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Amit Shah Narendtra Modi

वैचारिक राजनीति को खूंटी पर टांग देने का नतीजा है मोदी-शाह की जोड़ी का हावी होना

The result of abandoning ideological politics is the dominance of the Modi-Shah duo

देश में बदलाव की बात तो हो रही है पर उस स्तर पर प्रयास नहीं हो रहे हैं। इसकी वजह यह है कि विपक्ष में जो नेता मुख्य रूप से भूमिका निभा रहे हैं, वे वंशवाद के बल पर स्थापित नेता हैं। यही वजह है कि जो लोग मोदी सरकार से प्रभावित नजर आ रहे हैं वे भी इस बदलाव के प्रति गंभीर नहीं दिखाई दे रहे हैं। इसका बड़ा कारण राजनीति का स्तरहीन व्यक्तिवादी होना है।

Commercialization of politics.

राजनीति के व्यवसायीकरण के चलते बदलाव के नाम पर होने वाले आंदोलनों से लोग बचने लगे हैं। इसका बड़ा कारण राजनेताओं का विभिन्न आरोपों से घिरे होना भी माना जा रहा है। राजनीति मतलब पैसा, पॉवर और एसोआराम माना जाने लगा है।

एक समय था कि राजनीति में जाने का मतलब समाजसेवा से होता था। परिवार का कोई व्यक्ति यदि राजनीति के क्षेत्र में चला गया तो समझो वह देश और समाज के लिए समर्पित है। उसका खर्चा उठाना उसके परिवार व समाज की जिम्मेदारी होती थी। यह माना जाता था कि यह व्यक्ति देश और समाज के लिए काम कर रहा है तो अपना या अपने परिवार का खर्चा कैसे उठाएगा। यही वजह थी कि इस तरह के लोगों को संगठन चलाने के लिए लोग बढ़-चढ़कर चंदा देते थे। वह था ईमानदारी की राजनीति का दौर (The era of honesty politics)। देश और समाज के लिए समर्पित रहने वाले नेताओं का दौर। नेता जनता के बीच में रहते थे, उनके चंदे से राजनीति करते थे और सत्ता में आकर उनके लिए ही काम करते थे। यही सब कारण थे कि उस दौर के नेता सादा जीवन उच्च विचार वाले थे।

आजादी की लड़ाई के दौर के नेता किसी भी पार्टी के हों, किसी भी विचारधारा के हों लगभग सभी में देश और समाज के लिए काम करने का जज्बा था।

आज की तारीख में बिल्कुल उल्टा है। जहां नेता को देश के सभी संसाधनों पर अपना हक चाहिए, वहीं लोगों का भी नेता से स्वार्थ जुड़ा होता है।

आज के नेता आजादी की बात तो करते हैं पर आजादी की कीमत को नहीं समझते।

चाहे महात्मा गांधी हों, सरदार बल्लभभाई पटेल हों, पंडित जवाहर लाल नेहरू हों, डॉ. राम मनोहर लोहिया हों, लोक नारायण जयप्रकाश हों। या फिर गरम दल के नेता सुभाष चंद्र बोस हों, भगत सिंह हों चंद्रशेखर आजाद हों सभी देश और समाज के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। किसी भी एक मामले में इनमें से किसी नेता का निजी स्वार्थ नहीं दिखाई देता।

आजादी के बाद भी जेपी क्रांति तक देश में ईमानदार राजनीति का दौर रहा। यही वजह थी कि जिस पार्टी के बैनर तले आजादी की लड़ाई लड़ी गई। उस पार्टी के नेता जब अपने पथ से भटकने लगे तो उस पार्टी के खिलाफ ऐसा माोर्चा खुला कि 1977 में उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ा।

डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे ने वह जोर पकड़ा कि उनके निधन के बाद भी उस नारे पर काम होता रहा। उनके संघर्ष के साथी रहे जयप्रकाश नारायण की अगुआई में इमरजेंसी के खिलाफ हुए आंदोलन ने वह रूप लिया कि देश में प्रचंड बहुमत के साथ जनता पार्टी की सरकार बनी। मतलब समाजवादियों की सरकार।

Individualist politics began to dominate the country.

देश में कितने भी बड़े-बड़े दावे किये जाते रहे हों पर जनता पार्टी के बिखराव के बाद देश में जो राजनीति शुरू हुई वह लगातार पतन की ओर ही गई।

जनता पार्टी से अलग होकर जनसंघ के नेताओं ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बना ली। भाजपा का गठन के बाद से ही एकमात्र एजेंडा हिन्दुत्व का रहा।

चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद चाहे चंद्रशेखर हों, मुलायम सिंह यादव हों, लालू प्रसाद हों, राम विलास पासवान हों, या फिर जार्ज फर्नांडीस सब बिखरे -बिखरे नजर आए।

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भले ही बोफोर्स मुद्दे पर 1989 में समाजवादियों और संघियों की मदद से वीपी सिंह की सरकार बनी हो पर इन सबमें देश और समाज हित कम और स्वार्थ ज्यादा था। यही वजह रही कि लाल कृष्ण आडवाणी की राम मंदिर निर्माण का लेकर निकाली गई रथयात्रा को बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के रोक देने पर भाजपा ने वीपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गई।

मतलब देश में व्यक्तिवादी राजनीति हावी होने लगी। यह वह दौर था जब देश में आरक्षण को लेकर बड़ा बवाल मचा था।

देश में क्षेत्रीय दलों का दौर शुरू हो चुका था। जेपी लोहिया के चेलों ने अपनी-अपनी पार्टी बना ली। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, लालू प्रसाद की राजद, रामविलास पासवान की लोजपा, जार्ज फर्नांडीस की समता पार्टी, जो बाद में जदयू में तब्दील हो गई।

यहां तक तो फिर भी कुछ ठीक था। इन नेताओं थोड़ी बहुत नैतिकता थी। हां इन नेताओं ने जो किया उसने तो राजनीति का बंटाधार ही कर दिया। ये नेता तो जातिवाद और परिवारवाद में ऐसे घुसे कि इन्होंने समाजवाद की परिभाषा ही बदल दी।

अब बिहार में राजद में लालू के बेटे तेजस्वी यादव, राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव अपनी-अपनी पार्टी की बागडोर संभाल रहे हैं। ऐसे ही हरियाणा में ओमप्रकाश के छोटे बेटे अभय चौटाला इनेलो के सर्वेसवा हैं।

हालांकि ओमप्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला ने अपने दम पर जननायक जनता पार्टी बनाकर हरियाणा सरकार में उप मुख्यमंत्री पद कब्जाया हुआ है। फिर भी यह दौर परिवारवाद, जातिवाद और वंशवाद की राजनीति का चल रहा है।

कांग्रेस में भी सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी ने पूरी तरह से कांग्रेस को कब्जाया हुआ है।

अब जब दश में ऐसे नेता होंगे तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे कट्टर नेताओं की जोड़ी देश की राजीनति पर हावी होगी ही।

मोदी सरकार के बदलाव के लिए प्रयास करने वालें में कांग्रेस से पूर्व इंदिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी, उनके बेटे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हैं तो समाजवादी पार्टी से वंशवाद के नाम पार्टी की बागडोर संभाल रहे अखिलेश यादव, एक विशेष जाति के नाम पर राजनीति के क्षेत्र में पहचान बनाने वाली मायावती और वंशवाद के नाम पर आगे आये विभिन्न पार्टियों के मुखिया हैं।

सी.एस. राजपूत

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