प्रेमचन्द का पाठ वस्तुतः गरीब, दरिद्र और वंचितों का पाठ है

Munshi Premchand

प्रेमचंद और आलोचना की चुनौतियाँ -1 | Premchand and the challenges of criticism-1

इस समय आलोचना जिस संकट में है उसमें नए –पुराने दोनों ही किस्म के समालोचकों के पास जाने की जरूरत है। आलोचना के संकटग्रस्त होने की अवस्था में पुराने आलोचक और सिद्धांत ज्यादा मदद करते हैं। हिन्दी में नया संकट दो स्तर पर है। पहला संकट यथार्थबोध के अभाव से पैदा हुआ है। जबकि दूसरा संकट अर्थ-निर्णय के सवालों से जुड़ा है। इस संकट की प्रतिनिधि अभिव्यक्ति देखनी हो तो नामवर सिंह के नजरिए में देख सकते हैं। मेरे सामने उनकी नई किताब ´प्रेमचंद और भारतीय समाज´(2010)है। इस किताब का पहला निबंध है ´हिन्दी के पहले प्रगतिशील लेखक´। इस निबंध में उन्होंने प्रेमचन्द को पहला प्रगतिशील लेखक करार दिया है।

नामवर सिंह ने लिखा है,

´प्रेमचन्द ने सन् 1930 के आसपास एलानिया तौर पर कहा था कि वे जो कुछ लिख रहे हैं वह स्वराज के लिए, उपनिवेशवादी शासन से भारत को मुक्त कराने के लिए लिख रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा है कि केवल जॉन की जगह गोविन्द को बैठा देना ही स्वराज्य नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वाधीनता भी होना चाहिए। सामाजिक स्वाधीनता से उनका तात्पर्य सम्प्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत से मुक्ति और स्त्रियों की स्वाधीनता से भी था।´ (पृ..15)

इस प्रसंग में मूल सवाल उठता है कि लंदन में बैठे लेखक पहले प्रगतिशील लेखक हैं या प्रेमचन्द ॽ

लंदन में बैठे युवा लेखकों ने पहली बार प्रगतिशील साहित्य का सपना देखा। प्रगतिशील लेखक संघ की वैचारिक बुनियाद उन्हीं लेखकों ने डाली, फिर उनको पहले लेखक की पंक्ति में रखने की बजाय नामवरजी ने प्रेमचन्द को हिन्दी का पहला प्रगतिशील लेखक क्यों कहा ॽ

इसके अलावा नामवरजी ने यह भी लिखा है, ´यद्यपि लोग उन्हें गांधीवादी कहते हैं, लेकिन वे गांधी से दो कदम आगे बढ़कर आन्दोलन और क्रांति की बात करते हैं। प्रेमचन्द अपने जमाने के साहित्यकारों से ज्यादा बुनियादी परिवर्तन की बात करते हैं।´ यानी उनके नजरिए का एक नया पहलू है आंदोलन और क्रांति से साहित्य को जोड़कर देखना।

इसके अलावा नामवरजी ने यह भी रेखांकित किया कि साम्प्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई लड़ना भी प्रगतिशील दृष्टिकोण का मुख्य पहलू है।

नामवरजी के प्रेमचन्द संबंधी मूल्यांकन में कहीं-कहीं अतिरेक भी है जोकि संतुलन की मांग करता है। मसलन्, एक जगह वे लिखते हैं,´जब गांधीजी ने भारत की राजनीति में प्रवेश किया और उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में गाँवों की करोड़ों जनता का भाग लेने के लिए आह्वान किया। प्रेमचन्द पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने भारत की इस नई राष्ट्रीय चेतना को अपने साहित्य में वाणी दी।´(पृ.19)

यह जो प्रेमचन्द को पहला साहित्यकार बनाने का संकल्प नामवरजी के निबंधों में बार-बार व्यक्त हो रहा है यह मूलतः अतिरेक है। यह आलोचना में गैर-जरूरी तत्व है। यहां हम नामवरजी द्वारा प्रेमचन्द के मूल्यांकन के प्रसंग में उठाए कुछ प्रमुख सवालों पर विचार करेंगे।

प्रेमचन्द हिन्दी में नयी सभ्यता और आधुनिक संस्कृति के सबसे जागरूक लेखकों में अग्रणी हैं।

प्रेमचन्द के विचारों में जो ऊर्जा है, प्रेरणा है और ताजगी है वह अन्यत्र दुर्लभ है। आज के भारत की अनसुलझी बुनियादी समस्याओं के समाधान प्रेमचन्द के विचारों में खोजे जा सकते हैं। आज भारत में अनेक ज्वलंत समस्याएं हैं। इनमें से कुछ समस्याएं संस्कृति की हैं तो कुछ राजनीतिक क्षेत्र की हैं तो कुछ समस्याएं सामाजिक हैं।

अधिकतर बुद्धिजीवियों की मुश्किल यह है कि वे अपने पूर्वजों से प्रेरणा लेने की बजाय उनकी पूजा करते हैं या एकदम अस्वीकार करते हैं या उपेक्षा करते हैं। प्रेमचन्द उन लेखकों में से एक हैं जिनका प्रतिक्रियावादी विचारक, राजनीतिक दल एवं संस्थाएं अपने लिए इस्तेमाल नहीं कर पातीं।

प्रेमचन्द के पाठ और विचारों की यह विशेषता है कि उसका संरचनावादी, रूपवादी, उत्तर संरचनावादी, उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण से सही मूल्यांकन संभव नहीं है।

प्रेमचन्द की खूबी है कि उनके विचारों में निश्चित दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है। अनिश्चित या अस्पष्ट नजरिए का निषेध उनके नजरिए की विशेषता है। अनिश्चितता और अस्पष्टता की सैद्धान्तिक संरचनाओं का निषेध करते हुए सुनिश्चित धारणाओं का समग्रता में निर्माण साहित्य-संस्कृति की दीर्घकालीन और तात्कालिक समस्याओं के समाधान में पग-पग पर हमारी मदद करता है। यही वजह है प्रेमचन्द जितनी बार पढ़े जाते हैं उतनी ही बार कुछ न कुछ नया मिलता है। नवीन से नवीन समस्या का वे नया समाधान पेश करते हैं। आज के भारत की क्रमशः सबसे ज्वलंत समस्याएं हैं गरीबी, धार्मिकता,स्त्रियों के समान अधिकार, साम्प्रदायिकता, संस्कृति, जातीयता, जातिप्रथा आदि।

गांव के गरीबों की समस्या प्रेमचन्द लेखन की धुरी है। गरीबों को उनकी पामाली से मुक्त करने का सपना उनके साहित्य का मुख्य लक्ष्य है। गरीबों को गरीबी से मुक्ति दिलाने में बुर्जुआजी या वर्चस्वशाली वर्ग सफल होगा, इस पर प्रेमचन्द को संदेह था।

प्रेमचन्द का पाठ वस्तुतः गरीब, दरिद्र और वंचितों का पाठ है। इस पाठ को पढ़ने के लिए गरीबी से मुक्ति का दर्शन चाहिए, विचारधारा चाहिए। उत्तर आधुनिकतावादियों और आधुनिकतावादियों की मुश्किल यह है कि उनके पास दरिद्रता से मुक्ति का कोई दर्शन नहीं है, बल्कि सैद्धांतिक तौर पर उन्होंने दरिद्रता से मुक्ति दिलाने वाले दृष्टिकोण और विचारधारा का विरोध किया है। यही बुनियादी वजह है कि प्रेमचन्द जैसे बड़े लेखक इस तरह के सिद्धांतकारों के मूल्यांकन के केन्द्र में नहीं हैं।

दिलचस्प है कि उत्तर आधुनिकता और आधुनिकतावादी चिंतन का ढोल पीटने वालों ने अभी तक गरीबीं से मुक्ति का कोई फार्मूला तक नहीं सुझाया ! गरीबी से मुक्ति का दर्शन तो बहुत दूर की बात है!
Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

गरीबी हमारे गांव की कठोर वास्तविकता है, वही हमारे समाज की अनेक समस्याओं की जननी है। गरीबी को हम जितने करीब से जानते हैं, गहराई में जाकर असका अध्ययन करते हैं, संवेदनात्मक धरातल पर जाकर महसूस करते हैं उतने ही ज्यादा हमारे मन में उससे मुक्ति के लिए बेचैनी पैदा होती है। उससे मुक्ति के प्रयत्नों की तरफ मुखातिब होने की ललक पैदा होती है।

प्रेमचन्द के नजरिए की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता है कि उन्होंने ´व्यवस्था´ का समग्रता में मूल्यांकन और चित्रण किया है। उससे भविष्य का रास्ता खोजने में मदद मिलती है, समस्याओं और अन्तर्विरोधों को देखने में मदद मिलती है।´व्यवस्था´उनके लिए एक वर्गीय संरचना है। जीवन मूल्यों के उत्पादन और पुनरूत्पादन का स्रोत है। जबकि उत्तर-आधुनिकतावादियों और आधुनिकतावादियों के यहां´व्यवस्था´ के बारे में चमत्कृत भाषा में व्याख्याएं तो हैं। लेकिन ´व्यवस्था´का कोई समग्र और सुसंगत विश्लेषण नहीं मिलता। वे यह भी बताने में असमर्थ हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था या पूर्व-पूंजीवादी व्यवस्था में कोई फिनोमिना किसी खास समय पर ही क्यों पैदा हुआ ॽ उस फिनोमिना में निहित अंतर्विरोधों को कैसे हल करें ॽ आदि सवालों के उनके पास कोई समाधान नहीं हैं। इसके विपरीत प्रेमचन्द ´व्यवस्था´के गर्भ से पैदा होने वाले फिनोमिना का मूल्यांकन करते हैं, उसके बुनियादी अन्तर्विरोधों पर प्रकाश डालते हैं और इस प्रक्रिया में पैदा होने वाले मूल्यों और उनके सर्जक भोक्ता वर्गों की मीमांसा भी करते हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

Topics – Premchand and Indian Society, Namwar Singh’s views on Premchand, व्यवस्था के बुनियादी अंतर्विरोधों पर प्रेमचंद, Premchand on the basic contradictions of the system,

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