दलित व स्त्रीविरोधी है हिंदुत्व के राज का असली चेहरा : अंतर दिल्ली तथा हाथरस की निर्भयाओं का

हिंदुत्व की राजनीति और अंतर दिल्ली तथा हाथरस की निर्भयाओं का

The politics of Hindutva and the difference between Nirbhayas of Delhi and Hathras

दरिंदगियों में अंतर खोजना, निरर्थक ही नहीं, नुकसानदेह भी होता है। आखिरकार, दरिंदगी के अलग-अलग प्रकरणों में किसी को ज्यादा भयानक बताना, परोक्ष रूप से वैसे ही दूसरे प्रकरणों को कम भयानक बताने का ही काम करता है। इस लिहाज से दिल्ली की निर्भया के साथ 2012 के दिसंबर की दरिंदगी और हाथरस की निर्भया के साथ 2020 की 14 सितंबर की दरिंदगी में अंतर नहीं किया जा सकता है, नहीं किया जाना चाहिए।

यह उपयुक्त ही है कि दोनों प्रकरणों की पीड़िताओं के लिए हम निर्भया के एक ही कल्पित नाम का प्रयोग कर रहे हैं, जो इस दरिंदगी के चलते उनके समान रूप से आखिरकार मौत से लड़ाई से हार जाने से बढ़कर, उनके हफ्तों तक बहादुरी के साथ जिंदगी बचाने के लिए लडऩे की कहानी कहता है। लेकिन और यह लेकिन महत्वपूर्ण है, दरिंदगी के इन दो प्रकरणों पर हमारे समाज तथा व्यवस्था ने जैसी प्रतिक्रिया की है या कहना चाहिए कि इन प्रकरणों के टूटे हुए शीशों में हमारे वर्तमान समाज तथा व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं की जो तस्वीर दिखाई दी है, उसमें जो अनेक महत्वपूर्ण अंतर हैं, उनकी पहचान करना भी उतना ही जरूरी है, जितना जरूरी इन दोनों ही दरिंदगियों के खिलाफ उठे व्यापक जनाक्रोश की समानताओं को रेखांकित करना है।

सच तो यह है कि इन अंतरों को पहचानना और ज्यादा जरूरी है क्योंकि उन्हीं में हम सारे आडंबरों को चीर कर, वर्तमान समाज की गतिकी यानी दशा-दिशा को पकड़ सकते हैं। इस गतिकी को पकडऩा, इस वर्तमान के बदलने की पहली शर्त है।

बेशक, अचानक नृशंस सामूहिक बलात्कार तथा प्राणघातक हमले का शिकार बनाए जाने की, दोनों निर्भयाओं की कहानी एक जैसी है। लेकिन, इन पीड़िताओं के साथ बर्बरता के बाद हुए सलूकों में बहुत भारी और वास्तव में गुणात्मक अंतर को देखे बिना नहीं रहा जा सकता है।

बेशक, इसमें हाथरस के एक गांव और देश की राजधानी दिल्ली में पीड़िता के लिए उपलब्ध सापेक्ष संवेदनशीलता से लेकर सुविधाओं तक का, अंतर भी शामिल है।

वास्तव में इसमें दोनों पीड़ितों की अपनी सामाजिक-शैक्षणिक पृष्ठभूमि का तथा इससे निकला उनकी अभिव्यक्तियों या बोली-बानी का अंतर भी शामिल है, जिसका फायदा उठाकर हाथरस की पीड़िता के मामले में, हाथरस से लेकर लखनऊ तक के पुलिस तथा प्रशासन के अधिकारीगण, खासतौर पर उसके साथ बलात्कार होने की सचाई को ही नकारने में काफी असरदार तरीके से जुट गए हैं।

जाहिर है कि यह सब उत्तर प्रदेश की और किसी न किसी हद तक देश की भी, हिंदुत्ववादी सरकारों के इशारे पर ही हो रहा है और यह इन दो दरिंदगियों के बीच सत्ता के चरित्र में आए बदलाव को दिखाता है। लेकिन उस पर हम जरा बाद में आएंगे।

         यहां हम सिर्फ इतना ध्यान दिलाना चाहेंगे कि किस तरह से बड़ी चतुराई से और जाहिर है कि समझ-बूझकर, दरिंदगी के बाद के पहले वीडियो में पीड़िता के ‘‘जबर्दस्ती’’ की बात कहने तथा उसके लिए कुछ लोगों के नाम लेने के बावजूद, पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों द्वारा बार-बार दोहरा कर, यह स्थापित करने की कोशिश की जाती रही है कि बलात्कार/ सामूहिक बलात्कार की बात, पीड़िता के परिवार द्वारा बाद में जोड़ी गयी थी।

अचरज की बात नहीं है कि बाद में लीक हो गए वीडियो में, पीड़िता के मृत्यु-पूर्व बयान के बाद ही नहीं बल्कि उसकी मृत्यु के बाद भी, जिलाधिकारी को परिवार के लोगों को यह कहकर धमकाते सुना जा सकता है कि वे जो बार-बार बयान बदल रहे हैं, उनको मुश्किल में डाल सकता है।

धमकी यह थी कि मीडिया तो निर्भया की मौत पर दो-दिन के लिए जुटा है, उसके वापस होने के बाद तो उनका साबका उसी प्रशासन से पड़ेगा!

इससे पहले, एक असामान्य घटनाक्रम में हाथरस में उसी पुलिस तथा प्रशासन द्वारा निर्भया के मृत शरीर को अपने कब्जे में लेकर और घरवालों के खुले विरोध के बावजूद तथा वास्तव में उन्हें घर में ही बंद कर, रात को ढाई-तीन बजे फूंका जा चुका था। बाद में सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के हलफिया बयान में इस मनमानी को यह कहकर उचित ठहराने की कोशिश की गयी कि सुबह तक बड़े पैमाने पर जातिवादी भीड़ें जुट जाने तथा जातिवादी-सांप्रदायिक हिंसा भडक़ाए जाने का खतरा था। इसलिए, रात के अंधेरे में ही मृतका के शरीर की अंत्येष्टि करना जरूरी था।

जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट में उक्त हलफिया बयान दिए जाने तक, खुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के इशारे पर, शीर्ष स्तर से पुलिस व प्रशासन द्वारा आधिकारिक रूप से और सत्ताधारी पार्टी द्वारा राजनीतिक रूप से, इस प्रकरण के बहाने से बड़े पैमाने पर जातिवादी-सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के षड़यंत्र की कहानियां गढ़कर पेश की जा चुकी थीं। इससे आगे जाकर, तथाकथित षड़यंत्र के सिलसिले में हाथरस में छ: एफआईआर करने समेत, राज्य के विभिन्न हिस्सों में 22 एफआईआर दर्ज कर, यहां-वहां कई गिरफ्तारियां भी की जा चुकी थीं। इस सिलसिले में केरल के एक दिल्ली-आधारित पत्रकार समेत, चार मुसलमान युवाओं को हाथरस के रास्ते में मथुरा में गिरफ्तार कर, उन पर दमनकारी यूएपीए की धाराएं भी थोपी जा चुकी थीं।

यह दूसरी बात है कि यह फर्जी आख्यान पेश किए जाने के साथ ही तब उघडऩा शुरू हो गया, जब केंद्र सरकार के आधीन प्रवर्तन निदेशालय ने, इस षड़यंत्र के सिलसिले में विदेशी स्रोतों से 100 करोड़ रुपए के हस्तांतरण के योगी सरकार के दावों के संबंध में कोई जानकारी ही नहीं होने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर ली।

उधर, ऐसे ही असामान्य घटनाक्रम में, जो भाजपा के राज में तथा खासतौर पर उत्तर प्रदेश के योगी राज में खास असामान्य भी नहीं रह गया है, पीड़िता के गांव गुलगढ़ी की ही पुलिस नाकेबंदी कर, गांव में मीडिया तथा राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों समेत, सभी के पीड़ित परिवार से मिलने का रास्ता बंद कर दिया गया।

पीड़ित परिवार से मिलने हाथरस जा रहे राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी के काफिले को रोका ही नहीं गया, उन्हें गिरफ्तार कर नोएडा के एक गैस्ट हाउस में रख दिया गया। अगले दिन, हाथरस जा पहुंचे तृणमूल सांसदों को न सिर्फ गांव में जाने से रोका गया बल्कि उनके साथ बाकायदा धक्का-मुक्की भी की गयी। यह दूसरी बात है कि पुलिस की सारी घेरेबंदी के बावजूद, कुछ हिम्मती तथा मेहनती संवाददाता छुपते-छुपाते किसी तरह से पीड़ितों के परिवार तक पहुंच ही गए और गांव से खबरें निकालते रहे।

इसी क्रम में पीड़ित परिवार के बहुत असुरक्षित महसूस कर रहे होने की खबरों के बीच, आस-पास के 12 गांवों की ठाकुर-ब्राह्मणों की सवर्ण पंचायत होने की भी खबर आयी, जिसमें इस कांड के सिलसिले में गिरफ्तार चारों ठाकुर युवकों को, निर्दोष करार देते हुए, हर कीमत पर उन्हें बचाने का एलान किया गया था। इसके बाद कथित सवर्ण सेना आदि के सक्रिय होने की खबरें आने लगीं और अंतत: एक पूर्व-भाजपा विधायक, राजवीर पहलवान द्वारा गांव में ही ठाकुरों की सभा किए जाने की तस्वीरें आयीं, जिसमें ‘अपने निर्दोष लड़कों’ को बचाने का एलान किया गया था।

जाहिर है कि सारी रोक-टोक पीड़ित परिवार से एकजुटता जताने के लिए जा रहे राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि के लिए ही थी।

आरोपियों के बचाव की गोलबंदियों के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी। इसी दौरान, देश भर में स्वत:स्फूर्त विरोध प्रदर्शनों के ज्वार और देशी-विदेशी मीडिया में शोर मचने के बाद, एसपी समेत तीन पुलिस अधिकारियों के निलंबन तथा एसआईटी के गठन के दो दिन बाद, मीडिया को तथा राहुल, प्रियंका और बाद में कम्युनिस्ट नेताओं समेत राजनीतिक नेताओं को गांव में जाने की इजाजत तो दी गयी, लेकिन इस बीच बाहर के सवर्ण श्रेष्ठतावादी ‘योद्धाओं’ को गांव में स्थापित किया जा चुका था, जो पीड़ित परिवार को आतंकित करने के हिस्से के तौर पर, उससे सहानुभूति जताने वालों के साथ भी दुर्व्यवहार करने की कोशिश कर रहे थे। इन्हीं तत्वों ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर के निकलने के बाद, प्रेस को संबोधित कर रहे आप पार्टी के सांसद पर स्याही से हमला किया और चंद्रशेखर रावण को ‘इस दशहरे पर फूंकने’ की सार्वजनिक घोषणाएं कीं।

उधर, आरोपी युवकों का बचाव करने वालों द्वारा अलग-अलग किए जा रहे सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के आरोपों से इंकार को, पुलिस प्रशासन में शीर्ष स्तर से औपचारिक रूप से पेश करते हुए, एडीजी प्रशांत कुमार ने संवाददाता सम्मेलन में बाकायदा इसका एलान कर दिया कि सामूहिक बलात्कार का आरोप झूठा था और कम से कम इरादतन हत्या की बात भी सही नहीं थी।

यह दावा सिर्फ इस आधार पर किया गया था कि फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी को भेजे गए नमूनों में पीड़िता के शरीर पर या कपड़ों में कोई वीर्य नहीं पाया गया था और राजधानी के सफदरजंग अस्पताल ने मौत का कारण, चोट से रीढ़ की हड्डी के टूटने का ट्रॉमा बताया गया था।

फोरेंसिंग साइंस लैबोरेटरी की उक्त रिपोर्ट से कोई बलात्कार नहीं होना साबित करना, दो कारणों से पूरी तरह से शरारतपूर्ण था। पहला यह कि इन नमूनों की खुद ही कोई विश्वसनीयता नहीं थी क्योंकि इन्हें घटना के पूरे ग्यारह दिन बाद, 25 तारीख को इकट्ठा किया गया था, जबकि ज्यादा से ज्यादा बहत्तर घंटे तक एकत्र किए गए नमूनों की ही कोई विश्वनीयता होती है।

वास्तव में, नमूने लिए जाने में इतनी देर कराना और उसके बाद, नमूने से बलात्कार के सबूत नहीं मिलने को बलात्कार ही नहीं होने का सबूत बनाया जाना, शीर्ष स्तर पर पुलिस तथा प्रशासन की आरोपियों को बचाने की कोशिश को ही दिखाता है।

यह कोशिश, इस दूसरे कारण से और भी नंगी हो जाती है कि निर्भया प्रकरण के बाद, बलात्कार कानून में हुए संशोधनों के बाद तो, बलात्कार के साक्ष्य के रूप में पीड़िता के शरीर पर वीर्य पाए जाने का तकाजा पूरी तरह से खत्म ही हो गया है, जिसकी डीजीपी को जानकारी नहीं हो यह संभव नहीं है।

इतना ही नहीं, अलीगढ़ के जिस अस्पताल में पीड़िता को पहले भेजा गया था उसकी मैडिको-लीगल रिपोर्ट में दर्ज विवरण जब चीख-चीखकर बलात्कार की ओर इशारा कर रहे थे और पीड़िता के 25 सितंबर के ही मृत्यु-पूर्व बयान में मजिस्ट्रेट के सामने सामूहिक बलात्कार तथा हत्या की कोशिश की बात दर्ज करायी जा चुकी थी, उसके बाद लखनऊ में बैठे शीर्ष पुलिस अधिकारी का उक्त बयान, उसकी आका सरकार के आरोपियों के पीछे खड़े होने को ही दिखाता था।

यही बात पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में जो नहीं कहा गया है उसके जरिए, इस रिपोर्ट को इरादतन हत्या के खिलाफ साक्ष्य बनाने की, उक्त सरकारी कोशिश के बारे में भी सच है।

दिल्ली की निर्भया से भिन्न, हाथरस की निर्भया के मामले में, राजनीतिक रूप से सत्ताधारी संघ परिवार द्वारा अनुमोदित आक्रामक सवर्ण गोलबंदी और भाजपायी शासन-प्रशासन की जो जुगलबंदी देखने को मिली है, उसे और मारक बनाया है, संघ-सरकार द्वारा नियंत्रित गोदी मीडिया ने, ‘दंगों के षड़यंत्र’ की योगी सरकार की कहानियों के लिए भोंपू बनने में तो कोई संकोच नहीं ही हुआ है, हत्या के बाद भी हाथरस की निर्भया के चरित्र की हत्या करने में भी कोई संकोच नहीं हुआ है।

वास्तव में यही वह जगह है जहां सवर्ण श्रेष्ठतावादियों, संघी योद्धाओं और शासन-प्रशासन की सबसे धारदार एकता देखने को मिलती है।

अनेक संवाददाताओं की गवाही के अनुसार, पीड़िता के परिवार के कथित कॉल डॉटा रिकॉर्ड्स लीक करने के जरिए, संबंधित अधिकारीगण सवर्ण गोलबंदियों, संघ परिवारी सोशल मीडिया सेना और मुख्यधारा के गोदी मीडिया के जरिए, इसकी खबरें प्लांट करने व प्रसारित करने में लगे हुए थे कि मुख्य आरोपी से पीड़िता के संबंध थे और ज्यादा संभावना यही है कि यह पीड़िता के परिवार द्वारा ‘ऑनर किलिंग’ का और अगर वह नहीं भी हो तब भी ज्यादा से ज्यादा ‘प्रेम संबंध बिगड़ने’ का मामला था।

अचरज की बात नहीं है कि पीड़ित परिवार के बयानों के अनुसार, योगी सरकार की एसआईटी की जांच में भी सारा जोर, पीड़िता और मुख्य आरोपी के बीच ‘‘रिश्तों’’ की खोज करने पर ही रहा था, न कि 14 सितंबर की घटना की जानकारियां इकट्ठा करने पर।

भाजपायी सरकारों की सवर्णपक्षधरता

विभिन्न स्तरों पर भाजपायी सरकारों की इस सवर्णपक्षधरता का आलम यह है कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के हाथरस कांड की सीबीआई जांच कराने का एलान करने के हफ्ते भर बाद भी सीबीआई जांच का कहीं अता-पता नहीं था, जबकि स्वत: स्पष्ट कारणों से सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के प्रकरण में, सुप्रीम कोर्ट के सीबीआई जांच का रास्ता खोलने के चौबीस घंटे के अंदर-अंदर सीबीआई की टीम, मुंबई पहुंचकर जांच ही शुरू नहीं कर चुकी थी बल्कि एफआईआर भी दर्ज कर चुकी थी!

हाथरस की निर्भया के लिए न्याय की आवाज उठाने को ‘जातिवादी-सांप्रदायिक दंगों के अंतर्राष्ट्रीय षड़यंत्र’ का हिस्सा करार देने के जरिए, योगी सरकार ने अब और जाहिर है कि मोदी के अनुमोदन से, सवर्ण-श्रेष्ठतावाद की अपनी पक्षधरता को, और मुकम्मल कर दिया है। यह सिर्फ बदनामी से या विपक्ष के हमलों से अपनी सरकार को बचाने का मामला किसी भी तरह से नहीं है। यह हिंदुत्ववादी राजनीति के मूल चरित्र का मामला है, जो जितनी अल्पसंख्यकविरोधी है, उतनी ही सवर्ण-श्रेष्ठतावादी और स्त्रीविरोधी भी है।

हिंदुत्ववाद, जैसाकि हिंदुत्व के प्रणेता सावरकर ने ही स्पष्ट कर दिया था, एक प्रतिगामी राजनीतिक प्रोजैक्ट है, जो सत्ता का इस्तेमाल वंचितों के दमन के लिए करता है, ताकि आर्थिक-सामाजिक रूप से विशेषाधिकारप्राप्त वर्गों के हित साध सके। उससे हिंदुओं के हितों की चिंता की उम्मीद किसी को भी नहीं करनी चाहिए। हां! उससे हिंदुओं के बीच मौजूद जाति, क्षेत्र, भाषा, परंपरा, पूजा-पद्घति आदि के विभाजनों को हथियार बनाकर, वास्तव में हिंदुओं के हितों को चोट पहुंचाने की ही नहीं, उनके विभाजनों को और धारदार बनाने की ही उम्मीद की जाती है।

भाजपा के राज में अल्पसंख्यकों के साथ-साथ, दलितों और महिलाओं पर बढ़ते हमले इसी का सबूत हैं।

इस सचाई को समझने के लिए सिर्फ एक आंकड़ा काफी है।

2019 में देश भर में महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध योगी के राज में उत्तर प्रदेश में ही दर्ज हुए थे और 2019 तक के चार साल में उत्तर प्रदेश में, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में पूरे 66.7 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। इसी अवधि में देश भर में अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ बलात्कार के मामलों में 37 फीसद और हमले/ बदसलूकी के मामलों में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। इतना ही दलित तथा स्त्रीविरोधी है, हिंदुत्व के राज का असली चेहरा। यही पृष्ठभूमि है जो हाथरस और दिल्ली की निर्भयाओं को, अपनी एक सी त्रासदियों में भी अलग करती है।                                                                                            

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
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