टायर से तार छीलने का काम करती महिलाओं की स्थिति, एक तरह का छुपा हुआ शोषण

Things you should know

The situation of women peeling wire from tires

दिल्ली के बाहरी इलाकों में बड़ी संख्या में औद्योगिक केन्द्र (A large number of industrial centers on the outskirts of Delhi) बसे हुए हैं और इन औद्योगिक केन्द्रों के आसपास बड़ी संख्या में मजदूर बस्तियां (A large number of labor settlements around industrial centers) बसी हुई है जिनमें हजारों-लाखों की आबादी में लोग रहते है। ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, गढ़वाल, राजस्थान से आकर बसे हुए हैं। इन बस्तियों में रह रहे लोगों को रोज पानी, नाली, साफ-सफाई जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। नांगलोई, के पास बसा प्रेम नगर ऐसा ही एक इलाका है।

दिल्ली का ‘मिनी-बिहार’ | Delhi’s mini-Bihar

किरारी सुलेमान नगर से सटे हुए क्षेत्र प्रेम नगर के एक ओर मुबारकपुर गांव है, तो दूसरी ओर रानीखेड़ा गाव पड़ता है, प्रेम नगर की अधिकांश बसी आबादी बिहार से है इसलिए इस एरिया को ‘मिनी-बिहार’ भी कहा जाता है बिहार के साथ-साथ उत्तर-प्रदेश गढ़वाल और राजस्थान, हरियाणा के बसे लोग भी है।

प्रेम नगर तीन भागों में 1,2,3, में बंटा हुआ है। प्रेम नगर-3 को अगर नगर भी कहा जाता है। प्रेम नगर से सटे बाहरी क्षेत्र के आस-पास औद्योगिक नगर पीरागढ़ी, मुंडका, टिकरी बार्डर, बहादुरगढ़ क्षेत्र आता है, जहां प्रेम नगर में बसे लोग काम करने आते है इसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी बहुत संख्या है जो कि जूता फैक्टरी, सिलाई फैक्टरी व पश्चिम विहार पंजाबी बाग में डोमेस्टिक वर्कर का काम करने के निकलती हैं। इसके बाद जो महिलाएं घर में रहती हैं, वे भी कलोनी में घर खर्च निकालने के लिए पीस रेट के काम करती हैं।

यहां बड़े पैमाने पर अलग-अलग फैक्टरियों से कच्चा माल जिसको घर में रहने वाली महिलाएं तैयार करती है। ये कच्चा माल सीजन या त्यौहारों के हिसाब से अलग-अलग तरीके से आता है, जैसे राखी बनाने का काम, मोमबत्ती पैकिंग, थैले सिलने का काम, रबर बैंड बनाने का काम, पुराने कपड़ों की छंटाई का काम, फैक्टरियों से जहाज के टायरों के चमड़े से धागा व तार खींचने जैसे अनेक काम करती हैं।

टायर के रबड़ में से तार खींच कर अलग करने का काम यहां सबसे अधिक व साल भर चलने वाला काम है।

यहां काम करने वाले बताते हैं कि यह टायर हवाई जहाज के होते हैं जो खराब होने के बाद कबाड़ या स्क्रैप में चले जाते हैं। इस स्क्रैप को बड़े स्क्रैप डीलर खरीद कर छोटे कबाड़ियों को दे देते हैं। छोटे कबाड़ियों द्वारा इस रबर के स्क्रैप से तार अलग करने के लिए मजदूर बस्तियों में महिलाओं को बांट दिया जाता है। माल किलों के हिसाब से तोल कर दिया जाता हैं एक किलो रबड़ में से धागा निकालने पर आठ से दस रुपये मिलते हैं। इस तार में 7-8 पतली-पतली तारें होती हैं, जिनको मिला कर एक तार बनती है।

रबड़ से तार व धागा ज्यादा आराम से निकल सके इसके लिए रबड़ को सुबह की धूप निकलते महिलाएं बाहर गली में डाल देती हैं, जिससे कि वह नरम हो जाएं फिर घर के काम से निपटा कर शाम होने तक गली में बैठकर रबड़ से धागा व तार खींचने में लग जाती हैं। सर्दियों में व बादल वाले दिनो में महिलाएं मिट्टी की अंगीठी बनाकर उस पर टायर के टुकड़ों नरम करके तार व धागा निकालती हैं।

प्रेम नगर की महिलाएं घर की आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए तार व धागा छीलने का काम करती हैं जिससे की घर में पैसे की तंगी कुछ कम हो सके। लॉकडाउन के समय तार छीलने वाली कुछ महिलाओं से उनकी घरेलू स्थिति के बारे में बात की जिससे उनकी समस्या को जाना।

35 साल की सुलेखा के पति का लॉकडाउन से पहले ही कंपनी में काम करते समय मशीन से उनके एक पांव में चोट आ गई जिसके कारण वह तीन से महीने बिस्तर पर ही रहे। लॉकडाउन खुलने के बाद उनकी फैक्टरी में उन्हे तीसरे दिन बुलाया जाता है, सेलेरी के नाम पर दिहाड़ी दिया जाने लगा। लॉकडाउन से पहले सुलेखा पीस रेट का माल लाकर उसे बनाती थी क्यों,कि उनके पति की तनख्वाह से घर खर्च निकाल पाना पहले से ही मुश्किल हो पाता था और अब पति की तनख्वाह भी कम हो गई।

सुलेखा कहती है कि ‘‘अब तो दो वक्त की रोटी का खर्च भी निकाल पाना मुश्किल हो पाता है, ऊपर से उनकी दवाई का खर्च अलग है, पहले मैं भी कुछ न कुछ काम करती रहती थी, बच्चे अच्छे से पढ़-लिख लेते थे लेकिन अब तो मेरे पास भी कोई काम नहीं है’’।

मूल रूप से बिहार की रहने वाली सुलेखा को प्रेम नगर, अगर नगर में आए 15 साल से ऊपर हो गए, उनके पति अमर कुमार दस साल से रिठाला की एक फैक्टरी में काम करते हैं, जहां हलवाई के काम में इस्तेमाल होने वाले सामान बनाये जाते हैं इस होली से पहले फैक्टरी में काम करते हुए उनके पांव में चोट आ गई जिससे एक पांव खराब हो गया, फैक्टरी मालिक ने तुरन्त उनका इलाज करवा दिया, लेकिन उसके बाद कोई और सुविधा नही दी। पांव में चोट लगने की शिकायत या केस करने की सोचा ही था कि लॉकडाउन हो गया और बात आई गई हो गई। अब मालिक बोलता है कि आना है तो आओ वरना हमेशा के लिए छुट्टी ले लो।

ऐसी स्थिति केवल सुलेखा की ही नही है प्रेम नगर में रहने वाले हर दूसरे घर की लगभग ऐसी ही परिस्थिति है।

सुलेखा पहले तार छीलने का काम करती थी जो कि आठ -दस रुपये प्रतिकिलो में मिलता था। चमड़े के अन्दर रेशम के धागे या फिर तांबे के तार चिपके रहते हैं जिसे गर्म करके छीला जाता है। रेशम में धागे निकालने वाला चमड़ा आठ रुपये प्रति किलो मिलता है और तांबे का तार निकालने वाला चमड़ा दस रुपये प्रतिकिलो।

सुलेखा बताती है कि चमड़ों से तार निकालने में हाथ की अंगुलियों के किनारे कट जाते हैं, चमड़े से तार निकालना धागे निकालने से ज्यादा कठिन है क्योंकि कई बार तार छीलते हुए हमारी अंगुलियों मे घुस जाता है।

एक अन्य महिला लीला देवी भी चमड़े से तार निकालने का काम करती थी वो बताती है कि ‘‘कई बार जब हम तार को प्लास से अपनी ओर खींचते हैं तो वो कहीं कही छू जाने मात्र से पेट पर या कलाई पर घुस जाता था, जिससे तुरन्त खून आने लगता था, लीलादेवी अपने पेट पर बने निशान दिखाती है जो कि चमड़े से तार छीलने के दौरान बने।

प्रेम नगर-3 जिसे अगर नगर भी कहा जाता है, यहां पर बड़ी संख्या में महिलायें इस काम को करती हैं। सुलेखा के पति को ये काम पसन्द नहीं था इसलिए सुलेखा ने दो साल पहले इस काम को छोड़ कर बालों में लगाये जाने वाले रबर के छल्ले बनाने का काम किया, जो कि 8 रुपये दर्जन में मिलता था। परिवार के सभी लोगों के लगने पर पूरे दिन भर में वो 10 दर्जन बना लेती थी, और कभी कभी 7 दर्जन ही निकाल पाती थी। उसके बाद सिले हुए थैले पलटने का काम करने लगी जिससे घर में सब्जी रोटी का जुगाड़ हो जाता था। लेकिन अब लॉकडाउन के बाद कोई भी काम नहीं मिल रहा है।

इसी कलोनी में रहने वाली लीला देवी 2001 में बिहार मुज्फ्फरपुर से पति के साथ शहर आई, उनके पति रिक्शा चलाते थे, लेकिन उनकी इतनी आय नहीं थी कि उनके चार बच्चे पल सकें, इसलिए लीला नजफगढ़ में कोठीयों मे काम करने लगी उसके बाद वह तार छीलने का काम करने लगी थी जिसमें वह महीने में तीन से चार हजार रुपये कमा लेती थी, लेकिन बार- बार हाथ में घाव हो जाने के कारण और सास की समस्या हो जाने के कारण उन्होंने यह काम छोड़ दिया और एक जूता फैक्टरी में काम करने लगी, लेकिन वहां समय से पैसा नहीं मिलता है।

तार छीलने के काम में भले ही तकलीफ है लेकिन अगर नगर प्रेम नगर की मजदूर औरतों के लिए ये काम राहत का है क्योंकि फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर की कमाई से घर चलाना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में महिलाएं घर की देखभाल के साथ-साथ इस काम से घर खर्च में हाथ बंटाती हैं। यहां की हर गली में इस काम को करते देखा सकता हैं।

यहां रहने वाली गीता देवी भी इस काम को करती थी लेकिन हाल ही में अब उन्होंने ये काम छोड़ दिया, वह बताती है कि ‘‘जब मैं चमड़े का माल बनाती थी तब उनको हमेशा खांसी आती रहती थी। मेरी साड़ियां और हाथ एकदम काले हो जाते थे, अंगुलियों में चोट लगती सो अलग, इसलिए अब यह काम छोड़ दिया।“

वही पर रह रही बादामी देवी (50 साल) भी कई सालों से तार छीलने का काम कर रही है वह बताती है कि ‘वह कई सालों से तार छीलने का काम कर रही है वो और उनके पति अब बूढ़े हो चुके हैं और बेटे और बहू अलग रह रहे हैं ऐसे में तार छीलकर चार से पांच हजार रुपये महीने तक कमा लेती है जिससे घर खर्च चलता है। वह बताती है कि अच्छे माल से 20 से 25 किलो रबड़ से धागा व तार निकालने (The work of removing thread and wire from rubber) में 3 से 4 दिन लग जाते हैं, यदि माल खराब हुआ तो हफ्ता या दस दिन भी लग जाते हैं। इसके साथ ही यह भी है कि पुराना माल साफ कर देने पर ही पुराना माल दिया जाता है, लेकिन लॉकडाउन के समय तार छीलने वाला काम आना बन्द हो गया और माल देने वाले मालिक लोग अपने गाव भाग गए, यहां की हर महिला का एक से दो हजार बकाया है जो कि मालिकों ने नहीं दिया और अभी लॉकडाउन खुल जाने के बाद भी मालिक वापिस नहीं आया है। ऐसे में वहां की महिलाएं अब अपने पैसों के मिल पाने की आस छोड़ चुकी हैं। घरेलू महिलाओं के इस काम की गिनती न ही घर के बाहर कमाने वाले सदस्य करते हैं और न ही बाहर के लोग। ये एक तरह का छुपा हुआ शोषण है जिसे शोषित होने वाली महिलाएं भी नहीं जान पाती हैं।

डॉ. अशोक कुमारी

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें