोग अंग्रेजों की जगह लेने की सम्भावना देखते हुए राजनीतिक आजादी के लिए और तत्पर हो उठे. आज़ादी पाने की ललक में वे दलितों पर होने वाले अन्याय-अत्याचार की पूरी तरह अनदेखी करने लगे. इस स्थिति में दलित अपनी आवाज उठाने के लिए खुद की पत्र-पत्रिकाएं निकालने की दिशा में अग्रसर हुए, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र से हुए हुई, जो परवर्तीकाल में पूरे देश में फैली, जिसकी पृष्ठभूमि डॉ. आंबेडकर की पत्रकारिता रही.

महाराष्ट्र से शुरू हुई दलित पत्रकारिता Dalit journalism started from Maharashtra

वैसे दलित पत्रकारिता की शुरुआत का श्रेय डॉ.आंबेडकर को जरूर है, लेकिन जिस प्रकार उनके दलित आन्दोलनों में कूदने के पहले महाराष्ट्र में शिवराम जनवा काम्बले, फागु जी बनसोडे वगैरह ने आंदोलनों की जमीन तैयार कर दी थी, वही काम उन्होंने दलित पत्रकारिता के क्षेत्र में भी किया था.

शिवराम जनवा काम्बले का ‘सोमवंशीय मित्र’ दलितों द्वारा निकले गए प्रथम पत्र के रूप में जगह बनाया. उनके बाद फागु जी ने निराश्रित हिन्द नागरिक (1910), विटाल विध्वंसक (1913), मजूर पत्रिका (1910) निकाला. लेकिन ठोस शुरुआत डॉ. आंबेडकर ने मूकनायक (1920),बहिष्कृत भारत (1927), समता (1928), जनता (1930) और प्रबुद्ध भारत(1956) निकालकर किया.

‘मूकनायक’ के प्रवेशांक की संपादकीय में डॉ. आंबेडकर ने इसके प्रकाशन के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए लिखा था,

“बहिष्कृत लोगों पर हो रहे और भविष्य में होनेवाले अन्याय के उपाय सोचकर उनकी भावी उन्नति व उनके मार्ग के सच्चे स्वरूप की चर्चा करने के लिए वर्तमान पत्रों में जगह नहीं। अधिसंख्य समाचार पत्र विशिष्ट जातियों के हित साधन करने वाले हैं। कभी-कभी उनका आलाप इतर जातियों को अहितकारक होता है।‘

यहां ध्यान देने की बात है कि मूकनायक के प्रकाशन के पृष्ठ में दलितों पर हो रहे अन्याय-अत्याचार से बढ़कर, उनकी मंशा सत्ता में भागीदारी के प्रश्न को खड़ा करना था, जिसकी शुरुआत उन्होंने साऊथबरो कमिटी के समक्ष प्रश्न खड़ा करके की थी.

बहरहाल जिन कारणों से डॉ. आंबेडकर ने मूकनायक की शुरुआत की, प्रायः उन्हीं कारणों और उनके प्रयासों से प्रेरित होकर धीरे-धीरे दलित पत्रकारिता पूरे भारत में फैली. महाराष्ट्र से शुरू होकर जो दलित पत्रकारिता पूरे देश में फैली, उसका सबसे ज्यादा असर हिंदी-भाषी राज्यों पर पड़ा.

हिंदी पट्टी में दलित पत्रकारिता Dalit journalism in Hindi belt

हिंदी दलित पत्रकारिता की शुरुआत स्वामी अछूतानंद की पत्रिका ‘अछूत’(1917) से माना जाता है. गुलाम भारत में हिंदी भाषी अंचल में स्वामी अछूतानन्द ने जिस पत्रकारिता की शुरुआत की, आजाद भारत में उसे बढ़ाने का काम अजुध्यानाथ दंडी, दयानाथ व्यास, बलवीर सिंह, मेवाराम महाशय ने किया. किन्तु गहरी छाप छोड़ा मोहनदास नैमिशराय ने, जिन्होंने 1972 में ‘समता शक्ति’ साप्ताहिक और ‘बहुजन अधिकार’ पाक्षिक: दो पत्रों को जन्म दिया. ये दोनों पत्र तो दीर्घजीवी न हो सके, किन्तु दलित पत्रकारिता पर नैमिशराय की छाया दीर्घ से दीर्घतर होती गयी.

नैमिशराय के बाद उस दौर में आर कमल, राम समुझ, सुन्दर लाल सागर इत्यादि ने दलित पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का काम किया. लेकिन इस मामले में जिस शख्स ने सबको पीछे छोड़ा, वे कांशीराम रहे. पिछली सदी के 80-90 के दशक में दलित पत्रकारिता में सबसे बड़ा योगदान इन्हीं का रहा.

साहब कांशीराम ने अपने जीवन काल में अपने संगठन की विचारधारा के प्रसार के लिए अंग्रेजी में ऑपरेस्ड इंडिया, हिंदी में बहुजन संगठक, बहुजन नायक के अतिरिक्त अनटचेबल्स इंडिया, श्रमिक साहित्य, शोषित साहित्य, दलित आर्थिक उत्थान आदि समाचार पत्रों का संपादन किया. उन्होंने हजारों साल की दास जातियों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा भरने के साथ ‘पे टू द सोसाइटी’ के मन्त्र से दीक्षित करने का जो चमत्कार अंजाम दिया, उसमें इन पत्रों का बड़ा योगदान रहा. कांशीराम का अनुकरण करते हुए ही आज कई धड़ों में बंटे बामसेफ के मुखिया अपना-अपना पत्र निकाल रहे हैं. संभवतः इसीलिए कुछ जानकार उन्हें डॉ. आंबेडकर से भी बड़ा पत्रकार मानते हैं.

बहरहाल हिंदी पट्टी में जिस दलित पत्रकारिता की शुरुआत स्वामी अछूतानंद ने की इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मोहनदस नैमिशराय, डॉ.श्योराज सिंह बेचैन, कँवल भारती, प्रो. विवेक कुमार, चंद्रभान प्रसाद से स्थापित हुई.

हाल के दिनों डॉ. कौलेश्वर प्रियदर्शी और ब्रिटेन में शोधरत अरविन्द कुमार भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं.

जिन लोगों से दलित पत्रकारिता की पहचान बनी है, उनमें चंद्रभान प्रसाद को दलितों में पहला स्तंभकार बनने का गौरव प्राप्त हुआ. उन्होंने अंग्रेजी अखबार ‘द पायोनियर’ के ‘दलित डायरी’ नामक स्तम्भ के जरिये दलित पत्रकारिता और आन्दोलन को सामाजिक-राजनीतिक की जगह आर्थिक मुद्दों पर केन्द्रित करने का ऐतिहासिक काम किया.

प्रसाद ने दलित डायरी के जरिये सर्वव्यापी आरक्षण की हिमायत करने वाली ‘डाइवर्सिटी’ की आइडिया को जन्म दिया, जिसे परवर्तीकाल में अपने अखबारी लेखों के जरिये आगे बढाते हुए एच.एल. दुसाध ने भारत में पत्रकारीय लेखन का सबसे बड़ा अध्याय रच दिया. अगर आंबेडकरी तेवर के लिहाज से आंकलन किया जाय तो गैर-दलितों में दिलीप मंडल और उर्मिलेश ने दलित पत्रकारिता को जो ऊंचाई दी है, वह खुद में एक इतिहास है. लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद आज दलित पत्रकारिता जहाँ खड़ी है, उसे देखकर करुणा व्यक्त करने से भिन्न कुछ नहीं किया जा सकता.

इक्कीसवीं सदी में दलित पत्रकारिता          

आज हिंदी भाषी इलाकों में दलित पत्रकारिता का विकसित रूप अशोक दास की ‘दलित दस्तक’, दयानाथ निगम की ‘आंबेडकर इन इंडिया’, बुद्ध शरण की ‘आंबेडकर मिशन पत्रिका’, डीके भाष्कर की ‘डिप्रेस्ड एक्सप्रेस’, राजेश बौद्ध की ‘प्रबुद्ध विमर्श’ इत्यादि जैसी मासिक पत्रिकाओं; लखनऊ से राजेन्द्र गौतम के संपादन में निकलने वाला अखबार ‘तिजारत’, ‘निष्पक्ष दिव्य सन्देश’ तथा जयपुर से राज कुमार मल्होत्रा के संपादन में निकलने वाले ‘प्रभात पोस्ट‘ जैसे साप्ताहिक अख़बारों में नजर आता है. अवश्य ही दलित पत्रकारिता का आरंभ करने वाले महाराष्ट्र की स्थिति कुछ बेहतर है, जहाँ से पत्रिकाओं के अतिरक्त ‘सम्राट’, ‘महानायक’ जैसे कुछ दैनिक पत्र भी प्रकाशित हो रहे हैं. लेकिन इतने विशाल देश में इन पत्रिकाओं की पहुच जहाँ महज कुछेक हजार तक है, वहीँ दैनिक व साप्ताहिक पत्र भी लाखों तक नहीं पहुंचते, जबकि सवर्णों के कई अख़बारों की पहुँच, 7-8 करोड़ पाठकों तक हो चुकी है.

सच तो यह है कि दलित पत्रकारिता महज अपनी उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित है, जो विचारों का निर्माण करने वाली यथास्थितिवादी मुख्यधारा की पत्रकारिता को चुनौती देने की स्थिति में बिलकुल ही नहीं है. और इसका प्रधान कारण आर्थिक है.

दलित मीडिया स्वामियों द्वारा विज्ञापन निधि की अनदेखी

बाबा साहेब के ज़माने से ही आर्थिक संकट से जूझती दलित पत्रकारिता आज भी इससे उबरने में व्यर्थ है, जिसका शायद अन्यतम प्रधान कारण है आर्थिक आंदोलनों के प्रति दलित मीडिया स्वामियों की उदासीनता.

समस्त दलित आन्दोलन ही राजनीतिक व सामाजिक सुधार को जोर दिए, किन्तु आर्थिक सुधार उनकी प्राथमिकता में कभी रहा नहीं. दलित पत्रकारिता में भी समाज सुधार और राजनीति की बातें खूब हुई: लेकिन आर्थिक सुधार नदारद रहा. इस कारण अवसर रहते हुए भी दलित मीडिया के स्वामी कभी केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विज्ञापन मद में किये जाने वाले खर्च में अपनी भागीदारी की लड़ाई लड़ने का प्रयास नहीं किये. वे बजट में कंपोनेंट प्लान के लिए तो चिंतित होते रहे, पर विज्ञापन के लिए जो करोड़ों का बजट निर्धारित होता है, उसमें उनकी पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी विज्ञापन सुनिश्चित हो, इसकी मांग नहीं करते.

सरकारें विज्ञापन पर जो खर्च करती हैं, वह पब्लिक का पैसा है, जिसमें दलित – आदिवासी और पिछड़ों का भी हिस्सा है, यह जानते हुए भी कभी विज्ञापन के लिए निर्दिष्ट होने वाले बजट में अपनी मीडिया के हिस्सेदारी की मांग नहीं उठाते.

बहरहाल बाबा साहेब के जमाने से विज्ञापन निधि की जो अनदेखी होती रही, इक्कीसवीं सदी में उसे मुद्दा बनाने का पहली बार ठोस प्रयास ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ की ओर से हुआ

बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के घोषणापत्र में विज्ञापन निधि  

आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के मकसद से शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक- में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने के लिए 2007 में बहुजन लेखकों का जो ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’(बीडीएम) नामक संगठन वजूद में आया, उसके दस सूत्रीय एजेंडा के नंबर 6 में विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी की बात प्रमुखता से उठाई गयी. बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर से जारी घोषणापत्र के पृष्ठ 46-48 पर इस विषय में रोशनी डालते हुए कहा गया है. ‘विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी लागू कर आर्थिक विषमता की खाई को पाटने में महत्वपूर्ण रोल अदा किया जा सकता है. केंद्र और राज्य सरकारें अपने कार्यक्रमों, नीतियों और उपलब्धियों को प्रचारित करने के लिए प्रति वर्ष हजारों करोड़ रूपये विज्ञापन पर खर्च करती हैं.

यह सारा पैसा जाता कहां है?

यह सारा पैसा वर्ण-व्यवस्था की पोषक उन पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में जाता है, जिन्हें बहुजन समाज के बुद्धिजीवी टॉयलेट पेपर मानकर खारिज करते रहते हैं. मुख्यतः सरकारी विज्ञापनों के सहारे ही हिन्दू आरक्षणवादियों के तीस-तीस, चालीस -चालीस रूपये के लागत के अखबार डेढ़-दो रुपयों से लेकर तीन रूपये में बिकते हैं, फिर भी भारी मुनाफे में रहते हैं. यही हाल उनकी पत्रिकाओं भी है. बहुत से चालाक सवर्ण संपादक पहुँच के बल पर, अपनी पत्रिकाओं की सौ-पचास प्रतियां निकालकर भी पचास-पचास हजार का सरकारी विज्ञापन हासिल कर लेते हैं.

लब्बोलुबाव यह है कि प्रधानतः सरकारी विज्ञापनों के सहारे ही पत्र-पत्रिकाओं के स्वामी न सिर्फ अपने वर्ग-हित के अनुकूल विचारों का निर्माण करते हैं, बल्कि रईसों की ज़िन्दगी जीते हुए पेज- 3 पर जगह बनाते एवं राष्ट्र और राज्य की राजधानियों के ह्रदय-स्थल में अट्टालिकाएं खड़ी करते हुए विधान परिषद् और राज्य सभा की सीटें तक बुक करा लेते हैं. वहीँ सरकारी विज्ञापनों में हिस्सेदारी न मिल पाने के कारण मूलनिवासी समाज के प्रिंट मीडिया के स्वामी सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रकाशित की जाने वाली पत्र-पत्रिकाओं की अकाल मृत्यु देखने के लिए अभिशप्त रहते हैं. लेकिन सवर्ण मीडिया स्वामियों के लिए सरकारी क्षेत्र अगर दरिया है तो निजी क्षेत्र समंदर !

निजी क्षेत्र अपने अनाप-शनाप उत्पादों की और उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए कहीं-कहीं उत्पादित वस्तुओं की लागत से कहीं ज्यादा खर्च उसके विज्ञापन पर खर्च करता है. नतीजा ! हजारो-हजारों करोड़ रुपया विज्ञापन मद में सवर्ण मीडिया स्वामियों के पास जा रहा है. फलस्वरूप कुकुरमुत्ते की तरह रोज-रोज नए अखबार, नए टीवी चैनल उगते जा रहे हैं. और अपने उदय के थोड़े ही दिनों में वे हजारों करोड़ के व्यावसायिक प्रतिष्ठान में तब्दील हो जाते हैं. होंगे भी क्यों नहीं ! कुछ-कुछ सेकेंडों के विज्ञापन के लिए इन्हें कई-कई लाख जो मिल जाते हैं. लेकिन सड़े-गले और समाज परिवर्तन-विरोधी विचारों को बेचकर सुख ऐश्वर्य की जिंदगी जीने वाले सवर्णों की वित्त-वासना सरकारी और निजी क्षेत्र की मिलने वाली विज्ञापन राशि से भी शांत नहीं हुई. उन्होंने अटल सरकार को, जो 1955 के मंत्री-मंडल का हवाला देकर प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश से पीछे भागती रही, भूमंडलीकरण के दौर में बंद पड़े सभी खिड़कियों- दरवाजों को सभी के लिए मुक्त करने का बार-बार आग्रह कर, प्रिंट मीडिया में भी विदेश निवेश को अनुमति देने के लिए राज़ी कर लिया.

अटल सरकार के ज़माने से शुरु हुआ 26 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जहाँ आज प्रिंट मीडिया में 49 प्रतिशत तक पहुँच गया, वहीँ यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 74 प्रतिशत तक हो गया है. विदेशी मीडिया स्वामी भी भारत में विपुल विज्ञापन राशि का लहराता समंदर देखकर निवेश में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं.

ऐसे में अगर सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा खर्च की जाने वाली विज्ञापन राशि : मीडिया में निवेश होने वाली विदेशी पूँजी में डाइवर्सिटी लागू कर दिया जाय तो आर्थिक विषमता तो मिटेगी ही, सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि भारत में विचारक क्रांति की जमीन तैयार हो जाएगी. कारण, तब विज्ञापन निधि के सहारे मूलनिवासी समाज के ढेरों अखबार और चैनल अस्तित्व में आ जायेंगे, जो लाखों मूलनिवासी युवक-युवतियों को रोजगार देने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तनकामी विचारों को हवा देंगे. इस सम्भावना को देखते हुए बीडीएम विज्ञापन राशि में डाइवर्सिटी लागू करवाने पर विशेष जोर देगा.’ और बीडीएम ने ऐसा किया भी. इसके लिए यह संगठन अनेकों संगोष्ठियां/ सभाएं आयोजित करने के साथ ही ढेरो किताबें और पम्फलेट भी प्रकाशित किया है. पर, विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी का उसका एजेंडा कभी दलित-बहुजन मीडिया स्वामियों को स्पर्श नहीं कर सका.

क्या होता यदि विज्ञापन निधि में लागू हो जाती डाइवर्सिटी !

यदि विज्ञापन निधि के बंटवारे की लड़ाई लड़ने में बहुजनवादी मीडिया स्वामी सफल हो जाते तो इससे किस पैमाने पर दलित-बहुजन पत्र-पत्रिकाओं की शक्ल बदल जाती, इसका अनुमान केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारणमंत्री राजवर्धन राठोर के इस स्वीकारोक्ति से लगाया जा सकता है. उन्होंने 28 दिसंबर, 2018 को एक सवाल के जवाब में लोकसभा में कहा था कि साल 2014 से सात दिसम्बर 2018 तक सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर कुल 5245.73 करोड़ की धनराशि खर्च की गयी है, जिसमें 2312.59 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक /ऑडियो, विजुअल मीडिया पर, जबकि 2282 करोड़ प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए खर्च किया गया. इसके अतिरिक्त 651.14 करोड़ आउटडोर पब्लिसिटी पर खर्च हुआ. यदि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था ‘लोक संपर्क और संचार ब्यूरो(बीओसी), जो भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं इनके विभागों का विज्ञापन करती है, के खर्चों को जोड़ लिया जाय तो पता चलेगा कि जनता के धन से केंद्र सरकार अपनी नीतियों और योजनाओं को विज्ञापित करने के लिए किस पैमाने पर खर्च करती है.

विज्ञापन बाज़ार का बढ़ता दायरा

विज्ञापन निधि ही मीडिया की प्राणशक्ति है. इसके बिना मीडिया उस स्थिति से ऊपर उठ ही नहीं सकती, जिस स्थिति में आज दलित मीडिया/पत्रकारिता है. और विज्ञापन का दायरा सिर्फ केंद्र सरकार के विज्ञापन खर्च तक सीमित न रहकर राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र तक प्रसारित है. ये सभी अपनी-अपनी नीतियों और उत्पादों का विज्ञापन देने के लिए इतना खर्च करते हैं, जिसकी कल्पना दलित मीडिया वालों के लिए करना शायद कठिन है. विज्ञापनों के प्रिंट(पत्र-पत्रिकाएं )और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (टीवी,इंटरनेट,रेडियो,डिजिटल सिनेमा,एसएमएस ) से सभी अवगत हैं, पर, आउटडोर माध्यमों की ओर सबका ध्यान नहीं जाता, जिसके अंतर्गत पोस्टर, बैनर, होर्डिंग, रेलवे टिकट इत्यादि आते हैं.

कहने का मतलब विज्ञापन के बाजार का दायरा बहुत ही बड़ा है. इसका अनुमान में 28 मार्च, 2015 को सत्याग्रह में छपी इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है कि ‘पिछले साल प्रिंट मीडिया को करीब 17600 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व मिला.

रिपोर्ट के मुताबिक 2019 तक यह औसतन 9.7 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ेगा. रिपोर्ट यह भी बताती है कि बीते साल 15490 करोड़ के विज्ञापन राजस्व के साथ दूसरे स्थान पर रहा टीवी मीडिया 14.1 फीसदी सालाना बढ़ोतरी के साथ इस दशक के आखिर तक प्रिंट को पछाड़ देगा.’

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
एच.एल. दुसाध
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

इस मामले में 7 जून,2019 को ‘मनी भास्कर’ में छपी यह रिपोर्ट विशेष ध्यान देने योग्य है, जिसमें कहा गया था कि भारतीय मीडिया एंव मनोरंजन उद्योग अगले पांच सालों में 11.28 फीसदी की सालाना दर से बढ़कर 2023 में 4.51 लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा. अतः तेजी से विस्तार लाभ करते विज्ञापन बाज़ार को देखकर दलित-बहुजन मीडिया स्वामियों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे सरकारी और निजी क्षेत्र द्वारा प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ आउटडोर विज्ञापनों में खर्च किये जाने वाली धनराशि में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने अर्थात सवर्णों, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के संख्यानुपात में बंटवारे की लड़ाई लड़ें.

विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी की लड़ाई लड़ने की दोहरी जरूरत क्यों है?

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के साथ आउटडोर विज्ञापन में खर्च की जाने वाली धनराशि में विविधता अर्थात डाइवर्सिटी लागू करवाने की दोहरी जरूरत है. हालाँकि यह लड़ाई फिलहाल निजी क्षेत्र में तो कठिन है, किन्तु केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा खर्च की जाने वाली धनराशि में डाइवर्सिटी लागू करवाना नामुमकिन नहीं है. यदि यह लड़ाई दलित-बहुजन जीत लेते हैं तो यथास्थितिवाद की पोषक सुविधाभोगी वर्ग की मीडिया के हिस्से में विज्ञापन बाज़ार का बमुश्किल सिर्फ 15-20 प्रतिशत धनराशि जाएगी. ऐसा होने पर वे सभ्यता को बैक गियर में ले जाने व यथास्थिति को बरक़रार रखने में अक्षम हो जायेंगे. दूसरे दलित बहुँजनों के संख्यानुपात में हिस्सेदारी मिलने पर न सिर्फ इन वर्गों की मीडिया की सेहत में चमत्कारिक सुधार होगा, बल्कि देश में परिवर्तनकामी व युक्तिवादी विचारों को बढ़ावा मिलेगा. अतः यदि दलित-बहुजन मीडिया के स्वामी सचमुच मूकनायक के प्रकाशन के पृष्ठ में कारणों से प्रेरित है, तो उसके लिए उन्हें बाकी चीजें परे रखकर विज्ञापन बाजार में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करवाने की दिशा में अग्रसर होना होगा.

-एच.एल.दुसाध

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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