महामारी के खिलाफ लड़ाई में इन मुसलमानों को फ्रंटलाइनर के रूप में याद किया जाएगा

EID with migrants

कोविड-19 आपदा के समय मुस्लिम समुदाय का सौहार्द

वायरस, नफरत और अलगाव के माहौल में मानवता व परोपकार

The role of Muslims in the fight against the Corona virus epidemic

आज पूरा वैश्व‌िक महामारी कोविड-19 की चपेट में है। कोरोनावायरस जनित कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए लॉकडाउन से पूरा भारत अस्त-व्यस्त है। बहुत बड़ी संख्या में कामगार और मज़दूर वर्ग इसी लॉकडाउन के कारण अपने रोज़गार के साधनों से वंचित हो कर पलायन को मज़बूर हुए ! अपर्याप्त राजकीय व्यवस्थाओं के चलते जिस प्रकार इस वर्ग को कठिनाइयों (The difficulties) का सामना करना पड़ा और एक पीड़ादायक स्थिति से गुजरना पड़ा, उस समय में विभिन्न शहरों में कई संस्थाओं और समाज के अग्रणी नागरिकों द्वारा बिना किसी धार्मिक-जातिगत भेदभाव के, सहयोग के मानवीय पहलू देखने को मिले।

संक्रमण जिस रफ्तार से देश में बढ़ रहा है, यह अत्यंत ही गंभीर स्थिति है। अब संक्रमण के खतरे से समाज में भय व्याप्त हो रहा है। यह समय धैर्य रखने का है, सावधानी बरतने का है। संयम और सामंजस्य की आवश्यकता अत्यधिक है। यह समय मानवता आत्मसात करने, मानवीय मूल्यों की महत्ता का आकलन करने (To assess the importance of human values), हमारे समाज और हमारी स्थिति पर गंभीरता से विचार करने का समय है।

इस बात पर गंभीरता से चिंतन और मनन किया जाना चाहिए कि हमने किस तरह से समाज का निर्माण किया है जिसमें हम और हमारी आने वाली पीढ़ी कहां तक सुरक्षित हैं। यह अवलोकन करने का समय है।

भारत आज जो है उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक वर्ग का योगदान है, यदि हम इस बुनियादी बात को भी नहीं समझ पाते हैं, तो हम भारत को समझने में असमर्थ ही रहेंगे।

ऐसे गंभीर समय में मीडिया के एक पक्ष द्वारा ‘तबलीगी जमात’ के नाम पर नफरत परोसी गई, और फैलाई गई जो निःसंदेह, सांप्रदायिक ताकतों की सामंती सोच के द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को पूरी तरीके से निष्क्रिय बनाने का सबूत है। भारत की आत्मा पर एक गंभीर चोट इस तरह के प्रचार से पहुंची है।

The struggle to save the soul of India will be long and difficult.

भारत की आत्मा को बचाने का संघर्ष लंबा और कठिन होगा। स्थितियाँ बेहतर होने से पहले अगर खराब हैं, तो उनको ठीक करने का काम किया जा सकता है।

“कोविड-19” जिसको ‘कोरोना काल’ की संज्ञा दी गई है, भारत में इसे सांप्रदायिक जामा पहनाए जाने की कोशिशें की गईं। आज इस महामारी में जब पूरा भारत विस्थापन, बेरोजगारी, भूख जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में देश का मुख्यधारा मीडिया भले ही मुस्लिम समाज को देश विरोधी साबित करने की भरपूर कोशिश कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि जब भी देश पर कोई खतरा आता है तो उससे निपटने के लिये मुस्लिम समाज पूरी तरीके से देश में पूर्ण आस्था रखते हुए बढ़-चढ़कर सहयोग देता है।

एक ओर जब मुख्यधारा का मीडिया ताली और थाली बजाने जैसे विचारों को बढ़ावा दे रहा था, तभी से मुस्लिम समाज के लोग जरूरी चीजें जैसे मास्क, सैनिटाइजर और राशन समाज में बिना किसी भेदभाव के बांट रहे हैं।

The family of Ibrahim Motiwala has fed 800 people daily for free.

महाराष्‍ट्र की राजधानी और बॉलीवुड सिटी में रहने वाला इब्राहिम मोतीवाला फैमिली एक बार में करीब 800 लोगों के लिए खाना तैयार करवा कर जरूरतमंदों को बांटते रहे हैं। देश के विभिन्न शहरों से ऐसे बहुत से मुस्लिम नागरिक समूहों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है।

मुस्लिम समाज ने अनूठा प्रयास किया है, और इस दिशा में लगातार प्रयासरत है‌।

दयालुता मानवीय दृष्टिकोण है ! Kindness is a human attitude!

मुस्लिम समाज के साथ-साथ प्रत्येक घर में, समाज में और अन्य समुदाय के अधिकांश ऐसे लोग एक दूसरे का साथ देने के लिए तैयार हैं, जो लाखों भारतीयों के लिए एक आशा को जीवित रखता है। यह कार्य कट्टरता और क्रूरता पर करुणा की विजय का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के मुस्लिम समाज द्वारा संकट से प्रभावित लोगों की मदद के लिए जो प्रयास किए गए हैं, वह समान रूप से प्रशंसनीय हैं। देश के सभी हिस्सों से मुस्लिम लोगों द्वारा अन्य कोरोना रोगियों की जान बचने के लिए उपचार में अत्यंत उपयोगी प्लाज़्मा दान करने के बहुत से उदाहरण सामने आए हैं।

Compassion destroys Hatred.

करुणा से नफरत नष्ट हो जाती है। अपने स्वभाव से ही प्यार पैदा होता है, और वह एक सहयोगी समाज, एक खूबसूरत दुनिया बनाता है। कोविड-19 के बाद की दुनिया की कल्पना (Imagine the world after COVID-19) क्या ऐसी ही सुंदर दुनिया के रूप में हम करना चाहेंगे ?लोग प्रयासरत हैं। इस प्रयास में मुस्लिम समाज का ज़ज़्बा भी बराबर का भागीदारी है।

राजनीतिक लाभ के लिए दक्षिणपंथी शातिर एजेंडे पर मुस्लिम समाज विशेष रूप से निशाने पर रहा है। तबलीगी जमात पर कोरोनावायरस को फैलाने में पूरे समुदाय पर आरोप लगाना बहुत ही अपमान जनक है। इस सब के बावजूद कई मुस्लिम व्यक्तियों व सामूहिक निकायों और संगठनों ने प्रभावित लोगों के दर्द को कम करने की ज़िम्मेदारी ली। ऐसे समय में जब राजकीय स्वास्थ्य सेवाएं असफल हो रही हैं और निजी अस्पताल कोविड-19 मामलों के लिए अत्यधिक धनराशि लगभग 50000 रूपए प्रतिदिन या आठ लाख रूपए का पैकेज तक वसूल रहे हैं, तब कई सारे मुस्लिम डॉक्टर एसोसिएशन साथ मिलकर काम कर रहे हैं जो कि कोविड-19 के मरीज़ों से कोई पैसा नहीं वसूल रहे, भले ही कोरोना रोगी उनकी जाति या धर्म के हो या ना हो। ऐसी ही एक पहल गुजरात के बड़ौदा में, जो कि सबसे अधिक प्रभावित राज्य के रूप में उभरा है, बड़ौदा मुस्लिम डॉक्टर्स एसोसिएशन (Baroda Muslim Doctors Association) ने डॉ वसीम मलिक व डॉ मोहमद हुसैन के सहयोग से की है, जिसमें बिना किसी जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के कोरोना के मरीज़ों का इलाज बिलकुल मुफ्त में किया जा रहा है। मरीज़ों से बिना कोई राशि लिए वेंटिलेटर्स, दवाईयां, भोजन, व उपचार प्रदान किया जा रहा है !

भारत में कोविड-19 की कहानी वंचितों से शुरू नहीं होती और नफरत से खत्म नहीं होती। आज हमारी सामूहिक स्थिति का एक अभिन्न पहलू यह है कि इस त्रासदी ने अद्भुत संकल्प को जन्म दिया है। सद्भाव व सम्मान के विस्तृत दृष्टिकोण रखने वाले नागरिकों द्वारा नफरत का मुकाबला प्यार और करुणा से करने का एक प्रयास है, जो आने वाली पीढ़ी को सदियों तक प्रेरणा देता रहेगा और इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा।

देश की राजधानी दिल्ली, जहाँ तब्लीगी जमात के इजलास पे सवाल उठे थे, उसी राजधानी के अलग-अलग क्षेत्रों में बहुत सी मुस्लिम तंजीमों ने आपदाग्रस्त लोगों की बिना किसी धार्मिक जातिगत भेदभाव के मदद के प्रयास किये। ‘अनहद’ सामाजिक संगठन के सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, फिल्म मेकर व कवि गौहर रज़ा जैसे मुस्लिम सामाज के अग्रणीय नागरिकों ने राशन, भोजन, दवाइयों, वस्त्रों से जरूरतमंदों की विभिन्न क्षेत्रों में सहायता की।

देशभर में समाज के कमजोर वर्ग को राहत प्रदान करने के लिए अलग-अलग नागरिक संस्थाओं ने समाज में मिसाल पेश की है! विशेष रूप से कुछ मुस्लिम सामाजिक संगठन धार्मिक या जातिगत पहचान की परवाह किए बगैर सभी को समान रूप से सहयोग प्रदान करने के लिए काम कर रहे हैं।

लखनऊ में अधिवक्ता वर्ग से ज़फर अज़ीज़ ( एडवोकेट) पुराने लखनऊ में मास्क वितरण, राशन वितरण और जागरूकता फैलाने में सहयोग करते हैं, तो वही नौशाद हुसैन पठानिया (प्रिंसिपल) और एक हिजाब पहने मुस्लिम महिला निखत अबरार मलिक (हिंदी प्रवक्ता )गरीब बच्चे बच्चियों को और उनके घर वालों को इस बीमारी में बचने के उपाय समझाती हैं और उनके संशय को दूर करती हैं, ताकि वह सभी लोग अपने आप को इस बीमारी से बचा सकें।

कोविड-19 लाइफ लाइन, जिस का संचालन मोहम्मद अहसान, इमरान खान, फरहत खान, रफत जहान, मोहम्मद सैफ़, मोहम्मद नूर और दीपक शर्मा, मोहम्मद यासिर द्वारा किया गया, यह व्यापक सामुदायिक राहत प्रयास है। अब महामारी के दौर में शहर और दूरदराज के नगरों में गरीबों और रेल आश्रितों को एक दिन में 2500 से अधिक लोगों को भोजन परोसा जा रहा है। स्वैच्छिक दानदाता और लाभार्थी प्रत्येक धार्मिक समुदाय और हर संप्रदाय से आते हैं। भूखे और वंचित के लिए हमारी मानवता को व्यक्त करने के लिए ये मौलिक अवसर है।

जब से लॉकडाउन लागू हुआ, तभी से कैंसर और गुर्दे की बीमारियों जैसे रोगियों का नियमित उपचार टेढ़ी खीर हो गया है। लेकिन ऐसे गंभीर समय में भी कोलकाता के डॉक्टर फवाद हलीम (Dr. Fuad Halim) अपने 60 रिश्तेदारों और मित्रों के साथ एक एनजीओ कलकत्ता स्वास्थ्य संकल्प, के जरिए एक छोटी स्टैंडअलोन डायलिसिस यूनिट में मात्र 50 रुपए में डायलिसिस कर रहे हैं।

डॉक्टर फवाद हलीम ने सीपीआई (एम) के टिकट पर डायमंड हार्बर से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। वह एक लाख से कम वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे, जबकि विजेता, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लगभग आठ लाख वोट मिले।

सद्भाव को लेकर तमाम सारे लोग जो कि मुस्लिम समाज के हैं, उनका मुस्लिम के खिलाफ व्यापक पूर्वाग्रह, धार्मिक पहचान या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना इस संकट में प्रभावित होने वाले सभी वर्ग के लोगों को सेवा करने का प्रयास है।

माइल्स टू स्माइल (Miles to smile) संस्था ने शिव विहार में दिल्ली दंगा प्रभावित इलाकों में मुस्लिम विस्थापितों, महिलाओं की आर्थिक मदद करके उन्हें दुबारा रोजगार उपलब्ध करवा कर एक अनूठा प्रयास किया। आईआईटी स्कॉलर आसिफ मुज्तबा व उनके साथी युवाओं ने मस्तफाबाद, लाल बाग़ दंगा प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं को सिलाई मशीन उपलब्ध करवा कर मास्क और पी पी किट्स का उत्पादन स्थानीय स्तर पर करवा कर आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम को स्थापित किया!

Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
Sara Malik, सारा मलिक, लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

हालांकि इस्लामोफोबिया की छाया व शारीरिक और मानसिक खतरों के बावजूद मुसलमानों ने संकट में लोगों का समर्थन करना जारी रखा है। राहत के कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों की गणना करते हुए मुसलमान सामाजिक कार्यकर्ता विभिन्न समूहों के भीतर युवाओं को सशक्त बना रहे हैं ताकि न केवल मौजूदा भूख की स्थिति को पूरी तरह से निवारण कर सकें बल्कि निवारक उपायों को अपनाने के लिए अपने समुदाय को तैयार कर सकें। परोपकार के कार्य में एक जुड़ाव है और साथ ही मानव सेवा करने का आह्वान मुसलमानों ने स्वीकार किया है। लोगों के भोजन, जीवन और प्रतिष्ठा के अधिकारों की रक्षा के लिए संकल्पित हुए हैं। उन्होंने सहानुभूतिपूर्ण कृत्यों से इसको पूरा किया। इसके अलावा विस्तारित तालाबंदी और रमजान के महीने में भी राहत कार्यों में लगे रहे हैं।

इन मुस्लिम समुदाय और संगठनों को अपने प्रयासों को बनाए रखने और कई परिवारों और अन्य समुदाय की जरूरत में सहायता करने व महामारी के खिलाफ लड़ाई में फ्रंटलाइनर के रूप में याद किया जाएगा।

सारा मलिक

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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