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आरक्षित वर्ग के अनग्रसर जातियों की कारुणिक सोच !

अगर यह जानने का प्रयास हो कि भारत में वह कौन सा वर्ग है, जो सबके निशाने पर रहता है तो शायद उसका सही जवाब होगा आरक्षित वर्ग की अग्रसर जातियां, जिनके खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग के लेखक-पत्रकार, साधु – संत तथा न्यायिक सेवा से जुड़े लोग तो षडयंत्र करते ही रहते हैं : खुद आरक्षित वर्ग की अनग्रसर जातियां भी इनके प्रति शत्रुता का भाव पोषण करने में पीछे नहीं रहतीं. सबके निशाने पर रहने वाले आरक्षित वर्ग के अग्रसर जातियों के प्रति आरक्षित वर्ग के अनग्रसर जातियों की शत्रुता तो लगता है अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है. कारण, इस वर्ग के कुछ लोग मांग उठाने लगे हैं कि एससी- एसटी-ओबीसी के संपन्न जातियों के लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर कर देना चाहिए. यह एक सोच है जो द्विज बौद्धिकता से प्रभावित है।

द्विजवादी मीडिया, लेखक- पत्रकारों, न्यायपालिका इत्यादि के प्रभाव में आकर ऐसे लोग आरक्षित वर्ग के थोड़े से अग्रसर लोगों और जातियों को हक़मार वर्ग तक घोषित करने लगे हैं। इस सोच को आगे बढ़ाने में आरक्षित वर्ग के अनग्रसर जातियों के नेताओं और बुद्धिजीवियों का भी कम योगदान नहीं है। ऐसी बातें उठाकर वे सवर्णवादी सत्ता के प्रिय पात्र बनते जा रहे हैं : विनिमय में कुछेक को छोटा-मोटा नेता बनने का अवसर मिल जाता है।

बहरहाल आरक्षित वर्ग की कथित संपन्न जातियाँ अनग्रसर जातियों की हकमारी कर रही हैं, ऐसा तब माना जाता जब कॉलेज/ विश्व विद्यालयों से लेकर तमाम उच्च पदों पर एससी, एसटी, ओबीसी के कथित संपन्न वर्ग का कब्जा होता : वहां आरक्षित वर्गों का कोटा भरा दीखता और अनग्रसर बहुजनों के लिए कोई अवसर नहीं रहता। पर, ऐसा है क्या?

नौकरशाही देश चलाने की नीतियों और क्रियान्वयन के मामले में देश की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों के सचिव सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं. अब कोई बताये केंद्र से लेकर राज्यों के सचिव पद पर आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों के कितने लोग हैं? विश्वविद्यालयों में कुलपतियों, एसोसियेट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर पदों पर आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों का कितना प्रतिशत कब्ज़ा है ? मिलिट्री में कर्नल, ब्रिगेडियर इत्यादि कमांडिंग पदों पर आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों का कितना कब्ज़ा है ? पुलिस बल में आईजी- डिआईजी- डीजीपी पदों पर आरक्षित वर्ग के अग्रसर जातियों कितने लोग हैं? इसरो – भामा एटमिक रिसर्च सेंटर जैसे वैज्ञानिक संस्थानों में हकमार वर्ग के कितने लोग हैं ? फिल्म – टीवी, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, ट्रांसपोर्टेशन इत्यादि में आरक्षण के हकमार वर्ग की कितनी उपस्थिति है? छोटे-छोटे कस्बों से लेकर मेट्रोपोलिटन शहरों में छोटी –छोटी दुकानों से लेकर जो बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स नज़र आते हैं, उनमें कितनी दुकानें आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों के हैं? पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें कितने प्रतिशत फ्लैट्स आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियों के हैं ? चार से आठ- दस लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें कितनी गाड़ियाँ आरक्षण के हकमार वर्ग की हैं?

ये वो सवाल हैं, जिसे द्विज वर्ग के लेखक- पत्रकार- नेता- न्यायाधीश लोगों के जेहन में उभरने ही नहीं देते। इसी सवाल से बचने के लिए मोदी सरकार जाति आधारित जनगणना कराने से भाग रही है. आरक्षित वर्ग की कथित संपन्न जातियों के प्रति शत्रुता पोषण करने वाले इस वर्ग की अनग्रसर जातियों के लोगों ने भी कभी इस सवाल से टकराने की कोशिश ही नहीं किया। अगर करते तो उन्हें पता चलता तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियों छोड़कर, हर जगह आरक्षित वर्ग की संपन्न जातियां नहीं, 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा द्विजों का है.

 इन्होंने इस बुनियादी बात की भी अनदेखी की कि आरक्षण का लाभ उठाने के लिए आरक्षित वर्गों के मध्य प्रतियोगिता में उतरना पड़ता है, जिसमें सफल वह होता है जिसने शिक्षा में खुद को बढ़िया से डुबोया है. अगर इन तथ्यों को ध्यान में रखते तो फिर उनकी अपने ही कथित संपन्न भाइयों के प्रति शत्रुता की तीव्रता में कमी आ जाती.

दरअसल कथित अग्रसर लोगों/जातियों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण मनोभाव रखने वाले आरक्षित वर्ग के नेता/ बुद्धिजीवि द्विजों के प्रभाव में आकर यह तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि वर्ण- व्यवस्था की सम्पूर्ण वंचित जातियों और उनसे धर्मान्तरित तबकों की 1- 9 तक समस्या शासन- प्रशासन, उद्योग- व्यापार, फिल्म-मीडिया, पौरोहित्य, शिक्षण संस्थानों, न्यायपालिका इत्यादि सहित शक्ति के समस्त स्रोतों पर द्विजों का औसतन 90 प्रतिशत कब्जा है। द्विजों के इस बेहिसाब प्रभुत्व के कारण जहाँ भारत मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या- आर्थिक और सामाजिक गैर- बराबरी- के मामले में प्रायः विश्व चैम्पियन बन चुका है, वहीं दलित-आदिवासी-पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित अधिकाँश तबके प्राय उस स्टेज में पहुँच चुके हैं, जिस स्टेज में पहुँच कर दुनिया की तमाम कौमों को शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई में उतरना पड़ा. द्विजों के इस प्रभुत्व के भयावह दुष्परिणामों से अवगत होने के बावजूद उनके प्रभुत्व और मजबूत करने के लिए ही चैंपियन द्विजवादी सरकार विनिवेशीकरण, निजीकरण, लैट्रल इंट्री के जरिये के आरक्षण को लगभग कागजो की शोभा बनाने में सफल हो गयी है।

वर्ग संघर्ष का खुला खेल खेलते हुए यह सरकार आरक्षण के खात्मे के लिए जिस तरह तत्पर है, उससे आगामी दो- चार सालों वे सारे क्षेत्र विलुप्त हो जायेंगे, जहां आरक्षण मिलता है। यह काम करने में वह इसलिए और तत्पर है क्योंकि उसे पता है, जो जातियाँ आरक्षण बचाने तथा शासक वर्गों के अन्याय-अत्याचार के खिलाफ वंचित वर्गों की लड़ाई लड़ सकती है, उसे ही अलग- थलग करने के लिए उनके ही कथित पिछड़े भाई मुस्तैद हैं।

बहरहाल आरक्षित वर्ग के कथित संपन्न लोगों के खिलाफ माहौल बनाकर कर द्विजवादी सत्ता को आरक्षण के खात्मे की उर्जा प्रदान कर रहे अनग्रसर जातियों के नेता/ बुद्धिजीवियों से इस लेखक की अपील है कि वे इस बात को दिल की अतल गहराइयों में बिठा लें कि अग्रसर- अनग्रसर आरक्षित वर्ग की समस्त जातियों की 1- 9 तक समस्या शक्ति के स्रोतों पर द्विजों का बेहिसाब कब्जा है। ऐसा कब्जा जो वर्तमान विश्व में किसी भी जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का नहीं है। और यह कब्ज़ा और दृढ़तर हो इसके लिए वर्तमान सरकार देश बेचने से लेकर संविधान को निष्प्रभावी करने में सर्वशक्ति लगा रही है.

ऐसे में इस लेखक की गुजारिश है कि आरक्षण से कम लाभान्वित जातियां में अपने ही संपन्न भाईयों के प्रति जो शत्रुता है, उसे द्विजों की ओर शिफ्ट कराकर ऐसा उपक्रम चलायें जिससे उनको समस्त क्षेत्रों में उनकी संख्यानुपात पर सिमटाया जा सके। यदि समस्त क्षेत्रों में औसतन 80 – 90 प्रतिशत कब्जा जमाये द्विजों को उनके संख्यानुपात पर लाने में सफल हो जाते हैं तब प्रत्येक क्षेत्र में ही उनके हिस्से का अतिरिक्त (सरप्लस) 70- 75 प्रतिशत अवसर उस बहुजन समाज के लिए मुक्त हो जायेंगे, जो आरक्षण के खात्मे के साजिश के तहत प्रायः विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुंचा दिया गया है . अवसरों तथा संपदा-संसाधनों के बंटवारे के मामले में द्विजों को उनके संख्यानुपात पर लाना कठिन जरूर है, पर असंभव टास्क नहीं है। जिस देश की भारत से सर्वाधिक साम्यता है, उस दक्षिण अफ्रीका में यह काम सफलता से अंजाम दिया जा चुका है।

काबिलेगौर है कि दक्षिण अफ्रीका का सोशल कंपोजिशन (social composition of south africa) प्रायः भारत जैसा ही है। वहां भारत के द्विजों सादृश्य 9-10 प्रतिशत गोरे दो सौ सालों तक शक्ति के स्रोतों पर प्राय 80 – 90 प्रतिशत कब्जा जमाये रहे। वहां भारत के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजनों की भाँति 79 प्रतिशत मूलनिवासी कालों की आबादी है, जिनका भारत के बहुजनों की भाँति ही शक्ति के स्रोतों पर बमुश्किल 9- 10 प्रतिशत कब्जा रहा। जिस तरह भारत के मूलनिवासी बहुजन कई जातियों में विभाजित हैं, उसी तरह परस्पर शत्रुता से लबरेज दक्षिण अफ्रिका के काले दर्जनों कबीलों में विभाजित हैं। जिस तरह भारत के बहुजन आरक्षित वर्गों की कथित संपन्न जातियों के प्रति इर्ष्या कातर हैं, वैसे ही वहां वंचितों की लडाई लड़ने वाले नेल्सन मंडेला की जाति ‘जुलुओं’ के प्रति इर्ष्या का भाव रहा।

कहने का मतलब दक्षिण अफ्रिका के बहुजनों का शोषण प्राय: भारत के बहुजनों जैसा ही रहा। लेकिन वहां के मूलनिवासी ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अपनी मूल समस्या का कारण गोरों के प्रभुत्व को समझा और सदी के शेष होते- होते वंचित काले आपसी शत्रुता भूलकर संपन्न जुलु जाति के मंडेला के नेतृत्व में तानाशाही सत्ता कायम कर लिया।

इस तानाशाही सत्ता के जोर से गोरों द्वारा पशुवत इस्तेमाल होने वाले दक्षिण अफ्रीका के कालों ने संविधान में अवसरों के बंटवारे में जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी अर्थात डाइवर्सिटी का प्रावधान किया। अवसरों के बंटवारे में डाइवर्सिटी लागू होने के बाद शक्ति के स्रोतों पर 80- 90 प्रतिशत कब्जा जमाये गोरे धीरे- धीरे अपने संख्यानुपात पर सिमटने लगे। इसके साथ ही उनके हिस्से का सरप्लस अवसर मूलनिवासियों कालों के हिस्से में आने लगा। और आज गोरे अवसरों के मामले में प्रायः अपनी संख्यानुपात सिमटने के बाद दक्षिण अफ्रिका छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने लगे हैं।

भारत में भी शक्ति के स्रोतों पर 80- 90 प्रतिशत कब्जा जमाये अल्पजन शोषक समुदाय को गोरों की भाँति संख्यानुपात पर लाया जा सकता है, यदि आरक्षित वर्ग के संपन्न जातियों के खिलाफ शत्रुता का भाव पोषण करने वाले बहुजन आपसी बैर भूलकर भारत को दक्षिण अफ्रिका बनाने का मन बना लें। ऐसा होने पर 70- 75 प्रतिशत अतिरिक्त अवसर बहुजनों के लिए मुक्त हो जायेंगे। इसका आरक्षित वर्ग की अनग्रसर जातियों की बदहाली दूर करने में कितना लाभ मिल सकता है, इसकी कल्पना कोई भी आसानी से कर सकता है।

एच. एल. दुसाध

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

एच.एल. दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)  
लेखक एच एल दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इन्होंने आर्थिक और सामाजिक विषमताओं से जुड़ी गंभीर समस्याओं को संबोधित ‘ज्वलंत समस्याएं श्रृंखला’ की पुस्तकों का संपादन, लेखन और प्रकाशन किया है। सेज, आरक्षण पर संघर्ष, मुद्दाविहीन चुनाव, महिला सशक्तिकरण, मुस्लिम समुदाय की बदहाली, जाति जनगणना, नक्सलवाद, ब्राह्मणवाद, जाति उन्मूलन, दलित उत्पीड़न जैसे विषयों पर डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हुई हैं।

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