शिवरात्रि पर स्वामी दयानंद की कथा और आर्य समाज की शोकांतिका !!

शिवरात्रि पर स्वामी दयानंद की कथा और आर्य समाज की शोकांतिका !!

The story of Swami Dayanand and the mourning of Arya Samaj on Shivratri !!

शिवरात्रि पर स्वामी दयानंद की याद क्यों आती है? (Why is Swami Dayanand remembered on Shivratri?)

शिव का व्यक्तित्व (Personality of Shiva) हमेशा आकर्षित करता है। वे अकेले अनार्य देवता हैं जिनकी ठसक इतनी जोरदार और आदिम समाज के जमाने से जमी जड़ें इतनी मजबूत थी कि लिखापढ़ी में उनकी निंदा और भर्त्सना करने वाले आर्यों को भी उन्हें न केवल स्वीकार करना पड़ा बल्कि महा-देव की पदवी देने के लिए भी मजबूर होना पड़ा। मगर इसके बावजूद शिवरात्रि पर शंकर की नहीं मूलशंकर (दयानन्द सरस्वती) की याद आती है। एक तो इसलिए कि पूरी स्कूली पढ़ाई लश्कर ग्वालियर के डीएवी (शुरुआत में डीएवी का मतलब दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयMeaning of DAV Dayanand Anglo Vedic School हुआ करता था – बाद में ये दयानन्द आर्य विद्यालय हो गए ) स्कूल में की जहां परीक्षा में आर्य समाज के दो नियम अनिवार्यतः पूछे जाते थे और सही बताने पर 4 नंबर मिला करते थे।

We should not worship such a helpless God.

उसी दौरान सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा। इसलिए भी कि बाद में सनातनी हो गए इकलौते मामा ने अपने साधू जीवन की शुरुआत आर्यसमाजी होकर की थी। इस आर्यसमाज की स्थापना का कारण शिवरात्रि थी, क्योंकि इसी पर्व पर धर्मालु बालक मूलशंकर का मोहभंग हुआ था जब उन्होंने देखा कि शिव पर चढ़े प्रसाद को चूहे खा रहे हैं। उन्होंने सोचा कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।

यही से शुरू हुयी वह जिज्ञासा जिसे आगे बढ़ाते हुए मूलशंकर दयानन्द सरस्वती बने। शुरुआत उन्होंने उसी हिंदू धर्म में फैली बुराइयों व पाखण्डों के खण्डन से की जिस हिंदूधर्म में उनका जन्म हुआ हुआ था, मगर वे यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने सभी धर्मों में फैली बुराइयों का विरोध किया चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो। उन्होंने जातिप्रथा को भी अस्वीकार किया और इस तरह वे सिर्फ एक धर्म सुधारक बन कर नहीं रहे एक तरह के सामाजिक सुधार की प्रक्रिया भी शुरू की जिसने अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद भारत में – विशेषकर हिमालय से विंध्य तक के भारत में – काफी हद तक सामाजिक जड़ता तोड़ी। उस जमाने में यह बहुत आगे की बात थी। आज के जमाने में भी यह कम मुश्किल नहीं होता – क्या पता वे भी यूएपीए की राष्ट्रद्रोह की धारा में किसी कारागार में बंद तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीखें गिन रहे होते।

 बहरहाल यहां प्रसंग स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२४-१८८३) की जीवनगाथा नहीं उनके द्वारा खड़े किये गए आर्यसमाज की शोकांतिका है।

कहाँ गया आर्य समाज ?

एक जमाने में पूरे उत्तर भारत में जिस आर्य समाज ने सनातनियों को शास्त्रार्थ में निरुत्तरित और हक्का बक्का करके पीछे छोड़ दिया था आज उन्ही सनातनियों ने, बिना डकार लिए, आर्यसमाज को गड़प कर लिया है। मूर्तिपूजा को मनुष्यता की गरिमा गिराने वाला बताने वाले आर्य संस्थान, उनके विद्यालय और उनके अनुयायी “रामलला हम आएंगे – मंदिर वही बनायेंगे” का राग अलाप रहे हैं। संघियों के कब्जे में पहुँच कर पूरे प्राणपण से सनातन धर्म की पुनर्प्राणप्रतिष्ठा में लीन हैं। पिछले दिनों इन्हीं ने रामकृष्ण परमहंस द्वारा स्थापित और स्वामी विवेकानंद द्वारा परिवर्धित और परिमार्जित नव वेदांती दर्शन की इस प्रतिष्ठित संस्था रामकृष्ण आश्रम के कर्नाटक केंद्र पर हल्ला बोल दिया था। क्योंकि इस आश्रम के स्वामी भावेशानंद ने कह दिया था कि “हिजाब को लेकर कर्नाटक के स्कूल कॉलेजों में फैलाया जा रहा हानिकारक विवाद अनावश्यक है, यह शांति और सद्भाव के हित में नहीं है। इसे लेकर कर्नाटक के समाज जो विद्वेष पैदा किया जा रहा है वह खराब बात है, यह सबके लिए अहितकारी है।”

आर्य समाज विलुप्त क्यों हो गया? | Why did the Arya Samaj become extinct?

आर्य समाज का विलुप्त हो जाना या रामकृष्ण आश्रम को निशाने पर लेना अनायास नहीं है, ना ही यह सिर्फ एक मुद्दे पर दृढ़ राय देने की वजह से आयी उन्मादियों की प्रतिक्रिया है। यह उस राजनीतिक महापरियोजना को लागू करने की साजिश का एक और चरण है जिसका अंतिम लक्ष्य भारत में सनातन धर्म पर आधारित हिन्दू-राष्ट्र की स्थापना करना है। इस महा परियोजना की एक क्रोनोलॉजी है – शेष सभी धर्म, स्वयं हिन्दू धर्म के मत, पंथ, सम्प्रदाय, दर्शन, विचार और परम्पराओं का खात्मा इसका मिशन है।

What is Sanatan in Sanatan Dharma?

सनातन धर्म में सनातन क्या है इसे आज तक कोई सनातनी भी नहीं समझ पाया है, अब जब खुद ही नहीं समझ पाया तो बाकियों को समझाने का सवाल उठाने का तो सवाल ही नहीं उठता !! यूं तो उनके दोनों ही ब्रह्मसूत्र; हिन्दू और सनातन रचे और गढ़े शब्द हैं। हिन्दू शब्द की तो व्युत्पत्ति ही देशज नहीं है। इसी तरह कोई साफ़ साफ़ परिभाषित, सर्वस्वीकार्य प्रथाओं, प्रणालियों वाला कोई सनातन तो छोड़िये हिन्दू धर्म भी नहीं हैं।

डॉ आंबेडकर अपनी किताब “रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म” (हिन्दू धर्म की पहेलियाँ) की 24 गुत्थियों में यह सवाल बहुत साफ़ साफ़ 1955 के नवम्बर में ही उठा चुके हैं जिसका कोई तार्किक या अतार्किक जवाब पिछली 66 वर्षों में नहीं आया। एक दूसरे से असहमत और विरोधी बीसियों पंथ, सैकड़ों सम्प्रदाय, हजारों प्रथाओं, दसियों हजार मत और अनगिनत अंतर्धाराओं वाले हिन्दू धर्म की विशेषता उसकी असीमित विविधता ही है।

यदि वैदिक धर्म को ही हिन्दू धर्म मानने की कुछ लोगों की हठ को मान भी लें तो उसमे भी 4 वेद, 14 ब्राह्मण ग्रन्थ, 7 आरण्यक , 108 उपनिषद और 18 पुराण हैं। इनमे से दर्शन, ईश्वर और पूजा पाठ प्रणाली के मामले भी कोई भी एक दूसरे के मत का समर्थन नहीं करता – बल्कि भिन्न, यहां तक कि प्रतिकूल और विपरीत राय देता है। जिनकी गीता को सनातनी अपने धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक बताने पर इन दिनों आमादा-ए-फसाद रहते हैं वे कृष्ण भी कह गए हैं कि “धर्म वह है जो परिस्थितियों और समय के हिसाब से बदलता रहता है – जो नहीं बदलता है वह अधर्म है।”

इस तरह किसी धर्म के सनातन होने का दावा ही धर्मसम्मत नहीं बैठता। हिन्दू धार्मिक परम्पराओं में यदि कुछ सनातन है तो वह अंतर्विरोधों और असहमतियों की निरंतरता ही है।

शोषण के कारगर औजार के रूप में गढ़े गये वर्णाश्रमी ब्राह्मणवादी धर्म के द्वारा समाज पर थोपी गयी जड़ता के विरूद्ध उपजा अंतर्विरोध और दर्शन तथा धर्म की भाषा में उसकी अभिव्यक्ति तथा उसके खिलाफ हुआ संघर्ष ही था जो समय समय पर भारत में अलग अलग दार्शनिक परम्पराओं और उनके आधार पर नए नए धर्मों के अस्तित्व में आने का कारण बना।

लोकायत की समृद्ध परम्परा के अलावा जैन और बौद्ध और सबसे ताजा सिख धर्म इसी ऐतिहासिक संघर्ष के परिणाम थे। आर्यसमाज भी इनमें से एक था। इन सबने अपने-अपने कालखण्ड में भारतीय समाज की जड़ता को तोड़ा, नतीजे में समाज ने आगे की तरफ प्रगति की। विज्ञान, गणित, कला, स्थापत्य, चिकित्सा विज्ञान, भाषा, व्याकरण, कृषि तथा व्यापार के क्षेत्रों में तेजी के साथ नयी खोजें, आविष्कार और अनुसंधान हुए।

आरएसएस जिस सनातन धर्म की स्थापना की बात करता है वह भारतीय परम्पराओं के इस पूरे विकास क्रम और इस तरह खुद हिन्दू धर्म का निषेध है। उनका सनातन धर्म शुद्ध अर्थों में मनुस्मृति, गौतम स्मृति और नारद संहिताओं जैसी गैर दार्शनिक और अधार्मिक किताबों में लिखी यंत्रणा पूर्ण समाज व्यवस्था और सती प्रथा जैसी बर्बरताओं की बहाली है और इस तरह कुछ हजार वर्षों के मंथन तथा संघर्षों के हासिल को छीनकर भारत को एक घुटन भरे बंद समाज में बदल देने की महा परियोजना है। स्वयं निजी जीवन में नास्तिक सावरकर और आरएसएस के गुरु कहे जाने वाले गोलवलकर सहित संघ के अनेक सरसंघचालक इसे लिखा-पढ़ी में कह चुके हैं।

यह दुष्ट परियोजना ब्राह्मणवादी धर्म की यातनापूर्ण जकड़न के खिलाफ हिन्दू परम्पराओं के भीतर पिछली कई सदियों में चले ब्रह्मो समाज, आर्यसमाज जैसे सुधारवादी आंदोलनों तथा राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद जैसे सुधारवादियों का भी नकार है। इस तरह कुल मिलाकर यह धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में ऐसी प्रतिक्रांति है जिसके बाद कुछ भी साबुत नहीं बचने वाला है।

जाहिर है कि यह सब कर पाना बहुत सहज और आसान नहीं होगा। इसलिए उनके निशाने पर वह सब हैं जो उनकी कूपमंडूकता और प्रतिगामिता को चुनौती देते हैं। भारत की जमीन पर जन्मे सबसे प्राचीन नास्तिक दर्शन – जैन धर्म – को वे पिछली कुछ दशकों में लगभग हजम कर चुके हैं। बुद्ध थोड़े ज्यादा ही कठिन हैं – उनके मठों, विहारों, ग्रंथों का ध्वंस करने, भिक्खुओं और बौद्ध अनुयायियों के सर कलम करने और ऐसा करते हुए जिस देश में यह धर्म पैदा हुआ और दुनिया का तीसरा बड़ा धर्म बना उसे उसी देश में खत्म करने की बर्बरता और खुद गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतारों में शामिल करने की चतुराई के बावजूद उन्हें पचा पाना मुश्किल है। इसलिए वे अब भी उसके खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं। उनका प्रचार है कि “बुद्धिज्म एक राष्ट्रविरोधी, मूर्खतापूर्ण और भारत विरोधी धर्म है”और यह भी कि “भारत के दुर्दिनों के लिए यह धर्म जिम्मेदार है। अशोक के बौद्ध बनने के बाद से उनके अहिंसा के प्रचार के कारण भारत पर विदेशी हमले बढे और यूनानियों ने वैदिक धर्म पर हमले कर उसे नुकसान पहुंचाया।”

अलग तीव्रता के साथ यही रुख सिख धर्म के प्रति है। यही लोग पंजाब में 1961 की जनगणना के समय पंजाबी की जगह हिंदी को मातृभाषा लिखवाने की विषाक्त मुहिम चलाकर एक तरफ हिन्दू और सिखों के बीच खाई खोदते रहे हैं दूसरी तरफ सिख धर्म को हिन्दू धर्म का ही एक अंग बताते रहे हैं। बंगाल और दक्षिण के मजबूत सुधार आंदोलनों के प्रति इनकी नफ़रत ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति को तोड़े जाने और केरल में जनप्रिय राजा बाली के बरक्स उन्हें ठगकर मारने वाले वामन की पुनर्प्राणप्रतिष्ठा की मुहिम में देखी जा सकती है। अब वे विवेकानंद के रामकृष्ण आश्रम के खिलाफ आये हैं।

ठीक यही वजह है कि शिवरात्रि के दिन हमें शिव से ज्यादा स्वामी दयानन्द सरस्वती याद आ रहे हैं।

बादल सरोज

सम्पादक लोकजतन, संयुक्त सचिव अखिल भारतीय किसान सभा

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